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"बीती ताहीं बिसार के"


बीती ताहीं बिसार के....
आगे बढने को जी चाहता है....
बहुत गल्तियाँ कर ली...
अब सुधरने को जी चाहता है


चौरासी,बाबरी और गोधरा पर शर्मिंदा हैँ

पता नहीं क्यूँ फिर भी हम ज़िन्दा हैँ
लड़ भिड़ कर देख लिया बहुत मर्तबा
अब शिक्वे भूल गले लगने को जी चाहता है


उड लिए पंख फैला ऊँची उड़ान
अब नीचे ज़मीं ताकने को जी चाहता है
पूरी हुई अच्छी-बुरी हसरतें सभी
अब बस वैराग्य को जी चाहता है


जी लिए बहुत उल्टा सीधा कर के
अब बस सुकून से मरने को जी चाहता है
चल के देख लिया कई दफा पुराने ढर्रे पर
अब नई राहें नई मंज़िलें तलाशने को जी चाहता है


मरते रहे औरों के लिए हर हमेशा
कुछ पल अब अपने लिए जीने को जी चाहता है
सुनते रहे तमाम उम्र इसकी उसकी सबकी
अब अपनी करने को बस जी चाहता है


महफिलें उम्दा जमाते रहे उम्र भर
अब मायूस हो बैठने को जी चाहता है
बीते बरस लिखने को बहुत छूट गया....
अब नए विष्य नए शब्द तलाशने को जी चाहता है


सच!...बीती ताहीं बिसार के....
आगे बढने को जी चाहता है....
बहुत गल्तियाँ कर ली...
अब सुधरने को जी चाहता है

***राजीव तनेजा***

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नुक्कड़ निमंत्रण

अविनाश जी के सुझावानुसार हम सोच रहे हैँ कि क्यों ना नेहरू प्लेस,दिल्ली के नज़दीक 'आस्था कुंज' में  ब्लॉगर साथियों से एक अनौपचारिक मुलाकात की जाए।अब इसे गोष्ठी या फिर सामान्य मुलाकात आप जो जी चाहे  कह लें लेकिन आप आएँ ज़रूर।आप सभी का इंतज़ार रहेगा और यदि किन्हीं अपरिहार्य  कारणों की वजह से आना संभव ना हो तो अपना स्नेहाशीष तथा शुभकामनाएँ ज़रूर भेजें।

इसके लिए कौन सा दिन व कौन सा समय(कितने बजे से कितने बजे तक) सबसे उचित एवं सुविधाजनक रहेगा?इसके बारे में आप हमें अपने विचारों से अवगत कराएँ।मेरे ख्याल से रविवार का दिन हो तो सबसे अच्छा।

मेरा मानना है कि ऐसी अनौपचारिक मुलाकात महीने में कम से कम एक बार तो अवश्य ही होनी चाहिए जिसमें हम सभी सम्मिलित हों और चर्चा के जरिए एक दूसरे के विचारों से अवगत हों।

इस मुलाकात में किस बारे में बात की जाए और किस बारे में नहीं?.......इस बारे में भी आपके सुझाव आमंत्रित हैँ।

एक और ज़रूरी बात कि खाने-पीने का क्या इंतज़ाम किया जाए और कैसे किया जाए?...

यहाँ कैसे किया जाए से मेरा तात्पर्य है कि किसी एक साथी के सिर पे इन सब इंतज़ामात का ठीकरा फोड़ने के बजाए क्यों ना हम सब अँग्रेज़ी के घोर विरोधी होते हुए भी उन्हीं के तरीके ..'खर्चा अपना अपना...तो दोस्ती पक्की' को अपनाएँ? क्योंकि बड़े-बुज़ुर्ग भी तो कह गए हैँ कि......"सीख अगर अपने चिर विरोधी से भी मिले...तो भी उसे बेहिचक ले लेना चाहिए"

आपका क्या विचार है?

एक और तरीका ये भी हो सकता है(अगर सुविधाजनक लगे तो) कि हम सभी अपने घर से कोई ना कोई आईटम बना कर(अगर बनाना आता हो तो) या फिर बनवा कर लाएँ।

क्या कहा?

मैँ क्या लाऊँगा?"...

"म्मैँ....मैँ आलू-पूड़ी लाने को तैयार हूँ।अब ये मैँ आपको क्यों बताऊँ कि इसके लिए मैँ अपने-हाथ-पैर और कपड़े सब लिबेड़ूंगा या फिर इसके लिए श्रीमति जी से चिरौरी कर उन्हें मक्खन लगाऊँगा?

आप गुठलियों की चिंता छोड़ बस सिर्फ आम से मतलब रखें।वैसे भी आपको तो बस काम होने से मतलब होना चाहिए।

"क्यों?...है कि नहीं"

हाँ!...अगर आप चाहें तो किसी बाज़ार या मॉल से भी कुछ खरीद कर ला सकते हैँ।वैसे ये आपकी जेब पर और आपके विवेक पर निर्भर करता है कि आप क्या करना चाहते हैँ?

आप चाहें तो इस बारे में अविनाश जी से फोन पर भी संपर्क कर सकते हैँ।

उनका नम्बर है--- 9868166586

राजीव तनेजा

+919810821361

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नुक्‍कड़ ब्‍लॉग/ब्‍लॉगर गोष्‍ठी का आयोजन

प्रतिक्रिया पर प्रति‍प्रतिक्रिया दीजिए

जैसे दी है मैंने
और दीजिए ज्ञान

इसी से आगे खुलेंगे
आंख, नाक और कान।

बच्‍चा काफी समझदार है
नटखट नाम तो है इसका
पर काम दिमाग खटखटाने के कर रहा है
पर विदेशी या विदेश में रहने वाले इस
प्‍यारे से खटखट बच्‍चे को ढेर सारा प्‍यार।

सही खटखटाया है इसने दिमाग का दरवाजा
ऐसी नौबत ही न आने दें कि हो झगड़ा
करें ऐसा कि झगड़े का न हो तनिक रगड़ा

नुक्‍कड़ संगोष्‍ठी में आने का हो पक्‍का इरादा
वे पूरा होमवर्क अभी से करना कर दें शुरू
कह सकते हैं गुरू हो जायें शुरू
चाहे हों वे मौजूद इन चुरू

पर करनी है जिन मुद्दों पर चर्चा
उस पर अभी से दिमाग का कर लें खर्चा
अपने विषय सुझायें उस पर राय भी बतलायें

सब अपना अपना आइडिया इसी प्‍लेटफार्म पर लायें
उस पर अपने विचार बतलायें, सबके विचार सुनें
मनन करें, मंथन करें और निकालें निष्‍कर्ष
तभी संगोष्‍ठी का सोपान बनेगा नया उत्‍कर्ष

सिर्फ मिलने के लिए मिलना
अपने घरों से इतनी दूर निकलना
मेरा घर पास है तो इसका मतलब
यह तो नहीं है कि मुझे अन्‍यों की
चिंता नहीं है, जबकि आज खाली कोई नहीं है

