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एक नए ब्‍लॉगर का शिकायतनामा (अविनाश वाचस्‍पति)

मित्र मेरे जो पढ़ते हैं मेरा लिखा
मेरी रचना का कहते हैं स्‍वाद चखा

न जाने कैसे टिप्‍पणी तो कर जाते हैं
चाहे टिप्‍पणी हो कैसी भी पर वे मेरे
तो मन को खूब भाते हैं
, शिकायत :
पर पसंद पर चटका लगाना भूल जाते हैं ?

पसंद चटकाने से रचना का मजा हो जाता है दूना
जितनी पसंद चटकती हैं आनंद बढ़ता है कई गुना।


एक नए ब्‍लॉगर का शिकायतनामा है। जिसको भावों में मैंने बांध दिया है। इतना गूढ़ संदेश खुले शब्‍दों में उतार दिया है।
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बरखा दत्त की फिल्म के बहाने जरा सोचिए


विजय दिवस के नाम पर पर देश के अधिकांश हिंदी चैनल भले ही लोगों को शर्तिया तौर पर भावुक करने में जुटे हों, हम तुम्हें आज रुला कर ही छोड़ेगे के अंदाज़ में भाषा और शब्दों का जबरन इस्तेमाल कर रहे हों, लेकिन इन सबसे अलग NDTV24×7 पर बरखा दत्त की ओर से पेश की गयी, लगभग चालीस मिनट की फिल्म REMEMBERANCE KARGIL TEN YEARS LATER ये साबित कर देती है कि कम शब्दों के जरिये भी हम संवेदना के स्तर पर मज़बूती से बात कर सकते हैं। ऐसे मौके पर हिंदी के तमाम न्यूज़ चैनल्स, जहां टेलीविजन को टेलीविजन रहने ही नहीं देना चाहते, वो उसे रेडियो में कन्वर्ट करने पर आमादा हो जाते हैं, वहीं बरखा दत्त इस फिल्म के जरिये टेलीविज़न की ताक़त को रीडिफाइन करती नज़र आती हैं। अभिव्यक्ति के स्तर पर ये पूरी फिल्म इस थ्योरी पर बनी है कि SOME MOMENTS ARE WORDLESS। कुछ ऐसे ही मौक़े होते हैं, जहां कुछ भी कहना नहीं होता, उसके लिए कुछ शब्द भी नहीं होते, गहराई तक जाने के लिए बस हमें उससे होकर गुज़र जाना भर होता है। टेलीविज़न की ज़रूरत और ताक़त यहीं समझ में आती है।

फिल्म की शुरुआत बहुत ही सादे और स्वाभाविक तरीके से होती है। बरखा दत्त करगिल के उन इलाक़ों में पहुंचती है, जहां से आज से ठीक दस साल पहले 26 साल की उम्र में होकर वो गुजरीं, करगिल युद्ध को कवर किया और देशभर में इतनी पॉपुलर जर्नलिस्ट बनी कि बॉलीवुड ने इसकी छवि का इस्तेमाल करते हुए लक्ष्य जैसी फिल्म बनायी। पूरा लेख मीडिया ख़बर.कॉम पर। READ MORE
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मीडिया का भी कबाड़ा, राजनीति और फिल्मों की तरह

प्रभाष जोशी भन्नाए हुए हैं। उनका दर्द यह है कि पत्रकारिता में सरोकार समाप्त हो रहे हैं। हर कोई बाजार की भेंट चढ़ गया है। क्या मालिक और क्या संपादक, सबके सब बाजारवाद के शिकार। कभी देश चलानेवाले नेताओं को मीडिया चलाता था। आज, मीडिया राजनेताओं से खबरों के बदले उनसे पैसे वसूलने लगा हैं। देश भर में दिग्गज पत्रकार कहे जाने वाले प्रभाष जोशी बहुत आहत हैं। अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा, जैसा चल रहा है, तो सरोकारों को समझने वाले लोग मीडिया में ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेंगे। हालात वैसे ही होंगे, जैसे राजनीति के हैं। वहां भी सरोकार खत्म हो रहे हैं। पद और अपने कद के लिए कोई भी, कुछ करने को तैयार है।

यह विकास की गति के अचानक ही बहुत तेज हो जाने का परिणाम है। अपना मानना है कि भारत में अगर संचार से साधनों का बेतहाशा विस्तार नहीं हुआ होता, तो आज जो हम यह, भारतीय मीडिया का विराट स्वरूप देख रहे हैं, यह सपनों के पार की बात होती। पूरा लेख मीडिया ख़बर.कॉम पर । यहाँ क्लिक करें।
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कार्टून-पनडुब्बी ..

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सेक्स, सेक्सुएलिटी और संस्कृति

योग गुरू बाबा रामदेव लोगों को ये सिखाते नहीं थकते कि जिंदगी में संयम बनाये रखना है तो योग की शरण में आओ। लेकिन धारा 377 को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले पर अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पाये। समलैंगिकता को लेकर एक टीवी चैनल पर बहस के दौरान बाबा ने जो कहा उसे यहां लिखा नहीं जा सकता मगर उनका मतलब ये था कि " वो जगह किसी और काम के लिये है" यौन संबंध के लिये नहीं। तमाम धर्माचार्य भी कोर्ट के इस फैसले से आग बबूला हैं। इनके मुताबिक समलैंगिकता धर्म विरोधी है, घृणित कर्म है, एक मानसिक विकृति है, एक ऐबरेशन यानि विचलन है जिसका विरोध न किया गया तो समाज का पतन निश्चित है। बाबा और धर्माचार्यों को समझने के लिये भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास सब ताक पर रखनी पड़ेगी। क्योंकि इन महापुरूषों ने भारतीय संस्कृति का एक नया इतिहास रचने का हठ कर लिया है। इस नये इतिहास का पहला चैप्टर सेक्स और समलैंगिकता पर होगा। इसमें खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों के इरॉटिक शिल्पकारी की बात नहीं बतायी जायेगी, उन चित्रों में दिखाये गये ओरल सेक्स का जिक्र बाबा की किताब में नहीं होगा। READ MORE...
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अखबार में अशुद्ध शब्दों की भरमार

अभिव्यक्ति के जो कई माध्यम हैं, उनमें भाषा का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। ध्वनियों ने लिपि को विकसित किया और लिपियों ने अक्षरों को विकसित किया। अक्षर ध्वनि और लिपि का सर्वोच्च रूप है। भाषा में भी ध्वनि,लिपि और अक्षर का ही महत्व है। इसी के आधार पर हम अपनी बात संप्रेषित करते हैं। मीडियाकर्मी अपनी बात यानी खबर को भाषा के माध्यम से संप्रेषित करते हैं। इसलिए उनके लिए उस भाषा और वर्तनी का काफी महत्व है, जिसके ज़रिये वे खबर को संप्रेषित करते हैं।

मैं जब सुबह उठ कर अखबार उठाता था, तो भाषा और वर्तनी की अशुद्धियों की भरमार पाता था। पटना से प्रकशित सभी दैनिकों की मैं बात कर रहा हूं- नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और आज सबकी। इनमें तो ‘आज’ में बहुत सारी अशुद्धियाँ रहती थीं। देख कर मन खिन्न हो जाता था। उन अशुद्धियों को दूर करने के लिए मैं अपने स्तम्भ-लेखन का प्रूफ़ खुद पढ़ता था। वे स्तम्भ थे-‘कस्बानामा’,नगर-चर्चा,‘कथन’। लेकिन बाद में सोचा कि मैं इनमें अपनी आंखे गड़ाने में ही सारा समय लगा दूंगा, तो फिर लिखूंगा कब? इसीलिए मैं जो कुछ भी लिखता था, समाचार के अलावा,उनका भी प्रूफ़ नहीं पढ़ता था। वैसे, बहुत सारे पत्रकार लिखते भी गलत हैं। शायद ही कोई ‘संन्यासी’ लिखता है, ज्यादातर लोग ‘सन्यासी’ ही लिखते हैं जो गलत है। उस समय मेरे साथ काम करने वाले कई सहयोगी कागजात की जगह कागजातों लिखते थे। कागज का बहुवचन कागजात है। फिर कागजातों की क्या जरूरत है। इसी तरह हमलोगों के ही अखबार में ‘गण्यमान्य’की जगह ‘गणमान्य’ छपा था। मैंने अपने सहकर्मी को बताया कि यह शब्द गलत है। लेकिन वे मानने के लिए तैयार नहीं थे। मैंने उन्हें समझाते हुए कहा-अलग-अलग देखें,तो ‘गण’ भी ठीक है और ‘मान्य’ भी। READ MORE...
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बलात्कारियों का बलात्कार क्यों ना हो . चलो बेशर्मी की हद पार की जाये

मैं सुबह उठती हूं तो अमूमन अच्छी बातें सुनना और देखना पसंद करती हूं । खुदा को याद करने के बाद मैं हमेशा टीवी खोल देती हूं क्योंकि ऑफिस पहुंचने के बाद टीवी जर्नलिस्ट होने के बावजूद टीवी देखना नसीब नहीं हो पाता। एक बड़ा चैनल दृश्य दिखा रहा था. एक औरत के जिसको पटना की सड़कों पर खुलेआम इधर उधर से छुआ जा रहा था औऱ कई सारे लड़के उसे हर तरफ से घेर कर बेइज्जत कर रहे थे और कपड़े खींच रहे थे . मैंने देखा कि दूर खड़े लोग हंस रहे थे औऱ नामर्दों की तरह तमाशा देख रहे थे . देख कर आखे फंटी रह गई औऱ कुछ सेकंड में ही आंसूं फूंटने लगे . हैरत हुई ये देखकर कि अहम मर चुका है , खून ठंडा हो चुका है औऱ बुजदिली छा गई है . ऐसा लगा जैसे किसी ने जोर से मेरे मुंह पर तमाचा मारकर मेरी औकात बताई हो क्योंकि मैं भी एक लड़की हूं . देख कर बहुत तकलीफ हुई और चिंता हुई कि जब तक हमारी औलादें होंगी औऱ बड़ी होंगी तब तक कहीं इससे भी बदतर हालात ना हो जायें . पूरा लेख मीडिया ख़बर.कॉम परपढ़ सकते हैं। Read More........
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कारगिल के शहीदों को प्रणाम ' आंसू जो कविता बन गये '

मातृभूमि की रक्षा से देह के अवसान तक
आओ मेरे साथ चलो तुम सीमा से शमशान तक
सोये हैं कुछ शेर यहां पर धीरे धीरे आना
आंसू दो टपका देता पर ताली नहीं बजाना

शहीद की शवयात्रा देख कर मुझमें भाव जगे

चाहता हूं तुझको तेरे नाम से पुकार लूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

बारंबार पिटा सीमा पर भूल गया औकात को
चोरी चोरी लगा नोचने भारत के जज्‍बात को
धूल धूसरित कर डाला इस चोरों जैसी चाल को
मार पीट कर दूर भगाया उग्र हुए श्रंगाल को
इन गीदड़ों को रौंद कर जिस जगह पे तू मरा
मैं चूम लूं दुलार से पूजनीय वो धरा
दीप यादों के जलाऊं काम सारे छोड़कर
चाहता हूं भावनाएं तेरे लिए वार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

सद्भावना की ओट में शत्रु ने छद्म किया
तूने अपने प्राण दे ध्‍वस्‍त वो कदम किया
नाम के शरीफ थे जब फौज थी बदमाश उनकी
इसलिए तो सड़ गयी कारगिल में लाश उनकी
सूरत भी न देखी उनकी उनके ही परिवार ने
कफन दिया न दफन किया पाक की सरकार ने
लौट आया शान से तू तिरंगा ओढ़कर
चाहता हूं प्‍यार से तेरी राह को बुहार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद की मां को प्रणाम

कर गयी पैदा तुझे उस कोख का एहसान है
सैनिकों के रक्‍त से आबाद हिन्‍दुस्‍तान है
तिलक किया मस्‍तक चूमा बोली ये ले कफन तुम्‍हारा
मैं मां हूं पर बाद में, पहले बेटा वतन तुम्‍हारा
धन्‍य है मैया तुम्‍हारी भेंट में बलिदान में
झुक गया है देश उसके दूध के सम्‍मान में
दे दिया है लाल जिसने पुत्र मोह छोड़कर
चाहता हूं आंसुओं से पांव वो पखार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद की पत्‍नी को सम्‍मान

पाक की नापाक जिद में जंग खूनी हो गयी
न जाने कितनी नारियों की मांग सूनी हो गयी
हो गयी खामोश उसकी लापता मुस्‍कान है
जानती है उम्र भर जीवन तेरा सुनसान है
गर्व से फिर भी कहा है देख कर ताबूत तेरा
देश की रक्षा करेगा देखना अब पूत मेरा
कर लिए हैं हाथ सूने चूडि़यों को तोड़कर
वंदना के योग्‍य देवी को सदा सत्‍कार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद के पिता को प्रणाम

लाडले का शव उठा बूढ़ा चला शमशान को
चार क्‍या सौ सौ लगेंगे चांद उसकी शान को
कांपते हाथों ने हिम्‍मत से सजाई जब चिता
चक्षुओं से अक्ष बोले धन्‍य हैं ऐसे पिता
देश पर बेटा निछावर शव समर्पित आग को
हम नमन करते हैं उनके, देश से अनुराग को
स्‍वर्ग में पहले गया बेटा पिता को छोड़कर
इस पिता के चरण छू आशीष लूं और प्‍यार लूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद के बालकों को प्‍यार दुलार

कौन दिलासा देगा नन्‍हीं बेटी नन्‍हें बेटे को
भोले बालक देख रहे हैं मौन चिता पर लेटे को
क्‍या देखें और क्‍या न देखें बालक खोये खोये से
उठते नहीं जगाने से ये पापा सोये सोये से
हैं अनभिज्ञ विकट संकट से आपसे में बतियाते हैं
अपने मन के भावों को प्रकट नहीं कर पाते हैं
उड़कर जाऊं दुश्‍मन के घर उसकी बांह मरोड़कर
बिना नमक के कच्‍चा खाकर लंबी एक डकार लूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद की बहन को स्‍नेह

