Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

शुभकामनायें स्‍वीकार करें पर टिप्‍पणी देने में न समय खराब करें (अविनाश वाचस्‍पति)

बटोर लें
बांट दें
सभी
कामनायें
आनंद देती हैं।


पोस्‍ट तो लिखें
पर टिप्‍पणी न दें
समय बहुत कम है
आंकड़े देखकर
रीडरशिप के
खुश हो लेंगे।

शुभकामनायें होती हैं
तभी शुभ जब
बेरोकटोक पहुंचती हैं।

पसंद भी न चटकायें
पोस्‍ट भी न खोलें
सिर्फ नजर घुमायें
शुभ हो जायें।

आपका देखना
सिर्फ देखना भर
मन में संतोष
भर देता है
टिप्‍पणी न देखकर
जिसे आये रोष
वो मैं नहीं
कोई और होता है ?

मुझे तो पड़ोसी की
खुशी में खुशी
और दुख में दुख
होता है
और
मेरे पड़ोसी के
बारे में
पड़ोसी ही जाने।

अन्‍य ब्‍लॉग पर
देख टिप्‍पणी
अपने ब्‍लॉग पर
होने का सुकून
मिलता है।

पर नहीं दे पाता हूं
टिप्‍पणी जब
तब मुझे दुख
जरूर होता है
पर समय
मजबूर होता है
कम होता है
वैसे पोस्‍ट में तो
सभी की ही
खूब दम होता है।

स्‍वीकार लें
मेरी शुभकामनायें
जो आपकी पोस्‍टों पर
पसंद के तौर पर
बेपढ़े ही चटकाई
जा चुकी है।
Read More...

लिखें इबारत

मुबारक
क्‍कीस का






नए साल के
नर्म गाल पे,
आओ मलें सब
रंग गुलाल के !


नए साल की
मस्‍त ताल पे,
रचें गीत हम
कुछ धमाल के !


नए साल के
हरेक काल पे,
रखें याद हम
सपने हाल के !


नए साल में
हों कमाल के,
समाधान कुछ
ज्‍वलंत सवाल के !


नए साल के
उजले भाल पे,
लिखें इबारत
नए ख्‍याल से !


0 राजेश उत्‍साही


Read More...

यह साल राजेंद्र अवस्थी को भी छीन ले गया

मशहूर पत्रकार और साहित्यकार राजेंद्र अवस्थी नहीं रहे। उनका आज सुबह दिल्ली में निधन हो गया। वे पिछले कई दिनों से एस्कोर्ट हास्पिटल में वेंटिलेटर पर थे। कुछ दिनों पहले तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें भर्ती कराया गया था। कल उनका स्वास्थ्य काफी सुधर गया था पर आज सुबह अचानक उनकी सांसें थम गईं। 79 वर्ष के राजेंद्र अवस्थी का पांच-छह महीने पहले हृदय की बाइपास सर्जरी हुई थी। कादंबिनी, नंदन, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका के संपादक रहे राजेंद्र अवस्थी ने जंगल के फूल जैसा उपन्यास लिखकर काफी नाम कमाया। इसी उपन्यास के कारण उन्हें फणीश्वरनाथ रेणु के बराबरी का आंचलिक उपन्यासकार माना जाने लगा। जंगल के फूल उपन्यास आदिवासियों की जिंदगी पर आधारित है। भड़ास4मीडिया से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन कहते हैं कि जंगल के फूल जैसे उपन्यास पर फिल्म बननी चाहिए ताकि राजेंद्र के काम को दुनिया जान सके। पंडित सुरेश नीरव बताते हैं कि राजेंद्र जी का जाना हिंदी साहित्य के एक युग का अवसान है।
पूरी खबर यहाँ पढ़ें -----http://www.bhadas4media.com/
Read More...

भगवान का इंटरव्यू (अविनाश वाचस्‍पति)

आप भगवान को जानते हैं
उससे भी बड़ा प्रश्‍न है मानते हैं
या अपनी जिद को ही ठानते हैं
न मानते हैं
न मानने देते हैं
पर अब तो आपको मानना ही पड़ेगा
यूं ही अब तक तो चलता रहा
पर अब यूं ही नहीं चलेगा


भगवान ने इस बरस जाते जाते
मुझे एक इंटरव्‍यू दिया है
खूब शब्‍दों को भर भर कर जिया है
जिसका प्रसारण सिर्फ ब्‍लॉग पर होगा
उसके ट्रांसक्रिप्‍शन का कार्य चल रहा है
फिर उसमें संपादन
...
नहीं ... संपादन तो संभव नहीं है
यूं का त्‍यूं ही पेश किया जायेगा
पर ट्रांसक्रिप्‍शन जरूरी है
वो सुनाई नहीं देगा किसी और को
यही तो मजबूरी है
उसके ट्रांसक्रिप्‍शन में मैं व्‍यस्‍त हूं
पर घनघोर नहीं
और कार्य भी कर रहा हूं
इसलिए अगले बरस ही पढ़वा पाऊंगा
मैं तो मिल लिया
पर आपको मिलवाऊंगा
तो मिलने को रहिएगा तैयार।