वैसे भी समय खराब करने के लिए
नेटजगत से अच्‍छा कोई और प्‍लेटफार्म नहीं है
पर सभी नहीं कर रहे हैं समय खराब
और
न ही करना है हम सबने बेकार

चाहे कार में न आयें पर बेबस भी न हों
रचें, लिखें, मथे, ऐसा जो जचे जमाने को
बदल दे कहानी को, पूरी रवानी को

ऐसा माहौल बनाना है, अच्‍छे विचारों को
जगमगाना है, ब्‍लॉग का सदुपयोग करके
सबको करके दिखलाना है

नुक्‍कड़ चाहे न बने मिसाल, पर न खराब हो इसमें लगे साल
साल दर साल नहीं तो यूं ही बढ़ते रहेंगे
पर सच्‍चाई में पीछे हटते रहेंगे

इसलिए अच्‍छी तरह सोचें
अपनी योजनायें नुक्‍कड़ पर लगायें
जिसमें अपना संपूर्ण ज्ञान आजमायें
सबकी मानें और अपनी मनवायें
जो भी हों अच्‍छी सच्‍ची बातें

नहीं तो कल यही बच्‍चा हमें डांट रहा होगा
कहेगा अंकल, देखना मैं करता हूं क्‍या कल
पर उसे न होने दें विकल
और पर्यावरण अनुकूल चलायें शब्‍दों की साईकिल।

मैं इस साईकिल से उतरता हूं
अब दूसरा बैठे और अपनी बात कहे।
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माँ क्यों रोती है ?



एक बालक ने माँ से पूछा माँ औरते रोती क्यों है

माँ ने झट जवाब दिया - हम औरत है यूँ रोती हैं

बेटा बोला - माँ तेरा जवाब मुझे समझ नहीं आया

माँ ने पट जवाब दिया इसे तो कोई न समझ पाया

लड़के ने पिता से पूछा कि पापा माँ क्यों रोती है

पिता ने कहा -ये औरतें बिना कारण रोती रहती हैं

लड़का थोडा बड़ा होकर भगवान से ये प्रश्न पूछता है

भगवान् चक्कर मैं पड़े अब उन्हें कुछ ना सूझता है

भगवान परेशान होकर इन्टरनेट कैफे मैं जाता है

जिसको कोई न बताता उसे गूगल- देव बताता है

जब मैंने औरत बनाईं मैंने उसे विशिष्ट बनाया

पूरी धरा का भार उठाने कंधो को मज़बूत बनाया

स्पर्श मैं जादू हो इसलिए उसके हाथ तो नरम बनाए

उसको आतंरिक शक्ति दी ताकि संतान पैदा कर सके

ताकत दी ताकि दुत्कार खाकर भी बह सेवा कर सके

मैंने उसे मृदुलता दी ताकि बह सबसे प्यार कर सके

मैंने उसमे ये समझ पाने की बुद्धिमत्ता भर दी

कि एक अच्छा पति कभी ना हो सकता वेदर्दी

वो जांचता है कि हमेशा ही तुम साथ हो

उसे तुम माफ़ करदो तुम्ही तो उसकी सांस हो

इन सबके बदले मैंने उसे रोने को आंसू दिए

जब जरूरत हो इनसे काम ले जब तक जिए

तुम ये समझो यही उसकी एक कमजोरी है

वरना वो उतनी ही सशक्त है जितनी भोरी है

जब वह आंसू बहाए तो उसे ये अहसास देना

भले रोये उसे बताना कि वो कितनी प्यारी है

रोकर भी उसका दिल ख़ुशी से चहक उठेगा

और तुम्हारा घर भी खुशबू से महक उठेगा

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कर्ज माफी योजना में किसानो को राहत

भारत सरकार की कर्ज माफी की योजना मे किसानो को पहली किस्त ३० सितम्बर २००८ को चुकानी थी लेकिन वही समय किसानो के लिए फसल मे पैसा लगाने का है. जब यह बात वित्त मंत्री महोदय के संज्ञान में लाई गयी तो पिछले सप्ताह सरकार ने फैसला लिया कि पहली किश्त चुकाने की अंतिम तिथि ३१ मार्च की जाती है. सरकार के इस निर्णय से एक ओर जहां प्रत्यक्ष मे किसानो को राहत मिली है वही बैंक भी ऐसे खातो को फिलहाल स्टैण्डर्ड खातो मे रख सकेंगे. सरकार की इस पहल से चुनावों से पूर्व पुनः ऐसी ही किसी नयी घोषणा की अटकले भी लगाई जा रही हैं. पिछली घोषणा से ही कृषि ऋण को चुकाने की प्रवृति मे काफी गिरावट आयी है नयी घोषणा बांको के लिए बसूली को बहुत मुश्किल कर देगी.

स्क्रैप पोस्ट करें रद्द करें
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सत्यम शिवम् सुन्दरम - राजू गंदा अच्छे हैं हम


राजू का ताश के पत्तो का साम्राज्य ढह रहा है और बाकी सभी खिलाड़ी अपने मन में खुश हो रहे हैं कि माना तो उसी ने है - सो चोर भी केवल बही सावित हुआ. हम उन आँख के अंधे निदेशक बोर्ड के सदस्यों को क्या कहेंगी जिन्होंने कभी बैलेंस शीट पढने की जेहमत नहीं की. कौन मानेगा इस बात को. पब्लिक लिमिटेड कंपनी हर ३ माह मे अपनी बैलेंस शीट अखवार मे छपती है. और उस पर चर्चा होती है. लेकिन उन सबको लगा जैसे कि राजू भैया के पास कोई जादू है जो वो लाभ तेजी से बढा रहे है और शेयर की कीमत भी उस जादू से उपर जा रही है. तो उस लोभी निदेशक मंडल को राजू ने क्यों अपने बयान मे तमाम जिम्मेदारी से मुक्त किया इसकी जांच होनी चाहिए. कंपनी के औडिटर तो शक के घेरे मे नहीं पूरी तरह दोषी है ही उन बैंको के बारे मे क्या जिन्होंने गलत प्रमाण-पत्र दिए. म्यूचुअल फंड के रिसर्च विभाग मे क्या हो रहा था? क्या उन्हें उद्योग की प्रगति पर शक नहीं करना चाहिए था ? और अब क्या अकेली सत्यम मे गड़बड़ है शायद समंदर के पाने मे ही कुछ गड़बड़ है. समूचे वाणिज्य जगत को इस पर पारदर्शक मंथन करना पडेगा.
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नुक्‍कड़ ब्‍लॉग/ब्‍लॉगर गोष्‍ठी का आयोजन

यह किया जाना है तय
कि मिलें ब्‍लॉगर्स
दिल्‍ली में।

करें शुरूआत
मिलने की
जुलने की।

न कि लड़ने की
भिड़ने की
फिर गिरने की।

क्‍या दिल्‍ली में
नेहरू प्‍लेस के
आस्‍था कुंज में
मिलना रहेगा
ठीक।

रहे ठीक तो
लगे कीबोर्ड
यह भी बतलायें
कि कब मिलें
कितनी देर मिलें
और क्‍यूं मिलें।


