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शरद कोकास जी लड्डू बाट रहे हैं : जन्‍मदिन है आज उनका (अविनाश वाचस्‍पति)


जो कल एक दिन छोटा था
आज के दिन आज के समान
और आने वाले कल वालों से
एक दिन बड़ा हो गया है।

और उससे भी अगले दिन वालों से
दो दिन और ........
यह कहानी तो लंबी है इतनी
जितनी लांबी सोर
पर आजकल सबसे लंबा है शोर
चोर भी खूब शोर मचाते हैं
चोर मचाये शोर
फिल्‍म वाले यही फरमाते हैं।

सबको फिल्‍म वाले ही लुभाते हैं
पर एक हम हैं
हमें सब भाते हैं
वे लिखने वाले हों
पढ़ने वाले हों
टिप्‍पणियां देने लेने वाले हों
पोस्‍ट लिखने वाले हों
प्‍यार जतलाने वाले हों।

ब्‍लॉगजगत में आजकल
सबको वही सुहाते हैं
शरद कोकास जी की भी
यही अच्‍छी भली बातें हैं।

कितने ही हैं ब्‍लॉग उनके
कितने ही हैं रूप
रूप सब मोहक हैं
वे मनमोदक हैं
मन में लड्डू फोड़ते हैं
पर आज मन के लड्डुओं से
नहीं चलेगा काम।

सचमुच में लड्डू भिजवायें
सभी ब्‍लॉगरों के धाम
आज के लड्डू पोस्‍टें नहीं
होंगी टिप्‍पणियां
खूब बांटे और
किसी को भी न छांटें
और न ही डांटें।

शरद कोकास जी का जन्‍मदिन है
मिलेंगी टिप्‍पणियां सबको
इसलिए भूल न जाना साथियों
टिप्‍पणी में देना मुबारकबाद उनको।
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प्रवासी हिन्‍दी का अंधकार युग

