तलाक कहकर ताला किया लॉक‍ : जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' 18 जून 2013 अंक में प्रकाशित

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  • अविनाश वाचस्पति

  • अब सब रहे हैं लॉफ। लॉफिग यह बुद्धा की नहीं है, सर्फिंग यह विशुद्ध नहीं है। इस हंसने में जीवन नहीं है, चहकने का बिल्‍कुल मन नहीं है। परिहास से शुरू हुआ सफर हास्‍यास्पद गति तक पहुंच गया है। तलाक कहा और कर दिया रिश्‍तों का ताला लॉक। शायरी का भरपूर बेड़ा गर्क हुआ है, जान लीजिए बंदर के हाथ में अदरक दिया है। दुआ दे रहे हैं जीने की और तीन कदम उपर बढ़ते ही वह जीना तोड़ देते हैं। करते हैं जो दवा उसमें भी मिलाते हैं दारू और कहते हैं कि कारूं का खजाना हाजिर है। दुआओं में उनकी छेद इतने सारे, नीयत में होने लगे हैं बंटवारे,  जिसमें षडयंत्र बैठा है पैर पसारे। नीयत मंडरा रही है कुर्सी के आसपास। न किसी को आस, न किसी को विश्‍वास। जब दिल ही टूट गया अब पीकर क्यों मरेंगे, मरने के बाद भी पीने का बिल भरेंगे। कुर्सी नहीं मिलने का रहा भरोसा, फिर एक कदम भी मिलकर क्‍यों चलेंगे।

    आह भरी बदनाम हुए, इतना भारी नाम हुआ, तलाक दिया जिसके तले कुचलकर उनका काम तमाम किया। कत्‍ल करने की जरूरत पड़ी नहीं, दफा 302 लगी नहीं। उनके मरने के इल्‍जाम चार सौ बीसी करके उनके उपर ही दे मारे, कुर्सी के गुल कर दिए सभी सितारे। कुर्सी की महक इनके मन में महकती है। महक बोले तो मेरा हक, चल छिछोरे दूर हट, मत कर लिपट-झिपट, यह कुर्सी है खुदगर्जी की, सिर्फ मेरी मर्जी की, नहीं ताकत किसी अर्जी की। नमो की ताकत ऐसी जैसे सिंह दहाड़ा। यह दहाड़ रहे हैं, वह पहाड़ पर भाग-भाग कर चढ़ाई कर रहे हैं। सोचते हैं कुर्सी पहाड़ा पढ़ रहे हैं। पहाड़ से ही गिरे हैं, इसलिए दबे-कुचले हैं, रिश्‍तों को बनाया दिया है नासूर इसलिए अब नहीं मिल रहा एक भी सुर, सब बने गए हैं असुर।

    मजबूत लोहा समझा था, न गुमां था कि यूं ही भरभराकर ताश के महल की तरह ढह जाएगा। बरतन की आवाज घर की रसोई में रोजाना आती है। आवाज से यह कयास मत लगायें कि सब चूर चूर चकनाचूर हो गए होंगे। आपने जो बताया मान लिया कि जहां पर बरतन गिरे, वह सीमेंट का फर्श पक्‍का था। अहसास था कि रिश्‍तों की ताकत बहुत मजबूत होती है पर देख रहे हैं सब कि अब उनसे रक्‍त रिस रहा है। रिश्‍ते यह रस्‍सी से कमजोर निकले। न सुलझी रस्‍सी की गांठ उलटे उलझ गई रिश्‍तों की गांठ न खुली, न सुलझी, हुई बरबादी और किया सत्‍यानाश। कह रहे हैं उनके अपने रिश्‍तों की रस्‍सी काट डाली गई।

    इतना गैरपना कि बैरपना भी शर्मिन्‍दा है, कोई लिहाज नहीं । बरतन की छोड़ें अब पेड़ की सोचें - पेड़ भी काटा जाता है तो उसकी लकडि़यों में चीरा लगाकर उसको उपयोगी बना लेते हैं।  उन लकडि़यों की पेड़ के उपर ही मचान बना सकते हैं और रच सकते हैं बेशकीमर्ती फर्नीचर। सब कुछ स्‍वाहा कर दिया। पेड़ के पेड़पने को कुर्सी मोह की दीपक चट कर गई।  तनिक गुंजायश नहीं रही, न आस बची, न भरोसा डटा और विश्‍वास तो टूट ही गया – चारों तरफ सत्‍यानासी के बीज पड़े हुए थे, मन की गांठ की देखी करामात। चुनाव बतलाएगा किस किसके पड़ी, कैसी पड़ी लात। दिख रहा है कि दोनों की होगी अब करारी मात।

    पत्‍थर से दिल लगाया और तन कुचला पाया। दोनों का न रहेगा अब नामलेवा, लगता है इसलिए ना ना कर बैठे। अपनी-अपनी शैया पर शूल जड़ लिए। कुर्सी से दिल लगाया और लोहे से चोट खाई। सोच रहे हैं कि कुर्सी ही लोहे की क्‍यों नहीं बनाई, वाणी आडवाणी की दूर पार्श्‍व में हो गई मौन है। कुर्सी की मलाई की चिकनाहट ने ऐसा रपटाया है।  मंसूबे बांध लिए हैं ऐसे-ऐसे कि लोहे की कुर्सी बनवाएंगे उसमें अपने नेता की वेल्डिंग करवाएंगे।  पर इसकी भनक मानसून को लग गई।  दरार को पाटने तेरह दिन पहले ही चली आई जबकि तेरह दिन के महात्‍मय से कौन परिचित नहीं है। लग रहा है कि जरूर किसी की तेरहवीं होकर रहेगी। मोदी का गुजरात से बाहर आना पूरे राजनीतिक परिदृश्‍य में रात का घेरा कस रहा है। पर उसका चहेता गोदी में बैठा हंस रहा है। जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्‍या होगा ?
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    दु्ष्यंत जी चित्र बदल चुका है

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  • Girish Billore

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    सिनेमा की आभासी दुनिया का तीखा सच : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 5 से 11 जून 2013 अंक में प्रकाशित

