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प्यार का रंग ना बदला



बदल गया है सब कुछ भैया

मगर प्यार का रंग ना बदला


बदली बदली हवा लग रही

बदले बदले लोग बाग़ हैं

बदले बदले समीकरण हैं

बदल गयी है नैतिकता भी

बदले लक्ष्य बदल गए साधन

देखे सभी बदलते हमने

मगर प्यार का रंग ना बदला


फैशन बदले कपड़े बदले

उपर से थोडा नीचे है

नीचे से थोडा ऊंचे है

नीचे ऊपर ऊपर नीचे

इनको देख हुआ जाता है

मेरा मन भी ताथा थैया

मगर प्यार का रंग ना बदला


मंजर बदले आँखे बदली

यात्री बदले मंजिल बदली

आँखों के सब सपने बदले

बदला मौसम आँगन बदले

ओठों के सब गाने बदले

मांझी बदले बदली नैया

मगर प्यार का रंग ना बदला
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ब्‍लॉगरों पप्‍पू मत बनिए : इंटरनेट से ऑनलाईन (वोट) मत दीजिए

इस बार नहीं बनना पप्‍पू
पर वोट पप्‍पू को देना
आप पप्‍पू दिवस का
अंतिम दिन है मानिए।
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कार्टून-मतदान

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मीडिया में देहराग


औरत की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है । सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। आगे मीडिया ख़बर.कॉम पर।

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कार्टून-चलो अच्छा हुआ .....

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पी सी माने प्‍यारा कंप्‍यूटर जाता है बार बार टंग ( hang) (अविनाश वाचस्‍पति)

पी सी हमारा दिखला रहा है अजब नजारा
मोजिला में तो इंटरनेट से होता है कनेक्‍ट
एक्‍सप्‍लोरर और क्रोम में नहीं जोड़ता है
कोई भी पेज नहीं खोलता है करते हैं ट्राई

Internet Explorer cannot display the webpage
लिखकर चिढ़ाता है, मुंह बनाता है,करूं मैं क्‍या ?
दस मिनिट भी नहीं कर पाता हूं काम
तो कह देता है तुरंत ही करो जाकर आराम

टंग (हैंग) जाता है, न चूहा चलता है
न किसी बटन का असर दिखता है
बंद करके खोलता हूं दोबारा।

फिर लगभग दस मिनिट बाद यही करता है
मेरा प्‍यारा है पर मुझसे जरा न डरता है
यह ऐसा क्‍यों हुआ जा रहा है
क्‍या इस पर भी नेताओं का असर आ रहा है
मशीन भी आदमी बनता नजर आ रहा है
कोई इसको सज्‍जन बनाने का नुस्‍खा बतलाए ?

टंगता है खुद और टांग मुझे देता है।
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कार्टून-खोट - से - वोट तक.....

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कार्टून-बूट से वोट तक.....

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राजेश उत्‍साही की दो ग़ज़लें

॥ एक ॥
हवाओं में जहर हर तरफ मिला है
राह में जो बिछड़ा वो कब मिला है

फेफड़े हैं कुन्द और नब्ज मद्धम
दिमाग भी है बन्द,मुंह सिला है

हर वक्त खुलकर सोचने वालो,
आसपास ये कौन-सा किला है

दूर से नजर आता है हरा-भरा
पास आकर देखिए निरा पीला है

मत रहो घोड़े की सूं बांधकर पट्टी
राह में दाएं-बाएं भी उपवन खिला है

रूठे-मनाएं, रूठ जाएं फिर से
जिन्दगी का तो यही सिलसिला है

पर्वत जो सामने है कोई बात नहीं
हां, एक उत्साही से कब हिला है

॥ दो ॥
मासूम सवालों का जमाना नहीं रहा
चालाक हैं सब ,कोई सयाना नहीं रहा

औरों की बुनियाद में हो गए पत्थर
खुद का चाहे कोई ठिकाना नहीं रहा

फटी हुई गुदड़ी के लाल हैं हम भी
अलग बात है, कोई घराना नहीं रहा

सी लिए होंठ सबने मूंद ली आंखें
शायद कसने को अब ताना नहीं रहा

बहारों के दरीचों पर है प्रवेश निषेध
जाएं कहां अब कोई वीराना नहीं रहा

समझेगा नहीं कोई मोहब्बत का जुनून
हीर-सी दीवानी,फरहाद दीवाना नहीं रहा

सिर-से पैर तक बदल गई है दुनिया
फैशन में कोई चलन पुराना नहीं रहा

आओ उत्साही से भी मिल लें चलकर
चर्चा में उसका अफसाना नहीं रहा
0 राजेश उत्साही
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कार्टून-वाह क्या मुद्दा हैं ..........

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परदे के पीछे बैठी सांवल गोरी

कुछ समय पहले फ़िल्म "धरम करम " का एक गाना कानों में पड़ा जिसने कुछ सोचने को मजबूर कर दिया।
"परदे के पीछे बैठी सांवल गोरी.."
भला एक लड़की सांवली व गोरी एक साथ कैसे हो सकती है?

ऐसे अनेक सवाल हमारी हिन्दी फिल्मों के गीत हमसे पूछ जाते हैं और हम जानते ही नही, मसलन मुकेश जी का यह गाना:
" साकी शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता की जहाँ पर खुदा न हो"

अब उत्तर दीजिये इस शराबी के प्रश्न का! है कोई ऐसी जगह जहाँ यमलोक के बहीखाते से दूर अपनी मनमर्जी की जा सके, भगवान् की पैनी निगाहों से बचा जा सके! फ़िर कैसे हम सोच लेते हैं की हमें कोई नही देख रहा, कोई स्टिंग ऑपरेशन नही कर रहा हम पर।

इसी तरह इश्क में गिरफ्तार एक गरीब युवक भरी महफ़िल में लड़की व उसके बापू से यह पूछता है
"खता तो जब हो की हम हाले दिल किसी से कहें
किसी को चाहते रहना कोई खता तो नही!"
सही बात है, हमारी मर्ज़ी हम जिसको चाहें, समस्या तब होनी चाहिए जब हम उसे प्रोपोज कर डालें!


