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चुनाव और हम ब्‍लॉगर्स की जिम्‍मेदारी

चुनाव एक यज्ञ
(सामयिक चर्चा)

चुनाव एक यज्ञ है। इस यज्ञ में वो सब लोग जो वोट देने के अधिकारी हैं, यज्ञ करने वाले हैं और जो अभी वोट देने की उम्र तक नहीं पहुचे हैं वे यज्ञ में सम्मिलित ऐसे सदस्‍य हैं जो इससे ज्ञानार्जन और पुण्‍य दोनों अर्जित कर रहे हैं।

आज किसको वोट दिया जाए और किसको न दिया जाए, ये एक यक्ष प्रश्‍न बन गया है। हम कोई सीधा सादा फार्मूला नहीं लगा सकते कि जो ऐसा है उसको वोट दो और जो ऐसा नहीं है उसको वोट न दो। जो इस पार्टी का है उसको वोट दो और जो उस पार्टी का नहीं है उसको वोट न दो। आज का यह सबसे बड़ा बहस का मुद्दा है कि हम किस प्रत्‍याशी को जिताएं।

हम सभी ब्‍लॉगर्स की भी यह नैतिक जिम्‍मेदारी है कि इस यज्ञ में शरीक हों और इस बहस को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाये कि आखिर हम किस तरह के लोगों को चुनकर लोकसभा में भेजें। क्‍योंकि एक गलत चुना हुआ नुमाइंदा सदन में कितना व्‍यवधान पैदा करता है, एक बेईमान मंत्री (
सुखराम जैसे लोगों को याद करो) देश को कितना बड़ा नुकसान पहुचाता है इस का लेखा जोखा करना आसान नही है। यहां तक कि सदन के लिए चुने हुए व्‍यक्ति द्वारा दिए हुए एक एक बयान, एक एक स्‍टेटमेंट के अपने मायने होते हैं और अगर वो गलत हैं, मूर्खतापूर्ण हैं, गैर जिम्‍मेदाराना हैं तो पूरे देश का और समाज का अतिशय अहित होता है।

पिछले सदन के कार्य काल में, हम सभी ने यह जरूर महसूस किया होगा कि सदन के समय की खूब बर्बादी हुई है, सदन बहुत ही कम समय के लिए चला है (पिछले सदनों की अपेक्षा बहुत कम समय तक चला है) और सदन में गंभीर से गंभीर विषयों पर चर्चा या विचार विमर्श बौद्धिक स्‍तर पर नहीं हुआ है। खाली सहमति और असहमति के नारे लगाए गए हैं। कार्यवाही में बाधा पहुचाई गई है। और कई बार तो ऐसा लगा है कि पूरे सदन को गुमराह करने की कोशिश की गई है।

सदन कोई बच्‍चों के खेल का मैदान नहीं है। कुछ विवेकशील लोगों ने यह सोचा कि यदि सदन की कार्यवाही का टी वी पर जीवंत प्रसारण किया जाएगा तो शायद सदन के सदस्‍यों को इस बात का डर रहेगा कि हमें पूरा देश देख रहा है लेकिन यहां तो हालत ये हो गई कि किसी बेशर्म का लोगों ने एक बार कपड़ा उतार दिया तो अब वो कपड़ा ही नहीं पहनना चाहता। हां, सदन में जो शर्मदार सदस्‍य हैं, वे विचारे या तो चुप बैठे रहते हैं या आंखें बंद किए रहते हैं।

हमें अपने गरिमामय राष्‍ट्र के सदन के लिए जिम्‍मेदार और विवेकशील सदस्‍य चाहिएं। हमारे सोमनाथ दादा ने ठीक ही कहा है कि तुम सब लोग इस बार हार जाओगे। उनका तात्‍पर्य सीधे सीधे सदस्‍यों की गैर जिम्‍मेदाराना हरकतों और सदन के गरिमा को कम करने के कारणों से ही रहा होगा। क्‍योंकि यह श्राप किसी विशेष पार्टी या किसी विशेष सदस्‍य के नहीं ये सिर्फ उन लोगों के लिए है जिन लोगों ने सदन की गरिमा को घटाया है।

अंत में, मैं यही कहूंगा कि हम सब अपने अपने ज्ञान के आधार पर तजुर्बे के आधार पर ऐसे छोटे छोटे सूत्रों का प्रतिपादन करें जिससे हमारे समाज के हर व्‍यक्ति को यह संदेश जाए कि वो किसको वोट दे और किसको वोट न दे।

From the desk of : MAVARK
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वोटों को लुटने से बचाया जाए (अविनाश वाचस्‍पति)

लुटने से भी बचाएं और
सही प्रत्‍याशियों को दें
आओ इस पर करें विचार
सभी ब्‍लॉगर्स मिलकर
देखें आवाह्न मवार्क का।

जब भी होते हैं चुनाव
तो होती है बाध्‍यता
वोट देने की यानी
कह सकते हैं इसे
वोट लुटते देखने की
या तो न देकर ही
हो जाता है बेकार।

इस और ऐसे ही प्रश्‍नों पर मिलकर करें मंथन। करें चर्चा जिसमें नहीं होता है खर्चा। खर्चा होता है समय का। जिससे बनेंगे हमारे नेता ढंग के। राजनीति से बेढ़गापन हटेगा। भला इस पर विचार करने से कोई वोटर या ब्‍लॉगर क्‍यों डरेगा ?
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नारी का अहवान , रचना जी का प्रयास


दिल्ली वालों होशियार, भारत वालों होशियार , दुनिया वालों होशियार अरे भाई आराम से कोई आफत नहीं है - - दिल्ली आज प्रयास कर रही है ग्लोबल वार्मिंग से निबटने के लिए। आप आइये इसे सफल बनायें और जागरूक करें खुद को और सभी को । आज अगर दिल्ली एक घण्टे का साथ दे तो १६० किलोवाट बिजली बचेगी । नारी ब्लाग की रचना जी के अहवान के साथ हम सभी । आइये दिल्ली सामूहिक प्रयास को सफल बनायें । यहां देखें - " मैं अपनी धरती को वोट दूंगी, आप भी दें कैसे?क्यूँ?? जाने??

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जन्म देने वाली मां हमेशा के लिए विदा- शरद आलोक (अविनाश वाचस्‍पति)

एक मां ने जन्‍म दिया है
एक मां ने मन दिया है
दिए हैं विचार अपरंपार
इस लिंक पर जानें सब।

मां जिसने जन्‍म दिया
भौतिक देह छोड़ गई
पर बसी है
मन में
विचारों में
यादों में
रचनाओं में सारी।

वो जब तक हम हैं
हमारे बच्‍चे हैं
तब तक यहीं रहेंगी
रहेगी बाद में भी याद
उनकी, मां को देख
मां ही याद आती है।

हिन्‍दी भी हमारी मां है
इसकी सेवा कर रहे हैं
इसकी सेवा करते रहेंगे
मां को सच्‍ची श्रद्धांजलि
यही होगी हमारी।

शरद आलोक जी का बल
मां का संबल बना रहे
मां की कमी नहीं हो सकती पूरी
पर हिन्‍दी मां की सेवा वर्षों से
जिस तरह कर रहे हैं शरद आलोक
उसी तरह करते रहें सब
यही है निवेदन सबसे अब।
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प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक सॉफ़्ट्वेयर ISCII TO UNICODE CONVERTER

प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक सॉफ़्ट्वेयर से अब कम्प्यूटर पर किसी भी प्रकार के इस्की फ़ॉन्ट्स (ISCII 8 bit code) आधारित देवनागरी पाठ्य को यूनिकोड फ़ॉन्ट (16 bit code) आधारित पाठ्य में तुरन्त बदलना आसान हो सकेगा। प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक बहुत ही उपयोगी सॉफ़्टवेयर है। इस के द्वारा हिंदी वेबसाइटों पर हिंदी में प्रचलित इस्की फ़ॉन्ट आधारित पाठ को यूनिकोड आधारित पाठ में तत्काल परिवर्तित किया जा सकेगा।
लिंक:-
.zip फ़ॉर्मेट आधारित लिंकः-http://www.4shared.com/file/95233113/8580c800/Prakhar_Devanagari_Font_Parivartak.html
.rar फ़ॉर्मेट आधारित लिंकः-
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कार्टून -जनसंपर्क ....

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"शनिदेव की न्यायप्रियता पर उठते सवाल"

देश के श्रद्धालुओं के दिलों में इन दिनों शनि महाराज का वास है । तमाम मुश्किलात से दो चार हो चुके प्रवचन किंग आसाराम का सिंहासन बिनाका गीतमाला का सरताज बना रहने में कामयाब है । प्राणायाम और कपालभाति सिखाते - सिखाते बाबा रामदेव योग गुरु से राजनीति के गुरु घंटाल बनने की जुगत भिडाने में जुट गये हैं । राज कपूर ने राम जी को मैली होती गंगा की दुहाई दी थी ,लेकिन तब ना सरकार जागी ना ही जनता चेती । अब जब कुछ उद्योग घरानों को विलुप्त होती गंगधारा में खज़ाना नज़र आने लगा है , तो भागीरथी को बचाने के लिए सरकारी तौर पर प्रयास शुरु करने की बात कही जा रही है

इस बीच न्याय के देवता कहे जाने वाले शनिदेव के आराधकों का ग्राफ़ दिनोंदिन ऊर्ध्वगामी होता जा रहा है । ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा जब लोग शनि की दृष्टिपात से भी खौफ़ज़दा रहते थे । शनि का दान देते समय सावधान्र रहते थे । शनि दान लेने वाले के प्रति भी नज़रिया ज़रा तंग ही होता था । लेकिन जय हो टीवी देव की...........।

कहते हैं ना , वक्त का फ़ेर है । समय होत बलवान । सो चैनलों ,समाचार पत्रों , ज्योतिषियों और चंद स्वनाम धन्य शनि उपासकों के गठजोड ने ’छाया मार्तंड” को त्रिलोक का अधिष्ठाता बना दिया । पिछले चार - पांच सालों में भोपाल में कदम कदम पर शनि महाराज ने डेरा डाल लिया है । हर मोर्चे पर नाकाम रहे एक शख्स ने एक ज़मीन पर बलात कब्ज़ा किया , फ़िर शनि की महिमा का बखान किया । घर पर शनि का दरबार सजाया , लोगों को शनि के दंड का डर दिखाया । आज वह करोडों की ज़मीन का स्वामी है ।