अपनी आस्‍था और श्रद्धात्‍मक टिप्‍पणियों का
देना भगवान को उपहार
कर सकते हो आलोचना भी
वैसे भगवान की इन टिप्‍पणियों पर
मॉडरेशन लागू नहीं होगा
पर अगर कोई भयावह टिप्‍पणी करेगा
तो वो स्‍वयं ही हवा हो जायेंगी


भगवान का इंटरव्‍यू
ब्‍लॉगरों के लिए दवा हो जाएगी
उसमें बतलाये हैं भगवान ने
ऐसे ऐसे नुस्‍खे
जिससे पोस्‍टों पर मिलें
खूब सारी टिप्‍पणियां
पर जरूरी नहीं
कि सब ही हों बढि़या।

निश्‍चय आप बाद में ही कीजिएगा
पहले पोस्‍ट का इंतजार
और बाद में आप भगवान को
टिप्‍पणियों का इंतजार करवाइयेगा
परंतु ब्‍लॉगवाणी, चिट्ठाजगत पर
पसंद चटकाइयेगा
ब्‍लॉगप्रहरी के पास लौट लौट कर
आइयेगा।
Read More...

चर्चा में पढ़ देते हैं पर्चा : उधर के लोग - अजय नावरिया


करते हैं चर्चा गोष्‍ठी
और पढ़वाते हैं पर्चा
उधर के लोग
ऐसे ही होते हैं
जगते हुए भी
लगते सोते हैं।

है उपन्‍यास
उधर के लोग
पढ़ते हम भी पर्चा
पर कैसे पढ़तें
करने के लिये चर्चा
पढ़ना पढ़ता है उपन्‍यास
जो अभी तक
नहीं है मेरे पास।

उधर के लोग
क्‍या ऐसे ही होते हैं ?
कैसे होते हैं
उधर के लोग
अगर आप जानना
चाहते हैं
तो क्‍यों नहीं
हिन्‍दी भवन के समीप
बी टी आर भवन में
बुधवार 30 दिसम्‍बर 2009
को सायं 4 बजे चले आते हैं।

उधर के लोग
इधर के लोग
यह उधर या इधर
होना है कैसा रोग ?
Read More...

चिट्ठाजगत की छुट्टी खत्म...लौट आया

लो जी चिट्ठाजगत की छुट्टी खत्म हुई
लौट आया है ये
अब फिर छापेगा धड़ाधड़
आओजी स्वागत है
:-)
Read More...

पी डी एफ फाईल का लिंक कैसे बनायें (अविनाश वाचस्‍पति)

मैं बतला नहीं रहा हूं
जानना चाह रहा हूं
समझ लीजिए
पूछ रहा हूं।

जो विज्ञ हैं
उनसे गुजारिश है
जानने की ख्‍वाहिश है।

जैसे है यह
कैसे बनता है
http://iffi.nic.in/2009/iffidaily09.htm
Read More...

एक अकेली मैं हूँ और साथ मेरे मेरी तन्हाई

एक अकेली मैं हूँ और साथ मेरे मेरी तन्हाई
रात घिरी निस्तब्ध मगर मुझे नींद ना आई
दिलो को चीरते हैं खामोशियों के पसरे सन्नाटे
खोया खोया चाँद भी गुमसुम ख़ामोशी छाई !


पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए
Read More...

हरियाणा में सिनेमा संस्‍कृति के लिये हर संभव प्रयास किये जाने चाहियें – कुमारी शैलजा


