मेट्रो पर भी ब्लूलाईन का रंग चढ़ रहा है : व्यंग्य प्रवक्ता में
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विजेता
ऑस्कर न जीते पर
आस तो कर सकते हैं
जीतने की।
"तुम सब फ़ेल हो जाओ".....मास्साब सोमनाथ चटर्जी
कौन से द्वारे माथ न टेका
कितनी तगड़ी घूस खिलाई
छोड़ी हँसिया, चूमा हाथ
दस जनपथ की धूल
लगाई अपने माथ
तब कहीं जाकर के खुशियाँ छाईं
निगोड़ी कुर्सी हाथ में आई
छोटे-छोटे इन बच्चों ने
उधम खूब मचाया
घर बाहर के दंगों में
हुडदंग खूब मचाया
पहली बार स्कूल देखा
मास्टर जी को खूब रुलाया
क्लास में न कोई वर्क किया
खोली न घर में कभी किताब
अगले माह बोर्ड परीक्षा
कैसे होंगे बच्चे पास?
सोच सोच कर यह सब
दुखी हुए सोमनाथ
इसीलिए जीभ से फिसल गया
खो दिया अपना आप
अनजाने में निकल गया
मुँह से ऐसा श्राप ............ शेफाली
पेड़ (कविता) - अशोक सिंह

पेड़
---
एक
---
पेड़ के बारे में कुछ जानना हो तो पेड़ से नहीं
उसपर घोंसला लगाये बैठे पक्षियों से पूछो
पूछो उस थके-हारे मुसाफिर से
जो उसकी छाया में बैठा सुसता रहा है
उसकी शाखाओं से झूला बाँध झूलती
लड़कियों से पूछो
उन लड़को से भी जो उसकी फुनगी पर बैठ
चाभ रहे हैं फल
लकड़ी बिनती लकड़हारन से भी पूछो
पहाड़ तोड़ती पहाड़न से पूछो
यहाँ बैठ पगुराती गाय-बकड़ियों से पूछो
और पूछना हो तो
अभी-अभी चालिस कोस पालकी ढोकर ला रहे
चारो कहारों से पूछो
सबसे पूछो मगर
पेड़ के बारे में पेड़ से मत पूछो
क्योंकि याद रखो, पेड़
आदमी की तरह खुद कभी
अपना बखान नहीं करते।
दो
--
पेड़ कहाँ नहीं है
जंगल नदी पहाड़ से लेकर
घर के आगे-पीछे और
सड़कों के किनारे-किनारे तक
जहाँ जाओ वहाँ
दिख ही जाता है कोई न कोई पेड़
क्योंकि पेड़ जानता है
कि आदमी को हर कहीं उसकी जरुरत पड़ती है
इसलिये हर जगह उपस्थित होता है वह उसके लिये
तीन
---
पहाड़ पर रहने से
पेड़ का दिल पत्थर नहीं हो जाता
और न ही विषधर के लिपटे रहने से विषैला
बभनटोली में हो या चमरटोली में
पेड़, पेड़ ही रहता है
वह पंडिताई का दंभ नहीं भरता
और न ही चमरौंधी की हीनता आती है उसमें
पेड़ कभी जाति नहीं पूछते
और न ही किसी का धर्म जानने की
होती है उसमें जिज्ञासा
चाहे मुसलमानों के मुहल्ले में रहे या हिन्दूओं के !
चार
----
यह सच है कि
आदमी की तरह उसकी आँखे नहीं होती
पर इसका मतलब यह तो नहीं कि
पेड़ अन्धे होते हैं, कुछ देख नहीं सकते
सुन नहीं सकते, बोल नहीं सकते
हँस-गा नहीं सकते, रो नहीं सकते पेड़ ?
अगर तुम ऐसा मानते हो
तो क्षमा करना
पेड़ों का मानना है कि तुम आदमी नहीं हो !
पाँच
---
पेड़ों का कहीं कोई घर नहीं होता
बल्कि पेड़ स्वयं होते हैं एक घर
पशु-पक्षी से लेकर आदमी तक के लिये
आँधी-पानी हो या बरसात
पेड़ रक्षा करते हैं सबकी
पर अफ़सोस
पेड़ सुरक्षित नहीं हैं अपने-आप में !
वे आग से नहीं डरते, आँधी-पानी से नहीं डरते
चोर-बदमाशों से नहीं डरते
खतरनाक़ आतंकवादियों से भी नही लगता उन्हें डर
वे डरते हैं -
आदमी के भीतर पनप रहे सैकड़ों कुल्हाड़ियों से !
छ:
--
पेडों ने सबको सब कुछ दिया
चिरैयाँ को घोंसला
पशुओं को चारा
मुसाफ़िर को छाया
भूखों को फल
पुजारी को फूल
वैद्य को दवा
बच्चों को बाँहों का झूला
चुल्हों को लकड़ी, घर को दरवाजा, छत, खिड़कियाँ
नेताओं, अफसरों को कुर्सियाँ
बदले में इन सबने पेड़ो को
अब तक क्या दिया ?
नहीं चाहकर भी आज
इसका हिसाब माँगते हैं पेड़ !
( कविता:: अशोक सिंह, प्रस्तुतकर्त्ता- सुशील कुमार)
मानवीय संवेदनाओं को खँगालती अशोक सिंह की कवितायें - सुशील कुमार