न्याय के इस आधुनिक देवता ने इस उपासक पर इतनी कृपा बरसाई कि ४० हज़ार रुपए स्क्वाय्रर फ़ुट की न्यू मार्केट की ज़मीन उसकी झोली में डाल दी । यहां नगर निगम के पार्किंग स्थल पर पिछले एक साल में शनिदेव ने अपना झंडा ना सिर्फ़ गाड दिया बल्कि करीब पांच हज़ार स्क्वाय्रर फ़ुट पर देखते ही देखते शिंगनापुर के शनि महाराज का प्राकट्य हो गया । शनिश्चरी अमावस्या ने भी आराधक पर खूब कृपा वर्षा की । हज़ारों भक्तों ने काले तिल , महंगे तेल और काले वस्त्रों का दान कर शनिदेव का भरपूर आशीर्वाद लिया ।

शनिदेव की बढती लोकप्रियता ने तो तैंतीस करोड देवताओं में से कुछ लोकप्रिय और सर्वव्यापी भगवानों को भी पीछे छोड दिया है । शबरी के राम और कुब्जा के कृष्ण की तो कौन कहे , हर पुलिस चौकी में पीपल के नीचे विराजमान रामभक्त पवनपुत्र हनुमान की पूछपरख भी कम हो चली है । मेरे घर के चार किलोमीटर के दायरे में सरकारी ज़मीनों पर अब तक मैं कम से कम दस शनिधाम देख चुकी हूं ।

जिस तरह बालीवुड में तीन खानों का बोलबाला है । उसी तरह आस्था के बाज़ार में शनिदेव सहित तीन देवताओं ने धूम मचा रखी है । जब से शनिदेव के साथ धन की देवी लक्ष्मी का उल्लेख किया जाने लगा है , भौतिकवाद का उपासक समाज एकाएक शनिदेव का आराधक हो गया है । मैंने तो शनि को न्याय के देवता के रुप में जाना - समझा । बेशर्मी से ज़मीन हथियाने और लोगों की आस्था के साथ खिलवाड करने वाले लोगों को रातों रात धनाढ्य होते देख कर मन संशय से भर उठता है ।

वैसे देखते जाइए कर्मकांड और ज्योतिष वाद के बाज़ार में छा जाने के बाद कौन कौन से नए अवतार जनम लेने वाले हैं देखने की ही बात होगी | लेकिन इतना तय है कि अनपढ़ लोगों का भविष्य तय सा है | कोइ अधिक न पढ़ पाए तो नेता या अभिनेता बन जाए , न बन सका तो ज्योतिषी बन जाए | अपना भरण पोषण आसानी से कर लेगा |

क्या वाकई शनि न्याय प्रिय हैं ...? अगर हैं , तो क्या धर्म और न्याय की परिभाषा बदल गई है .....? शनि गलत काम करने वालों को तत्काल दंडित करते हैं ऎसा कहा गया है । यदि ये सच है तो फ़िर ये माना जाए कि बेजा कब्ज़ा , दूसरों का माल हडपना , रिश्वतखोरी , चंदाखोरी , गुंडागर्दी और कायदे कानूनों का उल्लंघन अपराध नहीं हैं । शनि देव तो हो सकता है कुछ वक्त लगाएं ,लेकिन जिन अधिकारियों और नेताओं की नाक के नीचे ये सब काम होता है और जिसे रोकना उनकी ज़िम्मेदारी है , वो क्यों आंखें मूंदे बैठे रह्ते हैं .....? इनकी आंखें कब और कैसे खुलेंगी ....... खुलेंगी भी या नहीं .......? कह पाना बडा ही मुश्किल है .....?

शनिदेव से निराशा हाथ लगने के बाद अब तो मेरी निगाहें कल्कि अवतार पर ही टिकी हैं । हे कल्कि देव सफ़ेद घोडे पर हो कर सवार जल्दी लो अवतार ........।
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मीडिया मंत्र का नया अंक पढें ( मीडिया मंत्र - मीडिया पर केंद्रित हिंदी की एकमात्र मासिक पत्रिका )


मीडिया मंत्र का नया अंक पढें ( मीडिया मंत्र - मीडिया पर केंद्रित हिंदी की एकमात्र मासिक पत्रिका )-


मीडिया मंत्र - मार्च 2009 की खास बातें
( मीडिया मंत्र - मीडिया पर केंद्रित हिंदी की एकमात्र मासिक पत्रिका )


संपादकीय : मीडिया में महिलाओं का बढ़ता दायरा


मीडिया सर्वे : हिंदी के समाचार चैनलों में काम करने वाली महिलाओं पर केंद्रित सर्वे


टेलीविजन मंत्र : स्क्रीन पर स्त्री : स्त्री -सत्ता या टीआरपी की कठपुतलियाँ: विनीत कुमार


तस्वीर बोले : हिंदी न्यूज़ में महिला एंकर को किस तरह की स्टोरी दी जाती है


पत्रकारिता का सफरनामा : वर्तिका नंदा सहाय


इंटरव्यू मंत्र : चौथी दुनिया किसी भविष्य वाणी के तहत नहीं आ रहा : संतोष भारतीय


खुला मंच : परदे के इस पार / उस पार : डॉ रंजन जैदी


ब्लॉग मंत्र : महीने का ब्लॉग : चोखेरबाली


प्रिंट मीडिया : समाचार पत्रों में पढता भाषाई खेल : शालू सूरी


नयी कलम से : पत्र - पत्रिकाओं के प्रसार के लिए जरूरी है सेक्स संस्करण : निरंजन कुमार


किताब की समीक्षा : सिने पत्रकारिता : अविनाश वाचस्पति


ब्रेकिंग न्यूज़ : आईबीएन-7 पहुंचा पाताल


टेलीविजन की भाषा : हरीश चन्द्र बर्णवाल


क्या सचिन की ऐसी बॉडी आपने देखी है ?


पत्रकार की डायरी : टेलीविजन की ईद : अंजना कश्यप : न्यूज़ एंकर , न्यूज़ २४
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ज़ी न्यूज़ की अलका सक्सेना सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ एंकर और आजतक की श्वेता सिंह सबसे ग्लैमरस महिला एंकर बनी


ज़ी न्यूज़ की अलका सक्सेना सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ एंकर और आजतक की श्वेता सिंह सबसे ग्लैमरस महिला एंकर बनी - मीडिया खबर, मार्च, 2009हिंदी समाचार चैनलों में काम करने वाली महिला पत्रकारों पर केंद्रित सर्वे का परिणाम :हिंदी के समाचार चैनलों में काम करने वाली महिलाओं को केंद्र में रखकर मीडिया खबर।कॉम ने अपने प्रिंट पार्टनर मीडिया मंत्र (मीडिया पर केंद्रित हिंदी की मासिक पत्रिका) के साथ मिलकर पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वे करवाया। सर्वश्रेष्ठ महिला एंकर और सबसे ग्लैमरस एंकर के अलावा कुल 12 सवाल सर्वे में पूछे गए। यह सर्वे 15 फरवरी से 6 मार्च के बीच हुआ। पुरी ख़बर मीडिया ख़बर.कॉम पर। लिंक : http://mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=107&tid=808
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हम ब्‍लागरों में सबसे बडा स्‍टेटस किसका ?

शीर्षक देखकर आप सभी चौंक ही गए होंगे कि मैं किस स्‍टेटस की बात करने जा रही हूं आर्थिक,मानसिक,खर्च,जीवनशैली या किसी अन्‍य पक्ष की । अरे, हम ब्‍लागर भाई बहन हैं , अन्‍य सभी पक्षों को छोडकर सिर्फ ब्‍लागिंग की ही बात करते हैं, जाहिर है कि स्‍टेटस भी अपने पोस्‍टों और पाठक संख्‍या से ही बनेगी। अब इतने ब्‍लागरों में से मेरे पास तो सबका हिसाब किताब है नहीं कि किसने कहां पोस्‍ट किया और कितना पोस्‍ट किया और किसके चिट्ठे पर कितने पाठक आते हैं। लेकिन अभी चिट्ठाकारों में मेरी जानकारी में जिनका सबसे बडा स्‍टेटस है, उनकी चर्चा और किस आधार पर मैने उनको स्‍टेटस वाला चिट्ठाकार माना है, इसकी चर्चा करने जा रही हूं।
मेरे जीटाक पर बहुत सारे चिट्ठाकार मित्र हैं , क्‍योंकि मेरे लगभग सारे काम कंप्‍यूटर पर ही होते हैं , मैं लगभग दिन भर उसपर लागिन ही रहा करती हूं , यह बात अलग है कि मेरे पास इतना समय नहीं होता कि व्‍यर्थ चैटिंग में समय बर्वाद कर सकूं। पर हां , सारे आते जाते रहते हैं , जीटाक में अचानक किसी के जाने का तो पता नहीं चलता , पर आनेवालों की स्‍टेटस सहित सूचना देने के लिए जीटाक बिल्‍कुल एलर्ट रहा करता है। क्‍योंकि मैने जीटाक के सेटिंग में जाकर नोटिफिकेशन के फ्रेंड्स आनलाइन में शो नोटिफिकेशन के वर्ग को टिक कर रखा है। इस स्थिति में किसी मित्र ने जो भी कस्‍टम मैसेज सेट कर रखा होता है उसके सहित उनके आने की सूचना मुझे मिल जाती है। इस कारण बिना बात किए भी मुझे सबों के स्‍टेटस (कस्‍टम मैसेज) का पता चलता रहता है। साथ में कोई स्‍टेटस नहीं भी हो तो भी उनको नियमित देखकर सबकुछ सामान्‍य बने रहने का अहसास बना रहता है। कुछ असामान्‍य महसूस होता है , तो अवश्‍य बातें भी कर लिया करती हूं , कसम नहीं खायी है अबतक औरों कि तरह कि जीटाक पर बात ही नहीं करूंगी।
कोई आते हैं एक मिमी की उंचाई का स्‍टेटस लेकर तो कोई एक इंच की उंचाई का , कभी कभी कोई दोचार इंच तक का स्‍टेटस लेकर भी आते हैं , पर हमारे अविनाश वाचस्‍पति जी का स्‍टेटस हमेशा काफी उंचा होता है। पंद्रह दिन पहले तक उनका जी टाक पर आगमन मेरे कंप्‍यूटर की कुल उंचाई का आधा कवर कर रहा था , क्‍योंकि वे चार पांच पोस्‍टों का स्‍टेटस एक साथ लिए चल रहे थे , अब इतने स्‍टेटसवाले व्‍यक्ति से मेरा संपर्क हो , मुझे अच्‍छा तो लगेगा ही , मैं खिताब देना ही सोंच रही थी कि अचानक उन्‍होने अपना स्‍टेटस कम कर दिया। मैने खिताब का कार्यक्रम ही स्‍थगित कर दिया। पर दो तीन दिनों से उनके स्‍टेटस में पुन: बढोत्‍तरी की शुरूआत हुई है , मै इंतजार करने लगी , इनके कद में और वृद्धि होने कि और आज पुन: वह अवसर आ गया । आज तो उनका स्‍टेटस मेरे कंप्‍यूटर की कुल उंचाई का पौन भाग कवर कर रहा है, क्‍योंकि वे अपने कस्‍टम मैसेज में 8-8 पोस्‍टों को साथ लेकर चल रहे हैं। अब उनको खिताब देने से मुझे कोई नहीं रोक सकता। पर उसके पहले आप सबों को जानकारी तो देनी आवश्‍यक है , इसलिए कि कहीं उनसे बडे स्‍टेटस के कोई और ब्‍लागर भाई बैठे हों। यदि ऐसा है तो आप अवश्‍य जानकारी दें। मैं इंतजार कर रही हूं।
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पी एम की कुर्सी के लिए रविवार सुबह 6 बजे साहित्‍य शिल्‍पी पर टिकटें बटेंगी लेना न भूलना (अविनाश वाचस्‍पति)

