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परी की कहानी सी लगे ये मेरी जिंदगानी !

मुझसे हमेशा कहती थी नानी
गुडिया गुड्डे और परियों की कहानी
ख्वाब , आंसू और मुस्कान के रिश्ते
राजा रानी, परियां और खुदा के फ़रिश्ते

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मीडिया मंत्र में चोखेर बाली


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विकास ही तो हो रहा है (अविनाश वाचस्‍पति)

सहजता से पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें और राय देने के लिए ई मेल sopanstep@gmail.com/avinashvachaspati@gmail.com पर कीजिए।

सोपानstep द्विभाषी मासिक पत्रिका के नारदवाणी स्‍तंभ में जून 2009 अंक में प्रकाशित।
और ब्‍लॉगवाणी पर जितनी पसंद चटकेंगी उससे मुझे मालूम हो जाएगा कि कितनों को यह पसंद आया है।
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मेरा धर्म महान....तुम्हारा धर्म बकवास!!!

हम लोग अक्सर देखते है कि पैगम्बरों और मसीहाओं द्वारा प्रचारित धर्मों में कितनी अधिक भिन्नता दिखाई पडती है !  कईं बार तो विस्मय होने लगता है कि जीवन-मृ्त्यु,लोक परलोक, समाज या सृ्ष्टि सम्बंधित उनकी विचारधाराओं में इतना अधिक मतभेद क्यूं हैं । जो अपने को ईश्वर का दूत कहते हैं ओर जिनकों इस बात का विश्वास है कि वो जो कुछ प्रचारित रहे हैं, वह प्रभु की प्रेरणा से हो रहा है---तो फिर उनमें विचारैक्य क्यूँ नहीं ? । एक ईश्वर का दूत ऎसी बातें कहकर दुनिया से विदा ले लेता है तो दूसरा दूत कुछ दूसरी ही बातों का प्रचार करके । सत्य अनेक नहीं हो सकते । वह तो सदैव एक ही रहेगा । विभिन्न रूपों में उसकी अनुभूति अवश्य होती है,ओर वह किसी न किसी रूप में हो ही रही है ।
तो हम देखते हैं कि न तो कोई वैज्ञानिक,न दार्शनिक ओर न ही कोई पैगम्बर,मसीहा इत्यादि ही जीवन के सत्य को उजागर कर पाता हैं ।  मेरी दृ्ष्टि में तो पैगम्बर,मसीहाओं नें तो भ्रमपूर्ण ज्ञान के प्रचार के साथ साथ ओर भी बहुत सारी गलतियाँ की हैं । सामाजिक अशान्ती को दूर करके मानवी समाज को सुखी एवं समृ्द्ध करने के लिए उन लोगों नें जिन उपदेशों का प्रचार किया,उनका क्या पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां क्लिक करें
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गुलज़ार जी और त्रिवेणी




गुलज़ार जी के बारे में क्या कहे जब भी गुलज़ार जी के बारे में कुछ कहने का सोचिये सबसे पहला ख्याल आता है त्रिवेणी का | जिस दिन पहली बार त्रिवेणी सुनी उस दिन से त्रिवेणी के और गुलज़ार जी के फैन हो गए | चंद लफ्जों में पूरी बात कह जाना वो भी इतनी सहजता से और सुगमता से,  ऐसा जादू इतने कम शब्दों में जगाना इतना आसान भी तो नहीं |

आखिर ये त्रिवेणी है क्या तो आइये जानते हैं क्या है ये त्रिवेणी गुलज़ार जी के शब्दों में ही -
"  शुरू शुरू में जब ये फॉर्म बनाई थी तो पता नहीं था की ये किस संगम तक पहुँचेगी , त्रिवेणी नाम इस लिए दिया था क्योंकि पहले दो मिसरे गंगा जमुना की तरह मिलते हैं और एक ख्याल  एक शेर को मुकम्मिल करते हैं लेकिन इन दो धारों के नीचे एक और नदी है सरस्वती जो गुप्त है नज़र नहीं आती त्रिवेणी का काम सरस्वती को दिखाना ही है  तीसरा मिश्रा पहले दो मिस्रो में ही कहीं गुप्त है छुपा हुआ है  |  "
दो मिसरों में बुना हुआ एक बहुत ही खूबसूरत सा ख़याल और फिर तीसरे मिसरे  का आकर उस खयाल को एक नया ही नजरिया दे देना , यही वो जादू है जो हर त्रिवेणी पढने वाले के मुझ से वाह कहलवाए बिना नहीं रह सकता |
अगर कोई मुझसे पूछे मेरी पसंदीदा त्रिवेणी कौनसी है  तो शायद कह पाना मुश्किल होगा क्योंकि सभी एक से बढ़कर एक, लाज़वाब
तो एक छोटी सी कोशिश कर रही हूँ अपनी सभी पसंदीदा त्रिवेणी यहाँ एकत्रित करने की जिससे शायद जो लोग अनजान हैं अब भी इनसे वो भी इन्हें पढ़ कर इनके फैन बन जाएँ |




सब पे आती है , सबकी बारी से
मौत मुंसिफ है कमोबेश नहीं

जिंदगी सब पे क्यों नहीं आती !



कोई चादर की तरह खींचे चला जाता है दरिया
कौन सोया है तले इसके जिसे ढूंढ रहे हैं

डूबने वाले को भी चैन से सोने नहीं देते !



हाथ मिला कर देखा और कुछ सोच के मेरा नाम लिया
जैसे ये सर्वार्क किस नोवल पे पहले देखा है

रिश्ते कुछ बंद किताबों में ही अच्छे लगते हैं !



जिंदगी क्या है जानने के लिए
जिंदा रहना बहुत ज़रूरी है

आज तक कोई भी रहा तो नहीं !



जुल्फ में कुछ यूँ चमक रही है बूँद
जैसे बेरी में एक तनहा जुगनू

क्या बुरा है जो छत टपकती है



पर्चियां बाँट रही हैं गलियों में
अपने कातिल का इंतेखाब करो

वक़्त ये सख्त है चुनाव का !



सामने आए मेरे देखा मुझे बात भी की
मुस्कराए भी ,पुरानी किसी पहचान की खातिर

कल का अखबार था ,बस देख लिया रख भी दिया !



आओ सारे पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा

सबको सारे हंसी लगेंगे यहाँ !



मैं रहता इस तरफ़ हूँ यार की दीवार के लेकिन
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है

बड़ी कच्ची सरहद एक अपने जिस्मों -जां की है !



उम्र के खेल में एक तरफ़ है ये रस्साकशी
इक सिरा मुझ को दिया होता तो इक बात थी

मुझसे तगड़ा भी है और सामने आता भी नहीं !



कुछ अफताब और उडे कायनात में
मैं आसमान की जटाएं खोल रहा था

वह तौलिये से गीले बाल छांट रही थी !