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  • सिनेमा सिर्फ मनोरंजन ही करता है जो यह कहते हैं वह निरा झूठ बोलते हैं। धन और बुलंदी के जो रास्ते इससे खुले हैं उनसे साबित होता है कि धन का लालच और नाम पाने के अनेक मार्ग इसके बीचों बीच कब्जा जमाए बैठे हैं। जिस सिनेमा में धन है, सीधे ख्याति है मतलब कलाकार आभासी होते हुए भी सशरीर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहता है। उसकी अदाओं, करतबों, हाव भाव पर दर्शक रीझते हैं। उसके कारनामों में खुद को रूपायित होता देखकर मुग्ध होते हैं और फिर बन जाते हैं परदे के उस कलाकार के प्रशंसक, जिन्हें फैन इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे कलाकार के करतबों के साथ उनकी करतूतों को भी आंख मूंद कर पसंद करते हैं, चाहने लगते हैं।

    सिनेमा बनाने की तकनीक हाइ फाइ और निर्माण तथा देखने से जुड़े लाखों करोड़ों लोगों के कारण आकर्षक देशी विदेशी रम्य स्थलों पर शूटिंग करने के कारण इसमें बेहिसाब धन इंवेस्ट किया जाता है, जो बाद में कई सौ गुना होकर लौटता है। आइने में खुद के रूप को देखकर मोहित होना एक मानवीय कमजोरी है क्योंकि वह अन्य सबके मुकाबले स्वयं को खूबसूरत और आकर्षक समझता है। वजह अपनी आंखें, कान, नाक, मुंह, बाल, शरीर की बनावट खुद को बहुत लुभावनी लगती है और कोई भूले से अथवा मजाक में भी तारीफ कर दे तो मन खुश होकर अपने को आसमान के सितारों के मध्य चमकता पाता है। फिल्मी विषयों के मामले में कम ही लोगों को सच्चाई का दिव्य ज्ञान हो पाता है कि फिल्में भी सोशल मीडिया या फेसबुक की तरह आभासी का ही जीवंत संसार हैं। उसी तरह इससे भी अधिकांश लोग सदा आत्ममुग्ध  रहते हैं।

    सिनेमा से धन और देह का जितना सीधा रिश्ता है उतना मनोरंजन का नहीं है। सिनेमा बिना मनोरंजन का तो बनता है पर जिसमें धन और देह परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष तौर पर न जुड़ा हो, ऐसे सिनेमा की कल्पना करना ही बेमानी है। देह और धन के कारण ही सिनेमा में लालच जुड़ जाता है। जिनके पास धन होता है वह सिनेमा की चकाचैंध और धन के जरिए देह पाना चाहते हैं और पाते भी हैं। जबकि कमनीय देहधारक देह का उपयोग अथवा दुरुपयोग करके धन पाने के रास्ते पर बढ़ने लगते हैं। लालच जो सिर्फ धन अथवा फिल्म में अभिनय तक ही सीमित नहीं रहता है, स्त्री देह को भोगने की फंतासी में भी डूबने-उतराने लगता है और मौके-बेमौके इसमें सफल भी होता है। इन्हीं  वजहों से सिनेमा में कास्ट काउचिंग जैसी दुष्प्रवृति ने सिर उठाया है। मानव की अडिग कमजोरी यह भी है कि वह किसी को लाभ पहुंचाने की एवज में खुद बहुत कुछ पाने की लालसा से घिरा रहता है। देश में हो रहे घोटाले, नेताओं की करतूतें, नौकरशाही और पब्लिक से जुड़े विभागों में इसी लालसा की बानगी सब जगह दिखाई देती है।  भ्रष्टाचार का पैर पसारक स्वरूप इसी की देन है। भ्रष्टाचार का सीधा संबंध धन के लालच से होता है जिसका सीधा कन्टेक्ट मन के मानस से है। समाज में देखा गया है कि मेहनत की कमाई से गुजारा नहीं होता है और बेईमानी की कमाई से इंसान बुराइयों के चक्रव्यूह में फंस जाता है और यह इतना मन को लुभाता है कि इससे निकलने का मन ही नहीं होता और ऐसा सुझाव देने वाला दुश्मन दिखाई देता है। धन को जीवन में सब कुछ समझना और इस सब कुछ को हासिल करने में अमरता इसलिए नहीं आती है क्योंकि जन्म मरण इंसान के वश में नहीं है। यश अपयश पर कुछ हद तक इंसान का काबू रहता है। जबकि अधिकांश अवसरों पर इन हदों का फायदा उठाकर सीमाओं का अतिक्रमण किया जाता है।

    किसी भी प्रकार से काले धन का अंबार लगाना, उसी धन अथवा फिल्म में काम करने का लालच दिखलाकर देह पाना, वासनापूर्ति का कुत्सित रूप है। इस प्रकार सिनेमा, धन और देह की त्रिवेणीअनेक बार ख्याति से कुख्याति की ओर एक झटके में धकेल देती है। मानव का यह स्वभाव है कि जो सहज ओर सदा के लिए उसका है, उसकी उपयोगिता और आकर्षण जल्दी समाप्त  हो जाता है पर मन क्योंकि चंचल है इसलिए जानते हुए भी नहीं मानता और चलने में डगमगा जाता है। जोश के चक्कर में होश गंवाता है। कहा भी गया है कि दूसरे की आमदनी और अपना खर्च सदा अधिक महसूस होता है। दूसरे का दुख कम और अपना सुख कम। इससे आगे बढ़कर पड़ोसी के दुख में सुख पाने की प्रवृति बढ़ती जा रही है। यह मानव मन की विकृति है पर जिस तरह बुराइयों के अभाव में अच्छाइयों की तुलना नहीं की जा सकती इसलिए समाज में दोनों बनी रहती हैं। इनमें बुराइयां अधिक और अच्छाइयों का औसत सदा कम ही रहता है।

    सिनेमा में खूब धन है। धन का सागर हिलोरें मारता है फिर भी धन पाने की मानवीय भूख कभी शांत नहीं होती, तब भी नहीं जब इंसान कब्र में पांव लटकाकर बैठा पल पल गिन रहा हो। आज छोटे बड़े शहरों के युवक युवतियां अपने अपने झोले उठाकर भाग्य आजमाने के लिए रोजाना सैकड़ों की तादाद में मुंबई के भीड़सागर में उतरते हैं, वैसे झोलों की जगह कंधे पर लैपटाप के काले बैग सवार होते हैं। जिनमें हताश होकर डूबने वालों की संख्या अधिक रहती है और सफलता तक तो कोई विरला ही पहुंच पाता है। जो पहुंचते हैं वह सालों साल मुंबई के भीड़सागर में कठिन से कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते हैं और शोषण करवाने के लिए मजबूर होते हैं। सफलता सबकी चेरी नहीं बन सकती इसलिए युवक और युवतियां फिल्मों में कोई भी काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं, किसी भी तरह से पेट भरने को जीवन संघर्ष का नाम दे दिया जाता है। इसकी आड़ में उनका यौन शोषण भी किया जाता है। युवतियों को फिल्मों़ में छोटे से रोल का ब्रेक पाने के लिए छोटे कपड़े पहनने पड़ते हैं, फिर उसी की आदत पड़ जाती है। अच्छी भूमिका मिलना तो बाद की है, कितने ही बिस्तरों से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसी दुर्घटनाएं रोजाना होती हैं और धोखा मिलता है तब भी इक्का दुक्का मामले ही सार्वजनिक हो पाते हैं। नामी गिरामी हस्तियों से जुड़े मामले तो कभी कभार ही चर्चा में आते हैं क्योंकि उन्हें  शुरूआत में ही दबा दिया जाता है।