सावन के अंतिम दिवस ये वेदना सहनी पड़ेगी
जो कसक है आज की हर साल ही सहनी पडे़गी
ढूंढ़ती तेरी कलाई को धधकती आग में
न रहा अब प्‍यार भैया का बहन के भाग में
किस तरह बांधे ये राखी तेरी सुलगती राख में
न बचा आंसू कोई उस लाडली की आंख में
ज्‍यों निकल जाए कोई नाराज हो घर छोड़कर
चाहता हूं भाई बन मैं उसे पुचकार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

पाक को चेतावनी

विध्‍वंस के बातें न कर बेवजह पिट जायेगा
तू मिटेगा साथ तेरा वंश भी मिट जायेगा
कुछ सीख ले इंसानियत तेरा विश्‍व में सम्‍मान हो
हम नहीं चाहते तुम्‍हारा नाम कब्रिस्‍तान हो
चेतावनी है हमारी छोड़ आदत आसुरी
न रहेगा बांस फिर और न बजेगी बांसुरी
उड़ चली अग्‍नि अगर आवास अपना छोड़कर
चाहता हूं पाक को मैं जरा ललकार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं
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दाल के बहाने

पीली दाल,तूअर दाल या कि अरहर दाल का भाव सौ रुपए के आसपास चल रहा है। इससे घरों के मीनू में तो फर्क पड़ ही रहा है। पर हिन्‍दी साहित्‍य के मीनू में भी बदलाव करना पडे़गा। अब अगर दाल में काला भी हो तो भी आप उसे फेंक नहीं सकते। इसलिए ‘दाल में काला है’ कहने से भी बचना होगा। हम कहते रहे हैं कि ‘दाल-रोटी चल रही है।‘ सावधान रहिए। कहीं इनकमटैक्‍स वालों ने सुन लिया तो हो सकता है कि आपके यहां रेड पड़ जाए। किसी के घर में अगर आपको दावत में गलती से अरहर की दाल परस दी जाए तो आप अपने को सम्‍मानित महसूस करिएगा।

दिल्‍ली के बहुत सारे ढाबों और सामान्‍य होटलों में आम तौर पर पीली दाल नहीं मिलती है। हम जैसे मध्‍यप्रदेशी दालखाऊ जब वहां जाकर पीली दाल मांगते हैं तो होटल वाला हिकारत से देखता है, जैसे कह रहा हो पीली दाल भी कोई खाने की चीज है। अजी खाना हो तो काली दाल खाइए। पर अब लगता है वह हमें आदर से बिठाएगा और अपने वेटर से कहेगा,साब को पीली दाल लगाओ। दूसरे शब्‍दों में चूना लगाओ।

अब आप कहेंगे कि घर की मुर्गी दाल बराबर। तो मुर्गी भी गर्व महसूस करेगी। वैसे अब तो आपको कहना चाहिए घर की दाल मुर्गी बराबर। गाहे बगाहे रास्‍ते में दाल रोटी खाने के लिए पैसे मांगने वालों को मांगते समय सोचना पड़ेगा कि वे अब क्‍या बोलें। शायद चिकन खाने के लिए पैसे मिल जाएं, पर दाल के लिए न मिलें।

वैसे समय के साथ हमें कई मुहावरों या कहावतों में बदलाव कर लेना चाहिए। जैसे हम कहते रहे हैं कि पैसे को पानी की तरह मत बहाओ। लेकिन अब स्थिति यह है कि कहना चाहिए पानी को पैसे की तरह मत बहाओ।
मैंने केवल इशारा कर दिया है बाकी काम आप सब काम आप करिए।
*राजेश उत्‍साही
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"क्या माजरा था?"

***राजीव तनेजा***
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"आज जन्मदिन है मेरा..लेकिन दिल उदास है..पुरानी यादें जो ताज़ा हो चली हैँ"....
"उस दिन भी तो जन्मदिन ही था मेरा जब मै अड गया था कि गिफ्ट लेना है तो बस कम्प्यूटर ही लेना है..उसके अलावा कुछ नहीं"
"ज़िद क्यों ना करता मैँ?"...
"आखिर पास जो हो गया था मैँ लगातार तीन साल फेल होने के बाद"
"अब आपको भला क्यों बताऊँ कि कैसे ले-दे के पास हुआ था मैँ?"
"पिताश्री के हज़ार ना-नुकुर करने के बाद भी ज़िद पे अडा रहा मैँ"...
"हज़ार फायदे समझाए कि... इस से ये कर सकते है और ...वो भी कर सकते हैँ"
"तब जा के बडी मुशकिल से माने और कंपयूटर खरीद के देना ही पडा उनको"
"पूरे पचास हज़ार खर्चा हुए"
"अब तो खैर इतने में तीन भी आ सकते हैँ...ज़माना जो बदल गया है"
"आता-जाता तो कुछ था नहीं लेकिन एक दोस्त ने कुछ ऐसे गीत गाए कम्प्यूटर के कि... रहा ना गया"
"अब यार!...नयी-नयी जवानी की शुरूआत हुई थी और उस दोस्त ने जैसे बारूद के ढेर को चिंगारी दिखा दी हो"
"जो मैँ कभी सपने में भी नहीं सोच सकता,उस सब भी दर्शन करवा दिये उसने बातों-बातों में"
"एक से एक टाप की आईटम"...वो कान में धीरे से फुसफुसाते हुए बोला
"अब अपने मुँह से कैसे कहूँ?"कि क्या-क्या सपने दिखाये उसने
"अब तो ना 'टीवी' की तरफ ही ध्यान था और ना ही 'दोस्त-यारों' की यारी की तरफ"
"दाव लगा के 'पत्ते' खेलना तो मैँ जैसे भूल ही गया था"
"काफी मान-मनौवल के बाद पिताजी ने हाँ कर दी....बस!...फिर क्या था?....मैने आव देखा ना ताव और चल दिया तुरंत ही कम्प्यूटर खरीदने"....
"इंटर्नैट तो सबसे पहले लगवाना ही था"...
"सो!...लगवा लिया"...
"उसके बिना भला कम्प्यूटर किस काम का?"
"असली जलवा तो इंटरनैट का ही था"....
"दोस्त ने कुछ उलटी-पुलटी 'साईट्स' के पते भी मुँह ज़बानी रटवा दिए थे अपुन को"
"सो जैसे ही नैट चालू हुआ...इधर-उधर चुपके से देखा"...
"कोई नहीं था"...
"झट से दरवाज़ा बन्द किया और चला दी वही वाली स्पैशल वाली साईट"
"देख के चक्कर खा गया कि दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही है और हम है कि बस कुँए में बसे मेंढक की तरह....
"अभी देख ही रहा था कि पता नहीं कहाँ क्लिक करने के लिए लिखा हुआ आया और मुझ नादान ने बिना आगा-पीछा सोचे झट से वहीं क्लिक कर दिया"
"अभी सोच ही रहा था कि देखें अब क्या होता है?कि दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आयी"...
"हड़बड़ाहट में घबरा के साईट बन्द करने की कोशिश कि तो ...
"ये क्या?"....
"एक को बन्द करो तो स्साली फुदक के दूसरी टपक पडती"
"उसको बन्द करो तो कोई और टपक पडती"...
"एक तरफ पसीने छूट रहे थे इनके जलवे देख-देख और दूसरी तरफ लग रहा था कि आज तो पिताजी दरवाज़ा तोड़ ही डालेंगे"...
"खडकाए पे खडकाए जो चले जा रहे थे"
"तनिक भी सब्र नहीं होता आजकल के बुढों को"...
"बन्दे को सौ काम हो सकते हैँ"....
"अब कौन समझाए इनको कि अब मैँ बडा हो गया हूँ?"...
"कम से कम अब तो ये टोका-टाकी बन्द करो"
"इधर मुय्या कंप्यूटर था कि आफत पे आफत खडी करने को तैयार"
"उफ!...कैसे बन्द करूँ इस मरदूद को?"
"कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?...और क्या ना करू?"

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"इतने में शुक्र है कि लाईट चली गयी और जान में जान आयी"
"दिमाग चक्कर खाने को था कि क्या ऐसा भी हो सकता है ?"
"जिनको हम बडे पर्दे पर देख-देख 'आहें' भरा करते थे...
गुपचुप 'शरमाया' करते थे...
वो साक्षात मेरे सामने बिना.....
"हाय राम!....अपने मुँह से कैसे कहूँ?"
"लेकिन दिल था कि..खुशी के मारे बल्लियों उछल-उछल के फुदक रहा था" ...
"रात के तीन बज चुके थे....आँखे लाल हुए जा रही थी"....
"नींद आँखो से कोसों दूर ...नामोनिशां भी नहीं था उसका"
"सर्दी के मौसम में भी पसीने छूट रहे थे"
"कहीं कुछ मिस ना हो जाए...इसलिए झट से प्रिंटर का बटन दबा दिया".
"रूप की देवियाँ साक्षात मेरे सामने ....एक-एक करके प्रिंटर से बाहर निकल खुद ही मुझ से मिलने को बेताब हुए जा रही थी मानो उनमें होड़ सी लगी थी कि पहले मैँ मिलूगी राजीव से ....और पहले मैँ"...
"कमर का एक-एक बल तक साफ झलक रहा था"
"उफ!...क्या फिगर था?"....

"हाय!... वो 'लचकती'.....बल खाती कमर....मैँ सदके जाऊँ"
"गला सूख रहा था लेकिन पानी के लिये उठने का मन किस कम्भख्त का कर रहा था?"
"सुबह तक कार्डिज की वाट लग चुकी थी"
"पता किया तो पूरे 'ढाई हज़ार' का फटका लग चुका था एक ही रात में"
"बाद में पता चला कि...'टेलीफोन'...'पेपर'...और 'नैट'के पैसे एक्स्ट्रा"
"कुल मिला के 'तीन हज़ार' मिट्टी हो चुके थे एक ही रात में"
"अगले दिन पिताश्री को कंप्यूटर दिखाने के लिये खोला तो ऑन करते ही फटाक से हडबडाते हुए तुरंत ही बन्द करना पडा"
"पता नहीं कहाँ से एक बालीवुड सुन्दरी की बिलकुल ही *&ं%$#@ फोटू आ के चिपक गयी थी मेन स्क्रीन पे"
"बहाना बनाना पडा कि "पता नहीं क्यों 'शट डाउन' हो रहा है अपने आप?"
"ऑन ही नहीं हो रहा है ठीक से"
"अब फोटू हटाना किस कम्भख्त को आता था?"
"फोन घुमाया तो मकैनिक ने जवाब दिया.."अभी टाईम नहीं है,अगले हफ्ते आऊँगा"
"लगता जैसे कोई बिजली सी टूट के गिरी मेरे सुलगते अरमानों पर"
"इतने दिन जिऊँगा कैसे मैँ? और अब किसके लिये जिऊँ भी मैँ"
"इस भरी दुनिया में कम्प्यूटर के अलावा मेरा और था ही कौन?"...
"निराश हो चला था मैँ "
"शायद!...बक्शीश ना देने का दंड भुगतना पड रहा था मुझे"
"बदला ले रहा था वो कम्बख्त मुझसे"...
"लाख गिड़गिड़ाया उसके आगे....बडी रिकवैस्ट की लेकिन उल्लू का पट्ठा नहीं माना"
"गुस्सा तो मुझे इतना आया कि बस पूछो मत"...
"अगर मज्बूरी ना होती तो बताता इस बद-दिमाग को"...
"खैर!...थक हार कर जब जेब गरम करने का वादा किया तो अगले दिन आने की कह फोन काट दिया हरामखोर ने"
"स्साला!...लालच का मारा मतलबी इनसान"
"अब दिन काटे नहीं कट रहा था और रात बीते नहीं बीत रही थी "
"बार-बार घडी देखता कि अब इतने घंटे बचे हैँ और अब इतने उसके आने में"
"घडी की सुइयाँ मानो अपनी रफ्तार खो घूमना ही भूल चुकी थी"
"रत्ती भर खिसकना भी मानो जैसे गुनाह था उनके लिए"
"खैर!...बड़ी मुश्किल से किसी तरह वक़्त कटा और सुबह होने को आयी"
"आँखे दरवाज़े पर टिकी थी और कान घंटी की आवाज़ सुनने को बेताब"
"ऊपरवाले के रहम ओ करम से इंतज़ार की घडियाँ खत्म हुई और वो आ पहुँचा"
"आते ही मेरी हालत देख मन्द-मन्द मुस्काया...फिर इधर-उधर कुछ बटन दबाए और वो गायब हो चुकी थी"
"पैसे तो लग गये लेकिन जान में जान आ ही गयी"
"बस उसके बाद कुछ ही दिनों में कम्प्यूटर का गुलाम हो चुका था मैँ पूरी तरह से"....
"शायद!...पिताश्री को भी कुछ-कुछ भनक लग चुकी थी मेरी हरकतों की"
"नज़र सी रखने लगे थे मुझ पर"...
"कुछ-कुछ शक सा भी करने लगे थे कि पूरी-पूरी रात जाग-जाग कर आखिर ये करता क्या है?"
"एक दिन वही हुआ जिसका मुझे अंदेशा था....

पता नहीं कैसे पिताजी के हाथ वो प्रिंट-आउट लग गये? और मुझे नैट के साथ-साथ कम्प्यूटर  से भी हाथ धोना पडा"
"अब कमप्यूटर उनके कमरे में शिफ्ट हो चुका था"....
"पता नहीं क्या करते रहते हैँ पिताश्री सारी-सारी रात?"
"अब  ज़्यादातर उनका कमरा अन्दर से बन्द रहने लगा था"...

"साथ ही टेलीफोन भी कुछ ज़्यादा ही बिज़ी रहने लगा था"
"अब तो ये वो ही जाने या फिर ऊपरवाला जाने कि आखिर माजरा क्या था?"


***राजीव तनेजा***

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कहाँ हो कृष्ण?