भारत दुनिया का अकेला देश है जहां सरकारी स्तर पर 'हिंदी दिवस’ मनाया जाता है, केंद्र और राज्य सरकारों में एक राजभाषा विभाग होता है जो कानून और व्यवस्था संभालने वाले गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। हिंदी अधिकारियों की एक बड़ी फौज देश भर में मौज मस्ती करती है और संविधान की प्रस्तावना में लिखित कम-से-कम दो मूल्यों की धज्जियां उड़ाती है- लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता। भारत दुनिया का अकेला देश है जहां से सरकारी स्तर पर भाषा और साहित्य का कूड़ा-करकट दुनिया भर में भेजा जाता है, जहां के अधिकांश राजदूत और राजनयिक भारतीय साहित्य के बारे में कुछ नहीं जानते।
विदेश मंत्रालय के अधीन एक सरकारी ट्रेवल एजेंसी है जिसका नाम 'भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ (आईसीसीआर) है। यह नाम वरिष्ठ कांग्रेसी नेता वसंत साठे ने खुद दिया था जब वे आईसीसीआर के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष थे। यह संस्था हिंदी के नाम पर जो सड़ा-गला माल विदेशों में सप्लाई करती है उससे किसी भी भारतीय का सिर शर्म से झुक जाएगा। जिस तरह से हिंदी के वैश्विक तंत्र पर हिंदुत्ववादियों, पोंगा पंडितों और सिर्फ एक जाति का कब्जा है, वह अपराधिक है। केंद्र में चाहे कांग्रेस की सरकार हो या तीसरे मोर्चे की, यह वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि भारतीय जनता पार्टी की सरकारें ऐसा करें तो बात समझ में आती है, लेकिन सेक्यूलर सरकारें भी हिंदी के मामलों में राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना, संस्कार भारती जैसी कट्टरपंथी संगठनों का एजेंडा पूरा करने में लगी हुई हैं। मॉरीशस और ब्रिटेन के मामलों में यह बात शत-प्रतिशत सच है जिसका श्रेय स्वर्गीय डॉ. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी और उनके द्वारा प्रशिक्षित हिंदी अधिकारियों की नेटवर्किंग को जाता है। इस नेटवर्किंग ने विदेशों में हिंदी का ऐसा कबाड़ा किया हुआ है कि दुनिया के बड़े से बड़े तानाशाह भी शर्मा जाएं। हिंदी के इन कारोबारियों के संरक्षक बड़े ताकतवर लोग हैं जिनकी चरण वंदना का संगीत लगातार भयावह होता जा रहा है। इससे विदेशों में पदस्थापित थे आईएएस, आईपीएस, आईएसएस अफसर भी हैं जिन्होंने सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं में तो जरूर 'मुख्यधारा’ और 'गंभीर साहित्य’ से जुड़े प्रश्नों के उत्तर दिए होंगे। अब यही अफसर भारत के विदेश मंत्रालय के अफसरों के साथ मिलकर दुनियाभर में हिंदी की गोष्ठियों आयोजनों को नौटंकी और 'ग्रेट इंडियन लाफ्टर शो’ में बदल चुके हैं।
इन दिनों लंदन में डा. पदमेश गुप्त और तेजेंद्र शर्मा के बीच एक दिलचस्प जंग छिड़ी हुई है। पदमेश गुप्त और अनिल शर्मा की संस्था यू.के. हिंदी समिति पिछले कई सालों से भारत सरकार के पैसे से मंचीय कवियों के कई कार्यक्रम आयोजित करती रही है। इस काम में तेजेंद्र शर्मा की संस्था 'कथा यू.के’ कभी सहयोग नहीं करती। पदमेश गुप्त ने अपनी पत्रिका 'पुरवाई’ के संपादकीय में एक तरह से आरोप लगाया है कि 'कथा यूके’ हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहयोग नहीं करती। उधर अपने कई साक्षात्कारों में तेजेंद्र शर्मा में हिंदी की मुख्यधारा के साहित्य को तरजीह देने की बात करते हुए पुरवाई को हिंदुत्‍ववादी दक्षिणपंथी पत्रिका कहा है। जिसके संरक्षक भाजपा नेता केसरीनाथ त्रिपाठी हैं। पदमेश गुप्त का तर्क है कि उन्हें मुख्यधारा के कवि इसलिए नहीं चाहिए? क्योंकि ब्रिटेन के हिंदी श्रोता उनकी कविताओं का मजा नहीं ले सकते। बहरहाल। इसी 31 अगस्त 2009 को भारतीय उच्चायोग के नेहरू सेंटर में यूके हिंदी समिति का वार्षिक 16वां अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन संपन्न हुआ। इसमें जिन महान अंतर्राष्ट्रीय कवियों ने कविताएं पढ़ीं उनके नाम हैं- श्री केसरी नाथ त्रिपाठी (पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश, विधान सभा एवं वरिष्ठ भाजपा नेता) दीक्षित दनकौरी एवं पवन दीक्षित (दोनों सगे भाई हैं) विष्णु सक्सेना सुरेश अवस्थी, प्रीता वाजपेयी आदि। इस आयोजन में केसरीनाथ त्रिपाठी कई बार आ चुके हैं।
आश्चर्य हुआ यह देखकर कि भारतीय उच्चायोग के मंत्री (समन्वय) आसिफ इब्राहिम और नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता अपना सारा काम धाम छोड़कर इन कविगणों की खातिर में लगे रहे। सवाल यह उठता है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की पढ़ाई-लिखाई का क्या हुआ? हद तो तब हो गई कि लंदन के सन राइज रेडियो में काम करनेवाले रवि शर्मा को शो पीस की तरह मंच पर खड़ा कर चुटकुले सुनाने को कहा गया। मूर्खता का कोई मुकाबला नहीं हो सकता। जब कविगण हिंदी गजलों में उर्दू शब्दों का प्रयोग करने लगे तो एक पुजारीनुमा श्रोता ने आपत्ति की- 'यह हिंदी दिवस है या उर्दू दिवस’। अभी हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर के इस बयान पर काफी हंगामा हुआ था कि -'साहित्य मनोरंजन की चीज है।‘ विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने तो दशकों से इस विचार को असली जामा पहना दिया है। पद्मेश गुप्त और अनिल शर्मा की साहित्यिक समझ के बारे में हमें ज्यादा ज्ञान नहीं है, पर क्या दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, जकीया जुबैरी, आनंद कुमार, तेजेंद्र शर्मा, सत्येंद्र नाथ श्रीवास्तव, मोहन राणा भी यही मानते हैं।
यदि नहीं तो कोई क्यों नहीं कहता कि हिंदी कविता का असली चेहरा तो दूसरा है जिसमें पांच पीढिय़ों के सैकड़ों कवि सक्रिय हैं। जिस तरह भारत में चिली दूतावास पाब्लो नेरूदा, पोलिश दूतावास शिंबोस्र्का, मैक्सकी दूतावास, आक्टोवियो पाज, स्पेनिश दूतावास, लोर्का और चै‍क, जर्मन, इटालियन, जापानी, चीनी, हंगरी, नार्वे के दूतावास अपनी भाषा के मुख्यधारा के लेखकों कवियों पर कार्यक्रम करते हैं, गंभीर साहित्य के पठन-पाठन को प्रोत्साहित करते हैं, उसी तरह क्या हम सोच सकते हैं कि लंदन में कभी ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि कुंवर नारायण, एम.टी.वासुदेवन नायर, महाश्वेता देवी आदि पर भारतीय उच्चायोग कोई कार्यक्रम करेगा? क्या भारत में किसी को यह चिंता नहीं सताती कि सरकारी अफसर साहित्य के नाम पर जो कूड़ा-कचरा विदेशों में निर्यात कर रहे हैं उससे देश की प्रतिष्ठा को कितनी क्षति पहुंच रही है। हिंदी को इन ग्लोबल धंधेबाजों से कौन मुक्त कराएगा। क्या हमारे 400 के करीब हिंदी भाषी सांसदों में से किसी में भी यह चेतना नहीं बची है ?
(अजित राय यू.के. से लौटकर)
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ये बाबाजी भी आयेंगे कभी!!

