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मेरे पास मजदूर मां है : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 15 - 21 मई 2013 अंक में प्रकाशित

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  • नुक्‍कड़

  • मेरे पास मजदूर मां है



    -    अविनाश वाचस्पति



    ‘’तुझको नहीं देखा हमने कभी/पर इसकी जरूरत क्या होगी

    ऐ मां तेरी सूरत से अलग/भगवान की सूरत क्या  होगी ‘’



    वर्ष 1968 में प्रदर्शित ‘दादी मां’ फिल्म का यह गीत मां की महिमा बखान देता है पर आज हालात खतरनाक हो चुके हैं। मां की महिमा लिए हुए मई महीने के पहले दिन की शुरूआत मजदूर दिवस से हो गई है। हर बार होती है इसमें नया क्या है,  ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है।  इस बार कुछ नया घटने के नाम पर बढ़ा ही है। उस बढ़ोतरी में इस बार चर्चा में मां का मजदूरीय स्वरूप भी है।  जो महीने के दूसरे रविवार को मां दिवस के साथ मौजूद है। इस बार मां है, मजदूरी है और इनके साथ जुड़ी मजबूरी है। ‘मेरे पास मां है’ से कहना अधिक सटीक यह बनता है कि ‘मेरे पास मजदूर मां है’। देश में शोषण का शिकार हो रहे करोड़ों मजदूर हैं। हर जगह परोक्ष तौर पर मजदूरी की मजबूरी का ही यशोगान हो रहा है। सिनेमा हो या वास्तविकता, हालात जुदा नहीं हैं। कहीं दिखाई दे जाते हैं, कहीं दिखाए नहीं जाते। जो पेश किया जाता है, वह लुभाता है। इतना लुभाता है कि सुपरहिट संवाद बन जाता है।

    मां प्रथमतः एक नारी है, वही नारी जो पत्नी रूप में भी पुरुष के पास मौजूद है, कहा जाता है कि वह कंधे के साथ कंधा मिलाकर डटी है। फिर उस जुझारू नारी को इतना सम्मान क्योंा नहीं मिल रहा है।  वह सम्मान उसे क्यों अपने पुत्र से मिल रहा है जबकि पत्नी के रूप में नारी अधिक सम्मान की अधिकारिणी है। ससुराल में जिम्मेदारियां संभालते समय उसके पास अनुभव का बड़ा संसार भी नहीं था, जूझने का वह माद्दा भी नहीं था जिसके बल पर वह सबसे जूझती रही। पत्नी के रूप में उसके हिस्से एक से बढ़कर एक जिम्मेदारी आई और पूरी न किए जाने पर या उनमें प्रौढ़ता न पाए जाने पर उसे बुरा-बुरा ही कहा गया। किसी ने उसे नहीं बख्शा। उसकी हालत मजदूरों वाली बनी रही। आप यह सब सिनेमा के परदे पर देखते रहे हैं। पर आपको अगर लगता है कि उसमें रत्ती भर भी फर्क पड़ा है, तो अपने भ्रम से बाहर निकल आइए, राजस्थान की प्रथम महिला कुली मंजू देवी का उदाहरण पेश है। मंजू के जयपुर रेलवे स्टेथशन पर कार्यरत् कुली पति महादेव की बीमारी से मृत्यु होने पर मंजू ने बच्चों और अपना जीवन चलाने के लिए कुली का पेशा अपना लिया है। रेलवे से उन्हें सहयोग मिला और उनके स्वर्गीय पति का कुली लाइसेंस उनके नाम ट्रांसफर करके बैज नंबर 15 जारी किया गया। मंजू अपने इस निर्णय से गर्वित हैं। उनकी मनोकामना है कि अब अपने बच्चों  को गांव से जयपुर लाकर अपनी मेहनत की कमाई से पढ़ा लिखाकर अच्छा इंसान बनाएंगी। मां की मजदूरी के इस जज्बे को सलाम है। उनकी मनोकामना पूरी हो, ऐसी सच्ची कामना दिल कर रहा है। पर यह कामना क्या एक अच्छी भावना है, क्यांे यही इंसानियत है कि नारी कुली बने, यह मजदूरी ही मजबूरी है, जो कि शर्मनाक है। मंजू के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है पर पुरुष वर्ग को इस पर शर्म से डूब मरना चाहिए। मैं कहने के लिए मजबूर हैं कि ‘‘पहले आती थी हर बात पर शर्म, पर अब किसी बात पर नहीं आती।‘‘