पेड़
---
एक---
पेड़ के बारे में कुछ जानना हो तो पेड़ से नहीं
उसपर घोंसला लगाये बैठे पक्षियों से पूछो
पूछो उस थके-हारे मुसाफिर से
जो उसकी छाया में बैठा सुसता रहा है
उसकी शाखाओं से झूला बाँध झूलती
लड़कियों से पूछो
उन लड़को से भी जो उसकी फुनगी पर बैठ
चाभ रहे हैं फल
लकड़ी बिनती लकड़हारन से भी पूछो
पहाड़ तोड़ती पहाड़न से पूछो
यहाँ बैठ पगुराती गाय-बकड़ियों से पूछो
और पूछना हो तो
अभी-अभी चालिस कोस पालकी ढोकर ला रहे
चारो कहारों से पूछो
सबसे पूछो मगर
पेड़ के बारे में पेड़ से मत पूछो
क्योंकि याद रखो, पेड़
आदमी की तरह खुद कभी
अपना बखान नहीं करते।
दो
--
पेड़ कहाँ नहीं है
जंगल नदी पहाड़ से लेकर
घर के आगे-पीछे और
सड़कों के किनारे-किनारे तक
जहाँ जाओ वहाँ
दिख ही जाता है कोई न कोई पेड़
क्योंकि पेड़ जानता है
कि आदमी को हर कहीं उसकी जरुरत पड़ती है
इसलिये हर जगह उपस्थित होता है वह उसके लिये
तीन---
पहाड़ पर रहने से
पेड़ का दिल पत्थर नहीं हो जाता
और न ही विषधर के लिपटे रहने से विषैला
बभनटोली में हो या चमरटोली में
पेड़, पेड़ ही रहता है
वह पंडिताई का दंभ नहीं भरता
और न ही चमरौंधी की हीनता आती है उसमें
पेड़ कभी जाति नहीं पूछते
और न ही किसी का धर्म जानने की
होती है उसमें जिज्ञासा
चाहे मुसलमानों के मुहल्ले में रहे या हिन्दूओं के !
चार----
यह सच है कि
आदमी की तरह उसकी आँखे नहीं होती
पर इसका मतलब यह तो नहीं कि
पेड़ अन्धे होते हैं, कुछ देख नहीं सकते
सुन नहीं सकते, बोल नहीं सकते
हँस-गा नहीं सकते, रो नहीं सकते पेड़ ?
अगर तुम ऐसा मानते हो
तो क्षमा करना
पेड़ों का मानना है कि तुम आदमी नहीं हो !
पाँच---
पेड़ों का कहीं कोई घर नहीं होता
बल्कि पेड़ स्वयं होते हैं एक घर
पशु-पक्षी से लेकर आदमी तक के लिये
आँधी-पानी हो या बरसात
पेड़ रक्षा करते हैं सबकी
पर अफ़सोस
पेड़ सुरक्षित नहीं हैं अपने-आप में !
वे आग से नहीं डरते, आँधी-पानी से नहीं डरते
चोर-बदमाशों से नहीं डरते
खतरनाक़ आतंकवादियों से भी नही लगता उन्हें डर
वे डरते हैं -
आदमी के भीतर पनप रहे सैकड़ों कुल्हाड़ियों से !
छ:--
पेडों ने सबको सब कुछ दिया
चिरैयाँ को घोंसला
पशुओं को चारा
मुसाफ़िर को छाया
भूखों को फल
पुजारी को फूल
वैद्य को दवा
बच्चों को बाँहों का झूला
चुल्हों को लकड़ी, घर को दरवाजा, छत, खिड़कियाँ
नेताओं, अफसरों को कुर्सियाँ
बदले में इन सबने पेड़ो को
अब तक क्या दिया ?
नहीं चाहकर भी आज
इसका हिसाब माँगते हैं पेड़ !
सात
---
इधर कविताओं में कम पड़ते जा रहे है पेड़
कम होती जा रही पेडों पर लिखी कवितायें
पेडों को दु:ख है कि
उस कवि ने भी कभी अपनी कविताओं में
उसका जिक्र नहीं किया
जो हर रोज़ उसकी छाया में बैठ
लिखता रहा देश-दुनिया पर अपनी कविताएँ
पेडों को दु:ख है कि
उस हाथ ने काटे उसके हाथ
जिस हाथ ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाये
और मारे उसने उसके सिर पर पत्थर
जिसको अक़्सर अपनी बाँहों में झूलाता
देता रहा अपनी मिठास
दु:खी हैं पेड़ कि
उस हाथ ने किये उसके हाथ जख्मी
जिसके जख्मी हाथों पर मरहम का लेप बन
सोखता रहा वह उसकी पीड़ा
पेड़ दुखी है कि
उनका दु:ख कहीं दर्ज नहीं होता
और न ही अखबारों में आदमी की तरह
छपती हैं उसकी हत्या की खबरें!
दु:खी है पेड़ कि
सब दिन सबका दु;ख बाँटने के बावजूद
आज उसका दु:ख कोई नहीं बाँटता!
यहाँ तक कि उसकी छाया में बैठकर
वर्षों पंचायती करने वालों ने भी
कभी उनकी पंचायती नहीं की!
आठ--
पेड़ पर लिखते-लिखते
कई लोग पेड़ हो गये
और बोलते-बोलते पेड़ की तरह मौन
पर अफ़सोस!
पेडो़ को लेकर
वर्षों से चल रही बहस में शामिल लोग
आज पेड़ क्यों नहीं हो जाते ?
नौ---
पेड़ों की भी अपनी दुनिया है
अपना एक समाज
उन्हें भी भोजन चाहिये, पानी चाहिये
हवा चाहिये,धूप चाहिये
और चाहिये तनकर खड़ा होने के लिये
थोड़ी -सी जगह
अपना सुख-दुख बतियाने के लिये
रिश्ते-नाते, पड़ोसी भी
निरंतर अकेले पड़ते जा रहे पेड़
पूछते हैं हमसे
अगर उनकी तरह हमें भी
बिना रिश्ते-नाते-पड़ोसी के
अकेले रहना पड़े कहीं
तो कैसा लगेगा हमें?
दस--
औरों की तरह पेडो़ को भी
ईश्वर से शिकायत है
शिकायत है कि
ईश्वर ने उसे पेड़ क्यों बनाया?
अगर बनाया ही तो
क्यों नहीं दिये हाथ-पैर-जुबान
ताकि डँटकर कुल्हाड़ियों का सामना कर सकते
कर सकते जबाब-तलब
आदमी से आदमी की तरह !
खैर जो दिया सो दिया
इतना तो कर ही सकता है ईश्वर अभी भी
कि उस आदमी के हाथों का फल-फूल
स्वीकार नहीं करे कभी
जिन हाथों ने कभी कोई फल-फूल तक के
पेड़ नहीं लगाये !
ग्यारह-----
पेड़ आत्मकथा लिखना चाहते हैं
बयान देना चाहते हैं आदमी की तरह
आदमी की अदालत में
दिखा-दिखाकर अपना जख्म
दर्ज कराना चाहते हैं अपनी शिकायत
यूनियन बनाना चाहते हैं पेड़
हड़ताल पे जाना चाहते हैं
आन्दोलन करना चाहते हैं
आदमी के बढ़ते जुल्म के खिलाफ़
हथियार उठाकर
पर अफ़सोस!
ऐसा कुछ कर नहीं पा रहे पेड़
क्योंकि पेड़, पेड़ हैं
आदमी नहीं!
बारह---
एक ऐसे समय में
जब पेड़ आदमी नहीं हो सकते
और न ही आदमी पेड़
पेड़ आदमी से पूछना चाहते हैं
विनम्रता से एक बात कि -
अगर उसकी जगह आदमी होता
और आदमी की जगह वह
तो आज उस पर क्या बीत रही होती ?
कहो न! चुप क्यों हो?
क्या बीत रही होती तुम पर
अगर आदमी के बजाय तुम पेड़ होते?
( कविता:: अशोक सिंह, प्रस्तुतकर्त्ता- सुशील कुमार)
ऑस्कर के जादू का प्रभाव है
पुरस्कृत इन्हें कर दिया जाता इससे भी घिनौनी असलियत सामने लाने के लिए तो खुशी मनाते, उन्होंने तो सिर्फ पन्द्रह दिन पहले होली मनाई है, ये नौ महीने पहले दीवाली भी मनाते, भांगड़ा भी करते, ईद भी मनाते – मतलब खुद को मिलती खुशी तो चाहते कि सब वैश्विक हो और सारी दुनिया इनके साथ झूमे। जब इन्हें नहीं हासिल हुई है तो इनकी कामना है कि पाने वाला खुदकुशी कर ले। ऐसी लचर मानसिकता है इनकी कि दूसरे को भरना भी पड़े तब भी खुद ही सब चरना चाहते हैं। इन्हें नहीं मिला तो धमाल कर रहे हैं, मिलता इन्हें तो धूम धड़ाका करते।
"इस प्यार को क्या नाम दूँ"
"इस प्यार को क्या नाम दूँ"
***राजीव तनेजा***
"दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले"...
"आखिर तुम्हें आना है...ज़रा देर लगेगी"...
"आज ये सब गाने मुझे बेमानी से लग रहे थे क्योंकि सब कुछ धीरे-धीरे सैटल जो होता जा रहा था"
"आज भी पुराने दिन याद करता हूँ तो सिहर-सिहर उठता हूँ"...
"उफ!..वो दिन भी क्या दिन थे जब मैँ दिन रात इसी सपने में खोया रहता कि... काश..सपने में ही दिख जाए वो मुझे किसी तरह "
"असलियत में तो नामुमकिन सी बात जो लगती थी"..
"उसका चेहरा हमेशा मेरी आँखो के आगे छाया रहता"...
"ज़मीन पर रह कर चाँद को पाने की चाहत थी मेरी"..
"पहली बार बचपन में बडे पर्दे पर ही तो देखा था उसे"..
"सामने ये कौन आया...दिल में हुई हलचल...
देख के बस एक ही झलक...हो गए हम पागल"..
"उफ!..क्या कयामत बरपायी थी उसने अपने पहले ही जलवे में"..
"जिसे देखो...वही शैंटी फ्लैट हुए जा रहा था तो अपुन किस खेत की गाजर मूली थे?"...
"थे तो हम भी हाड माँस के मामुली इंसान ही ना?...
"सो!..कैसे बचे रह्ते उसके मोह पाश से?"
"बस अब ना था दिन को चैन और ना रही रातों की नींद"
"जानता था कि मेरी किस्मत में नहीं है वो"..
"कोई बडा आदमी ही ले जाएगा उसे"
"मेरी किस्मत में तू नहीं शायद...क्यूँ तेरा इंतज़ार करता हूँ...
मैँ तुझे कल भी प्यार करता था...मैँ तुझे अब भी प्यार करता हूँ"
"लोगों से सुना है...किताबों में लिखा है...
सबने यही कहा है कि...नखरे बहुत हैँ स्साली के"..
"खर्चीली इतनी कि पूछो मत"...
"किसी आँडू-बाँडू को पुट्ठे पे हाथ तक नहीं धरने देती है"...
"अब ये बावले क्या जानें कि नखरे तो होने ही हैं....टॉप की आईटम जो ठहरी"...
"अब हर किसी ऐरी-गैरी...नत्थू-खैरी के बस का कहाँ कि वो लटके-झटके दिखाती फिरे"
"नखरे दिखाना भी अदा होती है ...स्टाईल होता है"...
"अब खुमार ऐसा छाया दिल ओ दिमाग पे कि लाख उतारे ना उतरा"
"सबने समझाया कि रहने दे...तेरे बस कि बात नहीं"...
"ऊँचे लोगों की ऊँची पसन्द भला गरीब के घर में एडजस्ट कैसे करेगी?"
"बडे ही प्यार से ...जतन से रखूँगा"
"सब नखरे सह-सह लूंगा"...
"रूठ गयी तो ...प्यार से...मान मनौवल से मना लूंगा"
"अब किसी और को बसाने की इस दिल ए नादाँ में चाहत ना रही"
"बचपन से दिल में यही इकलौती इच्छा समाई हुई थी कि...एक ना एक दिन उसे लाना ज़रूर है"
"जब जवान हुआ और थोडा बहुत कमाना भी शुरू कर दिया तो...
कईओं ने घर आ-आ के खुद ही कहना शुरू कर दिया कि आप हमारी वाली ले जाएँ"
"मैँ मन ही मन सोचता कि इनकी जूठन?"....
"और!..वो मैँ सम्भालूँ?"
"हुह!..ऐसी होने से तो न होना ही अच्छा है लेकिन कम कमाई होने की वजह से सिवाय चुप लगा के रहने के मेरे पास कोई चारा नहीं होता था"
"अफसोस!..कोई फ्रैश पीस आ के ही राज़ी नहीं था मेरे पास"
"जो भी मिलती ...कोई ना कोई कमी साथ लिए ज़रूर होती"
"किसी का फिगर बेकार तो...
किसी के रंग रूप में दम वाली बात नज़र नहीं आती"
"कोई सूरत-शक्ल से बेकार...
तो कोई नैन-नक्श से कंडम"..
"कोई ज़रूरत से ज़्यादा तगडी तो...
किसी का कमज़ोरी में कोई सानी नहीं"
"कोई मेकअप से लिपी-पुती...
तो कोई मेकअप विहीन अपना दीन चेहरा लिए नज़र आती"
"अपुन ने तो अपने सभी यार-दोस्तों से साफ-साफ कह दिया था कि..
"लाएँगे तो एक्दम सॉलिड पीस ही लाएँगे वर्ना खाली हाथ बैठे रहेंगे"
"अब ये बेकार की '*&ं%$#@'पीस अपने बस की बात नहीं"
"सुना जो रखा था कि सब्र का फल मीठा होता है...
तो सोचा कि क्यों ना सब्र करके भी देख लिया जाए?"
"डायबिटीज़ हुई तो क्या हुआ?"...
"अब!..थोडा बहुत मीठा तो चलता ही है"...
"क्यों?..है कि नहीं?"
"और आखिर हर्ज़ ही क्या है इसमें?"
"क्या मालुम आने वाला कल सुनहरा हो"
"हम होंगे कामयाब एक दिन...हो..हो...मन में है विश्वास...पूरा है विश्वास"
"खैर...हम सब्र करते रहे और वो ऊपर बैठा-बैठा हमारे सब्र का इम्तिहान लेता रहा"...
"पहले तो ये बहाना था जनाब के पास कि मुंडा कमाता नहीं है" ...
"अब तो ठीकठाक कमाने भी लगा हूँ"...
"अब क्या एतराज़ है आपको?"
"स्साला!..जिसे देखो वही अपना घिसा पिटा पुराना माल चेपने की फिराक में तैयार बैठा मिलता था"..
"अब वैसे कहने को तो कई ठीक-ठाक काम चलाऊ अपने रस्ते में आती रही...
टकराती रही लेकिन इस चक्कर में कि सिर्फ और सिर्फ सालिड मॉल पे ही हाथ डालना है"...
"मैँ बेवाकूफ!..सबको रिजैक्ट पे रिजैक्ट करता चला गया"
"यही सोच थी मेरी कि ऊपरवाला रहमदिल है"...
"उसके घर देर है पर अन्धेर नहीं है"
"कोई ना कोई तो उसने मेरे लिए बनाई ही होगी"
"सुन जो रखा था कि जोडियाँ ऊपर से ही बन के आती हैँ"
"तो चलो!...देख लेते हैँ कि कब जागती है अपनी रूठी हुई किस्मत"
"इसी चक्कर में उम्र बढती रही..बढती रही"
"अब तो पडोसियों ने भी टोकना शुरू कर दिया था कि...
अब मज़े नहीं लेगा तो क्या बुढापे में लेगा?"
"बाद में तेरे किसी काम ना आएगी"...
"दूसरे ही मौज उडाएँगे"
"जब कब्र में पैर लटके होंगे तो ला कर क्या धूप-बत्ती करेगा?"
"अगर ढंग की एक नहीं मिलती है तो कामचलाऊ दो ले आओ"एक मज़ाक उडाता हुआ बोला
"आजकल बडी सस्ती मिल रही हैँ नेपाल में और आसाम में"
मुझे गुस्सा आ गया...बोला"नेपाल और आसाम का लोकल माल आप ही को मुबारक हो शर्मा जी"
"अपुन को तो चाहिए..एकदम स्टाईलिश वाला"
"शर्मा जी!...आपसे अपनी तो संभलती नहीं ठीक से और चले हैँ लैक्चर देने दूसरों को"...
"पहले अपना घर तो ठीक करो जा के"
"चिनॉय सेठ!...जिनके घर शीशे के होते हैँ वो दूसरों के घरों पे पत्थर नहीं फैंका करते"
"कुछ इल्म भी है आपको?कि कभी कोई तो कभी कोई आपकी वाली के साथ मौज उडा रहा होता है?"
"कभी चाँदनी चौक तो कभी चॉयना"...
"और साहेब हैँ कि इन्हें कोई फिक्र ही नहीं"
"वाह साहेब!..वाह"
"एक-आध को तो मैँने 'बाराटूटी' में भी गुल्छर्रे उडाते देखा था आपकी वाली के साथ"
"सच...इन्हीं आँखो से"
"आप बुज़ुर्ग हैँ...आपकी इज़्ज़त कर रहा हूँ वर्ना कोई और होता तो अभी के अभी मुँह तोड के रख देता"
"मूड खराब हो चला था मेरा"
"लग रहा था कि बिना उसके ही पूरी ज़िन्दगी काटनी पडेगी"
"ये सब ख्यालात दिल में उमड-उमड ही रहे थे कि अखबार में छपे एक इश्तेहार ने सारा मूड एकदम से फ्रैश कर दिया"
"बार-बार उसी सफे को पढे जा रहा था मैँ जिसमें मेरी जॉनेमन का जिक्र था"
"अपनी चमचम कर चमकती किस्मत पे जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था मुझे"
बार-बार खुद को चिकोटी काटता कि...
"या अल्लाह!...क्या ये सच है?"
अब दिल का भंवर झूम-झूम गाने लगा..
"जिसका मुझे था इंतज़ार...वो घडी आ गयी...आ गयी"...
"जिसके लिए था दिल बेकरार...वो घडी आ गयी..आ गयी"
"अब रुका किस कम्भख्त से गया?"...
"सीधा दिया हुआ फोन नम्बर मिलाया और सारी बातचीत करने के बाद बताए गए पते पे जा पहुँचा"
"वो तैयार खडी मानों मेरी ही राह तक रही थी"
"इस प्यार को क्या नाम दूँ?"
"दबे हुए जज़बातों को क्या अल्फाज़ दूँ?"
"शायद...पहली नज़र का पहला वाला प्यार यही था"
"लव ऐट फर्स्ट साईट"...
"जब अपने बारे में सब कुछ तफ्तीश से बताया उन्हें कि...
तनख्वाह के अलावा कितना कमाता हूँ ऊपर से और...
क्या क्या शौक हैँ मेरे वगैरा वगैरा"...
"तो कहीं जा के उन्हें तसल्ली हुई कि यही बन्दा ठीक रहेगा"
"हर किसी राह चलते ऐरे-गैरे नत्थू खैरे के हाथ कैसे थमा देते?"
"पहले भी तो देख चुके थे किसी अनाडी के हाथ में थमा के"...
"दो दिन भी ठीक से सम्भाला नहीं गया था उससे और उल्टे पाँव लौटा दी थी बैरंग "
"अब कहीं जा के तसल्ली हुई दिल को कि अब किसी को फाल्तू बोलने का मौका नहीं मिलेगा"
"यार-दोस्त...पडोसी-रिश्तेदार...सबके मुँह बन्द हो जाएँगे खुद ही"
"बडे कहते फिरते थे कि...राजीव के बस का कुछ नहीं"..
"ऐसे ही वेल्ले हाँकता फिरता है" ..
"ये!..बडा सा...मोटा सा ताला लग जाएगा उनकी लपलपाती ज़बान को "
"अब अपने मुँह से क्या तारीफ करूँ कि...
"दिखने में कैसी है?"
"रंग-रूप कैसा है उसका?"..
"स्टाईल कैसा है उसका?"
"फिगर कैसी है उसकी?"वगैरा...वगैरा"...
"उफ!...कैसे तारीफ करूँ उसकी?"
"रंग-रूप ऐसा कि चाँद भी शर्मा उठे"
"कोमल इतनी कि छू लेने भर से दाग लग जाए"
"बस यूँ समझ लो कि एक दम मक्खन के माफिक चिकनी"
"चाल ऐसी मतवाली कि जब सडक पे निकले तो सब की सब निगाहेँ थम जाएँ"...
"कसा हुआ भरपूर बदन कि बडे-बडे विश्वामित्र ललचा उठें"
"आँखे चौँधिया जाएँ उनकी "
"बोलती बन्द हो उठे "
"उनके जल कर कोयला होने का मंज़र देख ये दिल खुशी से झूम उठता है"
"तारीफ करूँ क्या उसकी...जिसने तुम्हें बनाया...
ये चाँद सा रौशन चेहरा ज़ुल्फों का रंग सुनहरा"...
"ऊप्स!..ये ज़ुल्फें कहाँ से आ गई बीच में?"..
"हैँ ही कहाँ उसके ज़ुल्फें?". ..
"मुझे तो दिखाई ही नहीं दी"
"अब वो ऐसी है...या फिर वो वैसी है...
"मेरे कहने से तो आप मानने से रहे"...
"तो आप खुद ही नज़र उठा कर एक झलक देख क्यों नहीं लेते?...
"आप भी अगर फिदा न हो उठें तो मेरा नाम भी राजीव नहीं"...
***राजीव तनेजा***
झॉपड़्पट्टी का कुत्ता करोड़्पति.
क्या रहमान ने कभी इससे बहतर कोई संगीत नही गढा??? क्या गुलज़ार साहब ने इससे बहतर कोई गीत नही लिखा??? क्या कोई दे सकता है इन सवालॉ के जवाब??? दे तो सब सकते है...पर देना नही चाहते.
क्या "तारे ज़मीं पर" फिल्म किसी लिहाज़ से घटिया थी??? हाँ एक तल पर वो उचित नही थी...कि उस का निर्देशन किसी अमेरोकन या फिर किसी अंग्रेज़ ने नही किया था. जबकि तारे ज़मीं पर ने जिस मानवीय भाव को छूआ वो अपने आपमॅ एक अनूठा विषय है... लेकिन आस्कर के लिये वह योग्यता के किसी पयदान पर नही टिकी क्यॉकि वो शुद्ध रूप से भारतीय निर्माण है... और पश्चिम ये कैसे सहन कर ले कि कोई भारतीय कैसे कला का इतना बड़ा सम्मान हासिल करे.
हमे यह बात समझनी चाहिये कि कला, ज्ञान, विज्ञान, कौशल का गुण आदि विधाऑ मॅ हम से अधिक समृद्ध सकल विश्व मॅ कोई नही है. और हमॅ अपने देश के सम्मान की रक्षा करनी चाहिये और अपना विरोध दर्ज करना चाहियेअ.
बने तो मौत बने .......................इसके सिवा कुछ भी नहीं। नजर -ए-गजल
धोखा था नजरों का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।
समझा था कैद है तकदीर मेरी मुट्ठी में,
रेत के दाने थे वे इसके सिवा कुछ भी नहीं।
मैं समझता रहा एहसास जिसे महका सा,
एक झोका था हवा का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।
मैं समझता रहा हूँ जिसे जान, जिगर , दिल अपना,
मुझे दीवाना वो कहते हैं और इसके सिवा कुछभी नहीं।
आजकल प्यार मैं अपने से बहुत करता हूँ,
हो ये ख्वाब इसके सिवा कुछ भी नहीं।
लगा था रोशनी है दर ये मेरा रोशन है,
थी आग दिल में लगी इसके सिवा कुछ भी नहीं।
तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी,
बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं।
ऑस्कर में भारत का जादू चल गया है। - सुशील कुमार।

