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हुल-दिवस पर विशेष - सुशील कुमार

आज झारखंड में हुल - दिवस मनाया जा रहा है। हुल दिवस यानी तीस जून, और इस अवसर पर हर साल की भाँति इस बार भी झारखंड में सरकारी अवकाश भी घोषित किया गया है। आज ही के दिन यानी 30 जून, 1855 को संथाल-परगना (झारखंड) के भोगनाडीह की धरती पर अमर शहीद सिदो-कान्हु ने शोषण और अत्याचार के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की थी जिसे प्रसिद्ध संथाल -विद्रोह के नाम से इतिहास जानता है। पर विडंबना तो देखिये, झारखंड के बिहार से अलग हुये आठ साल से उपर बीत गये हैं पर कुछ नहीं बदला। सब जस का तस है और सब जगह यहां लूट का बाज़ार गर्म है। आम जनता आज भी सुविधाओं के आभाव में जी रहा है और त्रस्त है। आज झारखंड में जिस सिदो-कान्हु की आज लोग गाथा गायेंगे, उसीकी पांचवी पीढ़ी की संताने इलाज के अभाव भूखमरी से बीमार हो में दुनिया से चल बसे। पर झारखंडी नेताओं की घोषणा और दंभ देखिये,उनकी नज़र में सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा है।

इस अवसर पर हिन्द-युग्म ने वीर गति प्राप्त सिदो-कान्हु को याद करते हुये मेरी एक कविता लगायी है जिसे नुक्कड़ के सुधी पाठक नीचे इस लिंक को चटका कर पढ़ सकते हैं -
हिन्द-युग्म पर सुशील कुमार की कविता
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कार्टून-नाचो रे ...पानी आया ...

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“निकाल इसी बात पै सौ का नोट”

***राजीव तनेजा***

Corrupt_Traffic_Cop_Cartoon

“रुक...अबे रुक"....

"ज्जी...मैँ?"....

"ओर तेरा फूफ्फा?".…

"जी...बोलिए"...

"बेट्टे!....बोलूँगा तो मैँ जरूर और सुणेगा बी तू जरूर"अपनी मूँछों को ताव दे बैरियर पे खड़ा सिपाही बोला

"हाँ जी!...बोलिए"...

"के बात?....तैन्ने दीखया कोणी यो गज भर लाम्बा... ठाढा सा(तगड़ा) पूरे अढाई किलो का हाथ?"...

"ज्जी....शायद!...म्रेरा ध्यान दूसरी तरफ था"...

"वोई तो...निकाल इसी बात पै सौ का नोट"...

"सौ का नोट?...वो किसलिए?"....

"वो इसलिए मेरे फूफ्फा...के मन्ने आज घर पै बाहमण(ब्राहमण) जीमाणे सैं"....

"तो?"...

"अरे मेरे ताऊ!....मैन्ने घण्णी कुफात(मेहनत) कर  के तैन्ने रुकवाया सै के नई?"...

"जी...रुकवाया तो है"...

"तो हरजाणा कोण भरेगा?.....मैँ के तू?"...

"जी मैँ"...

"तो निकाल इसी बात पे सौ का नोट"...

"लेकिन सर!...ना तो मैँने लाल बत्ती जम्प की है और ना ही मैँ बिना ड्राईविंग लाईसैंस के गाड़ी चला रहा हूँ और हैलमेट भी मैँने 'आई.एस.आई' मार्का वाला पहना हुआ है"...

"ओ बेट्टे!...तैन्ने तो म्हारे दुश्मण देश का टोप्पा पहण्या सै"...

"ईब्ब तो बेट्टे...तू गया काम से"...

"तू जाणता कोणी....म्हारे साब जी घण्णे सख्त किस्म के इनसान सैं.....देशद्रोहियाँ ने तो वो कति ना बक्शें...किसी भी कीमत पे छोड़ें कोणी"...

"ओर आज...आज तो साब जी वैसे भी  घण्णे गुस्से में सैं"......

"क्या बात?....बीवी ने कहीं.......

"स्साले!...म्हारे साब जी का मजाक उड़ावे सै?"....

"ईब्ब तो बेट्टे...तेरी खैर कोणी"....

"सुसरे!...म्हारे साब जी की दुखती रग पे हाथ रखै सै.....ईब्ब तो बेट्टे तैने तेरा बाप बी कोणी  बचा सके"...

"लगा अपनी फटफटी ने सैड पे ओर अपणे इस 'आई.एस.आई' के  टोप्पे ने तार के छांह मे आ ज्या"सिपाही गुस्से से चिल्लाता हुआ बोला...

"तेरा रिमांड तो बेट्टे!...ईब्ब साहब जी आप ही लेवेंगे"...

"साब जी!...इस लौण्डे ने आप ही सूधा(सीधा) करो...घण्णा कानून झाड़ रिया सै और म्हारे लाख मणा करणे के बावजूद आपके फैमिली मैटर को सरेआम पब्लिक में उछालण की कोशिश कर रिया सै"....

"कामयाब तो कोणी होया ना?"...

"म्हारे होते हुए कोई ओर क्यूँकर कामयाब हो जावेगा?"...

"के बके सै?"..

"सॉरी जनाब!...गलती से मुँह से निकल गया"...

"हम्म!...

"क्यों बे?....कित्त का सै तू?"उसे इग्नोर कर काँस्टेबल मुझे घूरता हुआ बोला...

"जी....शालीमार बाग का"....

"के बात?....घणा एण्डी बणे सै?"...

"ना जी"...

"सुण!...इस सुसरे ने अड़े छोड़ ओर तू एक काम कर"सिपाही की तरफ मुखातिब होते हुए काँस्टेबल बोला....

"जी....जी जनाब"...

"तू उस ट्राले वाल्ले से सुलट के आ....सुसरा!...बिना एंट्री दिए ही खिसकण के चक्कर में दीख रैया सै मन्ने"...

"जा!...तब तक मैँ इस सुसरे के पेंच ढील्ले करता हूँ"...

"जी जनाब"...

"ओर सर जी...हैलमेट भी पाकिस्तानियों का पहणेया सै पट्ठे ने"सिपाही काँस्टेबल के कान में फुसफुसाता हुआ बोला....

"हम्म..."काँस्टेबल ने मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारा और बोला...."नाम बता"...

"ज्जी...र...र..रा..

"ओए...ये र....र...रा कर के मन्ने रागणी(हरियाणवी लोक गीत) ना सुणा ओर सीधी तरिया अपणा नाम बता"कान खुजाते हुए काँस्टेबल बोला ...

"जी...रा....राजी...

"राजी तो बेट्टे तन्ने मैँ करूँगा जब तेरे घर पै...रेड मारण तांई पूरी फोर्स भेजूँगा"....

"सूधी तरियाँ क्लीयर कट अपणा पूरा नाम बता....

"जी...राजीव"...

"जी राजीव?....के बात?...थारे में 'जी' पहले लगावें हैँ ओर 'नाम' बाद में?"...

"ना जी...नाम पहले ओर जी बाद में"....

"तो इसका मतबल्ल तेरा नाम राजीव है"....

जी"...

"ओ.के...ईब्ब अच्छे बच्चों की तरिया यो बी साफ-साफ बता दे कि तू किसके लिए ओर....कितने सालों से जासूसी करे सै?...थम्हारे...यहाँ कौन-कौन से और कितने एजेंट सैं?"

"सर!...आपको गलतफहमी हुई है...मैँ....मैँ तो पक्का खालिस देशभक्त हूँ...आप चाहें तो बेशक मेरी बीवी से पूछ लें"...

"ओए...मन्ने औरतां के मुँह लगणे का शौक कोणी"....

"माँ कसम....पक्का बाल-ब्रह्मचारी सूँ".....

"सर!...मैँ सच कह रहा हूँ....आप खुद चैक कर लें...कपड़े भी मैँ स्वदेशी याने के होम मेड इस्तेमाल करता हूँ"...

"होम मेड का मतबल्ल स्वदेशी होवे है?".....

"ज्जी...वो दरअसल मेरा मतबल्ल...ऊप्स सॉरी मेरा मतलब था कि....

"स्साले हरामखोर!...'रे बैन' का इम्पोर्टेड गॉगल लगा के मण्णे बेवकूफ बणावे सै?"....

"तेरे जीस्से छत्तीस को तो मैँ रोज झोट्टाराम के  खेत में चराऊँ सूँ"...

"सर!...ये झोट्टाराम कौन?"सिपाही वापिस आ काँस्टेबल के कान में फुसफुसाता हुआ बोला...

"मेरे ताऊ का फूफ्फा...और कौण?"...

"सर!...आपको गलतफहमी हुई है...मैँ...मैँ तो....

"यो मैँ...मैँ कर के मिमियाणा छोड़ और सीधी तरह बता के कब से तू देश के साथ गद्दारी कर रहा है?"....

"सर!...मैँ तो सर सीधा-साधा लेखक प्राणी हूँ...मैँ भला अपने ही देश के साथ गद्दारी क्यों करने लगा?"...

"तू....तू लेखक सै?"मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारते हुए काँस्टेबल बोला...

"ज्जी...जी सर"...

"स्साले!...पहले क्यूँ नहीं बताया तैन्ने कि तू पत्रकार बिरादरी का बन्दा है"मेरे कन्धे पे धौल मार मुस्कराते हुए काँस्टेबल बोला....

"सॉरी!...आई.एम रियली वैरी सॉरी"काँस्टेबल के स्वर में अचानक मिठास आ चुकी थी

"माफ कीजिए..गल्ती से आपको रोक लिया....आप जा सकते हैँ"....

"बेवाकूफ कहीं के....गधे और घोड़े का फर्क समझे बिना सबको एक ही छड़ी से हांके चले जाते हैँ"काँस्टेबल सिपाही की तरफ देख बुड़बुड़ाता हुआ बोला....

"ओए!....

"जी जनाब"....

"स्साले!....देख तो लिया कर कि किसे रोकना है और किसे नहीं"....

"इतने साल हो गए यहाँ @#$%ं हुए....इतना भी नहीं पता कि किस से कैसे बात करनी है और कैसे नहीं"काँस्टेबल सिपाही पर चिल्लाता हुआ बोला...

"क्या हुआ जनाब?"...

"साहब जी तो पत्रकार बिरादरी के निकले"....

"क्या?"...

ओह!...सॉरी सर.....माफ कर दें सर...माई मिस्टेक सर..मैँ आपको पहचान नहीं पाया सर"....

"स्साले!...तेरे को कितनी बार हिन्दी में साफ-साफ समझा चुका हूँ कि अपने धन्धे में मल्लिका सहरावत की नंगी-पुंगी फिल्मों ने किसी काम नहीं आना है... असल जिन्दगी में अगर कुछ काम आएगा तो वो तेरा अपना हुनर...तेरा अपना टैलेंट काम आएगा"

"जा...जा के कहीं से फेस रीडिंग में एक्सपर्टाईज़ होने का कोर्स कर ले"...

"जी जनाब"....

"उस ट्राले वाले ने दिए के नहीं?"....

"आपके होते हुए देगा कैसे नहीं जनाब?"...

"लेकिन इतनी देर कैसे लग गई?"...

"बिना पर्चे के माल ले जा रहा था ससुरा.....मैँने बतौर जुर्माना दो हज़ार की डिमांड रखी तो सौ-दो सौ रुपल्ली दिखा मुझे टरकाने लगा कि ईब्ब तो ब्योंत कोणी...आगली बार मांगण ते पहलां ही ऊपरली गोझ(जेब) म्ह थम्हारी खातर धर लेयूँगा"....

"फिर?"मैँ उत्सुकता के मारे पूछ बैठा...

"फिर क्या?....मैँने गुस्से में ट्राला ही जब्त करने की धमकी दे डाली"....

"अच्छा ...फिर?"...