बाबाओं की दुनिया में एक बार फिरसे स्वागत है, बाबाओं का मेला लगा हुआ है जगह जगह पंडाल बाबा ज्ञान देते हुए: भक्तजनों ! इस दुखी संसार में इतने दुःख है की जिनकी गणना करना ही मुश्किल है|
मैं बोल्यो: बाबाजी आपको ही इतने दुःख क्यों दिखाई दे रहे हैं|
बाबाजी : सब ग्रहों का चक्कर है |
मैं बोल्यो:बाबाजी आप क्या अन्तरिक्ष में रहते हैं?|
बाबा : देखो बच्चा ये शनि यन्त्र ले जाओ इससे शनि शांत रहेगा |
मैं बोल्यो:बाबाजी ये कोई शनि महाराज का रिमोट है क्या आप तो शनि से भी तगड़े हो|
बाबाजी:शनिवार के दिन काला वस्त्र धारण करना |
मैं बोल्यो :क्यों बाबाजी शनि महाराज सांड हैं क्या जो लाल रंग से चिढ जायेंगे|
बाबाओं से मुझे लगता है वो दिन दूर नहीं जब बाबा कहेंगे: देखो बच्चा ए.सी कोइसा लो, टी.वी कोइसा लो पर सिम हमेशां एयरटेल का ही लेना |
मैं बोल्यो: बाबाजी वो दुसरे पंडाल वाले बाबा तो रिलायंस का लेने को कह रहे थे |
बाबा: देखो बच्चा एयरटेल में अस .टी.डी दर बहुत कम है और प्रभु प्रशन्न होते हैं |
मैं बोल्यो: कमाल है बाबाजी इससे प्रभु का क्या कनेक्शन |
बाबा : ज्ञान की गुह्य गति को समझो मुर्ख |
मैं बोल्यो : समझा दो प्रभु |
बाबा: अरे मुर्ख जो भी मोबाइल में काल आती है वो आसमान से आती है |
मैं बोल्यो : तो? बाबा: अरे नासमझ इसी आसमान के मिलावट से शरीर बना है मतलब प्रभु का अंश है |
मैं बोल्यो: वो तो सब मोबाइल में ही अता है |
बाबा: यही तो बात है बच्चा|
मैं बोल्यो : इब इसमें के बात है ?
बाबा: बच्चा एयरटेल का नेटवर्क इतना तगड़ा है की इसमे ज्यादा आसमानी शक्ति आती है और काल स्पष्ट सुनाई देती है |
मैं बोल्यो: ओह तो बाबा बी.एस.एन.एल. तो फिर और तगड़ा होता होगा |
बाबा: अरे कोई इस नासमझ को समझाओ |
मैं बोल्यो: बाबाजी तो आप है ? बाबजी: तो?
मैं बोल्यो: तो आप ही समझा दो |
बाबजी :अरे मुर्ख बालक ! बी.एस.एन.एल सरकारी है और सरकारी दफ्तरों में घुस और हराम का माल ज्यादा खाते है | इसलिए उसमें आसमानी शक्ति बिलकुल नहीं आती है |
मैं बोल्यो: कमाल है बाबाजी अब एक बात और बता दीजिये ?
बाबा: पूछ |
मैं बोल्यो: ये सिम कहाँ मिले ?
बाबाजी अपने झोले में से निकाल के: ले बच्चा |
मैं बोल्यो: बाबाजी फार्म ?
बाबजी : बच्चा बाद में भर देना पर पैसे अभी दे दो |
मैं बोल्यो : अगर बाद मैं ना भरूं तो ?
बाबाजी: वो मैं अपने आप ही भरवा ल्यंगा |
मैं बोल्यो : बाबाजी अब जाता जाता एक बात और बता दयों|
बाबजी : पूछ ले बच्चा | मैं बोल्यो : और के के सामान बेचो हो |
मैं तो सोचा बाबाजी नाराज हो जायेंगे पर नहीं बाबाजी ने अपना मेनू पकडा दिया |
| जय हो |
|| इति :||
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कार्टून:- आओ टांग-खिंचाई वाले ब्लागर से मिल लो..