    सिनेमा में धन और देह के ग्लैेमर से बचना संभव नहीं है और धन के बदले देह और देह के बल पर धन बटोरना काफी सरल है और यही हो रहा है। जीवन के अन्य क्षेत्र भी इस बुराई से अछूते नहीं हैं पर सिनेमा में ऐसे मामले बहुतायत में होते हैं और सामने भी आते हैं। जिसके पास धन है वह देह और जिसके पास देह है वह धन हासिल करने से चूकना नहीं चाहता। चाहे यह कितनी ही बड़ी सामाजिक बुराई है पर अन्य बुराइयों की तरह समाज का अटूट हिस्सा है और यह बुराई सदा सिनेमा और समाज में उसी तरह मौजूद मिलेगी जिस तरह भ्रष्टाचार जमा हुआ है। सत्ता में भी धन बटोरने के लिए ऐसे ही टोटके आजमाये जाते हैं तब सिनेमा में क्यों  नहीं आजमाए जाएंगे जबकि यह क्षेत्र सीधे तौर पर ग्लैेमर से भी जुड़ा है। सत्ता में घोटाले और यहां पर माफिया इन करतूतों को संचालित करते हैं। धन को तजने वाले सरल और देह को छोड़ने वाले विषय पर सहज होना तो आसान है पर विरल का सरल होना कई मामलों में संभव ही नहीं है। देह में सुख की खदानें हैं और इन खदानों को खोदने का मोह छोड़ने से भी नहीं छूटता है। आज सिनेमा, क्रिकेट इत्यादि में यही दिखाई दे रहा है।
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    'वृद्धग्राम' में गूंजते हैं जिंदगी के स्‍वर : लीगेसी इंडिया अप्रैल 2013 में प्रकाशित

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    ‘‘उद्भ्रांत में दृष्टि की व्यापकता और दार्शनिक तत्व’’ -प्रो. निर्मला जैन

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  • संगोष्ठी रिपोर्ट

    नई दिल्ली। उद्भ्रांत की दृष्टि-व्यापकता तथा दार्शनिक तत्व को छूने की कोशिश अद्भुत है जो उनकी लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ में स्पष्ट परिलक्षित होती है। यह बात वरिष्ठ आलोचक तथा साहित्यकार प्रो. निर्मला जैन ने साहित्य अकादेमी के संगोष्ठी कक्ष में अमन प्रकाशन, कानपुर के तत्वावधान में, उद्भ्रांत की लम्बी कविताओं के संग्रह ‘देवदारु-सी लम्बी, सागर-सी’ तथा उनके साहित्य-कर्म पर अन्य लेखकों, सम्पादकों की पुस्तकों के लोकार्पण समारोह के अवसर पर ‘उद्भ्रांत का कवि-कर्म’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कही।

    उन्होंने कहा कि मिथक का मूल अर्थ वहीं से निकलता है जहाँ से उसका जन्म हुआ है और जब भी कोई कृतिकार उसे अपनी वैचारिक दृष्टि के साथ खींचकर नया गढ़ने की कोशिश करता है तब यदि वह मूल अर्थ की व्यंजना से जुड़ा रहता है तभी उसमें मिथकीय संवेदना बनी रहती है। उन्होंने कहा कि यद्यपि आज लम्बी कविताओं का दौर नहीं है, फिर भी ऐसी कविताएं विचारशून्य नहीं होती हैं। उन्होंने ऐसी रचनाओं के लिए ‘लिबर्टी’ और ‘विज़न’ की आवश्यकता पर बल दिया।

    पिछले डेढ़ दशक से दिल्ली में स्थाई तौर पर रह रहे उद्भ्रांत की अनेक पुस्तकों के नियतिम अंतराल पर लोकार्पण होते रहे हैं तथा उनको केन्द्र में रखते हुए विचारोत्तेजक गोष्ठियाँ भी आयोजित हुईं, किन्तु उद्भ्रांत से सम्बंधित किसी भी गोष्ठी में पहली बार आयीं प्रो. जैन ने कहा कि निमंत्रण के बावजूद वे ऐसी गोष्ठियों में शामिल होने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थीं किन्तु यहाँ आकर उद्भ्रांत के रचना-परिमाण से परिचित होने के बाद हतप्रभ लगीं।

    इसके पूर्व संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए डॉ. कर्णसिंह चैहान ने कहा कि ‘राधा-कृष्ण’ जैसे मिथकों पर लिखना उद्भ्रांत की प्राथमिकता रही है, किन्तु इसे सम्हालना उतना ही कठिन है क्योंकि विषय की प्रासंगिकता के लिए ‘रिजिडिटी’ अनिवार्य होती है, उसमें लचीलापन नहीं होता है। उन्होंने कहा कि राधाभाव एक अमूर्त विषय है जोकि पूर्ण समर्पण के भाव से संयुत है, जबकि उद्धव का प्रसंग राधाभाव का विखण्डन है। उन्होंने कहा कि चीरहरण का पक्ष लेकर उसे न्यायसंगत ठहराना बहुत ही मुश्किल है। उद्भ्रांत में यह क्षमता है कि वे कठिन से कठिन कार्य को सहजता से कर लेते हैं। वे गोपियों के स्नान प्रसंग के माध्यम से आधुनिक नैतिकता की बात को आगे बढ़कर स्पष्ट करते हैं। उन्होंने कहा कि आज खाप पंचायतों के ‘ड्रेसकोड’ को प्रमाणित करते हुए यह कविता वर्तमान संदर्भों से जुड़ती है। नारी स्वतंत्रता और प्रतिबंध पर कविता के माध्यम से नयी राय रखी गयी है। वस्तुतः उद्भ्रांत ने काव्य के जितने रूपों का प्रयोग किया है, समकालीन कवियों में कम ही लोगों ने किया है।

    मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित डॉ. पी.एन. सिंह (गाजीपुर) ने संगोष्ठी में न आ सकने का दुख जताते हुए एक पत्र के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज की। उनके ई-मेल से प्राप्त पत्र को अखिलेश मिश्र ने पढ़ा। पत्र में डाॅ. सिंह ने लिखा कि उद्भ्रांत जी ने अपने अन्दर और बाहर दोनों को साधा है, और ठीक से साधा है। इनकी कविताओं में विचार के साथ-साथ सौन्दर्य भी है। इन्हें मिथकों का कवि न मानकर विचारों का कवि मानना उचित होगा। मिथकों को लेते तो हैं, लेकिन उनका अतिक्रमण भी करते रहते हैं, और यह अतिक्रमण ही सामान्य कवियों से उन्हें ऊपर उठाता है। इस तरह उद्भ्रांत एक ऐसे कवि हैं जो स्पष्ट पर भी थोड़ी और अस्पष्टता की चादर ओढ़ा कर अपने कवि-विश्व का निर्माण करते हैं।

    संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि उद्भ्रांत का व्यक्तित्व आग्रही है, जिस कारण उनका वक्तव्य महत्त्वपूर्ण और मानवीय तत्वों से युक्त हो जाता है। उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि भक्तिकाल में जो कुछ कहा गया, विशेषतः स्त्री चरित्रों को लेकर, उसका सेक्सुअलटी से क्या कोई रिश्ता है, इस पर विमर्श होना चाहिए। उद्भ्रांत के मिथकीय प्रसंग यथार्थवादी प्रतीत होते हैं। उनकी लम्बी कविताओं का जि़क्र करते हुए डाॅ. त्रिपाठी ने कहा कि उनकी रचनाओं में मानवीय पक्ष बहुत ही सक्षम है जिससे वे अपने को इस स्थिति में लाकर खड़ा कर देते हैं, जहाँ से मूक भी व्यक्त होने लगता है। 

    वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि किसी पुराने आख्यान की सीमा होती है, आप उसे कहीं से कहीं नहीं ले जा सकते, किन्तु उद्भ्रांत जी प्रतीकों के माध्यम से उसे कहीं से कहीं लेकर जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि उद्भ्रांत जी सब कुछ कह लेना चाहते हैं। उनकी लम्बी कविताओं में ही आलोचना के सूत्र हैं। व्यापकता और गहराई भी। हालांकि उनकी लम्बी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कविताओं में प्रबोधिनी नहीं है, कविता के ड्रामेटिक फार्म टकरा रहे हैं, विज़नरी और विज़न का महत्त्व नहीं रह गया है। उनकी ज़्यादातर लम्बी कविताओं में ‘फ़ार्म’ की व्याकुलता नहीं दिखती, अन्य कविताओं में मिलती है। उन्होंने कहा कि विस्तार से कविता की क्षति होती है और मार्मिक प्रसंग भी ढक जाते हैं, तथापि उनकी कविताओं में गतिशीलता है।

    डॉ. भगवान सिंह ने संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मानक साहित्य में मिथकीय शब्द ‘राधा’ नहीं है, किन्तु बाद के साहित्य में आ जाता है। उन्होंने ‘राधा’ को ‘लक्ष्मी’ के साथ जोडते हुए कहा कि राधा के परिवर्तित स्वरूप में निर्लज्जता, चंचलता में परिवर्तित हो जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रतिध्वनि उत्पन्न करने वाली कविता को तैयार करने में एवं उसकी भाषा गढ़ने में बहुत अधिक श्रम लगता है लेकिन तभी कविता पाठकों तक पहुँचती है। इस दृष्टि से उद्भ्रांत संपूर्णता के कवि हैं।

    इसके पूर्व संगोष्ठी में पधारे प्रबुद्धजनों की चर्चा में भागीदारी के लिए उद्भ्रांत ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि राधामाधव के संकेतित प्रसंगों में स्त्री-स्वातंत्र्य को शाश्वत मूल्यों से जोड़कर देखने की कोशिश है। उन्होंने आलोचकों से कवि के सामने उपस्थित चुनौती को समझने का आग्रह करते हुए कहा कि ऐसे कवि को अपना समय देखना होता है, उस समय को भी देखना होता है जिसके माध्यम से वह वर्तमान समय को देख रहा है तथा साथ में अपने आत्म के भीतर चलते द्वंद्व को भी। इन सभी के संयोग से ही ऐसी कृति संभव हो पाती है। प्रारंभ में उन्होंने लम्बी कविताओं के अपने लोकार्पित संग्रह ‘देवदारु-सी लम्बी, सागर-सी गहरी’ की प्रारंभिक दो कविताओं ‘तोता’ और ‘कृति मेरी पुत्री है’ का पाठ किया।

    संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर पधारे दूरदर्शन के महानिदेशक श्री त्रिपुरारि शरण ने चुटकी लेते हुए कहा कि बुद्धिमान व्यक्ति की कसौटी यही है कि जिस विषय पर ज्ञान न हो, उस पर अधिक नहीं बोलना चाहिए। उन्होंने उद्भ्रांत के कवि-कर्म को रेखांकित करते हुए कहा कि जीवन दर्शन की जो सीमारेखा है, जटिलता के बावजूद वे अपनी बातों को प्रभावी ढंग से रख पाते हैं। यह उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

    कार्यक्रम में जिन अन्य पुस्तकों का लोकार्पण हुआ वे इस प्रकार हैं--डॉ. कर्णसिंह चैहान द्वारा सम्पादित ‘राधामाधव’: राधाभाव और कृष्णत्व का नया विमर्श’, डॉ. लक्ष्मीकांत पाण्डेय द्वारा सम्पादित ‘रुद्रावतार और राम की शक्तिपूजा’, श्री अपूर्व जोशी द्वारा सम्पादित ‘अभिनव पाण्डव: महाभारत का युगीन विमर्श’, श्री नंदकिशोर नौटियाल की आलोचना पुस्तक ‘उद्भ्रांत का संस्कृति चिंतन’, श्री अवधबिहारी श्रीवास्तव द्वारा लिखित आलोचना पुस्तक ‘साहित्य संवाद: केन्द्र में उद्भ्रांत’, उडि़या के प्रख्यात विद्वान पदम्श्रीडॉ.श्रीनिवास उद्गाता द्वारा ‘राधामाधव’ का उडि़या काव्यान्तरण तथा उद्भ्रांत विरचित ‘रुद्रावतार’ का नया साहित्यिक संस्करण एवं ‘अभिनव पाण्डव’ का तीसरा संस्करण।