"फिर क्या?....एक ही घुड़की में धोती ढीली हो गई...पट्ठे की"...

"ये देखो जनाब....कड़कड़ाते नोट सैं"...कह सिपाही अपनी जेब की तरफ इशारा करने लगा

"बावला सै के तू?"....

"इस तरिया सड़क पे खुलेआम....मरवाएगा के?"....

"साब जी!...माफ कर दो...गल्ती हो गई"....

"अच्छा...अच्छा....छोड़ इस सब ने और उस नीली वाली सैंत्रो ने हाथ दे....सुसरा लाल बत्ती जम्प कर के निकल रिया है"...

"जी जनाब"....

"आप खड़े क्यों हैँ?...यहाँ...यहाँ मेरी बाईक पर बैठिए सर"....

"नहीं...बस रहने दीजिए....मैँ ऐसे ही खड़ा ठीक हूँ"....

"कमाल करते हैँ आप भी ...हमारे होते हुए भला आप खड़े रहें....ऐसा कैसे हो सकता है?"

"ओए!...साहब के लिए कुर्सी ला"काँस्टेबल नज़दीक खड़े जूस वाले को हुक्म देते हुए बोले

"आप क्या लेंगे सर?...ठण्डा या गर्म?"

"नहीं...रहने दो....ऐसी कोई खास इच्छा नहीं है"...

"अजी!...इच्छा को मारिए गोल्ली और अनार का ये स्पैशल जूस पीजिए"जूस वाला मेरे हाथ में गिलास थमाता हुआ बोला

"हम्म!...जूस तो वाकयी बहुत बढिया बनाया है"मैँ होंठों पे अपनी जुबान फिरा चटखारा लेता हुआ बोला....

"स्साले की शामत आनी है जो बढिया नहीं बनाएगा"जूसवाले को घूरते हुए काँस्टेबल बोला ...

"हाँ तो जनाब!...आप राजनैतिक या फिर फिल्मी?....किस तरह की पत्रकारिता करते हैँ?"...

"सर!...मैँने आपको पहले भी बताया था और अब फिर से बता रहा हूँ कि मैँ पत्रकार नहीं बल्कि एक छोटा-मोटा लेखक हूँ और हँसते रहो के नाम से अपना एक ब्लॉग चलाता हूँ"....

"स्साले!...इतनी ड्रामे बाज़ी की के जरूरत थी?...सीधी तरिया नई बता सकता था के तू एक मसखरा है"....

"मसखरा?"....

"ओर नईई तो के बहरुपिया?"...

"नहीं सर!...आप गलत समझ रहे हैँ...मैँ मसखरा नहीं हूँ"...

"तू मसखरा कोण्णी?"...

"जी"...

"तू पत्रकार बी कोण्णी?"....

"ओर तू बहरुपिया बी कोण्णी?"...

"जी सर"...

"तो फिर तू है के चीज?"...

"दरअसल....मैँ हास्य और व्यंग्य में लिखता हूँ"...

"ठीक सै!...तो फिर तू मन्ने हँसा"....

"मतलब?...मैँ आपको कैसे हँसा सकता हूँ?".....

"'छोरी %$#@  के' ...तैन्ने पूरी दुनिया को हँसाने का ठेका लिया हुआ सै ना?...

ईब्ब तू  मन्ने हँसा के दिखा"काँस्टेबल गुस्से से अपना चेहरा अकड़ा के मुझ पर अपना सर्विस रिवाल्वर तानता हुआ बोला...

"सर!...आपको गलत फैमिली...ऊप्स सॉरी गलतफहमी हुई है"मैँ सकपकाता हुआ बोला...

"बेट्टे!....हँसाना तो तुझी को पड़ेगा...ईब्ब तू चाहे हँस के हँसा या फिर रो के हँसा"सिपाही भी अपना डण्डा मेरे सर पे तानते हुए बोला...

"ओफ्फो!...कितनी बार समझा चुका हूँ कि मैँ कोई जोकर या मसखरा नहीं बल्कि एक जिम्मेदार लेखक हूँ और देश के प्रति अपने कर्तव्य का पूरी ईमानदारी और निष्ठा से वहन कर रहा हूँ"...

"लोगों को हँसा के?"....

"अब मैँ लोगों को हँसाऊँ या फिर रुलाऊँ...इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मेरा असली मकसद अपनी लेखनी के जरिए गलत हो रहे कार्यों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करना है"....

"मैँ भी तो सुणूँ के किस तरह के गलत कामों की तरफ तू लोगों का ध्यान आकर्षित करता है ?"सिपाही गर्म हो मेरे और नज़दीक आता हुआ बोला...

"जैसे आपने अभी नाजायज़ तरीके से उस ट्राले वाले से दो हज़ार वसूले"मैँ सकपका कर पीछे हटते हुए बोला....

"तो?"...

"मैँ ऐसे ही कामों के बारे में बता के जनता को जागरूक करता हूँ"मेरी आवाज़ में दृढता थी...

"तो तेरा मतबल्ल कि जनता जो है...वो कति बेवाकूफ है?"गुस्से से बिफरता हुआ जूस वाला बोला....

"ओर ये नाजायज़-नाजायज़ के लगा रक्खा सै?"डण्डा छोड़ अपनी आस्तीन ऊपर करते हुए  सिपाही बोला

"इसणे तो बेर की @#$% का पता कोण्णी....ओर चलया सै देश की जणता ने जागरूक करण खातर"काँस्टेबल का क्रोध भरा स्वर....

"जनाब!...इस कल के लौण्डे ने के बेरा कि जायज़ के होव्वे है ओर नाजायज़ के होव्वे है?"....

"ये जो प्राईवेट सकूल वाले रोज-रोज फीस बढावें सैं...यो जायज़ सै?"सिपाही भावुक हो बोल उठा....

"या ये जो पाछले ऐरियर  वसूल रहए सैं...यो जायज़ सै?"काँस्टेबल ने बात पूरी की...

"वो तो पे कमीशन ने....

"पे कमीशण गया तेल लेने...इस सुसरे स्कूल वालयाँ ने पहलए घणा कमा रक्खा सै ...उस्से म्ह से थोड़ा खर्च कर देंगे तो कोई पहाड़ ना टूट पड़ेगा"....

"थम्म तो यार!...पता नय्यी कूण सी दुनिया के....कौण से जुग में जीवो हो.....थम्म ने के बेरा कि इस मँहगाई के जुग में बच्चे कीस्से पाले जावें सैं?"

"अब यार!...आप तो पढे-लिखे हो...समझदार हो...खुद जाणो हो कि बच्चे तो भगवान का रूप होवे सैं...ओर भगवान की बात हम कैसे टाल सकते हैँ"...

"जी"...

"अब परसों मेरे मंझले छोरे ने 'एडीडास' के जूतों की और तीन नम्बर वाली छोरी ने 'वन्दना लूथरा' से अपना मेक-ओवर करवाने की फरमाईश कर दी तो मैँ कैसे टाल सकता था उन्हें?...

"जी"...

"तो बस भईय्ये!...यूँ समझ ले कि इसी खातिर मैँने उस ट्राले को रुकवाया था"....

"और अब ये जो सैंत्रो को...

"इसे?...इसे तो यार...मैँने अपनी श्रीमति जी के चक्कर में......

'त्रिभुवन दास भीम जी झावेरी' के यहाँ एक पेंडेंट पसन्द कर आई है"...

"लेकिन आप तो कह रहे थे कि सिर्फ बच्चों की फरमाईश....

"जी....बिलकुल!...तुम तो जानते ही हो कि मुझे बच्चों से कितना प्यार है?....बस छुटकी को बड़ा हो जाने दीजिए...उसी को उसके सोलहवें बर्थडे पर गिफ्ट कर दूंगा"...

"यू नो!...तीन महीने बाद वो पूरे स्वीट सिक्सटीन की हो जाएगी"काँस्टेबल के चेहरे पे गर्व भरी मुस्कान थी...

"ओह!...काँग्रैचुलेशन....मेरी तरफ से एडवान्स में ही बधाई स्वीकार करें"...

"क्यों?...एडवांस में क्यों?"...

"एडवांस में इसलिए कि...क्या मालुम कल हों ना हों"...

"खबरदार!...जो मुँह से कोई अशुभ या अनहोनी बात निकाली...मुझ से बुरा ना कोई होगा".....

"अरे यार!...मैँ तो बस ऐसे ही..

"ना...ये तो बिलकुल गलत बात है.....ना कोई मिठाई....और ना ही कोई गिफ्ट...ऐसी फोक्की बधाई तो आपको ही मुबारक"..

"हा...हा....हा...जस्ट किडिंग यार...आप तो काम के बन्दे हैँ.....आपसे क्या गिफ्ट लेना?"...

"मैँ भी...मैँ भी तो बस ऐसे ही मज़ाक कर रहा था"....

"पुलिस वाले से मज़ाक?"काँस्टेबल का रौद्र रूप...और फिर अचानक ज़ोर से हँसी..."हा...हा...हा...हा....डर गए ना?"...

"यार!....अभी तो तीन महीने पड़े हैँ...और अब जब  जान-पहचान हो ही गई है...अब तो हमारा-आपका मिलना-जुलना होता ही रहेगा ना?"...

"जी...बिलकुल"...

"लेकिन ये एडवांस में बधाई-वधाई बिलकुल नहीं चलेगी....ग़्राँड हयात में पार्टी दे रहा हूँ....आपने भी आना है...और ध्यान रहे कि भाभी जी को ज़रूर लाना है"...

"और बच्चे?"....

"क्या उन्हें घर पर ही छोड़ कर?....

"हाँ-हाँ!...क्यों नहीं?....तुम एक काम करना...उन्हें डब्बे में बन्द कर ...बाहर से ताला लगा....

"?...?...?...?"....

"बेवाकूफ!....बच्चों के लिए ही तो पार्टी दे रहा हूँ और तू है कि उन्हें ही घर पे छोड़ कर आने की बात कर रहा है?"..

"कैसा निर्मोही दोस्त है रे तू?".....

"चल!...माफी माँग मुझ से"...

"सॉरी यार!...माफ कर दे मुझे"...

"ना...बिलकुल ना"....

"पहली गलती है यार"....

"आज पहली गलती कर रहा है...कल को दूसरी गलती करेगा और परसों को तीसरी"...

"इतना ज़लील तो ना कर यार मुझे"...

"तू है ही इसी लायक"...

"प्लीज़!....माफ कर दे ना मुझे"मेरी आँखों से आँसुओँ की अविरल धारा बह चली....

"पागल कहीं का...कैसे बच्चों की तरह रो रहा है"काँस्टेबल भी अपने आँसू पोंछ मुझे गले लगाता हुआ बोला

"क्या जनाब?...आप दोनों तो बिलकुल बच्चों की तरह रोते हैँ"हमें रोता देख सिपाही की आँखो से भी आँसू बह निकले ...

"हम सब को रोता देख जूस वाले से भी रहा ना गया और वो भी धाड़ मार-मार के रोने लगा"

"चुप हो जाएँ जनाब...यूँ सड़क पर ऐसे रोने से अपने बिज़नस पे गलत अफैक्ट पड़ेगा"सिपाही कमीज़ से अपने आँसू पोंछ समझदारी से काम लेता हुआ बोला

"यस!...यू ऑर राईट....बिज़नस कमज़ ऑलवेज़ फर्स्ट"काँस्टेबल भी भावुकता छोड़ अटैंशन मुद्रा में आ गया....

"जी!....धन्धा पहले...बाकी सब काम बाद में"...

"हाँ!...रोक...रोक उसे...स्साला मोबाईल पे बात करता हुआ गाड़ी चला रहा है"....

"जी जनाब"कहते ही सिपाही से बीच सड़क के छलांग लगा दी...

"और सुनाओ...घर में सब ठीकठाक?"...

"जी बिलकुल"....

"कोई दिक्कत या परेशानी?"...