भारत सरकार की आवास एवं शहरी गरीबी उन्‍मूलन तथा पर्यटन मंत्री कुमारी शैलजा ने आज एक भव्‍य किंतु गरिमामय समारोह में द्वितीय हरियाणा अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह का शुभारंभ किया। डी ए वी कॉलेज फॉर गर्ल्‍स परिसर में आयोजित उद्घाटन समारोह में उन्‍होंने कहा यह फिल्‍मोत्‍सव हरियाणा में फिल्‍म संस्‍कृति के निर्माण में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायेगा। यह सही है कि देश में हरियाणा कृषि के कारण जाना जाता है संस्‍कृति के कारण नहीं। खुशी की बात है कि इस फिल्‍मोत्‍सव से भारत और दुनिया भर में हरियाणा की एक नई छवि विकसित हो रही है। उन्‍होंने इस शुरूआत को साहसिक और ऐतिहासिक बताते हुये कहा कि हरियाणा में अलग-अलग छह संस्‍कृतियां साथ-साथ रहती हैं। यह सिनेमा के विकास के लिये एक अच्‍छी बात है। उन्‍होंने आश्‍वासन दिया कि एक मंत्री के रूप में वे हरियाणा में फिल्‍म-संस्‍कृति के विकास के लिए हर संभव कोशिश करेंगी।
उद्घाटन समारोह के बाद आयोजित एक विशेष संवाददाता सम्‍मेलन को संबोधित करते हुये उन्‍होंने कहा कि फिल्‍म एप्रीसियेशन कोर्स से नई पीढ़ी में भारतीय और विश्‍व सिनेमा की बेहतर समझ विकसित होगी। एक सवाल के जवाब में उन्‍होंने कहा कि इससे भारतीय मनोरंजन उद्योग में रोजगार की बढ़ती संभावनाओं का लाभ छात्र-छात्राओं को मिलेगा। उन्‍होंने कहा कि वे निजी स्‍तर पर भी इस फिल्‍मोत्‍सव के लिये धन जुटाने का प्रयास करेंगी।
डी ए वी कॉलेज फॉर गर्ल्‍स की प्रिंसीपल डॉ. सुषमा आर्य ने सभी का स्‍वागत करते हुये कहा कि ऐसे फिल्‍मोत्‍सव के आयोजन के लिये बहुत बड़े पैमाने पर संसाधनों की जरूरत होती है। कॉलेज ने सीमित संसाधनों में इतना बड़ा फेस्टिवल आयोजित करके सचमुच एक नई मिसाल पेश की है।
फेस्टिवल के निदेशक अजित राय ने यमुना नगर के नागरिकों को धन्‍यवाद देते हुये कहा कि उनके सहयोग और समर्थन के कारण ही इतना बड़ा समारोह आयोजित हो सका है। उन्‍होंने कहा कि सिनेमा की दुनिया हवाई जहाज और फाइव स्‍टार से नीचे नहीं उतरती। एक अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म फेस्टिवल के आयोजन में करोड़ों रुपये लगते हैं और सैकड़ों लोग महीनों काम करते हैं। उन्‍होंने कहा कि हमने दूसरे साल एक पूर्ण रूप से व्‍यवस्थित फेस्टिवल का ढांचा खड़ा कर दिया है।
सुप्रसिद्ध फिल्‍मकार के. बिक्रम सिंह ने सिनेमा को बीसवीं शताब्‍दी की सबसे महत्‍वपूर्ण कला बताते हुये कहा कि इसमें संगीत, नृत्‍य, रंगमंच, चित्रकला सहित सभी कलायें शामिल हैं। उन्‍होंने कहा कि हरियाणा ने सिनेमा के क्षेत्र में अभी तक कोई ऐसा महत्‍वपूर्ण काम नहीं किया है जिसका उल्‍लेख किया जा सके। यह समारोह इस दिशा में सोचने की पहल करेगा।
सुप्रसिद्ध निर्देशक एवं लेखक रंजीत कपूर ने कहा कि जब पहली बार राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र के रूप में 1974 में मिट्टी की गाड़ी नाटक लेकर वे यमुना नगर आये थे तब और अब में जमीन आसमान का फर्क है। उन्‍होंने कहा कि हमें हर बात के लिये सरकारों पर निर्भर नहीं रहना चाहिये। यह फेस्टिवल कई नई उम्‍मीदें जगाता है।
इस अवसर पर कॉलेज की छात्राओं ने हरियाणवी आर्केस्‍ट्रा, हरियाणवी लोकगीत एवं हरियाणवी नृत्‍य के आकर्षक कार्यक्रम पेश किये। उद्घाटन समारोह के बाद द्वितीय हरियाणा फिल्‍म फेस्टिवल की अफगानिस्‍तान की फिल्‍म ओसामा (निर्देशक सिद्धिक बर्मक) दिखाई गई।
Read More...

नुक्‍कड़ सर्वोत्‍तम बाल कविता सम्‍मान परिणाम : तृतीय पुरस्‍कार से श्री विनोद कुमार पांडेय की बाल कविता सम्‍मानित



आज श्री विनोद कुमार पांडेय का जन्‍मदिन है
श्री विनोद कुमार पांडेय की तृतीय पुरस्‍कार से संयुक्‍त तौर पर सम्‍मानित बाल कविता

पप्पू,पापा जी से बोला
पापा एक सवाल बताओ,
इतना उपर उड़ जाता है,
कैसे गुब्बारा समझाओ.

पापा बोले ,बेटा पप्पू,
सही सवाल ढूढ़ कर लाओ,
ऐसे उल्टे प्रश्नों में तुम,
अपने को मत यूँ उलझाओ.


गुब्बारे में गैस भरी.है.,
सो वो उड़ता है,जाता ,
इतनी अकल नही है बुद्धू,
थोड़ा सा तो अकल लगाता.

एक मिनट फिर सोचा पप्पू,
फिर से अपना अकल .लगाया,
पापा जी के पास में जाकर,
वहीं प्रश्न फिर से उलझाया.

बोला गैस में इतना दम है,
ऐसे गुब्बारे लहराते?,
वहीं गैस गर हम भी, पी लें,
तो क्या हम भी यूँ, उड़ जाते.

अगर असर सचमुच में है तो,
क्यों तुम ऐसे चिल्लाते हो,
गैस पेट में जब बनती है,
बोलो क्यों? ना उड़ जाते हो.