    इस मुद्दे पर विचार करने के लिए सिनेमा से बड़ा, व्यापक, उपयोगी और कोई मंच नहीं हो सकता। सारे देश की नारियां एक मंच पर आ जाएं, तब भी फिल्मों  से बड़ा मंच मिलने की कल्पना नहीं की जा सकती। विडंबना यह है कि इन पर उथले रूप में ही विचार किया गया है।  जिससे फिल्में बनाने और उसमें काम करने वालों का भला हुआ पर उस नारी का कतई हित नहीं सध सका, जिसकी उसको जरूरत थी, जरूरत है और भविष्य में भी बनी रहेगी। मां का यह भव्य  रूप फिल्मों में जितने आकर्षक और लुभावने रूप में परिलक्षित होता है उसकी दिव्यता का अहसास और कहीं नहीं हो सकता। समाज में हालत इससे बहुत बदतर हैं। समझ लीजिए कि नारी फिर से बंधुआ होने की ओर अग्रसर हो चुकी है। एक तरफ विकास और दूसरी तरफ घोर सत्यानाश। कहीं बिक रही है, कहीं जिस्म बेच रही है, कहीं नचाई जा रही है और कहीं पर वस्तुओं को बेचने के लिए सजाई जा रही है। अब कोई क्या करे, जब नारी की फितरत ही ऐसी हो गई पर इसके लिए जिम्मेदार हम ही हैं। यह सब नारी के लिए सजा ही है। वह बात दीगर है कि इसमें भी मजा लेने की मानसिकता बन चुकी है और उसी से नैतिकता और मानवीय मूल्यों  का बेड़ा गर्क हुआ जा रहा है।

    नारी की स्थिति वैसे फिल्मों और समाज में जितने पतन की ओर जा रही है, उस पर सिर्फ विचार करने और लिखने-छपने से कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं है। पुरुषों के मुकाबले गिरता-बिगड़ता संतुलन बहुत भयावह स्थिति में पहुंच चुका है। आज देश के कई भागों से नारी के बिकने की खबरें आ रही हैं। नारी के बदतर हालात रोंगटे खड़े करने के लिए काफी हैं। मीडिया और फिल्में  नारी का जो रूप प्रचारित-प्रसारित कर रहा है, वह बाजार से प्रभावित है। इस बहाने ‘धन दे मातरम्’ को सफलता का पैमाना बना कर अमल में लाया जा रहा है।

    नारी वस्तुतः करुणा की प्रतिमूर्ति है, ममता की ठंडी छांव है और छांव में आंच लगाने की खबरें जब-तब दिल को बेचैन करती रहती हैं। ऐसी कितनी उपमाएं विसंगतियों से बच नहीं पाई हैं। असली स्थिति से बहुत डर लगता है। उपमाएं मिथ्या  नहीं हैं किंतु उनके बिगड़ते स्वरूप के लिए मूल रूप से पुरुष वर्ग ही अपराधी है, यह भी सच नहीं है। हम सब रोजाना बढ़ती कड़वाहट से रूबरू हो रहे हैं। समाज की रक्षा के सन्नद्ध पुलिस नारी पर डंडे चलाने से, थप्पड़ मारने से बाज नहीं आ रही है।

    नारी की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करने का जज्बा जब-जब जनमानस में सुलगता है तो यूं प्रतीत होता है कि सारी कायनात इसकी बेहतरी के लिए जुटी हुई है क्योंकि चारों ओर मोमबत्तियों का उजाला चमकने लगता है। सच कहूं कि नारी की सारी दुनिया ही लुटी हुई है। वास्तुविक रूप में फिल्मों में खामी है। अब वह कहां है उसे सब पहचानते भी हैं, पर सब इसके आगे मजबूर हो जाते हैं। वस्तुतः खामी मन में है, मन पर हम विजय प्राप्त नहीं कर सके हैं। भीतर और बाहर का मन इसके लिए जिम्मेदार है। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं, नारी के मन में ऐसा नहीं है, कुछ नारी मन भी विकृति के इस संजाल से ग्रसित हो चुके हैं। नारी के मन में भी बतौर मां अपनी संतानों के प्रति भेदभाव पनपता है, कायम रहता है और वे चाहकर भी इससे मुक्त नहीं रह पाती हैं। इनके कारणों में उनका भोगा हुआ यथार्थ अतीत बनकर सामने खड़ा है, जिसका शमन किया जाना जरूरी है। पर समाज की अन्य बुराइयों की तरह यह बुराई भी समाज से समूचे तौर पर दूर नहीं की जा सकी है। फिल्मों  में इसे विलेनत्व कहा गया है। विलेनत्व सिर्फ पुरुष मन में ही होगा, ऐसा नहीं है वह नारी, किशोर और बालकों के मन पर गंदा गहरा असर डालकर उसे जहरीला बना रहा है। ईर्ष्या, जलन, कुढ़न, प्रतिद्वंद्विता जैसी बुराइयां नारी मन को विद्वेष से भरती जा रही हैं। फिल्मों में इसका चित्रण इस आशय से किया जाता है कि इसे देख, जान और समझ कर समाज में जागरूकता आए जिससे इस प्रकार की बुराइयों का समूल नाश हो सके। पर जिस प्रकार समाज में बुराइयां रच-बस गई हैं, उसी प्रकार अच्छाइयां भी प्रभावी रहती हैं। यह अपनाने वाले पर है कि वह इसे किस नीयत के साथ अपना रहा है या उसके तौर तरीकों और चित्रण के कारण समाज में अच्छाइयों का बढ़ना सपना ही बना रहेगा। सपना जो सच होना चाहिए, पर हर बार नींद टूटने पर फिर वैसी ही वीभत्स सच्चाई के साथ मौजूद मिलता है। 