    संगोष्ठी में कवि की धर्मपत्नी श्रीमती ऊषा उद्भ्रांत, पुत्री तूलिका एवं सर्जना के साथ ही सर्वश्री दिनेश मिश्र, वरिष्ठ कथाकार डॉ. मधुकर गंगाधर, पी-7 चैनल के निदेशक श्री शरददत्त, साहित्य अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी,डॉ.. वीरेन्द्र सक्सेना, डॉ.  बली सिंह, राजकुमार गौतम, सुश्री कमलेश जैन, अमरनाथ ‘अमर’, हीरालाल नागर, ‘कथा’ के सम्पादक अनुज, राकेश त्यागी, प्रशांतमणि तिवारी तथा बी.एम. शर्मा सहित राजधानी के साहित्य, कला और संस्कृतिकर्मियों की उपस्थिति सराहनीय रही।

    संगोष्ठी का संचालन श्री पुरुषोत्तम एन. सिंह ने किया। संगोष्ठी के आयोजक श्री अरविंद वाजपेयी, प्रबंध निदेशक (अमन प्रकाशन) ने आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया।

    -प्रस्तुतकर्ता
    अखिलेश मिश्र,
    256सी, पाॅकेट सी, 
    मयूर विहार, फेस-2, 
    दिल्ली-110091

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    बालमन के पर्यावरण को दूषित होने से बचायें

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  • नुक्‍कड़
  • पर्यावरण को सुधारने और बिगाड़ने संबंधी मानवीय चिंतायें बेहद चिंतनीय हैं। व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में देखा जाये तो बालमन के पर्यावरण को सबसे स्‍वच्‍छ पाया गया है। आपने वह फिल्‍मी गीत सुना ही नहीं होगा बल्कि जहन में अब भी गूंज रहा होगा। नन्‍हा मुन्‍ना राही हूंदेश का सिपाही हूंमेरे साथ मिलकर बोलोजयहिन्‍दजयहिन्‍दजयहिन्‍द

    बालमन के पर्यावरण की यह निश्‍छलता  देश काल की सीमाओं से बाहर अपने अक्षितिजीय मनभावन स्‍वरूप में संपूर्ण सृष्टि में नेह बरसा रही है। बचपन में हम पैंया पैंया चलते रहे हैं और उससे भी पहले घुटनों के बल खिसकते रहे हैं। बिना कहेबिना सुने अपने विचारों के जरिए अनुभवों की सैर का आनंद लेते रहे हैं। खिसकने से पैदल चलने का यह सफरपैदल के बाद साईकिल की सवारीसाईकिल के बाद किशोर होने पर मोटर साईकिल और स्‍कूटर पर उतर चढ़तफिर कारबससारे चौपहिये वाहनऔर फिर इससे आगे बढ़कर रेल, जिसके पहिये गिने तो जा सकते हैं, पर कोई गिनता नहीं हैसिवाय उनके जिन्‍हें उनका गिन गिनकर  हिसाब रखना होता है।

    गिनता है बचपन में बच्‍चासिर्फ रेल के पहिये ही नहींकितनी चींटियां जमीन पर चल रही हैंकितने मच्‍छर उड़ रहे हैंकितने कुत्‍ते भौंक रहे हैंकितनी मक्खियां हैंउन्‍हें मारने की कोशिश करता बालमनबचपन में क्रूरता का समावेश करता चलता है। वो गिनता तो है उन रोटियों को भी जिनसे वो अपने पेट की भूख मिटाता हैभाई बहनों को भी जिनके साथ रहता हैदोस्‍तों पड़ोसियों कोइन पर प्‍यार लुटाता हैमाता पिता कोहितैषियों को जिनसे असीम प्‍यार दुलार पाता है। देखता है उस इंसान के बारे में जो मुंह से धुंआ उगलता दिखलाई देता है। धुंआ सिर्फ धूम्रपान का ही नहीं, अपशब्‍दों की बारिश भी, जिनसे रोजाना रूबरू होता है। वहीं से सही-गलत सब सीखता बढ़ता रहता है। जबकि वो घट रहा होता है। दिन, शरीर के स्‍तर पर और वैचारिक स्‍तर पर बढ़ रहा होता है। अनुभवों के मायने में समृद्धत्‍व को प्राप्‍त हो रहा होता है। पर इस गिनती में कोई स्‍वार्थ नहीं होता। स्‍वार्थ से बचा रहे ऐसा नहीं होता।

    यह अच्‍छा है तो मेरा हैमेरे भाई का हैमेरी बहन का हैमेरे मित्र का हैमेरे पिता का हैमाता का है और जो बुरा है वो तेरा हैकिसी अनजाने का है। जबकि अनजाना कौन हैसबमें मानवमन समाया है। बचपन में मच्‍छरों, चींटियोंमक्खियों को मारने से उपजी क्रूरता बचपन को मार देती है। थोड़ा और बढ़े होने पर सांप, बिच्‍छू को मारना। जबकि वही जब किसी कुत्‍ते के पिल्‍ले कोबिल्‍ली को, गिलहरी को दुलार करती है तो बचपन का आनंद कई सौ गुना बढ़ जाता है। इनके अच्‍छे प्रभाव से हम इंसानियत के पर्यावरण को सब सुधरता हुआ देखते हैं।

    जमीन पर दौड़ने में फास्‍ट मेट्रो,  उसके बाद हवाई जहाज की रनवै पर तेज दौड़भला उससे कौन करेगा होड़  पर उससे भी होड़ जारी है  सबसे तेज विचारों की सवारी है। इन विचारों का पर्यावरण स्‍वच्‍छ है, तो प्रत्‍येक मन गंगा हैमन कठौती है और विचार गंगा है। किसी का मन नहीं बुराईयों से रंगा है। बचपन स्‍नेह का अपनाबन। बननाबनना और मन का  सबसे बंधते जाना। 