पापा बोले, ये पप्पू जी,
तुम हो हमसे बड़े महान,
जाओ जाकर सो जाओ अब,
कभी नही मैं दूँगा .ज्ञान.
Read More...

नुक्‍कड़ सर्वोत्‍तम बाल कविता सम्‍मान परिणाम : तृतीय पुरस्‍कार से श्री समीर लाल की बाल कविता सम्‍मानित


श्री समीर लाल की तृतीय पुरस्‍कार से संयुक्‍त तौर पर सम्‍मानित बाल कविता
चूं चूं, चीं चीं


एक है चिड़िया-
चूं चूं करती
चूं चूं करती
चीं चीं करती

नाम है उसका बोलू
इस डंडी से उस डंडी पर
उड़ती फिरती
कभी न गिरती

फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फिर दूजी चिड़िया भी आई

चूं चूं करती
चीं चीं करती
उड़ती फिरती

फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र

नाम बताया मोलू
झूले में वो झूल रही है
खुशी खुशी से बोल रही है
मेरी यार बनोगी, बोलू?

चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
दोनों ने यह गाना गाया
कूद कूद के खाना खाया
तब तक तीजा दोस्त भी आया

नाम जरा था अलग सा पाया
हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई
चिड़ियों ने यह जात न पाई
जिसने पाला उसकी होती
उसी धर्म का बोझ ये ढोती
मुस्लिम के घर रह कर आई

एक नहीं पूरे दो साल
ऐसा ही तो नाम भी उसका
सबने कहा उसे खुशाल
वो भी झूला उस झूले पर
इस झूले पर, उस झूले पर

हन हन हन हन
घंटी वो भी खूब बजाता
ट्न टन टन टन
फिर सबके संग खाना खाता
मिल मिल करके गाना गाता

चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं

तीनों सबको खुश रखते हैं
ठुमक ठुमक के वो चलते हैं
खुशी में होते सभी निहाल
बोलू, मोलू और खुशाल!!

हम भी मिलकर
गाना गाते
चूं चूं, चीं चीं
चूं चूं, चीं चीं
उड़ते जाते

फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र
Read More...

बचत खाते में औसत राशि का क्या मतलब होता है और इसकी गणना कैसे की जाती है ?? (What is Average Balance in Saving Account.. and calculations )

आजकल लगभग सभी बैंकों के बचत खातों में औसत राशि रखना होती है।


पहले यह न्यूनतम राशि होती थी। पर बैंकें यह औसत राशि की गणना कैसे करती हैं, आपको यह पता है, आईये देखते हैं -

औसत राशि - एक तिमाही में आपने रोज जो भी बैलेन्स अपने बचत खाते में रखा है, उस तिमाही के बैलेन्स का
औसत औसत राशि होती है।

आईये एक उदाहरण द्वारा इसे देखते हैं -

मान लीजिये कि किसी बैंक में औसत राशि बचत खाते के लिये ५००० रुपये है एक तिमाही के लिये  -

जनवरी माह में -

१ जनवरी को खाते में बैलेन्स है ५००० रुपये।
५ जनवरी को सैलेरी जमा हुई २५००० रुपये तो बैलेन्स हुआ ३०००० रुपये।
१० जनवरी को खाते में से आपने २०००० रुपये निकाल लिये तो बैलेन्स हुआ १०००० रुपये।
१५ जनवरी को खाते में से फ़िर १०००० रुपये निकाल लिये तो बैलेन्स हुआ ० रुपये।



पूरा लेख पढ़ने के लिये यहाँ चटका लगाईये ।
Read More...

नुक्‍कड़ सर्वोत्‍तम बाल कविता सम्‍मान परिणाम : द्वितीय पुरस्‍कार से श्री अनिल चड्ढा की बाल कविता सम्‍मानित


डॉ. अनिल चड्ढा की द्वितीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित बाल कविता


एक नन्ही-मुन्नी के प्रश्न





मैं जब पैदा हुई थी मम्मी,
तब क्या लड्डू बाँटे थे ?

मेरे पापा खुश हो कर,
क्या झूम-झूम कर नाचे थे ?

दादी-नानी ने क्या मुझको,
प्यार से गोद खिलाया था,

भैया के बदले क्या तुमने,
मुझको साथ सुलाया था ?

प्यार अग़र था मुझसे माँ ,
तो क्यों न मुझे पढ़ाया था ?

मनता बर्थ-डे भैय्या का है,
मेरा क्यों न मनाया था ?

था करना मुझसे भेदभाव,
तो दुनिया में क्यों बुलाया था ?

क्या मैं तुम पर भार हूँ माँ ?
फिर तुमने क्यों ये जताया था ?

तुम भी तो एक नारी हो,
क्या तुमने भी यही पाया था ?

ग़र तुमने भी यही पाया था ?
तो क्यों न प्रश्न उठाया था ?

अपने वजूद की खातिर माँ,
क्यों मेरा वजूद झुठलाया था ?

तुमने अपने दिल का दर्द,
कहो किसकी खातिर छुपाया था ?