साहित्‍यशिल्‍पी
पर रविवार दिनांक 22 मार्च 2009 की
सुबह 6 बजे पहुंच जाएं और वे तो जरूर
पहुंचे जिन्‍होंने अपने लिए टिकट की मांग की है
जिन्‍होंने पहुंचने में देर कर दी
वे कुर्सी से उतना ही दूर होंगे
धन धर्म धंधा : धांसू हो गए
टिकट की कहानी विकट भई
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गधे से न जीते, गधइया के कान मरोड़े !

चुनावी मौसम में टर्र-टर्र करने में जुटे हैं कई छोटे-बड़े-मझोले नेता, मानों बरसाती मेढ़क हों। वरुण गांधी भी उनमें से एक नज़र आ रहे हैं। टर्र-टर्र कर रहे हैं। हां, ये अलग बात है कि वरुण के नाम के आगे *'गांधी'* लगा है इसीलिए उनकी 'टरटराहट' *ज्यादा ज़ोर से निकल रही है या यों कहें कि ज़ोर-शोर से प्रचारित की जा रही है। ज़ाहिरा तौर पर वरुण गांधी ने जो कहा, जिस तरह से कहा और जिन शब्दों में कहा वो न सिर्फ घोर आपत्तिजनक है बल्कि अमर्यादित है और अनैतिक भी। लेकिन जूनियर गांधी को इसकी परवाह कहां। उनका उद्देश्य तो बस अपनी मां मेनका गांधी की विरासत में मिली सीट जीतना है और नाम कमाना है फिर चाहे नाम बदनाम ही क्यों न हो, क्या फर्क पड़ता है। वो कहते हैं न कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा। ख़ैर, वरुण ज़हर उगल रहे थे, लोग तालियां बजा रहे थे। बीजेपी के कुछ कट्टरपंथी आला नेताओं के लबों पर भी हल्की-हल्की मुस्कराहट ज़रूर तैर रही होगी क्योंकि उनकी जमात में एक और आ खड़ा हुआ था। पुरा लेख मीडिया ख़बर.कॉम पर । लिंक : http://mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=113&tid=807
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27 वॅ साल मॅ ही दस्तक देने लगता है बिढापा ???

आज देश के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र मॅ पढा कि वाशिंगटन मॅ छपने वाले अखबार डॆली मेल मॅ यह लेख छपा कि एक जाने-माने रिसर्चर टिमथी साल्टहाउस ने एक 7 वर्षॉ तक 2000 लोगॉ पर शोध किया और यह जानने का प्रयास किया कि आयु के प्रभावी की सबसे कम आयु क्या हो सकती है. उन्हॉने 18 से 60 वर्ष की आयु के लोगॉ से बात की, उनके आंकडे जुटाये. अंतत: परिणाम यह सामने आया कि 27 वर्ष की आयु मे ही हम मॅ से अधिकांश लोगॉ की यादाश्त कमज़ोर होने लगती है. हम चीज़ॅ रखकर असामान्य रूप से भूलना शुरू कर देते हैं जैसे कोई दैनिक उपयोग की वस्तु (चाबी, किताब,घडी या फिर जूते) अपने हाथॉ से रखकर भूलजाना कि हमने कहाँ रखी है.यह शोध स्वस्थ और पढे-लिखे लोगॉ पर हुआ और नतीजे पर पहुँचने मॅ 7 साल लगे.

क्या वाकई ऐसा होता है??


इसके एक्दम उलट भारतीय विचार तो यह कहता है कि 25 वर्षॉ के समय यौवन अपने पूर्ण आवेग मॅ होता है और 40 वर्ष की आयु तक वह शारीरिक रूप से बिलकुल सक्षम होता है. लेकिन यह विचार 25 वर्षॉ तक ब्रह्मचर्य के पालन पर भी बल देता है. ऐसे मॅ यह परिणाम चौंकाने वाला है.

क्या ऐसा तो नहीं कि निरंकुश यौनाचार और भोगवादी मानसिकता का ही परिणाम आज मानव को असमय बुढापे के रूप मॅ हम सब के सामने हो ???
क्या यह सत्य है कि पश्चिम योग की ओर इसी लिये बढ रहा है कि वो जान चुका है कि भोग जीवन के सागर की वो मोटर बोट है जो शरीर को मृत्यु के घाट तक बडी तेजी से ले जाती है???

तो आज कौन सी जीवन पद्धति है जो हमॅ इस अनमोल जीवन को सुफल और सफल रूप मॅ जीने का अवसर दे सकेगी ???



आप की क्या राय है इस विषय मॅ. कृपया टिप्पणी करॅ और मुझे भी जानने का अवसर दॅ.
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आगाज़

नमस्कार, मैं संगीता मनराल इनर वायस नामक (निजी) ब्लाग में लिखती हूँ अविनाश जी से नुक्कङ पर लिखने का न्योता मिला तो तुरंत हाँ कर दी नुक्कङ हर शहर, गाँव, कस्बे में होता है, हर गली को जोङता है, पूरे जहान की खबर रखता है तो आज से अपना सफर नुक्कङ पर शुरु करती हूँ
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आजकल चुनाव की सुगबुगाहट चारों ओर है, कई दलों ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिये है सभी पार्टी ने अपने अपने मतों से प्रधानमंत्री के दावोदारों कि घोषणा भी कर दी है कहीं किसी के बयानों से छींटाकशी है तो कहीं किसी के खेमे में गुलमोहर बयार आ गई है, कोई आया राम से गया राम, तो कोई गया राम से आया राम हो गया है बस चहूँ ओर यही आलम है रोड शो और फिर रोड बनने का काम भी तो ज़ोरों पर है, हमारे इलाके में ही करीब ४-५ जगह रोड बनने का काम शुरु है

आज सुबह घर से आफिस के लिये निकली, स्टाप पर करीब २० मिनट इंतजार करने के बाद जब कोई बस नहीं आई तो पूछताछ से मालूम हुआ की रुट में कुछ बदलाव लाया गया है, सभी बसें इस स्टाप से ना जाकर दूसरे स्टाप से जा रही हैं शायद वहाँ से प्रधानमंत्री का काफिला गुजरने वाला है तो भई उनकी सुरक्षा को मद्देनज़र रखते हुये ये बदलाव किये गये है अब पब्लिक का क्या है, वो तो किसी भी हाल में अपने को खुश रख लेती है, तो मैं भी बुङबुङाते हुये पैदल चलकर दूसरे स्टाप तक चली गई और बस आने का इंतजार करने लगी ज्यादा तो कुछ नहीं, लेकिन आफिस करीब ३०-४० मिनट देरी से पँहुची और रेड मार्क से उपस्थिती दर्ज की

खैर मुद्दा ये है की पब्लिक कब तक यूँही हर हाल में खुश रहने की कोशिश करती रहेगी आम आदमी की कीमत कुछ नहीं और एक मंत्री के लिये करीब १० सिपहसलार, अगर उनकों मालूम है की राजनीती में आने पर जान जोखिम में है तो फिर वो राजनीती में आते ही क्यों है, मेरा मानना यह है कि वो अगर ये बोलते है की हम निश्काम भावना से पब्लिक की सेवा करना चाहते है तो फिर ये दिखावा क्यों, इतने सुरक्षा इंतजामात क्यों?? आप इस पर क्या राय रखते है??
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एक ग़ज़ल


सुभाष नीरव


दिखने में मुझको अ यारो सागर जैसा लगता है
अपनी प्यास लिए वो लेकिन मारा-मारा फिरता है

झिलमिल करते शीशमहल-से, आँखों में सपने अनगिन,
कहीं टूट कर बिखर न जाएँ, पलक झपकते डरता है

राह अंधेरी और अनजानी, फिर भी मंज़िल ढूँढ़ रहा
उसके भीतर कहीं यकीनन, आस का दीपक जलता है

सर पे छत हो, तन पे कपड़ा, पेट की ख़ातिर रोटी हो,
इतना भर मिल जाए उसको, दुआ यही वो करता है

जब जब चोट उसे लगती है, दर्द इधर भी होता है
उसका शायद हमसे ‘नीरव’, बहुत पुराना रिश्ता है।
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ये दुनिया आनी-जानी है - आत्म प्रकाश शुक्ला

धुप को देख ना मुखडा मोड़ छाँव से ज्यादा नाता जोड़
ना हो खोने पाने में मगन उम्र भर कर लम्बी घुड़दौड़
वक़्त की तेज नब्ज पहचान व्यर्थ है सारा गर्व गुमान
नियति तो सबकी फनी है रे दुनिया आनी जानी है
किसी को कल्पवृक्ष की चाह कीर्ति के कारण कोई तवाह
देह के पीछे बना विदेह भरे कोई सूने मे आगचतुर्दिक
अपनी आँखे खोल देख जी भर ना मुह से बोल
जिन्दगी अथक कहानी है ये दुनिया आनी जानी है
गया जो उसका क्या पछताव ना मिलकर करना कभी दुराव
बहुत बुजदिल होते वो लोग गिनाते जो छाती के घाव
मिला जो सगज उसे स्वीकार व्यर्थ जीना है हाथ पसार
आँख की कीमत पानी है ये दुनिया आनी जानी है
नुमाईश में ले मंडी हाट सभी के अपने अपने ठाठ
बिक रहे रूप रस रंग गंध चले सब अपने अपने घाट
दर्द से करले नैना चार सभी को बाँट बराबर प्यार हाट
एक दिन लुट जानी है ये दुनिया आनी जानी है
सफ़र की सब शर्ते स्वीकार डगर कितनी भी हो दुस्वार
पत्थरो को ठोकर की छूट शूल को चुभने का अधिकार
पाँव हो जाये लहूलुहान मिले तब मंजिल का ज्ञान
चंद दिन दाना पानी है रे ये दुनिया आनी-जानी है
धुल का कर इतना श्रृंगार प्यार खुद करने लगे कुम्हार
समय सचमुच पागल हो जाये दिशाए देख-देख बलिहार
रेत पर रख दे ऐसे पाँव खोजता रहे समूचा गाँव
धूल ही अमिट निशानी है रे ये दुनिया आनी जानी है
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जिंदादिली की मिसाल एक चौराहा