आज ऑस्कर के 81 वें एकैडेमी अवार्ड से भारत के पहले संगीतकार ए. आर. रहमान जिनका पूरा नाम अल्लारख्खा रहमान है, को नवाजा गया। वह बन गया है आज खास, जी हाँ.. क्योंकि आखिरकार आज रचा है उसने इतिहास! गुलजार को भी गीत के लिये। भारत के नगर-नगर, डगर-डगर में बस एक ही धुन बज रही है अभी... जय हो.. जय हो...। आईये हम भी इस प्रतिभाशाली संगीतकार का खै़रमक़दम करें ,उनका इस्तेक़बाल करें। वह भारत के गौरव हैं, भारतीय धुन का नगाडा़ पहली बार भारत से बाहर इतनी धूम से बज रहा है।‘स्लमडॉग’ को कुल आठ अवार्ड!बधाई!बधाई!!बधाई!!! राष्ट्रपति जी ने भी बधाई दी है! अपनी खुशी ,अपने अपने भाव यहाँ कमेन्ट बॉक्स में जाकर ज़ाहिर करें, और बधाई दें।
जाने-माने संगीतकार एआर रहमान की नज़रें अब ऑस्कर पर

जाने-माने संगीतकार एआर रहमान की नज़रें अब ऑस्कर पर हैं. उनकी कामयाबी के इस सफ़र पर बीबीसी के साथ बातचीत के महत्वपूर्ण अंश इस लिंक पर पढे़-
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2009/02/090218_rahman_interview_awa.shtml
भईया पहले भी पचास का डलवाते थे , और अब भी , हमको कोई फर्क नहीं है....................
किसी ने बीच में सरकार और फिर पेट्रोल की कीमत बढ़ने की चर्चा कर दिया । सभी की अलग- अलग प्रतिक्रिया थी । किसी ने कहा कि- अब भैया गाड़ी से चलना बड़ा मुशकिल हो जायेगा । तो किसी ने कहा कि ये सरकार अच्छी नहीं है । मैने कहा भई सरकार क्या करे जब दुनिया में ही तेल और महगाई बढ़ रही है तब । एक भाई साहब ने हंसते हुए कहा कि - चाहे तेल का दाम बढे या न बढ़े कोई फर्क नहीं है हमको । पहले भी ५० का भरवाते थे । और अब भी पचास का भरवाते है । सभी हंसने लगे । तो रहा महगाई पर लोगों की एक छोटी सी राय मेरे गांव की ।
जाने-माने संगीतकार एआर रहमान की नज़रें अब ऑस्कर पर हैं.

जाने-माने संगीतकार एआर रहमान की नज़रें अब ऑस्कर पर हैं. उनकी कामयाबी के इस सफ़र पर बीबीसी के साथ बातचीत के महत्वपूर्ण अंश इस लिंक पर पढे़-
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2009/02/090218_rahman_interview_awa.shtml
उलटी गिनती शुरू , अरबों डालर का खेल स्लमडाग पर , जाने क्या होगा रामा रे?

भारतीय संगीतकार ए.आर.रहमान को तीन पुरस्कारों के लिए नामित किया गया है । इस बार का आस्कर भारतीय दृष्टिकोण से ज्यादा महत्वपूर्ण है । 'जय हो' और 'ओ साया" को कडी टक्कर मिल रही है जेम्स हावर्ड से । इस तरह से अब क्या होगा आने वाले कुछ घंटों में यह उत्सुकता का विषय है । पर कामना यही है कि तिरंगा आस्कर में लहराये । हमारी झोली में अगर यह पुरस्कार आता है तो इतिहास रचा जायेगा आज।
एक ग़ज़ल

तब भी नहीं मैं समझा खुद को
खून से लथपथ हुआ तो सोचा
क्यों शीशे में रक्खा खुद को
कितना बड़ा फरेबी निकला
जो कहता था सच्चा खुद को
बड़े बड़ों की भीड़ में तन्हा
देख रहा था बच्चा खुद को
खूब सभी को लगता है वो
जिसने खूब तराशा खुद को।
माँ अब - सुशील कुमार ।

माँ के चेहरे पर
दु;खों के जंगल रहते हैं
फिर भी उसके आँचल में
सुख की
घनी छाया
किलकती है।
माँ की पथरायी आँखों में अब
न सागर लहराते हैं न सपने ।
सभ्यता की धूसरित दीवार से टँगी
वह एक जीवित तस्वीर है केवल
जहाँ तुम्हारे शब्दों से अलग
इतिहास के पन्ने फड़फडा़ते हैं
तुम्हें आगाह करते कि
माँ पृथ्वी है घूमती हुई
अँधेरे को उजास में बदलती हुई
जिसकी गुफ़ाओं में एक सूर्य उदीयमान है
रोम-रोम में जीवन की जोत जगाता हुआ,
तुम्हारे शब्दों और भाषाओं की गहरी
काली रात हरता हुआ ।
छणिकाएं- नीशू की
दिल के तूफान को किसने देखा,
ये तो सिर्फ आखों का धोखा।
छूना चाहता है समुन्दर चांदको
उठती हुयी लहरों को किसने देखा है।।
२- जीवन के रंग
जीवन के होते हैं कई रंग,
बचपन ,जवानी बुढ़ापे में भी जंग।
ये जंग तो पुरानी है,
जीवन एक अधूरी सी कहानी है,
कहानी को पूरा करने में लगा है इंसान ,
ढ़ूढ रहा है अपने ही पैरों के निशान।।
३- चाहत
पाने की चाहत , खोने का गम।
दुनिया में होते है इतने ही गम।
किसी से नफरत किसी से चाहत,
तनहाई का आलम बड़ा बेरहम।।
सागर की पुकार