"ना जी"...

"कोई भी...किसी भी तरह का....कैसा भी काम हो....बिना किसी प्रकार की झिझक के तुरंत मुझे याद कर लेना"...

"जी...बिलकुल"...

"चाहे मई-जून का टिप-टिप कर टपकता महीना हो या फिर हो ....जुलाई-अगस्त का लू भरा महीना ...बन्दे को हमेशा अपने साथ...अपने दिल के करीब पाओगे"...

"जी...शुक्रिया"....

"यार!...एक बात पूछनी थी तुमसे"...

"एक क्या...दो पूछो...जी में आए तो बेशक सौ पूछो"...

"ये जो तुम नैट पे लिखते हो....

"जी"...

"ये पूरी दुनिया तक पहुँच जाता है?"...

"जी..बिलकुल"..

"इधर लिखा और उधर बटन दबाया...बस पूरी दुनिया के सामने हमारा लिखा तुरंत के तुरंत पहुँच जाता है"...

"इधर लिखा और उधर बटन दबाया?"...

"जी"...

"इसका मतलब लिखा कहीं और जाता है और बटन कहीं और दबाया जाता है?"...

"नहीं!...जिधर लिखा जाता है...उधर ही बटन दबाया जाता है"...

"लेकिन तुमने ही तो अभी कहा कि इधर लिखा और उधर....

"ओफ्फो!...ऐसे सिर्फ कहा जाता है...किया नहीं जाता है"....

"अब यार!...मुझे क्या पता?...मैँ ठहरा मोलढ इनसान"....

"अरे वाह!...मोलढ भी कह रहे हो और इनसान भी"...

"अरे यार!...मेरा मतलब था कि तुम खुद तो कम्प्यूटर के महाज्ञानी हो और मुझे इसका 'क.ख.ग' भी नहीं आता...मुझे क्या पता कि क्या चीज़ ...कैसे करते हैँ"...

"चिंता ना करो...दो-चार दिन मेरे साथ रहोगे तो सब सीख जाओगे"....

"पक्का?"...

"बिलकुल पक्का"....

"थैंक्स"...

"किस बात का?".....

"कम्प्यूटर....

"एक बात कान खोल के सुन लो तुम मेरी"...

"जी"...

"यारी-दोस्ती में नो थैंक्स...नो शुक्रिया"....

"ओ.के...ओ.के बाबा....नो थैंक्स...नो शुक्रिया"...

"यार !...एक काम था तुमसे"...

"जब तुम्हें दिल से अपना मान लिया है तो एक क्या...दो काम कहो"....

"क्या तुम मेरा इंटरव्यू छाप सकते हो?"...

"हाँ-हाँ!...क्यों नहीं"...

"तो फिर छापो"....

"अभी?"...

"हाँ...अभी...अभी छापने में क्या दिक्कत है?"....

"अभी तो यार!...मेरे पास ना यहाँ कोई कागज़ है ना ही लैपटॉप"...

"कागज़ की तुम चिंता ना करो...अपने पास सब जुगाड़ हैँ"...

"ये लो"कह काँस्टेबल ने अपनी पूरी चालान बुक ही मेरी हथेली पे धर दी

"ये क्या?...ये तो सरकारी चालान बुक है"...

"तुम्हें सरकारी या गैर-सरकारी से आम लेने हैँ?"...

"तुम्हें कागज़ चाहिए ना?"....

"जी"...

"और वो मैँ तुम्हें दे रहा हूँ"...

"लेकिन....

"अरे!...लेकिन-वेकिन...किंतु-परंतु को मारो गोली और इस चालान बुक को पलट कर देखो....पीछे से ब्लैंक है"....

"लेकिन सरकारी संपत्ति का ऐसे दुरप्योग?"....

"अरे!...सरकारी कहाँ?...मैँने खुद अपने पल्ले से छपवाई हैँ"...

"ये देखो!...सरकारी वाली तो डिक्की में पड़ी है"काँस्टेबल अपनी बाईक की डिक्की खोल मुझे दिखाता हुआ बोला

"यू मीन...आपने खुद?...अपनी जेब से?...अपना पैसा खर्च कर के छपवाई हैँ?"...

"हाँ यार!...खुद ही छपवाई हैँ...कसम से"काँस्टेबल अपने कानों को हाथ लगा सफाई सी देता हुआ बोला

"पैसा भी आपका...खुद का ही था?"मुझे विश्वास नहीं हो रहा था

"भगवान झूठ ना बुलवाए...पैसा तो आम पब्लिक से ही वसूला हुआ था"...

"याने के रिश्वत का था"मैँ निर्णय पे पहुँचते हुए बोला....

"यार!...पैसा...पैसा होता है...चाहे वो रिश्वत का हो या फिर हक-हलाल की कमाई का"...

"क्या फर्क पड़ता है?"...

"अरे वाह!...फर्क क्यों नहीं पड़ता?"...

"कोई फर्क नहीं है दोनों में...बाज़ार में दोनों एक ही दाम पर चलते हैँ"...

"जी नहीं...अगर हक-हलाल की कमाई होगी तो आप उसे सोच-समझ के खर्च करेंगे और अगर कमाई गलत तरीके से की गई है तो आप पैसे को अनाप-शनाप तरीके से उड़ाएँगे"...

"हाँ उड़ाऊँगा!...एक नहीं सौ बार उड़ाऊँगा...किसी को जो करना हो...कर ले"...

"मेरा....मेरी मेहनत का पैसा है...मैँ उसका जो चाहे करूँ...तुम होते कौन हो मुझे रोकने वाले?"काँस्टेबल का पारा हाई हो चला था

"मेहनत का पैसा अगर होता तो आप ग्राँड हयात में पार्टी नहीं रखते"....

"तो क्या यार-दोस्तों को खाना भी ना खिलाऊँ?"....

"खाना तो आप घर पे भी खिला सकते हैँ"...

"हाँ!...घर में भी खिला सकता हूँ लेकिन फिलहाल मेरा इरादा अपनी नाक कटवाने का नहीं है"...

"अड़ोसी-पड़ोसी....नाते-रिश्तेदार...सभी तो जानते हैँ मुझे".....

"क्या सोचेंगे वो?...कि पॉश इलाके में तैनात  दिल्ली पुलिस के इस काँस्टेबल की इतनी औकात भी नहीं है कि वो ढंग से चार बन्दों को खाना भी खिला सके"...

"मेरी खिल्ली नहीं उड़ाएँगे?"...

"और तुम?....लेखक बिरादरी के टटपूंजिए लोग...तुम क्या जानों की मेहनत से कमाना किसे कहते हैँ?"...

"क्यो?....क्या हम मेहनत नहीं करते हैँ?"...

"जनाब!...आराम से पक्की छत के नीचे बैठ...उलटी-सीधी ऊँगलियाँ टकटका लेने को मेहनत नहीं कहा जाता"...

"तो फिर किसे कहा जाता है?"...

"ये जो हम तपती दोपहरी में खुले आसमान के नीचे धूल और धुआँ फाखते हुए जो मर-खप्प के दिहाड़ी बनाते है...उसे मेहनत कहते हैँ"...

"रहने दीजिए जनाब....रहने दीजिए...कितनी बार तो मैँने खुद अपनी इन्हीं आँखो से आपको मैट्रो स्टेशन के नीचे या फिर किसी पेड़ की छांह तले आराम फरमाते-फरमाते लोगों से पैसे वसूलते देखा है"....

"तुम्हें पेड़ की छांह के नीचे खड़े हो हमारा आराम फरमाना तो दिख गया लेकिन  हम जो झाड़-झंखाड़ों के बीच छुप के  काले सियारों का शिकार करते हैँ...वो तुम्हें दिखाई नहीं देता?"सिपाही से बोले बिना रहा नहीं गया...

"ये काले सियार कौन?"...

"कानून तोड़ने वाले...और कौन?"काँस्टेबल मेरी जिज्ञासा शांत करता हुआ बोला...

"तुम क्या जानों कि इस चक्कर में ना जाने कितनी दफा मेरी खुद की कोहनी...पीठ...लहुलुहान हो छिल चुकी है"काँस्टेबल बाज़ू ऊपर कर अपनी फूटी हुई कोहनी दिखाता हुआ बोला...

"पंगा तो पहले आप खुद लेते हैँ और बाद में शोर भी आप भी खुद ही खुद मचाते हैँ"...

"मतलब?"...

"आखिर आपको झाड़-झंखाड़ में घुस कर अपनी ऐसी-तैसी करवाने की ज़रूरत ही क्या होती है?"...

"आए-हाय...क्या ज़रूरत होती है?"...

"पब्लिक को इतना सीधा समझ रक्खा है क्या"...

"मतलब"...

"अरे!..आजकल की पब्लिक बड़ी चलती-पुर्ज़ी याने के चालू टाईप की है"....

"कैसे?"...

"अगर उसे ज़रा सी भी...तनिक सी भी भनक लग जाए कि हम लोग वाच कर रहे हैँ...तो एकदम गऊ के माफिक सीधी हो जाती है"....

"वो कैसे?"...

"कोई कानून ही नहीं तोड़ती है...यहाँ तक की पैदल चलने वालों से भी पूरी इज़्ज़त के साथ पेश आती है"...

"ओह!...

"इसी कारण हमें छुप कर उन्हें कानूनन...कानून तोड़ने के लिए बाध्य करना पड़ता है"...

"जी"...

"लेकिन ये सब तो गलत है कि पहले आप खुद ही लोगों को उकसा के कानून तोड़ने पे मजबूर करो और बाद में इसी जुर्म के लिए उनकी धर-पकड़ करो"...

"अब भईय्ये!..अगर सीधी ऊँगली से घी निकल जाए तो हम अपनी ऊँगली टेढी ही क्यों करें?"...

"लेकिन...

"इस लेकिन-वेकिन और किंतु-परंत को ठण्डे बस्ते में डाल के ध्यान से मेरी बात कान खोल के सुनो"...

"जी..."कान को हलके से उमेठते हुए मैँने जवाब दिया ...

"सबकी बात तो मैँ नहीं करता लेकिन मुझ में और मुझ जैसे कईयों में शराफत अभी बाकी है"...

"मतलब?"...

"हमारा ज़मीर अभी ज़िन्दा है...इस नाते हमें खुद अच्छा नहीं लगता कि हम ऐसी हराम की कमाई को हाथ भी लगाएँ लेकिन.....

"लेकिन?"....

"क्या करें?...हमारी भी अपनी मजबूरिया होती हैँ"....

"अजी छोड़िए...मजबूरियाँ होती हैँ....ये सब आप मर्ज़ी से....अपनी खुशी से....अपने ज़मीर को गिरवी रख के करते हैँ"...

"नहीं...झूठ!...झूठ है ये बिलकुल....तनिक भी इसमें सच्चाई नहीं है"सिपाही रुआँसा हो बोल उठा...

"क्या तुम जानते हो इस बीट पर ट्रांसफर करवाने के एवज में हर महीने मुझे पन्द्रह लाख रुपए की मंथली ऊपर 'एस.एच.ओ' को भेजनी पड़ती है?"...

"पन्द्रह लाख?"मेरा मुँह खुला का खुला रह गया... 
"जी हाँ जनाब!...पूरे पन्द्रह लाख...ना एक पैसा कम ...ना एक पैसा ज़्यादा"काफी देर से चुप जूस वाला बोल पड़ा...

"ना एक पैसा कम...ना एक पैसा ज़्यादा?"मुझे विश्वास नहीं हो रहा था...

"अगर किसी के पास दो-चार सौ कम हों तो?"मैँने शंका प्रकट की....

"नहीं...बिलकुल नहीं....रूल इज़ रूल"....

"हमारे यहाँ कानून सबके लिए बराबर है...उसकी नज़र में कोई छोटा नहीं...कोई बड़ा नहीं"...