त्रिवेनियाँ - गुलज़ार जी
इमेज सोर्स - गूगल
 इस माला के कुछ और मोती ,  कुछ और त्रिवेणी प्रकाम्या पर हैं उन्हें पढने के लिए यहाँ  क्लिक कीजिये 
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ब्लॉग जगत के दर्द को साझा करते,अमिताभ बच्चन


आजकल ब्लॉग जगत कई विवादों से घिरा हुआ है....इलाहाबाद में हुई संगोष्ठी पर भी कई लोगों ने लिखा है....एक जगह पढ़ा, स्वनामधन्य नामवर सिंह ने ब्लॉग जगत के अस्तित्व को ही नकार दिया था...और अब भी उन्हें काफी शिकायतें हैं....हिंदी,अंग्रेजी मीडिया के इस पक्षपातपूर्ण रवैये पर 'अमिताभ बच्चन' भी उतने ही व्यथित हैं....उन्होंने आज के अपने पोस्ट में इस दर्द से बखूबी परिचित कराया है...प्रस्तुत है, उनके ब्लॉग से उधृत अंश..

" The media dislikes the blog not because I write on it without their consent. The media dislikes the blog because we have created a family of devoted members in the shape of our FmXt, which believes पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए
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DDLJ:अच्छा है कि 'राज' हमारी यादों में जिंदा एक फिल्म किरदार है

डीडीएलजे से जुड़ी मेरी यादें कुछ अलग सी हैं. इनमे वह किशोरावस्था वाला अनुभव नहीं है,क्यूंकि मैं वह दहलीज़ पार कर गृहस्थ जीवन में कदम रख चुकी थी.शादी के बाद फिल्में देखना बंद सा हो गया था. दिल्ली में उन दिनों थियेटर जाने का रिवाज़ भी नहीं था.पर अब हम बॉम्बे(हाँ! उस वक़्त बॉम्बे,मुंबई नहीं बना था) में थे और यहाँ लोग बड़े शौक से थियेटर में फिल्में देखा करते थे.एक दिन पति ने ऑफिस से आने के बाद यूँ ही पूछ लिया--'फिल्म देखने चलना है?'(शायद उन्होंने भी ऑफिस में डीडीएलजे की गाथा सुन रखी थी.) मैं तो झट से तैयार हो गयी.पति ने डी.सी.का टिकट लिया क्यूंकि हमारी तरफ वही सबसे अच्छा माना जाता था.जब थियेटर के अन्दर टॉर्चमैन ने टिकट देख सबसे आगेवाली सीट की तरफ इशारा किया तो हम सकते में आ गए.चाहे,मैं कितने ही दिनों बाद थियेटर आई थी.पर आगे वाली सीट पर बैठना मुझे गवारा नहीं था.यहाँ शायद डी.सी.का मतलब स्टाल था.मुझे दरवाजे पर ही ठिठकी देख पति को भी लौटना पड़ा.पर हमारी किस्मत अच्छी थी,हमें बालकनी के टिकट ब्लैक में मिल गए.

फिल्म शुरू हुई तो काजोल की किस्मत से रश्क होने लगा...सिर्फ सहेलियों के साथ लम्बे टूर पर जाना. साथ-साथ मेरी कल्पना के घोडे भी दौड़ने लगे,काश!हमें भी ऐसा मौका मिला होता तो कितना मजा आता.शाहरुख़ खान के राज़ का किरदार तो जैसे दिल मानने को तैयार नहीं--'ऐसे लड़के भी होते हैं? एक अजनबी लड़की का इतना ख्याल रखना ...आरामदायक कमरा छोड़ इतनी ठंड में बाहर सोना..और उस पर से उसकी डांट....ना,ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में ही हो सकता है'.पर जब उनका टूर ख़तम हो गया तो उनके बीच जन्म लेते नए कोमल अहसास बिलकुल सच से लगे. 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...."इस गीत के पिक्चाराइजेशन ने भी इस अहसास को बड़ी खूबसूरती से उकेरा है.
फिल्म जब पंजाब में काजोल की शादी की तैयारियों तक पहुंची तो 'राज' का चेहरा किसी के चेहरे के साथ गडमड होने लगा.वह चेहरा था मेरे छोटे भाई 'विवेक' का.बिलकुल 'राज' की तरह ही वह उस शादी के घर में बिलकुल अजनबी था.लेकिन छोटे-बड़े, नौकर-चाकर, नाते-रिश्तेदार सबकी जुबान पर एक ही नाम होता था--'विवेक'
विवेक मेरे दूर का रिश्तेदार है,मेरी मौसी के देवर का बेटा...पर है बिलकुल मेरे सगे छोटे भाई सा. मैं छुट्टियों में अपनी मौसी के यहाँ गयी थी,वहीँ विवेक से मुलाक़ात हुई.हम दोनों में अच्छी जम गयी.वह दिन भर मुझे चिढाता रहता और मैं किसी से भी उसका परिचय यूँ करवाती--"ये विवेक हैं,जिनकी विवेक से कभी मुलाक़ात नहीं हुई"
मैं अपने चाचा की बेटी की शादी में गयी थी और वहां विवेक मुझसे मिलने आया.बिलकुल 'राज' की तरह वह बाकी लोगों से ऐसे घुल मिल गया जैसे बरसों की जान पहचान हो.मुझे याद नहीं कि किसी ने विवेक को शादी में फोर्मली इनवाइट किया हो पर जरूरत भी नहीं समझी,जैसे मान कर चल रहें हों,वह तो आएगा ही.और शादी के दिन सुबह से ही विवेक तैनात.आजकल तो स्टेज,मंडप की साज सज्जा,खाना पीना सब contract पर दे देते हैं पर उन दिनों हलवाई के सामने बैठकर खाना बनवाना,बाज़ार से राशन लाना,मंडप सजाना सब घर के लोग मिलकर ही करते थे.ऐसे में विवेक के दो अतिरिक्त उत्साही हाथ बहुत काम आ रहें थे.भैया का तो वह जैसे दाहिना हाथ ही हो गया था.
डी डी एल जे के राज की तरह वह किसी मकसद के तहत लोगों को खुश नहीं कर रहा था. बल्कि यह उसके स्वभाव में शामिल था.फिल्म की तरह गान बजाना तो उन दिनों नहीं होता था.पर 'राज' की तरह ही वह जब मौका मिलता बच्चों से घिरा रहता.और जहाँ कोई मामा,चाचा,दिख जाते कहता--"बच्चों, बोलो मामा की जय'.बच्चे भी गला फाड़ कर चिल्लाते.फिर वह मामा,चाचा से कहता,"पैसे निकालिए ,ये इतनी जयजयकार कर रहें हैं.".वे लोग भी हंसते-हंसते सौ पचास रुपये पकडा देते.और वह मुझे थमा देता,'जमा करो,सब मिलकर चाट खाने जायेंगे'
अमरीश पुरी की तर्ज़ में कई बड़े-बूढे उसे यूँ काम करता देख, ऐनक उठा,सीधे ही पूछ लेते."तुम किसके बेटे हो?"और वह मुझे इंगित कर कहता,"मैं इनका छोटा भाई हूँ"..क्या परिचय देता कि मैं लड़की की चाची की बहन के देवर का बेटा हूँ.
शादी की सुबह जब दूल्हा शेव कर तैयार होने लगा तो विवेक पहुच गया,"अरे आप दूल्हा हैं,खुद शेव करेंगे?..लाइए मैं शेव कर देता हूँ." और शेव करने के बाद बोला,"अब नेग निकालिए" लड़के ने भी मुस्कुराते हुए कुछ नोट पकडा दिए जो मेरे पास जमा हो गए.इस बार आइसक्रीम खाने के लिए
मेरे चाचा दिखने में तो अमरीश पुरी की तरह रौबदार नहीं थे.पर उनके बच्चों के साथ साथ हमलोग भी उनसे बहुत डरते थे.उस पर से जब बाराती छत पर पंगत में खाना खाने बैठे तो विवेक ने उनकी चप्पलें छुपा दीं.जब चप्पलें ढूंढी जाने लगी तो चाचा की क्रोधाग्नि में भस्म होने का हम सबको पूरा अंदेशा था.हमने विवेक को आगे कर दिया,तुम्हारा आइडिया था,तुम भुगतो.और वह चाचा से बहस करता रहा,'इनलोगों ने जनवासे में हमें कितना परेशान किया है,पहले सॉरी बोलें"पूरी शादी में पहली बार चाचा के चेहरे पर मुस्कान दिखी और उन्होंने विवेक को मनाया,चप्पलें वापस करने को.
विदा होते समय रूबी जोर-जोर से रो रही थी.भाई शायद पूरे साल बहन से झगड़ता हो,पर विदाई के समय बहन को रोते देख उसका दिल दो टूक हो जाता है,भैया ने विवेक को बोला,'तुम कार में साथ में बैठ जाओ,रास्ते में जरा उसे हंसाते हुए जाना."विवेक बोला..'अरे मेरे कपड़े नहीं हैं,कोई तैयारी नहीं है,ऐसे कैसे चला जाऊं?"...भैया ने बोला,'कोई बात नहीं,मैं कल लेता आऊंगा'और विवेक दुल्हन के साथ दूसरे शहर चला गया,जहाँ पहुँचने में कम से कम ८ घंटे लगते थे.