मेरे घर के पास एक चौराहे पर जिसका नाम यहाँ के पुराने किराना व्यवसायी पराग शाह के नाम पर है. वैसे तो मेरे नगर लहरपुर जो कि जनपद सीतापुर में है उसकी खासियत ही छोटे छोटे चाय के होटल हैं. यहाँ की एक विशेषता और कि ये सभी होटल अपनी चाय में नमक का इस्तेमाल करते हैं अब यह तो नहीं कह सकते कि ये नमक इश्क का ही है क्योंकि रेखा भारद्वाज ने ओंकारा के एक गाने में इश्क के नमक का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है. पर हमारे यहाँ की चाय का नमक बिलकुल वैसे ही है जैसे कि देश की राजनीति में सक्रिय एक स्वनाम धन्य नेताजी हैं जो राजनीति में अमर छौंक लगाने का बड़ा ही सुन्दर काम करते हैं. लोग कहते हैं कि पराग शाह चौराहा हमारे शहर की जान है क्योंकि जब सारा शहर सो जाता है तो कुछ लोग यहाँ पास ही पड़े खाली स्थान पर लेट कर पता नहीं किस बारे में बात करते रहते हैं, कभी यहाँ पर कुछ नव-युवक किसी मुट्ठी में कर लेने वाली मोबाइल सेवा का उपयोग कर अपनी प्रेमिकाओं से तल्लीनता से बतियाते मिल जायेंगें. किसी शहर का छोटा सा चौराहा किस तरह से सौहार्द की मिसाल हो सकता है, आप यहाँ पर देख सकते हैं। कभी भी कोई यहाँ से जाना चाहे तो वह जाम में से बिना किसी झिकझिक के निकल जाता है क्योंकि सभी लोग दूसरे के काम में टांग अड़ाने से ज्यादा अपने काम में व्यस्त रहना चाहते हैं... जो लोग दिन में छोटी बात पर भी झगडा करने से नहीं चूकते हैं वे भी यहाँ पर विनम्र दिखाई देते हैं. हाँ एक बात और कि कभी भी झगडा होने पर यहाँ पर २०० लोगों की भीड़ तो कुछ सेकेंड्स में ही जुट जाती है जैसे कि वे कहीं पर बैठ कर अचानक प्रकट होने की ट्रेनिंग लेकर आये हों.. अब देखिये और बताइए कि क्या आपके आस पास कोई ऐसा चौराहा भी तो नहीं है जिसकी जिंदादिली पर अभी तक आपकी नज़र ही न पड़ी हो ?
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250वीं पोस्‍ट है नुक्‍कड़ पर और टिप्‍पणियां अपार : कौन शोध करेगा

इस पोस्‍ट के साथ ही नुक्‍कड़ पर 250 पोस्‍ट पूरी हो गई हैं। नुक्‍कड़ अपने सभी साथी लेखकों, पाठकों, ब्‍लॉगर साथियों का इस उपलब्धि के लिए आभार करता है। आप सबको जानकर असीम प्रसन्‍नता होगी कि हिन्‍दी ब्‍लॉग्‍स यानी चिट्ठों की संख्‍या प्राप्‍त सूचना के अनुसार 10000 के उपर चढ़ चुकी है। इससे पता लग रहा है कि हिन्‍दी कितनी बढ़ चुकी है। इस चढ़ने, बढ़ने और अंग्रेजी से लड़ने, लड़ने नहीं, मनों में धमकने के लिए आप सबकी भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता है। एक बार फिर सभी का आभार। करते रहें नुक्‍कड़ को इसी तरह प्‍यार। मार्च में वित्‍तीय वर्ष की समाप्ति तक 300 पोस्‍ट का लक्ष्‍य हासिल करने के लिए कीबोर्डबद्ध रहें सभी नुक्‍कड़ग्रहवासी।

एक निवेदन और आप लोग सदा इस बात का ध्‍यान रखें कि पोस्‍ट को 24 घंटे प्रमुखता से एग्रीगेटर्स पर जमे रहने के लिए अधिकाधिक पसंद पर चटका लगाने और टिप्‍पणी लगाने यानी राय प्रकट करने की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। इसके लिए आप सभी का सहयोग सदा की तरह मिलता रहेगा। इसी विश्‍वास के साथ। फिर नुक्‍कड़ पर। हिन्‍दी को आगे बढ़ाने की इस मुहिम में लगे एग्रीग्रेटर्स की महती भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

नुक्‍कड़ पर यदि कोई ब्‍लॉगर साथी शोध करना चाहे और बतलायें कि अब तक की अवधि में इस ब्‍लॉग की पोस्‍टों की क्‍या विविधता रही, टिप्‍पणियों में क्‍या रहा, इसे और अधिक पाठकों तक पहुंचाने के लिए क्‍या किया जा सकता है, किन और लेखकों को इससे जोड़ा जाना चाहिए, और भी ऐसी संभावनाओं पर आप सबकी राय बेबाकी से सदा की तरह आमंत्रित हैं।

चलते चलते बतला रहा हूं कि साहित्‍य शिल्‍पी पर होली के अवसर पर जारी की गई कार्टूनक्रीड़ा में यह कार्टून जारी किया गया है। जिसे जो न देख पाए हों, इसे देखें और होली के बाद भी इसका आनंद लें। और अधिक आनंद लेने के मूड में हों तो इसे भी पढ़ें हिलियाना और जूतियाना पर टिप्‍पणी देने से न डरें और न पसंद पर चटका लगाने से।
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प्रेरक कथाओं का ब्‍लॉग

इन दिनों दूसरों के लिखे ब्‍लॉग लगातार पढ़ रहा हूं। एक साल बाद कुछ लोग ऐसे मिले हैं जिन्‍हें पढ़कर लगता है ठीक है कुछ देर रुकते हैं कहीं और से भी रोशनी आ रही है। इन दिनों एक ब्‍लॉग का तो बस फैन ही हो गया हूं। इस ब्‍लॉग के लेखक को तो मैं नहीं जानता लेकिन इस ब्‍लॉग की हर पोस्‍ट को अच्‍छी तरह पढ़ चुका हूं। ब्‍लॉग का नाम है


इसमें निशान्‍त मिश्र जी ऐसी सुंदर कथाएं संग्रह की हैं कि दिल चाहता है उनके हाथ चूम लूं। हर एक कथा एक तूफान की तरह दिमाग में घुसती है और पहले से चल रहे तूफान से टकरा जाती है। विचारों का प्रवाह पहले से ही रोलर कोस्‍टर पर बिठाए रखता है। इसके साथ निशांतजी के झोंके जैसे उद्वेलित कर देते हैं। हर पोस्‍ट पढ़ने के बाद कुछ देर के लिए कम्‍प्‍यूटर बंद कर देता हूं। सोचने का मसाला जो मिल जाता है। काफी देर सोचने के बाद दिमाग इतना शांत हो जाता है कि कुछ और लिखने का जी ही नहीं चाहता। मैं इस ब्‍लॉग को ट्रैक्‍यूलाइजर ब्‍लॉग कहूंगा। जहां अधिकांश ब्‍लॉग भड़ास निकालने या पानी में हलचल बढ़ाने का काम कर रहे हैं वहीं ये प्रेरक कथाएं दिल और दिमाग को कुछ देर की शांति दे जाती हैं। मेरे ब्‍लॉग पर आने वाले सभी पाठकों को निवेदन करूंगा कि एक बार निशांतजी के ब्‍लॉग पर अवश्‍य जाएं। वहां हर किसी के लिए कुछ खास जरूर मिलेगा। 
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pani do....

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आसमान से गिरा

आसमान से गिरा

holi

***राजीव तनेजा***

'हाँ आ जाओ बाहर... कोई डर नहीं है अब...चले गए हैं सब के सब।'
मैं कंपकंपाता हुआ आहिस्ता से जीने के नीचे बनी पुरानी कोठरी से बाहर निकला। एक तो कम जगह ऊपर से सीलन और बदबू भरा माहौल, रही-सही कसर इन कमबख़्तमारे चूहों ने पूरी कर दी थी। जीना दूभर हो गया था मेरा। पूरे दो दिन तक वहीं बंद रहा मैं। ना खाना, ना पीना, ना ही कुछ और। डर के मारे बुरा हाल था। सब ज्यों का त्यों मेरी आँखों के सामने सीन-दर-सीन आता जा रहा था। मानों किसी फ़िल्म का फ्लैशबैक चल रहा हो। बीवी बिना रुके चिल्लाती चली जा रही थी...

नोट:इस बार आलस्य या फिर व्यस्त्तता के चलते कुछ नया नहीं लिख पाया तो सोचा कि होली के मौके पर अपनी एक पुरानी कहानी को आप लोगों के साथ बांटू,इसे मैँने दो साल पहले होली के मौके पर लिखा था।उम्मीद है कि यह आपकी अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी।


'अजी सुनते हो? या आप भी बहरे हो चुके हो इन नालायकों की तरह? सँभालो अपने लाडलों को, हर वक़्त मेरी ही जान पे बने रहते हैं। तंग आ चुकी हूँ मैं तो इनसे ...काबू में ही नहीं आते। हर वक़्त बस उछल कूद और...बस उछल कूद और कुछ नहीं। ये नहीं होता कि टिक के बैठ जाएँ घड़ी दो घड़ी आराम से... ना पढ़ाई की चिंता ना ही किसी और चीज़ का फिक्र...हर वक़्त सिर्फ़ और सिर्फ़ शरारत...बस और कुछ नहीं। ऊपर से ये मुआ होली का त्योहार क्या आने वाला है, मेरी तो जान ही आफ़त में फँसा डाली है इन कमबख़्तों ने। उफ!...बच्चे तो बच्चे..... बाप रे बाप, जिसे देखो रंग से सराबोर| कपड़े कौन धोएगा?.... तुम्हारा बाप?