राय और आदेश
आमंत्रित हैं।
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लुप्त होते संस्कार और मीडिया का योगदान

कल शाम को मै यूँ ही बुद्धू बक्से के सामने बैठ गया. तभी किसी खबरिया चैनल पर एक डिफ्रेंट टाइप का विज्ञापन दिखाई दिया. जो दिखाता है कि एक विदेशी पर्यटक के साथ किसी लोकल (स्थानीय) ने बुरा व्यवहार किया और हमारे गज़नी खान यानी आमिर खान जी लोगॉ को सिखाते है कि अगर हम विदेशी यात्रियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेंगे तो वे क्या सोचेंगे भारत के बारे मॅ. और आस-पास का जन-समूह भावनाओं मॅ बहकर उस लोकल की पिटाई करने लगते हैं, फिर आमिर साहब यह समझाते हैं कि हमें अतिथि के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए. बड़ा अटपटा लगा मुझे वह विज्ञापन देख कर, सोचने लगा कि हम क्या होते जा रहे हैं? फिर सोचा कि इतनी मूलभूत व्यावहारिक बातॅ भी अब किसी जन-जागृति कार्यक्रम के माध्यम से सीखनी पड़ेंगी।
फिर रात को सोने के बाद मैंने सपना देखा कि बच्चे अपने बड़ों से ठीक से व्यवहार करें। इसे सिखाने के लिये एक टी.वी. कार्यक्रम शुरू हुआ है और उसमें एक नाटिया के माध्‍यम से सिखाया जा रहा है जिसमें एक बच्चा अपने पिता से बोलता है,” अबे बुढऊ, ज़रा सुन तो मुझे तुझसे कुछ काम है.” और तभी कोई ग़ज़नी खान कहता है, “हमें अपने बड़ों से तमीज़ से पेश आना चाहिए.” दूसरे चैनल पर एक स्त्री को अपनी संतान से प्रेम करने और उससे दुलार से पेश आने की सलाह दी जा रही है, उसे माता होने का अर्थ समझाया जा रहा है। तीसरे चैनल को देखा तो उस पर किसी युवती से बात की जा रही है, “क्या आप माँ बनना पसंद करेंगी?” वह जवाब देती है, “अभी तक इस बारे मॅ सोचा नहीं है। हाँ, अगर मै माँ ना भी बनूँ तो इससे क्या फर्क पड़ता है??”.....मैं सपने मॅ हैरान-परेशान हो रहा हूँ.
मेरे घर से मेरे मोबाइल पर टेलीफोन आता है(सपने में) लाइन पर मेरी बेटी है, कहती है डैडी, मुझे आपको कुछ बताना है?? और मेरे जवाब को सुने बगैर बोलती है, “मैं माँ बनने वाली हूँ....पिछले महीने टोनी के साथ ट्रिप पर गई थी ना, वहीं यह सब हुआ था....पर घबराने की कोई बात नहीं है... मैं गायने से बात कर चुकी हूँ...यह अबोर्ट हो जायेगा....मैं वहीं जा रही थी...तो सोचा कि कम से कम आप को इंफार्म तो कर ही दूँ...” मैं घबरा उठ बैठा। तो पाया मेरी 11 साल की बेटी पास ही अपना होम-वर्क पूरा करने में व्यस्त है....मैं चैन की सांस लेते हुए फिर टी.वी. खोलता हूँ और पाता हूँ कि मरे हुए एक कुत्ते की लाश को फोकस मॅ लिये एक संवाददाता जनता से यह गुहार लगा रहा है “इस कुत्ते की शक्ल देख कर लगता है कि इस कुत्ते की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है, मगर नहीं...हमारी टीम ने बड़ी मेहनत से यह वीडियो हासिल किया है जो इस राज़ का पर्दाफाश करता है कि इस कुत्ते को कितनी बेदर्दी से मारा गया है...” मैं टीवी बंद कर देता हूँ कि कहीं फिर से कोई सच्चाई मेरे सपने में आकर मुझे ना डरा दे।
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ओ हंस

ओ हंस ,

तुम ज्वालामुखी क्यों हुए ?

कि एकबारगी ही

फ़ूट पड़े

अपने श्वेत लावे के साथ

फ़िर

सूख गये धरा तक पहुँचने से पहले ही !

क्षीर विवेकी ओ !

किस भाँति तय किये

पृथकता के पैमाने तुमने

कि आज भी मिलती है

उजली गन्ध

हर कुएँ के जल में ?

ओ श्वेतपंख !

क्यों तुम गरुड़ बने ?

कि तुम्हारे धारदार पंखों के

अग्निमय निशान

क्षितिज पर टिक न सके

अरुणिम ज्योति सदृश !

ओ हंस !

तुम नदी क्यों न हुये

कि पत्थर की दरार से धीरे धीरे

रिसकर फ़ैलते और बहते,

बड़ी धार बनकर-

दूर तक

फ़िर उगता तुम्हारा रक्त

सदियों तक फ़सलों में ।


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छंदमुक्त बनाम छंदयुक्त: सच्चाईयाँ और दलीलें।- सुशील कुमार