    अब इस पर्यावरण पर भी खूब खतरा तारी हो रहा है। बचपन वो बचपन नहीं रहाजो देश कोसंसार को अपने बचपने से लुभाये। अब बालमन आधुनिकता के मकड़जाल में उलझ गया है और इस बुरी तरह से उलझ गया है कि सुलझाये नहीं सुलझ रहा है। फास्‍टता इतनी अधिक और इतनी तेजी से समाती जा रही है बल्कि बरगलाती जा रही है कि फूड बन रहा है फास्‍टफूडभाषा बन रही है फास्‍टभाषा (एस एम एस और चैनलों की भाषा पर गौर कीजिए और यही बन रही है अखबारों में खबरों की भाषा)फास्‍टमेट्रोफास्‍टजहाज (चाहे युद्धक सहीपर युद्ध बुराईयों से तो है सही परंतु युद्ध नहीं सहीजो बचपन के विरुद्ध लड़ा जा रहा है) फास्‍टमोबाइलजो सभ्‍यता और संस्‍कृति को बच्‍चों से दूर ले जा रहा है इन्‍हें भटका रहा है और ये बचपन मटक रहा है अच्‍छाईयों को गटक रहा है। इसमें न अटकेंइससे बचें और बाहर निकलेंतभी बचपन का पर्यावरण सुरक्षित रहेगाचाहते सब हैं परंतु बचपन में इस भंवर में फंसने के बादबड़े होने पर समझते हैंअहसासते हैं पर समय से क्‍या करेंआप ही ढूंढ़ कर बतलायें कोई कारगर उपाय।

    पर एक फास्‍टता सबको लुभा रही है और उसके जरिए हमारी सबकी प्‍यारी हिन्‍दी समूचे संसार में अपना सिक्‍का जमा रही है। सिक्‍का जो सोने का नहीं हैडायमंड का नहीं है और न ही है चांदी का। वह सिक्‍का है इंटरनेट पर हमारी हिन्‍दी की भूमंडलीय सार्थक उपस्थिति। हिन्‍दी जिसने हिन्‍दी फिल्‍मी गीतों के जरिए पूरे विश्‍व में हिन्‍दी के पर्यावरण को महकायाउसे और फास्‍टता के साथ इंटरनेटीय तीव्रता से सुगंधित कर रही है। पूरे विश्‍व को हिन्‍दीहोम बना रही है। आप जान लीजिए कि पूरे समूचे विश्‍व को हिन्‍दीहोम सिर्फ हिन्‍दी के द्वारा ही बनाया जा सकता हैहिन्‍दी प्रेमी ही बना सकता है और समूचा जगत हिन्‍दी प्रेमी बनता जा रहा है।


    पर्यावरण पर चढ़े हुये छद्म आवरण को वरण मत कीजिए। बचपन से ही तज दिया जायेऐसा कारगर उपाय कीजिए। बचपन पर बच्‍चों का ही नहींसबका मन अहसास करे सुंदर सलोने बचपनीय मन का। शरीर की प्रत्‍येक रक्‍तवाहिनी मेंनस नाड़ी मेंविचारों की गाड़ी में बचपन ही सवार नजर आए। हर नजर खिलखिलाए। पर्यावरण प्रत्‍येक मन का अंदर तक सुंदर बना रहे। यही कामना है जीवन की। पुरस्‍कार चाहे न मिलेनकद राशि बिल्‍कुल भी न मिलेपर बचपन और पर्यावरण का तारतम्‍य अपनी स्निगधता में बना रहेयही मेरी और प्रत्‍येक नेक सच्‍चे मानव मन की कामना है।  
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    बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 29 मई से 4 जून 2013 में प्रकाशित अभिनेता आलोक भारद्वाज से साक्षात्‍कार और फिल्‍म चीज ... का बकाश अंश

  • by
  • अविनाश वाचस्पति


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    सच्चाई की ताकत कलाकार को शिखर तक ले जाती है : आलोक भारद्वाज



    डीडी नेशनल पर प्रसारित चर्चित धारावाहिक धारावाहिक ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘ से बतौर अभिनेता अपने कैरियर की शुरुआत करके आलोक भारद्वाज ने सोनी टीवी पर प्रसारित ‘अदालत‘ और लाइफ ओके पर ‘सावधान इंडिया‘ में अभिनय किया। आलोक का मानना है कि प्रत्येक कलाकार को निरंतर अपनी अभिनय कला को निखारने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए । रोल के साथ प्रयोग को भी तरजीह देनी चाहिए, सच्चे कलाकार की यही ताकत उसे शिखर पर ले जाती है। टीवी इंडस्ट्री के माहौल को अच्छा बतलाते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि माध्यम कोई भी हो पर प्रतिभा कलाकार को सफल मुकाम तक पहुंचाने में सहायक होती है।  पेश है उनसे की गई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश:

    टी वी इंडस्ट्री में आपकी एन्ट्री कब हुई ?

    आलोक: मैं काफी समय से इस इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ हूँ । हालांकि 2012 में मुझे पहला ब्रेक मिला। वह साल मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण साल है।

    आपका अभिनीत पहला टी वी धारावाहिक कौन सा है ?

    आलोक: मेरा पहला टी वी धारावाहिक था ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘  डीडी नेशनल पर एक वर्ष तक लगातार प्रसारित हुआ। यह  धारावाहिक समाज की कुरीतियों के प्रति जागरूक करता है, इसमें मैंने विशाल नामक एक ऐसे नवयुवक की भूमिका अभिनीत की है जो कितनी ही कठिनाइयों का मुकाबला करते हुए अपने परिवार का साथ नहीं छोड़ता है और सबसे मिलकर चलता है। इस धारावाहिक से संयुक्त परिवार की अच्छाइयों के बारे में बेहतरीन संदेश निकलकर आता है।



    क्या आपको लगता है कि ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘ धारावाहिक को देखने के लिए अन्य धारावाहिकों के दर्शक इससे जुड़ हैं क्योंकि टीआरपी के हिसाब से डीडी नेशनल को इंडस्ट्री में इतना अधिक रिस्पांस नहीं मिलता है ?

    ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘ धारावाहिक के बारे में साथी कलाकारों और दर्शकों की प्रतिक्रिया काफी सकारात्मक रही है। वैसे भी चैनल तो केवल एक जरिया भर है, दर्शक सिर्फ वही धारावाहिक देखना पसंद करते हैं जिनकी घटनाएं उनके दिल के करीब हों और रोजमर्रा की जिंदगी से ताल्लुक रखती हों और जिन समस्याओं से वह जूझ रहे हों, उनका सटीक हल निकालती हों।

    इस धारावाहिक में काम करने के बाद आपका कैरियर उठान पर है, इस विषय पर क्या कहेंगे आप ?