"कोई अपना नहीं...कोई पराया नहीं"सिपाही ने बात पूरी की....

"तो क्या कानूनन आपको ये रकम देनी पड़ती है?"...

"अरे!...अगर कहीं किसी नीलामी में हम कोई बोली लगाएँगे तो हमें वही बोली की रकम देनी पड़ेगी कि नहीं"...

"जी...देनी तो पड़ेगी"...

"तो फिर कम या ज़्यादा से क्या मतलब?"...

"लेकिन नीलामी अलग चीज़ है और आपका काम अलग चीज़....इस से आपके काम का क्या कनैक्शन?"...

"अरे!..जैसे पुराने माल...पुरानी गाड़ियों की नीलामी होती है कि नहीं?"...

"जी...होती है"....

"तो बन्धु मेरे!...ठीक वैसे ही हमारे यहाँ थाने में आने वाली बीटों और डिवीज़नों की नीलामी होती है"सिपाही मुझे समझाता हुआ बोला...

"ओह...अच्छा"...

"तो क्या ये बोली साफ-सुथरे और निष्पक्ष तरीके से?.....

"100%"...

"बेशक हमारा धन्धा बे-ईमानी का सही लेकिन होता पूरी ईमानदारी से है"...

"सबके सामने खुले में बोली होती है...अपना जिसको जिस बीट या डिवीज़न की दरकार होती है...वो उस हिसाब से बोली लगाता है"...

"ओह!...अच्छा"...

"ये पैसा हर महीने आप 'एस.एच.ओ' को?"...

"जी"....

"तो क्या 'एस.एच.ओ' अकेला ही?".....

"अब ये तो भगवान जाने कि अकेला डकार जाता या फिर और ऊपर तक चढावा चढाता है लेकिन इतना ज़रूर पता है कि पिछले महीने हमारे उसने गुड़गांव की एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में छै कमरों का एक शानदार लग्ज़रियस अपार्टमैंट खरीदा है".....

"जनाब!..'टी.डी.पी' मॉल में उनके शानदार ऑफिस के बारे में बताना तो भूल ही गए"सिपाही काँस्टेबल की तरफ मुखातिब होता हुआ बोला...

"वाह!...क्या ऑफिस खरीदा है..वाह-वाह"जूस वाला भी हाँ में हाँ मिलाता हुआ बोला...

"इसमें वाह-वाह की क्या बात है?...उससे शानदार तो मेरा डिफैंस कालौनी वाला बँगला है और उसके वरसोवा वाले शो-रूम से कई गुना बड़ा और महँगा मेरा घाटकोपर वाला मॉल है "'एस.एच.ओ' की तारीफ सुन काँस्टेबल भड़क उठा...

"हुँह!...बड़ा आया शो-रूम वाला"...

"दिल तो करता है कि किसी दिन ऊपर...जॉइंट कमिश्नर तक ई-मेल भेज के सारे कच्चे चिट्ठे खोल के रख दूँ इस 'एस.एच.ओ' के बच्चे के कि कैसे ये डिवीज़नों की और बीटों की नीलामी लगवाता है"...

"स्साला!...मुझ से पंगा लेता है"...

"साब जी...क्या बिगाड़ा है 'एस.एच.ओ' साहब ने आपका?"...
"ये तुम?...तुम मुझ से पूछ रहे हो शुक्ला?"...

"जानते नहीं कि इस बार घंटाघर चौक की कमाऊ बीट मैँने अपने लिए माँगी थी लेकिन उस स्साले...हराम के &ं%$#@  ने  वो उस तिवारी के बच्चे को लॉलीपॉप की तरह थमा दी"...

"उसके पैसे...पैसे हैँ और मेरे पैसे......

"जमाई लगता है क्या वो उसका?".....

"साब जी!...जाने दीजिए"...

"इस हमाम में हम सभी तो नंगे हैँ...क्यों बेकार में पंगा लेते हैँ?....खाने दीजिए ना उसे...हम भी तो खा रहे हैँ"...

ऊपरवाला सब देख रहा है...अपने आप सबक दे देगा"...

"अरे!...ऊपरवाला अगर देख रहा होता तो वो ये भी देखता कि हम तो बस चख रहे हैँ...असल में खा तो वो भैण का टका रहा है...खा नहीं...बल्कि डकार रहा है"....

"ना!...ना जनाब ना"....

"मैँने आज तक आपकी हर बात में हाँ में हाँ मिलाई है लेकिन इसका ये मतलब नहीं हो जाता कि मैँ आपकी गलत बातों को भी जायज़ ठहराऊँ"सिपाही से बिना बोले रहा ना गया....

"हाँ जनाब!...यहाँ तो मैँ भी आपसे सहमत नहीं हूँ....मैँने खुद उनको कई बार इन्हीं हाथों से जूस पिलाया है लेकिन....

"जी जनाब!...मैँने खुद कई बार 'शेर-ए-पँजाब' ढाबे में उनके साथ डिनर किया है लेकिन कसम है मुझे उस खुदा...उस परवरदिगार की जो मैँने कभी डकार मारते हुए देखा हो"...

"जी...मैँने भी उनके बारे में कभी ऐसी खबर ना पढी और ना ही सुनी लेकिन हाँ...ये डकार मारने की बात पे याद आया कि मैँ तो घर खाना खाने जा रहा था बीवी काफी देर से इंतज़ार कर रही होगी"...
"ओह!....

"तो मैँ चलूँ?"...

"लेकिन मेरा इंटरव्यू?"....

"हो तो गया"...

"कब?"...

"अभी...और कब?"...

"मतलब?"...

"मैँ ये जो आपसे इतनी देर से बात कर रहा था"...

"तो?"...

"वो आपका इंटरव्यू ही तो ले रहा था"...

"लेकिन तुमने कुछ लिखा तो है ही नहीं"...

"अरे!...कागज़-कलम और दवात का ज़माना तो कब का बीत गया"....

"ये देखो"...

"ये क्या है?"....

"एम.पी.थ्री' प्लेयर कम वॉयस रेकार्डर..आपकी सारी बातें रेकार्ड कर ली है मैँने"..."ओह!...तुम तो यार...छुपे रुस्तम निकले"...

"जी...अपना काम ही कुछ ऐसा है"....

"लेकिन यार!...वो 'श्रीमान 'एस.एच.ओ' जी के खिलाफ जो मैँने टिप्पणियाँ की थी...

"जी"...

"वो तो बस ऐसे ही मज़ाक-मज़ाक में....

"ज़रा सा बहक गए थे?"...

"ज्जी...जी बिलकुल"...

"प्लीज़!..उनसे रिलेटिड बातों को मत छापना"...

"हाँ-हाँ!..क्यों नहीं"...

"शुक्रिया"....

"निकाल!...इसी बात पे सौ का नोट"...

"हा...हा...हा...(सम्वेत स्वर)

***राजीव तनेजा****

Rajiv Taneja(India)

http://hansteraho.blogspot.com

rajivtaneja2004@gmail.com 

+919810821361

+919213766753

 

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सुख और दुःख

दुःख सुख क्या है
वक्त का अँधेरा है
फैला है चारो ओर
कव होगा सवेरा
कब मिटेंगे दुःख मेरे
जीवन फिर महकेगा
दुःख के अंधेरो मे
आशा के होने से
विजली तो चमकती है
ऐसा समय आयेगा
फिर सुख के दिन होंगे
सूरज फिर चमकेगा
जीवन मे देखो तो
हैं रात बड़ी लम्बी
घनघोर है अँधेरा
दुःख का है कथानक
सुख महज प्रसंग है
कौन सदा चहकेगा
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माइकल जैक्‍सन चले गए


माइकल जैक्‍सन को
हार्ट अटैक ले गया
किसी को नहीं है
छोड़ता ये गया
वो गया सो गया।

नुक्‍कड़ की विनम्र श्रद्धांजलि।
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एस.पी.पर संगोष्ठी : आमंत्रण


भारत में आधुनिक टेलीविजन पत्रकारिता के जनक माने जाने वाले एस.पी.सिंह की 12 वीं पुण्यतिथि के मौके पर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है. इस अवसर पर मीडिया पर केंद्रित हिंदी की मासिक पत्रिका "मीडिया मंत्र" के जुलाई अंक का विमोचन भी किया जायेगा, जो कि एस.पी.सिंह पर केंद्रित है. संगोष्ठी में मीडिया जगत के जाने - माने लोग शामिल होंगे जो एस.पी से संबंधित अपने संस्मरणों को साझा करेंगे. इस अवसर पर आप सादर आमंत्रित हैं.

स्थान : प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, रायसीना रोड, नई दिल्ली


तिथि : 27 जून, 2009


दिन : शनिवार


समय : 3 बजे


संपर्क : 9999177575

- एस. पी. सिंह जैसे लोग किसी सरजमीन पर कभी-कभी ही पैदा होते हैं - संजय पुगलिया, संपादक, आवाज
- एस. पी. की हिंदी पत्रकारिता में जो देन है उसे शब्दों में नहीं बयां नहीं किया जा सकता. - कमर वहीद नकवी, न्यूज़ डायरेक्टर, आजतक
- मैं एस.पी.की जिंदगी का अर्जुन कभी नहीं बन पाया - आशुतोष, मैंनेजिंग एडिटर, आईबीएन-७
- एसपी निष्पक्ष पत्रकार नहीं थे, इसलिए महत्वपूर्ण हैं - दिलीप मंडल, संपादक, ईटी हिंदी.कॉम
- एसपी जितने बड़े पत्रकार थे, उससे ज्यादा बड़े इंसान थे। - सुप्रिय प्रसाद, न्यूज़ डायरेक्टर, न्यूज़ 24
- एस.पी बहुत जीवंत और सहज व्यक्ति थे - दीपक चौरसिया, संपादक (राष्ट्रीय समाचार), स्टार न्यूज़
- एस.पी एक ऐसे पत्रकार थे जो पहाड़ से संजीवनी बूटी निकाल लेते थे - अलका सक्सेना, कंसल्टिंग एडिटर, जी न्यूज़
- बड़ी मुश्किल होती है जब किसी बेइंतहा करीबी के बारे में लिखना पड़े - चंदन प्रताप सिंह, राजनीतिक संपादक, टोटल टीवी
- एस.पी ने जो काम किया वह एक पूरी पीढी के लिए आदर्श और प्रेरणा का स्रोत है. - परंजय गुहा ठाकुरता, वरिष्ठ पत्रकार
- एस.पी. जर्नलिज्म में मेरे पितातुल्य - - अंजू पंकज, एंकर, समय

एस.पी.की याद में (मीडिया मंत्र)........
- संजय पुगलिया, संपादक, आवाज
- कमर वहीद नकवी, न्यूज़ डायरेक्टर, आजतक
- दिलीप मंडल, संपादक, ईटी हिंदी.कॉम
- चंदन प्रताप सिंह, राजनीतिक संपादक, टोटल टीवी
- राजेश त्रिपाठी, सन्मार्ग
- परंजय गुहा ठाकुरता, वरिष्ठ पत्रकार
- दीपक चौरसिया, संपादक (राष्ट्रीय समाचार), स्टार न्यूज़
- सुप्रिय प्रसाद, न्यूज़ डायरेक्टर, न्यूज़ 24
- आशुतोष, मैंनेजिंग एडिटर, आईबीएन-7
- अंजू पंकज, एंकर, समय
- अलका सक्सेना, कंसल्टिंग एडिटर, जी न्यूज़

* किसी भी तरह की जानकारी के लिए आप 9999177575 पर संपर्क कर सकते हैं।


http://www.mediakhabar.com/ मीडिया मंत्र - मीडिया की ख़बर

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"बम चिकी बम...बम....बम"

***राजीव तनेजा***

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"बोल बम चिकी बम चिकी बम...बम....बम"

"बम....बम...बम"....

"बम....बम...बम"(सम्वेत स्वर)...