मैं तो आज की बच्ची हूँ ,
मुझको ये सब न सुहाता है,

इस दुनिया का ऊँच-नीच,
सब मुझे समझ में आता है ।

इसीलिये तो अब मुझको,
आँधी में चलना भाता है,

मेरी तुम चिंता मत करना,
मुझे खुद ही संभलना आता है ।
Read More...

शायद ...इसीलिए परियां अब इस ज़मीन पर नहीं आती

कल का दिन मुझे व्यथित  कर गया | एक मित्र महोदया ने एक अजन्मी बच्ची की हत्या कर दी क्यूंकि उनको अपनी पहली संतान के रूप में एक बिटिया नहीं चाहिए थी कैसी त्रासदी है जब पढ़े लिखे जागरूक लोग ऐसी मानसिकता रखते हैं तो बाकि लोगो से कोई क्या उम्मीद रहे?
यक्ष प्रश्न .......क्या शिक्षा ने यही जागरूकता दी हमे ???????



दिल ए रेगिस्तान में फंसी, जिंदगी के मिराज में भटकती
नाउम्मीदी होगी हासिल, मालूम है इनको अपनी हस्ती !
उम्मीदों के बादल की बरखा टीस का पानी बन झड जाती
शायद ...इसीलिए परियां अब इस ज़मीन पर नहीं आती !


पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए


भी मित्रो से एक विनम्र निवेदन ~
अगर कुछ लोगो भी ये गुनाह कर पाने से हम रोक पाए
तो लगेगा की अब भी कुछ इंसानियत जिंदा है कहीं
कृपया इस पोस्ट का लिंक  को अपने सभी मित्रों को भेजे
शायद इस सोते हुए समाज को कुछ जागरूक कर पायें 
Read More...

नुक्‍कड़ सर्वोत्‍तम बाल कविता सम्‍मान परिणाम

प्रथम पुरस्‍कार की घोषणा और कविता पहले ही पोस्‍ट की जा चुकी है।
विजेता सुधीर सक्‍सेना 'सुधि'

द्वितीय : अनिल चड्ढा को उनकी बाल कविता शीर्षक ‘एक नन्ही मुन्नी के प्रश्न ’ के लिए

तृतीय : विनोद कुमार पांडेय को उनकी बाल कविता शीर्षक ‘पप्पू् पापा जी से बोला’

और

तृतीय : समीर लाल को उनकी बाल कविता शीर्षक ‘चूं चूं चीं चीं’ के लिये संयुक्‍त तौर पर

दो सांत्‍वना पुरस्‍कार

बलराम अग्रवाल को उनकी बाल कविता शीर्षक ‘गिनती का गीत’
और
अमर बरवाल ‘पथिक’ को उनकी बाल कविता शीर्षक ‘भगवान तुम भी अगर कभी स्कूल गए होते’ के लिये
निर्णायक मंडल की संस्‍तुति पर सहर्ष घोषित किये जाते हैं। इन कविताओं को आप शीघ्र ही नुक्‍कड़ पर पढ़ पायेंगे।
सभी विजेताओं से अनुरोध है कि वे अपना नाम, पूरा पता, ई मेल,ब्‍लॉग पते, मोबाइल नंबर और चित्र शीघ्र anreporter@gmail.com और avinashvachaspati@gmail.com पर भिजवाने का कष्‍ट करें।
एक बार फिर से सभी प्रतिभागियों और विजेताओं को जोरदार बधाई।
Read More...

काश ... ज़िन्दगी ख्वाब ही होती तो अच्छा होता

 लड़की की इच्छा क्या है , बस इक पानी का बुलबुला है
बनना चाहती है बहुत कुछ,करना चाहती है बहुत कुछ !
जाना चाहती हैं यहाँ वहां, देखना चाहती है सारा जहाँ
कल्पनाएँ करती रहती है ,सोचना चाहती है बहुत कुछ !


पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए
Read More...

बचत खाते से ज्यादा ब्याज कैसे प्राप्त करें, स्वीप इन जमा खाता एक बेहद उम्दा रास्ता...

बचत खाता तो सबके पास होते हैं और सभी लोग उसका उपयोग करते हैं। परंतु बचत खाते में कितनी रकम रखना चहिये और कितनी उसमें से निकालनी चाहिये इस पर कभी भी सोच नहीं पाते हैं।

पर अगर आपको ऐसी सुविधा वाला बचत खाता दे दिया जाये कि आप जो भी रकम सावधि जमा खाते में है, वह आप अपने बचत खाते के माध्यम से निकाल सकते हैं तो.... आपको ज्यादा रकम अपने बचत खाते में रखना भी नही पड़ेगी और ब्याज का नुकसान भी नहीं होगा। अगर बचत खाते में रकम रखते हैं तो ३.५% ब्याज मिलता है, वो भी उस न्यूनतम शेष राशि पर जो कि महीने की ११ से ३० तारीख के मध्य आपके बचत खाते में होगी।

इस तरह की सुविधा क्या सभी बैंकों में उपलब्ध है, जी हाँ ……
पूरा पढ़ने के लिये यहाँ चटका लगाईये।

विवेक रस्तोगी
Read More...

