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बंटवारे का गम

जिनसे कभी मिले नहीं
उनसे बिछड़ने का क्या गम होगा।
ज़ख्मों को हरा करने से
दर्द भला क्या कम होगा।

वो उस सरहद का बारूद
इस सरहद में रख देते हैं
इससे भी बढ़कर भला
कौन बेवफा सनम होगा!

फ़िर भी सब शिकवे भुलाकर
इंतज़ार आज भी करते हैं
कि उनकी भी आंखों में
कोई तो कोना नम होगा।

बंटवारा सरहदों का नही
हिन्दुस्तान के दिलों का हुआ था
दिल से दिल जब मिलेंगे
तब ही ये फासला कम होगा।
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दिल्‍ली पुस्‍तक मेले में प्रकाशन विभाग की पुस्‍तकों का विमोचन (अविनाश वाचस्‍पति)


दिल्‍ली में पुस्‍तक मेला चल रहा है
जी हां मेला चलता ही है और
इस मेले में पुस्‍तक प्रेमियों का
दिल मचलता ही है खरीदने के लिए।

मेले तो सभी चलते हैं
बच्‍चों को भी अच्‍छे लगते हैं
बच्‍चे कहते हैं मेला मेला है
मतलब मेला मेरा है।

पर पुस्‍तक मेला तो सबका है
बच्‍चों, जवानों और अनुभवियों का
दिल्‍ली में है तो यह मत समझें
सिर्फ दिल्‍ली वालों का है।

एक सितम्‍बर 2009 को तीन बजे
पत्रकार और लेखक देवेन्‍द्र भारद्वाज रचित
राष्‍ट्रमंडल खेल : सफरनामा का विमोचन
खेल कमेंटेटर डॉ. नरोत्‍तम पुरी करें।

4 सितम्‍बर 2009 को किया जाएगा विमोचन
प्रोफेसर पुष्‍पेश पंत लिखित भूमंडलीकरण का
जिसे मुख्‍य अतिथि और यूपीएससी के सदस्‍य
डॉ. पुरुषोत्‍तम अग्रवाल करेंगे शाम 4 बजे।

इसके अलावा भी होंगे खूब सारे कार्यक्रम
यह सब प्रगति मैदान में हो रहा है
और विमोचन प्रगति आडिटोरियम में।
आप आयेंगे विश्‍वास है नुक्‍कड़ को।
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बेमौसम की होली

पोस्‍ट नंबर 19

बेमौसम की होली

बीजेपी की टोली

हम आप सभी होली खेलते हैं

एक दूसरे पर रंग डालते हैं

गुलाल लगाते हैं

कीचड़ फेंकते हैं

गोबर फेंकते हैं

कीचड़ में‍ छिपाकर कंकड़ .............. पूरा पढ़ने के लिए क्लिक करें.
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पप्‍पू मंदिर जाता है (अविनाश वाचस्‍पति)


मुन्‍ना ने पूछ लिया पप्‍पू से
तुम्‍हारे जूते
मेरे जूतों से
चमकदार कैसे ?

पप्‍पू ने बतलाया
इसे प्रभु की माया
मुन्‍ना चकराया
खूब दिमाग लगाया
जब समझ नहीं आया
तो पूछ लिया
कैसे ?
कल तलक तो
फटे पुराने थे।

रहस्‍य खोला पप्‍पू ने मुस्‍कराते हुये
बात है सीधी सी
नहीं जरा सी भी टेढ़ी या तिरछी
थोड़ी बहुत सिलाई करा ली थी और ...

और क्‍या ....
अधीर हो चुका था मुन्‍ना
मंदिर में चला गया था
दर्शन करने।

पप्‍पू मंदिर जाता है
चमकदार जूते पहनता है।
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मजहब के चलते अंतर क्‍यूं धरती के संतान में

कई वर्ष पहले ‘नवनीत’ पत्रिका में यह रचना पढी थी , पसंद आने पर इसे डायरी में नोट कर लिया था , आज आप सबों के लिए इसे ब्‍लाग पर डाल रही हूं , यह भी जानने की इच्‍छा है कि इसके रचयिता कौन हैं , यदि आपमें से किसी को मालूम हो तो अवश्‍य बताएं ....

नहीं लिखा है , अगर कहीं भी गीता और कुरआन में ,
मजहब के चलते अंतर क्‍यूं धरती के संतान में ।

हिन्‍दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई , ईश्‍वर की संतान हैं ,
धर्म भले हों अलग अलग पर , पहले सब इंसान हैं।
उपरवाले से हम सबको , सबकुछ सदा समान मिला ,
कुछ को गीता , गुरूग्रंथ , तो कुछ को कुरआन मिला।

ग्रंथ भले ही अलग अलग हों, न अंतर, मनुज बने इंसान में ,
मजहब के चलते अंतर क्‍यूं , धरती की संतान में।

धूप , पवन और जल सबको हैं , संग साथ ही मिलते ,
सबके उपवन में मौसम पर फूल संग ही खिलते।
नहीं धूप ने कहा कभी , मैं केवल मंदिर जाउं ,
नहीं पवन ने कहा कभी , क्‍यों मस्जिद में इठलाउं।

निर्माता ने किया नहीं , जब फर्क कहीं निर्माण में ,
मजहब के चलते अंतर क्‍यूं धरती की संतान में।

अमर हो गयी मीरा जग में , कृष्‍ण भजन गा गाकर,
मानुष हो तो कहैं रसखान , बसौं ब्रजगोकुल जाकर।
नहीं कोई रसखान सरीखा , गोकुल बसनेवाला ,
नहीं पिया कोई मीरा जैसा कृष्‍ण भक्ति का प्‍याला।

कहां कृष्‍ण ने अंतर समझा , मीरा और रसखान में ,
मजहब के चलते अंतर क्‍यों धरती की संतान में ।

यह तो राजनीति का चक्‍कर , जो लोगों को बांट रही ,
राम रहीम ईसा का खेमा , बना बनाकर बांट रही ।
सावधान होकर सोंचे , पर मत आए बहकावे में ,
मानवता ही मात्र धर्म है , भूले नहीं छलावे में।

स्‍नेह प्‍यार की खुश्‍बू बांटे , देवतुल्‍य इंसान में ,
मजहब के चलते अंतर क्‍यूं , धरती की संतान में।
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'चरणदास चोर' और उदय प्रकाश

अभी कुछेक दिन पहले एक ई मेल मिला। ई मेल में 'कबाड़खाना' ब्लॉग से एक जरूरी सूचना दी गई थी। 'जन संस्कृति मंच' के महासचिव प्रणय कृष्ण का एक वक्तव्यनुमा लेख था, जिसमें सूचित किया गया था कि छत्तीसगढ़ सरकार ने हबीब तनवीर के प्रख्यात नाटक 'चरणदास चोर' पर प्रतिबंध लगा दिया है। प्रणय कृष्ण के लेख पर तुरंत प्रतिक्रियाएं आना शुरू हो गईं और बड़ी संख्या में बुध्दिजीवियों ने छत्तीसगढ़ सरकार की आलोचना की। वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने तो यहां तक लिखा कि सारे कलाकारों को इकट्ठा होकर छत्तीसगढ़ चलना चाहिए और वहां 'चरणदास चोर' का मंचन करना चाहिए। राजकिशोर ने लिखा कि वह छत्तीसगढ़ चलने के लिए तैयार हैं।

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार अपने कुत्सित कारनामों के लिए पहले से ही मशहूर है। मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ। विनायक सेन छत्तीसगढ़ सरकार की तानाशाही के चलते एक लम्बा वक्त जेल में गुजार कर आए हैं और आए दिन फर्जी मुठभेड़ों में निरीह और गरीब आदिवासियों को नक्सली बताकर मार देने की खबरें भी छत्तीसगढ़ में आम बात हो गई है। उधर हबीब साहब के ऊपर भी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी गुंडे हमले कर चुके थे और कई बार उनके नाटकों में इन भगवा आतंकवादियों ने विघ्न डाला था। लिहाजा प्रणय कृष्ण की सूचना पर बौध्दिक जमात का उद्विग्न होना लाजिमी था। लेकिन इसी बीच रविवार डॉट कॉम के संपादक आलोक पुतुल का एक मेल मिला जिसमें बताया गया कि छत्तीसगढ़ में 'चरणदास चोर' पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है बल्कि सतनामी समाज ने मुख्यमंत्री से मिलकर उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी और उस मांग पर सरकार की चुप्पी से यह भ्रम फैला। पूरा आलेख आप मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। READ MORE..
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एक जबरदस्‍त जबरदस्‍ती ब्‍लॉगर्स के साथ ब्‍लॉगिंग में (अविनाश वाचस्‍पति)

ताऊ और अविनाश वाचस्‍पति ताऊ स्‍टूडियो में जीवंत प्रसारण

तेरी नहीं यह मेरी है
फोटो बहुत ही चितेरी है
जिया मेरा लूट ले गई।

आईना देख रहे हैं
नहीं नहीं नहीं
आई ना, आई ना।

आप हैं ब्‍लॉगर
असरदार और सरदार भी
असर अपना डालिये।

तीन बजकर तैंतीस मिनिट पर
ताऊ डॉट इन पर पधारिये
मन में जो सवाल आयें
उन्‍हें अविस्‍मरणीय बनायें
और बतौर टिप्‍पणी दर्ज कर जायें।