आदरणीय श्री रूपसिंह चंदेल जी, आप कविता-प्रदेश के नागरिक कब से हो गये? जब आपने अपनी ब्लॉग पर मेरी कविता को तहस-नहस कर छापी थी तो मैंने न सिर्फ़ आपसे इसकी शिकायत की थी बल्कि इससे संबंधित परिवाद-पत्र की प्रतिलिपि भी आदरणीय सुभाष नीरव भाई जी को भी भेजी थी। तब आपने यह कहकर कन्नी काट लिया कि आपको कविता की अच्छी जानकारी नहीं है। इसलिये मैं चुप हो गया। अब जबकि कविता पर सवाल और आपकी राय सामने है, मैं आपसे और सुभाष भाई से यह पूछना चाहूंगा कि जब आप लोग अपने साईट पर छंदमुक्त कविताओं को छंदयुक्त कविता की तुलना में अधिक छापते हैं तो फिर काव्य के छंद-प्रवृति पर आपकी पक्षधरता कितनी जायज है। संस्कृत की कई पुरातन पुस्तकें छंद में हैं पर वे कविता-साहित्य की कोटि में क्यों नहीं आती? सिर्फ़ छंद ही कविता को कविता थोड़े बनाती है! आप लय की बात क्यों नहीं करते जो छंदमुक्त के साथ-साथ छंद वाली कविता की भी प्राण है?। आप अरुण कमल की एक रचना को लेकर चल रहे। उनकी अन्य रचानायें भी पढि़ये। अगर आप छंद पर अरुण कमल जी विचार ही जानना चाहते हैं तो उनका भी कहना यही है कि “जिसने छंद नहीं सीखा,जिसने छंद को उन कार्यों के लिये इस्तेमाल नहीं किया,जिस तरह वह निचाट गद्य को करता है,उसका कवि जीवन अधूरा है।”आप उनको फोनकर इस बात भी सत्यापन कर लें। ...और अगर छंदमुक्त कविता का उदाहरण ही देना है तो मैं वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की एक कविता यहाँ रख रहा हूं, अगर इसे देखकर आप छंदमुक्त कविता का भविष्य तय करें तो जरा समझ में भी आये -
धारदार चित्कारें
--------------
सुनता हूँ अग्नि की अनुगूँज तरंगमालाओं में
ज्वालाओं की लय
थिरकन कणों उपकरणों की
भीतर सोये ज्वालामुखी पता नहीं
कब जागें
मुझे अन्न चाहिये
छत और छाया भी
पथरीले मौन को भेदने वाला लोहा
मुझे दो
मेरा युग अंधा नहीं
मैंने ही आँखों पर पट्टियाँ बाँधी हैं
देखने से पहले रोएँ पहचानते हैं
ऋतुओं का बदलना
शब्दों की रगों में बहते ख़ून की आवाज़ सुनो
कुल्हाड़ी की तेज धार में दमकते हैं
भूख के चेहरे-
ब्रह्म का एक नाम अन्न भी है
ओ मेरे धातुक समय
मुझे सुनने दे
ज़मीन में दबे लोगों की उबलती चित्कारें-
ओह, कटीले तारों में मुझे कसता समय
इस्पात ढालते हाथों की मरोड़ों में
उभरते भविष्य के आयताकार मेहराब देखता हूँ
आसमान में जो अबाबिल गा रहा है
उसमें छिपा है धरती का त्रास भी
देखता हूँ इसी ऋतु में
गोरैया को घोंसला बनाते
पहाड़ों को तोड़कर ही
उधर जाना है
जिधर दीख रहे हैं घास के हरे तिनके
ओ टूटते नक्षत्र
बुझते राख होते उल्कापिंड
तुम धरती की मर्म पीड़ा से बेखबर हो
मनुष्य-हृदय
अब उन चट्टानों सा कठोर हो चुका है
जिन पर समुद्री लहरें
सदियों से सिर पटक रही हैं
ज़िन्दा वृक्ष गिराये जा रहे हैं
ओ मेरे कवि-
समय की रगों में बहकर
आदमी की पीड़ा को जान
सुनता हूँ सड़क पर खड़े बच्चे का रुदन
उसके हाथ में बासी रोटी का टुकड़ा है
आँखों से झरते आँसू
बच्चे, मेरे प्यारे बच्चे
रोओ मत
फिलहाल बादल ने सूर्य ढक लिया है
वह उसे फाड़कर
कल फिर उदय होगा
इस शहर की बाँहों में लपेटे अरावली की
श्रृखलायें भी
सूर्योदय को रोक नहीं पाती
यह अँधेरा क्षणिक है
पूर्व को हर रोज़
इसी उम्मीद से देखता हूँ
यह थोड़ा और उगे
तुम भी देखना-
उस पूर्व पर भरोसा करो
जहाँ से वह उगता है हर रोज़।
- [कवि विजेन्द्र]
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हिंदी कविता का भाग़्य(फल)

सुभाष नीरव


“नुक्कड़” पर भाई सुशील कुमार जी का लेख- “कविता में छंद वापसी पर बहसें- कितनी समकालीन और उपयोगी होंगी ? पढ़ा। और उस पर आईं छह टिप्पणियाँ भी।

मैं भाई रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। उन्होंने बहुत सही कहा है कि "छन्द कहीं नहीं गया था ,जो वापस आ गया हो ।" छंद में आज भी अच्छे गीत/नवगीत लिखे जा रहे हैं। हाँ, छंदमुक्त कविता की बहुतायत में और प्रायोजित शोर-शराबे में वे दब –से गये हैं। दूसरी ओर मेरा यह कहना है कि छंदमुक्त कविता भले ही छंद से परहेज करती है पर उसमें भी एक लय प्रवहमान होती है। निराला जी की कविता "वह तोड़ती पत्थर" इसका उदाहरण है। पर क्या करें आज कविता अगर हास्य कवियों तक सिमटी है तो इसके पीछे हमारी पत्र पत्रिकाओं के संपादकों का भी बहुत बड़ा हाथ है जो कविता के नाम पर कुछ भी छापते रहे हैं और छाप रहे हैं। इसके सैकाड़ों उदाहरण दिये जा सकते है, पर यहाँ एक उदाहरण ही प्रासंगिक होगा। अभी हाल में ही "कथादेश" के दिसंबर 08 के अंक में हिंदी के चर्चित एवं स्थापित कवि अरुण कमल की कविता "भाग्य -फल" को देखा जा सकता है, जो विचार और संवेदना के स्तर पर पाठकों को कुछ नहीं देती, लय की तो बात ही छोड़िये। जब मैंने "कथादेश" के संपादक हरिनारायण जी से फोन पर बात की और पूछा कि आपने इस कविता में ऐसा क्या विलक्षण देखा कि आपने इसे प्रकाशित कर दिया? क्या यह कविता यदि किसी नये अथवा अल्पज्ञात कवि ने उन्हें भेजी होती तो क्या वह उसे छापते? इस पर हरिनारायण जी का उत्तर था कि क्या करूँ, अरूण कमल हिंदी कविता का एक स्थापित और बड़ा नाम है, इसलिए छापना पड़ा। तो जनाब, अगर इस तरह का रवैया होगा तो कविता से पाठक क्यों नहीं कटेंगे और वे क्योंकर कविता को पढ़ेंगे ?
यदि आपने “कथादेश” में छ्पी अरूण कमल वह कविता अभी तक न पढ़ी हो तो उसे यहाँ बानगी के तौर पर दे रहा हूँ और आप ही बताएं कि क्या यह कविता है? -
भाग्य फल
-अरुण कमल

चू चे चो ला ली लू ले लो अ
व उ ओ बा वी वि वु वे वो
क की कु घ ङ छ के को हा
ही हू हे हो डा डी डू डे डो
मा मी मू मे मो टा टी टू टे
टो पी पा ष ठ पे पो पू ण
तू ती ता ते रे रू रा री रो
तो ना नी नू ने नो धा यी यू
ये यो भा भी भू धा फा ढ़ा मे
भो ज जी खी खू खे खो गा गी
गू गे गो सा सी सू सो दा दी
दू थ झ दे दो चा ची ञ डः
00

कविता के प्रेमी कृपया बताएंगे कि उक्त कविता क्या कविता है ? क्या इसमें पाठक की संवेदना को स्पर्श करने वाली कोई बात है? इसमें कौन सी ऐसी अभिव्यंजना, विचार, संवेदना निहित है जो इसे एक कविता बनाती है? क्या इस कविता के माध्यम से कवि आने वाली कविता का भाग्य (फल) बता रहा है कि देखों, भविष्य में कविता का यही हश्र होने वाला है !
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कविता में छंद-वापसी पर बहसें कितनी समकालीन और उपयोगी होगी ?