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हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में आज दीवाली है (अविनाश वाचस्‍पति)

ब्‍लॉगवाणी के लौटने से
छा गई खुशहाली है
मान लो सभी ब्‍लॉगरों
आज दीवाली है।

शुभ ब्‍लॉगवाणी
शुभ दीपावली
फिर न कहें ऐसी बात
जो कभी किसी को खले।

ब्‍लॉगजगत में हिंदी
छाये भरपूर हुजूर
मेरी मानो तो
आज दीवाली है।

ब्‍लॉगवाणी के लौटने से
दीप चेहरों पर जल उठे हैं
मैथिलीजी और सिरिलजी
को धन्‍यवाद देकर हम
उनके योगदान को कम आंकेंगे।

इसीलिए दीपावली से इस
नेक काम की करेंगे तुलना
क्‍या अब भी किसी को
मन में कोई ग्‍लानि है।

हिन्‍दी और ब्‍लॉगजगत में
आज सच्‍ची दिवाली है
शुभ दीपावली
शुभ ब्‍लॉगवाणी।
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ब्लोग्वानी फिर चालू हो गया है

मैंने अभी १०.२५ सुबह देखा की http://blogvani.com/ फिर चालू हो गया है
चलो अच्छा हुआ.

-काजल कुमार.
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मुझे खड़े करके इंसान ने क्यूं जलाया है - रावण



जलते जलते मुझे यूं ख्याल आया है
कि मुझे खड़े करके इंसान ने क्यूं जलाया है
या समझ रहा इंसान है
कि जिंदा हूं मैं राम के बिना
जबकि राम ने मुझे मारा है
जमाना जानता है सारा
और मानता भी है
या जी रहा है मुगालते में भारी
रावण जिंदा को बांध कर लाया है
इसलिए खड़ा करके जलाया है





बना रहा है
बेच रहा है
पुतले मेरे
जला रहा है
जला जा रहा है


सोच लगती है
सच इंसान की
इसलिए वो जलाकर मुझे
घर पहुंचकर नहीं नहाया है
वैसे उसने मुझे शमशान में नहीं जलाया है
इसलिए भी लगता नहीं नहाया है
वैसे न मेरी हड्डियां अस्थियां बटोरने आएगा
करेगा नहीं तेरहवीं मेरी कोई
न क्रिया, न हरिद्वार में अस्थि विसर्जन
तो न नहाकर उसने किया तो लगता ठीक है

वैसे उस राम के होने पर भी
सवाल इंसान ने ही उठाया है
पर फिर भी मुझे जलाने में
इंसान को लुत्फ बहुत आया है
मेरा तमाशा खूब बनाया है

लेकिन मैं भी ढीठ हूं बहुत
जलूंगा नहीं अभी मैं
जलूंगा नहीं कभी मैं

रावण हूं रावण रहूंगा
ब्लू लाईन के चालकों के भेष
में राजधानी में रहूंगा मैं
तू नहीं नहाएगा तो
श्रीलंका नहीं मैं जाऊंगा ?
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बचपन का दशहरा याद आ रहा है - अजित अंजुम,मैनेजिंग एडिटर,न्यूज़ 24



न जाने कहाँ खो गए वो बचपन के दिन। जब हमें इंतज़ार होता था दशहरे का. नए कपड़े पहनकर घूमने का उल्लास होता था. दुर्गा जी को देखने जाते थे. यह शर्त लगती थी कि कौन कितने दुर्गा जी को देखता है. वहां दशहरा का मतलब उत्सव होता था. मेला होता था. यहाँ दशहरा का मतलब एक और छुट्टी. यह कहना है न्यूज़ 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम का...आगे पढ़ें।

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हिन्‍दी ब्‍लॉगर श्री जगदीप सिंह दांगी की जान को खतरा