बचपन में एक गाना सुनकर बहुत परेशां हो जाते थे, समझ में ही नही आता था
"मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, सावन के कुछ भीगे भीगे दिन..."
बाद में पता चला की कोई सामान वामान नही था, लड़की लड़के पर इमोशनल अत्याचार कर रही थी।

अंत में एक ऐसी क्लासिक पंक्ति जो तालिबान के गुंडों को सही राह दिखाने के लिए काफ़ी है, बस वो ज़रा गौर फरमाएं:

"परदा नही जब कोई खुदा से, बन्दों से परदा करना क्या"
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कार्टून-बुनियादी सुविधा..

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कार्टून-अप्रैल फूल

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॥ चुप्पी ॥

सर्तक रहें
उनसे
जो बोलते हैं मुंह पर
बिना आगा-पीछा सोचे
फट से सच-सच

सतर्क रहें
उनसे भी
जो बोलते हैं मुंह देखकर
तौलकर,सोचकर
करके आगा-पीछा

लेकिन जो
नहीं बोलते हैं कुछ
रहते हैं चुप्पी साधे
सतर्क रहने की
कहीं अधिक जरूरत होती है
उनसे

चुप्पी
सदियों से सोए हुए
ज्वालामुखी की मानिंद है
फूटेगी जिस दिन
बचेगा नहीं कोई
लावे से उसके!
0 राजेश उत्‍साही
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श्री विष्णु प्रभाकर पर दिविक रमेश की बेबाक टिप्पणी

प्रिय मित्रों
महान् साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर पर दिविक रमेश की बेबाक टिप्पणी इस लिंक पर पढ़ने का कष्ट करें ।
http://divikramesh.blogspot.com/2009/04/blog-post.html
प्रेम जनमेजय
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कार्टून-ये आपके हितेषी हे इन्हें वोट दीजिये

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विष्‍णु प्रभाकर को श्रद्धांजलि : देह का सफर पूरा विचारों का जारी (अविनाश वाचस्‍पति)

देह का सफर पूरा
विचारों का जारी।

आवारा मसीहा के मसीहा
विष्‍णु प्रभाकर

की सिर्फ देह का
अंत हुआ है
विचार उनके
जीवित रहेंगे सदा सर्वदा।

आज से हम सब उन्‍हें
मन में महसूस पाएंगे
मानस में उनके विचारों की
ज्‍वाला धधकती पाएंगे
इसी तरह उन्‍हें याद
सदा करते नजर जाएंगे।

बी 151, महाराणा प्रताप एनक्‍लेव, रानी बाग,
दिल्‍ली से दोपहर 2 बजे उनकी देह,
जो उनकी नहीं थी,
(पर सभी समझते हैं कि देह अपनी होती है
इन नामसमझों में मैं भी शामिल हूं)
का अंतिम सफर शुरू होगा।

नुक्‍कड़ समूह (पाठक एवं लेखक)
अपने श्रद्धासुमन आदरणीय प्रभाकर जी को
समर्पित करता है इस भावना के साथ
कि परमपिता परमात्‍मा उनके विचारों को
मंथन के नित नए सोपान दे।

यह सूचना आशीष कुमार 'अंशु' (बतकही) के एस एम एस यानी संदू से मिली। कुछ माह पहले जब मित्र पवन चंदन (चौखट) के साथ श्री श्‍याम विमल (नोएडा) जी से उनके आवास पर मिलना हुआ था तब माननीय विमल जी ने उनसे हुई मुलाकात का जिक्र किया था।
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कार्टून-ज़मीन से जुडा व्यक्ति

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भीड़तंत्र - सुशील कुमार की कविता




न कोई कल्पवृक्ष

न कामधेनु

न सपने में कोई देवता
आएगा पृथ्वी का दुख हरने
दुखों के व्रण बस रिसते रहेंगे
मंदिरों के घंटे बजते रहेंगे
कठमुल्ला भी कलमा पढ़ते रहेंगे
न वेद न संविधान
अबलाओं की लुटती अस्मत बचाएँगे
न नेता न मंत्री न सरकारें
बचा पाएँगे हत्यारों से निरीह जनता
यह जनतंत्र भीड़तंत्र का रचाव मात्र होगा
जो सुबह की छाती पर
रोज़ उठेगा धधकता सूर्य सा
पर ढल जाएगा क्षितिज पर हर-सा।
जनता की उम्मीदें, विश्वास सब
प्रेत बन घुमेंगे दसों दिशायें
फिर भी किल्विष आत्माएँ ढूँढ लेंगी उन्हें
और पकड़ ले जाएँगी बूथों तक
जबरन वोट डालने।
सड़कों पर लामबंद होंगे लोग फिर
उबलेंगे नपुंसक विचारों की आँच में
चीखेंगे,चिल्लाएँगे
बिलखेंगे,बिलबिलाएँगे
और लौट जाएँगे अपने-अपने कुनबों में वापस
कुंद हो जाएँगी उनकी आवाज़ें
बुझी हुई, राख-सी।
गावों में धूल,
संसद में गुलदस्ते फिर देखे जाएँगे
न सच होंगे न सपने
सच की तरह सपने
सपनों से सच होंगे।
दूर से सब लगेंगे अपने,
हाँ, इस तंत्र का यही
ताना-बाना होगा।
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लखटकिया है तैयार जाम लगाने के लिए...........कहीं बीएसएनएल के सिम जैसा रेलमपेल तो नहीं