हे कृष्ण...हे कृष्ण....! शूरमाओं से भरी महफिल में जब एक 'अबला' स्त्री की इज्जत नीलाम हो रही थी और वहां बैठे एक भी 'मर्द' की मर्दानगी नहीं जागी, तो उसने अपनी अंतिम आस 'भाई' को गुहार लगाई, फिर उसकी लाज बचाने कृष्ण आ गए...यहां भी एक अबला का चीरहरण हो रहा था और सब के सब उसी तरह तमाशबीन बने हुए थे। आर्यावर्त की इस धरती पर सैंकड़ों लोगों के बीच न तो किसी की आत्मा ने उस अबला की दर्द भरी आवाज सुनी और न ही किसी ने कलयुग का कृष्ण बनकर उसकी इज्जत बचाई. बस इस 'चीरहरण' को पब्लिक बड़े चाव से देखती रही. पूरा लेख आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। यहाँ क्लिक करें।
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हड़ताल पर भगवान

शीर्षक पढकर कहीं आप सोच में तो नहीं पड़ गए। अगर अभी तक नहीं सोच रहे हैं तो फिर सोचना शुरू कर दीजिये। क्यूंकि अगर अभी भी आपने नहीं सोचा तो आपके साथ भी वो हो सकता है जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश के मरीजों के साथ हो रहा है। निशचित ही मरीज तो आप भी कभी न कभी रहें होंगे और आगे भी कभी रह सकते हैं। खैर भगवान न करे कि आप कभी मरीजों की श्रेणी में आयें क्योंकि अगर आप इस कैटेगरी में आ गए तो आप भी कहेंगे कि वाकई भगवान हड़ताल पर हैं।

मेरी इतनी लंबी बकवास के बाद तो आप शायद समझ गए होंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और उत्तरप्रदेश के जूनियर डॉक्टर पिछले कई दिनों से हड़ताल पर हैं। मरीजों के लिए भगवान का दूसरा रूप कहे जाने वाले डॉक्टर भी हड़ताल पर हो तो बेचारे मरीजों का क्या होगा। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी मांगें उनके साथ-साथ मरीजों के हित में भी हैं। अब जरा मध्यप्रदेश में इन डॉक्टरों की मांगों पर भी थोड़ा गौर कर लीजिये। फीस में पचास प्रतिशत की कमी, प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों की गैरमान्यता प्राप्त 74 सीटों को मान्यता देने की मांग और मेडिकल छात्रों को अस्पताल में ड्यूटी के दौरान इंशयोरेंस। इसके साथ एक खास मांग और भी सुनिये। स्टायपेंड बढ़ाने की मांग। फिलहाल मध्यप्रदेश में इंटर्न के दौरान 3000, पीजी प्रथम वर्ष को 16000, द्वितीय वर्ष को 16500 और तृतीय वर्ष को 17000 रूपये स्टायपेंड दिया जा रहा है। अब ये डॉक्टर इंटर्न को 8000 और पीजी के छात्रों को क्रमश: 28000, 29000 और 30000 स्टायपेंड दिये जाने की मांग कर रहे हैं। मरीजों की जान की परवाह किये बिना अपने पैसे बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देने वाले डॉक्टरों को आखिर क्यूं भगवान माना जाए। अपने केबिन में भगवान की फोटो लगाना और खुद को भगवान मानने में थोड़ा फर्क है। एक खास बात और। जिन मरीजों के हितों की बात ये डॉक्टर कर रहे हैं उनसे जरा ये पूछा जाये कि सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले कितने लोगों को 17000 रूपये स्टायपेंड मिलता है। लेकिन ये डॉक्टर है कि भगवान और धनवान में अंतर ही नहीं समझते। अंकुर विजयवर्गीय द्वारा लिखित इस पूरे लेख को आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। यहाँ क्लिक करें ।
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बंगलौर: दो

फूल यहां
अल्लसुबह
बगीचे में नहीं महिलाओं की
चोटी में खिलते हैं
राह चलते नजरें उनके नितम्बों पर नहीं
उनकी चोटियों के साथ झूलती वेणियों पर टिकती हैं
फूलों की सुंदरता निहारते हम नितम्बों
की मोहक गति भूल जाते हैं

हमारा आदिम मन
वासना नहीं साधना
की ओर जाता है
सोचते हैं फूलों के रंग
वेणी की बनावट उसमें फूलों की सजावट
सोचते हैं
वेणी बनाने वाले
धागे में फूल पिरोने वाले
हाथों के बारे में

सोचते हैं
उन्हें बगीचे में
देर रात या कि मुंह अंधेरे
पौधे से उतारने वाले
कांपते हाथों के बारे में

सोचते हैं
साइकिल के पीछे
परातनुमा डलिया में रखकर फर्राटा भरते छोकरे के बारे में
या कि
सिर पर धरे डलिया
आवाज लगाती
बिना अपने बालों में लगाए वेणी वेणी बेचती औरत के बारे में

सोचते हैं
यहां अल्लसुबह
जैस्मी‍न, सेंवती और ऐसे तमाम फूलों के बारे में
जो बगीचे में नहीं महिलाओं के जूडे़ में
खिलते हैं।

राजेश उत्सा़ही
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अजन्ता शर्मा की कविता - मल्हार

छवि- अजन्ता शर्मा

परिचय- अजन्ता शर्मा


अजंता शर्मा नोयडा से हिंदी की अत्यंत संभावनशील युवा कवयित्री हैं। ‘नुक्कड़’ के सुधी पाठकों के लिये मैं उनकी यहां एक कविता मल्हार प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें इस मौसम के अनुकूल एक सरस-सलिला प्रेम-विरह की बानगी निखर कर सामने आयी है जिससे आशा है, आप अभिभूत हुये बिना नहीं रहेंगें। आपसे अनुरोध होगा कि इनकी हौसला-आफ़जायी के लिये आप कविता पर अपनी ओर से टिप्पणी देना न भूलें- सुशील कुमार।

मल्हार

अचानक
किसी बसंती सुबह
तुम गरज बरस
मुझे खींच लेते हो
अंगना में .
मैं तुममें
नहा लेने को आतुर
बाहें पसारे
ढलक जाती हूँ .
मेरा रोम रोम
तुम चूमते हो असंख्य बार .
अपने आलिंगन में
भिगो देते हो
मेरा पोर पोर.
मेरी अलसाई पलकों पर
शीत बन पसर जाते हो.
माटी के बुलबुलों में छुपकर
मेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
नाखूनों से खुरचती हूँ
जमीन.
और हाथ पसार
कुछ मुक्ता जुटाती हूँ.
शिख नख
तुम ह्रदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो
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इतनी जल्दी क्या है!

जब से कसब ने अपना गुनाह कबूला है, उसे फांसी पर लटका दिए जाने की दलीलें तेज़ हो गई हें। बात भी सही है जब सब कुछ साफ़ साफ़ है तो अब देर किस बात की, कम से कम उन शहीदों की आत्मा को तो शान्ति मिलेगी जो इस हादसे की चपेट में आए थे।
लेकिन मुझे लगता है की हमें इस मुद्दे के दूसरे पहलु पर भी गौर करना चाहिए, अत्यधिक भावनाओं में बहकर कुछ ठोस कदम लेने से पहले। कसब ने भले ही एक जघन्य कृत्य किया है पर यह कृत्य उससे जिन लोगों ने करवाया है वे लोग अभी हमारे दायरे में नही आए हें। हमारे पास उन लोगों के ख़िलाफ़ कोई पुख्ता सबूत नही हें और इसीलिए पाकिस्तान अब तक उन्हें सुरक्षित पनाह देने में सफल रहा है। जिस तरह की आँख मिचौली इस पूरे कृत्य के असली मुजरिम लख्वी के मामले में देखने को मिली है उससे लगता नही की इतनी आसानी से इस जघन्य काण्ड के असली करता धरता कभी क़ानून के चंगुल में आकर अपने किए की सज़ा पायेंगे। कसब तो बस एक मोहरा है, एक छोटा सा प्यादा, इस खेल के असली वजीर तो अभी भी हमें मात दे रहे हें।
ऐसे में इस पूरे मामले की एकमात्र कड़ी, एकमात्र सबूत जो शुरू से इस पूरे काण्ड के रचयिताओं के साथ रहकर प्रक्षिक्षण लिया है, उसे अगर हम मार देंगे तो यकीन मानिए, हमसे ज्यादा खुश तो वो लोग होंगे। वो तो ख़ुद भी कब से कसब को मिटा देना चाहते होंगे, इसीलिए तो उसे इस दर्जे की सुरक्षा देनी पड़ रही है।
कसब की ज़िन्दगी की उनके लिए कोई अहमियत नही, उसके जैसे कितने और अभी वहाँ प्रशिक्षण ले रहे होंगे। सुसाईड बोम्बेर्स की वहाँ कोई कमी थोड़े ही है। वहाँ तो खेती है इसकी। अभी अगर कसब बचकर निकल गया(जो की असंभव है!) तो उन्हें कोई फर्क थोड़े पड़ेगा।
लेकिन कसब की ज़िन्दगी की अहमियत हमारे लिए हो सकती है, उन लोगों तक पहुँचने के लिए, उनके बारे में और बातें जानने के लिए। कसब को मारकर हमारी उन ज्वलंत भावनाओं को तो शान्ति मिल सकती है लेकिन मैं नही चाहती की ऐसा हो, क्योंकि जब तक असली गुनाहगार जिन्होंने ये पूरा खेल रचा है उन्हें सज़ा नही मिल जाती, ये आग जलते रहनी चाहिए, ये जूनून, ये दबाव कायम रहना चाहिए। कसब अब हमारे कब्जे में है, उसका जिंदा बचना नामुमकिन है, तो फ़िर चिंता किस बात की। हमें उसे पूरी तरह से इस्तेमाल करके ही ख़त्म करना चाहिए। यही ऐसे लोगों की सज़ा है, रोज़ मर मर के जीना, रोज़ अपनी मौत की राह देखना।
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सच का सामना या निजता में सेंध


इन दिनों टीवी चैनलों में टीआरपी बढ़ाने के लिए जिस तरह से आपाधापी हो रही है, वह पहले कभी नहीं थी। इसके चलते ये टीवी चैनल इस तरह के फूहड़ और अश्लील कार्यक्रम परोस रहे हैं जिनका न कोई सिर होता है न पैर। बस अगर होता है तो दर्शकों को उत्तेजित या खौफजदा करना ताकि वे आधा घंटा, एक घंटा या चौबीस घंटा उनकी उस बेहूदगी को झेलते और अपना सिर धुनते रहें। कोई भूत-प्रेत का सहारा ले रहा है, तो कोई साक्षात् शंकर जी को ही परदे पर ले आता है जो कहते हैं किसी भक्त के सपने में आये होते हैं। वह भक्त उनका वीडियो भी बना लेता है। यानी चैनल की इस कपोल कल्पना पर यकीन करें तो कलियुग में कितने सुलभ और सस्ते हो गये हैं भगवान। हर चैनल कोई भी खबर देते समय यह दावा करता है कि यह खबर सिर्फ और सिर्फ वह ब्रेक कर रहा है। कुछ इस तरह के जुमले उछाले जाते हैं- `यह खबर आप सिर्फ और सिर्फ इसी चैनल पर देख रहे हैं। ' `यह हमारी एक्सक्लुसिव खबर है।' यकीन मानिए चैनल घुमा कर देखिए वह खबर दूसरे कई चैनलों में भी दिखेगी और वह भी यही कह रहे होंगे कि खबर हमने ब्रेक की, आप हमारे ही चैनल पर इसे पहली बार खास तौर पर देख रहे हैं। अब आप किस पर यकीन करेंगे कि किस चैनल का दावा सही है। पूरा लेख आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। लिंक : मीडिया ख़बर.कॉम
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कार्टून- चेतावनी की लाली पॉप...

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ई बाईक खरीदना चाहता हूं (अविनाश वाचस्‍पति)

खरीदना चाहता हूं ई बाईक
जिसका न रजिस्‍ट्रेशन होता है
न जरूरत होती है लाईसेंस की
चलाने के लिए
पेट्रोल, सीएनजी, डीजल
भी नहीं चाहिए

चाहिए सिर्फ बिजली
जिससे होगी उसकी बैटरी चार्ज
प्रदूषण तो होगा नहीं
गति भी तेज नहीं होगी

पर असमंजस में हूं
हूं तो दिल्‍ली में भी
कि कौन सी खरीदूं
जो जानते हैं
वे बतलायें
अपने अनुभव
या दें सलाह

अग्रिम शुक्रिया।

विज्ञापन तो देखें हैं कई कंपनियों के
छूट यानी सब्सिडी भी दे रही है
दिल्‍ली सरकार
पर इन सबमें कौन सी कंपनी है
ई बाईक की सरदार।
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सूर्यग्रहण से न घबराएं, केएन राव की सलाह

प्रसिद्ध ज्योतिषी केएन राव ने कहा है कि 22 जुलाई को पड़ने वाले सूर्यग्रहण को लेकर लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। स्टार न्यूज ने सूर्यग्रहण को लेकर फैलाए जा रहे डर की केएन राव के साथ तफ्तीश की. राव ने उन भविष्यवेताओं की तीखी आलोचना की जो इस ग्रहण को अनिष्ट से जोड़ रहे हैं और महिलाओं को इस दौरान मां न बनने तक की सलाह दे रहे हैं. पूरी ख़बर मीडिया ख़बर.कॉम पर। यहाँ क्लिक करें।
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सामाजिक प्राणी हैं मास्टरजी!!!