लगभग डेढ़ घंटे पूर्व मुझे नुक्‍कड़ के सम्‍मानित लेखक और तकनीकी जानकार श्री जगदीप सिंह दांगी से जो ई मेल प्राप्‍त हुई है, उसे प्रस्‍तुत कर रहा हूं। इसे पढ़ें और विचार करें तथा इस पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करायें :-
आदरणीय Sir/Ma'am,
नमस्कार...
अटल बिहारी वाजपेयी — भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी एवम् प्रबंधन संस्थान
ग्वालियर में हिन्दी पखवाड़ा कार्यक्रम के अन्तर्गत मुझे सम्मानित करने के
बहाने आमंत्रित किया और अपमानित ढंग से सम्मान किया और शिकायत करने पर
मुझे एक गुण्डा किस्म के सहायक प्राध्यापक गौरव अग्रवाल ने बहुत ही
गन्दी—गन्दी गालिया दी और मुझे उठाकर ऊपरी मंजिल से फेंकने ही वाला था कि
लोगों ने बचा लिया। गौरव अग्रवाल संस्थान में कुछ समय पहले ही आया है और
अपनी रंगदारी कमज़ोरों पर कर रहा है। शिकायत निदेशक महोदय और थाना में
दर्ज़ कर दी है, पूरे घटनाक्रम से काफ़ी डरा हुआ हूँ और असुरक्षित हूँ।
मेरी सुरक्षा करो। वह बहुत ही गुण्डा—मवाली किश्म का व्यक्ति है कुछ भी
कर सकता है। मेरी जान को बहुत खतरा है आप लोग मेरी सुरक्षा हेतु प्रयास
करने की कृपा करें।
सादर
जगदीप सिंह दांगी
साइंटिस्ट—इंजीनियर,
अटल बिहारी वाजपेयी — भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी एवम् प्रबंधन संस्थान, ग्वालियर।
मो. 09826343498
Profile: http://www.iiitm.ac.in/iiitm/Scientist_Eng/JDangi.htm
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ब्‍लॉगवाणी के बंद होने से किसको खुशी मिली : हमें तो दुख हुआ है (अविनाश वाचस्‍पति)


इस चित्र पर चटका लगायें या ब्‍लॉगवाणी खोलें अब बात एक ही है।

इसे कहते हैं अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारना
जो मिल रहा है उसमें मीन मेख निकालना

सब्र की एक इंतहा होती है समझ लीजै
एक आग का दरिया है जिसमें झुलसना है


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मीडिया से भाषा और संस्कृति दोनों मटमैली

मीडिया भाषा और जीवन की संस्कृति को विकृत कर रहा है और लोगों के बार-बार संकेतित करने के बावजूद सचेत नहीं हो रहा है। भाषा का संबंध संस्कृति से भी है. हमारी संस्कृति युग-युग से भाषा से प्रभावित होती रही है. भाषा के समाजशास्त्र में हम इस बात का विवेचन भी करते हैं. यह बात प्रमाणित हो गयी है कि भाषाविज्ञान ने आँखे ही समाजशास्त्र की गोद में खोली है. इसलिए भाषा का संबंध संस्कृति से भी है. भाषा संस्कृति को प्रभावित करे या संस्कृति भाषा को प्रभावित करे, यह बात तय है कि दोनों ही स्थितयों में इस प्रभाव या परिवर्तन की प्रक्रिया दीर्घ होती है. पूरा लेख पढ़ें...
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खुला पत्र : प्रिंट मीडिया के नाम (अविनाश वाचस्‍पति)


जो रह गए हैं पढ़ने
और अपना मत देने से
मत दें, मत दें, मत दें

आपका क्‍या विचार है
क्‍या प्रिंट मीडिया
करता रहे अपनी मनमानी
या ब्‍लॉगरों का करें सम्‍मान
और उनकी पोस्‍ट छापने पर
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-ग़ज़ल

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लता जी के जन्मदिन पर न्यूज़ 24 की खास पेशकश लतानमा देखना ना भूलें

मेलोडी क्वीन लता मंगेशकर 28 सितम्बर को 80 साल की हो रही हैं। उनके जन्म दिन से तीन दिन पहले न्यूज 24 शुक्रवार रात 10 बजे एक घंटे का खास प्रोग्राम चला रहा है -लतानामा--80 साल की मेलोडी क्वीन। लता मंगेशकर के इंटरव्यू और फिल्म इंडस्ट्री के तमाम लोगों की लता से जुड़ी यादों को लेकर ये शो बनाया गया है। शुक्रवार की रात 10 बजे इसका पहला भाग प्रसारित हो रहा है। दूसरा भाग शनिवार रात 10 बजे से प्रसारित होगा। पूरी ख़बर पढने के लिए यहाँ क्लिक करें । आगे पढ़े...
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आज की इस बदलती दुनिया में मिलावट का रूप


देखो तो घनघोर मिलावट,
भईया चारो ओर मिलावट,
दूध मिलावट बात पुरानी,
बने मिलावट से अब पानी.

खेल रहा है खेल मिलावट,
शैम्पू,साबुन,तेल मिलावट,
बचा नही है,कुछ भी असली,
ऐसा छाया मेल मिलावट.