भगवान बचाए ऐसे त्योहार से।रोज़ कोई ना कोई शिकायत लिए चली आती है।
''इसने मेरी खिड़की का काँच तोड़ दिया और इसने मेरी नई शिफॉन की साड़ी की ऐसी-तैसी कर दी"...
''अरे!...डाक्टर ने कहा था कि काँच लगवाओ खिड़की में? प्लाई या फिर लकड़ी का कोई मज़बूत सा फट्टा नहीं लगवा सकती थी क्या उसमें?''

"और ये साडी-साडी क्या लगा रखा है?"...

"कोई ज़रूरी नहीं है कि हर वक़्त अपना पेट दिखाती फिरो"...

"कोई ज़रूरी नहीं कि सामने वाले मनोज बाबू को यूँ छुप-छुप के ताकती फिरो खिडकी से हर दम" ....

"ज़्यादा ही आग लगी हुई है तो भाग क्यों नहीं खडी होती उनके साथ?" "शरीफ़ों का मोहल्ला है ये। लटके-झटके दिखाने हैं तो कहीं और जा के मुँह काला करो अपना" बीवी ने तो अपनी नौटंकी दिखा सबको चलता कर दिया पर 'शर्मा जी' वहीं खडे रहे....टस से मस ना हुए...बोल्रे..

"मेरे चश्मे का हाल तो देखो...अभी-अभी ही तो नया बनवाया था".....
"दो दिन भी टिकने नहीं दिया इन कम्भखतो ने"
"बस मारा गुब्बारा खींच के 'झपाक' और कर डाला काम-तमाम"
"टुकडे-टुकडे कर के रख दिया"

"अब पैसे कौन भरेगा?"शर्मा जी गुस्से से बिफरते हुए बोले

बीवी ने आवाज़ सुन ली थी शायद, लौटे चली आई तुरंत..बोली...
"अब शर्मा जी... बुढ़ापे में काहे अपनी मिट्टी पलीद करवाते हो? और मेरा मुँह खुलवाते हो। राम कटोरी बता रही थी कि चश्मा लगा है आँखे खराब होने से और आँखे ख़राब हुई हैं दिन-रात कंप्यूटर पे उलटी-पुलटी चीज़ें देखने से। इसीलिए तो काम छोड़ चली आई ना आपके यहाँ से?"

शर्मा जी बेचारे सर झुकाए पानी-पानी हो लौट गए। उनकी हालत देख मेरी मन ही मन हँसी छूट रही थी। अभी दो दिन बचे थे होली में, लेकिन अपनी होली तो जैसे कब की शुरू हो चुकी थी। बस छत पर चढ़े और लगे गुब्बारे पे गुब्बारा मारने हर आती-जाती लड़की पर....ले दनादन और...दे दनादन...
"पापा!... पापा!...सामने वालों की हिम्मत तो देखो...अपुन के मुकाबले पर उतर आए हैं।" अपना चुन्नू बोल पड़ा।
"हूँ...अच्छा! तो पैसे का रौब दिखा रहे हैं स्साले!....चॉयनीज़ पिचकारियाँ क्या उठा लाए सदर बाज़ार से, सोचते हैं कि पूरी दिल्ली को भिगो डालेंगे? अरे!...बाप का राज समझ रखा है क्या?...अपुन अभी ज़िंदा है, मरा नहीं। क्या मजाल जो हमसे कोई हमारे ही मोहल्ले में बाज़ी मार ले जाए। दाँत खट्टे ना कर दिए तो अपुन भी एक बाप की औलाद नहीं।"
यह सामने वाले के प्रति मेरे मन की ईर्ष्या थी या होली का उन्माद मैं खुद भी नहीं समझ सका पर जोश सातवें आसमान पर था तो हो गया मुकाबला शुरू।

कभी वो हम पे भारी पड़ते तो, कभी हम उन पे। कभी वो बाज़ी मार ले जाते तो कभी हम, कभी हमारा निशाना सही बैठता तो, कभी उनका। गली मानो तालाब बन चुकी थी लेकिन...कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था। कभी अपने चुन्नू को गुब्बारा पड़ता तो कभी उनके पप्पू का। धीरे-धीरे वो हम पे भारी पड़ने लगे। वजह?
"सुबह से कुछ खाया-पिया जो नहीं था, बीवी जो तिलमिलाई बैठी थी और वो स्साले! बीच-बीच में ही चाय-नाश्ता पाड़ते हुए वार पे वार किए चले जा रहे थे। बिना रुके उनका हमला जारी था। और इधर अपनी श्रीमती नाराज़ क्या हुई चाय-नाश्ता तो छोड़ो हम तो पानी तक को तरस गए।

हिम्मत टूटने लगी थी कुछ-कुछ...थक चुके थे हम और इधर ये पेट के नामुराद चूहे स्साले!...नाक में दम किए हुए बैठे थे। भूख के मारे दम निकले जा रहा था और बदन मानो हड़ताल किए बैठा था कि "माल बंद तो काम बंद"। ठीक कहा है किसी बंदे ने कि खुद मरे बिना जन्नत नसीब नहीं होती सो!...अपने मन को मार, खुद ही बनानी पड़ी चाय।
"ये देखो!...स्सालों, हम खुद ही बनाना और पीना जानते हैं...मोहताज नहीं हैं किसी औरत के।चूड़ियाँ पहन लो चूड़ियाँ ....हुँह!...जिगर में दम नहीं कहते हैँ "हम किसी से कम नहीं"। तुम्हारी तरह नहीं है हम, हम में है दम। ये नहीं कि चुपचाप हुकुम बजाया और कर डाली फरमाईश।अरे!...तुम्हें क्या पता कि अपने हाथ की में क्या मज़ा है? बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद?

अभी पहली चुस्की ही भरी थी कि फटाक से आवाज़ आई और सारे के सारे कप-प्लेट हवा में उड़ते नज़र आए, चाय बिखर चुकी थी और कप-प्लेट मानों अपने आखिरी सफ़र के कूच की तैयारी में जुटे थे। ऐसा लगा जैसे मानों, समय थम-सा गया हो। खून भरा घूंट पी के रह गया मैँ लेकिन एक मौका ज़रूर मिलेगा और सारे हिसाब-किताब पूरे हो जाएँगे। बस यही सोच मै खुद को तसल्ली दिए जा रहा था कि सौ सुनार की सही लेकिन जब एक लोहार की एक पड़ेगी ना बच्चू....तो सारी की सारी हेकड़ी खुद-ब-खुद बाहर निकल जाएगी। मैं चुपचाप बाहर आकर बालकनी में बैठ गया।

"देखो...देखो...पापा! कैसे बाहर खड़ा-खड़ा...गोलगप्पे पे गोलगप्पा खाए चला जा रहा है" अपना चुन्नू बोल पड़ा,
"निर्लज्ज कहीं का...ना तो सेहत की चिंता और ना ही किसी और चीज़ का फिक्र। पहले अपनी सेहत देख, फिर उस गरीब बेचारे गोलगप्पे की सेहत देख...कोई मेल भी है?
कुछ तो रहम कर। स्साला! चटोरा कहीं का। देख बेटा!... देख, अभी मज़ा चखाता हूँ। ले स्साले!... ले और खा गोलगप्पे...

"चिढाता है मेरे 'चुन्नू' को?"मैँने निशाना साध खींच के फेंक मारा गुब्बारा... ये गया....और....वो गया...
"फचाक्क".... आवाज़ आई और कुछ उछलता सा दिखाई दिया।
"मगर ये क्या? जो देखा, देख के विश्वास ही नहीं हुआ। पसीने छूट गए मेरे। थर-थर काँपने लगा, हाथ-पाँव ने काम करना बंद कर दिया। दिमाग जैसे सुन्न-सा हुए जा रहा था...
"पकड़ो साले को, "भागने ना पाए" जैसी आवाज़ों से मेरा माथा ठनका। कुछ समझ नहीं आ रहा था। ध्यान से आँखे मिचमिचाते हुए फिर से देखा तो अपना पड़ोसी सही सलामत भला चंगा, पूरा का पूरा, जस का तस खड़ा था और बगल में शम्भू गोलगप्पे वाला सोंठ से सना चेहरा और बदन लिए गालियों पे गालियाँ बके चला जा रहा था। उसका नया कुर्ता झख सफ़ेद से अचानक नामालूम कैसे चॉकलेटी सा हो चुका था।

"दरअसल!...हुआ क्या कि बस पता नहीं कैसे एक छोटी-सी बहुत बड़ी गल्ती हो गई और मुझ जैसे तुर्रमखाँ निशानची का निशाना ना जाने कैसे चूक गया और गुब्बारा सीधा दनदनाता हुआ गोलगप्पे वाले के चटनी भरे डिब्बे में जा गिरा धड़ाम और....बस्स!...हो गया काम।
"पापा!...भागो....सीधा ऊपर ही चला आ रहा है लट्ठ लिए।" चुन्नू की मिमियाती सी आवाज़ सुनाई दी।
मैंने आव देखा ना ताव कूदता-फांदता जहाँ रास्ता मिला भाग लिया। कुछ होश नहीं कि कहाँ-कहाँ से गुज़रता हुआ कहाँ का कहाँ जा पहुँचा। हाय री मेरी फूटी किस्मत!... इसी समय निशाना चूकना था? जैसे ही छुपता-छुपाता किसी के घर में घुसा ही था कि वो लट्ठ बरसे बस... वो लट्ठ बरसे कि बस पूछो मत....कोई गिनती नहीं।

उफ़!...कहाँ-कहाँ नहीं बजा लट्ठ? स्सालों! कोई जगह तो बख्श देते कम से कम, सुजा के रख दिया पूरा का पूरा बदन। कहीं ऐसे खेली जाती है होली? अरे!..रंग डालो और बेशक भंग(भाँग) डालो लेकिन ज़रा सलीके से, स्टाईल से, नज़ाकत से, ये क्या कि आव देखा ना ताव और बस सीधे-सीधे भाँज दिया लट्ठ? ठीक है!...माना कि रिवाज़ है आपका ये लेकिन पहले देखो तो सही कि सामने कौन है?... कैसा है?.... कहाँ का है?... कुछ जान-वान भी है कि नही? स्टैमिना तो देखो कि सह भी सकेगा या नहीँ?