इधर छंद को लेकर 'साहित्यशिल्पी' में महावीर शर्मा जी की एक छंदयुक्त कविता पर दी गयी टिप्पणी के आलोक में एक बहस सी चल पड़ी थी। कुछ समय पहले जयपुर की सुप्रतिष्ठित पत्रिका 'कृतिओर' में भी इस विषय पर लंबी बहस चली थी। कहने का मतलब कि छंद पर बहसें बराबर चल रही हैं। दरअसल यह बहस कम होती है और लोगों को अपने पक्ष में करने का उद्योग अधिक। कुछ छंदों की ओर लौटने की बात करते हैं तो कुछ आगे बढ़ने की। पर इस तरह की बहसों में विवाद ही अधिक होता है, संवाद कम क्योंकि सहमतियाँ बन नहीं पाती।


वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी का मत है कि "कविता में छंद नहीं लय प्रमुख है। छंद उसकी एक प्रजाति है। लय का रिश्ता शिल्प के उपरी ढाँचे से न होकर कविता की अंतर्वस्तु में व्याप्त हमारी मानवीय निजता एवं प्राण-शक्ति से भी है।"


प्रखर समालोचक डा.जीवन सिंह का मानना है कि "लय का सबंध कविता के रूप-विधान से है जो कविता के लिये प्रयुक्त वाक्यों, वाक्यांशों और शब्दों का एक प्रवाहमयी संयोजन करके पैदा की जाती है।...कविता में जिसे हम गद्यात्मकता कह रहे हैं वह कविता में सरसता और भावपरायणता का ह्रास है। दरअसल बौद्धिकता के ज्वार में हमने कविता में सरसता और भावपरायणता को इतना दरकिनार कर दिया है कि ये बातें कविता के लिये अछूत जैसी बना दी गयी है।..हमारे यहाँ गद्य साहित्य की रचना जितनी पश्चिमी प्रभाव में हुई, उतनी कविता में नहीं। इसका सीधा सा कारण है हमारे यहाँ कविता की सुदीर्घ और समृद्ध परम्परा का होना। उसकी अनदेखी कर जो रचना होगी वह नई और आधुनिक तो अवश्य होगी परन्तु आत्मिक स्तर पर उतनी समृद्ध और पूर्ण नहीं होगी। इस वजह से कभी हम कविता में छंद का सवाल उठाते हैं तो कभी लय का। यह दुविधा है। जब हमने छंद से मुक्ति लेकर मुक्त छंद को अपना लिया है तो फिर बजाय मुक्तिछंद के वैशिष्ट्य और विविधता को सम्पन्न करने के, हम छंद वापसी की बातें करने लगे। मान लीजिये छंद की वापसी हो भी गयी तो फिर दोहा छंद होगा या चौपाई होगी, मात्रिक छंद होंगे या वार्णिक या आल्हा का वीर छंद होगा या रीतिकालीन कवित्त और सवैये। कहा जा सकता है कि यह कुछ भी होगा तो अभी से कल्पना कीजिए कि बौद्धिक पिछड़ेपन और अग्रगामिता का कैसा वातावरण बनेगा? इससे गद्यात्मकता का क्षरण तो हो ही जायेगा लेकिन छंद का जो रीतिवाद और रूढ़वाद पैदा होगा, उसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। यह वैसे ही है जैसे आज कोई लोकतान्त्रिक व्यवस्था के जातिवाद, सम्प्रदायवाद, पूँजीवाद, बाहुबलवाद, आदि विकृतियों से परेशान होकर यह कहने लगे कि इससे तो राजाओं का राज, अँग्रेजी राज और सैनिक तानाशाही ही अच्छी। स्वाद बदलने के लिये या प्रयोग के लिये छंद में लिख लेना अलग बात है लेकिन अपने समय की जटिलता को व्यक्त करने के लिये छंद का लौटना शायद ही गुणकारी हो। यह सभ्यता के विभिन्न चरणों का सवाल है, न कि अकेले छंद का। हम जैसे अपनी वेश-भूषा को विशेष समारोहों पर धारण कर प्रसन्न हो लेते हैं। लेकिन सामान्यतया मध्यवर्ग की वेश-भूषा अब पैंट-शर्ट हो चुकी है। उसी तरह छंद की बात है। हम जहाँ तक आ चुके हैं उससे पीछे लौटना, मेरी राय में न उचित है और मुश्किल काम तो यह है ही।"


- समालोचक डा. जीवन सिंह ने कविता के छंद-वापसी पर अपने ये विचार श्री महेश पुनेठा द्वारा लिये गये उस साक्षात्कार के दौरान प्रकट किये हैं जो देहरादून की सुपरिचित मासिक प्रिंट पत्रिका 'लोकगंगा' के नवम्बर, 2007 अंक में पृष्ठ 29 पर छपी थी। अत: समकालीनता को वापस घसीटकर उल्टी दिशा में नहीं ले जाया जा सकता। छंद की ओर लौटने का मतलब है समय का भूतकाल में लौटना, परम्पराओं का अपने उसी समय में वापस होना । जैसे नदी का प्रवाह उलट नहीं सकता ठीक वैसे ही कविता का वर्तमान अपने पीछे नहीं लौट सकता। गीत की जगह भी नवगीत अब लिखे जाने लगे हैं। वस्तुत: कविता में विचार-बोध की जगह भावबोध की दरकार है। इसलिये छंद की जगह अगर लय की बात करें, कविता में भावप्रवणता कैसे पैदा की जाय इसकी चिंता हो, तो बहस सार्थक दिशा में आगे बढ़ सकती है।


नुक्कड़ के लेखक-कवि-पाठक गण , आपसे अनुरोध होगा कि इस बहस में भाग लें और अपनी बहुमूल्य राय यहाँ कमेन्ट बॉक्स में जाकर दें ताकि यह बहस सार्थक दिशा में संवाद का रूप ग्रहण कर आगे बढ़ सके। - सुशील कुमार (sk.dumka@gmail.com)
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अभिव्यक्ति की निरंकुशता

जब अनभिव्यक्ति मन को तृषित करने लगे तो चीखने का मन करता है, हर उस सलीब के लिये जिसने अभिव्यक्ति का दम घोंटा। मैं सोचता हूं कितना असर है अभिव्यक्ति का हमारे मन पर, हमारे प्राणों पर। इसका असर प्राणों पर ऐसे ही है जैसे मनुष्य का दर्पण पर । दर्पण को हारकर हमारा प्रतिबिम्ब देना ही पड़ता है ।

बहुत पहले मनुष्य की अभिव्यक्ति पर पहरे थे। विश्वभर में इस पहरेदारी के विरुद्ध हमने क्रांतियां कीं । पश्चिम से शुरु हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत पूर्व में भी छा गयी। हर एक संविधान तक में, हमारे सविधान में भी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार व्याप्त कर दिये गये । हर जगह कहा जाने लगा वह सब कुछ, जो मन में आया । इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने शब्दों को नवीन गति, नयी तीव्रता दी ।

पर हमने खयाल नहीं किया कि धीरे-धीरे यही स्वतंत्रता निरंकुश हो गयी । पश्चिम में तो बहुत पहले, कुछ वर्षों से हमारे देश में भी । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्या-क्या नहीं हुआ ? बोलने की आजादी ने मर्यादाओं का शील भंग कर दिया, समाज का संस्कार ठुकरा दिया गया । न जाने कितने वादों, न जाने कितनी मुक्तियों और न जाने कितने आन्दोलनों के नाम हो गया यह अभिव्यक्ति का स्वातंत्र्य । याद क्या करें - क्या-क्या करें - नारी देह की छद्म अभिव्यक्ति, देवी-देवताओं के नग्न चित्र, वर्जनाओं को अभिव्यक्ति देती फ़िल्में, मनुवाद की शब्दावली से उपजी महापुरुषों के लिये असंयत वाणी …………?