    प्रयास जारी हैं, दूसरी मिसाल सनूजा राजन की है। वे बस कंडक्टवरी से पहले नरेगा में मजदूरी कर चुकी हैं, केरल राज्य राजस्व विभाग में चौथे दर्जे की कर्मचारी होने के बावजूद 30 अप्रैल 13 को प्रसारित बिग सिनर्जी के फिल्मी स्टार सुरेश गोपी द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में एक करोड़ की विजेता के तौर पर कीर्तिमान कायम कर चुकी हैं। इससे आशा बंधती है पर फिर दिल दहलाने वाली खबरें आने लगती हैं और सभी आशाओं के बंध टूट-टूट जाते हैं।

    फिल्म एक सशक्त माध्यम है। यह जन को भीतर तक आंदोलित करने में सक्षम है। इसका उपयोग बुराइयों के विनाश में किया जाना चाहिए। नारी की परंपरागत छवि को बेहतर बनाने और समाज में उसे अमली जामा पहनाने के लिए फिल्म माध्यम का जहां भी उपयोग किया गया है, वहां पर बेहतर नतीजे सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस अभी दो महीने पहले ही गुजरा है और कई सालों से गुजर रहा है पर उसके सामने नारी बेबस होकर गुजर जाने को मजबूर है।

    मां को भगवान का दूसरा रूप माना गया है। मुझे इस पर भी आपत्ति है, पहला रूप मां का होना चाहिए। जो ईश्वर को तलाशना चाहते हैं, वे मां से मिल तो लें। फिल्मों में निरूपा राय और ललिता पवार के अभिनय दो किनारे हैं। इनके मध्य राखी, दुर्गा खोटे, नर्गिस, निरुपमा राय, वहीदा रहमान, रीमा लागू जैसी बेमिसाल अदाकाराएं हैं। फिल्मों की सफलताओं में इन मांओं कायोगदान उल्लेखनीय है, जिन पर विमर्श किया जाता रहा है। दोनों की जरूरत है, बाजार के लिए इनकी अनिवार्यता से गुरेज नहीं किया जा सकता।  पर आज ऐसे किरदार धारावाहिकों में भी अपनी प्रशंसनीय सराहनीय आमद दर्ज करा रहे हैं क्योंकि छोटे परदे पर बुराइयों से कमाई का एक बहुत बड़ा बाजार विकसित हो चुका है। इसके चंगुल से निकलना ‘फिल्म और धारावाहिक बनाने वाले सौदेबाजों’ के लिए संभव नहीं है। बुरा पक्ष दिखाई दे पर उससे निकलने का कोई रास्ता न दिखलाए, वह तो बुराई को अपनाने की ओर ही ढकेलेगा। मन को संतुष्टि तो मिलती है लेकिन शायद ही कोई नारी स्वीेकार करती होगी कि उसमें ऐसे दुर्गुणों का समावेश है क्योंकि अपनी बुराइयां और दूसरों की अच्छाइयां कभी न समझ आती हैं और न दिखाई देती हैं। निरूपा राय के ममतामयी मां स्वरूप को प्रदर्शित करके यह उनकी जगह खुद को महसूस करने लगती है। यह तादात्मय फिल्म माध्यम को मजबूती देने वाला एक लोकप्रिय तत्व है। मानकर चलना चाहिए कि इस प्रकार के सार्थक चिंतन उस आग को जीवंत बनाए रखेंगे जो समाज से कुरुपताओं के समूल नाश के लिए सदा से समाज के लिए जरूरी रहे हैं।



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    मां का मतलब हां होता है

  • by
  • अविनाश वाचस्पति
  • हर दिन होता है मां का

    नहीं प्रश्‍न इसमें ना का

    फिर मनाते हैं क्‍यों सब

    सिर्फ एक दिन हां का
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    बॉलीवुड सिने रिपोर्टर के 7 मई 2013 तक के अंक में विसंगति की संगति का समन्‍वयन हैं फिल्‍में

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  • नुक्‍कड़



  • मैं क्या करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया। फिल्म में कलाकार का किरदार एक बुड्ढे का भी और कॉमेडियन का भी। कहां बुढ़ापे के बोर नीरस जीवन के साथ कॉमेडी का भरपूर जलवा। यह फिल्मों  में ही संभव है। फिल्म  में वह सब संभव है जो साहित्य में असंभव है। साहित्य  तो छोड़िए किसी भी रचनात्मक विधा में भी नहीं। फिल्म में सब कुछ घटने के नाम बढ़ता जाता है, सब संभव है। संजीव कुमार नौ जन्म लेते तब भी नौ किरदार बखूबी नहीं निभा पाते लेकिन फिल्म  नया दिन नई रातमें उनकी अदाकारी बेमिसाल साबित हुई। यहां आकाश भी हद नहीं है, इसके बाद और पहले भी उन्होंने कई फिल्मों में अनेक नेक और विलेनत्व पूर्ण किरदार भी निबाहे। वह ठाकुर बनते हैं (शोले) और किसी (खामोशी) में सुनने में असमर्थ पर समझने में माहिर, भांति भांति की दिलकश भ्रांतियां।