परी हूं मैं यहाँ, बस यूँ ही रहने दो मुझे मेरे ही ख्यालों में

"परी हूँ मैं" हाँ परी ही तो हूँ ,हूँ पर अपने ही कुछ खयालो में
घबराई सकुचाई तनहा हूँ ,किस्मत के अनसुलझे सवालों में !
आफताबी रेशम से बुनती हूँ ,लाखों सुनहरी झिलमिल ख्वाब
रहती हूँ तारों में बसे आसमानी शहर के चाँद आशियाने में !

पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए
Read More...

१८ दिसंबर को मुंबई आ रहा हू.

दोस्तो, १८ दिसंबर को मुंबई आ रहा हू.

करीब ६-७ दिन वहा रहकर २४ दिसंबर को वापसी का मन है,

इस बीच कुछ अंतरजाल के दोस्तों से बात हो रही है,

कुछ मिलेंगे कुछ शायद नहीं मिल पाए.

लेकिन मेरा प्रयास होगा कि अधिक लोगो से मिल सकू.

जो ब्लोगर साथी मिलने का मन रखते है उनका स्वागत है.

मुझे ०९००१८९६०७९ पर सन्देश दे या बात कर सकते है.

.
Read More...

नेटबुक कौन सी लूं ? (अविनाश वाचस्‍पति)


लैपटाप भारी
बैटरी बैकअप कम
नेटबुक सस्‍ती
बैटरी बैकअप ज्‍यादा।

लैपटाप का रेट
टॉपोटाप
नेटबुक का कम
यही लब्‍बोलुआब।

पता नहीं
इसमें क्‍या है
और क्‍या नहीं
घूम रहे हम।

लैपटाप कंधा तोड़ता है
नेटबुक सबसे जोड़ता है
क्‍या करूं
क्‍या लूं ?

नाम बहुत सारे
ब्रांड एसर, कॉम्‍पैक,एच पी
लेनोवो, डेल, के नजारे
बेनामी इसमें होते नहीं
यह ब्‍लॉगरों की फौज नहीं
जो लेती है मौज यहीं।

नेटबुक रसगुल्‍ला है
तो
रसगुल्‍ला कौन सा लूं ?
Read More...

अभिव्‍यक्ति साप्‍ताहिक पत्रिका में काले का बोलबाला (अविनाश वाचस्‍पति)

आज दुनिया भर में काले बनने बनाने का फितूर छाया हुआ है। अभी कुछ अर्सा पहले तक जो कंपनियाँ गोरेपन को तरह-तरह की क्रीमों के जरिए भुना रही थीं, उन सभी को सावधान हो जाना चाहिए। नई क्रीमें बाज़ार में निकल पड़ी हैं जो कहती हैं- कालिमा क्वीन, ब्लैक एंड लवली क्रीमों को अपने चेहरों पर पोतें और इतने चमकदार हो जाएँ कि गोरापन भी शर्मा जाए।

साल भर पहले अमेरिका में ओबामा के राष्‍ट्रपति बनने से रंगों के क्षेत्र में जो काली क्रांति हुई है उसने दुनिया को पलटकर रख दिया है। चहुँ ओर काले का बोलबाला हो गया है। ओबामा ने इस बरस शांति का नोबेल पुरस्‍कार प्राप्त कर के इस बात को और भी पक्का कर दिया है कि काले का महत्त्व गोरे से कितना अधिक है। काले रंग की इस बहार से हर रंग उड़ता हुआ नज़र आ रहा है। हरी भरी सब्ज़ियों का ज़माना बीतने को है। जल्‍दी ही काली काली ज़ायकेदार पौष्टिक सब्ज़ियाँ आपको सब्‍ज़ी मंडी रस आ रहा हो तो पूरा पढ़ने के लिए क्लिक कीजिएगा
Read More...

नैनो प्रकरण-२

कोलकाता की सङकों पर अब चौबीस घंटा जाम रहने लगा है. औसतन दो व्यक्ति कार-बसों की चपेट में आकर जान गंवाते हैं. गाङियों की पार्किंग की समस्या है. मेम साहब बन-ठन के बाज़ार जाय, होटल या सिनेमा जाये, तो गाङी को २ – ३ किलोमीटर दूर पार्किंग को जगह मिलती है. एक घंटे बाद ही गाङी निकालना संघर्ष का काम होता है, तब तक आगे-पीछे, दांयें-बायें और गाङियाँ लग चुकी होती हैं. क्षमतासे चार-पाँच गुना वाहन हैं सङकों पर. इससे बिगङने वाला पर्यावरण अलग... जीना मुहाल है. अब लखटकिया नैनो आयेगी!
इतने मे घबरा गये,बारी है नैनो की.
लाखों गाङी आ रही, हालत क्या हो सङ्क की.
क्या हालत हो सङक की,सांसे घुट जायेगी.
खुद टाटा को अपनी नानी याद आयेगी.
कह साधक सीएनजी हो या तेल-पेट्रोल.
निकल जायेगा इंसानों का तेल-पेट्रोल.
पैसा-सत्ता-बाहुबल,राक्षसी गठ-जोङ .
जनता को हैं लूटते, मचा-मचा कर होङ .
मचा-मचा कर होङ ,करोङों वारे-न्यारे ,
टाटा चार सौ करोङ, सिंगुर में हारे .
पूछे साधक हिसाब ,जो पलटा दे पत्ता .
एक-लाख में कार ,गजब है-पैसा-सत्ता . १२