लखटकिया बुकिंग के लिए तैयार है ..............हम भी तैयार है भाई ......अरे गुरूवार तो आने दीजिये । टाटा की इस बुकिंग को देखते बीएसएनएल के सिम की मारामारी का दृश्य और लंबी कतार और धक्कामुक्की , रेलम पेल की याद आ जाती है । कई कई घंटे तक लाइन में लगे प्यास लगी होते हुए भी आराम से अपनी बारी का इंतजार करते हुए काउंटर को बंद होते देखते आंखों से आंसू ही न निकलते । अब क्या ऐसा कुछ तो फिर होने वाला है ऐसा लगता है । कार तो नयी है...............उत्साह भी नया है अब देखना होगा कब तक उछल कूद होती है । आज बीएसएनएल को लेने वाले परेशान है और टाटा को लेकर क्या होता है बस कुछ ही इंतजार बाकी रह गया है । हमारा तो नेटवर्क जाम है अब टाटा रास्ते भी जामकरेंगें कुछ ऐसा ही लग रहा । सिम से बात न होने का दुख है अब क्या कार क्या क्या रंग और दिन दिखायेगी , देखना अभी बाकी है । भीड कार की होगी , हम कार के अंदर होगे और सड़क पर कार होगी । हार्न की आवाज से कान पकेगा पर शान तो बरकरार रहेगी कि कार तो हैं ।
मोटर साइकिल गली में रहती है और कार कहां रहेगी ये पता नहीं । सड़क ही सबसे अच्छी होगी पार्किंग । चोरों के लिए अच्छा है आराम से पार करेंगें इधर से उधर कार को ।

कंपनी का कहना है कि कि नैनो के संभावित ख़रीददार 9 से 25 अप्रैल तक 300 रुपए अदा कर आवेदन पत्र ख़रीद कर कार बुक कर सकते हैं। प्रारंभिक मॉडल की बुकिंग 95 हज़ार रुपए देकर या फिर किसी बैंक से वित्तीय सहायता लेकर कर सकते हैं । नैनो के प्रारंभिक मॉडल के फ़ाइनेंस के लिए कनारा बैंक सबसे कम 2850 रुपए ले रहा है जबकि स्टेट बैंक 2999 में कार फ़ाइनेंस उपलब्ध करा रहा है ।





चित्र- गूगल से लिया गया
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बताएँ तुझे कि कैसे होता है बच्चा

"बताएँ तुझे कि कैसे होता है बच्चा"


***राजीव तनेजा***


बड़े दिन हो गए थे। खाली बैठे बैठे , कोई काम-धाम तो था नहीं, बस कभी-कभार कंप्यूटर खोला और थोडी-बहुत ' चैट-वैट ' ही कर ली। सच पूछो तो यार बेरोज़गार था मैं और इसमें अपनी सरकार का कोई दोष नहीं , दरअसल अपनी पूरी जेनरेशन ही ऐसी है। अब कोई छोटी-मोटी नोकरी तो हम करने से रहे। अब यार हर किसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे को घड़ी-घड़ी कौन सलाम बजाता फिरे ? कोई छोटा- मोटा धंधा करना तो अपने बस की बात नहीं। बाप-दादा जो थोडी-बहुत पूंजी छोड गए थे , वो भी आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने को आ रही थी। आखिर वह भी भला कब तक साथ देती ? बीवी के तानों का तो शुरू से ही मुझ पर कोई असर होता नहीं था। उसकी हर बात को मैं एक कान से सुनता और दूसरे से बाहर निकाल देता। कई बार तो कान में घुसने तक ही ना देता।
पहले नकदी खत्म हुई फिर , गहने-लत्तों का नंबर भी आ गया। एक-एक करके चीज़ें खत्म होती जा रही थीं लेकिन मेरी अकड़ ढीली होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक दिन मज़े से टीवी पर ' नो-एंट्री ' फिल्म देखते-देखते अचानक खुशी के मारे उछल पडा। इसलिए नहीं कि फिल्म अच्छी थी बल्कि...अपुन के भेजे मे आइडिया आ गया था नोट कमाने का। अरे नोट कमाने का क्या, वह तो नोट छापने का आइडिया था। जैसे ही बीवी को बताया कि एक आइडिया मिला है नोट छापने का तो वह गश खा कर गिरी और वहीं बेहोश हो गई।

होश मे आने के बाद बोली, " बस जेल जाने की कसर ही बाकी रह गई थी .... नोट छाप कर वह भी पूरी करने का इरादा है जनाब का? "
मेरी हंसी रोके ना रुकी। बोला, " अरी भागवान , नोट छापने का असली मतलब सचमुच में नोट छापना नहीं है। "
" तो फिर ?"
" देखा नहीं, फिल्म में उस ज्योतिषी को ?.... कितनी सफाई से सलमान से पैसे ऐंठ लेता है और अनिल कपूर बेवकूफ बनाता है। "
" तो क्या हुआ ?"
" अपुन का भी बस यही आइडिया है। "
" तुम्हारे पूरे खानदान में भी कोई ज्योतिषी हुआ है जो तुम बनोगे ?"
" है तो नहीं लेकिन हमारी आनेवाली नस्ल ज़रूर राज ज्योतिषी कहलाएगी। "
" पर ये सब करोगे कैसे ?"
" अरे कुछ खास नहीं, बस थोड़ा-बहुत त्याग तो मुझे करना ही होगा। "
" वह भला कैसे ?"
अरे ये हीरो-कट बाल छोड़ सीधे-सीधे लम्बे बाल रखूंगा। "
" उसमें तो नाई का खर्चा भी बचेगा, " बीवी चहक उठी ।
" कर दी ना तुमने दो कौड़ी वाली बात .... अरे मैं लाखों में खेलने की सोच रहा हूं और तुम इन छोटी-छोटी बातों पर नज़र गड़ाए बैठी हो। "
" लेकिन आता-जाता तो कुछ है नहीं, खाली वेष बदलने से क्या होगा ?" बीवी फिर बोल पड़ी।
" अरे यार, पहले पूरी प्लानिंग तो सुन ले। "
" जी बताऒ, " बीवी आतुर नज़रों से मेरी तरफ ताकते हुए बोली।
" हां, तो मैं त्याग करने की बात कह रहा था। तो दूसरा त्याग यह करना पडेगा कि....ये गोविंदा-छाप कपड़े छोड़ धोती-कुरता पहनना पड़ेगा। "
" वह तो शादी का पड़ा-पड़ा अभी तक सड़ रहा है अलमारी में, " बीवी चहकते हुए फिर बोल पड़ी।
" चलो, यह काम तो आसान हुआ. अब कोने वाले कबाड़ी की दुकान से रद्दी छांटनी पड़ेगी। "
" आय-हाय। अब क्या रद्दी भी बेचोगे ?"
" जब पता नहीं होता , तो बीच में चोंच मत लड़ाया कर, " मैं आँखे तरेरता हुआ बोला, " बेवकूफ, पुराने अखबारों में जो भविष्यफल आता है, उसकी कतरनों को सम्भालकर रखूंगा, वक्त-बेवक्त काम आएंगी और अगर एस्ट्रॉलजी से रिलेटेड कोई किताब मिल गई तो... पौ-बारह समझो। "
" पौ-बारह मतलब ?"
" अरे बेवकूफ, पौ-बारह मतलब लॉटरी लग गई समझो। "
" लेकिन यह जन्तर-मन्तर कहां से सीखोगे भला ?"
" कोई खास मुश्किल नहीं है यह सब भी , बस...बल्ली सागू या फिर बाबा सहगल के किसी भी रैप सॉन्ग को कुछ इस अन्दाज़ से तेज़ी से होंठो ही होंठो मे बुदबुदाना होगा कि किसी के पल्ले कुछ ना पडे। बस हो गया.... ' जन्तर-मन्तर काली कलन्तर... "
" ऒह समझ गई.... समझ गई। "