मास्टरजी का नाम सुनते ही एक अपनत्व की भावना आ जाती है, और गांवों में तो मास्टरजी का वर्चश्व पूरा छाया हुआ है | | हर साल एक साधारण आदमी से मास्टरजी की श्रेणी में तब्दील होने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है | अब तो स्थिति ऐसी है की गाँव में आदमी कम और मास्टरजी ज्यादा हो गए हैं | एक बार किसी कुते ने मास्टरजी को काट लिया, लोग चिंता प्रकट करते हुए बोले : इस कुते को मरवाना होगा आज मास्टरजी को काटा है कल को किसी आदमी को भी काट सकता है | आदमी और मास्टरजी ?? पता नहीं क्यूँ गांव वाले फर्क करते हैं !! मास्टरजी की बिटिया की शादी होती है, गाँव पुरे जोशे खरोश से काम में जुट जाता है | मास्टरजी ने शादी में बहुत पैसा लगाया बिटिया की शादी में गांव में चर्चा : अरे दहेज़ की गाडियां तो भरनी ही थी आखिर मास्टरजी हैं | अब अगर किसी मास्टरजी ने साधारण शादी की दहेज़ ज्यादा नहीं दे पाए, गाँव में फिर चर्चा : बेचारा कहाँ से दहेज़ की गाडियां भरेगा ? आखिर मास्टर ही तो है | सामाजिक अनुष्ठान में मास्टरजी की अहम् भूमिका होती है | घर में किसी पशुधन को कुछ तकलीफ है मास्टरजी कष्ट निवारण करते हैं| किसी के घर जागरण है पांच सात मास्टरजी को बुलवा लिया जाता है | हर क्षेत्र में अहम् भूमिका निभाता मास्टरजी सबका प्यारा मास्टरजी | धापली की शादी थी बरात आई सभी काम काज में व्यस्त | एक बच्चा रोये जा रहा था, और बच्चे ने पोटी भी कर रखी थी | किसी का ध्यान बच्चे की और नहीं गया | एक बाराती दयालु सज्जन ने बच्चे को उठाया साफ़ किया | फिर उसकी माता को ढूंड कर बच्चा उनके हवाले किया महिला बोली: धन्यवाद मास्टरजी !!!! आदमी के आश्चर्य का ठिकाना न था बोला: आपको कैसा पता की मैं मास्टरजी हूँ ? औरत बोली : इतना सामाजिक और कोण हो सकता है !! मास्टरजी अपने हैं, मास्टरजी सबके प्यारे सबके दुलारे हैं !!
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इतना अनर्थ क्यों हो रहा है भाषा के साथ?

इन दिनों कुछ तो हिंदी में बुरी तरह से घुसपैठ कर रही अंग्रेजियत और कुछ भाषा के अज्ञान के चलते बड़ा अनर्थ हो रहा है। हमारी वह भाषा जो एक तरह से हमारी मां है, हमारी अभिव्यक्ति का जरिया है और जिसकी बांह थाम हम अपनी जीविका चलाते हैं आज उसका जाने-अनजाने घोर निरादर और अपमान हो रहा है। भाषा भदेस हो रही है या की जा रही है और उसके साथ जम कर छेड़छाड़ और खिलवाड़ हो रहा है। चाहे प्रिंट मीडिया से जुड़े लोग हों या इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोग, शिक्षक हों या आलोचक और कथाकार सब इस बात से सहमत होंगे कि उनकी अभिव्यक्ति का आधार सिर्फ और सिर्फ भाषा है। उसका ज्ञान उनसे छीन लिया जाये तो वे मूक और लाचार हो जायेंगे। आज उसी भाषा के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ हो रही है वह चिंता का विषय है। ऐसे में जिन्हें भाषा से प्यार है, यह जिनकी अन्नदाता है उनका यह कर्तव्य बनता है कि वे पल भर रुकें और भाषा पर कुछ विमर्श करें। जो गलत प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए सक्रिय और सचेष्ट हों। आज बड़े-बड़े विद्वानों तक को धड़ल्ले से भाषा का गलत इस्तेमाल करते देखा जाता है। शब्दों के अर्थ और सही प्रयोग की जानकारी न होने के कारण कभी-कभी तो अर्थ का अनर्थ भी होते देखा गया है। मैं अपने को भाषा का पंडित नहीं मानता लेकिन अल्प ज्ञान में जो गलतियां नजर आयीं उन पर ध्यान आकर्षित करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूं। कारण, हम जिस भाषा के हैं और जिसके चलते ही हम जो हैं, वो हैं उसका प्रयोग सही और सटीक हो यही हमारा काम्य है। जो इसके सही प्रयोग को नहीं जानते उन्हें राह दिखाना और बताना कि सही क्या है, गलत क्या है यही इसका उद्देश्य है। पूरा लेख आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। यहाँ क्लिक करें।
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दिल्ली में ब्लॉगर सम्मलेन: एक सूचना, एक आग्रह - आपस में बांटेंगे प्‍यार

काफी पहले से योजना चल रही थी कि दिल्ली में एक ब्लॉगर सम्मलेन किया जाये ..अनेक कारणों से ..ये अब तक टलता ही जा रहा है...मगर अब लगता है ह‍ि बहुत जल्दी ही ..राजधानी में हम एक ब्लॉगर सम्मलेन करने में सफल हो जायेंगे ..स्थान और समय सबकी उपलब्धता पर निर्भर करेगा..मगर फिलहाल के लिए आप सबसे ये आग्रह किया जा रहा है कि आप सब ..अपना पता , अपना फोन नंबर, अपनी ई मेल आई डी अपने चित्र और ब्‍लॉगों की जानकारी सहित हमें भेजने की कृपा करें.

प्रयास किया जा रहा है कि इस सम्मलेन को ,मीडिया भी कवर कर सके तो और भी अच्छा होगा,,हालांकि अभी ये नहीं पता कि प्रयास कितना सफल होगा ..मगर उम्मीद पर दुनिया कायम है..और हम भी ...इसलिए सभी बड़े ,छोटे, पतले मोटे, सीधे, तीखे ...पुरुष, महिला ..बूढ़े बच्चे ब्लॉगर्स से आग्रह है कि आप इसे सफल बनाने में हमारा साथ देने की कृपा करें..

सम्मलेन में करेंगे क्या...अजी ये तो वहीं पहुँच कर पता चलेगा..मगर यकीन मानिए आप सब भूल नहीं पायेंगे ..आप सब किसी भी माध्यम से मुझे ajaykumarjha1973@gmail.com या अविनाश भाई avinashvachaspati@gmail.com को मेल करके सूचना दें..आपकी सकारात्‍मक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी...
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शादी के कार्ड पर क्यों, एक्सपायरी डेट नहीं होती ....?





टल्ली होने को,
टके का मोल नहीं होता,
इसीलिए दारु के बोतल पे,
लिखी कोई रेट नहीं होती....

जो मिलते थे सुबहो-शाम,
कभी राम-राम, कभी दुआ सलाम,
अमा उधारी कए दे दी उनको,
अब कभी उनसे यूँ भेंट नहीं होती..

लालू जी फरमाते हैं, हम,
हमेशा नए आईडिये लाते हैं,
सब रेलगाडी में मेट्रो ट्रेन का इंजन लगा दो,
काहे से की, ऊ कभी लेट नहीं होती.....

पहले था सिर्फ दूर का दर्शन,
चैनल बढ़ गए , हो गयी टेंशन,
दिन भर रिमोट पर फिरती हैं उंगलियाँ,
कमबख्त किसी एक जगह सेट नहीं होती....

नाम,पता, और दिन जगह,
खाना-पीना, रुकना-जाना, सब होता है लिखा,
फिर शादी के कार्ड पर क्यों,
सिर्फ एक्सपायरी डेट नहीं होती...

कई बार हुई है लानत-मलामत,
उससे भी बढ़कर थूकम -फजीहत,
ये तो हद है बदकिस्मती की हमारी,
बेइज्जती भी तो भर पेट नहीं होती....
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नैनो बस गयी नैनों मे

टाटा की नैनो कार जल्द ही बाज़ार मे आने वाली है..अब देखिएगा कार बाज़ार मे क्या-क्या परिवर्तन हो सकते है. आज आप नुक्कड़ पर मेरे कविता के माध्यम से कार के परिवर्तित रूप का काल्पनिक आनंद लीजिए.धन्यवाद.

दिखने से पहले ही, नज़रों को भाने लगा,
जब टाटा के लखटकिया का, एडवरटायज आने लगा|
मोटर मार्केट मे एकदम से, हल्ला मचाकर रख दिया,
मारुति,सुज़ुकी के मालिकों को भी, नचा कर रख दिया||

हीरोहोंडा,बज़ाज़,अरिश्मा,करिश्मा,सब बेकार लगा,
मंहगाई के दौर में ,जब इतना सस्ता कार लगा|
चारो तरफ एक इमर्जिंग ब्रांड, बन गयी है नैनो,
और इस साल के दूल्हों की,पहली डिमांड बन गयी है नैनो||

कारों के कार मे ,सुपरस्टार हो गया है,
नवयुवकों के लिए तो,चमत्कार हो गया है||
बाइक बेचकर, नैनो की बुकिंग करवा रहे हैं,
और 3000 की किस्त ,अपने बाप से भरवा रहे हैं||

कुछ बाप तो हर हाल मे ,नैनो लेंगे ही लेंगे,
इससे सस्ता और बढ़िया, बेटे को गिफ्ट मे क्या देंगे|
पप्पू का बाप उसके बारे मे ,सोचकर डर रहा है,
He Can't Drive,फिर भी नैनो की खरीद कर रहा है||

सारा भारत जय हो नैनो के, गीत गा रही है,
कार कम्पटीसन की रफ़्तार ,तेज होती जा रही है|
फिर किसी दिन बज़ाज़,75000 मे बैनो लेकर आ जाएगी,
और मारुति की मैनो, 50000 मे ही लहराएगी ||

फिर तो शोरूम नही,दुकानो मे कारों के मेले लगेगें,
एक-दो खरीदने वालों को, तो झमेले लगेगें|
साल मे एक दिन ,एक ट्राली लेकर जाएँगे,
और दो चार नैनो,एक साथ लेकर आएँगे||

पत्नी,बेटे,बेटी को एक एक गिफ्ट कर देंगे,
एक-दो फ्यूचर यूज के लिए ,बरामदे मे शिफ्ट कर देंगे|
एक रख लेंगे दूध,अख़बार और सब्जियाँ लाने के लिए,
एक रामू काका को दे देंगे,घर आने और जाने के लिए||

कपड़ो की तरह लोग कार बदलने लगेंगे,
आरामतलब और अईयासी मे ढलने लगेंगे|
इस दीवाली पे कार के बाज़ार मे भी लूट मिलेगी,
3 खरीदने पर (40+10)% की छूट मिलेगी||

सड़क पे आम आदमी से ज़्यादा कार घूमेगी,
60-70-80 की रफ़्तार चूमेगी||
पर कभी कभी मौज की जिंदगी भी हराम हो जाएगी,
चौराहे तो चौराहे जब गलियाँ तक जाम हो जाएगी||

घिसकते घिसकते नैनो के पग, थक जाएँगे ,
कार मे बैठे नैनो के सरताज़ ,भी पक जाएँगे||
धुँआ,पेट्रोल,डीज़ल से जब, गमगमा उठेगा माहौल,
कभी खुशी कभी गम ,जैसा हो जाएगा नैनो का रोल||

नैनो से जुड़े परिवर्तन के, और तत्व भी हैं,
नैनो के अपने सामाजिक ,महत्व भी हैं||
सबको बराबरी पर लाने वाले,समाज़ के नीतियों को बल मिलेगा,
जब वर्ग समुदाय को नैनो के रूप मे ,खुशहाल कल मिलेगा||

फिर भी मध्यमवर्गीय बाप, अब भी स्कूटर पर ही जाएगा,
और कार खरीद कर, बेटी के ससुराल पहुँचाएगा||
इस लखटकिया से उसका असहनीय, दुख कट जाएगा,
और दहेज की बलिहारी ,निर्दोष बालाओं का रेट कुछ घट जाएगा||

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सनसनी है बेटा... टीआरपी बढ़ेगी


पिछले दिनों मध्यप्रदेश के रायसेन जिले से एक खबर आई। एक पत्रकार होने के नाते मेरे लिए उस खबर पर अचंभित होना लाज़मी था। खबर थी कि एक मुर्गी ने इंसान के बच्चे को जन्म दिया। लगभग एक हाथ की लंबाई का वो बच्चा जन्म लेते ही मर गया। पता नहीं क्यूं मेरा मन ये मानने से इंकार कर रहा था कि ऐसा हो सकता है, क्यूंकि विज्ञान का विद्यार्थी रह चुके होने के नाते मुझे डार्विन का सिद्वांत याद आ रहा था कि शुरूआती तीन महीनों में इंसान और जानवर दोनों का विकास एक जैसा होता है। पर खबर थी तो करना भी जरूरी था। मुझे लगा हो सकता है कि कोई उस भ्रूण को वहां पर फेंक गया हो या फिर डार्विन भाई का सिद्वांत ही ठीक हो। खबर करने का मन न होने का एक कारण यह भी था कि उस बच्चे को पैदा होते किसी ने नहीं देखा। लेकिन उपर से आदेश था तो खबर करना भी जरूरी था लेकिन क्या करें दिल है की मानता ही नहीं। पांच बजे तक हमने इंतजार किया और जब देखा कि सभी चैनलों ने उसे चलाना शुरू कर दिया तो मजबूरन मुझे भी ये खबर करनी पड़ी। आप पूरा लेख मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। यहाँ क्लिक करें।
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आमी चलाबो,सुपेरफास्त, दादा तोमी चलाओ मालगाडी

लालू बोले ममता से,
अरे सुनिए ममता जी,
हम इतना दिन से,
ई रेल गाडिया सब को कतना बढिया चलाये थे,
चल रही थी ,
घाटे में कंपनी,
हम ही तो फायदा मंत्र बताये थे ,

मुदा पाहिले हमका,
ई पब्लिक ने हरवाया,
जुलम देखिये इसके ऊपर,
गठबंधन ने भी नहीं है पूछा,
उलटा हमई को लतियाया,

चलिए न झगडा ख़त्म करें,
आप बंगाली हम बिहारी,
आप आ जाओ हमरे डेरा,
नहीं ता हमही आते हैं आपकी बाडी ,
अरे रिश्ता भी बन सकता है ,
रक्षा बंधन की करो तैयारी...

तुम हमरी ममता दीदी ,
हम बन जाते हैं लालू दादा,
बहना हमरा पोर्टफोलियो वापसी का ,
करना होगा तुमका वादा ...