पर मालिक हैं आप
राय देने के लिए
अच्‍छा अच्‍छा ही न कहें
जो बुरा हो वो ही कहें
जिसे हम सहें।

एक जबरदस्‍ती हम करें
एक जबदस्‍ती आप करें
फिर न कहना
हमसे जबरदस्‍ती न हुई।
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‘नुक्कड़’ के सभी पोस्ट अब मुख्य पृष्ठ पर - (सुशील कुमार)





  • साथियों,
    यह बताते हुए मुझे हर्ष हो रहा है कि ‘नुक्कड़’ पर अनुसरणकर्ताओं (Followers) की संख्या अब सौ को पार कर चुकी है और कुल पोस्ट की संख्या यहां483 से उपर हो गयी है। यह ब्लॉग-प्रेमियों का पुराना साझा-मंच है... एक चौराहे की तरह, जहाँ हम सब आकर मिलते रहते हैं और बेबाक़ी से अपनी बात रखते हैं। तो बात यह है कि पोस्टों की संख्या बढ़ जाने के कारण मुझ जैसे धीमी गति के डाटा-स्पीड नेट पर काम करने वाले लोगों को अपनी पुरानी पोस्टें खोजने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी। हर बार पेज पर नीचे older posts को किल्क कर अपने वांछित पोस्ट तक पहुँचना पड़ता था, या फिर सर्च-इंजिन की सहायता से उस पोस्ट को खोजना पड़ता था।इसके अलावे कब,किसने क्या लिखा, यह भी देखने में परेशानी होती थी।
    पर अब यह परेशानी दूर कर दी गयी है। दाहिनी ओर उपर ही साईडबार में ‘सभी पोस्ट दिखाएँ’ लिंक पर किल्क करने से मुख्य-पृष्ठ पर ही सारे पोस्ट के लिंक उपलब्ध हो जाते हैं जिसे किल्क कर देखा जा सकता है। सुविधा के लिये प्रति पृष्ठ पोस्ट की संख्या 150 रखी गयी है जिसे घटाया बढाय़ा जा सकत है। फिर नीचे older posts को किल्क करने पर अगला 150 पोस्ट लिंक खुल जायेगा। तो है न यह सुविधा वाली बात!
    मैंने अपने साईट स्मृति-दीर्घा और सबद-लोक पर भी यह सुविधा कर रखी है।
    संगीता पुरी जी के ब्लॉग गत्यात्मक ज्योतिष पर भी पोस्टों की संख्या बढ़ रही है। अत: उन्हें भी यह काम कर लेना चाहिये ताकि पाठकों को कोई पुराना अभिलेख खोजने में दिक्कत न आये।
    साथ ही सभी ब्लॉगर साथियों से निवेदन करना चाहूंगा कि वे ब्लॉग के मुख्य-पृष्ठ पर पोस्ट की संख्या अधिक न रखें। अधिक रखने से ब्लॉग खुलने में खासकर वैसे जन को दिक्कतें आती है जहाँ धीमा डाटा-स्पीड का नेट उपलब्ध होता है। पोस्ट की संख्या अवश्य कम रखा करें।
    साथियों, आप सोच रहे होंगे कि जब यह सब इतना आसान और सुविधाजनक है तो मैं यहां इसके करने की विधि क्यों नहीं बता रहा। तो इस मेरा कहना यह है कि यह काम उन लोगों का है जो टेकनीक-ब्लॉग संचालित कर रहे हैं। मैं तो लेखक-कवि मात्र हूँ और उनका हक़ छीनना नहीं चाहता। हां.. यह काम HTMl को Edit कर विजेट लगाने का है जिसमें सतर्कता भी रखनी पड़ती है जिसे मुझसे बेहतर वे जन ही बता पायेंगे। यह तो आदरणीय भाई अविनाश जी का प्यार है कि अपने साथ-साथ उनके ब्लॉग पर भी इक्का-दुक्का काम कर देता हूँ। तो साथियों,फिर मिलेंगे नये पोस्ट के साथ। तब तक आप नुक्कड़ के ’पोस्ट-अनुक्रम’के नीचे ‘सभी पोस्ट दिखाएँ’ बटन को किल्क कर पुरानी पोस्टों का लुत्फ़ लीजिये। धन्यवाद।
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लोकार्पण समारोह : दिशा देती कथाएं : रेणु सैनी

मेरे आत्‍मीय ब्‍लॉगर/मित्रों
जो हैं दिल्‍ली में
से है विशेष अनुरोध
अवश्‍य आयें और
इस बहाने हम भी
आपस में
एक बार फिर
रूबरू हो जायें।

गुरूवार है 27 अगस्‍त 2009 को
और आयोजन है
दिशा देती कथायें (रेणु सैनी)
पुस्‍तक के लोकार्पण का।

लोकार्पण कर रहे हैं
मुख्‍य अतिथि
जस्टिस दिल्‍ली हाईकोर्ट
श्री एस एल भ्‍याना
और
अध्‍यक्षता श्री एम के गांधी
अध्‍यक्ष मानवता अभियान एवं
आल इंडिया टैक्‍स एडवोकेट फोरम।

समय सायं 5.00 बजे से
स्‍थान : त्रिवेणी कला संगम, तानसेन मार्ग
मण्‍डी हाउस, नई दिल्‍ली।
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वॉयस ऑफ इंडिया के बहाने जरा सोचिए,कुछ कीजिए

उस समय तक वॉयस ऑफ इंडिया की सांसें लगभग उखड़ चुकी थीं, जब साईं भक्त और चैनल के सीईओ अमित सिन्हा इसे मज़बूती के तौर पर खड़े करने की बात करते नज़र आ रहे थे। मीडिया ख़बरों से जुड़ी एक वेबसाइट पर बतौर सीईओ उन्होंने कहा कि मैं साईं का भक्त हूं और मुझे उन पर पूरा भरोसा है, सब ठीक हो जाएगा। जाहिर है, उस समय अमित सिन्हा ने चैनल से जुड़े लोगों को जो भरोसा दिलाया, वो एक सीईओ की हैसियत से ज़्यादा श्रद्धा में जकड़े एक भक्त की भावुकता से ज़्यादा कुछ भी नहीं था। जिन लोगों को लगता है कि उनका जीवन श्रद्धा, विश्वास और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर तय होते हैं, उन्हें अमित सिन्हा की बात पर भरोसा करने में रत्तीभर भी संदेह नहीं हुआ होगा और वो इस इंटरव्यू के पढ़े जाने के बाद से ही राहत महसूस करने लगे होंगे। वैसे भी देश के भीतर एक खास तरह की जनता हमेशा से मौजूद है जो बाबा, पुजारी, भगवान और पीर-फकीरों के प्रभाव से कोढ़ी, लाचार और अपाहिज को रातोंरात चंगा होते देखते आये हैं। अपनी इसी समझदारी के बूते पर अमित सिन्हा ने सीईओ के तौर पर एक-दो लोगों की जिंदगी नहीं बल्कि पूरा का पूरा एक चैनल ही चंगा करने की जिम्मेवारी अपने आराध्य पर डाल दी। अगर अमित सिन्हा के भीतर प्रोफेशनल एप्रोच होता, तो वो साईं मिलेनियर नाम से दूसरा चैनल खोलने के बजाय मौजूदा चैनल को दुरुस्त करने का काम करते। इस बात को समझ पाते कि दिन-रात साधना और आध्यात्म की बात करनेवाले चैनल भी बाज़ार की शर्तों पर चलते हैं, उसे कोई बाहरी शक्ति चंगा करने नहीं आती। नहीं तो अब या तो ये मानिए कि सारी गड़बड़ी उस आराध्य की है, वो अब समर्थ नहीं रह गये कि कोढ़ी को चंगा कर सकें या फिर अमित सिन्हा को इस पूरे प्रकरण के लिए जिम्मेवार मानिए कि उन्होंने सैकड़ों मीडियाकर्मियों की जिंदगी से खिलवाड़ किया है और भक्त होकर आस्था की सत्ता के आगे ढोंग रचने का काम किया है। ये मामला एक चैनल का है] इसलिए बाकी के चैनल कवरेज करने के बावजूद भी चुप्पी साधे बैठे हैं। नहीं तो दूसरी स्थिति होती तो ये पूरा मामला आस्था और कल्याण से जुड़ी स्टोरी एंगिल को लेते हुए हम ऑडिएंस के लिए एक के बाद एक पैकेज बनकर सामने आते। पूरा लेख मीडिया ख़बर.कॉम पर पढ़ सकते हैं। यहाँ क्लिक करें।
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क्या ’स्मृति-दीर्घा’ ब्लॉग को बंद कर दिया जाय? -सुशील कुमार