फिर बरसों बाद विवेक से मिलना हुआ.मेरे मन में उसकी वही शरारती छवि विद्यमान थी.पर १२वीं में पढने वाला वह लड़का, अब धीर गंभीर बैंक ऑफिसर बन चुका था,शादी भी हो गयी थी.मैंने पति से परिचय करवाया."ये विवेक है"(पर दूसरी पंक्ति कि 'जिसकी विवेक से कभी मुलाक़ात नहीं हुई' कहते कहते रुक गयी.) अच्छा है कि 'राज' एक फिल्म किरदार है और हमारी यादों में जिंदा है वरना १४ साल बाद उसके हाथ में भी होता 'माऊथ ओरगन' की जगह एक लैपटॉप और चेहरे पर सदाबहार खिली मुस्कान की जगह चिंताओं का रेखाजाल.
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मेरी बहरीन यात्रा (-काजल कुमार)

13 से 15 अक्टूबर तक बहरीन यात्रा पर जाना हुआ. आइए आपको भी इस यात्रा पर हुए अनुभवों से अवगत कराया जाए.

11,000 हजार मीटर की उंचाई पर 725 कि.मी. प्रति घंटे की गति से जब जहाज उड़ान भरता है, तो बाहर का तापमान शून्य से 47 डिग्री नीचे होता है. दिल्ली से मस्कट (ओमान) की उड़ान करीब 4 घंटे की है. जब जहाज पाकिस्तान के शहर कराची के ऊपर से उड़ता है तो शहर नीचे दिखाई देता है. इसके बाद जहाज़ ओमान की खाड़ी के ऊपर उड़ान भरता है.  मस्कट से मनामा (बहरीन) की उड़ान डेढ़ घंटे की है. बहरीन साउदी अरब और ईरान के बीच फारस की खाड़ी में स्थित है.

imageimage बहरीन के राजा का निवास

 

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होटल रमादान

 

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भारत का राजदूतावास

हम जहां ठहरे, उस होटल रमादान के ठीक सामने राजनिवास था और होटल के पीछे दूसरी तरफ कुछ ही दूरी पर भारतीय राजदूतावास था.

 

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बहरीन में सड़क के दायीं ओर चलने वाला यातायात बहुत अनुशासित है किंतु जाम बड़ी समस्या हैं.

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भव्य इमारतों का देश है बहरीन

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भीड़ और गंदगी की अभयस्त भारतीय आंखों को यहां की सफाई और शांति कुछ नकली सी लग सकती हैं.

 

बहरीन, खाड़ी के देशों में सर्वाधिक आज़ाद ख्याल देश है. अरब संस्कृति के बावजूद यहां कामकाजी महिलाएं आपको समाज के हर क्षे़त्र में मिलेंगी. यहां के होटलों में मदिरा पान आम बात है. शायद यही कारण है कि यहां के होटल सप्ताहांत में भरे मिलते हैं.

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सवाल आपसे हैं, उनसे नहीं जो सवाल पैदा कर रहे हैं।