स्सालों!...खेलना है तो टैस्ट मैच खेलो... आराम से खेलो मज़े से, मज़े-मज़े में खेलो। ये क्या कि फिफटी-फिफ्टी भी नहीं...सीधे-सीधे ही टवैंटी-टवैंटी? ये बल्ला घुमाया...वो बल्ला घुमाया और कर डाली सीधा चौकों-छक्कों की बरसात। ठीक है!... माना कि इसमें जोश है...जुनून है... एक्साईट्मैंट है....दिवानापन है... खालिस...विशुद्ध एंटरटेनमैंट है लेकिन वो भी दिन थे जब सामने वाले को भी मौका दिया जाता था कि ले बेटा!...हो जाएँ दो-दो हाथ। कमर कस तू भी और कमर कसें हम भी...फिर देखते हैँ कि कौन?...कैसे? ...और किस पे ...कितने हाथ साफ करता है?....ये क्या कि सामने वाले को न तो सफ़ाई का मौका दो और ना ही दम लेने का वक्त?बस!...सीधे-सीधे बरसा दिए ताबड़-तोड़ लट्ठ। इंसान है वो भी, मानवाधिकारों के चलते कुछ तो हक बनता है उसका भी।

कई बार समझा के देख लिया कि भईय्या...अभी तो होली आने में दो दिन बाकि हैँ लेकिन कोई मेरी सुने...तब ना।कहने लगे...अभी तो रिहर्सल ही कर रहे हैँ....फाईनल तो होली वाले दिन ही खेला जाएगा।उफ्फ!...स्सालों ने अपनी प्रैक्टिस-प्रैक्टिस के चक्कर में अपुन पर ही हाथ साफ़ कर डाला"
"जानी!...होली खेलने का शौक तो हम भी रखते है और खेल भी सकते हैं होली लेकिन तुम छक्कों के साथ होली खेलना हमारी शान के खिलाफ़ है।" इस डायलॉग से खुद को समझाता, बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ा जैसे ही बाहर निकला तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर पे अटका। बाहर लट्ठ लिए नत्थू गोलगप्पे वाला पहले से ही मौजूद था, मेरा ही इंतज़ार था उसे। दौड़ फिर शुरू हो चुकी थी मैं आगे-आगे और वो पीछे-पीछे। ये तो शुक्र है उस कुत्ते का जिसे मैंने कुछ ख़ास नहीं बस तीन या चार गुब्बारे ही मारे थे कुछ दिन पहले और निरे खालिस सफ़ेद से बैंगनी बना डाला था पल भर में, वही मिल गया रास्ते में, मुझे देख ऐसे उछला जैसे बम्पर लाटरी लग गई हो, पीछे पड़ गया मेरे। पैरों में जैसे पर लग गए हों मेरे। किसी के हाथ कहाँ आने वाला था मैं?...ये गया और वो गया।

"नत्थू क्या उसका बाप भी नहीं पकड़ पाया। हाँफते-हाँफते सीधे जीने के नीचे बनी कोठरी में डेरा जमाया। और आखिर चारा भी क्या था? वो स्साला!....नत्थू का बच्चा जो दस-बीस को साथ लिए चक्कर पे चक्कर काटे जा रहा था बार-बार। ये तो बीवी ने समझदारी से काम लिया और कोई ना कोई बात बना उन्हें चलता कर दिया तो कहीं जा के जान में जान आई।

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

Delhi(India)

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होली हैं...

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होली के बहाने यादें बचपन की






आज होली के इस मौके पर जब मैं ब्लॉग लेखक के रूप में धीमी लेकिन सक्रिय शुरुआत कर चुका हूँ, मुझे अपने बचपन की होली याद आती है। याद आती है अपने कस्बे की और वहाँ की होली, जिसकी चर्चा दूर दूर तक थी और आस पास के गाँव के लोग चलकर होली के दिन भी धमाल देखने आते थे।मैं बात कर रहा हूँ हिंडौन की जहाँ होली १-२ दिन नही बल्कि १ महीने चलने बला त्यौहार हुआ करता था। महिलाए जहाँ १ महीने पहले से ही होली के गीत गाया करती थीं तो पुरूष हुरियारे बने मंदिरों मैं ढोलक और ढप की थाप पर होली गीतों पर गाते और नाचते थे।


होलिका दहन के लिए लड़कों की टोलियाँ घर घर से लकडियाँ और उपले मांग के लाती और उसे अपने गुप्त स्थान पर सुरक्षित रखती साम दाम दंड भेद इस संग्रह को और बढ़ाने के लिए मीटिंग होती योजनाये बनाई जाती। पडौस के होली के सामान की रिपोर्ट ली जाती और अपने लक्ष्य संसोधित किए जाते। होलिका दहन बाले दिन ऐसे कंजूस लोग जो मांगने पर लकडी उपले नही देते उनके घर मौका देखकर सेंध लगाई जाती और जो मिले पलंग, कुर्सी, किवाड़ या कोई लकडी का सामान जो मिला वो होली के हवाले फिर पता चलने पर कंजूस का शोर मचाना और गालिया देना होलिका महोत्सव का चिर परिचित रंग होता था।


मेरे पिताजी की मित्र मंडळी पोंगा मंडल कहलाती थी और इसकी सदस्यता को लोग लालायित रहते थे। इसके सभी सदस्य कस्बे में पढ़े लिखे विचारक माने जाते थे यह पोंगा शब्द मुझे लगता है पोंगा पंडित फ़िल्म से लिया गया था लेकिन ये तय है वे सभी सच्चे पोंगा थे।


पोंगा मंडल प्रति वर्ष होली के मौके पर भभक पत्रिका का प्रकाशन करता था और इसमे मस्त गीत, मस्त विज्ञापन और मस्त टाइटल दिए जाते थे। टाइटल अंतररास्ट्रीय हस्तियों से शुरू होकर स्थानीय लोगो तक होते थे। पोंगा मंडल के सक्रिय सस्दास्यो के नाम अंत में होते थे। भभक में जिनके नाम छपते थे वो ख़ुद को औरो से बड़ा और प्रसिद्द मानते थे और जिनके नही छपते वो अगले साल होली से पहले पोंगाओं से मिलना जुलना बढ़ा देते। कुछ लोग अपने टाइटल को पसंद नहीं करते पर इस डर से की कहने पर अगले साल नाम गायब नही हो जाए चुप रहते। कुछ लोग शिकायत करते, आपने क्या सोचकर हमारे लिए ऐसा टाइटल दिया तो उन्हें तत्काल कोई सकारात्मक तर्क देकर खुश किया जाता।
बाकी तो होली के दिन सवेरे मोहल्लों के मंदिरों के अहातों में लोग इकट्ठे होते और होली के श्लील, अश्लील गाने गाये जाते, खुलेआम नाम ले लेकर गालियाँ दी जातीं। औरतें घर से वहार झांक भी नही सकती थीं। और लड़कों की टोलियाँ अपनी यार दोस्तों के साथ गली गली चक्कर काट रही होती थी लोग अपने मिलने बालो के यहाँ समूग बनाकर खूब घर घर जाकर होली खेलते और भानग ठंडाई और गुजिया - नमकीन खाते रहते। कुछ लोग शराब भी पीते पर उस समय ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी। १ बजे तक ये क्रम चलता। सवेरे लोग घर से निकलते तो कपड़े पहनकर ही वापसी पर जो पहनकर आते उन्हें भी कहते तो कपडा ही हैं लेकिन उनमे वो आधुनिक मल्लिका शेरावत या उस समय की हेलन के रूप लगते थे।


फिर लोग नहा धोकर अच्छे कपड़े पहनकर दोपहर को घर से निकलते गुलाल की होली और धमाल देखने के लिए। शहर के बीचों बीच सभी मोहल्लों की टोलियों के प्रतिनिधि इस धमाल में शामिल होते थे और इस धमाल की चर्चा दूर दूर होती थी। इसमे भी कुछ हद तक गालीबाजी होती थी लेकिन सांस्कृतिक होली के कुछ गीत भी होते थे जिन्हें सुनना रुचिकर लगता था। इस तरह शाम को करीब ७ बजे तक होली की धूम रहती थी।


आप सभी को होली के इस शुभ अबसर पर रंगारंग शुभकामनाये।
पोंगा हरि शर्मा
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राजूयाना होली पर रंगकामनायें और काले रंग की किलकारी


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जिसका कोई ना पूछे हाल - उसके साथ गिरधारी लाल

स्वर्गीय गिरधारी लाल भार्गव
जन्म - ११।११।१९३६ - देहावसान - ०८।०३।२००९
२ बार के पार्षद, ३ बार के विधायक और ६ बार सांसद
अगर कोई शहर स्वप्न देखे कि उसका जन प्रतिनिधि कैसा हो तो एक छवि उभरकर आती है और उसे नाम दिया जाता है गिरधारी लाल भार्गव। सच्चे जनसेवक, सामजिक कार्यकर्ता, सक्रिय पार्षद, जनप्रिय विधायक और बेहद लोकप्रिय सांसद गिरधारी लाल भार्गव अब स्मृति शेष हो गए हैं लेकिन अपने पीछे एक ऐसा जीवन इतिहास छोड़ गए हैं जो जयपुर शहर, राजस्थान और पूरे भारतवर्ष में एक अनूठी मिसाल बन गया है।
एक ऐसा व्यक्ति जो निरंतर राजनीतिक सफलताए पाता चला गया लेकिन उसकी मिलनसारिता और विनम्रता ज्यो कि त्यों बरकरार रही। चुनावों में जब उनके विरोधियो को उनके ख़िलाफ़ कहने को कुछ नही मिलता तो उनकी जो अप्रतिम विशेषता थी ( तीये की बैठको में भाग लेना, गरीबों की अस्थियों को स्वयं गंगाजी ले जाना, अधिक से अधिक सामाजिक कामो मैं भाग लेना और बिना जाती पाती की चिंता किए सबके साथ साम करना ) उसी का मखौल उडाया जता था।
मैंने ख़ुद देखा है उनका संस्कार जब वो कवि सम्मलेन सुनने जाते तो कभी मंच पर नही बैठे और अंत तक अग्रिम पंक्ति में बैठकर कवि सम्मलेन का आनंद उठाते। कितने राजनेता इतने सरल और सहज होते हैं। ६ बार सांसद चुने जाना उतना बड़ा कमाल नही है जितना इस सरलता को सहेज कर रखना मुश्किल है।
अहमदाबाद में दिल का दौरा पड़ने से कल उनका निधन हो गया। भगवान से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे और परिवार को इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।
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bin pani sab sun...