बस फिर क्या था मोटी कमाई के चक्कर में बीवी के बटुए का मुंह खुल चुका था। ज़रूरी सामान इकट्ठा करने के बहाने पैसे ले मैं चल पड़ा बाज़ार। पहले ठेके से दारू की बोतल खरीदी और फिर जा पहुंचा बाज़ू वाले कबाड़ी की दुकान पर। एक-दो पेग मरवाए उसे और अपने मतलब की रद्दी छांट लाया।
अब दिन-रात एक करके हम मियां-बीवी उन कतरनो का एक-एक अक्षर चाट गए और इस नतीजे पर पहुंचे कि " पूरी दुनिया में इससे आसान काम तो कोई हो ही नहीं सकता। " अब आप पूछोगे कि , " वो भला कैसे ?"
तो ये मैं आपको क्यों बताऊं ? और अपने पैर पर ख़ुद ही कुलहाड़ी मार लूं ? कहीं मुझसे ही कॉम्पिटीशन करने का इरादा तो नहीं है आपका ?
क्या कहा ?.... चिंता ना करूँ ?
तो सुन लीजिए...कुछ ख़ास मुश्किल नहीं है यह सब.... बस सिम्पल-सी कुछ बातें गांठ बांध लो कि... " हर बंदा अपने को अच्छा और बाक़ी सबको बुरा समझता है। "
हर-एक को यही लगता है कि वह सही है और बाक़ी सब ग़लत, कोई उसे सही ढंग से समझ ही नहीं पाया आज तक, वह अपनी तरफ़ से कड़ी मेहनत करता है लेकिन उसका पूरा फल नहीं मिलता, सबके सब उसकी कामयाबी से जलते हैं, कोई उसका भला नहीं चाहता ... दोस्त-यार ... रिश्तेदार .. भाई-बहन ... पड़ोसी ... सब के सब मतलबी हैं ... कोई उसकी ख़ुशी से ख़ुश नहीं हैं...वह सब पर तरस ख़ाता है, लेकिन कोई उस पर नहीं खाता ... किसी ने उस पर कोई जादू-टोना किया हुआ है ... या फ़िर उसकी दुकान या मकान बांध दिया है...
बस कुछ सामने वाले का चौख़टा देख कर अंदाज़ा लगाओ कि उस पर कौन-कौन से डायलॉग फ़िट बैठेंगे। बस चौखटा देखो और मार दो हथौड़ा। अगर तीर सही निशाने पर लगा तो समझो कि अपनी तो निकल पड़ी।
" और अगर निशाना ग़लत लगा तो ?"
फिकर नॉट... घुमा-फिरा कर 2-4 डायलॉग और मार दो बस... " कोई ना कोई तो अटकेगा ज़रूर। और हाँ... अगर ऊं चे लेवल का गेम खेलना है, तो दो-चार चेले-चपाटे भी साथ रख लो, एकाध चेली हो तो कहना ही क्या। अगर कोई ना मिले तो चौक से ही दिहाड़ी पर पकड़ लाओ।
बड़े बे-रोज़गार हैं , कोई ना कोई अपने मतलब का मिल ही जाएगा पर इतना ज़रूर ध्यान रखना कि....चेला रखना है गुरु नहीं ... । कहीं अगले दिन ही वह तुम्हारे सामने तेल की शीशी और चटाई लिए बैठा तुम्हारा ही बंटाधार करता न मिला। चौक पर बिकने वाला तोता अगर मिल जाए, तो धंधे में और रौनक आ जाएगी।
बस तोते को भूखा रखना है और... भविष्य की पर्चियों पर अनाज का दाना चिपका देना है। पंछी बेचारा तो भूख के मारे अनाज के दाने वाली पर्ची उठाएगा और बकरा बेचारा बस यही समझेगा कि मिट्ठू महाराज ने उसका नसीब बांच दिया है।
" और उस पर्ची के अंदर लिखा क्या होगा ?" बीवी बोल पड़ी।
" हे भागवान, पूरी रामायण खत्म होने को आई और यह पूछ रही है कि ... सीता , राम की कौन थी ?"
" अरी भागवान, अभी ऊपर सारे मंतर तो बताता आया हूँ...कोई ना कोई तो फ़िट बैठेगा ज़रूर।"
" हुं! " बीवी की समझ मैं बात आ चुकी थी।