टाटा-बिरला-अम्बानी,पैसे का सब खेल .
देश-समाज सब भाङ में,सत्ता से है मेल .
सत्ता से है मेल,विदेशी-दुश्मनों संग,
पींग बढाते हैं ऊँची,यह देश हुआ तंग .
कह साधक,अब देश बचाये कोई बिरला.
सब पैसे के पीछे पागल टाटा-बिरला . १३.

काली सडक पे दौडती, करती हवा को काला
काल बन रहा आज फिर, टाटा नैनो वाला ।
टाटा नैनो वाला, सड़कें जाम करेगा
सस्ती कार, मगर कोई बोलो कहाँ रखेगा
कह साधक कवि पलकों पर नैनो का झूला
कार के पीछे बच्चों की किलकारी भूला ।

गैरेज में कारें भरी, नई डिजायन नित्य
पलना ऊँचे टंग गया, बिसरा जीवन सत्य ।
बिसरा जीवन सत्य, पदार्थ प्रेमी मानव को
यही दिशा प्रेरित करती आई दानव को ।
कह साधक कवि, कारें जीती, बच्चे हारे
नई डिजायन नित्य, भरी गैरेज में कारें ।

ममता कुर्सी मांगती,खेत का लेकर नाम.
वाम-पंथ को भी मिले सत्ता संग आराम.
सत्ता संग आराम,तो कैसे बात मान ले.
टाटा भले चले जायें,चाहे जगत जान ले .
कह साधक कवि, आज धरा संकल्प मांगती,
बदलो यह दुश्चक्र, कि ममता कुर्सी मांगती.१४.


नैनो प्रकरण-२
Read More...

'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात


आज का ही तो दिन था, कुर्ला रेलवे स्टेशन के बाहर 'नुक्कड' पर जब 'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात हुई तो यकीन मानिये ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार किसी व्यक्ति से मिल रहा हूं। सूचना क्रांति के इस दौर की तारीफ तो करनी ही होगी कि उसने बगैर मिले लोगों को आपस में मिला दिया है। दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। औसतन कद-काठी, गले में टंगा चश्मा, कमर में बान्ध रखा बैग, अपनत्व की मुस्कान और मिलनसार व्यक्तित्व की ऊर्जा लिये दमकता चेहरा मेरी आंखों में आज भी कैद है। कैद है कानों में खनकती स्नेहिल आवाज़ और मिलते ही प्रस्फुटित हुए शब्द ' जैसा फोटो में दिखते हो वैसे ही लगते हो', कुछ देर तो मुझे लगा कि सचमुच फोटो और प्रत्यक्ष दिखने में बहुत अंतर होता है। अमूमन तस्वीरें हक़ीक़त बयान नहीं करती, किंतु मुझे अच्छा लगा कि मेरी तस्वीर हक़ीक़त में भी मेरी ही है। खैर.. 'तेताला' से बाहर निकल मुम्बई आए इस इंसान से मैं मिलने का इच्छुक पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां क्लिक कीजिएगा
Read More...

नजर टिकाओ राम-तत्व पर!