"परम पूज्य स्वामी श्री श्री 108 सुकर्मानन्द महराज की जय"....

"जय"....

"जय हो श्री श्री 108 सुकर्मानन्द महराज की"मैँने ज़ोर से जयकारा लगाया और गुरू के चरणॉं में नतमस्तक हो गया

"प्रणाम गुरूवर"....

"जीते रहो वत्स"....

"क्या बात?...कुछ परेशान से दिखाई दे रहे हो"....

"क्कुछ खास नहीं महराज"...

"कोई ना कोई कष्ट तो तुझे ज़रूर है बच्चा".....

"तुम्हारे माथे पे खिंची हुई आड़ी-तिरछी रेखाएँ बता रही हैँ कि तुम किसी गहरी सोच में डूबे हुए हो"....

"बस ऐसे ही...

"कहीं ट्वैंटी-ट्वैंटी के वर्ल्ड कप में......

"ना..ना महराज ना....जब से 'आई.पी.एल' के मैचों में मुँह की खाई है...तब से ही तौबा कर ली"...

"सट्टा खेलने से?"...

"ना...ना महराज ना...बिना सट्टे के तो जीवन बस अधूरा सा लगता है"....

"तो फिर किस चीज़ से तौबा कर ली तुमने?"...

"'टी.वी' देखना छोड़ दिया है मैँने...यहाँ तक कि अपना फेवरेट प्रोग्राम..."खाँस इंडिया खाँस" भी नहीं देखता आजकल

"सोच रहा हूँ कि टी.वी की तरफ रुख कर के सोना भी छोड़ दूँ....ना जाने बुरी लत फिर कब लग जाए"...

"तो फिर क्या कष्ट है बच्चा?"....

"कहीं घर में बीवी या भौजाई से किसी किस्म का कोई झगड़ा या क्लेश?....

"ना....ना महराज ना....भाभी तो मेरी एकदम शशिकला के माफिक सीधी...सच्ची और भोली है"...

"और बीवी?"....

"वो तो जैसे कलयुग में  साक्षात निरूपा रॉय की अवतार"....

"तो फिर क्या बच्चे तुम्हारे कहे अनुसार नहीं चलते?"...

"ना..ना महराज ना...पिछले जन्म में तो मैँने ज़रूर मोती दान किए होंगे जो मुझे प्राण...रंजीत और शक्ति कपूर जैसे होनहार...नेक और तेजस्वी बालक मिले....ऐसी औलादें तो भगवान हर माँ-बाप को दे"..

"तो फिर काम-धन्धे में कोई रुकावट?......कोई परेशानी?"...

"ना...ना महराज ना...जब से आपने उस एक्साईज़ वाले से हरामखोर से सैटिंग करवाई है....अपना धन्धा तो एकदम चोखा चल रहा है"...

"तो इसका मतलब यूँ समझ लें कि दिन-रात लक्ष्मी मईय्या की फुल्ल बटा फुल्ल कृपा रहती है"...

"जी...बिलकुल"....

"तो फिर चक्कर क्या है?"...

"चक्कर?....कैसा चक्कर?...कौन सा चक्कर?"...

"ओफ्फो!...बीवी तुम्हारी नेक एवं सीधी-साधी है"....

"जी महराज"...

"बच्चे तुम्हारे गुणवान हैँ"...

"ज्ज...जी महराज"...

"धन्धा पूरे ज़ोरों पर चल रहा है"...

"जी महराज"...

"तो फिर भईय्ये!...तन्ने के परेशानी सै?"...

"अब क्या बताऊँ स्वामी जी...आज के ज़माने में भाई का भाई पर से विश्वास उठ चुका है...दोस्त एक दूसरे से दगा करने से बाज़ नहीं आ रहे हैँ...नौकर का मालिक पर से और मालिक का नौकर के ऊपर से विश्वास उठ चुका है"...

"तो?"...

"सच कहूँ तो स्वामी जी...जब अपने चारों तरफ ऐसे अँधकार भरे माहौल को देखता हूँ तो अपने मनुष्य जीवन से घिन्न आने लगती है....जी चाहता है कि ये मोह-माया त्यागूँ और अभी के अभी सब कुछ छोड़-छाड़ के सन्यास ले लूँ?"...

"के बात?...म्हारे सिंहासण पे कब्जा करणा चाहवे सै?"...

"ना ...महराज ना...कीस्सी बातां करो सो?"...

"कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली?"...

"म्हारी के औकात कि थम्म जीस्से पहाड़ से मुकाबला कर सकूँ"...

"कोशिश भी ना करियो....जाणे सै नां कि म्हारे लिंक घण्णी ऊपर तक...

"ज्जी...जी महराज"....

"ईब्ब साफ-साफ बता मन्ने कि के कष्ट सै तन्ने?...

"के बताऊँ महराज....इस वाईनी की खबर ने घण्णा दिमाग खराब कर रखा सै"....

"खबर?....कूण से वाईनी की खबर?"...

"अरे!...वो बैंगस्टर वाला वाईनी....और कौन?"....

"के पुलिस ने गोल्ली मार दी?"....

"ना...ना महराज ना...कीस्सी अनहोणी बात करो सो?.....ऊपरवाले को बी ईस्से लोगां की जरूरत नां सै....इस णाते ससुरा कम्म से कम्म  सौ साल और जीवेगा"...

"ईसा के गजब ढा दिया इस छोकरे णे के सौ साल जीवेगा?"...

"नूं तो कई नाटकां में हीरो का रोल कर राख्या सै पट्ठे ने लेकिन असल जिन्दगी में तो पूरा विल्लन निकल्या...पूरा विल्लन"...

"के बात करे सै?"...

"लगता है महराज जी आप यो पंजाब केसरी अखबार ने सिरफ नंगी हिरोईणां के फोटू देखण ताईं मंगवाओ सो"...

"के मतबल्ल?"...

"रोज तो खबर छप रही सै अखबार म कि वाईनी की नौकरानी ने उस पर ब्लात्कार करने का आरोप लगाया है"...

"अरे!...आरोप लगाने से क्या होता है?"...आरोप तो हर्षद मेहता ने भी अपने नरसिम्हा जी पर लगाए थे लेकिन हुआ क्या?"...

"चिंता ना कर....यहाँ भी कुछ नहीं होने वाला"....

"पैसे में बहुत ताकत होती है...कल को छोकरी खुद ही तमाम आरोपों से मुकर जाए तो भी कोई आश्चर्य नहीं"...

"वैसे मुझे इन मीडिया वालों पर बड़ी खुन्दक आती है"...

"वो किसलिए महराज?"...

"ये बार-बार अखबार...टीवी और मैग्ज़ीनों वाले जो 'ब्लात्कार-ब्लात्कार' कर रहे हैँ...इन्हें खुद 'ब्लात्कार' का मतलब नहीं पता"...

"क्या बात करते हैँ स्वामी जी...आजकल तो बच्चे-बच्चे को मालुम है कि 'ब्लात्कार' किसे कहते हैँ?...कैसे किया जाता है"....कितनी तरह के ब्लात्कार होते हैँ वगैरा-वगैरा"...

"तो चलो तुम्हीं बता दो कि 'ब्लात्कार' किसे कहते हैँ?"....

"इसमें क्या है?....किसी की मर्ज़ी के बिना अगर उसके साथ सैक्स किया जाए तो उसे ब्लात्कार कहते हैँ"...

"ये तुमसे किस गधे ने कह दिया?"...

"कहना क्या है?....मुझे मालुम है"...

"बस यही तो खामी है हमारी आज की युवा पीढी में....पता कुछ होता नहीं है और बनती है फन्ने खाँ"...

"तो आपके हिसाब से 'ब्लात्कार' का मतलब कुछ और होता है?"...

"बिलकुल"...

"तो फिर आप अपने ज्ञान से मुझे कृतार्थ करें"...

"बिलकुल...तुम अगर ना भी कहते तो भी मैँ तुम्हें समझाए बिना नहीं मानता"...

"ठीक है!...फिर बताएँ कि क्या मतलब होता है 'ब्लात्कार' का"...

"देखो!...'ब्लात्कार' शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है...बलात+कार=ब्लात्कार अर्थात बल के प्रयोग से किया जाने वाला कार्य"...

"जी"...

"इसका मतलब जिस किसी भी कार्य को करने में बल या ताकत का प्रयोग किया जाए उसे ब्लात्कार कहते हैँ?"...

"यकीनन"...

"इसका मतलब अगर खेतों में किसान बैलों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें हल में जोतता है तो ये कार्य भी ब्लात्कार की श्रेणी में आएगा?"...

"बिलकुल...सीधे और सरल शब्दों में इसे किसान द्वारा  निरीह बैलों का ब्लात्कार किया जाना कहा जाएगा और इसे कमर्शियल अर्थात व्यवसायिक श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा"...

"और अगर हम अपने बच्चों को डांट-डपट कर पढने के लिए मजबूर करते हैँ तो?"...

"तो ये भी माँ-बाप के द्वारा बच्चों का ब्लात्कार कहलाएगा और इसे डोमैस्टिक अर्थात घरेलू श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा"...

"और अगर फौज का कोई मेजर या जनरल अपने सैनिकों को दुश्मन पर हमला बोलने का हुक्म देता है तो?"....

"अगर सैनिक देशभक्ति से ओत-प्रोत हो अपनी मर्ज़ी से इस कार्य को अंजाम देते हैँ तो अलग बात है वर्ना ये भी अफसरों द्वारा सनिकों का ब्लात्कार कहलाएगा"...

"इसे तो नैशनल अर्थात राष्ट्रीय श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा ना?"

"बिलकुल"...

"तो इसका मतलब ...कार्य कोई भी हो....अगर मर्ज़ी से नहीं किया गया तो वो ब्लात्कार  ही कहलाएगा?"...

"बिलकुल"...

"अगर तुम्हारी बीवी तुम्हें तुम्हारी मर्ज़ी के बिना बैंगन या करेला खाने पर मजबूर करती है तो इसे भी पत्नि द्वारा पति का ब्लात्कार कहा जाएगा"...

"या फिर अगर आप अपनी पत्नि की इच्छा के विरुद्ध उसे सास-बहू के सीरियलों के बजाय  किसी खबरिया चैनल पर बेहूदी खबरें देखने के लिए मजबूर करते हैँ तो इसे भी पति द्वारा आपकी पत्नि का ब्लात्कार ही कहा जाएगा" 

"लेकिन महराज एक संशय मेरी दिमागी भंवर में गोते खा रहा है"...

"वो क्या?"...

"यही कि क्या सैक्स करना बुरा है?"....

"नहीं!...बिलकुल नहीं"....

"अगर ऐसा होता तो हमारे यहाँ अजंता और ऐलोरा की गुफाओं और खजुराहो के मंदिरो में रतिक्रिया से संबंधित मूर्तियाँ और तस्वीरें ना बनी होती"...

"हमारे पूर्वजों ने उन्हें बनाया ही इसलिए कि आने वाली नस्लें इन्हें देखें और देखती रहें ताकि वे अन्य अवांछित कार्यों में व्यस्त हो कर इस पवित्र एवं पावन कार्य को भूले से भी  भूल ना पाएँ"....

"ओशो रजनीश ने भी तो फ्री सैक्स की इसी धारणा को अपनाया था ना?".....

"सिर्फ अपनाया ही नहीं बल्कि इसे देश-विदेश में लोकप्रिय भी बनाया"...

"जी"...

"उनकी इसी धारणा की बदौलत पूरे संसार में उनके लाखों अनुयायी बने और अब भी बनते जा रहे हैँ"...

"स्वयंसेवकों के एक बड़े कैडर ने उनकी धारणाओं एवं मान्यताओं को पूरे विश्व में फैलाने का बीड़ा उठाया हुआ है इस नाते वे पूरे संसार में उनकी शिक्षाओं का प्रचार एवं प्रसार कर रहे हैँ"...

