
आदरणीय श्री रूपसिंह चंदेल जी, आप कविता-प्रदेश के नागरिक कब से हो गये? जब आपने अपनी ब्लॉग पर मेरी कविता को तहस-नहस कर छापी थी तो मैंने न सिर्फ़ आपसे इसकी शिकायत की थी बल्कि इससे संबंधित परिवाद-पत्र की प्रतिलिपि भी आदरणीय सुभाष नीरव भाई जी को भी भेजी थी। तब आपने यह कहकर कन्नी काट लिया कि आपको कविता की अच्छी जानकारी नहीं है। इसलिये मैं चुप हो गया। अब जबकि कविता पर सवाल और आपकी राय सामने है, मैं आपसे और सुभाष भाई से यह पूछना चाहूंगा कि जब आप लोग अपने साईट पर छंदमुक्त कविताओं को छंदयुक्त कविता की तुलना में अधिक छापते हैं तो फिर काव्य के छंद-प्रवृति पर आपकी पक्षधरता कितनी जायज है। संस्कृत की कई पुरातन पुस्तकें छंद में हैं पर वे कविता-साहित्य की कोटि में क्यों नहीं आती? सिर्फ़ छंद ही कविता को कविता थोड़े बनाती है! आप लय की बात क्यों नहीं करते जो छंदमुक्त के साथ-साथ छंद वाली कविता की भी प्राण है?। आप अरुण कमल की एक रचना को लेकर चल रहे। उनकी अन्य रचानायें भी पढि़ये। अगर आप छंद पर अरुण कमल जी विचार ही जानना चाहते हैं तो उनका भी कहना यही है कि “जिसने छंद नहीं सीखा,जिसने छंद को उन कार्यों के लिये इस्तेमाल नहीं किया,जिस तरह वह निचाट गद्य को करता है,उसका कवि जीवन अधूरा है।”आप उनको फोनकर इस बात भी सत्यापन कर लें। ...और अगर छंदमुक्त कविता का उदाहरण ही देना है तो मैं वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की एक कविता यहाँ रख रहा हूं, अगर इसे देखकर आप छंदमुक्त कविता का भविष्य तय करें तो जरा समझ में भी आये -
धारदार चित्कारें
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सुनता हूँ अग्नि की अनुगूँज तरंगमालाओं में
ज्वालाओं की लय
थिरकन कणों उपकरणों की
भीतर सोये ज्वालामुखी पता नहीं
कब जागें
मुझे अन्न चाहिये
छत और छाया भी
पथरीले मौन को भेदने वाला लोहा
मुझे दो
मेरा युग अंधा नहीं
मैंने ही आँखों पर पट्टियाँ बाँधी हैं
देखने से पहले रोएँ पहचानते हैं
ऋतुओं का बदलना
शब्दों की रगों में बहते ख़ून की आवाज़ सुनो
कुल्हाड़ी की तेज धार में दमकते हैं
भूख के चेहरे-
ब्रह्म का एक नाम अन्न भी है
ओ मेरे धातुक समय
मुझे सुनने दे
ज़मीन में दबे लोगों की उबलती चित्कारें-
ओह, कटीले तारों में मुझे कसता समय
इस्पात ढालते हाथों की मरोड़ों में
उभरते भविष्य के आयताकार मेहराब देखता हूँ
आसमान में जो अबाबिल गा रहा है
उसमें छिपा है धरती का त्रास भी
देखता हूँ इसी ऋतु में
गोरैया को घोंसला बनाते
पहाड़ों को तोड़कर ही
उधर जाना है
जिधर दीख रहे हैं घास के हरे तिनके
ओ टूटते नक्षत्र
बुझते राख होते उल्कापिंड
तुम धरती की मर्म पीड़ा से बेखबर हो
मनुष्य-हृदय
अब उन चट्टानों सा कठोर हो चुका है
जिन पर समुद्री लहरें
सदियों से सिर पटक रही हैं
ज़िन्दा वृक्ष गिराये जा रहे हैं
ओ मेरे कवि-
समय की रगों में बहकर
आदमी की पीड़ा को जान
सुनता हूँ सड़क पर खड़े बच्चे का रुदन
उसके हाथ में बासी रोटी का टुकड़ा है
आँखों से झरते आँसू
बच्चे, मेरे प्यारे बच्चे
रोओ मत
फिलहाल बादल ने सूर्य ढक लिया है
वह उसे फाड़कर
कल फिर उदय होगा
इस शहर की बाँहों में लपेटे अरावली की
श्रृखलायें भी
सूर्योदय को रोक नहीं पाती
यह अँधेरा क्षणिक है
पूर्व को हर रोज़
इसी उम्मीद से देखता हूँ
यह थोड़ा और उगे
तुम भी देखना-
उस पूर्व पर भरोसा करो
जहाँ से वह उगता है हर रोज़।
- [कवि विजेन्द्र]