सो एक दिन ऊपरवाले का नाम लिया और जा पहुंचा बीच बाज़ार और बरगद के पेड़ के नीचे डेरा जमाया। " कोई न कोई कोई असामी रोज़ टकराने लगी। किसी को कुछ , तो किसी को कुछ इलाज बताता उसकी हर तक़लीफ़ या बीमारी का। एक से तो मैने एक ही झटके में पूरे बारह हज़ार ठग डाले थे। बड़ी आई थी मज़े से कि " महाराज बच्चा नहीं होता है , कोई उपाय बताओ। "
मैंने सोचा, अरे नहीं होता है तो कुछ ' ओवर-टाइम ' लगाओ , ' माल-शाल खाओ और अगर फिर भी बात नहीं बने तो किसी डॉक्टर-शॉक्टर के पास जाओ। यह क्या कि सीधे मुंह उठाया और ज्योतिषी के पास चली आई। अब यार, अपने घर की ड्यूटी तो बजाई नहीं जाती अपुन से, ओवरटाइम कौन कंबख्त करता फिरे ? लेकिन धंधा तो धंधा है सो , उस बेचारी को कुछ उलटी-पुलटी चीज़ें बताई लाने के लिए जैसे ' काली शेरनी का दूध... जंगली भैंसे का सींग ... शुतुर्मुर्ग का कलेजा और न जाने क्या-क्या...
मुंह उतर आया उस बेचारी का कि मैं अबला नारी... " कहाँ से लाऊंगी ये सब ?"
मैंने कहा, " आप चिंता ना करें। परसों मेरा शागिर्द नेपाल से आनेवाला है, उसको फ़ोन किए देता हूँ , वही सब इंतज़ाम कर देगा। " उसने हामी भर दी।
और चारा भी क्या था उसके पास ?
नकद गिन के पूरे बारह हज़ार धरवा लिए मैने। फिर जाने दिया उसे।
मोटी-कमाई हो चुकी थी, सो मैने अपना झुल्ली बिस्तरा संभाला और चल पड़ा घर की ओर।
रास्ते में विलायती की पेटी ले जाना नहीं भूला।

ख़ुश बहुत था मैं, बस पीता गया, पीता गया। कुछ होश नहीं कि कितनी पी और कितनी नहीं पी। होश आया तो बीवी ने बताया , " पूरे तीन दिन तक टुल्ली थे आप। ख़ूब उठाने की कोशिश की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं। "
" तो क्या पूरे तीन दिन दुकान बन्द रही ?"
" और नहीं तो क्या ?"
मैं झट से खड़ा हुआ और भाग लिया सीधा दुकान की ओर। पूरे रास्ते यही सोचे जा रहा था कि तीन दिन में पता नहीं कितने का नुक़सान हो गया होगा ?
कई बार तो पता नहीं कैसे मेरा तुक्का सही लगने लगा था और किसी-किसी को थोड़ा-बहुत फ़ायदा भी होने लगा लेकिन 8-10 बार शिकायत भी आई कि " महाराज आपकी तरकीब तो काम न आई, कोई और जुगाड बताओ। " ऐसे बकरों का तो मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता था। एक ही पार्टी को 2-2 दफा शैंटी-फ्लैट करने का मज़ा ही कुछ और है। उसके द्वारा किए गये इलाज में कोई न कोई कमी ज़रूर निकलता और नये सिरे से बकरा हलाल होने को तैयार। पुरानी कहावत भी तो है कि " खरबूजा चाहे छुरी पर गिरे या फ़िर छुरी खरबूजे पर , कटना तो खरबूजे को ही पड़ता है।

अपुन का कॉन्फिडेंस ' टॉप-ओ-टॉप बढता ही जा रहा था कि एक दिन एक ' जाट-मोलढ ' टकरा गया ....
पूरी कहानी सुनने के बाद मैंने उससे , उसकी परेशानी का इलाज बताने के नाम पर 2 हज़ार माँग लिए। जाट सौदेबाज़ी पर उतर आया। आख़िर में सौदा 450 रुपये में पटा। उसने धोती ढीली करते हुए जो नोट निकाले, तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। नज़र धोती में बंधी नोटों की गड्डी पर जा अटकी, लेकिन अब क्या फ़ायदा, जब चिड़िया चुग गयी खेत। मैं तो यही सोचे बैठा था कि बेचारा ग़रीब मानुस है, इसे तो कम से कम बख्श ही दूं। आख़िर ऊपर जाने के बाद वहां भी तो हिसाब देना पड़ेगा। लेकिन यह बांगड़ू तो मोटी आसामी निकला। यहीं तो मार खा गया इंडिया।

साढ़े चार सौ जेब के हवाले करते हुए मुंह से बस यही निकला, " ताऊ काम तो करवा रहे हो पूरे ढाई-हज़ार का और नोट दिखा रहे हो टट्टू ।"
" बेटा टट्टू तो तुमने अभी देखा ही कहाँ है ?"
" वो तो अब मैं तुम्हें दिखाऊंगा, " कहते हुए उसने किसी को इशारा किया और तुरंत ही मेरे चारों तरफ़ पुलिस ही पुलिस थी। " साले! पब्लिक का फुद्दू खींचता है। अब बताएंगे तुझे...चल थाने। बड़ी शिकायतें मिली हैं तेरे खिलाफ़। साले! वो S.H.O साहेब की मैडम थीं, जिससे तूने बारह हज़ार ठगे थे । चल अब हम तुझे बताते हैं कि बच्चा कैसे होता है।
राजीव तनेजा
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नुक्‍कड़ की अप्रैल - पोस्‍ट की चर्चा दैनिक भास्‍कर के ब्‍लॉगर्स पार्क में (अविनाश वाचस्‍पति)

शहरों में पार्क तो हैं
पर पार्किंग
समस्‍या है
क्‍योंकि पार्क में
पार्किंग है वर्जित।

ब्‍लॉगर्स लूट सकते हैं
पार्क में पार्किंग का
असीम सुख
जो नुक्‍कड़ ने लूटा है
दैनिक भास्‍कर के
ब्‍लॉगर्स पार्क में।

इस पार्क में
ब्‍लॉग पार्क होते हैं
विचरण भी करते हैं
इस पार्किंग पर
नहीं लगता है
कोई शुल्‍क।

वाहन पार्किंग से
हट जाए अगर
पार्किंग शुल्‍क
अच्‍छा हो जाए
साड्डा मुल्‍क।

अपनी टिप्‍पणी का खर्चा
मत बचाएं यहां पर तो
अपनी टिप्‍पणी बेदर्दी से
खूब जीभर के लुटाएं
ब्‍लॉगवाणी पर पसंद
नापसंद होने पर भी
चटकाएं और एक बार
अप्रैल फूल मनाने का
आनंद फिर लूट ले जाएं।
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कार्टून-जलसंकट में आशीर्वाद.....