आजकल जिसे देखो वही ढोलू (कछुआ) को डांटने चल पड़ता है. यही बात सोचते हुये ढोलू आज अकेला ही सैर को निकला. और घूमते हुये वह एक ऐसे स्थान पर आ पहुँचा जो उसने अबतक देखा ही नहीं था.
उसने देखा की उस जल कोने का सारा पानी काला काला है. समन्दर में होनी वाली जलीय वनस्पति भी लगभग नष्ट हो चुकी थी. और तो और वहाँ पर कोई जलीय जीव भी उसे दिखाई नहीं दिया. अब तो ढोलू को डर लगने लगा कि उसकी माँ जो कहती थी वह सच ना हो जाये.
ढोलू की माँ कहती थी कि मानव हर साल लाखों टन हानिकार रासायनिक तरल, कचरा, हर तरह की गन्दगी और अवशिष्ट पदार्थ समन्दर में फैक आ रहा है. और अगले आने वाले सालों में हमें पीने के लिये काला पानी ही मिलेगा. वह सोचने लगा कि मानव तो बड़ा बुद्धिमान जीव है फिर भी उसे यह छोटी से बात क्यॉ समझ मॆ क्यॉ नही आती कि प्रदूषण से तो इस प्रकृति के हर जीव के जीवन को खतरा है....और मानव भी इसका अपवाद नहीं.
अब तो ढोलू को अपने उन सब दोस्तॉ की याद आने लगी जो समन्दर का पानी जीने लायक न रह जाने के कारण मर गये थे. बस दो चार छोटी मछलियाँ ही बची है उसके बचपन के दोस्तॉ में. ढोलू ने तय किया कि वह इस समस्या से निपटने के लिये सार्थक और ठोस प्रयास अवश्य करेगा. ताकि वह अपने आने वाले वंशजॉ को इस अभिशाप से बचा सके.
ढोलू अब तक उस गन्दे पानी की कैद में फंस चुका था. उसे कोई राह नही सुझाई दे रही थी कि वह सागर में वापिस अपने
घर कैसे जा पायेगा???
क्या आप बता सकते हैं???
अगर हाँ तो टिप्पणी कीजिये और बताइये!!!
(रेखाचित्र:कुमारी प्रियंका गुप्ता के द्वारा)
नि:संदेह देह देह ही है देह भी नहीं नि:संदेह
देह खिलाती है गुल
बत्ती करती है गुल
विवेक की
मन की
जला देती है
बत्ती तन की।
देह सिर्फ देह ही होती है
होती भी है देह
और नहीं भी होती है देह।
देह धरती है
दिमाग भी
देह में बसती है आग भी
देह कालियानाग भी
देह एक फुंकार भी
देह है फुफकार भी।
देह दावानल है
देह दांव है
देह छांव है
देह ठांव है
देह गांव है।
देह का दहकना
दहलाता है
देह का बहकना
बहलाता नहीं
बिखेरता है
जो सिमट पाता नहीं।
देह दरकती भी है
देह कसकती भी है
देह रपटती भी है
देह सरकती भी है
फिसलती भी है देह।
देह दया भी है
देह डाह भी है
देह राह भी है
और करती है राहें बंद
गति भी करती मंद।
टहलती देह है
टहलाती भी देह
दमकती है देह
दमकाती भी देह
सहती है देह
सहलाती भी देह।
मुस्काती है
बरसाती है मेह
वो भी है देह
लुट लुट जाती है
लूट ली जाती है
देह ही कहलाती है।
देह दंश भी है
देह अंश भी है
देह कंस भी है
देह वंश भी है
देह सब है
कुछ भी नहीं है पर
कृष्ण भी है देह।
देह के द्वार
करते हैं वार
उतारती खुमार
चढ़ाती बुखार
देह से पार
देह भी नहीं
देह कुछ नहीं
नि:संदेह।
मानसिकता नहीं बदल पा रहें हैं अमेरिकी ,, "न्यू यार्क टाइम्स" ने नस्लभेदी कार्टून में ओबामा को बनाया निशाना
अमेरिका में अभी भी लोगों की मानसिकता का यह ज्वलंत उदाहरण है । इस तरह की नस्लभेदी टिप्पणी तो इसी बात का संकेत देता है । कि वहां के गोरों ने अभी भी सच्चाई को स्वीकार नहीं किया है । कोई यह पहली घटना नहीं कि जब ऐसी समस्या आयी हो । अब यह विवाद कितना खिचता है यह पता नहीं पर यहां यह बात ज्यादा मायने रखती है कि एक विकसित राष्ट्र अभी पुरानी दकियानूसी विचारधाराओं से उबर नहीं पा रहा है ।
नुक्कड़ ही नुक्कड़
पाक के हालात पर खुश होने की जरुरत नहीं
दोनों खबरें भारत को परेशान करने वाली हैं। स्वात में तालिबान के सामने पाक हुकूमत का घुटने टेकना और जरदारी की स्वीकारोक्ति यह बताती है कि पाकिस्तान विघटन के कगार पर खड़ा है। इस खबर पर भारत में तथाकथित राष्ट्रवादी खुशी में झूम रहे हैं कि अब ‘नक्शे में से पापी पाकिस्तान का नाम मिट जाएगा’। लेकिन ऐसी खुशियाँ मनाने वाले उन लोगों में हैं जो पड़ोसी का घर जलते देखकर खुशियाँ मनाते वक्त यह भूल जाते हैं कि पड़ोसी के घर से उठी लपटें हमारा अपना घर भी स्वाहा कर देंगी। अमलेंदु जी द्वारा लिखित इस पुरे लेख को आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं ।
सोने की चमक से गायब है बाजार की रौनक

भारत में सोने के दाम एकाएक जिस ऊचाई से ऊपर गये हैं ।उससे तो दुकानदारों की परेशानी बढ़ गई है । इस समय शादियों के आने के इंतजार में सभी दुकानदार आखें बिछाये बैठे हुए थे । पर हुआ बिल्कुल उलटा । ये भाव कम से कम एक दो महीने तक तो कम होने वाला नहीं । अब कैसे करे कोई सोने में निवेश ।
इसलिए सोच समझकर ही करे सोने पर खर्च । वरना मंदी में और भी मंदी के पूरे आसार हैं ।
आज तुम जल्दी आना
और
देर से जाना ,
अच्छा नहीं लगता है कुछ भी,
तुम्हारे बिना,
जब से ,
मिला हूँ तुमसे ,
तुम्हारे ही सहारे जीता हूँ,
तुम्हारे ही सहारे सोता हूँ,
एक सपना लिए,
जिसमें केवल मैं होता हूँ,
तुम होती हो,
और
हमारी बातें होती है ,
जो हम करते हैं अपने आप से,
जब से तुम आयी हो ,
मेरे जीवन में ,
सब कुछ हसीन लगने लगा है,
यह मेरा भ्रम है
या
हकीकत यही है,
क्यों समझ नहीं आता है
कुछ भी,
जहां देखता हूँ तुम ही नजर आती,
जहां जाता हूँ तुमको ही पाता हूँ ,
क्या
ये सच है या मेरा भ्रम है,
मैं अकेलेपन में भी होता नहीं,
बिल्कुल भी अकेला,
अब तन्हाई में भी तन्हा नहीं होता हूँ,
ये तुम्हारा प्यार ही है ।
या
कुछ और समझ नहीं पाता हूँ।
अब तो इंतजार रहता तुम्हारे आने का ,
और फिर
देर से जाने का।
ये सब बात मैं तुम से कहता क्यों नहीं?
सोचता हूँ कि तुम आओगी तब कहूँगा,
तुम आती हो
और
कब चली जाती हो पता ही
नहीं चलता
और फिर से तुम्हारा इंतजार।
कि
आज जल्दी आना
और
देर से जाना।
अविनाश खोना मत विश्वास
झूठ का ही करेगा काम तमाम
मोहरा हो या मोहर लगती है
पिटती है, घिसटती है, सच
नहीं सिमटता कभी, डटता है
घात लगाकर किया आघात
सफर यूं ही तमाम नहीं होता
निकलता इससे दुखों का सोता
सुख भी सदा नहीं सोता रहता
सच सामने आएगा देखना जरूर
झूठ बिलबिलाएगा जल्द जी हूजुर।
" समंदर की लहरों के बीच " .....अच्छा लगता है मुझको......