पश्चिम की अन्तश्चेतना मन को नहीं जानती, प्राण को भी नहीं जानती, इसलिये वहां अभिव्यक्ति निरंकुश हो जाय तो आश्चर्य क्या ? पश्चिम हर क्रिया कि प्रतिक्रिया देता है, हर दोषारोपण की काट करता है, हर झूठ का स्पष्टीकरण देता है । उसे लगता है झूठ साफ़ हो जायेगा । ईराक, अफ़गानिस्तान पर हमलों के पीछे छिपा झूठ और अभिव्यक्ति का सच क्या हमने नहीं देखा? पश्चिम समझता है कि झूठ के पैर नहीं होते। सच है, पर झूठ के पास वीर्य होता है, उसे समझना चाहिये । इस वीर्य से प्राण गर्भित हो जाता है और झूठ प्राणवंत।

अभिव्यक्ति, वाणी जब निरंकुश हो जाती है तो वह सारे संयम तोड़कर जनसाधारण के प्राणों से बलात्कार करती है।
"प्राण एक निर्वस्त्र, असहाय कुमारी की तरह है । वाणी पुरुषों का हुजूम है जिन्हें प्रजातंत्र में इजाजत है, जो चाहे बर्ताव प्राणों से करें। वे प्राण-कुमारी से बलात्कार करते हैं, और प्राण रोज उसके शब्दों से गर्भित होते हैं और उसी के बच्चे पैदा करते हैं जिनमें तानाकशी और झूठ तो वाणी का होता है और सारा बदन प्राणों का।" ('निर्मल कुमार' की पुस्तक "ॠत : साइकोलोजी बियांड फ़्रायड' के एक अंश से उद्धृत)

इसलिये केवल अभिव्यक्ति, केवल बोलना सत्य नहीं रच सकता। अकेला तो प्राण भी सत्य नहीं रच सकता। जो सत्य है वह इसी प्राण और अभिव्यक्ति के संसर्ग से जन्म लेता है।
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मीडिया खुद खींचे लक्ष्मण रेखा

मुंबई पर हुए आतंकी हमले ने एक रहस्यमयी पिटारे को खोल दिया है। उससे निकले जिन्न से सभी तबाह हैं। पहली बार इस हमले ने इस बहस को जन्म दिया है कि हम मंत्री, पत्रकार या कर्मचारी होते हुए अपने देश और समाज के प्रति कितने संजीदा हैं। जब कोई चैनल सिर्फ दिखाने के लिए खबर चलाता है, कोई अखबार सिर्फ बिकने के लिए खबर छापता है या कोई व्यक्ति या दर्शक महज आत्मसंतुष्टि के लिए प्रतिक्रियावादी होकर भड़ास निकालता है, तब एक लक्ष्मण रेखा खींचने की जरूरत महसूस होती है। ऐसी रेखा जिसका हम सभी अनुपालन करें। मीडिया को ये देखना होगा कि क्यों वह सुरक्षात्मक मुद्दे पर हमले से पहले कमजोरियों की ओर ध्यान खींचने में विफल रहा। उसने क्यों उन मुद्दों को लेकर खोज या रिपोर्टिंग नहीं की?

दूसरी बात एक दर्शक या टिप्पणीकार जब मीडिया को सीधे गरियाता है, तो वह अपने ही आईने को झूठ बोलता है। मीडिया वही चीजें दिखाता है, जो आम दर्शक पसंद करते हैं। ऐसा क्यों है कि जो बेहतर और गंभीर पत्रिकाएं या अखबार हैं, उन्हें अस्तित्व में रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। फिर हार कर बाजार के समीकरण के तहत उसे अन्य सस्ते माध्यमों की तुलना में ढल जाना पड़ता है। उसके पीछे कारण पाठक, दर्शक या आम वर्ग द्वारा उसे स्वीकार नहीं कर पाना ही है। हम उन्हीं चीजों को देखते हैं, जो उत्तेजना या सनसनी पैदा करती है। किसी चीज पर भड़ास निकालना या गाली देना समस्या का मूल हल नहीं है।

एक बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि मीडिया को चलाने के लिए भी बाजार का सहारा चाहिए। हार कर मीडिया भी उन्हीं रास्तों पर चल पड़ा था या है, जो बाजार चाहता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की आरुषि हत्याकांड से लेकर अब तक की कई रिपोर्टिंग हमले से पहले गैर-जिम्मेदाराना रही। कई मामलों में उस पर उंगली उठी।

मुंबई हमले के समय डायरेक्ट टेलीकास्ट ने आम दर्शकों को फिल्मी हिंसा से परे एक ऐसी दुनिया से परिचय कराया था, जो सिर्फ कल्पनाओं में था। अगर सरकार में बैठे लोग या बुद्धिजीवी इसके कुप्रभाव के बारे में सोचकर कुछ फैसला ले रहे हैं, तो इसके पीछे भी मीडिया के खिलाफ व्याप्त असंतोष ही कारण था। मीडिया इससे सबक लेते हुए जरूरी है कि एक लक्ष्मण रेखा खुद खींचे। नहीं तो मीडिया और पत्रकारों द्वारा मचाया जा रहा शोर उस विस्फोट में दब जायेगा, जो धीरे-धीरे बैलून में हुए छेद के कारण कभी भी हो सकता है।
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रसोई गैस सिलिंडर कि एक्सपायरी तिथि.. जागो ग्राहक जागो



यह जानकारी जन साधरण के हितार्थ दे रहा हूँ.

"Have U ever heard about LPG gas cylinder's expiry date....!!

Expired Cylinders are not safe for use and may cause accidents. In this regard please be cautious at the time of accepting any LPG cylinder from the Vendor.

Here is how we can check the expiry of LPG cylinders:
On one of three side stems of the cylinder, the expiry date is coded alpha numerically as follows A or B or C or D and some two digit number following this e.g. D06.

The alphabets stand for quarters -
1. A for March (First Qtr),
2. B for June (Second Qtr),
3. C for Sept (Third Qtr), &
4. D for December (Fourth Qtr).

The digits stand for the year till it is valid. Hence D06 would mean December qtr of 2006.
Please Return Back the Cylinder that you get with a Expiry Date, they are prone to Leak and other Hazardous accidents...