    एक फिल्म में चोर बन जाइये, सब कुछ चुरा ले जाइये, अपने चोरत्व का दीवाना दर्शकों को बनाइये। उसके बाद अगली फिल्म  में पुलिस बनकर दर्शकों की गालियों को महसूस कीजिए। फिर किसी फिल्म में ठग, उससे अगली में डकैत, उससे अगली में मजनूं, फिर एक में भिखारी और दूसरे में परोपकारी। विसंगतियां इतना जोर मारती हैं कि एक ही फिल्म में विसंगति की तलवार भांजो दुधारी। डबल रोल का चमत्कार।  विसंगति और गति दोनों तेज गति में। धन भी बरसे, मन भी सरसे। और अब तो हद भी पार हो चुकी है, वास्तवविकता के नाम पर गालियां और भद्दे संवाद बोल रहे हैं, युवा पीढ़ी पसंद कर रही है। फिल्म है इसलिए बेशर्म होकर कपड़े खोलो, लाज शर्म को उतार दो, यह भला क्या बात हुई ? एक से बढ़कर एक सीन को मीन बना दो, सीन में सीना दिखला दो। हसीना दिखला दो। हसीना हो और हंसी न हो तो हंसी के इफेक्ट डलवा लो। पसीने के नाम पर सब खारा और नमकीन बहा दो।

    इससे अगली फिल्म के सीन में कयामत ढा दो, उम्र बढ़ा दो, बाल सफेद चेहरा झुर्रीदार, कंपकंपाती, लड़खड़ाती आवाज, खड़खड़ करता किरदार। दर्शक को सब भाता है, वह मां के नहीं, हसीना के किरदार में किरदार को चाहता है और असल जिंदगी में उसका फैनयानी प्रशंसक बन जाता है। मन को भाती हैं विसंगतियां। वो क्या  करे जो उसको बुड्ढा मिल गया। किसी जवान को बुढ़िया भी मिलेगी, तब आपकी सारी बत्तीसी खिलेगी। विसंगति से संगति का एक-एक जोड़, चिपक कर बन गया है फेविकोल।  जो मल्टीप्लैक्स सिनेमाघर से जोड़ता है। दर्शक शुक्रवार के पहले शो की तरफ पैसे लेकर अंधाधुंध दौड़ लगाता है और टिकट हथियाने में कामयाब हो जाता है। सबसे पहले फिल्म देखता है, बिना यह जाने कि उसमें क्या है, क्यों होगा, पहले दिन, पहला शो फिल्म  का देखना किसी नशे से कम नहीं है। सबसे पहले वेबकूफ बनने में भी विजय हासिल करके रहेंगे,  कोई और कामयाब नहीं होना चाहिए। और भी होते हैं तो होते रहें, कोई दुख नहीं, पर खुद को यह मौका किसी कीमत पर नहीं गंवाना है। वेबकूफ बनाने वाला उसका अपना है, यह सपना नहीं, आज का सच है।

    आइटम सांग झूठ है और झूठ होता है लुभावना।  परदे पर प्रदर्शन झूठ है, क्या  फर्क पड़ता है। मुझे अपने सपनों में खोने दो, शादी हो जाने दो, शादी हो जाएगी’ - मतलब गीतों में भी वेबकूफाई की मलाई सब चाटने खाने को तैयार हैं। झूठ की गाढ़ी मलाई में आनंद है, वह मिलता बनकर परमानंद है। अब शादी न हो, जरूरत भी नहीं है। कानून में मोच नहीं, लोच है। यह लोच फिल्मों में और भी लचीली रसदार लीची के माफिक है। लिव इन रिलेशनशिपसंबंधों का वह जहाज है जो हवा में रहता है और पानी-पानी होते हुए भी पानी से बचा रहता है। सब जानते हैं कि गति सड़क पर गिराती है। शरीर और मन को जख्मी कर देती है, लहू नजर नहीं आता, पर यही जख्म सबको सुकून भरी गुदगुदी से तर कर देते हैं।

    विसंगति की संगति ही हॉरर फिल्म को कॉमेडी बना देती है। विसंगति पॉवरफुल है। संगति धराशायी है, किसी को अच्छी नहीं लगती। दुखांत हो, सुखांत हो - सबमें विसंगति का बोलबाला है, संगति का कर दिया गया मुंह काला है। काला यह कोयला नहीं है, कोयल भी नहीं है पर ऐसी सभी फिल्मों की कुहू कुहू भाती है। बनाओ कुछ, अर्थ निकले कुछ और सचमुच में अर्थ समेट लो, अर्थ जो पैसा है, अर्थ जो जमीन है, अर्थ न हो तो बिजली का करन्ट बहुत तेज लगता है, कई बार प्राण हर लेता है और शरीर को नीले रंग में रंग देता है। निर्माता, निर्देशक, लेखक, तकनीशियन, वितरक सब चकित हैं - दर्शक का रूझान चुनावों के रूझान से भी अधिक रहस्यमयी है। इसमें रहस्य भी मय है। नशा नशा ही होता है, मौका आने पर वह हिरण हो सकता है पर नशा शेर होता है, सवा सेर होता है, डेढ़ सेर होता है - अब जल्दी ही दो सेर होगा। नशा ही फिल्म की शान में दोगुनी चौगुनी चौंसठगुनी बढ़ोतरी करता है और फिल्म  की पहचान बनता है।