कल मुम्बई में अफरा-तफरी मच गई। मध्य-रेल अचानक ठप्प हो गई। सुबह के उस समय यह सब हुआ जब लाखों लोग अपने कार्यस्थल की ओर रवाना होते हैं। एक निर्माणाधीन पुराना पाईपलाइन वाला पुल टूट कर लोकल ट्रेन पर गिर जाता है, हाहाकार मच जाता है। मचे भी क्यों नहीं आखिर ट्रेन हादसे मे मौत भी हुई और घायल भी हुए। ऐसा लगा मानों किसी परिवार के मुख्य व्यक्ति को हार्ट अटैक आया और परिवार वालों में भगदड मच गई। बदहवासी छा गई। सारा कामकाज रुक गया। सबकुछ उलट-पलट सा गया। मुम्बई की लोकल ट्रेन को भी तो जीवन रेखा ही माना जाता है। यही वजह है कि कल लोग किस हाल में थे, और किस हाल में घर पहुंचे..बडी करुणामयी कहानी है। अफसोसजनक यह कि इस कहानी की आदत हो गई है, हर गम पचाने की मज़बूरी हो गई है। रोज़ ब रोज़ कहानी दोहराती है, सो जीवन में यह आम हो गई है। वाह री विडम्बना। किंतु मैं मुख्य घटना के केन्द्र की बात करना चाह रहा हूं। उस कैब की बात करना चाह रहा हूं जिसमें मोटरमैन (ड्राईवर) फसां था और मौत से लड रहा था। वो जीत जाता यदि उसके विभाग वाले चुस्त दुरुस्त होते। दुख होता है यह कहने में कि देश का सबसे बडा नेटवर्क, सबसे बडा लापरवाह है जो अपने आदमी की जान की कीमत भी नहीं समझता और महज़ 5 लाख सहायता राशि देकर मामले की इतिश्री मान लेता है। वह एक निरापद मौत थी। करीब 3 घंटों तक दचके हुए कैब में दबा हुआ मोटरमैन सहायता के लिये गुहार लगा रहा था, और रेलप्रशासन मामले की पुष्टी के लिये मीडिया से मुखातिब होना ज्यादा बेहतर मान रहा था। कहने को वहां सब थे। रेल विभाग का आपातकालीन दस्ता भी था, पुलिस प्रशासन भी था, अग्निशमक दल के लोग भी थे और जनसामान्य की भीड भी थी। अगर वहां कोई नहीं था तो उस जिन्दगी को बचाने वाला, जिसकी सूझबूझ की वजह से बहुत बडी दुर्घटना टल चुकी थी। हास्यास्पद है जिस नेटवर्क के बारे में कहा जाता है कि यहां हर कार्य के लिये एक प्रशिक्षित व्यक्ति मौज़ूद है, साधन उपलब्ध हैं, वहां उसके पास कैब को काटकर जान बचाने के लिये जो औज़ार हैं वो सिर्फ दिखावा, कैब को काटने के लिये ड्रील मशीन लाई गई, गैस की टंकी लाई गई, पर वाह रे रेल विभाग, वो टंकी खाली निकली। मौत से लडने वाले ड्राईवर की थमती सांस की मानो किसी को कोई परवाह नहीं, पुलिस भीड को हटाने में व्यस्त, अग्निशमन दल रेल विभाग की कार्यवाही की प्रतीक्षा में, तो रेल विभाग का बचाव दल अपने ही बचाव में दिखाई दिया। अन्दर दबा कुचला उसका खुद का आदमी अंतिम सांसे गिन रहा होता है और बाहर उसे बचाने के नाम पर सिर्फ नाटक खेला जाता है। और जब कैब काट लिया जाता है, अन्दर फंसे ड्राईवर को बाहर निकाला जाता है तो हाथ में सिर्फ लाश आती है, क्योंकि निकालते समय उसका हाथ कट जाता है, पैर मे चोट पहुंचती है, वैसे भी काफी देर हो चुकी होती है। वाह रे रेल विभाग की सफलता। उस लाश को अस्पताल भेजा जाता है, फिर घरवालों को सौंप दिया जाता है। परिवार के बहते आंसुओं के बीच दो शब्द संवेदना के टपका कर रेलविभाग अपनी कर्मठता का प्रदर्शन करता है। अब परिवार को सहायता राशि घोषित कर दी गई है, किसी को नौकरी का आश्वासन भी दे दिया जायेगा। बस्स..धीरे धीरे सबकुछ ठीक..खत्म...। वाह री...मानवता....। मुझे समझ में यह नहीं आता कि करोडों बज़ट वाले रेलविभाग में इतनी दुर्घटनायें हो चुकी है, बावज़ूद इससे निपटने के लिये आवश्यक साधन भी उपलब्ध नहीं? प्रशिक्षित कर्मचारी भी नहीं? जो ऐसी घटनाओं के होते ही चुटकी में जान बचा सकता हो? होनी को कौन टाल सकता है, यह सच है किंतु होनी के बाद अगली होनी से बचाने के उपाय खडे किये जा सकते हैं। किंतु लापरवाहों की आंखे नहीं होती, दिमाग नहीं होता, होता है तो जेब भरने, काम चलने की बस एक तुच्छ मानसिकता होती है। मानवीय भूल होती है, किंतु कोई ड्राईवर मौत को आमंत्रण देता हो, ऐसा नहीं होता। अभी पिछले दिनो जब मथुरा में हादसा हुआ तो रेलविभाग ने ड्राईवर को दोषी मान कर अपनी कार्यवाही शुरू कर दी, किंतु जब मुम्बई में खुद रेलविभाग दोषी था तो कौन कार्यवाही करेगा?
सवाल सिर्फ रेलविभाग को ही नहीं साधता, बल्कि हमारे आसपास फैले इस पूरे तंत्र को साधता है जो आदमी की जिन्दगी को कौडी की कीमत से तौलता है। हर जगह मौत खडी है। उसके खडे होने के संकेत भी दीखते हैं, उसे खडे करने वाले लोग भी दीखते हैं..किंतु नहीं दिखते इन पर पाबन्दी लगाने वाले। पूरी मानवता की यह सबसे बडी हार है। और हम अपनी ही हार रोज़ देखते है खडे होकर..., हंसते हुए..। क्या अब भी आप मौन साधना ही हितकर समझते हैं या ऐसी तमाम खडी मौतों के खिलाफ आवाज़ बुलन्द कर प्रशासन को चेताना चाहते हैं? सवाल आपसे हैं, उनसे नहीं जो सवाल पैदा कर रहे हैं।
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55वें राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की खबरों के समाचार पत्रों में प्रकाशित चित्र और खबर


दैनिक भास्‍कर की सचित्र खबर
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दैनिक जनसत्‍ता में मास्‍टरनीनामा का मकड़जाल (अविनाश वाचस्‍पति)


नुक्‍कड़ ब्‍लॉग की सम्‍मानित लेखिका सुश्री शेफाली पांडेय की दैनिक जनसत्‍ता के संपादकीय पेज पर समांतर स्‍तंभ में मास्‍टरनीनामा की पोस्‍ट इन्‍हें इंसान ही बने रहने दिया जाए मकड़जाल शीर्षक से दिनांक 23 अक्‍तूबर 2009 के अंक में प्रकाशित।
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बापू का जवाब नयी पीढ़ी के नाम (अविनाश वाचस्‍पति)



प्‍यारे चेतन,

एक भगत तो चेतन है । यह जानकर अच्‍छा लगा और इतना चेतन कि उसने मुझे ई मेल के इस क्रांतिकारी दौर में चिट्ठी लिखकर नि:संदेह एक क्रांतिकारी कार्य ही किया है। यह भारत की चेतनता है। भगत भी हो और चेतन भी हो – ऐसा अपवाद ही होता है और इसी अपवाद के कारण ई मेल के दौर में पत्र लिखने का साहस किया है। ओबामा ने मेरे साथ डिनर की ख्‍वाहिश जाहिर की तो उसे नोबेल का हकदार मान लिया गया और शांति का नोबेल उसके नाम कर भी दिया गया। इस चेतन भगत ने मुझे सीधे पत्र लिखकर कलम की ताकत के अहसास को जीवंतता प्रदान की है इसलिए इस भगत को नोबेल पुरस्‍कार मिलना चाहिए, शांति का संपन्‍न हो गया है तो सादगी का ही दो, जरूर दो। ई मेल के युग में पत्र लिखना सादगी तो है ही, चिट्ठी लिखने की परंपरा से भी प्रेम का द्योतक है।

मेरे पास यह अखबार भास्‍कर आज ही पहुंचा है और मैं इसका जवाब नुक्‍कड़ ब्‍लॉग पर इसलिए दे रहा हूं क्‍योंकि इसे जानने के अधिकारी लोगों तक बात पहुंचाने के लिए नुक्‍कड़ ही मुझे जंचा है और इसी ब्‍लॉग के मॉडरेटर अविनाश ने अपने नाम के ब्‍लॉग अविनाश वाचस्‍पति पर हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत की (गर महात्‍मा गांधी ने ब्‍लॉग बनाया होता) प्रतिक्रिया जानी थी। मैं बतलाना चाहता हूं कि मैं अपने हिन्‍दी ब्‍लॉग का नाम बापू ही रखता, राष्‍ट्रपिता नहीं रखता। सहज और सादगी का पर्याय – यह सूत्र वाक्‍य होता मेरे ब्‍लॉग का। बिना लाग लपेट के अपनी बात अपनी मजबूती से कहने वाला।

मैं भी हाड़ मांस का ही इंसान था और वही नियम मेरे पर भी लागू होते हैं। 140 बरस का मैं कैसे हो सकता हूं। इतना झूठ, जबकि यह मीठा झूठ है जबकि मैं बार बार कहता रहा हूं मुझे झूठ सख्‍त नापसंद है परंतु तुम कल्‍पनाओं के सहारे मुझे झूठ से बरगलाना चाह रहे थे। जिस प्रकार जन्‍मदिन पर शुभकामनाओं के जरिए एक भ्रम पैदा किया जाता है कि तुम जिओ हजारों साल और साल के दिन हों पचास हजार। खैर ...