ठीक आछे दादा , आप बोलते
तो हम इस पर विचार कोरेगा ,
लेकिन दादा ई मंत्री पद ,
तो हम कैसे भी नई छोडेगा

आमरा दिमाग में आईडिया इक ठु,
जोर मारता है ताड़ा-ताडी ,
आम मिनिस्ट्री को हाफ हाफ कोर देगा,
कोर लिया है तैयारी....
दादा आमी चलाबो सुपरफास्ट ,
आप चलाओं सब मालगाडी ..
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मेरा नाम करेगा रौशन

 

***राजीव तनेजा***

"तुझे क्या सुनाऊँ ए दिल्रुरुबा...तेरे सामने मेरा हाल है"

"मेरी हालत तो छुपी नहीं है तुझसे" ....

"सोच-सोच के परेशान हो उठता हूँ कि उसे क्या नाम दूँ?"
"क्या कह के पुकारूँ उसे?"
दिल में कंभी ये ख्याल उमडता है तो कभी वो कि...
"मैँ उसे क्या नाम दूँ?"
"उसे दोस्त कहूँ या के दुशमन?"
"उसे अच्छा कहूँ या फिर बुरा?"
"या फिर उसे 'देव' कहूँ या फिर 'दानव'...
"कभी वो 'अच्छा' लगता है तो कभी 'बुरा'...
"कभी 'पागल' लगता है तो कभी 'स्याना'..
"कभी वो 'अपना' सा लगता है तो कभी 'पराया'...
"कभी 'मेहनती' लगता है तो कभी एक्दम 'आलसी'...
"कभी वो 'जवान' लगता है तो कभी एक्दम 'बुढा'....
"कभी वो 'सही' लगता है तो कभी 'गलत'...
"कभी वो 'नायक' लगता है तो कभी 'खलनायक'..
"कभी ये भी सोचता हूँ कि उसने आखिर एसा किया क्यों?"
"कभी-कभी दिल में ख्याल आता है कि अच्छा ही किया हो शायद उसने"
"मेरा भला ही सोचा हो शायद"
"अब ये तो पता नहीं कि उसके दिल में आखिर था क्या?"
"कभी-कभी ये भी सोचता हूँ कि इस सब से उसे मिलेगा आखिर क्या?"
"शायद किसी दूसरे को इतना....
'बेबस',....
'मजबूर',.
'तन्हा',...
'अकेला',...
'लाचार',देख चेहरा खिल उठता होगा उसका"
"खुशी के मारे बावला हो उठता होगा शायद वो"
"ये भी हो सकता है कि इंसानी फितरत है .....
खाली नहीं बैठा गया होगा उससे तो सोचा होगा कि..
"चलो आज इसी पे हाथ आज़मा लिया जाए"
आखिर पता तो चले खुद को कि ....
"कितने पानी में हूँ मैँ?"
साथ ही साथ पूरी दुनिया को भी पता चल जाएगा कि...
"हम में है दम"
खुद को बार-बार तसल्ली देता रहता हूँ मैँ कि ...
"ऊपरवाले के घर देर है पर अन्धेर नहीं"
"और भला कर भी क्या सकता हूँ मैँ?"
"कभी तो पुकार सुनी जाएगी मेरी भी उस 'परवर् दिगार के दरबार में"
"कभी-कभी गुस्सा बहुत आता है और दिल ये कह उठता है कि..
'कोई ना कोई'...
'कभी ना कभी'...
'सवा सेर' तो उससे भी टकराएगा और तभी फैसला होगा कि ...
"किस में कितना है दम?"
"कभी तो ऊँट पहाड के नीचे ज़रूर आएगा"
"कई बार तो गुस्से से भर उठता हूँ मैँ और जी चाहता है कि ...
कहीं से बस घडी भर के लिये ही सही ...
कैसे भी ...
किसी भी तरह से मिल जाए...
'36' या फिर '47'
"कर दूँ अभी के अभी शैंटी-फ्लैट "
"हो जाएगा फुल एण्ड फायनल"
"कोई कसर बाकि नहीं रहेगी"
"बडा तीसमार खाँ समझता है ना खुद को ....
सारी हेकडी निकल जाएगी बाहर "
"अरे अगर वार करना ही था तो सामने से आकर करता ...
"ये क्या? कि पीठ पीछे वार करता है"
"बुज़दिल कहीं का"
"लेकिन फिर सोच के रह जाता हूँ कि शायद वो अपने दिमाग का इम्तिहान ले रहा हो कि ...
कुछ है भी उसमें?"...
"या फिर खाली डिब्बा खाली ढोल"
"लेकिन फिर दिल तडप उठता है कि इस भरी पूरी दुनिया में क्या मैँ ही मिला था निठल्ला?"
"जो मुझ पर ही हाथ साफ कर गया"
"लेकिन एक बात की तो दाद देनी पडेगी कि बन्दा है बडा ही चलाक"
"शातिर दिमाग है उसका"
"खुली आँखो से ऐसे काजल चुरा ले गया कि ...
"कब मेरा सब कुछ अब मेरा नहीं रहा"
"बडे अरमान संजोए थे मैने "
"क्या-क्या सपने नहीं देखे थे मैने कि उसके पहले जन्मदिन पर एक बडा सा केक मँगवाउंगा"
"खूब पार्टी -शार्टी करूँगा"
"इसको बुलाउंगा और उसको भी बुलाउंगा"
"बडे ही जतन से पाला-पोसा था मैने उसे "
"अभी तो उसने अपने पैरों पे चलना भी नहीं सीखा था ढंग से "
"नन्हा सा जो था अभी"
"मैँ तो ये सोच-सोच के खुश हुए जा रहा त हा कि एक दिन...
"हाँ एक दिन ...
"मेरा नाम करेगा रौशन...जग में मेरा राजदुलारा"
"मुझे क्या पता था कि एक दिन...
'मेरी सारी मेहनत'...
'मेरे सारे ओवर टाईम' पर कोई पानी फेर जाएगा मिनट दो मिनट में"
"पता नहीं मै कैसे रात-रात भर जाग-जाग कर....
पाल-पोस कर बडा कर रहा था उसे"
"यहाँ तक कि मैने किसी की भी परवाह तक नहीं की"
"बीवी की भी नहीं"
"किस-किस के आगे माथा नहीं टेका?"
"कहाँ-कहाँ नहीं गया मैँ?"
"किस-किस जगह सर नहीं झुकाया?"
'मन्दिर',..
'मस्जिद',.
'चर्च',...
'गुरुद्वारा',..सभी तक तो हो आया था मैँ
'ओह'...
'ओह'.....
'ओह माय गाड'
"देखा?"...
"देखा तुमने?"
"हाँ....हाँ देखो "
"ऊपरवाले ने मेरी पुकार सुन ली "
"आखिर पसीज ही गया वो "
"दया आ ही गयी उसे मुझ गरीब पर"
"बाल भी बांका नहीं होने दिया उसने मेरी अमानत का "
"जस की तस"...
"वैसी की वैसी"...
"दूध में धुली"...
मेरी 'याहू आई.डी'('Yahoo ID')लौटा कर उस हैकर ने मुझे दिल की हर खुशी दे दी"
"हे ऊपरवाले तेरा लाख-लाख शुक्र है"
"आज यकीन हो चला है कि इस दुनिया में तू है ज़रूर"
"अगर सिर्फ 'आई डी' की बात होती तो कोई बडी बात नहीं थी,..
उनका आना-जाना तो चलता ही रहता है"
"इतना परेशान नहीं हो उठता मैँ,...
बहुत कुछ जुडा हुआ था उस 'आई डी'के साथ जैसे....
"बहुत सी प्यारी-प्यारी लडकियों के मेल अड्रैस" ,....
"लव लैटर्स" वगैरा-वगैरा और ...
वो सब उलटी-पुलटी मेल्ज़ भी जिन्हे मैँ सबकी नज़रों से छुपा के रखता था"
"यहाँ तक कि अपनी बीवी को भी हवा तक ना लगने दी थी "
"सबसे बडी बात कि मेरा याहू ग्रुप भी तो हैक हो गया था ना"
फन मास्टर G9
"छिन गया था वो मुझ से "
"हैकर के पास जा पहुँचा था उसका कंट्रोल "
"उसी को तो मैने जन्म दिया था"
"अपनी औलाद से बढ कर माना था उसे "
"रात-रात भर जाग-जाग के मैँ मेलज़ लिखता था"
"इधर-उधर से नकल मार दूसरों के माल को अपना बना फारवड किया करता था "
"हाँ हाँ ....
अब यकीन हो चला है कि एक ना एक दिन....

"मेरा नाम करेगा ...रौशन जग में मेरा राजदुलारा"

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja (India)

rajivtaneja2004@gmail.com

http://hansteraho.blogspot.com

+919810821361

+919213766753

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मान - मनोव्वल के बाद इंडिया टीवी एनबीए में वापस

लगभग तीन महीने तक न्यूज़ ब्राडकास्टिंग एसोसियेशन (एनबीए) से दूर रहने के बाद इंडिया टीवी वापस एनबीए में आ गया है। एनबीए के अध्यक्ष जी.कृष्णन और एनबीए के बाकी सदस्यों के द्वारा की गयी बातचीत और मान मनोव्वल के बाद इंडिया टीवी एनबीए में आने को राजी हुआ. एनबीए की स्थापना समाचार चैनलों द्वारा स्व-नियमन के लिए किया गया था. लेकिन इंडिया टीवी के एनबीए की सदयस्ता छोड़ने के बाद एनबीए की कार्यशैली और उसके औचित्य को लेकर सवाल खड़े किये जा रहे थे. ऐसे में इंडिया टीवी की संस्था में वापसी से एनबीए के लिए राहत की बात है. पूरी रिपोर्ट आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। यहाँ क्लिक करें।
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ब्‍लॉगिंग करते बदमाश धरा गया - नुक्‍कड़ की पोस्‍ट संख्‍या 420 - चमत्‍कार को नमस्‍कार


नुक्‍कड़ की बहु प्रतीक्षित पोस्‍ट
420 किसी श्रीमती जी के
खाते में जाने से बच गई
और राजीव तनेजा को डस गई।

उनकी पोस्‍ट
चमत्‍कार को नमस्‍कार

पोस्‍ट श्री 420 बन गई।

इस बदमाशी पर
उन्‍हें देते हैं बधाई।

इस पोस्‍ट के आरंभ में ही
उन्‍होंने रहस्‍य खोला है
ओ ... बड़े दिनों में खुशी का दिन आया

वो खुशी का दिन क्‍या है
हम उन्‍हें आज बतला रहे हैं
वे बने हैं नुक्‍कड़ के पोस्‍टश्री 420।

श्री राजीव तनेजा को उनकी
इस उपलब्धि पर बधाई देना मत भूलें।
वे हंसते ही रहेंगे
क्‍योंकि उनका प्रख्‍यात ब्‍लॉग है
हंसते रहो
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बजट के दिन सबसे ज्यादा देखा गया सीएनएन - आईबीएन और आजतक

नंबर एक अंग्रेजी न्यूज़ चैनल सीएनएन - आईबीएन को सबसे ज्यादा दर्शकों ने बजट वाले दिन देखा। टैम के ताजे आंकड़ों में यह बात सामने आयी है. इसके पहले लोकसभा इलेक्शन (2009) के समय भी सीएनएन - आईबीएन कवरेज़ और पहुँच के मामले में सबसे आगे रहा था. बजट के दिन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के भाषण को सबसे ज्यादा दर्शकों ने सीएनएन - आईबीएन पर ही सुना. महानगरों में भी वह अव्वल नंबर पर रहा. बजट के दिन सीएनएन - आईबीएन का चैनल शेयर 32% रहा. पूरी रिपोर्ट आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। MORE
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चमत्कार को नमस्कार

***राजीव तनेजा***

chamatkaar

"ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया....

ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया....

आज मुझे कोई ना रोके...

बतलाऊँ कैसे कि मैँने क्या पाया....

हो बड़े दिनों में.....

"याहू!....

वो मारा पापड़ वाले ने"...

"क्या हुआ तनेजा जी?...इस कदर बल्लियों क्यों उछल रहे हैँ?...

"अरे शर्मा जी!...साक्षात चमत्कार देख के आ रहा हूँ...साक्षात"....

"क्या सच?"....

"और नहीं तो क्या?"...

"हम भी तो सुनें भय्यी कि क्या चमत्कार देख के आ रहे हो?"...

"यूँ समझिए कि साक्षात ऊपरवाले ने अपने हाथों से गिफ्ट....

"तो क्या आज फिर किसी लड़की ने लिफ्ट?....

"तौबा...तौबा...कैसी बातें करते हैँ?"...

"क्यों?...पिछले हफ्ते तुम खुद ही तो बता रहे थे कि....

"शर्मा जी!...बन्दा एक बार धोखा खा सकता है...दो बार धोखा खा सकता है लेकिन सौ बार थोड़े ही कोई मुझे उल्लू बना पैसे ऐंठ सकता है"....

"तो फिर बताओ ना यार कि आखिर हुआ क्या?"शर्मा जी का उत्सुक स्वर...

"अजी!...यूँ समझिए कि धमाल हो गया"...

"अब कुछ बताओगे भी या यूँ ही बेकार में कमाल-धमाल कर के फुटेज खाते रहोगे?"....

"बताता हूँ....बताता हूँ....ज़रा सब्र तो रखिए"...

"अरे वाह!...इतनी देर से उतावले तो तुम खुद हुए जा रहे हो और अब मुझे सब्र रखने के लिए कह रहे हो?"...

"क्या शर्मा जी?...आप तो बात को पकड़ के बैठ जाते हैँ"...

"बैठ जाता हूँ?"...

"ध्यान से देखो!...मैँ बैठा हुआ नहीं बल्कि सीधा तन के खड़ा हुआ हूँ"शर्मा जी सीना तान छाती फुलाते हुए बोले...

"हे...हे...हे...शर्मा जी...आपके भी सैंस ऑफ ह्यूमर का जवाब नहीं"...

"थैंक्स फॉर दा काम्प्लीमैंट"...

"इसमें थैंक्स की क्या बात है?...यू डिज़र्व इट"....

"हक बनता है आपका"...

"ओ.के....ओ.के...बाबा"....