    गीत की गति में विसंगतियों की भरमार मिलेगी। दुधारी तलवार ही नहीं, कुंद होती धार भी मिलेगी। जहां धार में राधा का प्रेम भी है, वहां धार में मीरा की भक्ति भी है, बजरंग बली की शक्ति भी है, देवी की महिमा भी है और शरीर की मस्ती भी है, सभी राग और रंग भरपूर हैं - पर इनमें कन्हैया को पहचानना होगा। कन्हैया कौन है, वह दर्शक तो नहीं है। कुछ-कुछ अहसास होता है कि फिल्म  बनाने अथवा बेचने वाला है या फिल्म के किसी किरदार में होगा। और लो मिल गया ओह माई गॉडयानी ओएमजी का बांका, छैल छबीला - अक्षय कुमार मोटरसाईकिल सवार है। बांसुरी में भी खूब फब रहा है। इससे बड़ी विसंगति और क्या होगी कि गैया चराने वाला तेजगति से मोटरसाईकिल चला कर लुभा रहा है, बांसुरी की धुन से सबको दीवाना भी बना रहा है। आज दीवाना बनाना ही कन्हैया होना है, इसमें संगति ही संगति है, आपकी नजर में हो सकती है पर वह विसंगति है भी और नहीं भी। यह दिनन का नहीं, समझ का हेर-फेर है।

    वह यह नहीं गाता है कि ले देती मां मुझे जो बांसुरी तू दो पैसे वाली, किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली और मैं भी कदंब के नीचे बैठ कन्हैया बनता धीरे धीरे। आप पहचान रहे हो, क्या, इस एंगल से सोचा नहीं। आपको सोचने की जरूरत भी नहीं है। सोचने बरगलाने की सारी ठेकेदारी फिल्म वालों की है, उनका अधिकार क्षेत्र है। आपकी घुसपैठ का उसमें कोई स्कोप नहीं है, आपको तो बस हां में हां करते जाना है। फिल्म बनाने वाले की सोच में ताल बैठानी है, ताल में डूबना है, आप डूबेंगे तभी वे ताल में तरेंगे, तरेंगे और तैरेंगे भी और तरंगे महसूस करेंगे आप। आपको निबद्ध होना है क्योंकि आपको सब पका-पकाया मिलेगा। आपके पास करने के लिए और बहुत कुछ है। सोशल मीडिया है, परिवार है, मित्र हैं, आभासी हैं, वास्तविक हैं, चपल चैनल हैं जो सच्चाई से दूर हैं, अखबार हैं जो सच्चाई न बतलाने को मजबूर हैं। संचार के इतने सारे माध्यम हैं। इनके यम का शिकार होकर मय का पान करना है। मायने में रस है, मायने नहीं हैं तब भी क्या हुआ घ् यम डराता है, मय डर भगाती है। एक पास लाता है दूसरा दूर ढकेलता है। एक बटोरता है, दूसरा उंडेलता है। पर इस सारी प्रक्रिया के दौरान आंखों ने मुंदे ही रहना है, उन्हें  नहीं खुलना। यह घूंघट के पट नहीं हैं कि खुलेंगे तो पिया मिलेंगे। आंखें खोल लीं तो सब पिये मिलेंगे, क्या पीते हैं, मय पीते हैं।

    विसंगतियों का सफर संगति के साथ यूं ही गति पकड़ कर तेज, तेज और तेज दौड़ता ही रहेगा। समय की गति भी पीछे रह जाएगी, प्रकाश की गति भी इससे हार जाएगी। इसमें फिल्मी मति का तीखा छौंका लगाया गया है। आपको मोहित और सम्मोहित करने के लिए इसकी सुगंध ही काफी है। यही खींचातानी जेब से मुद्रा खींचती है। आखिर आप इनके लिए ही हैं और यह आपके लिए। हम सब बने हैं एक दूजे तीजे के लिए। सिनेमा इसी का बाजार है, इसी की कला है, विधा है, कविता है, गीत है, मादक संगीत है। यही माफी पाने की रीत है, इसे रीतने मत दो, जीतने दो। उसकी जीत में भी आपकी जीत है। आप जीते जग जीता। आप हारे तब भी जग जीता। इस समय सबके जीतने का है सुभीता। इसलिए जीतो जीतो विसंगतियों को संगति की डाल पर बैठाकर खूब जोर से खींचोगे तब भी नुकसान नहीं होगा क्यों कि आप मन से सींच रहे हैं

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    मजदूर दिवस पर मजे के पास ?