ठंडी- ठडी हवाएं,
रेत पर चलते हुए पीछे छूटते ,
कदमों के निशां,
और
एक लहर की पास आती आवाज
के साथ ,
पैर पर पानी का गुदगुदी करना ,
कदमों की रेत को बहा ले जाना,
चहल कदमी करते हम दोनों ,
चले जाते दूर तक,
चारों तरफ शांत आकाश
और
पंछियों की आवाज के साथ ,
अच्छा लगता है चलना हम को ,
खामोश एहसास ,
ये नजदिकियां ,
बिन कहे ही ,
प्यार बिखेरती है।
शाम से रात का होना ,
दूर के प्रकाश का झिलमिलाना,
और पीछे मुडकर पीछे देखना
सफर को अपने,
फिर उन्हीं रास्तों पर वापस आ जाना,
अच्छा लगता है ।
लोगों का आना - जाना,
चहल पहल से दूर,
कितना सौन्दर्य नजर आता है ,
प्रकृति में ,
वक्त दो वक्त का गुजरा पल,
मन को खुशी दे जाता है ,
कभी-कभी जाकर देखों
इनको तुम ,
ये सब कितना ,
भाता है ।
समंदर की लहरों के बीच चलना ,
अच्छा लगता है ।
दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा
दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा
***राजीव तनेजा***
"मैने उसे क्या समझा?और...वो क्या निकली"
"दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा...बरबादी की तरफ ला के छोडा"
"शायद ही इस पूरे जहाँ में मुझे कोई इतना प्यारा था लेकिन जिससे जितना प्यार करो...वो उतना ही दूर भागता है"...
"ये बुज़ुर्गों का कहा आज मुझे समझ आया लेकिन क्या फायदा?....जब चिडिया चुग गयी खेत"
"जिस कम्भख्तमारी के नाम मैने अपनी तमाम ज़िन्दगी....तमाम दौलत कर दी ...उसी ने मुझे 'दगा' दिया"
"काश!....एक बार...बस एक बार वो मुझ से कह के तो देखती"....
"मै खुद ही अपने आप सब कुछ' सैटल' कर देता"
"आखिर प्यार जो उस से इतना करता था"
"लेकिन!..उस 'बेवफा' ने मेरी आस्था के दीपक को बुझा मेरे विश्वास को तोडा"....
"मैँ किसी को मुँह दिखाने के काबिल ना रहा"...
"अब तो बाहर निकलते हुए शर्म सी आती है कि लोग क्या कहेगे?"...
"कैसी-कैसी बातें करेंगे?"
"कैसे उनके चेहरे पे उभरते सवालों का जवाब दूंगा?"
"कैसे सामना करूँगा मैँ इस बेदर्द ज़माने का?"....
"कैसे तन के खड़ा रह पाऊँगा अपने यार-दोस्तों के सामने?"...
"जानता हूँ!....जानता हूँ...अच्छी तरह जानता हूँ कि उसे' औलाद' चाहिये थी"...
"तो क्या मुझे 'बाप' बनने का चाव नहीं था?"
"ये सही है कि वो ज़माने के तानों से तंग आ चुकी थी लेकिन थोडा सब्र तो उसे रखना ही चाहिए था कम से कम क्योंकि भगवान के घर देर है अँधेर नहीं"...
"मैने भी तो सिर्फ उसी की खातिर ओवरटाईम' तक करना शुरू कर दिया था"..
"देर सवेर हमारी इच्छा ज़रूर पूरी होनी थी लेकिन उसे मुझ पर विश्वास हो तब ना"...
"शायद!...कुछ ज़्यादा ही जल्दी थी उसे 'माँ' बनने की लेकिन...इसका ये मतलब तो नहीं हो जाता ना कि कहीं भी खुले में जा के किसी के भी साथ मुँह मारो?"...
"हम सभ्य समाज में रहने वाले लोग हैँ"....
"फिर कंट्रोल-शंट्रोल नाम की भी कोई चीज़ होती है कि नहीं?"....
"अरे!...
हमें तो अपनों ने लूटा...गैरों में कहाँ दम था?"...
"अपनी कश्ती तो वहीं डूबी...जहाँ पानी कम था"
"अब तो मेरा दिल उसके लिए नफरत से भर उठा है और मैँने ठान लिया है कि अगर वो मेरी नहीं हो सकती तो माँ कसम!...वो किसी की भी ना हो पाएगी"...
"अगर मैँ उसके साथ नहीं जी सकता तो किसी और को भी उसके साथ जीने-मरने का कोई हक नहीं है"...
"क्या कहा?"....
"ज़्यादा गुस्सा ठीक नहीं"....
"क्या आप में जिगरा है आँखों देखी मक्खी को निगलने का?"...
"वो मेरे ही सामने अपने यार के साथ गुलछर्रे उडाती फिरे और मैँ खडा तमाशा देखता रहूँ चुपचाप?"
"उफ!...ये आँखे फूट क्यों ना गई ऐसा अनर्थ देखने से पहले?"....
"कम से कम' जात-बिरादरी' का तो ख्याल किया होता उस उल्लू की पट्ठी ने"....
"ना 'जात' देखी और ना ही 'पात' देखी उस हवस की पुजारिन ने"
"अगर उसे चक्कर चलाना ही था तो कम से कम अपनी बिरादरी में ही मुँह मारती कम्भख्त"..
"मैँ मन मसोस कर चुप बैठ जाता लेकिन अपनी जात-बिरादरी में तो सब के सब उसे निठल्ले...बेकार और नकारा नज़र आते थे ना"...
"इसीलिए भाग खडी हुई बाहर वाले परदेसी बाबू के साथ"
"हाह!...दोनों के दोनों पागल...ना तो उसने इसका साईज़ देखा और ना ही इसने उसके साईज़ पे गौर किया"
"कहाँ ये और कहाँ वो?"...
"कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली?"
"कोई मेल भी तो हो"
"जोडीदार तो ढंग का ढूंढना था उसे कम से कम"
"दिमाग से तो बचपन से ही पैदल थी... जवानी आते-आते आँखो से भी अन्धी हो उठी वो जो उसे...
'अच्छा-बुरा'...
'भला चंगा'....
'ऊंच-नीच'...कुछ भी ना दिखाई दिया"
"जी में तो आता है कि खुदकुशी कर लूँ और चुल्लू भर पानी में डूब के मर जाऊँ कहीं लेकिन नहीं!...
इतना कमज़ोर दिल मैँ नहीं"....
"करे वो और भरूँ मैँ?"....
"इतना पागल नहीं...मैँ भला क्यों खुदकुशी करने लगा?"....
"अरे!...अगर किसी को इस दुनिया से जाना होगा तो वही जाएगी....मैँ नहीं"
"ये भला क्या बात हुई कि...आम कोई और चूस के निकल जाए और छिलके संभालता फिरूँ मैँ?"...
"अरे!...वो ज़माना तो कब का लद गया जब मैँ बावला हुआ करता था"....
"अब पूरी समझ है मुझे...सब जानता हूँ मैँ कि मेरे लिए भला क्या है?...और बुरा क्या है?"
"एक बेवफा के लिये अपनी ज़िन्दगी खुद ही तबाह कर लूँ?"
"कभी नहीं!...कभी नहीं"...
"देखो!...देखो....उस नामुराद की हिम्मत तो देखो"....
कैसे बेशर्मों के माफिक अपनी नाजायज़ औलाद को मेरे सामने लिए चली आई कि मैँ ही इसे अपना नाम दे दूं"....
"हुँह!...जैसे मैने पूरी दुनिया के अनाथ और मुफलिसों का ठेका लिया हुआ है"
"मेरा पारा सातवें आसमान तक जा पहुँचा"....
"नाम दे दूँ?"....
"इस *&ं%$# को ?"....
"भले ही सारी ज़िन्दगी बिन औलाद के बैठा रहूँ लेकिन नाम देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता ना"
"कान खोल के सुन ले......
ये स्साला!....लावारिस की मौत मरेगा...लावारिस की..."
"ये सब सुन...वो गुस्से से बिफरते हुए बोली "लावारिस की मौत ये नहीं....तुम मरोगे"
"मुझे ठुकरा रहो हो ना?"...
"याद रखना!....मरते वक्त कोई कन्धा देने वाला तक नहीं होगा तुम्हारे आस-पास"
"हुँह!....बड़ा आया नाम देने वाला".....
" *&ं%$# में दम नहीं और हम किसी से कम नहीं"
"ये सुनते ही मेरा गुस्सा काबू में नहीं रहा और मेरा पारा एकदम से सातवें आसमान पर जा पहुँचा"...
"मैँने आव देखा ना ताव और झट से उस बेवफा की गर्दन दबोच ली और लगा ज़ोर से दबाने कि आज ही सारा का सारा टंटा खत्म कर देता हूँ"
"इस *&ं%$#%$ को ज़िन्दा नहीं छोड़ूँगा"...
"दिल रो रहा था"...
"आँखो से झर-झर आँसू बहे चले जा रहे थे"...
"आखिर करता भी क्या मैँ?"....
"क्या कोई और चारा छोडा था उसने मेरे लिए?"...
"या तो मैँ..उसकी बेशर्मी को चुप-चाप देखता रहता और वो बेहय्या मेरे ही सामने अपने आशिक के साथ...
"नहीं!....ऐसा कैसे सह सकता था मै?"...
"उसने सरेआम मेरी मर्दानगी...मेरे ज़मीर को ललकारा था"...
"उसे सबक सिखाना निहायत ही ज़रूरी हो गया था ताकि आज के बाद कोई भी ऐसा करने....ऐसा सोचने की जुर्रत तक ना करे"..
"ऐसा घिनौना ख्याल दिल में लाने से पहले ही उसकी रूह तक काँप उठे"
"उफ!....
क्या से क्या हो गया?...बेवफा...तेरे प्यार में"...
"चाहा क्या?...क्या मिला?...तेरे प्यार में"
***राजीव तनेजा***
जागो है जन मानस
क्यॉकि भारत एक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है इस लिये हम आपना यह स्वरूप कभी नही खो सकते. पर हमारा किसान आज भी अभावॉ की राजनीति मॅ पिसा हुआ है. भ्रष्टाचार ने देश के हर तंत्र के खोखला कर रखा है.
मै कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के एक गांव मे अपने किसी मित्र के परिवार के लोगॉ से मिलने गया था. वहाँ का जो हाल देखा तो मेरे होश उड़ गये. जिस प्रकार हमारे शहर मॅ सास-बहू से धारवाहिकॉ ने कहर ढा रखा है, वहाँ गांव मॅ लोग-बाग धार्मिक नाटकॉ के नशे का शिकार है. अपने परिवार के विकास का चिंतन करने की बजाय वो सारा सारा दिन टी.वी से चिपके रह्ते हैं. बच्चे तो बच्चे बूढे और जवान भी इसमॅ पीछे नही है. ना जाने कब इस मनोरंजन आतंकवाद के हमारे समाज को मुक्ति मिलेगी. देश के विकास की बात छोड़िये हम सब अपने विकास की योजना तक नही बना रहे है.
आज के नेता सिर्फ और सिर्फ दलगत राजनीति तक ही सोचते है. किसी को इस देश के लोगॉ से कोई लेना-देना नही है. अगर उन्हॅ कुछ चाहिये तो वोट और उस वोट के बदले मॅ वो चोट के सिवा समाज को कुछ नही दे सकते. नेताऑ ने देश को अगर इसके सिवा कुछ दिया है तो वो है भ्रष्टाचार से भरी शासन व्यवस्था.
गाहे बगाहे देश का प्रत्येक नागरिक इन सभी चुनौतियॉ से लड़्ना चाहता है. हम मॅ से हर एक चाहता है कि देश-समाज मॅ अमन हो चैन हो, लोग शांति से जी सकॅ. आपसी सदभाव हो. प्रेम के पुष्प हर दिल मॅ खिलॅ. हम सब अपने दिलॉ मॅ ये बात जानते हैं कि हम आपस मॅ किसी भी मज़हब से नफरत नही करते. हम पडोस मॅ रहने वाला हमार पडोसी नही हमारा भाई होता है. पर हमारे देश का जन सामान्य थोड़ा भावुक है. शातिर लोगॉ के बातॉ मॅ आकर भावनाऑ मॅ बह जाता है. और यह सही-गलत का अंतर भूल जाता है. और अपने ही शरीर पर प्रहार कर के खुद को ही घायल करलेता है. इसे ठीक करने का उपाय हमॅ ही करना होगा. हम यह समस्या किसी को आउट्सोर्स नही कर सकते.
बस एक मात्र उपाय है. पूरे देश को शिक्षा के प्रकाश से जगमगाना होगा. लोगॉ के दिलॉ मॅ बैठे उस अज्ञान रूपी अन्धकार को मिटाकर ही हम नई चेतना को जन्म दे सकॅगे. और वो चेतना ही वह शक्ति है जो हमारी हर सामाजिक समस्या का समाधान होगी. आइये हम सब प्रण करॅ कि शिक्षा के प्रकाश को जन-जन तक ले जाने मॅ हम भी यथा सामर्थ्य योगदान दॅगे. और स्वयं को सक्षम, समर्थ और जाग्रत बनाकर भारत देश को नई ऊचाईऑ तक ले जाऍगे. मेरा आप सभी से यही अनुरोध
हरिभूमि दैनिक में पढ़ें व्यंग्य काले हैं तो क्या हुआ ... आज दिनांक 16 फरवरी 2009 के अंक में
काले हैं तो क्या हुआ ...
शीर्षक व्यंग्य आज के
हरिभूमि हिन्दी दैनिक
में पढ़ें स्नैपशाट देखें
दिल्ली संस्करण में
पेज 4 पर है
अन्य संस्करणों में
भी प्रकाशित हुआ है।
नुक्कड पर बहस - ब्लागर समूह दे अपनी राय । पढ़े इस घटना को और अनुनाद सिंह जी की प्रतिक्रिया का जवाब
अनुनाद सिंह जी की टिप्पणी-भैया , ये "ठेकेदारी" शब्द का प्रयोग आपके लिए उपयुक्त नहीं है। कोई आपसे पूछ बैठे कि क्या आपने सबको सदा के लिए जीवित रखने की ठकेदारी ले रखी है क्या ? तो आपका क्या उत्तर होगा ?
मेरी जवाब- अनुनाद जी "ठेकेदारी "शब्द का प्रयोग ऐसे लोगों के लिए बिल्कुल उपयुक्त होगा । परम्परा और सभ्यता का झंडा लेकर किसी को सरेआम बेइज्जत करना और पीटना कहां की सभ्यता है । कोई अपना दोस्त और दुश्मन किसी को बनाये इससे इस संगठन को क्या आपत्ति है ?चाहे वि किसी भी धर्म और जाति का क्यों न हो? और न ही इसका निर्धारण ये चंद लोग कर सकते हैं । किसी एक को चार लोग मिलकर जो कह दें, तो क्या वह बात सही हो जाती है । किसी को इस हद तक जिल्लत करना कि वह अपनी जान दे दे । कितनी कष्टदायी है यह घटना । सुनकर ही दुख होता है । भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है । और सभी पूर्णरूप से स्वतंत्र है । किसी पर किसी की हुकूमत नहीं है । चाहे वो व्यक्ति हो या फिर संस्था ।
दूसरी बात कि - मैंने किसी को जीवित रखने का ठेका तो नहीं लिया है । लेकिन किसी की जान लेने का भी ठेका मेरे पास नहीं हैं। और इस तरह की घटना जो कि बहुत ही निंदनीय है ,उसका घोर विरोध करता हूँ । किसी भी तरह से इस घटना को देखें तो अश्वनी नामक बच्ची अभी मात्र ९वीं क्लास में पढ़ती थी । वह इस हद तक आहत हो जाये कि अपनी जान दे । इसका सारा श्रेय किसे देना चाहिये ? आप ही बताइयेगा ? कोई कहीं मर रहा है और कोई कहीं । बहाने अलग - अलग होते हैं । लेकिन यहां खुद उस बच्ची ने जान दी और वह भी इस तरह की घटिया और दकियानूसी हरकत के बाद ।मानसिक पीड़ा शायद उससे न सहन हुई तब जाकर यह कदम उठाया होगा ।
तीसरी बात - मैं आगे से यह ध्यान रखूंगा कि वर्तनी शुद्ध लिखूं । आपने यह बात पर ध्यान दिया और मुझे बताया इसके लिए आपका आभारी हूँ ।
प्रेम नहीं तो कुछ नहीं : एक मौजूं विचार
ईसाई धर्म के महान आचार्य संत पाल (St. Paul ) का यह विचार प्रेम के विराट प्रभाव का उल्लेख करता है । आज इस प्रेम-दिवस (Valentine Day) पर इस विचार का यहाँ प्रस्तुतीकरण मौजूं होगा -"यदि मैं मनुष्यों और फ़रिश्तों की जबान में बात करता हूँ, पर प्रेम से वास्ता नहीं रखता तो मैं केवल एक व्यर्थ बजने वाला ढोल हूँ । और यदि मैं भविष्य-दर्शन की क्षमता रखता हूँ और सभी रहस्यों तथा ज्ञान का अधिकारी हूँ, यदि मैं पूर्ण आस्थावान भी हूँ और पहाड़ों को हटाने की शक्ति भी रखता हूँ, परन्तु प्रेम नहीं करता तो मेरा सब कुछ व्यर्थ है। यदि मैं अपना सर्वस्व दान कर दूँ, अपनी देंह को भी जलाने के लिये दे दूँ, लेकिन प्यार से मुख मोड़ता हूँ, तो मुझे कुछ भी हासिल नहीं हो सकता ।"चित्र सौजन्य : http://www.catholic.org
संस्कृति के ठेकेदार ने ली मासूम की जान । आखिर कैसे बचेगी हमारी सभ्यता और संस्कृति ?
अश्वनी नाम की यह लड़की ९ क्लास में पढ़ती थी । वह अपने साहेली के साथ बस में चढ़ी । दोनों दोस्तों को रास्ते में उनका दोस्त सलीम मिल गया । वे वेन्नूर की तरफ जा रहे थे। बजरंग दल वालों ने रास्ते में उसे घेर लिया और एक मुस्लिम से संबंध रखने पर उसकी बेइज्जती की और लडके की धुनाई भी। लोगों ने पुलिस को बुलाया तो पुलिस बजरंग दल पर कार्यवाही करने के बजाय सलीम और लड़की को पुलिस स्टेशन ले गयी । माता पिता को थाने बुलाया गया । सलीम से माफीनामा लिखवाया गया । इस सबसे आहत होकर बच्ची ने जान दे दी ।
समाज में हिन्दूवादी झण्डा लेकर चलना ही सभ्यता और संस्कृति को बचाना नहीं है । जो ये घटना हुई इसका जिम्मेदार कौन है ? पुलिस की जवाबदेही और कायरता की जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है । समाज में संतुलन लाने के लिए ऐसे काम तुच्छ और घटिया ही कहे जायेंगे। किसी जाति को निशाना बना के धर्म को नहीं बचाया जा सकता है । बल्कि धर्म की इज्जत करना आना चाहिए। तब सभ्यता और संस्कृति महान होती है । केवल मारपीट और बेइज्जती करके समाज को अच्छा नहीं बनाया सकता है।
प्यार का खुमार..........फिजाओं में छाया है