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कार्टून-दौरा

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मीडिया सर्वे : राजनीतिक पत्रकारिता पर खास सर्वे


मीडिया सर्वे : राजनीतिक पत्रकारिता पर खास सर्वे
मीडिया पर केंद्रित हिन्दी की मासिक पत्रिका मीडिया मंत्र अपने वेब पार्टनर मीडिया ख़बर.कॉम के साथ मिलकर राजनीतिक पत्रकारिता पर केंद्रित एक सर्वे करवा रहा है. कृपया आप भी इस सर्वे में भाग लें और वोट करें. वोट करने की प्रक्रिया बेहद आसान है और बमुश्किल इसमें एक मिनट का समय लगेगा. अपना अमूल्य समय देने के लिए धन्यवाद. वोट करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें. http://www.esurveyspro.com/Survey.aspx?id=551736d4-b678-4a8d-9143-2d5754bc1c05

यदि कोई समस्या आती है तो आप मीडिया ख़बर.कॉम (http://mediakhabar.com/) के वेबसाइट पर जाकर अपना वोट डाल सकते हैं। यदि फिर भी कोई समस्या हो तो हमें मेल करें. आप हमसे 09999177575 पर संपर्क भी कर सकते हैं. इसके पहले मीडिया मंत्र और मीडिया ख़बर.कॉम ने मुंबई में हुई आतंकवादी घटनाओं के सीधे प्रसारण के औचित्य और समाचार चैनलों में काम करने वाली महिलाओं को केंद्र में रखकर एक सर्वे करवाया था जो बेहद सफल रहा. पूर्व में हुए सर्वे के विस्तृत परिणाम को आप मीडिया खबर.कॉम पर जाकर देख सकते है.


@ राजनीतिक पत्रकारिता पर आपके विचारों का भी स्वागत है।

*कृपया इस लिंक को अपने और पत्रकार मित्रों तक फॉरवर्ड करें और सर्वे को आधिक- से -अधिक सफल और व्यापक बनाने में सहयोग करें।
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ये हुई न न्याय की जीत!

इन दिनों कुछ अहम् मुद्दों पर न्याय से सम्बंधित विभिन्न पहलू देखने को मिले। सबसे पहले तो मैं पूरे भारतवर्ष को मुबारकबाद देना चाहूंगी की संजय दत्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली। ज़रा सोचिये, वह व्यक्ति जिस पर १९९३ के जघन्य काण्ड को अंजाम देने वाले गुंडों से बातचीत व हथियारों की खरीद फरोख्त का आरोप हो, उसकी हिम्मत भी कैसे हुई की वह स्वयं को निर्दोष साबित होने से पहले ही चल पडा उसी देश का प्रतिनिधि बनने! क्या हमारे देश की राजनीति इतनी गिर गई है की एक फ़िल्म में गांधीगिरी का अभिनय करने मात्र से आप चुनाव में स्वयं को गांधीजी का चेला बता दे, क्या जनता को अभिनय व वास्तविकता में फर्क नज़र नहीं आता?
दूसरी तरफ़ वरुण गाँधी यह भूल जाते हैं की भारतवर्ष का धर्म भारतीयता है व धर्मग्रन्थ संविधान है, जिसमें हर उस व्यक्ति के लिए जगह है जो स्वयं को पहले भारतीय व बाद में किसी धर्म का अनुयायी मानता हो। ऐसे धर्म व ऐसे धर्मग्रन्थ की अवहेलना करने की उन्हें उचित सज़ा मिल रही है।
एक अन्य बात देखने को मिली की अजमल कसब को वकील दिलवाने में कई लोगों को आपत्ति हो रही थी। अभी जो उसकी वकालत करेंगी उनकी सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है। समझ में नही आता की जनता को क़ानून हाथ में लेने का इतना भी क्या शौक है। जब हर चीज के लिए हमारे संविधान में एक तरीका बताया गया है तो उसका पालन करने का विरोध क्यों? किस बात का डर है हमें, की अजमल बच जायेगा? कैसे बच सकता है वह जिसके अपराध की गवाही देने पूरा मुंबई उमड़ सकता है। फ़िर इतना अधीर क्यों बनें, क्यों न पड़ोसी देश को कुछ अच्छी बातें सिखाएं, न की उनके जंगलराज का अनुसरण करें। हमें अपने संविधान पर गर्व होना चाहिए जो धर्म व समुदाय से सर्वोपरि है व अनेकता में एकता का सूत्रधार है। यदि हम उदाहरण पेश न करेंगे तो लोग सीखेंगे कैसे?
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संजय दत्त की ’अमर’ सियासत

बाज़ारवाद और भ्रष्टाचार के कारण अब नेता और अभिनेता के बीच का फ़र्क धीरे - धीरे खत्म होता जा रहा है । रुपहले पर्दे पर ग्लैमर का जलवा बिखेरने वाले अभिनेताओं को अब सियासी गलियारों की चमक-दमक लुभाने लगी है । गठबंधन की राजनीतिक मजबूरियों में अमरसिंह जैसे सत्ता के दलालों की सक्रियता बढ़ा दी है । हीरो-हिरोइनों से घिरे रहने के शौकीन अमरसिंह कब राजनीति करते हैं और कब सधी हुई अदाकारी ,समझ पाना बेहद मुश्किल है । "राजनीतिक अड़ीबाज़" के तौर पर ख्याति पाने वाले अमर सिंह के कारण सियासत और फ़िल्मी दुनिया का घालमेल हो गया है ।