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कथा महोत्‍सव 2008 : टीम अभिव्‍यक्ति ने परिणाम घोषित किए : बधाई और महाबधाई

नुक्‍कड़
देता है बधाई
कथा महोत्‍सव 2008 के
सभी विजेताओं को
और उन्‍हें भी जो विजयी
नहीं हो पाए
पर जिनकी भागीदारी से
विजेता विजेता बने।

विजेता तीस हैं
शुभकामनाएं एक सौ चौवन
भेज रहा हूं
जिन्‍होंने भाग लिया
सब भागीदारों को एक एक
पहले दस विजेताओं को तीन तीन
बाकी बीस विजेताओं को दो दो
इन्‍हें आपस में वितरित कर लें।

एक महाबधाई आयोजकों को
कुछ महाबधाईयां
प्रायोजकों, संयोजकों और निर्णायकों
के लिए भी
पर उनकी संख्‍या ही नहीं मालूम
इसलिए असंख्‍य दे रहा हूं।

सभी स्‍वीकारें।
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चुनावी वॉक

अभी-अभी खबर आई है कि भाजपा नेताओं ने रैंप पर कैट-वॉक का अभ्यास किया. भाजपाइयों को शुरू से ही वॉक से कुछ ज़्यादा ही लगाव रहा है. कुर्सी मिलने से पहले वे ख़ुद वॉक करते हैं, बाद में जनता को वॉक करवाते हैं. अडवानी जी ने एक बार रथ को लेकर भारत का वॉक किया था. उस लम्बी वॉक से उन्हें दिल्ली तक के वॉक में आसानी हो गयी थी. फिर उन्होंने कई कारसेवकों को लेकर अयोध्या-वॉक किया. तब कई रामभक्त इस दुनिया से सीधे दुसरी दुनिया, यानि डायरेक्ट श्रीराम प्रभु के चरणों में वॉक करने चले गए थे .और वाजपेयी जी ने कमल के फूल पर बैठकर दिल्ली की गद्दी की ओर वॉक किया था...................... क्योंकि उस समय भी उनके घुटनों में दर्द होता था.

लेकिन दूसरों कि वॉक भाजपाइयों को कम रास आती है. सोनिया गाँधी की गद्दी तक की, दो कदम की वॉक को रोकने में सुषमा स्वराज ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था. उनकी इटालियन किस्म की, तेज गति वाली वॉक से डर कर भाजपा ने वॉकआउट कर दिया था. 'वॉक-वॉक पर लिखा है चलने वाले का नाम' कहावत को चरितार्थ करते हुए मनमोहन ने अपनी मोहिनी-वॉक से सारे देश को मोहित कर दिया. आजकल युवराज की जनता के द्वार-द्वार वाली वॉक ने भाजपाइयों कि नींद उड़ा रखी है. वसुंधरा ने छः बार में वॉक ओके किया लेकिन गुर्जरों को उन्होंने खूब वॉक करवाया. वे बेचारे रेल की पटरी पर कई दिनों तक भूखे-प्यासे वॉक करते रहे लेकिन वो अपने महल से नीचे उतर कर नहीं आईं क्योंकि उनके घर में ही ट्रेडमिल है. महोदय, कैट-वॉक सीखने के कई फ़ायदे भी हैं. जिस तरह से कैट शिकार करने से पहले अपने शिकार से जी भर कर खेलती है, कभी उसकी दुम पर पैर रखती है, कभी थोड़ी दूर भागने देती है और फिर झपट कर उसे मुंह में रखती है उसी तरह से यह मतदाता-रुपी चूहे को कई दिनों तक रिझाएंगे, ढेरों वादे करेंगे और अंत में गप्प से उसके वोट को अपने मुंह में रख लेंगे और पांच साल तक चैन की नींद सो जाएंगे. जब वोटर इनके द्वार पर अपनी फरियाद लेकर जायेगा तो यह कैट की तरह दबे-पांव, पिछले दरवाज़े से वॉक कर जायेंगे.
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महिला दिवस पर ही हाय-हाय क्यों??????? ऐसे कुछ भी न बदलेगा

आजअतंरराष्ट्रीय महिला दिवस है । सबसे पहले सभी को शुभकामनाएं । मैं कुछ ज्यादा नहीं कहने और लिखने वाला नहीं हूँ । बस यही बात जेहन में है कि महिलाओं की दशा समाज में जो भी है क्या आज के ही दिन ज्यादा उबाल मारती है ? या फिर आज के मौके को भुनाना सभी को अच्छा लगता है ? कई पोस्ट आयी हैं अनके विषयों पर । मैंने पढी और अच्छा भी लगा । पर दुखद यह है कि यह सब हकीकत में हो रहा है । समाज में स्त्री की जो दशा है वह सभी जानते हैं । उच्च से निम्म स्तर तक की महिलाएं है उनकी अलग- अलग समस्याएं है । कितनी भारत की ऐसी महिलाएं हैं जो कि ये जानती हैं कि आज कौन सा दिवस है और इसका सही मायनों में क्या अर्थ है ?

आज इस दिवस के उपलक्ष्य में खूब सारे रंगारंग कार्यक्रम जरूर होगें इसके सिवा कुछ भी नहीं । हो सकता है कल ही भूल जायें फिर वही आम जिंदगी । बदलाव कुछ भी नहीं । ऐसे काम नहीं बनने वाला है । महिला दिवस हो या न हो पर जरूरी है कि महिलाओं की दशा और दिशा में कैसे सुधार हो वर्ना मेरे अनुसार इससे महिला उत्थान होने वाल नहीं सिवाय हो हल्ला के अलावा। इसलिए हाय हाय करने का आज कोई खास फायदा न होगा ।
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दस का दम .....महिला दिवस पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम का तोहफा


विश्व महिला दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने समस्त भारत वासियों को जबरदस्त जीत का तोहफा दिया है ।


भारत ने महिला विश्वकप क्रिकेट के अपने पहले मुकाबले में पाकिस्तान को १० विकेट से रौंद डाला । भारत ने टास जीतने के बाद पाकिस्तान को बल्लेबाजी करने के लिए आमंत्रित किया । तो पाकिस्तानी टीम महज ५७ रन बनाकर चलती बनी ।भारत ने इस छोटे से लक्ष्य को महज १० ओवरों में पूरा कर लिया । अनघा देशपाण्डे ने २६ और अंजुम चोपड़ा ने १७ रन बनाये । और टीम को जबरदस्त कामयाबी दिलाई । पाकिस्तानी टीम में चार खिलाड़ी तो खाता भी न खोल सके। भारत की तरफ से रूमेली धर ने आठ ओवरों महज सात रन खर्च कर ३ सफलता अर्जित की ।
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कार्टूनकार काजल कुमार से जो न मिल सकें हो वे नुक्‍कड़ पर मिल सकते हैं

काजल कुमार के कार्टूनों से
आप मिलते हैं रोज ही पर
आज मिला है अवसर देखो
बनाने वाले से मिलने का।

रामपुर का हरियाणवी ताउनामा
मौका चूक मत जाना
एक क्लिक मारना
और पूरा पढ़ जाना
फिर पढ़ने के छोड़ना
निशान पहचान कुरबान।

फिर भागना भाग लेने को
पहेली में, जैसे भागेंगे हम
वैसे ही भागना जी अब तुम।

जीत गए तो एक कार मिलेगी
आपको भी, जैसी है कार्टूनकार के साथ
तो बढ़ाओ हाथ, करो मुलाकात।
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भगोरिया की परंपरा....

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गांधी जी के स्मृति चिन्ह आखिरकार भारत वापस आये ......माल्या ने मारी बाजी

न्यूयॉर्क में बापू के स्मृति चिन्हों की विवादास्पद नीलामी में भारतीय उद्योगपति विजय माल्या ने 18 लाख डॉलर की बोली लगा कर बाज़ी मार ली। यह लगभग भारतीय रूपये साढ़े नौ करोड़ के बराबर है । हमारे लिए यह खुशी की बात है कि एक भारतीय ने इन स्मृति चिन्हों को खरीदने में रूचि दिखायी । जबकि भारत सरकार ने इस नीलामी को रोकने का प्रयास किया था जिसके जवाब में जेम्स ओटिस सरकार के सामने गरीबों के लिए कार्य करने की शर्त रखी थी । जिसे सरकार ने नहीं माना ।

जेम्स ओटिस ने कहा कि मैं यह नीलामी पैसे के लिए नहीं बल्कि गांधी जी के विचारों को आगे बढ़ाया जा सके और इसका प्रसार-प्रचार हो । नीलामी की बोली २० से ३० हजार डालर से शुरू हुई । और अन्तिम बोली विजय माल्या की रही ।
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bhagoriya me over loading....

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ye huie na baat....

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आखें नम हैं......आंसू छलक रहें है............पर बोलने को कुछ नहीं


पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला। बाल-बाल बचे क्रिकेट खिलाड़ी यही सोच रहे होगें-" जान बची लाखों पाये, लौट के बुद्धू घर को आये"। एक पाकिस्तानी दूसरे पाकिस्तानी के खून का प्यासा बना। इस वारदात में हलाक होने वाले सभी जवानों को सलाम । जिसने इस हमले के नापाक इरादों को नाकाम करते हुए शहीद हो गये।

इस्लाम ही इस्लाम का दुश्मन कैसे हो सकता है? क्या इन दोनों को अलग-अलग कुरान पढ़ाई गयी। ( क्योंकि ये आतंकी इस्लाम धर्म और कुरान का ही सहारा लेते हैं) एक ने जान ली और एक ने जान दी। आज उन घरों के दिये बुझ गये हैं जिन्होंने ने अपना खोया है । आखें नम हैं......आंसू छलक रहें है............पर बोलने को कुछ नहीं


पाकिस्तान सरकार ने २० लाख रूपये कीमत रखी है एक जिंदगी की । पर समस्या समाधान कुछ भी नहीं।
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अब दुनिया भर के चैनल, agencies, पत्रों से समाचार हिंदी मैं...एक ही वेब-पेज पर


यदि आप भारत सहित दुनिया भर के समाचार पढ़ने के इच्छुक हैं तो इन्टरनेट पर यह जानकारी विभिन्न साइट्स पर उपलब्ध है. जिन्हें बारी बारी से खोल कर पढना एक दुरूह कार्य तो है ही, शर्त यह भी है कि अधिकाँश जानकारी आपको अंग्रेजी में मिलेगी.

लेकिन आपको यदि यह बताया जाये की यह सारी जानकारी, न केवल एक ही साईट पर उपलब्ध है बल्कि हिंदी में होने के साथ, सीधे उसी मूल साईट से आ रही है तो शायद आप को विश्वास न हो. किन्तु यह अब संभव है.