इन हवाओं ने गीत गुनगुनाया है ,
है महक तेरी बसंत में,
जैसे गुलाब ने भैरों को बुलाया है।
गगन के उडते पंछी ,
बाग में कोयल की कूंकें,
घास पर ओस की बूदें,
चांद की चांदनी में,
आम के बौंर की महक,
लहलहाते खेतों में,
सूरज की पहली किरण,
और
साथ तेरे टहलते हुए,
प्रकृति की छटा ,
का नूर तेरे नूर से ,
न जाने क्यों शर्माया है ।
क्या बंसत का खुमार ही,
हम दोनों पर उतर आया है ।
प्यार का खुमार..........फिजाओं में छाया है ।
उन दिनों...
हम-तुम कितने खुश थे,
छोटी-छोटी बातों पर हंसते ,
बिन बातों के ही रूठते,
तुम हंसके के मुझे मनाती
और
मैं हंसके तुम्हें जलाता था,
उन दिनों...
दिल धड़कता था एक साथ ,
नहीं होती थी जब तुमसे मुलाकात,
तब लगता कि,
अब आ भी जाओ
एक पल को मेरे पास,
उन दिनों....
मौसम बदल गया,
हालात बदल गया,
अब आती है जब याद,
खो जाता हूँ लम्हों के साथ,
उन दिनों......हम-तुम कितने खुश थे।
मरजानी मरजानी खसमां नूं खानी - बिल्लू बारबर के इस गीत पर रोक लगाओ
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स्लम-डाग मिलियोनर.(प्रतिक्रिया कविता में)

संघर्ष की गाथा
संघर्ष और विजय की गाथा है स्लम-डाग मिलियोनर.
संघर्षों के रोमाँच की,
भय की - आशंका की – अनिश्चितता की
और इन सबको चीरते हुये
विजय की और इंच-दर-इंच बढ़ने की
सम्पूर्ण विषमताओं के बावजूद विजयश्री के
वरण के आनन्द की कथा है-स्लम-डाग मिलियोनर.
संघर्ष जमाल का-सलीम का- लतिका का
संघर्ष बस्ती का-पुलिस और गुँडों के साथ
संघर्ष भारत का – शक्तिशाली इंडिया के साथ
संघर्ष प्रेम का-पैसे के साथ-मान्यताओं के साथ-परम्पराओं के साथ
संघर्ष भावनाओं का- नृशँस व्यवस्था-तन्त्र के साथ
संघर्ष चेतना का- पदार्थ के साथ.
संघर्ष मिलन के लिये
संघर्ष विकास के लिये
संघर्ष मुक्ति के लिये
संघर्ष प्रेम के लिये
संघर्ष विजय-प्राप्ति के लिये
संघर्ष और विजय की कथा है- स्लम-डाग मिलियोनर.
संघर्ष पूरे जीवट के साथ
संघर्ष पूरी जद्दो-जहद के साथ
संघर्ष सम्पूर्ण इच्छा शक्ति के साथ
संघर्ष प्राण-प्रण के साथ-विजय के लिये.
संघर्ष और विजय की कथा है स्लम-डाग मिलियोनर.
संघर्ष ही जीवन है.
फ़िल्म में ही क्यों, प्रत्यक्ष जीवन में जारी है संघर्ष
भारत की हर साँस-साँस संघर्षरत
भारत की हर धङकन संघर्षरत
भारत संघर्षरत- इंडिया के विरुद्ध
गरीब,असहाय, निशस्त्र भारत संघर्षरत है.
जमाल में जिन्दा है भारत
बस्ती में पिसता है भारत
इण्डिया के तन्त्र से पीडि़त भारत
निरन्तर बढते-चमकते-चहकते इण्डिया के विरुद्ध
भोग और पदार्थवाद के विरूद्ध
विज्ञापन और बाज़ारवाद के विरुद्ध
सेकूलर शिक्षा और निर्मम अर्थ-तन्त्र के विरुद्ध
सिद्धान्त-शून्य वोट-तन्त्र के विरुद्ध
आस्था-शून्य विकास-तन्त्र के विरुद्ध
संघर्षरत है भारत- विजय के लिये
और विजय का विश्वास बढाता है स्लम-डाग मिलियोनर.
आवश्यक है संघर्ष
अपरिहार्य है संघर्ष
जमाल को लड़ना ही पङता है-चाहे-अनचाहे
भारत को लड़ना ही पङेगा चाए-अनचाहे
जमाल लड़ता है, प्रेम के लिये
भारत लङ़ेगा अपने आदर्शों के लिये
जमाल हारता है बार-बार,मगर टूटता नहीं
भारत हार सकता है, कई बार- मगर टूटेगा नहीं.
गिरना,घायल हो जाना, लहू-लुहान हो जाना संभव है
मगर थकना, हार जाना और टूट जाना संभव नहीं
अन्तिम जीत प्रेम की, सत्य की, भारत की है
जमाल तो निमित्त है केवल
मगर बड़ा अर्थ-पूर्ण है यह निम्मित्त भी.
जमाल-सलीम-लतिका,
नाम को छोङकर कहाँ है- मजहबी उन्मादी रंग?
भारत प्रकट हुआ है जमाल में
इण्डिया स्पष्ट है सलीम में
और लतिका बन गई दोनों की कसौटी.
इण्डिया है-सैक्स,हिंसा, कपट, चालबाजी-सलीम.
भारत है- प्रेम, करूणा,मुदिता, सच्चाई-जमाल
सलीम सताता है जमाल को
इण्डिया हावी है भारत पर
हारता है सलीम का लालच, कपट और मोह-अन्ततः
हारना ही है इण्डिया को अन्ततः
और जीतता है- भारत का प्रेम,मासूमियत और सच्चाई अन्ततः
जीतना ही है भारत को
इण्डिया पर भारत की जीत की घोषणा है स्लम-डाग मिलियोनर
इण्डिया पर भारत की जीत का दस्तावेज है-स्लम-डाग मिलियोनर
..... ..... naiasha.com
मेरा काव्य- " शब्द "
या
मैं ही हूँ शब्द?
मुश्किल था समझना
खुद को,
कुछ कहूँ
या
न कहूँ
बिना शब्द
पहुँचती है
मेरी भावना
मेरी संवेदना
मेरा प्यार
करता हूँ
विचार हमेशा
बिना शब्दों के
अधूरा हूँ मैं।
खामोश हो जाती है
मेरी शख्सियत
खो जाती है
मेरी पहचान
इसलिए
इन शब्दों को
बनाया मैंने
हथियार
खुद को
पहचानने में
आखिर ये शब्द ही तो
हैं
जो बयां करते हैं मुझे,
मेरे जज्बात को
मेरी आवाज को
इन शब्दों से
ही तो हूँ मैं
और
मेरी अभिव्यक्ति ।
धनार्थ प्रवेश, लूटार्थ प्रस्थान : डोनेशन यानी दोनेशन सिर्फ दो देशों का मामला ही नहीं है
स्कूलों में की जा रही फीस वृद्धि पर तो चिंता जतलाई जा रही है। पर डोनेशन नामक जो कैंसरीय व्याधि राष्ट्र में व्याप्त है। इस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। क्या इस पर हम ध्यान दे सकेंगे, या अज्ञानी ही बने रहेंगे और इसे पालते पोसते रहेंगे। सुधीजनों को इस पर विचार करने की जरूरत है। उपर दिए गए लिंक पर क्लिक करिए और जानिए कि डोनेशन देकर प्रवेश पाने के बाद जो ज्ञान हासिल होता है, उससे सिर्फ येन केन प्रकारेण लूटने की चिंता ही लगी रहती है। मानस लूटमय हो जाता है।
आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।
कुत्ते को मारने पर किया गिरफ्तार
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गोपालजी, हिन्दीजी, प्रेमजी और श्री व्यंग्यजी
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"कुछ-कुछ ऐसे ही होता है"