बैंक के हर नोट पर मेरी तस्‍वीर तो छापी है जबकि खोट का जन्‍म ही नोट से होता है। इसलिए तुम मुझे कभी भुला न पाओगे। वो खोट अपने अतिवादी स्‍वरूप में तब आता है जब नकली बनाया जाता है। वैसे बिना बनाये भी नकली स्विस बैंकों में ढेर लगाना भी खोट ही है। मेरी मूर्तियों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है जिस तरह से मेरी अच्‍छी बातों की हो रही है बिल्‍कुल उसी तरह। प्रतिष्ठित सड़कों का नाम मेरे नाम से होने पर ऐसा तो नहीं होता कि उनमें गड्ढे नहीं होते या नहीं होतीं दुर्घटनायें। जब यही सब होना है तो किसी को मेरे नाम से क्‍या लेना देना है। राजनेता मेरे अनुरूप खुद को ढालने की कोई कोशिश नहीं करते बल्कि मुझे ही उन्‍होंने अपना वोट बैंक बनाने के लिए सदा ही नये नये रूपों में ढाला है।

मेरा जो अनुगमन आप बतला रहे हैं वो और कुछ नहीं, निरा स्‍वार्थ सिद्धि का साधन है। मेरे अनुगमन से अच्‍छा मानवता की पूजा करना है। वोट बैंक हथियाने का जरिया है। इसी प्रकार मुन्‍नाभाई एमबीबीएस में गांधीगिरी दिखलाकर दर्शक हथियाए गए थे। जहां तक मेरे नीचे आने की बात है तो चाहे मैं नीचे आकर सदा ही रहूं। तो मुझ पर बहस वगैरह तो खूब होंगी जिनमें मुझे पूरी बेदर्दी से सरदर्द होने तक घसीटा जाएगा परन्‍तु इसे चैनलों के लिए एक सनसनीखेज खबर से अधिक कोई स्‍थान नहीं मिलेगा और न ही कोई मेरे आने से सीखना चाहेगा। आज सीखने वाले नहीं है, सब सिखाने वाले हैं – वो चाहे युवा पीढ़ी हो, बचपन हो या ... और बुजुर्गों के पास तो सनातन सिखाने का अधिकार ही है। मैं तो अब भी जोरदार तरीके से कह रहा हूं कि सदा अपने दुश्‍मनों को प्‍यार करो जिससे वो तुम्‍हारे ऐसे मित्र बनें जो मित्रता की मिसाल हों।

तुमने यह माना तो है कि युवाओं का इस्‍तेमाल किया जाता है और वे इस्‍तेमाल होने के लिए ही बने हैं। इन्‍हें बचाने के नाम पर तो मैं भी फेल हूं और इसे स्‍वीकारने में मुझे कोई शर्म महसूस नहीं होती। ये अपना भुला बुरा नहीं जानते हैं और न जानना ही चाहते हैं। इन्‍हें अपने से अधिक कोई समझदार नहीं लगता है। अधिक विस्‍तार में न जाते हुए मैं अपनी बात यहीं संपन्‍न कर रहा हूं अब यह कोई प्रवचन तो है नहीं जो खूब सारा और घंटों दिया जाये दूसरा किसी के पास समय नहीं है इतना सुनने का, और सच बतलाऊं तो उन्‍हें जरूरत भी नहीं है। बीच बीच में उनका मोबाइल भी बजेगा। मेरे जितने लेख धरती पर मौजूद हैं वे ही बहुत ही हैं अगर सही से अमल में लाए जाएं, माने जाएं और अधिक की जरूरत नहीं है। मैं कह चुका हूं कि जो जागते हुए सोने का बहाना कर रहा है उसे नहीं जगाया जा सकता है। जो सो रहा है उसे जगाना तो संभव है। तो मुझे तो सब सोने का बहाना ही करते दिखलाई दे रहे हैं।

हे राम।

अपनी समूची आस्‍थाओं के साथ

तुम्‍हारा बापू

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अपने पसंदीदा और जिम्मेदार चिट्ठाकार को बनायें ब्लॉग प्रहरी


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फर्जी रिफंड बेवसाइटें बन रहीं खतरा (अविनाश वाचस्‍पति)




दैनिक भास्कर में दिनांक 21 अक्तूबर 2009 को प्रकाशित समाचार के चित्र पर क्लिक करें और जानें तथा धोखाधड़ी से बचें। जनहित में नुक्कड़ पर जारी।
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वक़्त की धूप में बेरंग होता ये मन...

पिछली 'सिवकासी' वाली पोस्ट पर बड़ी इमोशनल प्रतिक्रियाएँ मिलीं. सुखद अनुभूति हुई,जानकर कि इतने लोग हमखयाल हैं. मेरे बेटे को सबने बहुत आर्शीवाद और शुभकामनाएं दीं....सबका शुक्रिया. पर सारे बच्चे ऐसे ही होते हैं--निश्छल,निष्पाप, दूसरों के दुःख में दुखी हो जानेवाले,अपनी धुन के पक्के. कई लोगों ने अपने अनुभव बांटे.ममता ने बताया,उनका बेटा भी वायु प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण का ख्याल कर पटाखे नहीं चलाता. राज़ी के बेटे ने इस बार,बिजली के रंगीन बल्ब और झालर लगाने से मना कर दिया और बोला--'इतनी बिजली बर्बाद करने से क्या फायदा,हम दिए जलाएंगे'. कई लोगों ने अपनी टिप्पणियों में भी बताया कि उनके बच्चों ने भी पटाखों का बहिष्कार किया है.ख़ुशी होती है ये देख कि आज के बच्चे इतने जागरूक हैं और देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है.ये बच्चे पाठ्य-पुस्तकों में पढ़कर सब भूल नहीं जाते बल्कि आत्मसात करते हैं और उसे व्यवहार में लाने की भी कोशिश करते हैं

मेरी एक डॉक्टर सहेली थकी मांदी क्लिनिक से आती है पर उसकी बेटी 'ग्लोबल वार्मिंग' की सोच उसे ए.सी. नहीं चलाने देती.मेरा छोटा बेटा भी,भीषण गर्मी में भी मुझे ए.सी.चलाने से रोकता है और मुझे समझाता है,"अगर हमने अभी से पर्यावरण की रक्षा का ख़याल नहीं किया तो तुम्हारी उम्र तक, जब मैं पहुंचूंगा तब तक टेम्परेचर ५० डिग्री तक पहुँच जायेगा.मैं ऑफिस से पसीने से लथपथ घर आऊंगा" जैसे भविष्य की भयावह तस्वीर उसके सामने खींच जाती है.