"अगर ये कार्य इतना ही अच्छा एवं पवित्र है तो फिर हमारे यहाँ इसे बुरा कार्य क्यों समझा जाता है?"....

"ये तुमसे किसने कहा?"...अगर ऐसा होता तो आज हम आबादी के मामले में पूरी दुनिया में दूसरे नम्बर पर ना होते"...

"स्वामी जी!...कुकर्म का मतलब बुरा कर्म होता है ना?"....

"हाँ...बिलकुल"...

"और आपके हिसाब से रतिक्रिया करना अच्छी बात है लेकिन ये अखबार वाले तो इसे बुरा कार्य बता रहे हैँ"...

"वो कैसे?"...

"आप खुद ही इस खबर को देखें....यहाँ साफ-साफ लिखा है कि....

"फलाने-फलाने 'एम.एल.ए' का पी.ए' फलानी-फलानी स्टैनो के साथ कुकर्म के जुर्म में पकड़ा गया"....

"इसीलिए तो मुझे गुस्सा आता है इन अधकचरे अखबार नफीसों पर...कि ढंग से 'अलिफ'... 'बे' आती नहीं है और चल पड़ते हैँ मुशायरे में शायरी पढने"...

"बेवाकूफो....कुकर्म का मतलब होता है कु+कर्म=कुकर्म अर्थात बुरा कर्म और सुकर्म का मतलब होता है सु+कर्म=सुकर्म अर्थात अच्छा कर्म

"पागल के बच्चे...जिसे बुरा कर्म बता रहे हैँ....उस कर्म के बिना तो खुद उनका भी वजूद नहीं होना था"...
"इतना भी नहीं जानते कि ये कुकर्म नहीं बल्कि सुकर्म है....याने के अच्छा कार्य....ये तो सोचो नामाकूलो कि अगर ये कार्य ना हो तो इस पृथ्वी पर बचेगा क्या...
टट्टू?

"ना जीव-जंतु होंगे...ना पेड़-पौधे होंगे और ना ही हम मनुष्य होंगे और अगर हम ही नहीं होंगे तो ना ये ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ होंगी और ना ही कल-कल करते हुए कल-कारखाने होंगे....ना ये सड़कें होंगी और ना ही घोड़ा गाड़ियाँ होंगी"....

"घोड़ा गाड़ियाँ क्या....छोटी या बड़ी...किसी भी किस्म की गाड़ियाँ नहीं होंगी"...

"हर तरफ बस धूल ही धूल जैसे चाँद पर या फिर किसी अन्य तारा मण्डल पर"

"लेकिन इन्हें इस सब से भला क्या सरोकार?...इन्हें तो बस अपनी तनख्वाह से मतलब रहता है भले ही इनकी वजह से अर्थ का अनर्थ होता फिरे...इन्हें कोई परवाह नहीं...कोई फिक्र नहीं"...

"अब "बोया पेड़ बबूल का तो फल कहाँ से आए?"...

"मतलब?"...

"अब जैसा सीखेंगे...वैसा ही तो लिखेंगे"...

"सीखने वाले भी पागल और सिखाने वाले भी पागल"...

"तो फिर आपके हिसाब से कैसे खबरें छपनी चाहिए?"...

"कैसी क्या?...जैसी हैँ...वैसे छपनी चाहिए"...

"मतलब?"...

"मतलब कि लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए"...

"जैसे?"...

"चार पुलिसकर्मी एक नाबालिग लड़की के साथ ज़बरदस्ती सुकर्म करने के आरोप में पकड़े गए" या फिर...

"सार्वजनिक स्थल पर सुकर्म की चेष्टा में एक अफगानी जोड़ा गिरफ्तार"

"इस खबर में यकीनन लड़्की की मर्ज़ी से सुकर्म को अमली जामा नहीं पहनाया गया होगा"...

"जी"...

"कार्य चाहे मर्ज़ी से हुआ या फिर बिना मर्ज़ी के लेकिन कार्य तो अच्छा ही हुआ ना?

"ज्जी"...

"इस नाते यहाँ नीयत का दोष है ना कि कार्य का...और हमारी...तुम्हारी और आपकी शराफत और भलमनसत तो यही कहती है कि हम बिला वजह किसी अच्छे कार्य को बुरा कह उसे बदनाम ना करें"...

"जी बिलकुल"...

"लेकिन अगर नीयत खोटी है और कार्य भी खोटा है तो उसे यकीनन बुरा कर्म अर्थात कुकर्म ही कहा जाएगा"...

"जैसे?"...

"जैसे अगर कोई चोर चोरी करता है तो वो बुरा कर्म याने के बुरा कार्य हुआ...उसे किसी भी संदर्भ में अच्छा कार्य नहीं कहा जा सकता"...

"लेकिन इसके भी तो कई अपवाद हो सकते हैँ ना गुरूदेव?"..

"कैसे?"....

"अगर हमारे देश की इंटलीजैंस का कोई जासूस दुश्मन देश में जा कर हमारे हित के दस्तावेजों की चोरी करता है तो उसे कुकर्म नहीं बल्कि सुकर्म कहा जाएगा"...

"हाँ!...लेकिन दूसरे देश की नज़रों में बिना किसी शक और शुबह के ये कुकर्म ही कहलाएगा

"धन्य हैँ गुरूदेव आप...आपने तो मुझ बुरबक्क की आँखों पे बँधी अज्ञान की पट्टी को हटा मुझे अपने ओजस्वी ज्ञान से दरबदर...ऊप्स सॉरी तरबतर कर मालामाल कर दिया"..

"बोलो.... बम चिकी बम चिकी बम...बम....बम"

"बम....बम...बम"....

"बम....बम...बम"(सम्वेत स्वर)...

"परम पूज्य स्वामी श्री सुकर्मानन्द महराज की जय"....

"जय"....

"जय हो श्री सुकर्मानन्द महराज की"मैँने ज़ोर से जयकारा लगाया और गुरू के चरणॉं में फिर से नतमस्तक हो गया

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja(Delhi,India)

rajivtaneja2004@gmail.com

+919810821361

+919213766753

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कार्टून-पकिस्तान की जीत ...

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बीते साप्ताहिक डायरी के पन्नों की कुछ लाइनें

पिछले 5-7 दिनो की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ एक नये अंदाज में.

1) हमारी भारतीय टीम,
सभी समीकरण तोड़ कर,
सफलता से मुँह मोड़ कर,
हार के बहाने जोड़ कर,
खेल प्रेमियों की भावनाओं को मरोड़ कर,
घर वापस आ गयी.

2) नेक और पवित्र मानवता शरमाने लगी,
सीधी,सादी सूरत इंसान को भरमाने लगी,
सामने श्वेत अंदर से काली स्याही है,
शाइनी का कृत्य इस बात की गवाही है,
सच और झूठ की परिचर्चा चल रही है,
और पूरे देश मे इसी बात की चर्चा चल रही.

3) विज्ञान और खोज की कला मे,
उपलब्धियों की श्रृंखला मे,
एक और विशेष अध्याय जुड़ गया,
इसरो के सहयोग एवम्, आई. आई. छात्रों की मेहनत रंग लायी,
और भारत की सबसे हल्की उपग्रह बन पायी,
कुछ ही दिनो मे विश्व के सामने आएगी,
और जुगनू नामक उपग्रह पूरे ब्रम्‍हांड मे टिमटिमाएगी.

4) पिछले सप्ताह एक और महत्वपूर्ण बात हुई,
ब्लॉगजगत मे,नुक्कड़ पर,
सुशील जी का कड़वा सच,
जम कर धमाल मचाया,
थोड़ा माहौल भी गरमाया,
सब की अपनी अपनी सोच थी,
कुछ ने जवाब दिया ,कुछ ने पचाया,
सच्चाई पसंद भी की गयी,
हृदय के दरवाज़ों मे बंद भी की गयी,
फिर भी सबसे गर्म थी,ब्लॉग जगत की यह सच्चाई,
जो खूब पसंद और टिप्पणियाँ पायी.
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पिताजी दिवस पर यह नया ब्‍लॉग : आइये इससे जुड़ जाएं (अविनाश वाचस्‍पति)

पिताजी
http://pitaajee.blogspot.com/
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कड़वा सच

धन्‍यवाद सुशील जी की आपने एक कड़वा लेकिन जरूरी सवाल उठाया। मैं लगातार खुद यह सवाल उठाता रहा हूं कि ब्‍लाग क्‍यों नहीं हमारे लिए एक सार्थक विचार विमर्श का माध्‍यम बन पा रहे हैं। मुझे लगता है उसके पीछे इस तरह की झूठी वाही वाही का बड़ा हाथ है। मुझे अस्‍सी के दशक की वे कविता गोष्ठियां याद आती हैं,जब मैंने कविता लिखना शुरू किया था। दस बाय दस के एक कमरे में दस कवि दीवार के सहारे सट-सट कर बैठते थे। सब एक-दूसरे की कविताओं की बढ़-चढ़ कर तारीफ करते थे। चाहे उसमें तारीफ करने जैसा कुछ भी न हो। मुझे जल्‍द ही समझ आ गया था कि इसका कोई फायदा नहीं है।

मुझे फिर से वे दिन याद आ रहे हैं क्‍योंकि इस एक बाय एक के कम्‍प्‍यूटर स्‍क्रीन पर वही सब दोहराया जा रहा है। सच मानिए इसका कोई सकारात्‍मक पक्ष नहीं है। टिप्‍पणियां करने वालों को भी सोचना चाहिए कि वे क्‍या कर रहे हैं।

मेरा कहना है झूठी और आत्‍ममुग्‍धता का यह क्रम बंद होना चाहिए।
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नेट पर हिन्दी का भविष्य और प्रायोजित टिप्पणियाँ- सुशील कुमार


बदनाम होंगे तब ही तो ज्‍यादा नाम होगा

[संदर्भ- विजय कुमार सपत्ति की कविताओं की काव्यात्मकता]

आज जब विजय कुमार सपत्ति जी का प्यारा मेल पढ़ा तो उनके ब्लॉग कविताओं के मन से पर भ्रमण करने चला गया। उनके ब्लॉग पर उपर की दो कवितायें ‘आओ सजन’ और ‘तेरा चले जाना’ पर यहाँ नज़र डालना चाहूँगा जो टिप्पणियों की
संख्या के हिसाब से नेट-जगत में मशहूर हो गयी हैं और उस पर अब हिंदी के सुधी पाठकों की राय भी जानना चाहूंगा। क्या आपको नहीं लगता कि दोनों ही कवितायें आत्ममुग्धता का शिकार और कवि की निहायत ही व्यक्तिगत अभिव्यक्ति यानि आत्मालाप (या बेहतर शब्द तो आत्मप्रलाप होगा) से आगे कुछ नहीं है ? कविता ‘तेरा चले जाना’ प्रेयसी की विदाई के दु:ख से उद्भूत एक प्रेमी का विरहगान है जिसकी भाषा एकदम कच्ची और कविता का रूप कविता की संरचना और उसकी शास्त्रीयता से बाहर जाता दिखाई देता है। शब्दों का प्रयोग यहाँ इतना बेतुका और भोंडा है कि क्या कहूं ! अजनबी स्टेशन, मदिरा का जाम, बेचैन सी रात की सुबह, उदास उजाले से आसूंओं का सूखना इत्यादि ऐसे मुहावरे और शब्द हैं जिसे हिंदी के गंभीर पाठक कैसे सहन करेंगे ? स्टेशन अनजान होता है,अजनबी नहीं। आदमी अजनबी हो सकता है। मदिरा का जाम की जगह कुछ और लिखा जाना कविता के बेहतरी के लिये जरूरी था। बेचैन सी रात का सुबह होने का मतलब है दु:ख का निस्तार होना, पर कवि ने भावातिरेक में बहकर मुहावरे के अर्थ पर बिना ध्यान दिये ही उसे अपनी कविता में डाल दिया है। यहां यह कहना समीचीन है कि कविता करते समय कवि को आत्मसम्मोहन की अवस्था और शब्दों के वेग से स्वयं को संयमित रखना आवश्यक होता है वर्ना वह कहां जायेगा शब्दों की बाढ़ में बहकर , कहना जरा कठिन है। पूरी कविता ट्रांस(बदहवास)स्थिति में आत्मनियंत्रण को खोकर लिखी गयी प्रतीत होती है जिस कारण कविता भाव को शिल्प के स्तर पर अभिव्यक्त करने में नितांत असफल हो गयी है। अगर सपत्ति जी आज्ञा दें तो इसी भाव को एक दूसरी कविता में पिरोकर मैं ही उन्हें अवगत करा दूं कि कैसे भाव कविता में रूप का लक्ष्य सही रीति से करता है। हिंदी साहित्य में प्रेम-कविताओं का बड़ा महत्व है । इस पर अनेक विशेषांक भी निकाले जाते हैं पर उन कविताओं में दुराशा और व्यथा की जगह प्रेम का व्यापक रूप और उसका सामाजिक सरोकार होता है। चिली कवि पॉब्ला नेरूदा की प्रेम कवितायें मनुष्य में जीवन की जिजीविषा का अदम्य भाव भरती है। पर सपत्ति की ये प्रेम कवितायें उस दृष्टि से साहित्यिक दर्जा तक प्राप्त ही नहीं कर सकती। अच्छे और बुरे का सवाल तो बाद में उठता है।