साथियों ,
गत दिनों हमने आपसे अनुरोध किया था कि "स्मृति-दीर्घा" पर एक दिन में एक ही पोस्ट हो तो उत्तम। एकाधिक पोस्टें पाठकों की गंभीरता को भंग करती हैं और पाठक उसे कम ही पढ़ पाते हैं जिससे रचना पर संभवत: टिप्पणियाँ भी कम ही मिल पाती हैं, जबकि हम जानते हैं कि टिप्पणियाँ लेखकों को बेहतर लेखन की प्रेरणा देती हैं। किन्तु बात बनी नहीं , विगत 19 अगस्त 2009 के बाद वहाँ किसी ने कोई रचना,यादें पोस्ट ही नहीं की ,जबकि लक्ष्य यह है कि यहाँ प्रतिदिन एक पोस्ट किया जाय। काजल कुमार जी ने अपना कार्टून तक पोस्ट नहीं किया।

लगता है लेखकों की रुचि भंग हो गयी है या उन्हें समय नहीं। अगर मेरी बातों का बुरा माना आपने तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। पर ऐसी कोई बात ही नहीं। अभी तक इतने (33) लेखकों/लेखिकाओं ने यहाँ लिखने के लिये योगदान किया है जो गुण और संख्या की दृष्टि से कतई कम नहीं। इसके अच्छे आसार नज़र आते हैं ,तब फिर उदासीनता का कारण समझ में नहीं आता।
सर्वश्री/श्रीमति/सुश्री-
समीर लाल ’समीर’
शेफाली पाण्डेय
सुरेश यादव
मोहन वशिष्‍ठ
राजीव रंजन प्रसाद
अजित वडनेरकर
हिमांशु
अजन्ता
शैलेश भारतवासी
अविनाश वाचस्पति
अजय कुमार झा
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
डा०आशुतोष शुक्ल
अरविन्द श्रीवास्तव
अरुण कुमार झा
हरि शर्मा
उमाशंकर मिश्र
रति सक्सेना
मुरारी परीक
आलोक शंकर
सिद्धार्थ जोशी
श्यामल सुमन
काजल कुमार
पवन *चंदन*
कमल शर्मा
राजीव तनेजा
शमा
कथाकार
राजेश उत्‍साही
सुशील कुमार सुभाष नीरव
अशोक सिंह
संगीता पुरी
आप सभी जन से अनुरोध है कि आप गंभीरता से विचार करें कि साझा-ब्लॉगिंग इस तरह कैसे चल सकता है, यदि वहाँ कभी-कभार ही रचनाएँ पोस्ट हों।

क्या ’स्मृति-दीर्घा’ ब्लॉग को बंद कर दिया जाय?

आपने लेखकों के संस्मरण के इस अभिनव यात्रा में साथ देने का निर्णय लिया है, तभी तो यहाँ योगदान भी किया है ताकि समय-समय पर आप अपने जीवनानुभव के विचिध पगों से, वहां घटित घटनाओं से हमें अवगत कराकर हमारा मार्गदर्शन करते रहें जिससे इस जीवन के टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर हम आप से सीख ले सकें और अपनी ज्ञान-संपदा, अपने अनुभव को समृद्ध करते रहें। अत: मैं पुन: सभी जन से विनम्रता से आग्रह करता हूँ कि आप अपनी स्मृतियां और अनुभवलोक से हमें दीर्घा पर सदैव बाँटते रहें। मैं इस प्रार्थना के साथ आदरणीय वरिष्ठ कवि विजेन्द्र की एक नूतन कविता से विदा लेता हूँ कि-
तुम्हें कठोर जीवन जीते-जीते
वह सहज लगने लगा है
उठो और जागो,
मनुष्य जीवन सिर्फ़ दासता के लिये नहीं;
प्यार में करुणा ही नहीं
प्रतिरोध भी है
तुम कहो वे बातें
तुम्हारी स्मृति में सालों से जो पड़ी हैं
जिससे औरों को भी
मुक्त होने का साहस मिले
इतना कि
विस्मृति की चिर-निंद्रा में सोयी
चेतना के हंस उनके
फिर से जाग उठे
तुम्हारी ही तरह फिर औरों को
जगाने के लिये***
-सुशील कुमार
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ब्लॉगर पहचानो वाले कार्टूनिस्ट सुरेश शर्मा जी अस्वस्थ हैँ

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ब्लॉगर पहचानो वाले सुरेश शर्मा जी(कार्टूनिस्ट) जिनका कार्टून धमाका नामक ब्लॉग भी है...वो आजकल अस्वस्थ हैँ।अत: वो कुछ दिन तक अपना पोस्ट नहीं कर पाएँगे।हम सभी चाहते हैँ कि वो शीघ्र अति शीघ्र पूर्ण रूप से स्वस्थ हो कर ब्लॉगजगत में पुन: सक्रिय हों

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सर पे लटकती ये तलवार है


***राजीव तनेजा***

nse

'सेंसेक्स' की छाई बहार में

सोमवार से लेकर इतवार में 

हर किसी को जब डूबे देखा...

दीन दुनिया से ऊबे देखा

कौतूहल सा भाव जाग उठा

गूढ सवाल का सरल जवाब 

क्या है ये दिल माँग उठा

बाज़ार भाव देख रहे पिताजी से  

जब उत्सुकतावश पूछा... 

क्या होता है उतार ...

क्यूँ चढता है चढाव...

क्या होता है मुनाफा...

क्यूँ होता है लॉस

हारे हुए जुआरिओं को 

कैसे बँधाए हम आस

क्या खरीदें कितना खरीदें

कैसे करें हम सही चुनाव

बात मेरी सुन वो मंद-मंद मुस्काए 

जिज्ञासा मेरी देख कर 

खुशी हर्ष के बादल चेहरे पे छाए

हकीकत ए 'सेंसेक्स' उन्होंने कुछ यूँ ब्याँ कर दी...

मानो ज्ञान रूपी गंगा से झोली मेरी भर दी 

'सेंसेक्स' की माया बेटा!..है अजब निराली

कर दे किसी की तिजोरी बिलकुल खाली 

तो किसी की छप्पर फाड झोली भर....

ला दे बिन मौसम होली और दिवाली 

कंस्ट्रक्शन' में लगाओ ऊँचा जाएगा

'कैमिकल' में ना फँसा घाटा खाएगा

जैसे जुमले रोज़ सुनने को मिलते है

तगडे मुनाफे के फूल तो बेटा.....

यदा कदा ही खिलते हैँ

साम,दाम, दंड और भेद अपना नाजायज़ 

जला दिए थे हाथ हमारे उस 'हर्षद' और 'केतन' ने

भूले कैसे याद है सब दर्द सहा है कितना 

छाछ को भी हमने अब फूंक फूंक कर है पीना

कोई 'रिलायंस' की 'पावर' के पीछे बडा बावला है 

शायद वो पिछले घाटे पूरे करने को उतावला है 

वो पिछला 'स्टाक' बेच बेच माल बटोर रहा है 

'रिलायंस पावर' खरीद 'स्टॉक' का इरादा कर रहा है 

जिसे देखो उसी का हाल बेहाल है...

इसी आपाधापी में सबका हुआ बुरा हाल है 

ज़िन्दगी का मज़ा हुआ कब का खत्म...

ना बचा सुर ना ही बची अब ताल है

कोई हाँफ-हाँफ फोन पे हाल अपना बतिया रहा है 

तो कोई कम्प्यूटर में आँख गडाए चुपचाप खिसिया रहा है

किसी की नज़र 'फाईनैंशल' अखबारों से नहीं हट रही

तो किसी की दूजे 'चैनलों' पे दो पल नहीं टिक रही...

लग गया है चश्मा बढ गया है नम्बर 

उफ!...ये काम भी कितना दुश्वार है 

फिर भी सभी को इसी से प्यार है 

हाँ!...हरदम इसी से प्यार है

कोई 'ट्रांसफार्मर्स'. ..

तो कोई 'बी जी आर' को पा कर मुस्कुरा रहा है

कोई 'मुन्द्रा पोर्ट बेच मनचाही मुद्रा कमा रहा है 

तो कोई 'स्वराज इंजन' के पिछले शेयरों पे इतरा रहा है 

जिसे देखो वही सुनहरे मौके को भरपूर भुना रहा है 

कूद रहे हैँ मैदान ए जंग में रोज़ाना खिलाडी नए नए 

ऑफर उनके लुभावने कोई बेचे सिमेंट तो कोई बेचे पेय 

कोई ढेरो मुनाफे के वायदे को पकाए बारम्बार

कोई 'फिक्स डिविडैंड' का झुनझुना थमाए लाखों बार 

कोई प्यारा सज्जन बोनस पे बोनस बाँट रहा है

तो कोई रावण  हक का 'डिविडैंड' भी खाए जा रहा है

कोई लंपट  बरगला औने पौने में 'शेयर' हथिया रहा है

तो कोई उन्हें 'बोनस' में  दे सबको लुभा रहा है 

कोई ढेरों मुनाफा पा अपने में खुद मदमस्त है 

तो कोई अपने अनचाहे घाटों से ही बेदम औ त्रस्त है 

कोई लाखों कमा शुक्र ऊपरवाले का मना रहा है 

तो कोई किस्मत अपनी फूटी का रोना गा गा सुना रहा है

दिन को चैन नहीं रातों को आराम नहीं

बेचैन ना हो इतना दिल को थाम यहीं

रट ले बेटा राजीव ये मूल मंत्र...