हम बच्चों में बढती अनुशासनहीनता,भौतिकपरस्तता और स्वार्थीपन की शिकायत करते हैं पर कभी कभी ये बच्चे सहजता से इतनी बड़ी बात कह जाते हैं कि हमें चकित कर देते है.एक बार मैं पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली से बात कर रही थी तभी उसका दस वर्षीय बेटा आया और बोला --'ममी,कमलेश खेलने के लिए बुला रहा है,मैं नीचे जाऊं??"(कमलेश पास की दुकान में डिलीवरी बॉय का काम करता है,जब कभी काम से फुरसत मिलती है,बिल्डिंग में बच्चों के साथ खेलने आ जाया करता है)
सहेली ने पूछा--"और भी कोई आया है खेलने?"
"ना, और कोई नहीं...बस मैं और कमलेश हैं"
"बाद में जाना, जब सब आ जाएँ"....सहेली का आभिजात्य मन अपने बेटे को एक डिलीवरी बॉय के साथ अकेले खेलने देना गवारा नहीं कर रहा था. बेटे ने आँखे चढाकर,संदेह से पूछा--"क्यूँ?..क्यूंकि वह एक दुकान में काम करता है,इसलिए??...तुमलोग इतना भेदभाव करती हो इसलिए,इंडिया इतना पिछड़ा हुआ है...मुझे जाने दो,ना."..सहेली ने उसकी बातों से बचने को, जाने की इजाज़त दे दी...और वह दस साल का बच्चा हमें भाईचारा का पाठ पढ़ा,चला गया. ऐसे ही एक बार मैं बाहर से लौटी तो पाया घर में बिल्डिंग के बच्चे जमा होकर 'पकिस्तान' और 'साउथ अफ्रीका' के बीच चल रहा मैच देख रहें हैं.मैंने यूँ ही पूछ लिया,"तुमलोग किसे सपोर्ट कर रहें हो?..और सबने समवेत स्वर में कहा--"ऑफ कोर्स! पाकिस्तान को...आखिर वो हमारा भाई है"....जब हम ना खेल रहें हो तो पाकिस्तान को कई लोग सपोर्ट करते हैं..पर भाई का दर्जा कितने लोग देते हैं?....इसी दीवाली में सात साल की अपूर्वा अपनी मम्मी से घर के सामने रंगोली बनाने की जिद कर रही थी,उसकी मम्मी ने कहा, जाओ सीढियों पर कुछ फिगर्स बना कर उसमे रंग भर दो....आप आश्चर्य करेंगे जानकर,उस बच्ची ने हर स्टेप पर एक दीपक,एक स्वस्तिक और चाँद तारे बनाए...और खुश खुश हमें दिखाया,"मैंने पाकिस्तान के फ्लैग का मार्क भी बनाया".

इन बच्चों का मन इतना कोमल होता है,दूसरो का जरा सा दुःख देख व्याकुल हो जाते हैं,कोई भी त्याग करने से जरा भी नहीं हिचकिचाते.मेरी सहेली वैशाली की बेटी स्कूल की तरफ से एक अनाथालय में एक स्किट पेश करने गयी.घर आकर दो दिन उसने ठीक से खाना नहीं खाया और उदास रही कि वे बच्चे अपने मम्मी पापा के बिना कैसे रह पाते हैं? मैं भी जब बच्चों के छोटे कपड़े अनाथालय में देने जाती हूँ तो मेरा छोटा बेटा कहता है, "तुम्हे इसके साथ कुछ नए कपड़े भी देने चाहिए"...मैं तर्क देती हूँ," सिर्फ एक दो बार की पहनी हुई है,और छोटी हो गयी है,बिलकुल नयी जैसी है." वह कुछ रोष से कहता है ."पर नयी तो नहीं है"

२६ जुलाई के महाप्रलय में जब सारा मुंबई डूबा हुआ था... कुछ ऊँचाई पर होने की वजह से हमारे इलाके में पानी नहीं भरा और बिजली भी नहीं गयी....बिल्डिंग के बच्चों ने जब टी.वी.पर देखा, कई इलाकों में तीन दिन से बिजली नहीं है, तो जैसे अपराधबोध से भर गए. उन्हें आपस में बाते करते देखा--"ये लोग एक दिन के लिए हमारी बिजली काटकर उन्हें क्यूँ नहीं दे देते?"..उन्हें अँधेरे में रहना...टी.वी.नहीं देखना गवारा था पर दूसरो की तकलीफ वे नहीं देख पा रहें थे.

इन बच्चों कि बातें सुन ,मुझे लगा....क्या हम भी बचपन में ऐसे नहीं थे?...फिर ऐसा क्या हुआ कि हम संवेदनाशून्य होते चले गए.वक़्त ने ऐसा असर किया हमपर कि हम इतने बदल गए.बचपन का एक वाक़या याद आता है...मेरी माँ बाहर गयीं थी तभी एक भिखारी आया और बोला...वह बहुत भूखा है.मैंने उसे ढेर सारे कच्चे चावल दे दिए. मैं चावल दे ही रही थी कि मेरा छोटा भाई आ गया.मुझे डर लगा ,अब ये मेरी शिकायत करेगा कि दीदी ने इतने सारे चावल दे दिए.मैंने सफाई दी...दरअसल वह बहुत भूखा था.मेरे भाई ने तुंरत कहा, "तुमने उसे फिर थोड़े दाल और आलू भी क्यूँ नहीं दिए,केवल चावल वो कैसे खायेगा?"..... ऐसे होते हैं हम सब बचपन में......फिर धीरे धीरे आगे बढ़ने की जद्दोजहद, इस दुनिया में सर्वाइव करने की कशमकश हमारी सारी कोमल भावनाएं सोख लेती है.कर्तव्यों,जिम्मेवारियों के बोझ तले ये दूसरों के लिए सोचने का जज्बा दम तोड़ देता है.हम अपनी सुविधाएं,असुविधाएं देखने लगते हैं...अपना हित सर्वोपरि रखते हैं.

दो तीन साल पहले मैंने एक संस्था "हमारा फुटपाथ" ज्वाइन की थी. यह संस्था सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए काम करती है.पर जब मुझे पता चला कि बाकी सारे सदस्य शाम ७ बजे इकट्ठे होते हैं क्यूंकि बाकी सारे लोग ऑफिस वाले थे और बच्चे भी सिग्नल पर फूल,गुब्बारे,खिलौने,किताबें...बेचने के बाद ही आ सकते हैं.मैं नहीं जा सकी क्यूंकि ७ बजे मेरे बच्चे भी खेलकर घर वापस आते थे ,उनकी पढाई,उनका खाना पीना देखना था.फिर दूरी के कारण आने जाने में भी २ घंटे लग जाते. मैंने कहाँ सोचा कि मेरे बच्चों के पास तो सुख सुविधा से पूर्ण आरामदायक घर है,उन बच्चों के पास तो माँ..बाप..सर पे छत...किसी का सहारा नहीं.यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि हम कुछ अच्छे काम करना भी चाहते हैं तो अपने फालतू बचे समय में.