दूसरी कविता ‘आओ सजन’ को सपत्ति सुफियाना भक्ति-गीत से प्रेरित होकर रचा हुआ कह रहे हैं। पर उन्हें मध्यकालीन सूफी कवियों को पढ़ना चाहिये। तब उनके पल्ले यह बात पड़ेगी कि सूफी कवितायें क्या होती है? क्या उन्होंने ‘दमादम मस्त कलन्दर ’ या फिर ‘छाप तिलक सब’ नहीं पढी है? अगर वह नहीं पढ़ी तो मलिक मोह्म्मद जायसी, मीरा, सूर और उस समय के सूफी कवियों में से किसी को देंखें। यहाँ पूरी कविता ही सपाटबयानी का नमूनाभर है जबकि सूफी कविताओं में प्रेम का जो स्वरूप और मानदंड सामने रखा गया है और उससे जो संदेश मिलते हैं उसके लिये वह भाषा और शिल्प भी चाहिये जिसकी गुंजाईश कम से कम सपत्ति की इन कविताओं में तो रत्तीभर भी नहीं है। इस कविता पर अपनी टिप्पणी देते हुये अशोक कुमार पाण्डेय ने उनसे ठीक ही आग्रह किया है कि उन्हें अन्य विषयों को भी अपनी कविता में लाना चाहिये।

मगर टिप्पणी की संख्या तो जरा देखिये। यह लेख लिखे जाने तक उक्त कविताओं पर क्रमश: सत्तर और एक सौ बत्तीस टिप्पणियाँ विजय कुमार सपत्ति जी को मिल चुकी है। क्या करूं, मुझे भी वहां जाकर देनी पड़ी। अब प्राण साहब जो गजल के जाने -माने उस्ताद हैं, ने अपनी हजार गजलें सपत्ती की एक कविता‘तेरा चले जाना’ पर न्योछावर कर दिया। मेरी तरह उनकी भी टिप्पणी करने की कुछ मजबूरियाँ जरूर रही होंगी। पर सपत्ति जी की कवितायें चाहे जैसी हों पर
आदमी बड़े भोले-भाले, बच्चे जैसे स्वभाव वाले और मृदुल हैं जिसकी यहाँ तारीफ़ करनी होगी। हाँ, नेट पर टिप्पणी पाने का यही नुस्खा़ है भाई। मैं तेरा- तू मेरा। आपको अगर अपनी घटिया पोस्ट पर भी सत्तर टिप्पणी चाहिये तो उसका सबसे सरल उपाय यह है कि आप भी सत्तर जगह जाकर उन पर टिप्पणी करें भले ही वहां आपके टेस्ट की चीज न हो और टिप्पणी में वाहवाही भी करें। फिर आप देखिये, टिप्पणियों की टी. आर. पी. कैसे बढ़ती है! सपत्ती को जितनी टिप्पणी मिली है उतनी तो कोई नागार्जुन, त्रिलोचन और अभी जीवित बड़े कवियों की कविताओं पर भी मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है क्योकि वे आयेगे नहीं टिपियाने। पर अगर आप विजय कुमार सपत्ति की अदा अपना लेंगे तो आपके ब्लॉग पर भी टिप्पणियों की बरसात हो जायेगी।


अब मैं एक सवाल नेट पर हिंदी के गंभीर पाठक-लेखक-कवियों से करना चाहूंगा कि क्या इससे नेट पर हिंदी का भविष्य उज्जवल रह पायेगा, जब तक अच्छी चीजें उपेक्षित-तिरस्कृत होती रहेंगी और खराब चीजों पर वाहवाही लुटायी जाती रहेंगी? निश्चय ही यह हिंदी के अपरिपक्व पाठकीयता की ओर इंगित करती है जिससे नेट पर बचने का सार्थक प्रयास होना चाहिये।

दूसरे , मैं सपत्ति जी को परामर्श देना चाहूँगा कि आप हिंदी के बड़े कवियों जो दिवंगत हो चुके या अभी जीवित हैं और वरिष्ठ हैं यथा चन्द्र्कांत देवताले, भगवत रावत,विजेन्द्र, एकांत श्रीवास्तव,कुमार अम्बुज, कूँवर नारायण, अरुणकमल जैसे कई- कई कवि हैं जिन्हें पढ़ें ताकि आपको कविता के स्वभाव और उसकी समकालीनता और उसके काव्यतत्व का भान हो सके। अगर विजय कुमार सपत्ति को अपनी कविताओं का नेट पर ही साहित्यिक मूल्य परखना है तो इस तरह की कवितायें वे हिन्द-युग्म (www.hindyugm.com), सृजनगाथा(srijangatha.com), लेखनी ( www.lekhani.in), कृत्या( www.kritya.in) इत्यादि वेब पत्रिकाओं में भेंजे तो उनको यह पता चल जायगा कि यहाँ भी रास्ता इत्ता आसां नहीं जित्ता सोच रक्खा है! हा हा हा। ***
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हास्‍यकवि अल्‍हड़ बीकानेरी भी चले गए

जून कवियों की ले रहा है जान
कैसे रह सकते हैं इससे अंजान

आज चले गए हैं अल्‍हड़
कैसे मचाएं हम हुल्‍लड़

चले गए हास्‍यकवि एक और
कैसा चल रहा है यह दौर

उनकी कविताएं उनकी याद दिलाएंगी
याद रूलाएगी तो कविताएं हंसाएंगी।

कम ही जानते हैं कि अल्‍हड़ बीकानेरी जी ने हरियाणवी फिल्‍म छोटी साली के निर्माण से फिल्‍म निर्माण के क्षेत्र में भी दमदार कदम रखा था। नुक्‍कड़ की विनम्र श्रद्धांजलि। परमपिता परमात्‍मा शोक संतप्‍त परिवार-साहित्‍य जनों को संबल प्रदान करे।

काका हाथरसी ने लिखा था कि
अल्हड़ जी का स्वर मधुर, गोरा-चिट्टा चाम।
‘श्यामलाल’ क्यों रख दिया, घरवालों ने नाम।
घर वालों ने नाम, ‘शकीला’ पीटे ताली।
हमको दे दो, मूँगफली वाली कव्वाली।
इसे मंच पर गाने में जो होगी इनकम।
आधी तुम ले लेना, आधी ले लेंगे हम।
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कार्टून-शिलान्यास ...

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कार्टून- भोजन का निरीक्षण ...

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प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक (ASCII/ISCII TO UNICODE CONVERTER) का नवीन संस्करण


प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक Version 2.2.5.0 : First and Only Software for the purpose of Conversion of Devanagari {Hindi, Sanskrit, Marathi} Text in various ASCII/ISCII (8 bit) Fonts into Unicode (16 bit) Text immediately and easily with 100% accuracy. लगभग 260 तरह के प्रचलित विभिन्न हिन्दी, संस्कृत और मराठी के फ़ॉण्ट को 100% शुद्धता के साथ यूनिकोड में परिवर्तन हेतु

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12.) AADevShreeLipiBil {एएदेवश्रीलिपिबाईएल}

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19.) AARituPlus2-Numbers **{आऋतुप्लस२नम्बर्स}

20.) AARituPlus2 {आऋतुप्लस२}**

21.) Aarti {आरती}

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23.) Agra Thin {आगरा थिन}

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29.) AkrutiDynamicYogini {अकृतिडायनामिकयोगिनि}

30.) AkrutiOfficePriya {अकृतिऑफिसप्रिया}

31.) AkrutiSanPriya {अकृतिसंप्रिया}

32.) Aman {अमन}

33.) Ankit {अंकित}

34.) APS-C-DV-Prakash {एपीएस-सीडीवी-प्रकाश}

35.) APS-DV-Prakash {एपीएस-डीवी-प्रकाश}

36.) APS-DV-Priyanka {एपीएस-डीवी-प्रियंका}

37.) Arjun {अर्जुन}

38.) Aryan2 {आर्यन २}

39.) AU {अमर उजाला}

40.) B Bharati Kautilya {बी भारती कौटिल्या}

41.) B Bharati Santosh {बी भारती संतोष}

42.) BF_Devanagari {बीएफ_देवनागरी}

43.) Bhaskar {भास्कर} 236KB

44.) Bhaskar {भास्कर} 63.1KB

45.) Bhaskar {भास्कर} 69.4KB

46.) BRH Devanagari {बरहा देवनागरी}

47.) CCDV-AKRPUB-LAYOUT {अकृतिलेआउट}

48.) CCDV-AKS-LAYOUT {अक्षरलेआउट}

49.) CCDV-AU-LAYOUT {अमर उजालालेआउट}

50.) CCDV-IND-LAYOUT {इंडिकालेआउट}

51.) CCDV-ISM-BI-LAYOUT {आइएसएमबाईलेआउट}

52.) CCDV-ISM-LAYOUT {आइएसएमलेआउट}

53.) CCDV-ITR-LAYOUT {आइटीआरलेआउट}

54.) CCDV-KRT-LAYOUT {कृतिलेआउट}

55.) CCDV-PRK-LAYOUT {प्रकाशकलेआउट}

56.) CCDV-RNG1-LAYOUT {रंगोली१लेआउट}

57.) CCDV-RNG2-LAYOUT {रंगोली२लेआउट}

58.) CCDV-SRI2-LAYOUT {श्री२लेआउट}

59.) CCDV-SRI3-LAYOUT {श्री३लेआउट}

60.) CCDV-SRI708-LAYOUT {श्री७०८लेआउट}

61.) CCDV-SULIPI-LAYOUT {सुलिपिलेआउट}

62.) CCDV-SUSHA-LAYOUT {शुषालेआउट}

63.) CCDV-WEBDUNIA-LAYOUT {वेबदुनियालेआउट}

64.) Chanakya {चाणक्य}

65.) Chanakya {चाणक्य}** : (Type1 Font)