नहीं कोई जादू है ना ही कोई तंत्र

माल कमाने का बस यही असल एक है जंत्र...

'आई पी ओ' में लगाओ बहार ही बहार है 

'ट्रेडिंग' के पीछे ना भागो सर पे लटकती ये तलवार है

हाँ!...सर पे लटकती ये तलवार है 

***राजीव तनेजा***

नोट:अविनाश वाचस्पति जी को समर्पित

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मैं ‘मंजू दीदी’ बनना चाहती हूं


हमारे पूरे परिवार की सबसे छोटी सदस्‍य यानि घर की एकमात्र बिटिया रानी साक्षी ( क्‍यूंकि बडे भैया की लडकी की शादी हो चुकी और मेरे दो बेटे ही हैं और वह देवरानी की बिटिया है) चार पांच वर्ष की उम्र की ही होगी कि एक दिन हमारे पूछने पर कि तुम बडी होकर क्‍या बनना चाहती हो , उसने बताया कि वह ‘मंजु दीदी’ बनना चाहती है। अब आप पाठकों को मंजू दीदी का परिचय दे ही दूं। उस वक्‍त वह 14 – 15 वर्ष की एक लडकी थी , जो हमारे घर के अतिरिक्‍त अन्‍य दो घरों में चौका बरतन करती थी। छोटे परिवार वाले घरों में तीन घरों में काम करना उसके लिए अधिक कठिन नहीं था , जबकि इसी बहाने वह दिन भर घर से गायब घूमती , फिरती , सबके घरों में फिल्‍म या सीरियल देखती , नए नए कपडे और श्रृंगार प्रसाधनों की खरीदारी करती और हर वक्‍त सजी संवरी रहती। सालभर का कोई भी त्‍यौहार होना चाहिए , चाहे वह हिन्‍दू का हो , मुस्लिमों का , सिखों का या ईसाई का या राष्‍ट्रीय पर्व या फिर नए वर्ष का , उसके कार्यक्रम पहले से बने होते और साथ ही साथ उसके लिए छुट्टी की अर्जी भी। उसकी उम्र देखकर हमें दया आती , हर परिवार से उसे छुट्टी मिल जाती थी , चाहे त्‍यौहार के दिनों में भी अतिरिक्‍त काम के बोझ से पीसें क्‍यूं न जाएं। कारण चाहे जो भी रहा हो , बच्‍चे के मन में स्‍टेटसवाली बात की जानकारी तो नहीं होती , पांच वर्ष की इस बच्‍ची को परिवार की अन्‍य महिलाओं से जरूर वह अच्‍छी लगी होगी , तभी तो ‘मंजू दीदी’ उसकी आदर्श बन गयी थी , आज भले ही इस बात की चर्चा होने पर वह शर्मा जाती है ।


जहां हम महिलाएं एक ओर घरेलू काम खुद न कर अपना बी पी , सुगर और थायरायड के बढने से परेशान हैं , वहीं दूसरी ओर इन कामवालियों के भाव में आयी बढोत्‍तरी भी हमें कम परेशान नहीं करती। सचमुच इन बाइयों का जीवन कम आरामदेह नहीं होता। भले ही दिनभर काम करने के बाद उन्‍हें मामूली पैसे ही मिलते हों , पर जहां एक ग्रेज्‍युएट भी दो–तीन-चार हजार की नौकरी करने को विवश हों , वहां उनकी कमाई इतनी कम भी नहीं। अन्‍य किसी प्राइवेट नौकरी में आपको छुट्टी लेने से पहले कई बार सोंचना होगा , पर घरेलू नौकरानियों को छुट्टी लेने के लिए कुछ सोंचने की आवश्‍यकता नहीं। अभी सावन के अंत अंत में मेरी नौकरानी ने कांवर लेकर देवघर के भोले बाबा को जल चढाने का मन बनाया। सभी घरों से सिर्फ एक सप्‍ताह की छुट्टी ही मंजूर नहीं हुई , वरन् उसे गेरूए कपडे और पैसे भी अतिरिक्‍त मिले । उसके बाद के एक सप्‍ताह काम पर आने पर तबियत खराब होने के कारण हल्‍के फुल्‍के ही काम करती रही । फिर सप्‍ताह दस दिन भी नहीं हुए कि गायब ही हो गयी , मनसा पूजा (सर्पों की देवी) के बहाने। यह पूजा इस इलाके में 19 अगस्‍त को मनायी गयी , पर 20 अगस्‍त को बृहस्‍पतिवार का दिन होने से विसर्जन नहीं हुआ , 21 को विसर्जन हुआ है और आज भी उसका कोई अता पता नहीं। आप उसे काम से हटा भी नहीं सकते , एक हटाएंगे तो उन्‍हें दस मिल जाएंगे। अब एक सप्‍ताह से खुद सारे काम संभालने पड रहे हैं और वह मजे मार रही है। देखिए उसके मजे को साक्षी ने इतनी कम उम्र में पहचान लिया था। वैसे आज तबियत खराब होने के बाद भी इतने घरेलू कामों के दबाब में अचानक साक्षी की इस बात की याद आ गयी , वैसे इसी रक्षाबंधन के दिन मुझे यह बात मालूम हुई कि उसकी बेचारी मंजु दीदी तो इस दुनिया में तो अब रही भी नहीं ,
नहीं तो मेरे मन में इन बाइयों के लिए बहुत सहानुभूति है , और वो मुझे या मैं उन्‍हें तभी छोड पाती हूं , जब मुझे घर बदलने होते है । यदि छोटी छोटी खुशियों में ही वे खुश होते हैं , तो हमारा क्‍या अधिकार बनता है उनकी खुशी को छीनने का।

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शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शिक्षक हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था के हृदय हैं। शिक्षा को अगर बेहतर बनाना है तो शिक्षण विधियों के साथ-साथ शिक्षकों को भी इस हेतु पेशवर रूप से सक्षम तथा बौद्धिक रूप से सम्‍पन्‍न बनाए जाने की जरूरत है।

राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 में भी शिक्षक की भूमिका पर विशेष रूप से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि शिक्षक बहुमुखी संदर्भों में काम करते हैं। शिक्षक को शिक्षा के संदर्भों,विद्यार्थियों की अलग-अलग पृष्‍ठभूमियों,वृहत राष्‍ट्रीय और खगोलीय संदर्भों,समानता,सामाजिक न्‍याय, लिंग समानता आदि के उत्‍कृष्‍ठता लक्ष्‍यों और राष्‍ट्रीय चिंताओं के प्रति ज्‍यादा संवेदनशील और जवाबदेह होना चाहिए। इन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए आवश्‍यक है कि शिक्षक-शिक्षा में ऐसे तत्‍वों का समावेश हो जो उन्‍हें इसके लिए सक्षम बना सके।

इसके लिए हर स्‍तर पर तरह-तरह के प्रयास करने होंगे। टीचर्स आफ इंडिया पोर्टल ऐसा ही एक प्रयास है। गुणवत्‍ता पूर्ण शिक्षा की प्राप्ति के लिए कार्यरत अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन (एपीएफ) ने इसकी शुरुआत की है। महामहिम राष्‍ट्रपति महोदया श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने वर्ष 2008 में शिक्षक दिवस इसका शुभांरभ किया था। यह हिन्‍दी,कन्‍नड़, तमिल,तेलुगू ,मराठी,उडि़या, गुजराती ‍तथा अंग्रेजी में है। जल्‍द ही मलयालम,पंजाबी,बंगाली और उर्दू में भी शुरू करने की योजना है। पोर्टल राष्‍ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा समर्थित है। इसे आप www.teachersofindia.org पर जाकर देख सकते हैं। यह सुविधा निशुल्‍क है।

क्‍या है पोर्टल में !