हर बच्चे के दिल में एक 'मदर टेरेसा' और 'बाबा आमटे' का ह्रदय होता है पर जैसे जैसे उम्र बढती है यह छवि धूमिल पड़ती जाती है और एक समय ऐसा आता है जब ये छवि बिलकुल गायब हो जाती है.तभी तो आज इनके बाद ऐसी निस्स्वार्थ सेवा करने वाला कोई तीसरा नाम नहीं सूझ रहा.
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**शुभकामनाएं**

 
मोती सा त्‍यौहार दिवाली
ज्‍योति का त्‍यौहार दिवाली
 
दीप जलें ,जगमग जगमग
रोशन हों, हर घर खुशहाली
 
बांटें खुशियां मिलकर सब
तमिल ,मराठी हों बंगाली



यही कामना सच हों सपने
रहे न कोई पुलाव ख्‍याली
 
चकाचौंध में, भूल न जाना
रातें कुछ हैं, अब भी काली

खाएं छककर आप मिठाई
दुआ करे, उत्‍साही भोपाली  

            0राजेश उत्‍साही

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मानस के मोती से जोड़ना वस्‍तुत: आपसे जुड़ना है (अविनाश वाचस्‍पति)

दीपावली वो जो मन की हो
अच्‍छे विचारों की हो
सुसंस्‍कारों की हो ।

आपसे हम जुड़ना चाहते हैं
आपको खुद से जोड़ना चाहते हैं
जो जुड़े हुए हैं पहले से
अहो भाग्‍य हमारा है
आज नये- नये साथियों ने
हाथ हमारा थामा है
तो आप भी थामिए हाथ
बनिए संबल एक दूसरे का
भरिए अपना ई मेल और बन जाइये
दीपावली के पावन पर्व पर
मानस के मोती की माला का
एक चमकदार
खनकदार सीप सा मोती
मानस के मोती की तुलना
किसी से नहीँ होती।









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दीपावली के शुभ अवसर पर आज नया ब्लॉग



काव्य-रसिक मित्रो !

दीपावली के शुभ अवसर पर आज नया ब्लॉग

कवि सम्मेलन
http://hindikavisammelan.blogspot.com/

शुरू किया है जिस पर आप रोज़ाना उत्तम एवं श्रेष्ठतम साहित्यिक

कविताओं का वाचन कर तो कर ही सकेंगे साथ ही वर्तमान में रची

चर्चित कवितायें भी बाँच सकेंगे..........

इस अभियान का श्री गणेश कर रहा हूँ....

महान कवयित्री महादेवी वर्मा की अधोलिखित कविता से

पढ़िए और आनन्द लीजिये एक महान रचना का...........



आज दीपक राग गा लूँ ..........


सब बुझे दीपक जला लूँ

घिर रहा तम आज दीपक-रागिनी अपनी लगा लूँ


क्षितिज-कारा तोड़ कर अब गा उठी उन्मत्त आँधी

अब घटाओं में न रुकती लास-तन्मय तडित बाँधी

धूलि की इस वीणा पर मैं तार हर तृण का मिलालूं



भीत तारक मूंदते दृग, भ्रांत मारूत पथ न पाता

छोड़ उल्का अंक नभ में, ध्वंस आता हरहराता

उँगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचालूं



लय बनी मृदु वर्तिका हर स्वर जला बन लौ सजीली

फैलती आलोक सी ..........झंकार मेरी स्नेह-गीली

इस मरण के पर्व को मैं आज दीपाली बनालूं



देख कर कोमल व्यथा को आँसुओं के सजल रथ में

मोम सी सांधे बिछादी थी इसी अंगार - पथ में

स्वर्ग है वे, मत कहो अब क्षार में उनको सुलालूं



अब तरी पतवार लाकर तुम दिखा मत पार देना

आज गर्जन में मुझे बस ...एक बार पुकार लेना

ज्वार को तरणी बना मैं इस प्रलय का पार पा लूँ

आज दीपक राग गा लूँ


- महादेवी वर्मा


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नवभारत टाइम्‍स दीपावली 2009 वार्षिकांक में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर अनुराग अन्‍वेषी का एक महत्‍वपूर्ण आलेख नेट के सागर में हिंदी का मोती

आप इस लेख को पढ़ने के लिए नीचे चित्रों पर क्लिक करके पूरे लेख का भरपूर आनंद ले सकते हैं जिसमें हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के सफर का चित्रण किया गया है।







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मालूम नहीं?????आज नरक चौदस है!!!!!!

आज सुबह-सुबह श्रीमती ने  जगाया
हाथ में चाय का कप थमाया
तो मैंने  पूछा- क्या टाइम हुआ है?
मुझे लगता नहीं कि अभी सबेरा हुआ है
बोली ब्रम्ह मुहूर्त का समय है,चार बजे हैं
और आप अभी तक खाट पर पडे हैं
मालूम नहीं आज नरक चौदस है
आज जो ब्रम्ह मुहूर्त में स्नान करता है
वो सीधा स्वर्ग में जाता है
वहां परम पद को पता है
जो सूर्योदय के बाद स्नान करता है
वो सारे नरकों को भोगता है
चलो उठो और नहाओ
यूँ घर में आलस मत फैलाओ
मैंने कहा मेडम कृपा करके
तुम मुझे तो सोने दो
मुझे नहीं जाना स्वर्ग में
यही नर्क में ही रहने दो
मैं स्वर्ग में  नहीं रह  सकता हूँ
वहाँ जाकर मै उकता जाऊंगा
सारे दोस्त तो नरक में ही मिलेंगे
इसलिए स्वर्ग में क्या लेने जाऊंगा?
उनके पास कई जन्मों का पुण्य संचित है
इसलिए हमारा नरक में ही रहना उचित है
फिर वहां रम्भा,मेनका, उर्वशी
जैसी  अप्सराओं से तुम्हे डाह होगी
तुम्हारे होठों पर एक आह होगी
कोई लाभ नहीं होगा बाद पछताने में
इसलिए क्या बुरा है नरक आजमाने में
शूर्पनखा, ताड़का, मंथरा को देखकर
वहां मेरा मन वहां नहीं भटकेगा
आखिर आसमान का गिरा
खजूर पर ही अटकेगा ,
श्रीमती मान गई- और बोली
अगर ये बात है तो जाओ,सो जाओ
अगर नही नहाना है तो नरक ही जाओ
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इनसे अधिक मिठास कहीं और मिल सकती नहीं (अविनाश वाचस्‍पति)

त्‍योहार हैं आये सबके मन आनंद छाये मिले खूब बधाई
पर न तो मिठाई खाओ और न खिलवाओ मेरे प्‍यारे भाई

मिठाईयां बन रहीं, बिक रहीं, धड़ाधड़ खूब मिलावटी अब
बदले में मिल रही हैं सब बीमारियां सभी बेमिलावटी जी

खोया भी बन रहा नकली है जिसमें घी भी भरा नकली है
चीनी असली हो तो भी बचाव नहीं कर सकती मेरे मित्रो

लालच मन का इंसान के मन से बिल्‍कुल भी जाता नहीं है
इंसान के मन को हैवान बनाता लालच लजाता ही नहीं है