  • by
  • अविनाश वाचस्पति

  • चाहे हंसी-मजाक में ही कहा जाता है कि मजदूर यानी मजे से दूर, मजदूर के पास मजे के पास।  पर इसमें एक खौफनाक तल्‍खी छिपी हुई है।  मई माह का पहला पूरा दिन सिर्फ मजदूरों की चर्चा के लिए नियत है। ऐसा नहीं है कि इस एक दिन मजदूरों को बिना काम किए पगार मिलेगी या अधिक मिलेगी।  जब उतनी मिलने की भी गारंटी नहीं है जितने पर अंगूठा लगवाया जाता है तो अधिक की सोचना ही बेमानी है। कारण इसमें सब तरफ बेईमानी ही पसरी हुई है। चर्चा पूरे दिन मजदूर की ही की जाएगी। मई महीने में भीषण गर्मी का प्रकोप रहता है इससे निजात पाने के लिए, इन चर्चा-आयोजनों में भाग लेने वालों के लिए इस एक दिन ठंडे का बेहिसाब इंतजाम किया जाता है। यह इंतजाम जेब को गर्म करने के लिए भी आवश्‍यक है। चाहे मौसम कितना ही गर्म हो पर जेब उससे भी गर्म रहनी चाहिए। ठंडी जेब रहे, ऐसे कार्य कभी नहीं सुहाते हैं। मीडिया और अखबारों तथा पत्रिकाओं में भी मजदूरों की हिस्‍सेदारी को लेकर, जबकि वो पहले से ही काम करते हुए सभी जगह मौजूद है, विमर्श यही होगा कि कैसे नित नए तरीकों से उसका शोषण किया जा सकता है। एक से एक नायाब तरीकों से उसका शोषण करके उसको विशिष्‍टता का अहसास कराये जाने के ऐसे आयोजन नितांत जरूरी हैं।  
    इस दिन मजदूर को खाने का समय एक घंटे के बजाय दो घंटे भी नहीं दिया जाएगा और न शाम को ही एक घंटे पहले छुट्टी दी जाएगी। वो बात दीगर है कि वो बीड़ी फूंकने या चाय सुड़कने के बहाने कुछ पल यूं ही गुजार ले। ऐसा करने से भी मजदूर दिवस पर कोई आंच नहीं आती है। मजदूर दिवस पर ही क्‍यों, हर दिन मजदूर बेबस है। आज खास इसलिए है क्‍योंकि उसके बारे में खुली चर्चा हो रही है।
    मजदूरी में मेहनत करते हुए भी ऐसा बोध होता रहे कि आज का दिन खास है तो विशेषता का मजा लिया जा सकता है। जबकि विडंबना देखिए, उसे खुद नहीं मालूम होगा कि आज मजदूर दिवस है। अगर अखबार पढ़ पाता तो शायद जान भी पाता पर पेट बचाने की जुगत से फुरसत मिले तो ऐसे खटराग सुहाते हैं पर फिर मजदूर कहां रह पाता वो ? साहब बन जाता, कंप्‍यूटर नहीं चलाता। अभी सिर्फ अखबार और कंप्‍यूटर को ढोता है, सच मानिए, इसलिए ही तो रोता है।
    अगर वो पढ़ने समझने लायक ही हो गया होता तो मजदूर क्‍यों बनता। वो मजदूर नहीं बनता, तो सभी साहब बन जाते फिर बिना मजदूरों के समाज कैसे प्रगति करता। समाज की प्रगति के लिए इनकी दुर्गति जरूरी है।  भला अपनी खुशी से कोई मजदूर बनता है। पर जब रसोई में बनाने के लिए और कुछ न हो तो पेट पालने के लिए मजदूर बनने में भी खुशी मिलती है। जबकि रसोई के नाम पर सिर्फ चूल्‍हा ही होता है जिसके लिए लकड़ी या केरोसीन बहुत मुश्किल से मयस्‍सर होता है।  पर जो मजदूर भी नहीं बन पाते तो पेट पालने के लिए लूटमारी और  छीना झपटी करते हैं। मजदूरी की इस वैरायटी में पेट पालना गौण पर असल धर्म मौज उड़ाना होता है।  
    मजदूर से जुड़े सभी जरियों को उसकी मेहनत का भरपूर लाभ बिना अतिरिक्‍त मेहनत किए मिलता रहता हैजिसे कहा जाता है कि वे दिमाग की खाते हैं और दिमाग से वे ही कमायेंगे जिनके पास। .... और मजदूर दिमागरहित ही होता है। मजदूर को इस सच्‍चाई का इल्‍म नहीं होता इसीलिए तो उस पर जुल्‍म होता है। आजकल तो प्‍लेसमेंट वाले भी उसकी मजदूरी में सेंध लगाने के लिए सक्रिय हो चुके हैं। उनकी मजदूरी भी दिमाग वाली ही है, कमीशन मत कहिए उसे, मिशन-ए-नोट है यह।
    मजदूर ही क्‍या हुआ जिसने हाड़-तोड़ मेहनत न करी। अधिक मेहनत करेगा तभी तो सुकून की नींद आएगी। मजदूर को उसकी चैन की नींद मिलना ही उसकी मजदूरी का सच्‍चा इनाम है। एक मजदूर ही तो है जो कामचोर नहीं है। जबकि चोरी करना भी दिमाग वालों का ही काम है। बेअक्‍ल क्‍या खाक चोरी किया करते हैं ?
    डेमोक्रेसी अथवा शासन के सभी तरीकों में मजदूर की ऐसी-तैसी होना प्रीफिक्‍स्‍ड है। श्रम दिवस के बदले शर्म दिवस मनाया जाना चाहिए  प्रत्‍येक प्रकार के शासन में खूब मसले होते हैं जिन पर शर्म की जानी चाहिए। पर नहीं की जाती है इसीलिए श्रम दिवस को आज तक शर्म दिवस घोषित नहीं किया जा सका है। अगर श्रमिकों की दुर्दशा पर कुछ किया ही नहीं जाना है तो मजदूर दिवस को शर्म दिवस मान लेना चाहिए।  
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    डरने भी दो यारो : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर के 24 - 30 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित

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  • नुक्‍कड़


  • फिल्म के परदे पर डर देखकर डर गए तो जीत गया निर्माता, जीत गया निर्देशक, चमकने लगे सितारे। सब दर्शक को डराना चाहते हैं। कोई कब्रिस्तान दिखाता है, कोई श्मशान में टहलाता है, नरमुंड की माला पहनाता है, कंकाल चमकाता है, कोई रात में सड़क पर घुमाता है, दर्शक भी डरना चाहता है, इसलिए खूब डरता है और डरते-डरते झूम जाता है। परदे वाला क्यों डराना चाहता है, जबकि उसे डरपोक दर्शक को परदे के पीछे छिपा लेना चाहिए पर आप यह भी जानते हैं। अगर आप नहीं डरे तो उसका डरना ही नहीं, मरना भी तय है। जितना दर्शक फिल्म देखकर डर रहा है, उतना तेजी से फिल्म का बाजार बढ़ रहा है। डरना-डराना आजकल फैशन में शुमार हो गया है, फैशन का बहुत बड़ा बाजार है। दर्शक यह जानते हुए भी कि तकनीक का कमाल है, फिर भी डरता है। डर लगता है इसलिए डर जाता है। जब आप अंधेरे सिनेमा हॉल में डर रहे होते हैं तब तकनीक चमक रही होती है। तकनीक के जरिए आवाजों, दृश्यों की ऐसी डरावनी और सनसनीखेज प्रस्तुतियां की जाती है कि डरना अच्छा  लगने लगता है।

    डरते डरते हंसना सीखो, हंसते हंसते डरना,  इसी अवसर के लिए कहा गया है और सबने स्वीकार लिया है। परदे पर कई तरह के रंगों के साथ दृश्यों की संकल्पना को उकेरा जाता है, कल्पनाओं का वास्तविकता के साथ घालमेल कर विशेष प्रभाव उंडेले जाते हैं। सब उपक्रम आपको डराने के लिए रचे जाते हैं। आप खुद डरेंगे तो अपने मित्रों को बतलायेंगे कि पायरेटिड डीवीडी या छोटे परदे पर इस फिल्म को देखकर डरने में वो थ्रिल नहीं है। 500 रुपये की एक टिकट खरीदकर फिल्म देखने में डरने से मजा मिलता है। बड़े परदे पर भी च्वाइस आपकी होनी चाहिए। डोल्बी साउंड वाले थिएटर में चलो, वहां जाकर डरेंगे।

    डरने का मजा भी पैसे खर्च करके लूटा जा रहा है। लूट का बाजार गर्म है मौसम गर्मी से दहक रहा है। वितरक, निर्माता और निर्देशक की जेब गर्म करने का सिलसिला जारी रहना चाहिए। डरो डरो जल्दी  डरो। पर फिल्म देखने से पहले मत डरो। उसकी टिकट खरीदने में आने वाले खर्च की चिंता करके तो कायर डरते हैं, तुम तो बहादुर डरपोक हो। फिल्म देखकर डरना अच्छा लगता है। जरूरी नहीं कि फिल्मों में खूब खंजर चलें और नुकीले दांतों वाली डायन का लहूलुहान चेहरा हो, जख्मी चेहरे से रक्त टपक रहा हो,  पर उससे रक्त  नहीं, डर टपकना चाहिए। गोलियों की आवाजें आ रही हों। ढांय ढिशुम हो रही हो और वह डर और कहीं नहीं आपकी आंखों पर सीधा असर डाले, आपके मन को भूकंप की मानिंद झंकृत कर दे।