इस पोर्टल में क्‍या है इसकी एक झलक यहां प्रस्‍तुत है। Teachers of India.org शिक्षकों के लिए एक ऐसी जगह है जहां वे अपनी पेशेवर क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं। पोर्टल शिक्षकों के लिए-

1. एक ऐसा मंच है, जहां वे विभिन्‍न विषयों, भाषाओं और राज्‍यों के शिक्षकों से संवाद कर सकते हैं।

2. ऐसे मौके उपलब्‍ध कराता है, जिससे वे देश भर के शिक्षकों के साथ विभिन्‍न शैक्षणिक विधियों और उनके विभिन्‍न पहुलओं पर अपने विचारों, अनुभवों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

3. शैक्षिक नवाचार,शिक्षा से सम्बंधित जानकारियों और स्रोतों को दुनिया भर से विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में उन तक लाता है।

Teachers of India.org शिक्षकों को अपने मत अभिव्‍यक्‍त करने के लिए मंच भी देता है। शिक्षक अपने शैक्षणिक जीवन के किसी भी विषय पर अपने विचारों को पोर्टल पर रख सकते हैं। पोर्टल के लिए सामग्री भेज सकते हैं। यह सामग्री शिक्षण विधियों, स्‍कूल के अनुभवों, आजमाए गए शैक्षिक नवाचारों या नए विचारों के बारे में हो सकती है।

विभिन्न शैक्षिक विषयों, मुद्दों पर लेख, शिक्षानीतियों से सम्बंधित दस्‍तावेज,शैक्षणिक निर्देशिकाएं, माडॅयूल्स आदि पोर्टल से सीधे या विभिन्न लिंक के माध्‍यम से प्राप्‍त किए जा सकते हैं।



शिक्षक विभिन्न स्‍तम्‍भों के माध्‍यम से पोर्टल पर भागीदारी कर सकते हैं।



माह के शिक्षक पोर्टल का एक विशेष फीचर है। इसमें हम ऐसे शिक्षकों को सामने ला रहे हैं,जिन्‍होंने अपने उल्लेखनीय शैक्षणिक काम की बदौलत न केवल स्‍कूल को नई दिशा दी है, वरन समुदाय के बीच शिक्षक की छवि को सही मायने में स्‍थापित किया है। पोर्टल पर एक ऐसी डायरेक्‍टरी भी है जो शिक्षा के विभिन्‍न क्षेत्रों में काम कर रही संस्‍थाओं की जानकारी देती है।

आप सबसे अनुरोध है कि कम से कम एक बार इस पोर्टल पर जरूर आएं। खासकर वे साथी जो शिक्षक हैं या फिर शिक्षा से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। अगर आपका अपना कोई ब्‍लाग है तो इस जानकारी को या टीचर्स आफ इंडिया की लिंक को उस पर देने का कष्‍ट करें।

इस पोर्टल के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप मुझ से utsahi@gmail.comया utsahi@azimpremjifoundation.org पर संपर्क कर सकते हैं।


तो मुझे आपका इंतजार रहेगा।
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आलेखों को पोस्‍ट करते वक्‍त ब्‍लागर ध्‍यान दें


‘नुक्‍कड’ ब्‍लाग के शुरूआती दौर में ही मैने दो तीन आलेख प्रकाशित किए थे , उसके बाद व्‍यस्‍तता की वजह से सिर्फ वहीं नहीं , अन्‍य कई जगहों पर निमंत्रण के बावजूद भी मैं कुछ नहीं लिख पा रही थी । 17 अगस्‍त की शाम अचानक डायरी उलटते हुए अपने द्वारा लिखे दो दृश्‍यों पर नजर गयी और मैने इसे नुक्‍कड पर प्रकाशित करने का निर्णय किया। ‘नसीब अपना अपना’शीर्षक के अंतर्गत लिखकर मैने इन दोनो दृश्‍यों को नुक्‍कड पर पोस्‍ट कर दिया। थोडी ही देर में यह पोस्‍ट ब्‍लागवाणी और चिट्ठाजगत पर दिखने लगा। मैं प्रतिदिन शाम को अपना पोस्‍ट डालने के बाद कंप्‍यूटर की शब्‍दावली पर एक पोस्‍ट किया करती हूं। जब साढे सात बजे मैं उसे पोस्‍ट करने के बाद ब्‍लागवाणी और चिट्ठा जगत पर आयी , तो कंप्‍यूटर की शब्‍दावली वाली पोस्‍ट तो इनमें दिख गयी , पर नुक्‍कड वाली पोस्‍ट नहीं दिखी। अविनाश वाचस्‍पति जी तो आनलाइन थे नहीं कि मैं उनसे बात कर पाती , मैंने नुक्‍कड को खोला। वहां जाने पर पता चला कि अभी अभी कप्‍तान जी द्वारा एक कार्टून पोस्‍ट किया गया है। उनका पोस्‍ट दोनो एग्रीगेटर में दिख रहा था और 24 घंटे के अंदर पोस्‍ट किए गए होने के कारण मेरा पोस्‍ट भी ब्‍लागवाणी में उसके नीचे दिखाई पड रहा था। पर आठ बजे के आसपास शमा जी के द्वारा ‘ये मैने क्‍या सुना’ को पोस्‍ट करने के बाद कप्‍तान जी का कार्टून तो नीचे दिखने लगा , पर मैं एग्रीगेटरों से ही आउट हो गयी। दो घंटों में मुश्किल से दस लोगों ने भी मेरे आलेख को नहीं पढा होगा। वैसे तो यह कहना छोटी मुंह बडी बात ही होगी , पर इनलोगों को पोस्‍ट करते समय पिछले पोस्‍ट के समय को अवश्‍य देखना चाहिए था। एक पोस्‍ट को एग्रीगेटर पर चार छह घंटे तो रहने ही चाहिए। यदि पोस्‍ट करना जरूरी भी था , तो इनलोगों को कम से कम मेरे पोस्‍ट के पसंद पर ही चटका लगा देना था , कम से कम मेरी पोस्‍ट को ब्‍लागवाणी के साइड में भी जगह मिल जाती। वहां से उसे पढने का मौका ही नहीं दिया जाए , तो फिर लिखने का क्‍या फायदा ? फिर मैने कुछ आनलाइन मित्रों से इस बारे में संपर्क किया , तो उन्‍होने पसंद पर चटका लगाकर मेरे ब्‍लाग को ब्‍लागवाणी के साइड में स्‍थान दिलाया। वैसे वहां से कोई भी पोस्‍ट उतनी नहीं पढी जाती , जितना ब्‍लागवाणी के पहले पेज से । खैर , इससे उन लेखकों को तो अधिक अंतर नहीं पडता , जो अपने एक ही आलेख को कई ब्‍लोगों पर पोस्‍ट कर दिया करते हें , कहीं न कहीं से तो उनके पोस्‍टों को पढने के लिए पाठक मिल जाएंगे , पर मुझ जैसे लेखकों को दिक्‍कत हो जाती है , क्‍यूंकि मैं एक लेख को एक ही स्‍थान पर पोस्‍ट किया करती हूं। इंटरनेट में एक ही पोस्‍ट को कई जगहों पर प्रकाशित करने से क्‍या फायदा ?


फिर मुझे अचानक वो बात याद आ गयी , जब जे सी फिलिप जी से निमंत्रण पाने के बाद मैने एक आलेख लिखा था और झटपट ‘मां’ ब्‍लाग में प्रकाशित कर दिया था। प्रकाशन के एक घंटे के बाद मुझे ईमेल मिला कि उन्‍होने मेरा वह पोस्‍ट हटा दिया है और वे इसे कल लगाएंगे। बाद में उन्‍होने कारण बताया कि सारे सदस्‍य पोस्‍ट को लिखकर उसे सेव कर सकते हें , पर प्रकाशित वे स्‍वयं करते हैं । एक दिन के अंतराल में एक लेख को प्रकाशित करने से सभी लेखों को सभी लोगों द्वारा पढने की सुविधा हो जाती है। इसी तरह यदि अधिक आलेख मिलें , तो उन्‍हें छह छह घंटे के अंतराल पर या चार चार घंटे के अंतराल पर प्रकाशित किया जा सकता है। साहित्‍य शिल्‍पी में आलेखों के प्रकाशन का शीर्षक , लेखक और समय निश्चित करके इसे स्‍क्राल किया जाता है और समयानुयार प्रकाशित कर दिया जाता है। यदि मोडरेटर के पास पर्याप्‍त समय हो , तो प्रकाशन का जिम्‍मा उन्‍हें ही लेना चाहिए , बाकी सभी लोगों को अपने आलेख सेव कर छोड देने चाहिए। सुशील जी ने भी एक ब्‍लाग आरंभ किया है ‘स्‍मृति दीर्घा’ , धडाधड इतने लेखकों ने उसमें अपनी स्‍मृतियां पोस्‍ट की कि समझ में नहीं आया कि क्‍या पढूं , क्‍या नहीं ? कुछ को पढा , कुछ को छोडा , बाद में पढूंगी , पर टलता रहा । देखती हूं , उन्‍हें पढने का कब मौका मिलता है ? और ब्‍लागवाणी पर सामने आ जाए , तो कभी शीर्षक आकर्षित कर लेती है , कभी लेखक का नाम और कभी ऐसे भी कई आलेखों पर नजर डाल लेते हैं। यदि मोडरेटर के पास समय की कमी हो , तो बाकी लोगों को भी प्रकाशन का अधिकार दिया जाना चाहिए , पर उनके लिए कुछ नियम होने चाहिए । जैसे कि वे पहले प्रकाशित आलेख का समय देख लें , यदि वह एग्रीगेटरों के पहले पन्‍ने पर है , तो उन्‍हें इंतजार करना चाहिए । चार छह घंटे में कोई आलेख पहले पन्‍ने से हट ही जाता है , तब वे अपने पोस्‍ट प्रकाशित कर सकते हैं । इसके साथ ही यदि कोई आलेख हमें पसंद आए , तो पसंद पर चटका लगाना भी हमारा पाठकीय दायित्‍व है , ताकि वह ब्‍लागवाणी के साइड में भी स्‍थान ले पाए और अधिक से अधिक पाठक उसे पढ सके ।