जाना सब छोड़ के है किसी को ले जाना कुछ भी तो नहीं
फिर भी कमाता है खूब उल्‍टे तरीकों से बेशर्म होकर वही

रोक इस पर लग सकती नहीं है जो गिर गया उठता नहीं
लालच के जंजाल में फंस गया है निकल सकता ही नहीं

दो दिल से शुभकामनायें सबको बोल चार मीठे बोलकर
इनसे अधिक मिठास कहीं और जहां में मिल सकती नहीं

इनमें हो मिलावट तो सबको महसूस तुरंत हो ही जाती है
शब्‍दों की मिलावट कई बार तो पकड़ में भी नहीं आती है

मिलावटी मिठाई से देख लो बेचकर मिलते नोट असली हैं
बाजार में दौड़ रहे जितने अब नोटों के ढेर भी तो नकली हैं

नकली है इंसान भी, इंसान है परेशान भी, उसने ठान ली
मिलावटी और नकली बेचने में बढ़ती है उसकी शान भी।
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काश अपराधियों को पता होता ..... जान कितनी कीमती होती है !!

वैसे तो मेरी टी वी देखने की अधिक आदत नहीं ,पर कल शाम साढे सात बजे टी वी खोलकर बैठ गयी। शायद आई बी एन 7 पर एक कहानी दिखायी जा रही थी , एंकर की ओर से ही उसका इतने रोचक ढंग से प्रस्‍तुतीकरण किया गया कि मैं उसी चैनल पर अंटकी रह गयी। प्राचीन काल की बात है ,हर प्रकार से सुखी और संपन्‍न एक राजा किसी दैवी शक्ति की प्राप्ति के लिए एकाग्रचित्‍त हो मां काली की पूजा करने लगा। मां काली ने उसकी मनोकामना को पूरी करने के लिए सपने में उससे एक मनुष्‍य की बलि चढाने को कहा। राजा धर्म का पालन करनेवाला था , इसलिए बलात् किसी की बलि नहीं चढाना चाहता था , उसने राज्‍य में घोषणा करा दी कि उसे बलि चढाने के लिए एक व्‍यक्ति की आवश्‍यकता है , जो व्‍यक्ति बलि के लिए तैयार होगा , उसके परिवार का लालन पालन राज्‍य की ओर से किया जाएगा।

घोषणा के सालभर होने के बाद भी कोई व्‍यक्ति इसके लिए तैयार नहीं हुआ। दूसरे वर्ष राजा को देवी ने स्‍वप्‍न में पुन: इसी बात की याद दिलायी। जान की ही बलि देनी है , इसके लिए बूढे की बलि भी दी जा सकती है , उसने किसी बूढे को बलि के लिए उपस्थित होने को कहा , इसके एवज में परिवारवालों को बडे इनाम दिए जाने की घोषणा की। अपनी जान बहुत प्‍यारी होती है , इसके भी एक वर्ष बीत गए , कोई बूढा बलि के लिए तैयार नहीं हुआ। तीसरे वर्ष राजा ने फिर वही सपना देखा। राजा ने अपने स्‍तर को और गिराते हुए इस बात की घोषणा की कि जिसका कोई पागल या अपाहिज या किसी गंभीर बीमारी से पीडित कोई बच्‍चा हो , तो उसे बलि के लिए भेजा जाए , वह भी इनाम का हकदार होगा।

इनाम की राशि पर कोई ध्‍यान न देते हुए उसके बाद तो अभिभावक पागल और बीमार को अधिक छिपाकर रखना शुरू किया , ताकि राजा की दृष्टि न पड जाए और उसकी बलि न दे दी जाए। राजा परेशान चल ही रहा था कि चौथे वर्ष फिर बलि के लिए सपना आ गया। बलि के लिए किसी मनुष्‍य की खोज में राजा अनिश्चित दिशा की ओर चल पडे। इसके बाद कमर्शियल ब्रेक हुआ , और फिर एंकर की बातों से मालूम हुआ कि दरअसल बलि के बहाने भगवान की इच्‍छा तो राजा को एक सीख देने की थी। उत्‍सुकता और बढी , पर उसके बाद कहानी जैसे ही शुरू हुई , मेरे कालोनी की बिजली गायब । मेरी उत्‍सुकता बनी हुई है कि इससे आगे हुआ क्‍या ? आप पाठकों में से किसी ने इसे देखा हो , तो मेरी जिज्ञासा का समाधान करें कि बलि के बहाने आखिर राजा को क्‍या सीख मिली ?

इस कहानी के कारण कल से ही इस गंभीर विषय पर चिंतन चल रहा है कि जान कितनी प्‍यारी चीज होती है , अपनी भी और अपने परिवार वालों की भी , पर अपराधियों के लिए किसी की जान लेना कितना आसान होता है , गाजर मूली की तरह काट और भून डालते हैं लोगों को। वैसे तो प्रतिदिन मार काट की घटनाओं से अखबार और न्‍यूज चैनल अटे पडे रहते हैं , पर आज एक खास घटना की वजह से दिमाग बहुत तनाव में आ गया है। धनबाद से अपहरण किए गए एक बच्‍चे की हत्‍या किए जाने का समाचार सुनकर आज मेरा मन बहुत दुखी हो गया है। उसकी सूचना मुझे उसके स्‍कूल में पढनेवाले बहन के लडके से मिल रही है। मात्र 8 वर्ष की उम्र के इस बच्‍चे को अपराधियों ने किस बात की सजा दी , समझ में नहीं आता।

दस वर्ष पूर्व की एक घटना की याद पुन: मन को तकलीफ दे रही है , जब मेरे बडे बेटे के साथ पढनेवाले एक बच्‍चे का अपहरण उसी की कालोनी के अपराधी किस्‍म के कुछ बडे बच्‍चों ने किया था और आजतक उसका कुछ भी पता न चल पाया। अपराधियों को कोई सजा भी हो जाए , तो बच्‍चे तो अब लौट नहीं सकते । कैसे जी पाते होंगे उन बच्‍चों के माता पिता ? काश अपराधी उनके कष्‍टों को समझ पाते ?
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आ न पाये अन्धेरे का साया कभी, चाँद, सूरज, सितारों सा रौशन रहे

सभी ब्लॉगर्स

बन्धु बान्धवियों को

दीपोत्सव की लाख लाख बधाइयाँ

हार्दिक बधाइयाँ


______कामना कर रहा हूँ दिवाली पे मैं


______घर सभी का बहारों सा रौशन रहे


______
पाये अन्धेरे का साया कभी


______
चाँद, सूरज, सितारों सा रौशन रहे



मेरी ओर से सभी को

ये मधुर उपहार

इसमें रंग हैं पर विषैले नहीं हैं

माधुर्य है पर मिलावटी मावे का नहीं है

इसका सेवन करने से वज़न भी नहीं बढेगा............

टिप्पणी करने का कोई पैसा भी नहीं लगेगा

तो

दीपोत्सव पर अलबेला की अलबेली भेन्ट..


poems from heart


Poet Albela Khatri , Poem , Poetry, Comedy, Hasya Kavita, Gazal,


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