टूटते हैं जब-जब
आखें चुपके से बरस जाती हैं।
मिलते है हाथों से हाथ,
तुम्हारे जब-जब,
रातें यूँ ही गुजर जाती है ।
सांसों का बढ़ना, घटना,
होता है मिलने पर,
पलकें खुद ही झपक जाती हैं।
वक्त थमता नहीं,
कुछ पल को,
आने पर तेरे,
बस
आती हो,चली जाती हो।
"कुछ पल और रूक जाती "
मुझे छोड़ कर
इतनी जल्दी क्या जाना जरूरी है ,?
अच्छा जाना ही है ,
तो कुछ ही पल रूक जाओ ,
वैसे भी अब हम कम मिलते है
बस यादों से ही जिया करते है,
आज तुम आयी ,
जिंदगी में नयी रंगत लायी है,
अब इन यादों का पुलिंदा बना लूँ मैं
जो कुछ पल का साथ दो ,
तुम कब आती रहोगी यूँ ही
कब यूँ तड़पाती रहोगी ?
तुम जानती हो न ?
मैं कितना अकेला हूँ तुम्हारे बिना ,
फिर भी तुम न ,
अब मैं कहूँगा तुमसे कुछ ।
तुम तो बदल गयी हो ,
क्या ?
न तुम ऐसी थी
और न मैं ऐसा था
तुम मुझे देखती
और मै तुम्हे देखता
तुम जाने की जिद करती
और
न मैं रोकता
पर ठीक है
जाना है तो जाओ
हां ये वादा करके कि
जल्दी आओगी ,
मेरा साथ देने तुम।
एक बेहतर दुनिया के लिए
“नुक्कड़” पर मिलने वाले अपने सभी साथी मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ अपने ये कवितामयी विचार। जानता हूँ, आप भी ऐसा ही सोचते होंगे और यह विश्वास भी है कि एक बेहतर दुनिया के लिए, थोड़ी-सी बची अच्छी चीजों को नि:संदेह हम-आप बचाना चाहेंगे…कविता
शुक्र है…
शुक्र है-
निरन्तर बढ़ रहे इस विषाक्त वातावरण में
बची हुई है, थोड़ी-सी प्राणवायु।
शुक्र है-
कागज और प्लास्टिक की संस्कृति में
बचा रखी है फूलों ने अपनी सुगन्धि
पेड़ों ने नहीं छोड़ी अपनी ज़मीन
नहीं छोड़ा अपना धर्म
स्वार्थ में डूबी इस दुनिया में।
बेईमान और भ्रष्ट लोगों की भीड़ में
शुक्र है-
बचा हुआ है थोड़ा-सा ईमान
थोड़ी-सी सच्चाई
थोड़ी-सी नेकदिली।
शुक्र और राहत की बात है
इस युद्धप्रेमी और तानाशाही समय में
बची हुई है थोड़ी-सी शांति
बचा हुआ है थोड़ा-सा प्रेम
और
अंधेरों की भयंकर साजिशों के बावजूद
प्रकाश अभी जिन्दा है।
एक बेहतर दुनिया के लिए
थोड़ी-सी बची इन अच्छी चीजों को
बचाना है हमें-तुम्हें मिलकर
भले ही हम हैं थोड़े –से लोग !
0
मेरे कमरे की खिड़की
से
झाकती है रोशनी
प्रकाशमय करती है
मेरे जीवन को
हर रोज,
आती है चुपके से
बिना आहट दिये
दस्तक देती है
मेरी चौखट पर,
खुलती है आखें
उजली किरण के साथ
चका-चौंध
दुनिया में
मिलता है
इसका साथ
उठता हूँ
देखता हूँ
नित्य ही
उस खिड़की से
बाहर,
एक खामोश ,
सुहानी सुबह को
चिड़ियों की
चह चहाहट को
आते जाते
लोगों को,
शुकून मिलता है
ताजगी मिलती है,
ठंड हवा के
झोंकों से,
होती है
दिन की शुरूआत
कुछ ऐसे ही।
साल की शुरूआत कुछ ऐसे खेलों में

साल २००९ और भारतीय क्रिकेट टीम का शानदार आगाज "लंका में डंका" बजा । ५ मैचों की सीरीज में भारतीय टीम ३-० से अपराजेय बढत लिये हुए है । कल हुए मैंच में शुरूआती २ विकेट गिरने के बाद युवराज और बीरेन्द्र सहवाग की तूफानी पारी ने सभी क्रिकेट प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया । जिस शैली के लिए युवी और सहवाग जाने जाते है कुछ वैसा ही प्रदर्शन भी किया । बालर की आखें बल्लेबाज की तरफ न होकर बाउड्री लाइन की तरफ ही रहती । युवी और सहवाग ने धुआंधार बल्लेबाजी करते हुए महज ९० और ९५ गेदों में सैकडा जड़ा । बाकी की कसर यूसुफ पठान ने पूरी कर दी। बाद में बल्लेबाजी करने उतरी लंकाई टीम को करने के लिए कुछ खास न था । हमारे गेंदबाजों ने अच्छी गेदबाजी से सभी खिलाडियों को पैवेलियन का रास्ता दिखाया । भारत ने कल का मैच ११६ रन से जीत लिया । भारत का लंका में ३६३-५ रन सबसे उच्च स्कोर था ।
दूसरी तरफ हमारी हाकी टीम ने जर्मनी को शिकस्त दी । तो गोल्फ से एक अच्छी खबर यह रही कि जीव मिल्खा सिंह को जानी वाकर एशियाई गोल्फ पुरस्कार के लिए नामित किया गया है । टेनिस में बालक जूनियर वर्ग का खिताब युकी बांबरी ने जीता तो मिक्स डब्लस भी भारत के खाते में रहा ।
एक टिप्पणी जिसे पोस्ट होना चाहिए : विचार करें दोबारा
देख रहा हूं आपका आमंत्रण सभी को लुभा रहा है लेकिन जैसा कि हर नई शुरूआत के पहले तरह तरह की आशंकाएं घेरती हैं वैसे ही इस ब्लॉगर्स की सभा के लिए भी लोगों ने आशंकाएं व्यक्त की हैं। लेकिन ब्लॉगर्स पढ़े लिखे सभ्य लोग हैं, इकट्ठा होंगे तो लड़ेंगे क्यों, साहित्य से जुड़े हुए लोग हैं, सृजनशीलता में विश्वास रखते हैं यदि ये साथ मिलकर बैठेंगे किसी बात के लिए सहमत होंगे तो नया ही कुछ बन पड़ेगा। व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा यह महसूस होता है कि ज्यादातर ब्लॉगर्स अभी भी अपने इस हथियार को यानी कि अपने ब्लॉग पर आकर कुछ भी कह देने की क्षमता को इतनी गहराई से नहीं समझते। यह एक अमोघ अस्त्र है जो ब्लॉगस्पाट, वर्डप्रेस इत्यादि ने हमें दिया है। जिसका उन्नयन चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी इत्यादि एग्रीग्रेटरों के बलबूते परवान चढ़ रहा है। सबसे पहले तो हमें इन सबका हार्दिक आभार प्रकट करना है उसके बाद आगे का कार्यक्रम स्टैप्स में तय कर लेना है।
याद करें आज से 40 साल पहले छपने छपाने की बात तो कौन करे, किसी अच्छी कवि गोष्ठी में घुसकर सुनने के लिए रिरियाना पड़ता था। न तो किसी गोष्ठी का टेलीकास्ट होता था और न उसकी कोई लंबी चौड़ी समीक्षा आती थी। जो उस महफिल में घुस सका, केवल वही उस स्वाद को चख पाता था और आज हम सबकी महफिल चौबीसों घंटे, सातों दिन, बारह महीने सजी रहती है, चाहे तो सुनें चाहें तो सुनायें - जब चाहें अपनी बात कहें, जब चाहें तो दूसरों की बात सुनें, दूसरों के विचारों पर अपने विचार प्रकट करें और हर प्रकार से लाभान्वित हों। मेरी तरफ से चर्चा का पहला टॉपिक रखा जा सकता है
ब्लॉगर्स का सामाजिक दायित्व
या
पंचों की राय सरमाथे पर अर्थात जो बहुमत की राय हो। दिन और वार दिन रविवार ही बेहतर रहेगा और समय होली के बाद का पहला या दूसरा रविवार। इन सब बातों हम ब्लॉगर्स ब्लॉग पर पहले तय कर सकते हैं।
मिलने का समय दो सत्रों में होना चाहिए जो कम से कम कुल मिलाकर चार घंटे का हो, जिसमें पहले दो घंटे के बाद अल्पाहार के लिए ब्रेक रखा जा सकता है। मैं समझता हूं खाने पीने के लिए बहुत बड़ा आयोजन करने और ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। क्षुधा और प्यास शांत करने तक का प्रोग्राम बनाना ही उचित होगा। सब लोग एक जैसा खाएं, एक जैसा पिएं, जो कि सादा हो और स्वास्थ्यकर। कोई किसी पर बोझ न बने, इसका इंतजाम आराम से आम सहमति से किया जा सकता है। उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए ब्लॉगर्स अपने साथ समान रुचि के लोगों को ला सकते हैं अर्थात जिनका खुद का ब्लॉग नहीं है तो क्या हुआ वे भी हमारे साथी ही हैं।
मवार्क
पहाड़िया - सुशील कुमार

दिन समेटकर उतरता है
थका-माँदा बूढ़ा सूरज
पहाड़ के पीछे
अपने साथ वन-प्रांतरों की निःशेष होती गाथाएँ लिये
तमतमायी उसके आँखों की ललाई पसर जाती है
जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
मृतप्राय नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
विलुप्त हो रहे पंछियों के उजड़ रहे अंतिम नीड़ तक।
ऊँची-नीची पगडंडियों पर कुलेलती
लौटती है घर पहाड़न
टोकरीभर महुआ
दिन की थकान
होठों पर वीरानियों से सनी कोई विदागीत लिये।
उबड़-खाबड़ जंगल-झाड़ के रस्ते लौट आते हैं
बैल-बकरी, सुअर, कुत्ते, गायें भी दालान में
साँझ की उबासी लिये।
साथ लौटता है पहाड़िया बगाल
निठल्ला अपने सिर पर ढेर सा आसमान
और झोलीभर सपने लिये
(२)
घिर जाती है साँझ और गहरी
अंधरे के दस्तक के साथ ही
घर-ओसारे में उतर आते हैं महाजन
खटिया पर बैठ देर तक
गोल-गोल बतियाते हैं पहाड़ियों से
हँसी-ठिठोली करते घूरते हैं पहाड़नों को
फिर खोलते हैं भूतैल खाते-बहियाँ अपनी
और भुखमरी भरे जेठ में लिये गये उधार पर
बेतहाशा बढ़ रहे सूद का हिसाब पढ़ते हैं
दूध, महुआ, धान, बरबट्टी और बूटियों के दाम से
लेकर पिछली जंगल-कटनी तक की मजूरी घटाकर भी
कई माल-मवेशी बेच-बीकन कर भी
जब उरिन नहीं हो पाता पहाड़िया तो
गिरवी रख लते हैं महाजन
पहाड़न के चांदी के जेवर, हंसुली, कर्णफूल, बाले वगैरह....।
तेज उसाँसें भरता अपने कलेजे में पहाड़िया
टका देता है अपना माथा महाजन के पैर पर।
तब महाजन देते हैं भरोसा
कोसते हैं निर्मोही समय को
वनदेवता से करते हैं कोप बरजने की दिखावटी प्रार्थनाएँ
अपनेपन का कराते हैं बोध पहाड़िया को
गलबहियाँ डाले महाजन साथ मिलकर दुःख बांटने का
और संग-संग पीते हैं 'हंडिया-दारू' भी
भात के हंडियों में सीझने तक,
फिर देते हैं, एक जरूरी सुझाव जल्दी उरिन होने का,
जंगल कटाई का -
फफक-फफक असहमति में सिर हिलाता रो पड़ता है पहाड़िया
पहाड़न गुस्से से लाल हो बिफरती है
गरियाती है निगोड़े महाजन को
करमजले अपने मरद को भी
पर बेबस पहाड़िया
निकल पड़ता है माँझी-थान में खायी कसमें तोड़
हाथ में टांगी, आरा लिये निविड़ रात्रि में
भोजन-भात कर, गिदरा-गिदरी को सोता छोड़
पहाड़न से झगड़ कर
महाजन के साथ बीहड़ जंगल ।
(३)
रातभर दुःख में कसमसाती
अपने भीतर सपने टूटते देखती है पहाड़न
रात गिनती
मन की परत-परत गांठें खोल पढ़ती है पहाड़न
नशे में धुत्त पहाड़िया रातभर
पेड़ों के सीने पर चलाता है आरा, टांगी
और काटता रहता है अपने दुःखों के जंगल।
बनमुरगे की कुट्टियाँ नोंचते
रहरह कर दारू, बीड़ी पीते
जगे रहते हैं संग-संग धींगड़े महाजन भी रातभर।
(४)
शीशम, सागवान, साल की सिल्लियाँ लादे
जंगल से तराई की ओर बैलगाड़ियाँ पर कराते महाजन,
बिना दातुन-पानी किये, बासी भात और अपनी गिदरे
पीठ पर गठियाये महुआ बीनने पहाड़न,
मवेशियों को हाँक लगाता बगाल पहाड़िया
कब के उतर चुके होते हैं पहाड़ी ढलान !
बहुत सुबह, सूरज के उठान के काफी पेश्तर ही !!
खाली रहती है बहुधा पहाड़ी बस्तियाँ दिनभर
बचे रहते हैं पहाड़ पर सिर्फ़
सुनसान माँझी-थान में पहाड़ अगोरते वनदेवता
उधर पूरब में जलता-भुनता सूरज
और गेहों में लाचार कई वृद्ध-वृद्धाएँ ।
मेरा काव्य - " चौराहे पर जिंदगी उसकी "