The second example with D13 allows the cylinder to be in use until Dec 2013.
जागो ग्राहक गागो
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सकारात्मक दृष्टिकोण

एक समय म्रेरे जैसा एक युवा नौकरी पाने की इच्छा से अपने मार्ग पर बढा जा रहा था. अचानक उसके सिर के ऊपर एक पक्षी ने उड़्ते हुए हवा मॅ बीट (मल-त्याग) कर दी जो उस युवक के साफ-सुथरे सिर पर जा गिरी. इस पर उस युवक ने कहा,"चलो अच्छा है कि गाय-भॅसॅ अकाश मॅ नही उड़्ती, नही तो आज...
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कहानीकार तेजेन्‍द्र शर्मा का कहानी पाठ 15 जनवरी 2009 को भारत की राजधानी दिल्ली में

आप आ रहे हैं न
हमें इंतजार है
आपका भारत में
हम आपसे मिलना चाहते हैं
आपके संग संग कहानी सुनना चाहते हैं


कार्यक्रम और उसका विवरण
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मार गिराओ

मार गिराओ

ठाँ ठाँ कर के मार गिराओ ऐसे अत्याचारी को,
जख्मी करके ज़िन्दा है जो आमची मुम्बई प्यारी को,

दो जून की रोटी क्यो दी जनता के अपराधी को,
खतरा बनकर बैठा है जो हम सब की आज़ादी को,

कानूनो का खून करे और मानवता की बात करे-
चौराहे पर फ़ासी दे दो ऐसे आतंकवादी को,

हिम्मत का सागर है जन-जन आतंकी दल याद रखॅ,
वषॉ से रॉदा है जिसने उस बल-दल याद रखॅ,

सम्मुख शत्रु आऐ तो, साहस वो दिखलाऐ तो-
चुन-चुन मृत्यु घाट उतारे ऐसे हमलावारी को,

ठाँ ठाँ कर के मार गिराओ ऐसे अत्याचारी को,
जख्मी करके ज़िन्दा है जो आमची मुम्बई प्यारी को,
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भड़ास: मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के लिए 'काला कानून' !

भड़ास: मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के लिए 'काला कानून' !

भङास तक तो ठीक है, मगर सुनें मेरी बात.
मीडीया भी कुछ कम नहीं, करे धर्म का घात.
करे धर्म का घात,अर्थ और काम की खातिर.
शब्दों से बहलाती सबको, बहुत ही शातिर.
कह साधक कवि, बात आपकी जरा ठीक है.
मगर सुनें मेरी बार, भाङास तक ही ठीक है.
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इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल छोटे शहरों में : जागरण की तरंग में श्री अजय ब्रह्मात्‍मज

इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल छोटे शहरों में
हरियाणा के यमुनानगर में पिछले महीने बल्कि आप पिछले साल भी कह सकते हैं, एक अंतरराष्‍ट्रीय ऐतिहासिक घटना घटित हुई। जिसका संज्ञान मीडिया ने लगातार लिया। इस संबंध में लगातार समाचार और आलेख अब भी प्रकाशित हो रहे हैं। वो घटना 24 दिसम्‍बर 2009 को प्रथम हरियाणा अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह का आयोजन रहा। जिसका उद्घाटन प्रख्‍यात फिल्‍मकार श्री गौतम घोष ने किया।
इस संबंध में 4 जनवरी 2009 को दैनिक नई दुनिया की संडे मैग्‍जीन में प्रकाशित हुई है, जिसे लिखा है श्री विनोद भारद्वाज ने। इसके अतिरिक्‍त अभिव्‍यक्ति, सृजनगाथा, लेखनी, हिन्‍दी मीडिया जैसी इंटरनेट पत्र-पत्रिकाओं ने इस संबंध में खूब लिखा। शनिवार 10 जनवरी 2009 को राजस्‍थान पत्रिका दैनिक के बालीवुड परिशिष्‍ट में एक नई शुरूआत शीर्षक से एक सचित्र लेख भी प्रकाशित हुआ है।

इस संबंध में यदि आपके पास भी कोई लिंक हों तो सूचित करने का कष्‍ट करें। अथवा आपने किसी समाचार, पत्र-पत्रिका इत्‍यादि में इस बारे में पढ़ा सुना हो तो भी अवश्‍य बतलायें। आपके आभारी रहेंगे।
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चुप...आखिर कब तक ???

चुप...आखिर कब तक ???

स्वर चुप,
दृष्टि मूक,
शांत गुन्जन,
देश स्तब्‍ध.
लोक त्रस्त,
नेतृत्व पस्त,
तंत्र भ्रष्ट,
ह्र्दय दग्ध,
देश स्तब्‍ध.
जीवन रुग्ण,
जीवित मृत,
यौवन पथ-भ्रष्‍ट,
भविष्य तम,
घनघोर तम,
असहाय हम,
सूर्य मूक,
चन्द्र सुप्त,
भारत ध्वस्त,
भारत ग्रस्त,
भारत त्रस्त,
आखिर कब तक ???
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असुविधा

नुक्कड पर आया तो हूँ, पर हर बार अपने ई-मेल पर मिले लिन्क से ही प्रवेश हो पा रहा है.
अन्य कुछ मिला भी नहीं....क्या कारण है...बतावें...उम्मेद साधक
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सत्यम का हसश्र

सत्यम को सरकार ने ले लिया!
हे भगवान! सत्यम के इतने बुरे दिन आ गये! इससे तो अच्छा बिचारा राजू ही ठीक था.
उसने कितना भी घोटाला क्यों न किया हो, पर सत्यम को जिन्दा रह्ने जैस्स तो रखा था. सरकार क्या उसे जिन्दा रहने देगी?
उसने तो खुद कबूल किया था अपना गुनाह, क्या सरकार करेगी?
राजू शर्मिन्दा तो है अपने किये पर, क्या सरकार कभी शएमिन्दा हो सकती है?
राजू या अन्य किसी अनाङी के हाथ रह जाती, तो सत्यम के बचने की कुछ संभावना भी थी, अब...
सरकार तो जहाँ हाथ डालती है, उसका बँटाढार होना तय है...
.........जरूर इसमे कोई सरकारी षङ्यन्त्र था, जिसका शिकार सिर्फ़ राजु ही नहीं,लाखों निवेशक भी हुये...
राजू या अन्य कोई भी होता डाईरेक्टर, तो उससे शिकायत तो की जा सकती थी, अब???>???
फ्राइवेट हाथ फ़िर भी कुछ असरकारी होते....अब सरकार भला कैसे असरकारी हो सकती है?...उम्मेद साधक
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तबला चीखे तैल ताल

तेल तल रहा तेवर तीखे,
जनता मुश्किल जाल मॅ,
सरकारे तो पस्त हुई अब,
देश ठगा – बेहाल है,

बिजली – पानी – तैल – रसोई -
गैस, सभी बीमार है,
जीवन भी अब तो जनता का,
चुकने को तैयार है,