सिर्फ सामूहिक ब्‍लोगों में ही नहीं , व्‍यक्तिगत ब्‍लोगों में भी आलेखों के प्रकाशन करते वक्‍त कई बातों का ध्‍यान रखना चाहिए । कुछ लोग ब्‍लाग बनाते ही धडाधड पोस्‍ट करना शुरू कर देते हैं । यदि आप ब्‍लाग जगत में नए हैं , आप अच्‍छा लिखते हैं या बुरा , इससे कोई अंतर नहीं पडता । आप चाहते हैं कि आपके सारे आलेख अधिक से अधिक लोगों द्वारा पढे जाएं , तो कुछ अंतराल देकर लिखना आवश्‍यक होता है । मैं अपने ब्‍लोग पर भी एक दिन के यानि 48 घंटों के अंतराल पर पोस्‍ट किया करती हूं । कोई एग्रीगेटर हो या किसी ब्‍लोग के पोस्‍ट को दिखाने वाली कोई दूसरी जगह , आपके पोस्‍ट पर छपी अंतिम सामग्री ही वहां दिखाई पडती है। 48 घंटो तक पाठकों को पढने का समय मिल जाता है और नए लोगों के जुडने की संभावना अधिक बनती है । ब्‍लाग में जाने के बाद आपके पूर्व प्रकाशित आलेखों को पढने की संभावना सिर्फ उन पाठकों से ही की जा सकती है , जो आपका फैन बन चुका हो। इसलिए आप अपने हर पोस्‍टों के मध्‍य अंतराल रखें , यदि आपके पास लेखन के लिए सामग्री अधिक हो , तो ब्‍लाग एक से अधिक बना लें। यदि अपने लेखन के दम पर आप इस ब्‍लाग जगत में जम चुके हैं , तो फिर जितनी पोस्‍ट लिखें , जिस समय प्रकाशित कर दें , आपको तो लोग पढेंगे ही।

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"हिन्दी-व्याकरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बहुत समय से हिन्दी व्याकरण पर कुछ लिखने का मन बना रहा था। परन्तु सोच रहा था कि लेख प्रारम्भ कहाँ से करूँ।
आज इस लेख की शुभारम्भ हिन्दी वर्ण-माला से ही करता हूँ।
मुझे खटीमा (उत्तराखण्ड) में छोटे बच्चों का विद्यालय चलाते हुए 25 वर्षों से अधिक का समय हो गया है।
शिशु कक्षा से ही हिन्दी वर्णमाला पढ़ाई जाती है।
हिन्दी स्वर हैं-
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ

ऐ ओ औ अं अः।
यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक ही लगता है।
लेकिन जब व्यञ्जन की बात आती है तो इसमें मुझे कुछ कमियाँ दिखाई देती हैं।
शुरू-शुरू में-
क ख ग घ ड.।
च छ ज झ ञ।
ट ठ ड ढ ण।
त थ द ध न।
प फ ब भ म।
य र ल व।
श ष स ह।
क्ष त्र ज्ञ।
पढ़ाया जाता है। जो आज भी सभी विद्यालयों में पढ़ाया जाता है।
उन दिनों एक दिन कक्षा-प्रथम के एक बालक ने मुझसे एक प्रश्न किया कि और तो ठीक है परन्तु गुरू जी!
यह और
कहाँ से आ गया? कल तक तो पढ़ाया नही गया था।
प्रश्न विचारणीय था।
अतः अब 20 वर्षों से-
ट ठ ड ड़ ढ ढ़ ण।
मैं अपने विद्यालय में पढ़वा रहा हूँ।
आज तक हिन्दी के किसी विद्वान ने इसमें सुधार करने का प्रयास नही किया।
आजकल एक नई परिपाटी एन0सी0ई0आर0टी0 ने निकाली है। इसके पुस्तक रचयिताओं ने आधा अक्षर हटा कर केवल बिन्दी से ही काम चलाना शुरू कर दिया है। यानि व्याकरण का सत्यानाश कर दिया है।
हिन्दी व्यंजनों में-
कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अन्तस्थ और ऊष्म का तो ज्ञान ही नही कराया जाता है। फिर आधे अक्षर का प्रयोग करना कहाँ से आयेगा?
हम तो बताते-बताते, लिखते-लिखते थक गये हैं परन्तु कहीं कोई सुनवाई नही है।
इसीलिए हिन्दुस्तानियों की हिन्दी सबसे खराब है।
बिन्दु की जगह यदि आधा अक्षर प्रयोग में लाया जाये तभी तो नियमों का भी ज्ञान होगा। अन्यथा आधे अक्षर का प्रयोग करना तो आयेगा ही नही।
सत्य पूछा जाये तो अधिकांश हिन्दी की मास्टर डिग्री लिए हुए लोग भी आधे अक्षर के प्रयोग को नही जानते हैं।
नियम बड़ा सीधा और सरल सा है-
किसी भी परिवार में अपने कुल के बालक को ही चड्ढी लिया जाता है यानि पीठ पर बैठाया जाता है। अतः यदि आधे अक्षर को प्रयोग में लाना है तो जिस कुल या वर्ग का अक्षर बिन्दी के अन्त में आता है उसी कुल या वर्ग व्यंजन का अन्त का यानि पंचमाक्षर आधे अक्षर के रूप में प्रयोग करना चाहिए।
उदाहरण के लिए -
झण्डा लिखते हैं तो इसमें का आधा अक्षर की पीठ पर बैठा है। अर्थात टवर्ग का ही अक्षर है। इसलिए आधे अक्षर के रूप में इसी वर्ग का का आधा अक्षर प्रयोग में लाना सही होगा। परन्तु आजकल तो बिन्दी से ही झंडा लिखकर काम चला लेते है। फिर व्याकरण का ज्ञान कैसे होगा?
इसी तरह मन्द लिखना है तो इसे अगर मंद लिखेंगे तो यह तो व्याकरण की दृष्टि से गलत हो जायेगा।
अब बात आती है संयुक्ताक्षर की-
जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है कि ये अक्षर तो दो वर्णो को मिला कर बने हैं। इसलिए इन्हें वर्णमाला में किसी भी दृष्टि से सम्मिलित करना उचित नही है।
समय मिला तो अगली बार कई मित्रों की माँग पर हिन्दी में कविता लिखने वाले अपने मित्रों के लिए गणों की चर्चा अवश्य करूँगा।

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कार्टून-खबरों का फ्लू ...

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नसीब अपना अपना

                  
प्रथम दृश्‍य

‘अब तबियत कैसी है तुम्‍हारी’ आफिस से लौटते ही बिस्‍तर पर लेटी पत्‍नी पर नजर डालते हुए पति ने पूछा।
‘अभी कुछ ठीक है, बुखार तो दिनभर नहीं था , पर सर में तेज दर्द रहा’
’तुमने आराम नहीं किया होगा, दवाइयां नहीं खायी होगी, चलो डाक्‍टर के पास चलते हैं’
’दिनभर आराम ही तो किया है , पडोसी ने खाना बनाने को मना कर रखा था , स्‍कूल से आते ही बच्‍चों को ले गए , खाना खिलाकर भेजा , डाक्‍टर के यहां जाने की जरूरत नहीं , अभी आराम है’
’ठीक है, आराम ही करो, मैं होटल से खाना ले आता हूं’
’इसकी जरूरत नहीं, फ्रिज में राजमें की सब्‍जी है , थोडे चावल कूकर में डालकर सिटी लगा लेती हूं , आपलोग खा लेंगे’
’नहीं, हमें नहीं खाना चावल, आंटी ने बहुत खिला दिया है , हल्‍की भूख ही है हमें’ बच्‍चे चावल के नाम से बिदक उठे।
’ठीक है, तो चार फुल्‍के ही सेंक दूं , आटे भी गूंधे पडे हैं फ्रिज में’
‘नहीं मम्‍मा, रोटी खाने की भी इच्‍छा नहीं’
’तो फिर क्‍या खाओगे’
’बिल्‍कुल हल्‍का फुल्‍का’
‘ब्रेड का ही कुछ बना दूं’
’नहीं, नूडल्‍स वगैरह’
’ठीक है, दो मिनट में तो बन जाएगा, मैगी ही बना देती हूं’
‘अरे, क्‍या कर रही हो’ पतिदेव बाथरूम से आ चुके थे।
’कुछ भी तो नहीं बच्‍चों के लिए मैगी बना दूं’
’अरे नहीं, तुम्‍हें परेशान होने की क्‍या जरूरत, मैं ले आता हूं होटल से , तुम आराम करो भई’ उन्‍होने हाथ पकडकर पत्‍नी को बिस्‍तर पर लिटा दिया और सबका खाना होटल से ले आए।