जल जीवन में जवां मिलावट,
सांस संवारण हवा मिलावट,
घुट कर जीने के आलम में,
मरने तक की दवा मिलावट.

यहाँ,वहाँ हर जहाँ मिलावट,
मत पूछो की कहाँ मिलावट,
खूब बना जंजाल मिलावट,
आटा,चावल,दाल ,मिलावट.

रिश्तों में भी प्यार मिलावट,
सुख के साथी यार मिलावट,
दुख में साथ कुछ ही चलते हैं,
बाकी सब संसार मिलावट.

संसद में भी बात मिलावट,
वादों के हालात मिलावट,
सत्ताधारी,निज हितकारी,
नेताओं की जात मिलावट.

दिन-दिन होती दून मिलावट,
यहाँ तलक अब खून मिलावट,
भूखे पेट ग़रीब जनों के,
आँखों में शुकून मिलावट.

बोतल बंद शराब मिलावट,
है,सबसे आबाद मिलावट,
फिर सबको बेचैनी क्यों है,
बोलो जिंदाबाद मिलावट.


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मदद चाहिए


अनिल सरगर मेरे पुराने साथी हैं। वे एकलव्‍य संस्‍था में काम करते हैं जो कि मध्‍यप्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही है। वे मध्‍यप्रदेश के बैतूल जिले के शाहपुर कस्‍बे में रहते हैं। हाल ही में उनका एक मेल मुझे मिला जो उनके और मेरे एक और साथी निदेश सोनी ने सबको भेजा है। वे एक विकट समस्‍या से जूझ रहे हैं। उनकी समस्‍या उनके ही शब्‍दों में कुछ इस तरह है,

’मेरा पुत्र हर्षित सात वर्ष का है( ऊपर चित्र में) और मेरी पुत्री 22 माह की है। दोनों ही बच्‍चों को जन्‍म के समय पीलिया हो गया था। पीलिया का इलाज नागपुर में करवाया था। इलाज के दौरान दोनों का ही खून बदलना पड़ा था। दोनों के इलाज में लगभग एक लाख चालीस हजार रुपए का खर्च आया है। फिर भी दोनों बच्‍चे सामान्‍य नहीं हो पाए हैं। दोनों को इंदौर के चौइथराम अस्‍पताल में डाक्‍टर पासी को दिखाया है। दोनों बच्‍चों के कानों में समस्‍या है। हर्षित केवल 20 प्रतिशत ही सुन पाता है। वह बोलता भी नहीं है। जबकि पायल के कान केवल 5 प्रतिशत ही सुन पाते हैं। पायल अपने शरीर का संतुलन भी नहीं बना पाती है। वह पूरे समय बिस्‍तर पर ही लेटी रहती है। डाक्‍टर की सलाह पर हर्षित के लिए श्रवण मशीन की व्‍यवस्‍था की है। लेकिन पूरी तरह से ठीक करने के लिए डाक्‍टरों का कहना है कि बच्‍चों के कान का ऑपरेशन करना पड़ेगा। एक बच्‍चे के ऑपरेशन पर लगभग सात लाख रुपए का खर्चा आएगा। यह खर्चा वहन करना मेरी क्षमता के बाहर है। मेरा आप सबसे अनुरोध है कि कृपया मेरी मदद करें। ‘

निश्चित ही सात लाख रुपए के हिसाब से दो बच्‍चों के इलाज पर पंद्रह लाख से ज्‍यादा का खर्चा आएगा। हम जैसे सामान्‍य लोगों के लिए यह राशि जुटाना सपना देखने जैसा है। पर कहते हैं कि उम्‍मीद पर आसमान टिका है। मैं यही सोचकर यह अपील नुक्‍कड़ पर डाल रहा हूं कि अनिल की मदद कैसे की जा सकती है इस पर विचार करें। अगर ऐसे बच्‍चों के इलाज के लिए कोई संस्‍थाएं या ट्रस्‍ट आदि काम कर रहे हैं, तो उनकी जानकारी भी अनिल के लिए उपयोगी होगी।

अनिल तथा उनके बच्‍चों के बारे में अधिक जानकारी के लिए anil.sargar@yahoo.co.in पर मेल किया जा सकता है। या उनसे मोबाइल नंबर 91-9425608760 पर बात की जा सकती है।
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लगभग 6 घंटे शेष हैं जो बाल कवि के लिए विशेष हैं (अविनाश वाचस्‍पति)

नुक्‍कड़ सर्वोत्‍तम बाल कविता सम्‍मान
के लिए प्राप्‍त कविताओं के कवियों की
सूची
और
नियम एवं शर्तों का विवरण