इस साईट से आप नीचे लिखी साइट्स तो हिंदी में पढ़ ही सकते हैं, इनके अतिरिक्त भी दसियों साइट्स यहाँ उपलब्ध हैं. यही नहीं, आप अपनी रूचि के समाचार /चित्र इत्यादि भी छाँट कर, पढ़ सकते हैं. हिंदी के अतिरिक्त ४० अन्य भाषाओँ में भी यह जानकारी इस साईट से मिल सकती है. यह पेज बिना ग्राफिक्स के सीधा-सादा प्लेन पेज है, इसलिए खुलता भी एकदम है.

कुछ साइट्स जो उपलब्ध हैं:- टाईम्स ऑफ़ इंडिया, IBN, बीबीसी, याहू, स्काई, गूगल, newsvine, रायटर, फ्रांस २४, द टाईम्स, cnn, MSNBC, USA टुडे, हेराल्ड ट्रिब्यून, द इंडीपेंडेंट, द गार्जियन, द टेलीग्राफ, डेली मेल, अल जजीरा, एबीसी, फॉक्स, आयरिश इंडीपेंडेंट, LA टाईम्स,ग्लोब एंड मेल, NPR, buzzle, बोस्टन हेराल्ड, टाइम, FT, यूनीटिड प्रेस इंटरनेशनल, वाइस ऑफ़ अमेरिका, द एक्सामिनेर, स्टोक्स्मन, न्यूज़ वीक, वाल स्ट्रीट जर्नल.....

मैं अब तक इसी साईट का ज़िक्र कर रहा था:- http://www.veryquiet.com/ अगला पेज:- http://www.veryquiet.com/smallnews.htm

यदि आपको साईट अच्छी लगे तो बुकमार्क करना न भूलें.
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आतंक के खिलाफ : हल्ला बोल

कमी रह गई इस मॅ भी. एक आध क्रिकेटर की मौत हो ही जाती....तो भी दुनिया यह मानने को तैयार नही होती कि पाकिस्तान ही जड़ है पूरी दुनिया मॅ फैले इस आतंकवाद रूपी ज़हर के पौधे की. गददाफी स्टेडियम के बाहर श्री लंकाई क्रिकेट टीम दल पर हमला हो चुका है. और यह बात स्व-प्रमाणित हो चुकी है कि अगर अब भी नही चेते तो फिर दुनिया को चित होने से कोई नही रोक सकेगा.

फिर वही होगा....हम फिर एक माह के लिये जाग गये है. फिर से चिंता की रेखाये लौट आई है हमारे चिकने माथे पर. हम फिर अस्थाई रूप से चिंतित हो गये है. फिर से सारे मामले की समीक्षा होगी. पूरे मामले की निश्पक्ष जांच होगी. दो-चार नाम उछाले जायेगे. कुछ लोगो को शक के आधार पर गिरफ्तार भी किया जायेगा लेकिन नाकाफी सबूतॉ के चलते वो भी बाइज़्ज़त रिहा कर दिये जाएंगे. पूरा ड्रामा खेला जायेगा कि किस तरह हमेशा की तरह पाक खुद को पाक दामन साबित करले.

काश अगर यहाँ चीनी टीम होती, या फिर अमेरीकी टीम होती तो सूरतेहाल कुछ और ही होते.

अब तो जागो मेरे देश के लोगॉ. अब तो चेत जाओ. मौका आने वाला है. एक ऐसी सरकार चुनो जो तुम्हारा हित समझ सके. देश हित के जान सके. बदल ड़ालो भारत की तस्वीर इस दुनिया के नक्शे पर. दिखा दो कि हम भी तख्ता पलटना जानते है. हम भी हिम्मत रखते है कि अपनी बात रख कर अपनी ताकत दिखा सकते है.

तो बदल डालो...मिटा दो आतंकवाद का नाम इस दुनिया के शब्दकोष से.
(दुख हुआ कि खेल भावना को चिट पहुची. दुख हुआ कि खिलाड़ी घायल हुए. चैन है कि किसी की जान नही गयी.)
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आतंकरूपी कैंसर का खात्‍मा करें

पाकिस्‍तान की जमीं पर श्रीलंका के क्रिकेट खिलाडि़यों पर जानलेवा हमला एक घिनौनी साजिश है। इससे फैलाए आतंकवाद के विरोध में दुनिया की सभी ताकतों को एकजुट होकर
सामने आ जाना चाहिए। पाकिस्‍तान पर अब दया दिखलाने, संशय का लाभ देने या सबूत मांगने जैसी कोई खानापूर्ति नहीं की जानी चाहिए। इस समय पाकिस्‍तान संसार के खेल जगत के सामने नंगा हो चुका है। अब वो अपने घर में ही मेहमानों पर खूंखार बन गया है। उसका यह घिनौना रूप घोर निंदनीय है। नंगे को छिपा कर नहीं, मिटा कर ही आतंकरूपी इस कैंसर से निजात पाई जा सकती है।

हरकत पाकिस्‍तान में खेलों पर आतंकी साया
अब मांगे सबूत तो उसे साबूत ही मिटाना होगा।।
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भगोरिया को जानते हैं आप तो मानेंगे भी अब आप

भगोरिया है एक त्‍योहार
जो आदिवासी अंचलों में
है मनाया जाता
झाबुआ में आदिवासी इलाकों
में आदिवासियों का बहुत
बड़ा है त्‍योहार
जिसे जानती है सारी दुनिया
ख्‍याति है जिसकी बहुत
पर लगता है आप ...
अब तो जान गए हैं।

देश विदेश के लोग
भगोरिया का माहौल
देखने चले आते हैं।
इसके आदिवासी लोकनृत्‍य
पारंपरिक वेशभूषा, अनोखा अंदाज ...

बस माहौल देखते ही बनता है ...
भगोरिया का आलम ये है कि
परीक्षा में आदिवासी बच्‍चे
परीक्षा न देकर मेले में
जाना करते हैं पसंद
और चाहते हैं उनके मां बाप
भी यही और भगोरिया 4 मार्च
हो रहा है शुरू
जान गए अब आप गुरू
4 मार्च कल है ।

हु
रररररररररररररररररररररररररररररररररररररर्र्र्र्र
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bhagoriya aur exams... :(

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lo.. me aagaya

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नुक्‍कड़ के लेखक एवं पाठक ध्‍यान दें : वैसे जनहित का मामला है

मैं आप और सब
चाहते हैं यही
कामना रहती है
पढ़ें सब ही
जो लिखें हम
मिले टिप्‍पणी।

भूलें न कभी
करें सदा यही
आपको लगती हैं
पोस्‍टें जो भी अच्‍छी
आती हैं पसंद तो
चटकाएं ब्‍लॉगवाणी में
पसंद संख्‍या को।

इससे नंबर बढ़ेगा
और पोस्‍ट पूरे दिन
सामने नजर आएगी
खूब पढ़ी जाएगी
पसंद नंबर पर
चटकाने की सुविधा
ब्‍लॉग पर भी है
और ब्‍लॉगवाणी
तो इसका घर है।

तो नुक्‍कड़ ही नहीं
जो भी जिस भी
पोस्‍ट को पसंद करें
उसे चटकाएं अवश्‍य।

जब सभी ऐसा करेंगे
तो आप पाएंगे अपनी
पोस्‍टों को दिन भर
मौजूद सामने।

बतला रहा हूं इसलिए
हम में से अधिकतर
को इस संबंध में
जानकारी नहीं है
तो जानें खुद और
समझाएं सबको
लाभ उठाएं सब।
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आदर्शवादी सास की बहू


‘टी वी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, स्‍कूटर,
क्‍या करूंगी ये सब लेकर,
बस एक अच्‍छी सी बहू चाहिए
और भला मुझे क्‍या चाहिए।
ऐसी बहू जो हर वक्‍त करती रहे बडों की सेवा,
और कभी उम्‍मीद न करे कि मिले किसी से मेवा।‘
बोली मां संपन्‍न घराने में बेटे का विवाह तय कर,
और फिर चल दी,
मित्रमंडली में अपनी आदर्शवादिता की छाप छोडकर।
पर दिल में काफी इच्‍छाएं थी,
काफी अरमान थे,
हर समय सपने में बहू के दहेज में मिले
ढेर सारे सामान थे।
और जब बहू घर आयी,
उनकी खुशी का ठिकाना न था,
हर चीज साथ लेकर आयी थी,
उसके पास कौन सा खजाना न था।
हर तरफ दहेज का सामान फैला पडा था,
पर सास का ध्‍यान कहीं और अडा था।
बहू ने बगल में जो पोटली दबा रखी थी ,
इस कारण उनकी निगाह इधर उधर नहीं हो पा रही थी।
न जाने क्‍या हो इसमें ,
सोंच सोंच कर परेशान थी,
बहू ने अब तक बताया नहीं ,
यह सोंचकर हैरान थी।
हो सकता है सुंदर चंद्रहार,
जो हो मां का विशेष उप‍हार,
या हो कोई पर्सनल चीज,
या फिर किसी महंगी कार के एडवांस पैसे ,
शायद मां ने दिए हो इसे।
पर खुद से अलग नहीं करती,
इसमें अंटके हो प्राण जैसे।
काफी देर तक सास अपना दिमाग दौडाती रही,
और मन ही मन बडबडाती रही।
कैसी बहू है ,
सास से भी घुल मिल नहीं पा रही,
अपनी पोटली थमाकर बाथरूम तक नहीं जा रही।
बहुत हिम्‍मत कर करीब जाकर प्‍यार से बोली,
बहू से बहुत मीठे स्‍वर में अपनी बात खोली।
^इसमें क्‍या है^ , मेरी राजदुलारी,
इसे दबाए दबाए तो थक जाओगी प्‍यारी।
बहू भी काफी शांत एवं गंभीर स्‍वर में बोली,
आदर्शवादी सास के समक्ष पहली बार अपना मुंह खोली।
’सुना है ससुरालवाले दहेज के लिए सताते हैं,
ये लाओ, वो लाओ मायके से ये हमेशा बताते हैं।
जो मेरे साथ ऐसा बर्ताव करने की कोशिश करेगा,
वही मुझसे यह खास सबक लेगा।
उसके सामने मैं अपनी यह पोटली खोलूंगी,
इसमें रखे मूंग को उसकी छाती पर दलूंगी।‘

( लेखिका - श्रीमती शालिनी खन्‍ना )
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घोषणा नंबर 1

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