द्वितीय दृश्‍य

सुबह से सर में तेज दर्द है , पर मजदूरी करने जाना जरूरी था। जाते वक्‍त मुहल्‍ले की दुकान से उधार ही सही , सरदर्द की दो दवाइयां ले ली थी , सबह और दोपहर दोनो वक्‍त उस दवाई को खा लेने का ही परिणाम था कि वह आज की दिहाडी कमा चुकी थी। कुल 60 रूपए हाथ में , पति की कमाई का कोई भरोसा नहीं , सारा पैसा शराब में ही खर्च कर देता है वह। 60 रूपए में क्‍या ले , क्‍या नहीं , 4 रूपए की दवा ले ही चुकी है वह। 18 रूपए वाले चावल ले तो उसमें कंकड नहीं होता , पर बाकी काम के लिए पैसे कम पड जाएंगे । 15 रूपएवाले चावल ही ले लें , कंकड तो चुने भी जा सकते हैं। दोकिलो चावल लेने भी जरूरी हैं, थोडा भात बच जाए तो बासी भात के सहारे बच्‍चे दिनभर काट लेते हैं। घर में तेल भी नहीं , दाल भी नहीं , सब्‍जी भी नहीं , ईंधन भी नहीं , 26 रूपए में क्‍या ले क्‍या नहीं। नहीं आज तेल छोड देना चाहिए , थोडे दाल ले ले , थोडे साग है बगीचे में , आलू है घर में , कोयला लेना जरूरी है और किरासन तेल भी। काफी मशक्‍कत करके वह 56 रूपए में उसने आज की सभी जरूरतें पूरी कर ही ली। आकर चूल्‍हे जलाए , चावल बीने , साग चुने। खाने के लिए चावल , दाल , साग और आलू के चोखे बनाए। दिनभर के भूखे बच्‍चे गरम गरम खाना खा ही रहे थे कि झूमते झामते पति पहुंच गया। उसका खाना भी परोसा गया , पर यह क्‍या , पहला कौर खाते ही मुंह में कंकड। पति का गुस्‍सा सातवें आसमान पर , पूरी थाली फेक दी और जड दिए चार थप्‍पड उसकी गालों पर। ‘साली खाना बनाना भी नहीं आता , आंख की जगह पत्‍थर लगे हैं क्‍या ? ‘ बेसुध पति को जवाब देकर और मार खाने की ताकत तो उसकी थी नहीं , रोकर भी समय जाया नहीं कर सकती , बच्‍चों को खिलाकर खुद भी खाना है , बरतन साफ करने हैं तबियत ठीक करने के लिए सोना भी जरूरी है , सुबह फिर मजदूरी पर भी जाना है।
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मौसम पूर्वानुमान

मौसम पूर्वानुमान

हेराल्ड पिंटर

(1930-2008)

दिन की शुरूआत बदली से होगी

फिर बर्फीली हवाएं चलेंगी

पर जैसे जैसे दिन चढ़ेंगे

धूप निकलने लगेगी

और दोपहर बाद का मौसम शुष्क और गर्म रहेगा.

शाम को चांद दिखेगा

और वह भी खूब चमकदार

कहना पड़ेगा कि तब चलेंगी तेज़ हवाएं

और फिर सबकुछ यूं ही ठहर जाएगा

यह मौसम का आखि़री पूर्वानुमान है…

0----0

(कथादेश से साभार)

इंग्लैंड में जन्मे हेराल्ड पिंटर को 2005 का साहित्य के लिए नोबेल पुरूस्कार दिया गया था. वे साम्रज्यवाद और युद्ध के घोर विरोधी रहे विषेशकर अमरीका के नंगे नाच और इंग्लैंड के पिछलग्गूपन पर उनके पास शब्दों की कमी कभी नहीं रही.

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रुत बदल दे !

पार कर दे हर सरहद जो दिलों में ला रही दूरियाँ ,
इन्सानसे इंसान तक़सीम हो ,खुदाने कब चाहा ?
लौट के आयेंगी बहारें ,जायेगी ये खिज़ा,
रुत बदल के देख, गर, चाहती है फूलना!
मुश्किल है बड़ा,नही काम ये आसाँ,
दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!

१५ अगस्त के पर्व पे एक अदना-सी रचना पाठकों को समर्पित है..चंद पाठकों ने पढी होगी...पुनरावृत्ती की माफी चाहती हूँ!
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सरहद तक आंगन है

POST NO. 18

WISHING YOU ALL A VERY VERY HAPPY INDEPENDENCE DAY

सरहद तक आंगन है

हम धरती के फूल, गगन पावन माटी चन्‍दन है,

देश एक परिवार हमारा,सरहद तक आंगन है।

सतरंगे सुमनों की शोभा , सब धर्मों की क्‍यारी,

मानवता की महक सभी में देश एक फुलवारी।

नाचें, गायें, खेलें, कूदें , भरें सभी किलकारी,

इस माटी को नमन करें, है जो प्राणों से प्‍यारी।

द्वेष,घृणा या लोभ सरीखे, भाव न मन में लायें,

कभी न मांगे, कभी न छीनें, पौरुष से उपजाएं।

श्रम आधार और समता ही जीवन शैली होगी,

कभी न हम से,मानवता की चादर मैली होगी।

ऐसा दृढ़ संकल्‍प हमारा , जीवन में अपनायें,

सबके लिए खुशी-खुशहाली इस जगती पर लाएं।

(1986)

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BY: From the desk of MAVARK

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न इस पोस्‍ट को पढ़ें, न चटका लगायें और न टिप्‍पणी दें (अविनाश वाचस्‍पति)


सिर्फ बोलें
जय जन्‍माष्‍टमी
और प्रेम से
मन से
नमन करें।
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आंखों के लिए सलाह चाहिए (अविनाश वाचस्‍पति)


नजरें पहले पास की
अब दूर की भी
करती हैं परेशान।

वैसे आंसू नहीं लाती हैं
बस पढ़ता हूं तो
दिक्‍कत आती है।

नंबर पास का
पहले से है
चश्‍मा तो आप
देखते ही हैं
मुझे गले में टांगे हुए
या आंखों और कानों पर
साधे हुए।

पर अब इससे भी
नहीं हो रहा निदान
मुझे बतलायें
बाई फोकल हल नहीं है
पढ़ना और कंप्‍यूटर
दोनों की दूरी
समान नहीं है।

सलाह मिली है
प्रोग्रेसिव यानी मल्‍टीफोकल
लैंस वाले ब्रांडिड चश्‍मा
कान पर नाक पर
जमाना होगा।

तब पढ़ने का
पास का
दूर का
और दूर का सफर
सुहाना होगा।

पर ब्रांड कौन सा
अच्‍छा है
मुझे नहीं मालूम
इस मामले में
मैं तो बच्‍चा हूं।

इसलिए सलाह चाहिए
श्रीमान
आंखों का उचित हो
सके
सम्‍मान
और मिले सही सामान।

नजर सुहानी हो सके
पढ़ने में अखबार या पुस्‍तकें
करने पर कंप्‍यूटर में खटराग
आसानी हो सके।

कौन से ब्रांड का लैंस
कितने का आएगा
यह भी जरूर बताइएगा।
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मीडिया के ‘‘भूलते भागते क्षण’’

बहुत पुरानी बात नहीं है, जब हमारी दिनचर्या देश दुनिया की ख़बर पढ़ने के साथ शुरू होती थी। सुबह सवेरे अख़बार के बड़े - बड़े और मोटे आकार में लिखे हेडलाइन्स पर चर्चा और उसके नतीजों पर बहस के बाद बाकी के काम होते थे। शाम के समय दफ्तर से लौटने के बाद रेडियो पर प्रसारित होने कार्यक्रम हमें तरोताजा करते थे। इसमें दिन भर की ताजा ख़बरों के बुलेटिन को भी लोग गंभीरता से लेते थे। मीडिया लोगों की जरूरत बन चुकी थी। लोग इस क्षेत्र में क्रांति का इंतजार कर रहे थे। एक ऐसी क्रांति का जिससे ख़बर उनके पास तत्काल पहुंच सकें औरं उन्हें 24 घंटे का इंतजार ना करना पड़े। इंतजार का वक़्त तो धीरे - धीरे ख़त्म होता गया लेकिन जल्दी ही लोगों का इससे मोहभंग होना भी शुरू हो गया। इसमें ज्यादा वक़्त नहीं लगा।

ये थी ख़बरें आज तक, इंतज़ार कीजिए कल तक। तो लोग इंतजार करते थे। फिर हक़ीकत जैसी, ख़बर वैसी को भी लोगों ने गंभीरता से लिया। फिर चर्चा शुरू हुई बेख़बर ना रहने की और लोग-ख़बरों से जुड़े रहते थे। जुंबा पर सच, दिल में इंडिया-ये है एनडीटीवी इंडिया। ये कुछ ऐसे जुमले थे जो लोगों की जुबान पर चढ़ गए, और मुहावरे के तौर पर इसका इस्तेमाल होने लगा। पूरालेख मीडिया ख़बर.कॉम पर। यहाँ क्लिक करें।
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कार्टून :- है कोई जो इसके दांत तोड़ दे !