अब न करें आलस
भेजें अपनी सर्वोत्‍तम बाल कविता
जो नुक्‍कड़ की सर्वोत्‍तम बाल कविता
बने और आपको बनाये
नुक्‍कड़ सर्वोत्‍तम बाल कवि
और पुरस्‍कार में दिलाये
पुस्‍तकें।

ई मेल पता avinashvachaspati@gmail.com
tetaalaaa@gmail.com
पर भेजिएगा आज मध्‍य रात्रि तक।
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शहीद तेरे नाम से ... एक संस्‍मरण

बरसों पुरानी बात बताने जा रही हूँ...जिस दिन भगत सिंह शहीद हुए,उस दिन का एक संस्मरण...

सुबह का समय ...मेरे दादा-दादी का खेत औरंगाबाद जाने वाले हाईवे को सटके था...दादा दादी अपने बरामदे में शक्ल पे उदासी, ज़ुबाँ पे मौन लिए बैठे हुए थे...

देखा, लकडी के फाटक से गुज़रते हुए, अंग्रेज़ी लश्कर के दो अफसर अन्दर की ओर बढे़। कई बार यह हो चुका था कि, दादा या दादी को गिरफ्तार करने अँगरेज़ चले आते। स्वतंत्रता संग्राम जारी था... दादा जी ने अगवानी की। उन्हें बरामदे में बैठाते हुए, आनेकी वजह पूछी।

जवाब मिला: " हम हमारी एक टुकडी के साथ, अहमदनगर की ओर मार्च कर रहे हैं...सड़क पे आपके फार्म का तख्ता देखा। लगा, यहाँ शायद कुछ खाने/पीने को मिल जाय..पूरी बटालियन भूखी है.....क्या यहाँ कुछ खाने पीने का इंतज़ाम हो सकता है?"

दादा: " हाँ...मेरे पास केले के बागान हैं, अन्य कुछ फल भी हैं...अपनी सेना को बुला लें...हम से जो बन पायेगा हम करेंगे...."

एक अफसर उठ के सेना को बुलाने गया। एक वहीँ बैठा। दादी ने उन्हें खाने की मेज़ पे आने के लिए इल्तिजा की। मुर्गियाँ हुआ करती थीं...अंडे भी बनाये गए...

कुछ ही देर में दूसरा अफसर भी पहुँचा....दादा ने सेना के लिए फलों की टोकरियाँ भिजवाई....वो सब वहीँ आँगन में बैठ गए।

नाश्ते का समय तो हो ही रहा था। दादा दादी ने उन दो अफसरों को परोसा और खाने का इसरार किया। दादी, लकडी के चूल्हे पे ब्रेड भी बनाया करतीं...कई क़िस्म के मुरब्बे घर में हमेशा रहते...इतना सारा इंतज़ाम देख अफसर बड़े ही हैरान और खुश हुए.....
उन में से एक ने कहा :" आप लोग भी तो लें कुछ हमारे साथ...समय भी नाश्ते का है...आप दोनों कुछ उदास तथा परेशान लग रहे हैं..."

दादी बोलीं: " आज हमें माफ़ करें। हमलोग आज दिन भर खाना नही खाने वाले हैं..."
अफसर, दोनों एकसाथ :" खाना नही खाने वालें हैं? लेकिन क्यों? हमारे लिया तो आपने इतना कुछ बना दिया...आप क्यों नही खाने वाले ???"

दादा:" आज भगत सिंह की शहादत का दिन है...चाहता तो बच निकलता..लेकिन जब सजाए मौत किसी और को मिल रही यह देखा तो सामने गया...क्या गज़ब जाँबाज़ , दिलेर नौजवान है....हम दोनों पती पत्नी शांती के मार्ग का अनुसरण करते हैं, लेकिन इस युवक को शत शत नमन...अपने बदले किसी और को मरने नही दिया..आज सच्चाई की जीत हुई है....मरी है तो वो कायरता...सच्चाई ज़िंदा है...जब तक भगत सिंह नाम रहेगा, सच्चाई और बहादुरी का नारा लगेगा...!"

कहते ,कहते, दादा-दादी, दोनों के आँसू निकल पड़े...

दादी ने कहा: " उस माँ को कितना फ़क़्र होगा अपने लाल पे....कि उसकी कोख से ऐसा बेटा पैदा हुआ...वो कोख भी अमर हो गयी...उस बेटे के साथ,साथ..."