ओ तैल मंत्री, तैल सचिव ओ तैल मनेजर,
देश जल रहा बिना तैल- कुछ तो तू कर,
भौचक धन्ना सेठ, लुटे है व्यापरी,
कामगार पर गाज गिरी सबसे भारी,

कोई बाबा-संत-पुजारी आगे आओ,
तैल देव को पूजो-तैल हवन कराओ,

क्योकि:-

तेल तल रहा तेवर तीखे,
जनता मुश्किल जाल मॅ,
सरकारे तो पस्त हुई अब,
देश ठगा – बेहाल है,
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nakमस

नुक्कङ का हूँ मैं सदा,सबसे करता बात.
सँवाद फ़िर सहमति,तब सहयोग की बात.
सहयोग की बात,बने तो देश बदल दें.
दुष्ट-रावणी-तन्त्र हटा कर भारत ला दें.
कह साधक कवि,मैं एक वाद लिये आया हूँ.
बन जाये सँवाद,क्योंकि मैं नुक्क्ङ तन्त्र का हूँ
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बगलोल का आटा

पढ़ लिया होगा
आज का
सांध्‍य टाइम्‍स।


सार है इसका

सिर्फ इतना

कि मूर्खता की

नहीं होती सीमा।
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मीडिया मंत्र जनवरी 2009 अंक में पढ़ें सिने पत्रकारिता की समीक्षा



श्री श्‍याम माथुर लिखित सिने पत्रकारिता पुस्‍तक को सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा भारतेन्‍दु हरिश्‍चन्‍द्र पुरस्‍कार से माननीय सूचना एवं प्रसारण एवं विदेश राज्‍यमंत्री श्री आनंद शर्मा ने प्रथम पुरस्‍कार से पुरस्‍कृत किया है। इस पुस्‍तक की समीक्षा आप जनवरी 2009 के मीडिया मंत्र के अंक में पढ़ सकते हैं।
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मर्दो की ब्रा और टूटते रिश्ते

अविनाश जी के द्वारा दी गई खबर के कारण एक युगल मॅ नोक-झॉक हो गई

युवती बोली:
अविनाश जी तो कितना सुनदर लिखते है क्या तुम मुझ पर कोइ कविता नही लिख सकते... तो युवक बडे प्रेम से बोला:-
जितने भी दुनिया मै शायर हुए
वो पागल थे,
अपनी मेहबूबा की नज़ाकत के कायल थे,
किसी न किसी अदा से घायल थे,
मै तो अभी ठीक ठाक हूँ,
होशो-हवास के साथ हूँ,
किसी नज़ाकत का कायल नही हूँ,
अदाओ से भी घायल नही हूँ,
मुझे तो खुली हवा मॅ साँस आता है,
मर्दो का ब्रा ही अब मुझे भाता है,
अब तुम ही बताओ मै तुम पर क्यॉकर कविता लिखू ?
ये सुनकर युवती का दिल टूट गया,
और दोनो का दो माह पुराना बन्धन छूट गया,
अब खबर यही हवा मॅ उछ्ली है,
वो युवती बन्दूक लेकर
अविनाश जी की तलाश मॅ निकली है....
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पुरुषों की ब्रा की बिक्री जोरों पर : पहनते हैं तभी तो बिकती है

पुरुषों की ब्रा की बिक्री जोरों पर
समाचार पढ़कर हैरत में पढ़ गए
समाचार वैसे तो पुराना है पर
आपके लिए है नया क्‍योंकि
यह दुनिया है नई वेबदुनिया।

घटता है कहीं कुछ कहीं तो
पता लगता है सब जगह ही
जापान में हो रहा है ऐसा ही
ब्रा पुरुषों की मिल नहीं रही है।

पहले सुनते थे सब कहते थे
जा पान ले आ में देश तलाशो
अब कहेंगे जापान में कुछ नया
तो सब बोलेंगे पुरुष पहनते हैं ब्रा।

बनी कम हैं मांग ज्‍यादा है
आपका एजेंसी लेने का इरादा है
इरादा बिल्‍कुल नेक है
सारा विश्‍व आज एक है।

खबर तो और भी दिलचस्‍प है
आप क्लिक करें और पढ़ते जायें
क्‍या कहा शर्म आ रही है
जो पहन रहे हैं तो क्‍या वे बेशर्म हैं।

शर्मदार ही पहनते हैं ब्रा
पुरुष हो या हो महिला
शर्मसारिता से बचने के लिए
अनोखा स्‍वाद चखने के लिए।

नीचे दिए गए शीर्षक को तुरंत चटकाएं
और मजेदार हैरत अंग्रेज जानकारी पाएं
आप कहेंगे यह हैरतअंग्रेज क्‍या होता है
वही होता है जो हैरतअंगेज नहीं होता है।

पुरुषों की ब्रा की बिक्री जोरों पर
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श्‍याम माथुर को भारतेन्‍दु हरिशचन्‍द्र प्रथम ‍ पुरस्‍कार

The Ministry of Information and Broadcasting has announced the Bhartendu Harishchandra Awards for 2006. Shri Anand Sharma, the Minister of State for Information & Broadcasting will give away these awards on January 06, 2009 in New Delhi. Twelve books/manuscripts have been selected by the Jury this year for the awards.

Shri Shyam Mathur will receive the first prize in the "Journalism and Mass Communication" category for his manuscript "Film Patrakarita Ke Vividh Aayam" this time. Shri Harshdev has bagged the second prize for his book “Samayik Media Shabdkosh" and the third prize goes to Shri Sita Ram Khodawal for his manuscript "Hindi Jansanchar Aur Premchand Ka Jaagran Manch".

Shri Murli Manohar Manjul for his book "Akashvani ki Antarkatha", Shri Narendra Singh Yadav for his book "Graphic Design", Dr Smita Mishra and Dr Amar Nath 'Amar' for their jointly written book "Electronic Media : Badalte Aayam", Shri Prabhu Jhingran for his book "Sachitra Media Shabdawali" and Shri Dhananjai Chopra for his book "Sirf Samachar" have been awarded with consolation prizes.

The First prize is of Rs. 35000/-, Second prize of Rs. 25000/-, Third prize of Rs. 20000/- and consolation prizes of Rs. 5000/- each in this category.

In the 'Women Issues' category the First prize has been given to Ms. Anamika for her book "Man Manjhne Ki Zaroorat" and the Second prize goes to Ms Lata Sharma for her book "Aurat Apne Liye".

In 'Children's Literature' category the First prize goes to Shri Rama Shankar for his book "Antariksh Ka Swapnil Lok" and the Second prize goes to Shri Harish Kumar 'Amit' for his manuscript "Imandari Ka Swad". For these two categories, the first prize consists of Rs. 15000/- and the Second prize of Rs. 10000/- each. In the 'National Integration' Category, the Jury has not recommended any book or manuscript for awards.

Bhartendu Harishchandra Awards were instituted in 1983. Since then, these Awards are given by the Ministry of Information & Broadcasting every year to promote original writings in Hindi in the field of Journalism and Mass Communication. Awards for National Integration, Women Issues & Children's Literature were introduced in 1992.
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