66.) Chandini {चाँदनी}

67.) ChandiniE {चाँदनीइ}

68.) Devanagari {देवनागरी}

69.) Devanagari New {देवनागरी न्यू}

70.) DevLys 010 {देवलिस ०१०}

71.) DevLys 020 {देवलिस ०२०}

72.) DevLys 020 Thin {देवलिस ०२० थिन}

73.) DevLys 030 {देवलिस ०३०}

74.) DevLys 110 {देवलिस ११०}

75.) DevLys 140 {देवलिस १४०}

76.) Devmarathi {देवमराठी}

77.) Divyansh {दिव्याँश}

78.) Dtyash {डीटीयश}

79.) DV-AakashExBold {डीवी-आकाशएक्सबोल्ड}

80.) DV-TTAakash {डीवी-टीटी आकाश}

81.) DV-TTBhima {डीवी-टीटी भीमा}

82.) DV-TTGanesh {डीवी-टीटी गणेश}

83.) DV-TTGaneshEN {डीवी-टीटी गणेश इएन}

84.) DV-TTManohar {डीवी-टीटी मनोहर}

85.) DV-TTMayur {डीवी-टीटी मयूर}

86.) DV-TTNatraj {डीवी-टीटी नटराज}

87.) DV-TTRadhika {डीवी-टीटी राधिका}

88.) DV-TTSurekh {डीवी-टीटी सुरेख}

89.) DV-TTSurekhEN {डीवी-टीटी सुरेख इएन}

90.) DV-TTVasundhara {डीवी-टीटी वसुन्धरा}

91.) DV-TTYogesh {डीवी-टीटी योगेश}

92.) DV-TTYogeshEN {डीवी-टीटी योगेश इएन}

93.) DV_Divya {डीवीदिव्या}

94.) DV_Divyae {डीवीदिव्याइ}

95.) DV_ME_Shree.... {डीवी_एमइ_श्री....}

96.) DVB-TTSurekh {डीवीबी-टीटी सुरेख}

97.) DVB-TTSurekhEN {डीवीबी-टीटी सुरेख इएन}

98.) DVB-TTYogesh {डीवीबी-टीटी योगेश}

99.) DVB-TTYogeshEN {डीवीबी-टीटी योगेश इएन}

100.) DVBW-TTSurekh {डीवीबीडब्ल्यू-टीटी सुरेख}

101.) DVBW-TTYogeshEN {डीवीबीडब्ल्यू-टीटी योगेश इएन}

102.) DVBW Surekh Avid {डीवीबीडब्ल्यू सुरेख ऐविड}

103.) DVTTGita {डीवीटीटीगीता}

104.) DVW-TTSurekh {डीवीडब्ल्यू-टीटी सुरेख}

105.) DVW-TTYogeshEN {डीवीडब्ल्यू-टीटी योगेश इएन}

106.) ePatrika {ईपत्रिका}

107.) GIST-DVTTAjay {जिस्ट-डीवीटीटी अजय}

108.) GIST-DVTTAniket {जिस्ट-डीवीटीटी अनिकेत}

109.) GIST-DVTTAnjali {जिस्ट-डीवीटीटी अंजली}

110.) GIST-DVTTBrinda {जिस्ट-डीवीटीटी ब्रिंदा}

111.) GIST-DVTTDhruv {जिस्ट-डीवीटीटी ध्रुव}

112.) GIST-DVTTDiwakar {जिस्ट-डीवीटीटी दिवाकर}

113.) GIST-DVTTJamuna {जिस्ट-डीवीटीटी जमुना}

114.) GIST-DVTTJanaki {जिस्ट-डीवीटीटी जानकी}

115.) GIST-DVTTKishor {जिस्ट-डीवीटीटी किशोर}

116.) GIST-DVTTKundan {जिस्ट-डीवीटीटी कुंदन}

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118.) GIST-DVTTMalini {जिस्ट-डीवीटीटी मालिनी}

119.) GIST-DVTTManohar {जिस्ट-डीवीटीटी मनोहर}

120.) GIST-DVTTMayur {जिस्ट-डीवीटीटी मयूर}

121.) GIST-DVTTMegha {जिस्ट-डीवीटीटी मेघा}

122.) GIST-DVTTMohini {जिस्ट-डीवीटीटी मोहिनी}

123.) GIST-DVTTNayan {जिस्ट-डीवीटीटी नयन}

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126.) GIST-DVTTPrakash {जिस्ट-डीवीटीटी प्रकाश}

127.) GIST-DVTTPreetam {जिस्ट-डीवीटीटी प्रीतम}

128.) GIST-DVTTRajashri {जिस्ट-डीवीटीटी राजश्री}

129.) GIST-DVTTRanjita {जिस्ट-डीवीटीटी रंजीता}

130.) GIST-DVTTSagar {जिस्ट-डीवीटीटी सागर}

131.) GIST-DVTTSamata {जिस्ट-डीवीटीटी समता}

132.) GIST-DVTTSamir {जिस्ट-डीवीटीटी समीर}

133.) GIST-DVTTShital {जिस्ट-डीवीटीटी शीतल}

134.) GIST-DVTTShweta {जिस्ट-डीवीटीटी श्वेता}

135.) GIST-DVTTSumeet {जिस्ट-डीवीटीटी सुमीत}

136.) GIST-DVTTSwapnil {जिस्ट-डीवीटीटी स्वपनिल}

137.) GIST-DVTTVasundhara {जिस्ट-डीवीटीटी वसुन्धरा}

138.) GIST-DVTTVijay {जिस्ट-डीवीटीटी विजय}

139.) GIST Hindi Tall {जिस्ट हिन्दी टॉल}

140.) Hemant {हेमन्त}

141.) Hemant Condensed {हेमन्त कण्डेंस्ड}

142.) Hemant Thin {हेमन्त थिन}

143.) Hemant Wide {हेमन्त वाईड}

144.) Hindi Saral-1 {हिन्दी सरल}

145.) HINDI012 {हिन्दी०१२}

146.) Hinmith... {हिंमिथ...}

147.) HINmith018 {हिंमिथ०१८}

148.) HINmith033 {हिंमिथ०३३}

149.) HTChanakya {एचटी-चाणक्य}

150.) iitmhind {आईआईटीएमहिंदी}

151.) iitmsans {आईआईटीएमसंस्कृत}

152.) Jagran {जागरण}

153.) JC-BELA {जेसीबेला}**

154.) JC_Hindi {जेसी_हिन्दी}

155.) Kanika {कनिका}

156.) Kautilya {कौटिल्या}

157.) KBC_25 {केबीसी_२५}

158.) KF-Kiran {केएफकिरण}

159.) Kiran {किरण}

160.) Krishna {कृष्णा}

161.) Kruti Dev 010 {कृतिदेव ०१०} 56.2KB

162.) Kruti Dev 010 {कृतिदेव ०१०} 59.2KB

163.) Kruti Dev 010 Condensed {कृतिदेव ०१० कण्डेंस्ड}

164.) Kruti Dev 016 {कृतिदेव ०१६}

165.) Kruti Dev 020 {कृतिदेव ०२० }

166.) Kruti Dev 020 {कृतिदेव ०२०}

167.) Kruti Dev 030 {कृतिदेव ०३०}

168.) Kruti Dev 040 {कृतिदेव ०४०}

169.) Kruti Dev 180 {कृतिदेव १८०}

170.) Kruti Dev 501 {कृतिदेव ५०१}

171.) KrutiPad 010 {कृतिपैड ०१०}

172.) KrutiPad 030 {कृतिपैड ०३०}

173.) Kundli {कुण्डली}

174.) LangscapeDevPooja {लैंगस्केपदेवपूजा}

175.) LangscapeDevPriya {लैंगस्केपदेवप्रिया}

176.) LokWeb {लोकवेब}

177.) ManjushaMedium {मंजुषामीडियम}

178.) Marathi-Kanak {मराठीकनक}

179.) Marathi-Kanchan {मराठीकंचन}

180.) Marathi-Lekhani-Ital {मराठीलेखनीइटाल}

181.) Marathi-Lekhani {मराठीलेखनी}

182.) Marathi-Roupya {मराठीरॉउप्या}

183.) Marathi-Saras {मराठीसरस}

184.) Marathi-Tirkas {मराठीतिर्कस}

185.) Marathi-Vakra {मराठीविक्रा}

186.) Marathi Sharada {मराठी शारदा}

187.) Marathi Tirkas {मराठी तिर्कस}

188.) MARmith0 {मराठीमिथ०}

189.) Maya {माया}

190.) MillenniumNilimaFX {मिलेनियम निलिमाएफएक्स}

191.) MillenniumVarun {मिलेनियम वरुण}

192.) MillenniumVarunFX {मिलेनियम वरुणएफएक्स}

193.) MillenniumVarunWeb {मिलेनियम वरुणवेब}

194.) MONARCH_devnagri {मोनॉर्क_देवनागरी}

195.) MONARCH_devnagri2 {मोनॉर्क_देवनागरी२}

196.) MSANGAM {एमसंगम}

197.) Naidunia {नईदुनिया}

198.) Narad-... {नारद—...}

199.) Narad {नारद}**

200.) NewDelhi {न्यूदेल्ही}

201.) NewDelhi {न्यूदेल्ही}**

202.) Pankaj {पंकज}

203.) Paras-Hindi {पारसहिन्दी}**

204.) Paru {पारु}

205.) Patrika {पत्रिका}

206.) PIC {पीआर्इसी}

207.) Radhika {राधिका}**

208.) Richa {रिचा}

209.) RK Sanskrit {आरके संस्कृत}

210.) ROHINI {रोहिणी}**

211.) Ruchi-Normal {रुचिनॉर्मल}

212.) Saji-Hindi {साज़िहिन्दी}

213.) Sanskrit {संस्कृत}

214.) Sanskrit 1.2 {संस्कृत १.}

215.) Sanskrit 98 {संस्कृत ९८}

216.) Sanskrit 99 {संस्कृत ९९}

217.) Sanskrit 99 ps {संस्कृत ९९ पीएस}**

218.) Sanskrit New {संस्कृत न्यू}

219.) Sanskrit99classic {संस्कृत९९क्लासिक}

220.) Sanskritpc {संस्कृतपीसी}

221.) SansPost {संस्कृत पोस्ट}**

222.) Saroj {सरोज}

223.) SD-TTSurekh {एसडी-टीटी सुरेख}

224.) Shiva-Medium {शिवामीडियम}**

225.) Shiva {शिवा}**

226.) Shivaji01 {शिवाजी ०१}

227.) Shivaji02 {शिवाजी ०२}

228.) Shivaji05 {शिवाजी ०५}

229.) ShivaMedium {शिवा मीडियम}

230.) Shree-Dev-001 {श्रीदेव००१}

231.) Shree-Dev-0702 {श्रीदेव०७०२}**

232.) Shree-Dev-0708 {श्रीदेव०७०८} 53.1KB

233.) Shree-Dev-0708 {श्रीदेव०७०८} 57.0KB

234.) Shree-Dev-0714 {श्रीदेव०७१४}

235.) SHREE-DEV-0726-S00 {श्रीदेव०७२६एस००}

236.) SHREE-DEV-0726-S01 {श्रीदेव०७२६एस०१}

237.) Shree-Pud-77NW {श्रीपुढ—77एनडब्ल्यू}

238.) SHREE-PUDHARI {श्रीपुढरी}

239.) SHREE708 {श्री७०८}

240.) Shusha {शुषा}

241.) Shusha02 {शुषा ०२}

242.) Shusha05 {शुषा ०५}

243.) st01web {एसटी०१वेब}

244.) SUBAK-1 {सुबक}

245.) SUBAK {सुबक}

246.) tbdsunil {टीबीडीसुनील}

247.) Udgam {उद्गम}

248.) Varsha {वर्षा}

249.) Vigyapti {विज्ञप्ति}

250.) Vimal {विमल}

251.) W-C-905 {डब्ल्यू-सी-९०५}**

252.) Walkman-Chanakya-901 **{वॉकमैन-चाणक्य-९०१}

253.) Walkman-Chanakya-902 {वॉकमैन-चाणक्य-९०२}

254.) Walkman-Chanakya-905 **{वॉकमैन-चाणक्य-९०५}

255.) Walkman-Yogesh-Outline-1003 **{वॉकमैन-