    आलोक: मैं अभी अपनी सफलता से संतुष्ट नहीं हूं बल्कि यूं कहूंगा कि कलाकार कभी अपने अभिनय से संतुष्ट नहीं हो सकता है। यह असंतोष ही जीवन में बेहतर करने के लिए जरूरी है।  ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘धारावाहिक का सफल प्रसारण हाल ही में संपन्न हुआ है। इस दौरान मुझे अन्य कई चैनलों पर छोटी-छोटी भूमिकाएँ मिली हैं और मैंने उन्हें भी मन लगाकर पूरा किया है। वैसे भी भूमिका छोटा या बड़ा होना उतना मायने नहीं रखता, जितना अभिनय में डूबकर अपना सर्वोत्तम दर्शकों के सामने प्रस्तुत करना जरूरी है।  ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘ धारावाहिक के जरिए मैं अभिनय कला की कई बारीकियों से परिचित हुआ हूं।  ऐसा नहीं है कि इस धारावाहिक में अपने काम की सराहना पाकर खुद को बहुत बड़ा कलाकार समझने लगा होउफं।  मेरे सामने अभी और भी अच्छा कार्य करने की संभावनाएं है और मुझे उनमें भी खरा उतरना है। मेरे ख्याल से हर कलाकार को निरंतर अपने कला को निखारने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए। अभी मेरे पास कई अच्छे प्रोजेक्ट्स हैं । मुझे जीवन में नए नए प्रयोग करने में खूब आनंद मिलता है और मैं रोल के साथ प्रयोग को तरजीह देने का सदा पक्षधर हूँ। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में मैं अपनी अभिनय कला को और अधिक क्षमताओं के साथ अपने रोल में जीवंत कर पाउंगा।

    अभिनय के क्षेत्र में ही क्यों आए ?

    आलोक: विद्यालयी जीवन से ही मैं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया करता था । जब बड़ा हुआ तो फैसला लेना था कि क्या करना है। मेरे माता-पिता, दोस्त-यार, शुभ चिंतकों ने सुझाव दिया कि मुझे अभिनय के क्षेत्र में जाना चाहिए । उन्होने सपोर्ट भी किया और ेअनुकूल अवसर मिलते ही मैं इस क्षेत्र में प्रवेश कर गया।

    अभिनय में जीवन को आप कैसा महसूस करते हैं ?

    आलोक: यह जीवन इतना आसान नहीं है जितना दिखलाई देता है। इसमें बहुत गहरा आकर्षण है पर  मेहनत बहुत है। हर दिन आपको एक नया किरदार निभाना पड़ता है। बहुत से किरदार आप पर्दे पर निभाते है, पर आप अपनी असल जीवन में उन्हें निभाने से बचते हैं। जबकि पर्दे पर दिखाई देने वाला विलेन अपनी असल जिन्दगी में विलेन नहीं होता, इसे आप अभिनेता प्राण की मिसाल से बखूबी समझ सकते है ं? जिन्हें पिछले महीने भारत सरकार ने दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया है। अभिनय ही जीवन का एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें दुनिया को अनेक आयामों में जानने-समझने का मौका मिलता है। मैं खुद को खुशनसीब मानता हूँ कि मुझे यह अवसर मिला है।

    फिल्म इंडस्ट्री में आपका अनुभव कैसा रहा ?

    आलोक: वाचस्पति जी, बहुत अच्छा या यों कहिए कि अच्छाइयों से लबालब। यहाँ के लोग काफी सपोर्टिव हैं, जबकि बाहर इसके बारे में खूब सारी गलतफहमियां फेली हुई हैं। यहाँ हर कोई एक ही नाव में बैठता है इसलिए उसका तनिक भी नुकसान कोई बर्दाश्त नहीं कर सकता। जितना मैंने इस इंडस्ट्री से सीखा है और सीखता रहूंगा, मैं समझता हूं कि उतना शायद कहीं और नहीं सीख पाता ।

    अन्य चैनलों पर प्रसारित आपका पसंदीदा धारावाहिक कौन सा है ?

    आलोक: वैसे तो मुझे कई धारावाहिक पसन्द हैं पर साथियाँ साथ निभानामुझे बेहद आकर्षित करता है।

    क्या आप हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में भी कर रहे हैं ?

    आलोक: जी हाँ, हाल ही में मैंने एक हिन्दी फिल्म में छोटा सा किरदार निभाया है। उम्मीद करता हूँ कि वह भी दर्शकों को अवश्य पसंद आयेगा ।

    भविष्य की आपकी योजनाएँ ?

    आलोक: मैं अलग-अलग तरह के किरदार निभाना चाहता हूँ , चाहे टी वी हो या सिनेमा। मुझे अपने पर पूरा भरोसा है कि प्रोड्यूशर और डायरेक्टर्स को मेरा काम पसंद आता रहेगा और वे मुझे मौका देते रहेंगे ।

    चलते-चलते एक और प्रश्न....

    किन-किन लोगों ने आपको इस इंडस्ट्री में सपोर्ट किया है, जिनके प्रति आप आभार व्यक्त करना चाहेंगे ?

    आलोक: इस इंडस्ट्री में मेरे मार्गदर्शक रहे हैं रवि भूषण भारती और संदीप बेरीवाल। इन दोनों के दिशा-निर्देश के बल पर ही मैं यहाँ तक पहुँच पाया हूँ । साथ ही मैं आभारी हूँ ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘ के प्रोड्यूशर मनीष जी, डायरेक्टर सबीर जी और क्रिएटिव हेड शाहिद जी का, जिन्होने मुझ पर भरोसा किया और  अपने को साबित करने का दुर्लभ अवसर दिया ।

    जी धन्यवाद आलोक जी, अपना समय देने और बातचीत करने के लिए। जाते जाते पाठकों को मैं यह भी बतलाना चाहूंगा कि आलोक भारद्वाज के अभिनय से सजी फीचर फिल्म ‘खेलमंत्र‘ संभवतः अगस्त माह में प्रसारित होगी, जिसमें इनके अभिनय के एक नए रूप का दर्शक दीदार कर पायेंगे।