दोनों अफ़सर उठ खड़े हो गए। भगत सिंह इस नाम को सलाम किया...और उस दिन कुछ ना खाने का प्रण किया...बाक़ी लश्कर के जवान तब तक खा पी चुके थे...घर से विदा होने से पूर्व उन्होंने हस्तांदोलन के लिए हाथ बढाये....
तो दादा बोले:
"आज हस्तांदोलन नही..आज जयहिंद कहेंगे हम...और चाहूँगा,कि, साथ, साथ आप भी वही जवाब दें..."

दोनों अफसरों ने बुलंद आवाज़ में," जयहिंद" कहा। फिर एक बार शीश झुका कर , बिना कुछ खाए वहाँ से चल दिए...पर निकलने से पहले कहा,

" आप जैसे लोगों का जज़्बा देख हम उसे भी सलाम करते हैं...जिस दिन ये देश आज़ाद होगा, हम उस दिन आप दोनों को बधाई देने ज़रूर पहुँचेंगे...गर इस देश में तब तक रहे तो..."

और हक़ीक़त यह कि, उन में से एक अफ़सर , १६ अगस्त के दिन बधाई देने हाज़िर हुआ। दादा ने तथा दादी ने तब कहा था," हमें व्यक्तिगत किसी से चिढ़ नही... संताप नही... लेकिन हमारा जैसा भी टूटा फूटा झोंपडा हो...पर हो हमारा... कोई गैर दस्त अंदाज़ ना रहे ... हम हमारी गरीबी पे भी नाज़ करके जी लेंगे...जिस क़ौम ने इसे लूटा, उसकी गुलामी तो कभी बर्दाश्त नहीं होगी...."

ऐसी शहादतों को मेरा शत शत नमन....
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हिन्दी की आधुनिकताःएक पुनर्विचार विषय पर शिमला में शुरू हुआ वर्कशॉप

23 सितंबर से शिमला की गुलाबी ठंड के बीच बुद्धिजीवी समाज के बीच गर्माहट पैदा करने का दौर शुरु हो गया है। हिन्दी की आधुनिकताःएक पुनर्विचार पर विमर्श करने के लिए देशभर के बुद्धिजीवियों का जुटान यहां के शिमला उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला (Indian Institute of Advance Studies,Shimla) में हुआ है। सात दिनों तक चलनेवाले इस विमर्श में ये लोग अपनी-अपनी विशेषज्ञता और लेखन अभिरुचि के अनुसार हिन्दी,आधुनिकता,भाषा,अस्मिता और इनसे जुड़े सवालों पर अपनी बात रखेंगे। दिलचस्प है कि यहां वक्ताओं को अपनी बात रखने के लिए जहां 40 मिनट का समय दिया गया है,करीब उतना ही समय और उससे कहीं ज्यादा उनकी बातों से उठनेवाले सवालों और असहमतियों पर बहस करने के लिए श्रोताओं को भी समय दिया जा रहा है इसलिए सुननेवालों के बीच उम्मीद है कि वो दिल्ली की तरह पैसिव ऑडिएंस नहीं होंगे और उनकी भी सक्रियता लगातार बनी रहेगी। विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करे। पूरी रिपोर्ट .....
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नुक्‍कड़ सर्वोत्‍तम बाल कविता सम्‍मान के लिए जिन कवियों की कविताएं प्राप्‍त हुई हैं (अविनाश वाचस्‍पति)

आप लिखते हैं बाल कविता
या कभी लिखी है बाल कविता
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24 सितम्‍बर 2009 की
मध्‍यरात्रि तक अपनी एक
सर्वोत्‍तम कविता भिजवायें

पूजा जोशी
सीमा सिंघल 'सदा'
बलराम अग्रवाल
समीर लाल
एम वर्मा
ललित शर्मा
विनोद कुमार पांडेय
पवन चंदन
मीना जैन
संजू तनेजा
दीक्षांत कौशिक
मुरारी पारीक
राजेश उत्‍साही
आज जिन और कवियों की कविताएं अब तक प्राप्‍त हुई हैं
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
सुधीर सक्सेना 'सुधि'
प्राण शर्मा
सूरज प्रकाश
रजिया मिर्जा
लाल्‍टू
डॉ. अनिल चड्डा
रश्मि प्रभा
सरस्‍वती प्रसाद
अमर बरवाल'पथिक
सुलभ सतरंगी
डॉ. रूपचंद्र शास्‍त्री ''मयंक''
उल्‍लूक
रितु रंजन प्रसाद
महफूज अली
शेफाली पांडेय
शरद कोकास
शैल अग्रवाल
विजय तिवारी 'किसलय'
शिखा वार्ष्‍णेय
कुलवंत हैप्‍पी
कुल 34 कवियों की कविताएं प्राप्‍त हुई हैं।
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