जनसभाओं में लोग देश के हालात और आम जनता से जुड़े मुद्दों पर धारदार तकरीर सुनने के लिये जमा होते हैं , मगर अब चुनावी सभाओं में नेताओं के नारे और वायदों की बजाय बसंती और मुन्ना भाई के डायलॉग की गूँज तेज हो चली है । रोड शो में नेता को फ़ूलमाला पहनाने के लिये बढ़ने वाले हाथों की तादाद कम और अपने मनपसंद अदाकार की एक झलक पाने ,उन्हें छू कर देखने की बेताबी बढ़ती जा रही है । युवाओं की भीड़ जुटाने के लिये सियासी पार्टियाँ फ़िल्मी कलाकारों का साथ पाने की होड़ में लगी रहती हैं ।

समाजवादी पार्टी संजय दत्त की "मुन्ना भाई" वाली छबि को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती । सुप्रीम कोर्ट से चुनाव लड़ने की इजाज़त नहीं मिलने पर संजय दत्त को पार्टी का महासचिव बना दिया गया है । पर्दे पर दूसरे के लिखे डायलॉग की बेहतर अंदाज़ में अदायगी करके वाहवाही बटोरने वाले "मुन्ना भाई" के टीवी इंटरव्यू तो खूब हो रहे हैं ।

मज़े की बात ये है कि हर साक्षात्कार में अमर सिंह साये के तरह साथ ही चिपके रहते हैं और तो और संजय को मुँह भी नहीं खोलने देते । उनसे पूछे गये हर सवाल का उत्तर "अमरवाणी" के ज़रिये ही आता है । शायद कठपुतली की हैसियत भी इससे बेहतर ही होती है , कम से कम वो अपने ओंठ तो हिला सकती है । लगता है यहाँ भी मुन्ना भाई के पर्चे अमरसिंह ही हल कर रहे हैं ,बिल्कुल "मुन्ना भाई एमबीबीएस" फ़िल्म की तरह ही ।

सुनील दत्त ने राजनीति में रहकर समाज सेवा का रास्ता चुना । नर्गिस दत्त ने भी राज्यसभा सदस्य रहते हुए राजनीति की गरिमा बढ़ाई । प्रिया ने भी अपने माता-पिता की सामाजिक और राजनीतिक हैसियत की प्रतिष्ठा कायम रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।

संजय दत्त के मामले में यह कहानी उलट जाती है । बचपन से ले कर अब तक का उनका जीवन सफ़र बताता है कि वे आसानी से किसी के भी बहकावे में उलझ जाते हैं । इसी उलझाव ने इस "सितारा संतान" की आसान ज़िन्दगी को काँटो भरी राह में बदल दिया । मान्यता से विवाह के फ़ैसले की जल्दबाज़ी के बाद अमर सिंह जैसे दोस्तों का साथ उनका एक और आत्मघाती कदम साबित हो सकता है ।

संजय दत्त कानून मंत्री हँसराज भारद्वाज का स्टिंग ऑपरेशन करने वाले होते ही कौन हैं । पत्रकारों द्वारा किये गये स्टिंग ऑपरेशन भी जब कानून के नज़्रिये से सही नहीं माना जा सकता । ऎसे में एक सज़ायाफ़्ता मुजरिम को ये हक किसने दिया ? क्या यह राजनीतिक ब्लैक मेलिंग के दर्ज़े में नहीं आता ?

संजय दत्त इसी तरह दूसरों की ज़बान बोलते रहे ,तो जल्दी ही किसी बड़ी मुसीबत को घर बैठे निमंत्रण दे देंगे । अमर सिंह की मेहरबानी से दोनों बहनों के साथ उनके रिश्तों में इतनी खटास आ चुकी है कि अब की बार उनकी ढ़ाल बनने के लिये शायद ही कोई रिश्ता मौजूद रहे । मुसीबत के समय साया भी साथ छोड़ देता है , देखना होगा क्या तब भी मान्यता और अमर सिंह साये की तरह साथ रहेंगे .....?
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हिंदी चिट्ठाकार /साहित्‍यकार 4 अप्रैल को दिल्‍ली में मिलें मौका है पुस्‍तक पूजन का


अपने रचना समय में से
समय निकालिये
और पहुंचिये

रचना समय और राजेन्‍द्र प्रसाद अकादमी के
पुस्‍तक विमोचन (पूजन) समारोह में
तेजेन्‍द्र शर्मा ने रचना में जो समय लगाया है
उस वक्‍त के आईने में (पुस्‍तक) झांकने का मौका है
जब उसे आंकेंगे अजय नावरिया
और सूत्रधार होंगे वरिष्‍ठ पत्रकार अजित राय

यहां पर आपकी मुलाकात
पुस्‍तक से तो होगी ही
पुस्‍तक के संपादक हरि भटनागर
और तेजेन्‍द्र शर्मा और उनके लेखन को
चाहने वालों से भी होगी
मैं तो मिलूंगा ही वहां
यह सब हो रहा है जहां
निराला ही होगा वहां समां
आप भी अवश्‍य आयें मेहरबां।

तो भूल जायें तब भी आईयेगा
अपने भूलने को असफल बनाईयेगा

ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा
दिल्‍ली और एनसीआर वाले
छूट का लाभ उठाने का मौका न गंवाएं

बाहर वाले संभव न हों तो
टिप्‍पणी में संदेश भिजवायें

विमोचन में जिनके हाथ गीले होने हैं
वे हैं अपने अपने क्षेत्र के कुख्‍यात
विख्‍यात लेखिका कृष्‍णा सोबती
प्रख्‍यात समीक्षक डॉ. नामवर सिंह
राजेन्‍द्र यादव प्रख्‍यात लेखक और संपादक

राजेन्‍द्र प्रसाद भवन सभागार में दिनांक 4 अप्रैल 2009 को
210, दीनदयाल उपाध्‍याय मार्ग, आई टी ओ के समीप
, नई दिल्‍ली 110002
जलपान 5.30 बजे सांय पुस्‍तक विमोचन 6.15 बजे सांय

Welcome address:
Mr. Anil Mishra (Vice Chair – Maithlee-Bhojpuri Academy, Delhi.)