"चलो!...अब फटाफट पूरी बात बताओ"...

"शर्मा जी!...जल्दी क्या है?"....

"आप ही तो कहा करते हैँ कि जल्दी का काम शैतान का होता है...आराम से सुनिए"...

"ठीक है भैय्ये!...तो फिर टिका ले अपनी तशरीफ यहाँ...फुटपाथ पे और तसल्ली से बता"शर्मा जी एक तरफ इशारा करते हुए बोले...

"जी...शर्मा जी"मैँ भी आराम से चौकड़ी मार बैठता हुआ बोला...

"दरअसल हुआ क्या कि मैँ अपने नए स्कूटर पे...

Electric_Bike

"अरे वाह!...नया स्कूटर?.....कब लिया?"शर्मा जी चौंकने वाले अन्दाज़ में उठ खड़े हो गए...

"जी!...बस...यही कोई दो-चार दिन ही हुए हैँ"...

"अमाँ यार!...तुम तो बड़े ही छुपे रुस्तम निकले..किसी को कानों कान खबर भी नहीं होने दी और झट से मार लिया मैदान"...

"अब शर्मा जी!...अपने मुँह से कैसे कहता?.....आप तो मेरा नेचर जानते ही हैँ"मैँ मन ही मन फूल के कुप्पा होता हुआ बोला

"फिर तो भय्यी!....पार्टी बनती है हमारी"...

"हाँ-हाँ...क्यों नहीं?"...

"आप ही का दिया सब कुछ है"....

"जब चाहें...ले लें"...

"ना...तनेजा जी...ना....पार्टी से बचने का ये तरीका तो बरसों पुराना हो गया"...

"मेरे सामने आपका ये टोटका नहीं चलने वाला"...

"सीधे-सीधे निकालिए सौ का पत्ता और बन्ने खाँ की दुकान से गर्मागर्म जलेबी मँगवाईए"...

"हाँ-हाँ ...क्यों नहीं"...

"एक मिनट!....(स्कूटर को घूर के देखते हुए)

"ओए तनेजा!....

"जी!...शर्मा जी"....

"छोड़!.....ये पार्टी-शार्टी का चक्कर तू रहने दे"....

"कमाल करते हो शर्मा जी!...आपकी एक आवाज़ पे मैँने जेब के अन्दर हाथ डाल दिया और आप हैँ कि....

"तो दूसरी आवाज़ पे उसणे बाहर काढ ले...के दिक्कत सै?"...

"ना..दिक्कत तो कोई नहीं है जी...लेकिन....

"इस लेकिण-वेकिण ने अड़े छोड़ और जा...

खा कमा....मौज कर"...

"कह दिया ना कि जा...मैँ नहीं लेता"...

"वो तो आपको लेनी पड़ेगी"....

"कोई जबर्दस्ती है?"...

"कुछ भी समझ लें"...

"पागल हो गया है क्या तू?"...

"शर्मा जी!.....आप तो मेरे बारे में अच्छी तरह से जानते हैँ कि मैँ उसूलों का बड़ा पक्का आदमी हूँ"...

"तो?"...

"पहले तो कभी किसी को जल्दी से हाँ नहीं करता और अगर गलती से कभी किसी को हाँ कर भी दी तो फिर भूल के भी कभी ना नहीं करता"...

"अब मर्द की ज़बान जो ठहरी....कर दी...सो कर दी"....

"अब तो आप इसे पत्थर पे लिखी लकीर ही समझिए"...

"तो फिर झाड़ू मार पत्थर पे...अपने आप मिट जाएगी ससुरी....के दिक्कत सै?"...

"ना शर्मा जी!...ना....अब तो बेशक धरती इधर की उधर हो जाए....ये तनेजा...

ये तनेजा तो आपको पार्टी दे कर ही रहेगा"मैँ छाती ठोक गरजदार आवाज़ में बोला...

"अरे यार!...समझा कर"....

"क्यों?...मेरा पैसा आपको हज़म नहीं होगा?"....

"नहीं!...ये बात नहीं है"...

"तो फिर आखिर दिक्कत क्या है?"....

"छोड़ ना!..क्यों बेकार में सौ-दो सौ फूँकता है...बचा के रख...आड़े वक्त काम आएँगे"...

"शर्मा जी!...बात को घुमाईए मत और सीधे-सीधे बताईए कि आप पार्टी लेंगे या नहीं?"...

"जा!...नहीं लूँगा...कर ले जो तुझे करना हो"...

"पार्टी तो आपके फरिशते भी लेंगे"मैँ आस्तीन ऊपर कर त्योरियाँ चढाता हुआ बोला...

"ठीक सै...तो फिर एक मिनट की भी देर ना कर"...

"जी"मैँ अपनी कामयाबी पे खुश होता हुआ बोला

"जा...सीधा ऊपर जा.....तेरी ही बाट देख रहे हैँ कई दिनों से"...

"कौन?"...

"मेरे फरिशते...और कौन?"...

"क्या?"...

"जा!...कई दिनों से तेरा ही इंतज़ार कर रहे हैँ"...

""कई दिनों से?"...

"हाँ!..कई दिनों से"...

"वो भला क्यूँ?"...

"स्वर्ग में कई दिनों से अच्छा भोजन ना मिलने के कारण भूख हड़ताल करे बैठे हैँ"...

"सच में?"...

"हाँ!...जा के उन्हें ही दे दे अपनी पार्टी"...

"आप मज़ाक कर रहे हैँ ना?"...

"ओर नय्यी ते के मैँ तन्ने सीरियस दीख रेया सूँ?"...

"ओह!...फिर ठीक है"...

"अब फटाफट गोली हो ले यहाँ से"...

"शर्मा जी!...मान जाइए ना...प्लीज़"...

"कह दिया ना एक बार कि नहीं चाहिए मुझे तेरी ये पार्टी-शार्टी"...

"वो तो आपको लेनी ही पड़ेगी"...

"बेटे!...समझा कर....ज़िद ना कर"..

"क्या समझूँ?...कैसे समझूँ?...और क्यों समझूँ?"....

"एक बार जो ठान लिया...सो ठान लिया"...

"पार्टी देनी है...तो हर हाल में देनी है"...

"अरे!...अजीब पागलपन है....मुझे अगर नहीं लेनी है...तो किसी भी कीमत पर नहीं लेनी है"...

"वो तो आपको लेनी पड़ेगी"मैँ बच्चों की तरह ज़िद पे अड़ा रहा...

"ना!...बिलकुल ना"...

"शर्मा जी!...आप मेरे साथ ज़्यादती कर रहे हैँ"...

"कुछ भी समझ ले"...

"ना!..मैँ तो नहीं मानने वाला....पार्टी तो आपको लेनी ही पड़ेगी"...

"कोई ज़बरदस्ती है?"....

"यही समझ लीजिए"...

"ओफ्फो!...कह दिया ना एक बार कि नहीं लूँगा..नहीं लूँग़ा...नहीं लूँगा"...

"आखिर आपको दिक्कत क्या है?....परेशानी क्या है?"...

"अरे!....जो कँगला पैट्रोल तक के पैसे नहीं खर्च कर सकता...वो क्या खाक पार्टी देगा"...

"किसने कहा आपसे कि मैँ पैट्रोल के पैसे नहीं खर्च कर सकता?"...

"कहना या सुनना किस से है?"...मुझे साफ-साफ दिखाई दे रहा है"....

"क्या दिखाई दे रहा है?"...

"यही कि पैसे खर्च करने की तेरी औकात नहीं है"...

"औकात पे मत जाइए...कहे देता हूँ"...

"जाऊँगा!....एक नहीं सौ बार जाऊँगा...कर ले...जो तुझे करना हो"....

"शर्मा जी!...आप शायद ठीक से जानते नहीं हैँ मुझे वर्ना...ऐसी बात करने से पहले सौ बार सोचते"...

"औकात तो मेरी इतनी है कि यहीं खड़े-खड़े मैँ आपको....

"अरे जा-जा!...तेरे जैसे छत्तीस आए और चले गए"...

"तू अपने ससुराल वालों के दम पे कूद रहा है ना?"....

"आने दे उन्हें भी मैदान ए जंग में...देखें कौन किसका पानी भरता है?"...

"तुझे और तेरे रिश्तेदारों को...सभी को अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम में से कौन कितने पानी में है"...

"आप मेरी सास को बार-बार बीच में क्यों ला रहे हैँ?"...

"और अगर औकात नहीं होती क्या मैँ ये नवां-नकोर स्कूटर खरीद के लाता?"मैँ लगभग रुआँसा होता हुआ बोला...

"पागल के बच्चे!...ध्यान से देख...ये 'स्कूटर' नहीं बल्कि 'स्कूटरी' है"...

"तेरा ये 'कबूतर' ....'कबूतर' नहीं बल्कि 'कबूतरी' है.....हा...हा...हा...हा"....

"शर्मा जी!...आप बड़े है...बुज़ुर्ग हैँ लेकिन इसका मतलब ये नहीं हो जाता कि आप अपने से छोटॉं की भावनाओं से खिलवाड़ करें"....

"अपने होश औ हवास पे काबू रखें और जब तक...जहाँ तक सम्भव हो सके...मेरा मज़ाक ना उड़ाएँ...प्लीज़"...

"अरे भय्यी!...किसने कहा तुमसे कि मैँ तुम्हारा मज़ाक उड़ा रहा हूँ?"...

"ये मज़ाक नहीं तो और क्या है? कि आप मेरे अच्छे भले किंग साईज़ के 'स्कूटर' को 'स्कूटरी' बता उसके साथ-साथ मुझे भी नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैँ"....

"अरे भाई!...मैँ किसी की तौहीन नहीं कर रहा हूँ और ना ही मेरा ऐसा कोई इरादा है"...

"झूठ!...बिलकुल झूठ"...

"ओफ्फो!..कैसे विश्वास दिलाऊँ तुम्हें?"...

"मेरे सर पे हाथ रख कर कसम खाएँ कि जो कुछ कह रहे हैँ...सच कह रहे हैँ और सच के सिवा कुछ भी नहीं कह रहे हैँ"....

"हाँ भय्यी!...सच कह रहा हूँ...तुम्हारी कसम"...

"तो आपका मतलब ये 'स्कूटर' नहीं है"...

"बिलकुल"...

"तो फिर आपके हिसाब से 'स्कूटर' किसे कहते हैँ?"...

"'स्कूटर' उसे कहते हैँ जो पैट्रोल से चलता है और आपका ये तो छकड़ा पैट्रोल से नहीं बल्कि 'बैट्री' से चलता है ना?"...

"बैट्री से चलता है तो इसका मतलब ये 'स्कूटर' ना हो कर 'स्कूटरी' हो गया?"...

"बिलकुल"...

"ये आपसे किस गधे ने कह दिया?"...

"कहना किसने है?...मुझे खुद पता है"....

"शर्मा जी!...मेरे साथ...ये दोगला...ये सौतेला व्यवहार सिर्फ इसलिए ना कि....

  • ये कीमत में कम है...
  • सरकार इस पर सबसिडी दे रही है...
  • ये शोर नहीं करता...
  • प्रदूशन नहीं फैलाता...
  • बिना किक के स्टार्ट हो जाता है?...वगैरा....वगैरा"...

"ये सब मुझे नहीं पता"...

"तो फिर क्या पता है आपको?"...

"यही कि ये स्कूटर नहीं है"...

"अच्छा चल...अगर तुझे मेरी बात पे विश्वास नहीं है तो राह चलते किसी भी ऐरे-गैरे को रोक के पूछ ले कि ये 'स्कूटर' है के 'स्कूटरी'?"...

"शर्मा जी!...अभी मेरा वक्त इतना गया-बीता नहीं हुआ है किसी ऐरे-गैरे...नत्थू-खैरे से राय लेने की नौबत पड़ जाए मुझे"...

"वैसे आप ये बताने की कृपा करेंगे कि किस ऐगल से ये आपको 'स्कूटरी' दिखाई दे रही है?"...

"तो तुझे ही ये कौन से कोण से 'स्कूटर' दिखाई दे रहा है?"...

"ये देखिए!...हाँ-हाँ इसी ऐंगल से"मैँ लगभग ज़मीन पे लेट उन्हें ऐंगल समझाता हुआ बोला....

"दिखा ना?"...

"क्या?"...

"यही कि लम्बाई...चौड़ाई और मोटाई के हिसाब से ये किसी भी 'स्कूटर' से कम नहीं है"...

"सिर्फ लम्बाई...चौड़ाई और मोटाई से क्या होता है?"...

"क्यों?...होता क्यों नहीं है...बहुत कुछ होता है"....

"ओ.के!...ओ.के बाबा...तुमसे बहस में कोई नहीं जीत सकता"....

"आई.एम सॉरी....माफ कर दो मुझे"...

"वो किसलिए?"...

"कि मैँने तुमसे पंगा मोल लिया"...

"शर्मा जी!...कमाल करते हैँ आप भी"....

"आप मेरे बुज़ुर्ग हैँ...संगी-साथी हैँ....इतना तो आपका हक बनता ही है"...

"थैंक्स...कि तुमने मुझे इस लायक समझा"...

"चलो!...बात तो खत्म हुई"...

"वैसे भी क्या फर्क पड़ता है?...स्कूटर हो या स्कूटरी...दोनों एक समान"...

"अरे वाह!...फर्क क्यों नहीं पड़ता...ज़मीन और आसमान का फर्क पड़ता है"...

"क्या फर्क पड़ता है?"...

"आपको मैँ अगर मर्द के बजाए औरत कह कर पुकारूँ तो आपको बुरा लगेगा या नहीं?"...

"ज़रूर लगेगा"...

"बस इसीलिए मुझे भी लग रहा है"...

"मतलब?"...

"आप मेरे जवाँ मर्द स्कूटर को ज़बर्दस्ती 'स्कूटरी' कह स्त्री साबित करने पर तुले हैँ तो मेरा बुरा मानना जायज़ ही तो है"...

"लेकिन स्कूटर और स्कूटरी की बहस के बीच में ये मर्द और औरत कैसे आ गए?"...