चौराहे पर हंसती है जिंदगी,
एक बच्चे की ,
हाथों में रोटी का टुकड़ा ,
तन पर कुछ गंदे कपड़े,
और
आसपास मक्खियों का झुण्ड ,
आते जाते लोगों को देखते
ढ़लती है शाम ,
कुछ ऐसे ही चलती है
जिंदगी ,
आखों में खुशी,
मन में विश्वास ,
कुछ आगे बढ़ने का
जज्बा,
शायद यही सब है
उसके पास ,
एक छोटे से टुकड़े पर
उसकी दुकान ,
जिस पर है कुछ ही
समान ,
क्या करता होगा
कुछ कमायी ?
पर
इसी ने जिंदगी चलायी ।
मैं देखता हूँ
बड़े गौर से बच्चे को ,
उसका खिलखिलाता चेहरा ,
आस-पास कुछ कंकड़
जो खिलौने है उसके ,
और उसके मटियाये
बाल को,
और
गंदे शरीर को ,
फिर सोचता हूँबचपन को ,
कितना फर्क है ?
दुख होता है मुझे ,
पर
फिर भी वह खुश है
इस जिंदगी से ।
हिंद युग्म कार्यक्रम - राजेन्द्र यादव का विवादास्पद भाषण
हिंद युग्म के वार्षिक कार्यक्रम में ख्यातनाम साहित्यकार श्री राजेंद्र यादव के संवोधन से पैदा हुआ विवाद और उसमें वेहद गुस्से के तेवर से एक बात साफ़ हो जाती है कि हिंदी की ये नयी सेना हिंदी भाषा को समृद्ध करने के लिए कटिबद्ध है. आओ दोस्तों हम इसका जस्न मनाये. जो कुछ राजेंद्र यादव ने कहा उसे कहने के तरीके से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूँ लेकिन मेरा सहमत या असहमत होना राजेंद्र यादव के लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना अपने चिर विवादस्पद लहजे में अपनी बात कहना. ये ठीक है अब हिंदी के साहित्यकारों को नए जमाने के हिसाब से नए सृजन मूल्य तलाशने होंगे. और अपने अतीत से वाहर निकलना होगा. ये उनकी सोच है जिससे आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी. भाषा ने अपनी यात्रा में बहुत विकास किया है और ये ही भाषा की समृद्धी है. लेकिन उनकी इस बात से सहमत होने का कोई कारण नहीं नज़र आता कि उन्हें कूडेदान मे फेंक दो. वो बेकार है. तो ये जो हिकारत का भाव है अपनी भाषा के प्रति ये सठियाने या अपार दंभ का परिचायक है. आप अपनी बात कहें. लेकिन अपनी विरासत को लात मत मारिये. ये भी कि इस सारी आलोचना से राजेंद्र यादव पर कोई फर्क नहीं पड़ने बाला. वो आदमी नए नए विवादों की खोज करता है और इसी से उसकी दूकान चलती है. शोभा जी का आक्रोश बिल्कुल उचित है लेकिन हम एक बात और समझें कि किसी विद्वान् को हम आमंत्रण दें तो उसके विचार पर मनन करें. अच्छा लगे उसे काम में लें, अच्छा ना लगे भुला दें लेकिन ये उम्मीद करना कि उसका भाषण वैसा होगा जो हमारे विचार हैं ये संभव नहीं है और ऐसा होना भी नहीं चाहिए.जहां तक प्रश्न सबके सामने सिगार पीने का है इसका साफ़ मतलब है कि वो समाज के नियमो को नहीं मानता, अब ऐसे असामाजिक व्यक्ति को प्रमुख अतिथी बनाना चाहिए या नहीं हमें सोचना है.आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.......
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
बहुत पुराना सा सब -कुछ याद दिला गया ;
मुझको ;
मेरे शहर ने रुला दिया.....
यहाँ की हवा की महक ने बीते बरस याद दिलाये ,
इसकी खुली ज़मीं ने कुछ गलियों की याद दिलायी....
यहीं पहली साँस लिया था मैंने ,
यहीं पर पहला कदम रखा था मैंने ...
इसी शहर ने जिन्दगी में दौड़ना सिखाया था.
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
दूर से आती हुई माँ की प्यारी सी आवाज ,
पिताजी की पुकार और भाई बहनो के अंदाज..
यहीं मैंने अपनों का प्यार देखा था ;
यहीं मैंने परायों का दुलार देखा था ;
कभी हँसना और कभी रोना भी आया था यहीं ,
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
कभी किसी दोस्त की नाखतम बातें..
कभी पढाई की दस्तक , कभी किताबो का बोझ
कभी घर के सवाल ,कभी दुनिया के जवाब ..
कुछ कहकहे ,कुछ मस्तियां , कुछ आंसू ,और कुछ अफ़साने .
थोड़े मन्दिर,मस्जिद और फिर बहुत से शराबखाने ..
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
पहले प्यार की खोई हुई महक ने कुछ सकून दिया
किसी से कोई तकरार की बात ने दिल जला दिया ..
यहीं किसी से कोई बन्धन बांधे थे मैंने ...
किसी ने कोई वादा किया था मुझसे ..
पर जिंदगी के अलग मतलब होते है ,ये भी यहीं जाना था मैंने ..
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
एक अदद रोटी की भूख ने आंखो में पानी भर दिया
एक मंजिल की तलाश ने अनजाने सफर का राही बना दिया..
कौन अपना , कौन पराया , वक्त की कश्ती में, बैठकर;
बिना पतवार का मांझी बना दिया मुझको,
वही रोटी ,वही पानी ,वही कश्ती ,वही मांझी , मैं आज भी हूँ..
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
लेकर कुछ छोटे छोटे सपनो को आंखों में ,मैंने ;
जाने किस की तलाश में घर छोड़ दिया,
मुझे जमाने की ख़बर न थी.. आदमियों की पहचान न थी.
सफर की कड़वी दास्ताँ क्या कहूँ दोस्तों ....
बस दुनिया ने मुझे बंजारा बना दिया ..
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
आज इतने बरस बाद सब कुछ याद आया है ..
कब्र से कोई “विजय” निकल कर सामने आया है..
कोई भूख ,कोई प्यास ,कोई रास्ता ,कोई मंजिल ..
किस किस की मैं बात करूं यारों ;
मुझे तो सारा जनम याद आया है.....
आज मेरे शहर ने मुझे बहुत रुलाया है.. ....
नुक्कड़ निमंत्रण : ब्लॉगर्स चर्चा में शामिल हों।
नुक्कड़ की संगोष्ठी- यार मसखरी न करो !

भाई अविनाश, लगता है आप हम सबका अप्रैल फूल ही बनाना चाहते हैं। 1 अप्रैल 2009 को रविवार नहीं, बुधवार है। यों विषय अच्छा है। मंदी का दौर तो विश्व भर में चल रहा है। अब तो गूगल भी इसकी चपेट में है। नहीं पढ़ा ? संडे नई दुनिया (1 फरवरी 2009) के अंक में ब्लॉग विद्या के महारथी भाई बालेन्दु दाधीच के कॉलम "साइबर समाचार" की इस खबर पर गौर करें-
मंदी में गूगल
गूगल भी मंदी के चपेट में है। उसने कर्मचारियों की छंटनी कर दी है और ‘गूगल एप्स’ के सॉफ्टवेयरों की बिक्री में अन्य कंपनियों की मदद लेने जा रहा है। यू-ट्यूब की तर्ज़ पर बनाए गए गूगल वीडियो सहित अपने कई कमज़ोर उत्पादों और सेवाओं को वह बंद करने जा रहा है। सेकेंड लाइफ़ की तर्ज़ पर विकसित आभासी विश्व ( वर्चुअल वर्ल्ड) ‘लाइवली’ पहले से बंद हैं। टिवटर जैसी माइक्रोब्लॉगिंग सर्विस जाइकू को ओपन सोर्स प्रोजेक्ट में बदला जा रहा है। मोबाइल सोशल नेटवर्क ‘डोजबॉल’, गूगल मैशअप एडीटर और गूगल कैट्लॉग सर्च भी बंद होने की ओर अग्रसर हैं। ‘गूगल नोटबुक’ परियोजना पर भी आगे कोई शोध या विकास कार्य नहीं होगा। कुछ शहरों में कंपनी के दफ़्तर भी बंद किए जा रहे हैं।
[बालेन्दु दाधीच, संडे नई दुनिया ( 1 फरवरी 2009)]
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तो भाई, इस भयंकर मंदी के चलते क्या मालूम ब्लॉगिंग के लिए फ्री पेजेज देने वाला गूगल अपनी इस योजना को ही न बंद कर दे या फिर ‘फ्री’ न देकर ‘फीस’ लेना आरंभ कर दे ? अगर गूगल ने फीस लेना आरंभ कर दिया तो निश्चय ही ब्लॉगरों को ब्लॉगिंग को व्यवसायिक बनाने के गुर तो सीखने ही होंगे न ! ताकि फीस का भी जुगाड़ हो सके ! तो भाई, हम तो तैयार हैं ये गुर सीखने के लिए आपकी ‘नुक्कड़’ की पहली संगोष्ठी के माध्यम से ही सही। पर तारीख, दिन और समय, सही-सही बताओ, मसखरी न करो !
युकी भाम्बरी - टेनिस का नया सितारा
सुभिक्षा - दिवालियापन के कगार पर
भारतीय शहरों मे खुदरा खरीद का एक प्रतिष्ठित खिलाड़ी सुभिक्षा नकदी की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ११ साल मे सुभिक्षा ने देश भर मे १६०० स्टोर खोले। अब हालत ये है की प्रवंधन के पास ना तो वेतन चुकाने को पैसा है न ही बिल चुकाने को। ऐसी हालत मे ३०० करोड़ की नगदी की ज़रूरत बताकर प्रवंधन अपनी बेबकूफीयों के लिए पुरूस्कार मांग रहा है। निदेशक सुब्रह्मण्यम जी का ये कहना - हम व्यंसाय के लिए प्रतिबद्ध हैं और भागेंगे नही कोई मतलब नही रखता है। मेरे पिछले लेख http://nukkadh.blogspot.com/2009/01/blog-post_28.html का आशय यही था की अभी पता नही कितने राजू हमें बेबकूफ बना रहे हैं।