Keynote Address
Dr. Ajay Navaria

Moderator: Ajit Rai (Senior journalist).

Bimal Prasad Brij Narain Sharma.
Hony. Director RPA Editor – Rachna Samay
23239550

RSVP
Ajit Rai: 9818558871 / 9868098818
Hari Bhatnagar: 09424418567
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ब्लॉगिंग करने पर ब्लॉगरों पर टैक्स लगेगा ? अब सर पर बैठेगी कार

ब्लॉगिंग करना जुर्म तो नहीं होने वाला परन्तु तेजी से इसकी लोकप्रियता के मद्देनजर इसे टैक्स के दायरे में लाने का सरकार ने मन बना लिया है। पर कर का यह कहर सिर्फ हिन्दी ब्लॉगिंग पर ही क्यों, जबकि हिन्दी ब्लॉगिंग तो अभी अपने बचपन में ही है और इससे आय होना भी आरंभ नहीं हुई है।

पता चला है कि सरकार, जिसके जितने ब्लॉग उससे उसी के अनुसार कर लिया जाएगा, की पद्धति के तहत कर वसूलने की तैयारी कर रही है। सरकार को लगता है कि देश को आर्थिक मंदी की मार से बाहर निकालने के लिए यह एक कारगर कदम हो सकता है। इसे लागू करने के लिए सरकार चुनाव के समय दी जाने वाली रियायतों से भी दूर रखेगी क्योंकि ऐसे मामले आचार संहिता के दायरे में बहुत जल्दी आते हैं। यह तो वैसे भी देशहित से जुड़ा हुआ मसला है।

सरकार हिन्दी प्रेमी ब्लॉगरों से ईमानदारी की उम्मीद करती है। उसका मानना है कि जो हिन्दी से सच्चे। मन से प्रेम करता है। हिन्‍दी के लिए तन और धन न्‍यौछावर करने वाला हिन्‍दी सेवी है। वो अपने हिन्दी प्रेम की मिसाल ब्लॉगिंग पर कर चुका कर दे सकता है। ब्लॉगर्स को असुविधा न हो इसके लिए सरकार एक ऑनलाईन खाता शुरू कर रही है।

यह कानून वित्तीय वर्ष 2009-2010 में प्रभावी हो जाएगा। इसके तहत ब्लॉग की लोकप्रियता और प्राप्त टिप्पणियों के अनुसार कर देय होगा। मतलब साफ है कि जिसके जितने अधिक ब्लॉग और जितनी अधिक लोकप्रियता होगी तथा जिस पोस्ट अथवा ब्लॉग पर अधिकाधिक टिप्पणियां पाई जाएंगी, उन्हें उसी हिसाब से अधिक राशि का भुगतान करना होगा।

जिस ब्लाग के जितने अधिक फालोअर्स होंगे, उससे उसी हिसाब से अधिक टैक्स वसूल किया जाएगा क्योंकि यही उनकी लोकप्रियता का पैमाना होता है। वो बात दीगर है कि जो जितने अधिक ब्लागों का फालाओर होगा उसे टैक्स देयता में छूट मिलेगी। परन्तु अधिक टिप्पणी करने वाले ब्लॉ्गरों को इस छूट का लाभ नहीं मिल सकेगा।

ब्लॉगवाणी/चिट्ठाजगत इत्यादि एग्रीगरेटर्स पर पसंद पर क्लिक करने वाले ब्लॉगर्स को प्रति क्लिक के हिसाब से सरकार द्वारा भुगतान भी किया जाएगा। इस नीति का जिन ब्लॉगरों ने स्वालगत किया है वे सभी अंग्रेजी के हैं। परन्तु फंडा यह है कि जिस ब्लॉग की अधिक पसंद क्लिक होंगी उनसे सरकार को टैक्स भी तो अधिक मिलेगा। अब तक अपनी पोस्ट‍ पर ब्लॉगरों द्वारा पसंद चटकाने और टिप्पणी की मांग में मंदी आने की संभावना है। बल्कि टैक्स से बचने के लिए ब्लॉंगर्स एग्रीगरेटर्स की सुविधाएं न लेने पर भी विचार करने लगें और टिप्पणी की सुविधा ही रोक दें तो क्या आश्चर्य ? और अपनी पोस्ट की सूचना ई मेल के जरिए ही देने लगें और टिप्पणियां भी ई मेल पर ही मंगवाएं। जिससे टैक्स से बचाव हो सके।

जो ब्लॉग सिर्फ कविता को समर्पित होंगे अथवा जो ब्लॉंगर अपनी टिप्पणियां कविता में देते हैं उन्हें इस टैक्स से‍ निजात मिल सकेगी। इससे इंटरनेट पर हिन्दी कविता का भविष्य स्वर्णिम होने की आशा जगी है। आपकी इस संबंध में क्या राय है और आप इस करदेयता के पक्ष में हैं तो क्यों और अगर नहीं हैं तो भी क्यों ? अपनी राय जाहिर करें।

विदेश में रहकर हिंदी ब्लॉगिंग में जुटे ब्लॉगर प्रसन्न न हों। वे भी भारतीय हिंदी ब्लॉगरों की भांति सन्न हों।
प्रिंट मीडिया के धुरंधरों ने सरकार के इस कदम का सहर्ष स्वागत किया है और प्रिंट मीडिया के दोबारा से फलने फूलने की आशा व्यक्त की है। यही स्थिति चैनलों की भी है। चैनलों की घटती साख और टी आर पी में भी सरकार के इस असरकारी कदम से तेजी आने की उम्मीद की जा रही है।

मेरा भी यह निवेदन है कि जब तक पसंद का कीड़ा टैक्स से बाहर है, आप उसे अपने माउस से हिट कर सकते हैं और कीबोर्ड का प्रयोग करके टिप्पणियों की गति बढ़ा सकते हैं। कल के बारे में कौन जाने ?
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कार्टून-जन संपर्क...

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