    कहते हैं जो डरा नहीं भय से, भावों से, वह क्या डरेगा अभावों से। पीकर मय भरे प्यालों से, वह समय से भी नहीं डरता। मय ताकत देती है, सुरा बदल देती है सुर।  डरने से जो मजा आना है, उसे लॉक कर देती है। आज डरकर अमर होना तय है। डरपोक की आयु लंबी होती है, डरने से उसका जीवन बढ़ जाता है। लोग डर डरकर लंबी उम्र जिया करते हैं। डरकर जीवन बढ़ाने का आधुनिक फंडा है यह।  आपकी तेज सांसें देखकर डर जरूर डर जाएगा। डर को कांपते देख सबको मजा आएगा। बच्चे फिल्म के नाम से डरें। कहें कि हम भी देखेंगे डर, कैसा होता है सर। मुझे याद है पहले डर कबूतर की आहट हुआ करता था। कबूतर बिल्ली को देखकर आंखें बंद करके सुरक्षित हो जाता था। आज चूहा देखकर डर लगता है, पर न चूहा आंखें बंद करता है और न डरने वाला अपनी आंखें मिचमिचाता है। नेताओं को चूहे से नहीं, महिलाओं को चूहे से डर लगता है। महिलाएं छिपकली से भी डरती  हैं। काकरोच से डरने पर तो उनका एकाधिकार है। काकरोच चाहे डर न रहा हो, पर छिपकली से वह भी डरता है। छिपकली जब दीवार से चिपकती है और फिर तेजी से सरकती है, दरअसल वह सरकना, दीवार पर तेजी से रपटते हुए सरकना डर की ही बेबाक अभिव्यक्ति है। देखने वाला डरता है, सरकने वाली डरती है। उसे घूर रही हैं छिपकली की आंखें और वह सरकती हुई आंखों में घुसी चली आ रही है। डर अब न बिल्ली है, न कुत्ता है, डर अब महंगाई है, पर उससे भी नेता नहीं डरते।

    डरने वाले कुत्तों की भौंकने की आवाज से सिहर जाते हैं, सावधान हो जाते हैं। रात को वे जब सो रहे होते हैं। तब कुत्ते की आवाज से डर जाते हैं। एक मित्र ने इसका कारण पूछने पर बतलाया कि एक दिन दोपहर में वह अपने स्कूटर पर अपनी बीवी के साथ जा रहा था कि एकाएक एक कुत्ता भागकर आया, उन्होंने स्कूटर धीमा कर दिया और श्वान ने मौका नहीं चूका और उनकी टांग की पिंडली में पैने दांत गड़ा दिए। तब उन्होंने टीके लगवाए थे, टीकों के साथ तब डर भी लग गया, मालूम ही नहीं चला। इसलिए अब कुत्ते के काटने से डरता हूं और भौंकने से नींद में भी सिहर उठता हूं।

    हैरान हूं देखकर आज समाज को, डरता है जो मच्छर के गुनगुनाने से, नहीं डरता अब वह ट्रैफिक के तेज टकराने से। ट्रैफिक में कूदने से जो डरा नहीं, हॉर्न की तेज चीखें सुनकर वह डरेगा क्या, आइटम सांग से भी नहीं डरता है अब कोई, टम टमाटम टम टम, डग भरता है। सड़कों पर डर अब भीड़ सा मचलता है। सब उसी भीड़ में शामिल हो रहे हैं पर डर है कि कहीं दिखता नहीं। अपने डरने के लिए डंडा रखते हैं पर डंडा देखकर सामने वाला डर जाता है। डरने का प्रयास ही निष्फल हो जाता है। हालत ऐसी है आज कि पुलिस का डंडा देखकर पुलिस ही डरने लगी है। यह पहेली अभी तक किसी से नहीं सुलझी है। डर से डर कर हम प्रकृति के कार्य में सहयोग कर रहे हैं। इसलिए डर कर कितनी ही बार मर रहे हैं हम। डर को भगाओ मत, डर से चिपट जाओ, डर से लिपट जाओ। मेरी मानो तो डर पटाए और तुम पट जाओ।

    आज हालात यह हो गई है कि जब तक आप डरें नहीं, तब तक आप सफल नहीं हैं। सफल होने के लिए डरना सबसे सरल है। वोटर से डरा हुआ नेता वोटर को पांच साल डराता है और जिस दिन चुनाव आता है। वोटर का डर लपक कर नेता के चेहरे पर ट्रांसफर होकर कंधे पर बैठ जाता है। डर चीज ही ऐसी है फिल्म का डर दर्शक के चेहरे पर और वोटर का डर नेता के फेस पर। अब साबित हो चुका है कि फेसबुक पर जिनका खाता है, वह किसी से नहीं डरते, डरती उनसे अब सरकारें हैं। सरकारों के डरने का मौसम आ गया है। पर आप सरकार को मत डराना। नहीं तो वे गाना गायेंगी कि डर लगे तो गाना गा। कुछ लोग डर कर सो जाते हैं, अधिकतर रो जाते हैं, पर खोता कोई नहीं है, कुछ डर कर खाना खाने लगते हैं, जरूर उन्हें अपना बचपन याद आ जाता होगा। आपने भी सुना होगा कि वह इसलिए खो गया क्योंकि डर गया था। डर लगे तो गाना किसी फिल्म  का ही होना चाहिए। डर लगने पर हनुमान चालीसा का पाठ करने के जमाने बीत गए हैं क्योंकि इससे डर लगना बंद हो जाता है। न डरने वाले तो मौत से भी नहीं डरते उससे भी खुले में भिड़ जाते हैं। मौत सामने हो और वे अकड़ जाते हैं। मेरी यह सीख गांठ बांध लो कि डरना मना है’, क्या हुआ जो चारों ओर अंधेरा घना है, इसे मन की विकृतियों ने ही बुना है। इसे बुनने के लिए एक दुष्कर्मी ने राजधानी दिल्ली के गांधी नगर को ही क्यों चुना ?

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    जी हां दुनिया गोल घूमती है

     
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