    फिल्‍म चीज बड़ी है फिक्‍स फिक्‍स .. आलेख का बकाया अंश

    सृष्टि के अंत के लिए भी फिक्सिंग हो चुकी होगी। हम सब भी अपनी अपनी जगह फिक्स हैं। कोई नौकरी में फिक्स, कोई छोकरी में फिक्स, कोई दोनों में फिक्स।  और कोई तीन तरह से, फिर भी उसकी गिनती न तीन में है न तेरह में। फिक्सिंग की गति वही नहीं समझ पाता है। कोई पढ़ने के लिए फिक्स और कोई न पढ़ने के लिए फिक्स । कोई गाना सुनने में फिक्स कोई चुटकुला सुनाने के लिए फिक्स । कोई उन्हें लिखने के लिए फिक्स और कोई उन्हें चुराकर अपने नाम से छपवाने के लिए फिक्स। संत फिक्स हैं उपदेश देने के लिए, शैतान फिक्स हैं चकमा देने के लिए और चकमा लेने के लिए उनके अनुयायी। फिक्सिंग कहर है, जहर है और मजबूत ठहर है। ईमानदारी के लिए और बेईमानी के लिए गिराने उठाने की जोड़-तोड़ की फिक्सिंग। कोई बीमारी में फिक्स  है, जिसकी बीमारी हटाने के लिए डॉक्टर फिक्स है, यही तो फिक्सिंग की ट्रिक्स हैं। ट्रिक होते भी ट्रक से कहीं ज्यादा मजबूत है फिक्सिंग। जीने मारने में फिक्स , यमराज भी फिक्स, उसके एजेंट जगह-जगह अनेक अनेक रूपों में फिक्स हैं। सड़कों पर यातायात फिक्स, लाल बत्तियां फिक्स और उन्हें अनदेखा करके मनमानी करने वालों के लिए यातायात के सिपाही फिक्स। आप सुबह सैर पर चल दिए हैं और आपके पैरों तले चीटियां और सूक्ष्म  प्राणी मरने कुचले जाने के लिए फिक्स हैं। मक्खियां और मच्छर उड़ने के लिए फिक्स हैं, फिर भी ताली बजाने पर मरने के ‍लिए फिक्स। आप भी सैर पर, वह भी सैर पर, पर आपके पैर उनके सिर पर। सैर का लंबा और छोटा होना भी फिक्स  है। विचारों की सैर, गांव की सैर और शहर की सैर। ख्वाबों में भी सैर करते बहुतेरे हैं। जिंदगी में आनंद पाने के लिए ही फिक्सिंग है। देखा आपने फिक्सिंग में भी कितनी मिक्सिंग है।

    मल्टीटास्किंग का जमाना है इसलिए फिक्सिंग भी मल्टी हो गई है।  एक धंधे में अनेक धंधे जुड़ गए हैं, न एक से और न नेक कार्य से आदमी गुजर बसर कर पा रहा है। दरअसल, धन की लिप्सा , पैसे की भूख सबसे उपर मान ली गई है। इसलिए उसने अपने हाथ-पांव और चादर फैला ली है। बिना सतर्कता बरते कि उससे किसी की आंखें मुंद रही हैं। जैसे मल्टीनेशनल कंपनी छा जाती है। एक धंधे से यानी कमाई के एक सोर्स से आजकल गुजारा नहीं हो पाता। अब जो लाखों करोड़ों कमा रहे हैं उनके खर्चे और हेराफेरियां अरबों में पहुंच गई हैं। उनकी वासनाओं और हवस पर उनका बस नहीं रहा है। बेबस हो चुके हैं वह। अब भगवान ने भी गजब की फिक्सिंग की है। कान का मुख्य  काम सुनना है लेकिन सुनने के साथ ही जब चाहे पुलिस कान पर थप्पड़ मार देती है, इसके अतिरिक्त  कान पर ही चश्मा  पैर पसारकर लोट मारता है। चश्मे को कान के सिर पर लोट लगवाने की फिक्सिंग इंसान की अदा है। नाक भगवान ने सांस लेने के लिए दी, आपने उससे सूंघने की फिक्सिंग कर ली। नाक के सिर पर चश्मा जमकर बैठ गया कि अब नहीं हिलूंगा। चश्मा भी मल्टीटास्किंग कर रहा है। आंखों की मूल फिक्सिंग देखने के लिए है। पर उससे नैन मटक्का भी किया जा रहा है। वही आंखें धूल झोंकने के काम आ रही हैं, आप इस फिक्सिंग को मानने से कैसे करेंगे इंकार। चश्मा, कान नाक पर सवारी नहीं करेगा तो क्या मुन्ना्भाई बनकर हवा में लटकेगा या जुल्फों को पकड़कर लटकने का लुत्फ‍ लेगा। पहले इंसान ने वाहन में पैट्रोल से चलने की फिक्सिंग की, जब उससे मन नहीं भरा तो सीएनजी से चलने की फिक्सिंग भी कर दी। अब सुन रहे हैं कि पानी और हवा से वाहनों को चलाने की फिक्सिंग पर काम चल रहा है। जुगाड़ करना फिक्स करने का ही पर्याय है। सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान बढ़ने की देर नहीं होती कि वे कहने लगते हैं कि पे फिक्स करो। फिक्सिंग के सिक्सर की हर जगह धूम मची हुई है। क्रिकेट में सुन रहे थे कुछ नजारे नजर भी आए थे पर परंपरागत तरीका इतने बड़े खेल में खिलाडि़यों को ही रास नहीं आया इसलिए स्पॉट फिक्सिंग का तरीका खोज निकाला। जिसमें कोई तौलिया हिलाता है, कोई टोपी गिराता है और नोट पाने के चक्कर में कोई कोई तो खुद की नजरों से गिर जाता है। फिक्सिंग के साथ मिक्सिंग बुराईयों की अच्छाईयों की। फिल्म में जैन्ट्स  के साथ लुगाइयों की मिक्सिंग। कितनी हीरोइनें हीरोज के साथ मल्टी  फिक्सिंग करती हैं। कितने ही हीरो हीरोइनों के साथ मल्टी टास्किंग करते हैं। मिक्सिंग के जलवों को फिक्सिंग से कम मत समझिए। ज्यादा होंगे तो होते रहें इस समय तो फिक्सिंग के जलवे उबाल मार रहे हैं। संत ने माफिया के दवाब में आकर शैतानी रूप अख्तियार कर लिया। पानी के गिलास में गोली के मिलाने को मिक्सिंग कहोगे या फिक्सिंग - इनके बीच में सीमा रेखा की जरूरत है। दूध में आम, चीकू में दूध - कितने ही शेक मनुष्य को लुभाते हैं। आम खाने से आम और मैंगोशेक पीने से खास हो जाते हैं। शराब में सोडा, सोडे में व्हिस्की, व्हिस्की  में बीयर आप जिसे सहन कर सकते हो उस सब को फिक्स कर दो, फिर लुत्फ लो जिंदगी का। चाय में चीनी, मसालों में बुरादा, दाल में कंकड़ मिक्स‍ नहीं, फिक्स किए जाते हैं। इसलिए खुलेआम बिक जाते हैं और आप तथा हम खरीद कर ले आते हैं। इसलिए फिल्म चीज बड़ी है फिक्स फिक्स।


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    जी हां दुनिया गोल घूमती है

     
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