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मेरे देश की धरती सोना उगले ....... (अविनाश वाचस्‍पति)


मेरे देश की धरती सोना उगले गीत की पंक्तियां कानों में पड़ते ही अभिनेता मनोज कुमार की याद आ जाती है जबकि इस गीत के गीतकार गुलशन बावरा थे। वे नहीं रहे पर उनके गीत सदा रहेंगे। उनके गीतों का रहना ही उनका रहना है। गुलशन बावरा जी के खाते में अनेक बेहतरीन नेक गीत शुमार हैं जिनमें खुल्‍लम खुल्‍ला प्‍यार करेंगे हम दोनों, यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी, सनम तेरी कसम, अगर तुम न होते, आती रहेंगी बहारें और जीवन के हर मोड़ पर मिल जाएंगे हमसफर प्रमुख हैं और अभी भी धड़ल्‍ले से सबको मोहित कर लेते हैं। इन गीतों के रचयिता को बावरा उपनाम फिल्‍म वितरक शांतिभाई पटेल ने उनके रंग बिरंगे परिधान पहनने पर दिया था और वे इसी नाम से विख्‍यात हो गए।

जाना तो सबको है पर इनका जाना जाना नहीं कहा जा सकता। बावरा जी यहीं हैं और यही रहेंगे।

उनकी इच्‍छा का सम्‍मान करते हुए उनकी देर को दान किया जाएगा इसलिए अंतिम संस्‍कार नहीं होगा। उनकी देह को जे जे अस्‍पताल ले जाया जाएगा। उनके परिवार में उनकी पत्‍नी हैं।

नुक्‍कड़ की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि। विस्‍तृत समाचार यहां पढ़ सकते हैं ...
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हरियाणा में सरकारी विज्ञापनों में करोड़ों का घपला


ताज़ा सूचना के मुताबिक़, आरटीआई के तहत हिला देनेवाली जानकारी मिली है। हरियाणा सरकार ने सरकारी विज्ञापन देने में इलेक्ट्रानिक मीडिया में केवल एक चैनल के लिए दरिया दिली दिखाई है। उस चैनल के लिए सरकारी पैसा पानी की तरह बहाया गया। जबकि वो चैनल कहीं दिखता नहीं है। दूसरी तरफ , बड़े चैनलों , जिसमें सरकारी दूरदर्शन के अलावा स्टार, आज तक और ज़ी न्यूज़ चैनलों के लिए दिल बेहद छोटा कर लिया गया। यहां तक रिज़नल चैनलों की टीआरपी और विश्वसनीयता को भी नज़र अंदाज़ किया गया। जानकारी मिली है कि ये मामला अब कोर्ट में जानेवाला है। आगे पढ़ें ...
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पहरेदारों के पतित होने पर सोनिया की चिंता

भले ही दुनिया भर में हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का झंडा लिए घूमते हों, और अपनी संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हों। लेकिन हमारे सांसद, लोकतंत्र की गरिमा और उसके मंदिर की मर्यादाओं का कितना ख्याल रखते हैं, यह सोनिया गांधी की पीड़ा से साफ जाहिर है। संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को लेकर सोनिया गांधी की पीड़ा, पहरेदारों के पतित हो जाने का सबूत है। काग्रेस अध्यक्ष ने सांसदों की सदन से गायब रहने की आदत से आहत होकर गैर हाजिर रहनेवालों को कड़ी फटकार लगाई है। राहुल गांधी ने भी सदन में सांसदों की कम उपस्थिति को काफी गंभीरता से लिया है। सोनिया गांधी ने काग्रेस के सीनियर नेताओं से सदन में अपने सांसदों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा है। कोई भले ही उनकी इस तकलीफ के कुछ भी अर्थ निकाले, लेकिन इतना तय है कि हमारे सांसदों का संसदीय कार्यवाही में कम और बाकी कामों में ध्यान ज्यादा रहने लगा है। जिनको देश चलाने के लिए चुना गया हो, वे ही जब राष्ट्रीय फैसलों के निर्धारण में ही रूचि नहीं लेंगे, तो लोकतंत्र की गरिमा को मिट्टी में मिलने से कैसे बचाया जा सकता है ? READ MORE
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हिन्दी साहित्य मंच पर दूसरी कविता प्रतियोगिता सूचना ( लिखें हिन्दी और जीतें इनाम )

हिन्दी साहित्य मंच द्वारा आयोजित होने वाली कविता प्रतियोगिता में शामिल होकर जीतें इनाम । हिन्दी साहित्य मंच की दूसरी कविता प्रातियोगिता सितंबर माह में होने वाली है । इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए आप सभी अपनी कविताएं अगस्त माह की आखिरी तारीख तक भेज सकते हैं । कविता के लिए कोई विषय निर्धारण नहीं है । कविता भेजने के लिए ईमेल- hindisahityamanch@gmail.com है ।आप अपनी रचना हमें " यूनिकोड या क्रूर्तिदेव " फांट में ही भेंजें । आप सभी से यह अनुरोध है कि मात्र एक ही रचना हमें कविता प्रतियोगिता हेतु भेजें ।प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाली रचना को पुरस्कृत किया जायेगा । दो रचना को सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा । सर्वश्रेष्ठ कविता का चयन हमारे निर्णायक मण्डल द्वारा किया जायेगा । जो सभी को मान्य होगा । आइये इस प्रयास को सफल बनायें ।

हिन्दी साहित्य मंच कविता प्रतियोगिता के माध्यम से हिन्दी के विकास हेतु एक छोटी सी पहल कर रहा है । आप इस इस आयोजन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर अपना योगदान दें । भारत जैसे देश में हिन्दी भाषा के गिरते हुए स्तर को बनाये रखने हेतु इस तरह के प्रयास आवश्यक हो गये हैं । एक तरफ तो यह कहते सुनते हुए गर्व जरूर होता है कि हिन्दी विश्व में सबसे ज्यादा बोली वाली भाषाओं में एक है , साथ ही दूसरा पहलू बहुत ही सोचनीय है कि आज हिन्दी बोलने , लिखने और पढ़ने वालों की संख्या दिनों दिन कम हो रही है । ऐसे में अन्तरजाल ( इंटरनेट) की उपयोगिता को ध्यान में रखकर इस माध्यम से हिन्दी साहित्य को एक नया मुकाम अवश्य ही मिलता दिख रहा है ।


संचालक ( हिन्दी साहित्य मंच )hindisahityamanch.blogspot.com
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कार्टून स्ट्रिप ... तेनाली राम

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2007 में प्रकाशित फिल्‍म पुस्‍तक और लेखों के लिए राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार

55वां राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार

के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित की गई हैं। इसमें
सिनेमा पर सर्वोत्‍तम लेखन के लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार
जिसमें वर्ष 2007 में प्रकाशित सिनेमा विषयक पुस्‍तक
और वर्ष 2007 में समाचार पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशित
फिल्‍म विषयक लेखों पर पुरस्‍कार के लिए विचार करने
के लिए अपनी प्रविष्टियां दिनांक 7 अगस्‍त 2009 तक
जमा करवा सकते हैं

नियमों के लिए देखें
http://dff.nic.in/ विनियम

किसी भी प्रकार की अतिरिक्‍त जानकारी के लिए 01126499378 पर संपर्क कर सकते हैं या मुझे avinashvachaspati@gmail पर मेल कर सकते हैं।
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औरत नकार की भंगिमा अख्तियार करें

बिहार में बारिश नहीं होने के कारण कुछ बालिकाओं ने निर्वस्त्र होकर इंद्र देव को लजाने का प्रयास किया। बिहार के गया जिले के बांके बाजार की यह घटना विगत दो दिनों पहले मैंने अखबार में पढ़ी। खबर चौकाने वाली थी और पूरी खबर पढ़कर जबरदस्त झटका लगा। बिहार में इन दिनों बारिश नहीं होने के कारण सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई है। जिससे निपटने के लिए कुछ बालिकाओं ने निर्वस्त्र हो कर इंद्र देव को लजाने का प्रयास किया। शाम ढलते ही कुंवारी लड़कियों सधवा महिलाओं व विधवाओं की टोली ने इंद्र देव को बारिश करने की फरियाद की। सबसे ताजुज्जब की बात तो यह है कि कहा जाता है कि यह टोटका भी परंपरागत है गांव के बाहर ग्राम देवता को पूजने के बाद निर्वस्त्र बालिकाएं एक-एक कर बैल बनी और विधवा ने हल चलाया। इक्कीसवीं सदी में विकास की किरण तो गांव-गांव में पहुंची हैं, सूचना क्रांति का विस्फोट गांवों में हुआ है लेकिन इन घटनाओं को देखकर तो ऐसा लगता है कि लोगों की सोच-विचार और मानसिकता में जरा भी बदलाव नहीं आया है। प्रगतिशील सोच की जगह लोग आज भी अंअन्धविश्वास ,टोटके में विश्वास रखते है। क्या बालिकाएं निर्वस्त्र हो जाएंगी तो बारिश हो जाएगी। अगर ऐसा होता तो न कभी अकाल पड़ता और न इस भारत में रेगिस्तान रहता। और न लोग गर्मियों में बूंद-बूंद पानी के लिए रेगिस्तानी छटपटाहट का अनुभव करते। अगर इन टोटके में विश्वास है ही तो क्यों लोग मानसून का इन्तजार करते हैं कुछ बालिकाएं जब चाहे निर्वस्त्र हों और जब चाहे तब मानसून आ जाएं। क्या ऐसा संभव है? ....READ MORE
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