"वो ऐसे कि स्कूटर मर्द होता है और स्कूटरी स्त्री"...

"मतलब?"...

"मतलब कि स्कूटर चलता है...इसलिए वो मर्द है"...

"और स्कूटरी चलती है...इसलिए वो औरत हो गई?"...

"जी"...

"वाह!...क्या लॉजिक है"...

"तुम्हारा मतलब मोटर साईकिल और कार दोनों चलती है तो इसका मतलब ये दोनों स्त्रियों की श्रेणी में आएँगी?"...

"यकीनन"...

और ऑटो मर्द की श्रेणी में?"...

"जी!...सही पहचाना आपने"...

"जैसे 'बस' चलती है और 'ट्रक' चलता है?"...

"बिलकुल"...

"इसका मतलब तो रेलगाड़ी औरत है और हवाई जहाज़ मर्द"...

"जी बिलकुल"..

"लेकिन एक कंफ्यूज़न है?"...

"क्या?"...

"यही कि 'बुलेट' तो सबसे शक्तिशाली बाईक है ना?"...

"जी"...

"तो वो तो मर्द ही कहलाएगी ना?"....

"जी नहीं...'बुलेट' भी स्त्री ही कहलाएगी"...

"लेकिन वो तो सबसे शक्तिशाली....

"ऐसे तो 'हिडिम्बा' भी बहुत शक्तिशाली थी...लेकिन वो राक्षसी थी...राक्षस नहीं"...

"कम्पनी खुद अपने प्रचार में कहती है कि जब 'बुलेट' चले तो दुनिया रास्ता दे"...

"जी"...

"तो इसका मतलब एक औरत के लिए....

"जी!...ये तो यहाँ की रीत है"...

"मतलब?"....

"इसे कहते हैँ अपनी परंपराओं से जुड़े रहना"...

"?...?...?....?"...

"?...?...?....?"... "?...?...?....?"... "?...?...?....?"...

"हम महान भारत देश के वासी हैँ...हमारे यहाँ सदियों से स्त्रियों का सम्मान किया जाता रहा है...अभी भी किया जाता है और हमेशा किया जाता रहेगा"...

"जी!...ये बात तो है"...

"तो अब आपकी तसल्ली हो गई ना कि....

"हाँ भय्यी...हो गई...पूरी तसल्ली हो गई कि ये 'स्कूटरी' नहीं बल्कि 'स्कूटर' है"...

"जी"...

"लेकिन स्पीड?.....स्पीड का क्या?...वो तो इसकी बहुत ही कम....

"जी!...20 से 25 किलोमीटर प्रति घंटे की है"मेरा मायूस स्वर...

"यही इसकी सबसे बड़ी कमई है"...

"हाँ!....लेकिन अगर आप रफ्तार से समझौता कर सकते हैँ तो बाकी सब चीज़ों में इसका कोई सानी नहीं"...

"अरे हाँ शर्मा जी!...स्पीड से याद आया कि वो कमाल...वो चमत्कार तो स्पीड को लेकर ही था"...

"ओह!...इसका मतलब बातों-बातों में हम असली...मुद्दे की बात तो भूल ही गए"...

"जी"...

"हाँ!...अब बताओ कि क्या हुआ था?"...

"जैसा कि मैँ आपको बता रहा था कि...

"क्या तुम्हारी ये स्कूटरी...ऊप्स सॉरी स्कूटर...25 की स्पीड से ज़्यादा तेज़ भाग गया?"...

"आप तो अंतरयामी है...आपको कैसे पता चला?"...

"अभी तुमने ही तो कहा कि मैँ अंतरयामी हूँ"...

"शर्मा जी!...मज़ाक छोड़िए और सीरियसली बताईए ना कि आपको कैसे पता चला?"....

"अरे यार!...अभी तुमने ही तो कहा"...

"तो?"...

"भय्यी!...तुम स्पीड के साथ चमत्कार की बात कर रहे थे तो मैँने अन्दाज़ा लगाया कि ज़रूर इसकी गति तेज़ हो गई होगी"...

"जी...बिलकुल सही अन्दाज़ा लगाया आपने"...

"अब मुझे शुरू से...वर्ड टू वर्ड बताओ कि कैसे ये चमत्कार घटित हुआ?"...

"अब क्या चमत्कार हुआ?...ये तो मैँने आपको बता दिया लेकिन कैसे चमत्कार हुआ?...इस रहस्य से मैँ बिलकुल अनजान हूँ"...

"ठीक है!...आगे बोलो"...

"दरअसल!...हुआ क्या कि दूसरों कि देखा-देखी...खुशी-खुशी से चाव-चाव में मैँने इसे ले तो लिया लेकिन फिर इसकी मरियल स्पीड देख के जल्द ही दुखी हो परेशान भी हो गया"...

"ओह!...फिर?"...

"शर्मा जी!...मेरा दिल ही जानता है कि पिछले दो दिनों में इसकी स्पीड को तेज़ करने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए मैँने?"...

"मन्दिर...मस्जिद और गुरूद्वारे से लेकर चर्च तक मैँ कहाँ-कहाँ नहीं भटका?...

"तो?"...

"कोई मकैनिक...कोई कारीगर...कोई वर्कशाप नहीं छोड़ी मैँने"...

"ओह!...फिर?"...

""नतीजा वही ढाक के तीन पात"...

"मतलब?"...

"सारे क्रिया-क्रम फेल हो गए..

"दुखी हो कई बार इतना गुस्सा आया कि इसे ले जा के सीधा शो-रूम वाले के वहीं पटक आऊँ कि ले!...सम्भाल अपना टीन-टब्बर"....

"एक-दो बार तो बड़े उलटे-उलटे ख्यालात दिल में उमड़ने लगे"...

"वो क्या?"...

"यही कि इसे दियासलाई दिखा इसके साथ मैँ खुद भी सती हो जाऊँ"...

"बाप रे!...ऐसा गज़ब किसलिए भय्यी?"...

"ताकि ना रहे बाँस और ना ही बजे बाँसुरी"...

"शांत राजीव...शांत....आवेश में आने से कुछ नहीं होगा"...

"कमाल करते हैँ शर्मा जी आप भी...जिस संग बीतती है ना..वहीं जानता है...आपका क्या है...आप ठहरे मस्तमौला इनसान"...

"कई बार तो दिल में आया कि किसी अँन्धे कुएँ में कूद कर अपनी जान दे दूँ"...

"राजीव!...जैसे हर जोड़ का कोई ना कोई तोड़ अवश्य होता है...ठीक वैसे ही इस समस्या का भी कोई ना कोई हल ज़रूर होगा"...

"पागल हो गए हो क्या तुम?"....

"कुछ और सोचो.....आत्महत्या जैसी कायराना हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती".....

"जी"....

"अच्छा!...फिर क्या हुआ?"...

"कई बार सोचा कि अच्छे-भले...शरीफ और नेक नीयत इनसान को बरगलाने और फुसलाने का केस कम्पनी वालों के खिलाफ डाल दूँ"...

"गुड"....

"फिर सोचा कि लगे हाथ मानहानि का केस भी डाल दूँ"...

"ये तो सोने पे सुहागे वाली बात हो गई"...

"वकील ने तो तब भी लेने हैँ और तभी भी लेने हैँ"...

"जी"...

"मैँने सोचा कि जब एक साथ दो-दो कैसों का सामना करेगा...तब पता चलेगा बच्चू को...

"ये बच्चू कौन?"...

"शो-रूम का मैनेजर...'बच्चू सिंह यादव' और कौन?"...

"हुँह!...बड़ा दावा ठोक के कहता फिरता था कि पूरे 120 किलो वज़न झेल सकता है हमारा स्कूटर"...

"अरे!...झेल तो मैँ रहा हूँ इसे पिछले चार दिनों से"....

"तो क्या 120 किलो वज़न भी....

"शर्मा जी!...आप तो जानते ही हैँ कि मेरा वज़न पूरे 100 किलो है...ना एक ग्राम ज़्यादा..ना एक ग्राम कम"...

"जी!...पिछले हफ्ते ही तो बताया था आपने"...

"मैँने सोचा कि जब कम्पनी वाले 120 किलो बता रहे हैँ तो 25-30 किलो अगर ज़्यादा भी हो गया तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला"...

"जी!...ये ट्रक-टैम्पो और रिक्शा वाले भी तो ओवरलोडिंग करते ही हैँ आखिर"...

"जी!...और मैँ कौन सा उस मुटल्ली को रोज़-रोज़ लिफ्ट देने वाला था"...

"तो?"...

"तो क्या?...बेइज़्ज़ती करवा दी पट्ठे ने....बीच सड़क के ही टैं बोल गया"...

"ओह!...ये तो बहुत इंसल्ट वाली बात है"...

"जी!...मेरा तो शर्म के मारे सर ऐसा नीचा हुआ कि बस पूछिए मत"...

"ओह!....

"अच्छा फिर?"...

"फिर मैँने सोचा कि इम्पोर्टेड टैक्नोलॉजी है.....इसका मतलब वज़न ऐकूरेट और परफैक्ट होना चाहिए...ना एक ग्राम कम...ना एक ग्राम ज़्यादा"...

"हम्म!......

"जैसा कि आप जानते हैँ कि मेरा वज़न ....

"पूरे 100 किलो है"...

"जी"....

"तो?"...

"तो मैँने सोचा कि जब फालतू वज़न नहीं लाद सकते तो मैँ कम भी क्यों लादूं?"...

"बिलकुल!...उसूल तो उसूल है"...

"जी"...

"अच्छा फिर?"...

"फिर क्या?...मैँने सड़क से तीन-चार ईंटे उठाई और उन्हें पिछली सीट पे लाद चल पड़ा अपने काम की तरफ"...

"ठीक किया आपने"...

"अजी!...क्या खाक ठीक किया?"..

"क्यों?...क्या हुआ?"...

"ईंटों को बाँधना तो मैँ भूल ही गया था"...

"ओह!...फिर?"...

"कोई यहाँ गिरी...कोई वहाँ गिरी"...

"ओह!...फिर तो ईंटों को इकट्ठा करने में बहुत मुश्किल हुई होगी"...

"मुश्किल?...ईंटों को सम्भालने के चक्कर में तो मैँ तीन बार खुद ठुकते-ठुकते बचा"...

"ओह!....फिर?"...

"फिर क्या?...ईंटो का आईडिया ड्राप कर मैँने कबाड़ी से 20 किलो का बाट खरीदा और उसे आज़माया"...

"गुड!...अच्छा किया आपने"...

"अजी!..क्या खाक अच्छा किया?...अच्छा तो तब होता जब मेरी ये मेहनत...ये मशक्कत रंग लाती"....

"इतनी मेहनत...इतनी पल्लेदारी के बाद भी नतीजा एकदम सिफर"...

"ओह!...आगे बताईए कि फिर क्या हुआ?"शर्मा जी इंटरैस्ट लेते हुए बोले

"मैँने खूब दिमाग लगा के नए--पुराने ..सभी तरह के जुगाड़ आज़माए लेकिन किस्मत ही अगर खराब हो तो कोई क्या कर सकता है?"...

"आखिर हुआ क्या?"...

"होना क्या था?...मेरी हर तरकीब फेल पर फेल होती जा रही थी"...

"मैँ परेशान हो सोच में डूबा ही हुआ था कि ध्यान आया.....

"क्या ध्यान आया?"...

"यही कि पिछले महीने शादियों का सीज़न था"...

"तो?"...

"आप तो जानते ही हैँ कि शादियों और पार्टियों में फाल्तू का कितना खाना-पीना हो जाता है"...

"जी"....

"मैँ कॉपी-पैन और कैल्कूलेटर ले के हिसाब लगाने में जुट गया कि कहीं इन शादियों और पार्टियों के चक्कर में मेरा वज़न....

"तो?"...

"वही हुआ...जिसका मुझे डर था"...

"यू मीन!...आपका वज़न?"...

"जी!...वज़न पूरे 4 किलो बढकर मुझे वॉलीबॉल से फुटबॉल में तब्दील कर चुका था"...

"यू मीन!....100 से 104 किलो हो चुका था"...

"जी"...

"ओह!...वैरी क्रिटिकल सिचुएशन"...

"खैर!...मैँने भी दिमाग लड़ाया और इसका भी हल ढूँढ निकाला"...

"वज़न कम करने का?"...

"कुछ-कुछ"...

"वो कैसे?"...

"मैँने सोचा कि अब ये डायटिंग-शायटिंग तो अपने बस की है नहीं...तो जुगाड़ से ही काम लेना होगा"...

"अच्छा फिर?"..

"मैँने महसूस किया कि मेरे जूते ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भारी थे"...

"ओह!....फिर?"...

"फिर क्या?...मैँने जूते उतारे और नंगे पाँव ही चल दिया अपने गोदाम की तरफ"...

"पैदल?"...

"बावले हो क्या?...अपनी ...खुद की सवारी के होते हुए मैँ भला पैदल क्यों चलने लगा?"...

"जी"...

"और वैसे भी मुझे स्कूटर की स्पीड बढानी थी...ना कि खुद की"

"तो क्या स्पीड में कुछ इज़ाफा हुआ?"...

"इज़ाफा तो नहीं लेकिन हाँ!...मेरे पैरों में तीन-चार छाले और पाँच-छै...छोटे-बड़े कंकड़ ज़रूर चुभ गए"...

"ओह!...

"जब मैँने देखा कि जूते उतारने से भी कुछ फर्क नहीं पड़ा तो मैँने दिलेरी से काम लेते हुए एक अनोखा प्लैन बनाया"...

"तो क्या आपने कपड़े....

"आप तो अंतरयामी है प्रभु...आपने कैसे जान लिया?"...

"कमाल है!...खुद ही अंतरयामी कहते हो और फिर खुद ही प्रश्न पूछते हो"...

"अच्छा!...आगे बताओ कि फिर क्या हुआ?"...

"क्या दिन में ही?"...

"छी!...छी-छी....कैसी बातें करते हैँ शर्मा जी आप भी?"....

"क्या मैँ इतना निर्लज्ज और बेशर्म हो सकता हूँ कि अपनी इज़्ज़त-आबरू की परवाह किए बिना दिन में ही?"...

"तो क्या फिर रात में?"...

"शर्मा जी!...यू ऑर जीनियस"...

"सही पहचाना आपने"...

"तो फिर कितने बजे?"...

"यही कोई दो या सवा दो का वक्त था....सुहानी चाँदनी रात थी....मस्त हवा मंद-मंद बह रही थी"....

"जी"...

"ऐसे में मैँने अपने सब कपड़े उतारे......

"हाय राम!...तो क्या कुछ भी नहीं?"...

"शर्मा जी!...क्या आपने मुझे इतना निर्लज्ज...बेशर्म और बेहय्या समझ रखा है कि...मैँ बिना कुछ पहने ही रात-बेरात सड़कों पे उछल-कूद मचाता फिरूँ?"..

"तो क्या?"...

"जी!...सही पहचाना आपने...मैँने V.I.P की लाल रंग की छोटी वाली फ्रैंची पहनी हुई थी"...

"ये देखिए!...अभी भी पहनी हुई है"...

"अच्छा फिर?"...

"फिर क्या?"...

"लेना एक ना देना दो....स्साले!....बीच में रस्ता रोक के खड़े हो गए"...

"कौन?"..

"पुलिस वाले?"...

"अरे!...अगर पुलिस वाले होते तो मैँ कुछ ले-दे के उनसे सुलट भी लेता"...

"तो फिर कौन?"...

"शर्मा जी!...एक राज़ की बात बताऊँ?"...

"जी!...ज़रूर बताईए...एक क्या?...दो बताईए"...

"किसी से कहिएगा नहीं"...

"सवाल ही नहीं पैदा होता"...

"आप बेधड़क और बेचिंत हो के बताईए"...

"उस वक्त मेरे पास उस लाल रंग की फ्रैंची के अलावा और कुछ भी नहीं था"...

"ही...ही...ही...ही"...

"ये तो लाख-लाख शुक्र है ऊपरवाले का कि उसने उस दिन मेरी लाज बचा ली...वर्ना वो पुलिस वाले"...

"बाप रे बाप"...

"जी!...अब तो बच के रहना पड़ेगा इनसे...हाई कोर्ट ने जो आथोराईज़ कर दिया है ये सब"...

"जी!...इसी बात का तो डर था मुझे लेकिन वो कह्ते हैँ ना कि "जाको राखे साईयाँ...मार सके ना कोय"...

"जी!...

"आपने बताया नहीं कि उस रात आपका रस्ता रोक के कौन कम्बख्त खड़ा हो गया था"...

"जनाब!...अपनी भूल सुधारिए औरे रस्ता रोक के खड़ा हो गया के बजाय रस्ता रोक के खड़े हो गए थे..कहिए"...

"तो क्या?...कई सारे थे"...

"जी!...पूरे पाँच मुस्टण्डे थे...पूरे पाँच"...

"यही तो सबसे कमी है हमारे शहर की...गुण्डे रात भर मज़े से मटरगश्ती करते फिरते हैँ और पुलिस मज़े से अपने दड़बे में बेफिक्र हो सोई रहती है"...

"अजी गुण्डे कहाँ?....वो तो.....

"तो क्या कोई गैंगस्टर वगैरा?"...

"अजी!...गैंगस्टर वगैरा तो सारे अपनी-अपनी नौकरानियों से ब्लात्कार करने के जुर्म में जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहे हैँ"...

"कमाल है!...पुलिस भी नहीं...गुण्डे-मवाली भी नहीं...यहाँ तक की गैंगस्टर वगैरा भी नहीं....तो फिर ऐसी कौन सी आफत आ गई हमारे शहर में?"...

"स्सालों ने!...भौंक-भौक के मेरा सड़क पे चलना हराम कर दिया था"...

"ओह!....फिर?"...

"फिर क्या?...उनके डर के मारे...ये आईडिया भी ड्राप करना पड़ा...सर जी"...

"फिर क्या हुआ?"...

"हर तरफ से निराश होने के बाद मैँने उस ऊपरवाले..परवरदिगार का हाथ थामा कि...

"हे पालनहार!...अब तू ही मेरी मदद कर....मुझे बचा....मेरी डूबती नैय्या को पार लगा"...

"तो?"...

"तो क्या?....भगवान ने मेरा रुदन...मेरा क्रंदन...मेरी आह...मेरी पुकार सुन ली और चमत्कार दिखा दिया"...

"तो क्या स्पीड?"....

"जी बिलकुल"...

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा"...

"अरे!...हाथ कँगन को आरसी क्या? और पढे लिखे को फारसी क्या?"...

"आप खुद ही चला के देख लें"...

"अरे यार!..मुझे कहाँ आता है ये स्कूटर-शकूटर चलाना?"...

"तो फिर सीख लो"...

"इस उम्र में?"...

"क्या दिक्कत है?"..

"ना...बाबा ना....मेरा इरादा अपनी हड्डी-पसली एक करवाने का नहीं है"...

"तुम मुझे पूरी बात बताओ कि क्या हुआ और कैसे हुआ?"...

"कैसे-क्या होना है?...मैँ रोज़ाना की तरह आज भी उस रायचन्द के बच्चे को कोसता हुआ अपने काम पे जा रहा था"...

"अब ये कौन सा राय चन्द बीच में आ के टपक पड़ा?"...

"वही!...जिसने मुझे ये डिब्बा खरीदने की सलाह थी थी"...

"अच्छा!...फिर?"...

"पूरे रस्ते मैँ भगवान से प्रार्थना करता जा रहा था कि...हे भगवान...किसी तरह इस टट्टू की स्पीड बढा दे...किसी भी तरह इसकी स्पीड बढा दे"...

"पूरे इक्यावन का प्रसाद चढाऊँगा"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...भगवान ने मुझे साक्षात दर्शन दे दिए"...

"साक्षात?"...

"जी!...बिलकुल साक्षात...फेस टू फेस दर्शन"...

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा...पूरी बात बताओ"..

"दरअसल हुआ क्या?..कि मैँ तो मन ही मन ऊपरवाले से प्रार्थना करता हुआ जा रहा था कि इतने में देखता हूँ कि एक सरदार जी बीच सड़क के इशारा कर मुझसे लिफ्ट माँग रहा है"....

"इस छकड़े पे लिफ्ट?"...

"जी"...

"विश्वास नहीं होता"....

"पहले-पहले तो मुझे भी विश्वास नहीं हुआ कि क्या कोई इतना सनकी और पागल भी हो सकता है जो इस...इस पे लिफ्ट मांगे"मैँ अपने स्कूटर की तरफ इशारा करता हुआ बोला...

"फिर?"...

"मुझे लगा कि शायद मुझे ही धोखा हो रहा है....मैँने अपनी मिचमिचाती हुई आँखों को पूरे जत्न से खोल के देखा तो पाया सब सच था"...

"मतलब...वो सरदार जी तुम्हें ही लिफ्ट देने के लिए इशारा कर रहा था"...

"जी हाँ!...मुझे ही"...

"अच्छा फिर?"...

"पहले तो मेरे जी में आया कि उसे कस के डांट लगा दूँ...फिर जाने क्या सोच के मैँने उसे लिफ्ट दे दी"...

"चैक करो!...कहीं कोई अंजर-पंजर तो ढीला नहीं हो गया इसका?"...

"अब तो ऊपरवाला ही मालिक है तुम्हारे इस....

"शर्मा जी!...हमेशा ऊपरवाला ही हर चीज़ का मालिक होता है...ये तो हम और आप व्यर्थ में गुमान पाल लेते हैँ कि ये मेरा है और वो मेरा है"...

"जी!...ये तो है"...

"ऊपरवाला तो जब जाहे...जिस किसी की भी छप्पर फाड़ झोली भर दे और जब चाहे किसी की भी बनी-बनाई बिलडिंगे गिरा उसे फुटपाथ पे ला दे"...

"जी!...उसका कोई मुकाबला नहीं....उसकी महिमा अपरम्पार है"...

"जी बिलकुल"...

"आगे क्या हुआ?"...

"मैँने ना चाहते हुए उसे लिफ्ट दे तो दी लेकिन अब मेरा दिल अन्दर ही अन्दर धुक्क-धुक्क करे कि बेटा राजीव!...तू तो गया काम से"...

"अच्छा...फिर?"...

"मैँ मन ही मन मैँ उस घड़ी को कोस रहा था जब मैँने उस सरदार के चक्कर में ब्रेक लगाए थे कि अचानक चमत्कार हो गया"....

"तो क्या स्पीड?"...

"जी!...बिलकुल"...

"मेरा जो स्कूटर 25 की स्पीड पर ही साँस फुला हाँफने लगता था...वो हवा से बातें कर रहा था"...

"क्या बात कर रहे हो?"...

"तुम्हें धोखा हुआ होगा"...

"शर्मा जी!...धोखा एक बार हो सकता है...दो बार हो सकता है...दस बार नहीं"...

"मैँने कम से कम दस बार अपनी इन्हीं आँखों से चैक किया....स्पीड वास्तव में 35 के पार थी"...

"अरे वाह!...फिर तो मज़े हो गए तुम्हारे"...

"अजी मज़े कहाँ?...तीर्व गति पे स्कूटर दौड़ाने के मज़े मैँ ले ही रहा था कि अचानक बीच में टांग अड़ाते हुए उस सरदार के बच्चे ने....ऊप्स सॉरी ...संत-महात्मा जी ने मुझे रुकने का इशारा किया"...

"फिर?"...

"फिर क्या?...उसके जाते ही स्पीड भी टांय-टांय-फिस्स.....वापिस वही अपने पुराने ढर्रे पे"...

"याने के 25 की स्पीड पे?"...

"जी"..

"ओह!...ये तो बहुत बुरा हुआ"...

"जी"...

"ज़रूर कोई पुण्य आत्मा रही होगी"...

"कोई ज़रूरी नहीं...आम इनसान भी हो सकता है"...

"लेकिन आम इनसान में इतनी ताकत कि वो.....

"यार!...तुम्हारा स्कूटर बिजली से चार्ज होता है ना?"...

"जी!.."...

"और ये भी तुमने सुना होगा कि इनसानों के अन्दर भी बिजली का थोड़ा-बहुत करैंट होता है"...

"जी!...सुना क्या?...मैँने तो खुद महसूस किया है"...

"मेरी अपनी...सगी बीवी खुद करैंट मारती है"...

"कब?"...

"जब मैँ उसकी मर्ज़ी के बिना उसके नज़दीक जाता हूँ"...

"अरे यार!...वैसे तो मेरी बीवी भी करैंट मारती है और सच कहूँ तो उसकी मारक क्षमता इतनी तेज़ है कि मैँ कई-कई हफ्ते उसके धोरे(नज़दीक) नहीं लगता"...

"क्या बात करते हैँ शर्मा जी?"...

"हो ही नहीं सकता"....

"क्या नहीं हो सकता?"...

"मेरा ओपन चैलेंज है आपको कि मेरी बीवी...आपकी बीवी से ज़्यादा तेज़ और असरदार करैंट मारती है"...

"ना...बिलकुल ना"...

"आपको अगर विश्वास नहीं है तो बेशक कभी भी आज़मा के देख लें"....

"तो फिर सोमवार ठीक रहेगा?"...

"किसलिए?"....

"करैंट चैक करने के लिए"...

"जी बिलकुल!...सोमवार को तो मैँ भी फ्री होता हूँ"...

"पक्का?"...

"बिलकुल पक्का"...

"मुकर तो नहीं जाओगे?"...

"शर्मा जी!...आपसे मैँने पहले भी कहा था और अब भी कह रहा हूँ कि पहले पहल तो मैँ किसी को हाँ नहीं करता और...

"और अगर गलती से हाँ कर दिया तो फिर भूल के भी कभी ना नहीं करता"...

"जी बिलकुल"...

"तो अपनी बात पे डटे रहिएगा"...

"ये भी कोई कहने की बात है?"...

"ओ.के"..

"तो फिर सोमवार को मिलते हैँ"...

"जी ज़रूर"...

"लेकिन वो सरदार जी वाली बात तो बीच में ही रह गई"...

"अरे यार!...सिम्पल सी बात है...सरदार भी करैंट मारता होगा"....

"ओह!...

"उसी की विद्धुतीय तरंगों की वजह से तुम्हारे स्कूटर की स्पीड बढ गई होगी"...

"हम्म!...यही हुआ होगा"...

"वैसे वो सरदार...तुम्हें मिला कहाँ था?"....

"ब्रिटेनिया के नए वाले पुल के ऊपर"....

"और तुमने उसे छोड़ा कहाँ था?"....

"छोड़ना कहाँ था?...ढलान उतरते ही उसने मुझे कहा कि...बस यही रोक दो"...

"बेवाकूफ!...ये बात पहले नहीं बता सकता था"....

"आप ही ने तो कहा था कि सारी बात सिलसिलेवार ढंग से एक-एक कर के बताऊँ"....

"ओ.के"...

"इसीलिए तो मैँने अपनी बात स्कूटर से शुरू की थी"...

"अच्छा शर्मा जी!...ज़रूरी काम है....मैँ चलता हूँ"...

"कहीं देर ना हो जाए"...

"कहाँ जाना है?"...

"उसी पुल की तरफ...क्या पता फिर मुलाकात हो जाए और पुन: चमत्कार हो जाए"...

"उफ!...तौबा...

"बेवाकूफ के बच्चे!....अभी तक तेरे भेजे में बात नहीं घुसी की कि ऊँचाई से नीचे आते वक्त गाड़ी की स्पीड अपने आप तेज़ हो जाती है"...

"ओह!...लेकिन वो चमत्कार...

"धन्य है तू....और तेरा चमत्कार"...

"ले...देख....तेरे चमत्कार को दण्डवत हो के नमस्कार करता हूँ"....

"अब खुश"....

"जी...बहुत"...

***राजीव तनेजा***

नोट:इस कहानी को लिखने का आईडिया मुझे तब आया जब एक सरदार जी ने मुझसे मेरी 'स्कूटरी'...ऊप्स सॉरी 'स्कूटर' पर लिफ्ट माँगी

Rajiv Taneja

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