आज सुबह ही मुझे किसी मित्र ने सावधान किया कि मैं अपनीए ट्टिपणियों में किसी व्यक्ति का, किसी पोर्टल का या किसी वेब साईट का नामोल्लेख ना करूँ. बताया कि इससे वे नाराज हो सकते हैं. पहले तो मैं चौंका, कि लेखक या संस्थायें क्या इतनी असहिष्णु हो सकती हैं कि नामोल्लेख मात्र से भङक जाय, भले वे जमके किसी के भी कपङे भरे बाज़ार खींच दे रहे हैं! और अभी तो हम्माम में सभी नंगे वाली हालत है, सब समझते हैं, सब जानते हैं... फ़िरभी यह पर्दादारी! यही दुर्भाग्य है भारत का ( भूषण का नहीं ) . कथनी-करनी भेद ने भारत को ( फ़िर भूषण याद आये!) कहीं का नहीं छोङा. खैर, अभी बात इतनी सी है कि अभी –अभी य्क आलेख पढा है. बाबरी विध्वंस का मूल जिम्मा नेहरू-गाँधी वंश समेत राजीव गाँधी पर दिया है लेखक ने. बहुत शानदार समीक्षा है, लेकिन फ़िरभी समाधान तो कहीं नहीं. समाधान एकपक्षीय नहीं होता, सार्वभौमिक होता है. क्या राम-मन्दिर समस्या का सार्वभौमिक समाधान संभव है? क्या हर पक्ष को मंजूर हो सकने वाला कोई प्रस्ताव आजके ५०० या १००० साल बाद भी बन सकता है? या फ़िर इस प्रश्न को इस प्रकार रखा जाय कि दोनों समुदाय अपने-अपने इतिहास-बोध से छुटकारा पा सकते हैं? क्या दोनों समुयाय अपनी-अपनी पांथिक मान्यताओं से ऊपर उठ सकते हैं?... बात किसी एक के मानने से नहीं बनेगी. बात दोनों की है. बात दोनों के साथ-साथ होने की है. बिल्कुल वैसे ही जैसे गुलाब का फ़ूल काँटों के साथ है. न फ़ूल शिकायत करता है, न काँटा उसे परेशान करता है. बल्कि कभी किसी राजनेता ने फ़ूलको भङकाने की कोशिश की; उसे यह बताने की कोशिश की कि तुम्हारी सुन्दरता के साथ बेमेल भद्दा काँटा कहाँ से आ गया, चलो इसे हटा देते हैं; तो फ़ूल इसका विरोध करेगा. फ़ूल ही क्यों, दोनों एक साथ विरोध करेंगे- काँटा और फ़ूल. क्योंकि दोनों साथ हैं. अब कोई इस उदाहरण से अपनी तुलना करके स्वयं को काँटा मानकर भङक जाय तो कोई क्या करले. बात साथ-साथ होने की चल रही है. न तो काँटा, न तो फ़ूलकी. काँटा और फ़ूल एक दूसरे को अलग जानते ही नहीं. प्रकृति के नियमानुसार साथ हैं. बस हैं. तो क्या ऐसा कोई प्रस्ताव बन सकता है?
मैंने लेखक से इस कुण्डली में यही पूछा है, कि उसके नाम के साथ जो शुक्ल जुङा है, उसके दर्शन तो उसके आलेख में नहीं हैं. नजर बिल्कुल सही है. सारी बातों को आर-पार देख पा रही है, पर शुक्ल वाला भाग अनछुआ क्यों रह गया दोस्त! क्योंकि भ्रमकी स्याही जो पुती है.
सही नजर है प्रेमकी, पर शुक्ल कहाँ है दोस्त!
स्याही भ्रम की है पुती, दिखता केवल गोश्त.
दिखता केवल गोश्त, ये जीवन है अनदेखा.
तभी समस्या, समाधान का मुँह ना देखा.
कह साधक कवि नजर टिकाओ राम-तत्व पर.
वहीं शुक्ल है दोस्त! प्रेम की सही जहाँ नजर.
नाम तो ठीक मगर प्रेम को भी ठीक से नहीं जाना. अब मैं क्या करूँ.. नाम तो आता ही है. प्रेम न आये... तो क्या आये? पहले भी जितना लिखा सब लेखकों के लिये और स्वयं अपने लिये लिखा. लगता है कि लेखक अपनी पोस्ट देकर उसपर आई प्रतिक्रियायें नहीं देखते. जिसने मुझे टोका, दूसरों के लिये टोका. अपने यश पर आँच आती हो तो हर कोई वन्त बन जाता है. मेरा स्वयं का अनुभव भी यही है. किसी को भारत का भूषण बताना चाहा तो इसी बात पर भङक गये, कि मैं भारत भूषण नहीं हूँ. अब उनके लिये भी ऐसा की कोई आलेख बनाना पङेगा. आखिर सँवाद तो बनाना ही है. सँवाद बनाना है, क्यों कि सारा समाधान संवाद से ही बनता है. समझ सँवाद से बनती है. वरना तो सारा विवाद है. वाद वही जो सँवाद बनाये. सँवाद बने तो बात बने. सँवाद बने, सही समझ का सँवाद बने तो संसद, वरना दल-दल. सँवाद बने तो कोप, वरना नो होप. सँवाद बने तो धरा स्वर्ग, वरना..... ..... साधक-उम्मेद
Read More...

समझो पर्यावरण को !

विकसित देश धरती के दर्द को नहीं समझ सकते. कारण भी स्पष्ट है. उनके जीने का ढंग ही प्रकृति-विरोधी है. उनका दर्शन कहता है कि अस्तित्व परस्पर विरोध पर टिका है, जबकि अस्तित्व स्वयं ही सह-अस्तित्व है. प्रकृति में सहयोग है, न कि विरोध. सारी कायनात परस्पर सहयोगी है, सिवाय मानव के.... सिवाय भ्रमित मानव के. पश्चिम के पास वह भाषा ही नहीं है जो जीवन को समझ सके, व्याख्यायित कर सके. धरती का दर्द भारत समझता है, (इंडिया नहीं, वह तो पश्चिम की ही भौंडी नकल मात्र है ), इसीलिये भारत ने विकास के इस माडल को नकार दिया है. नैनो का साणंद मे विरोध संकेत है, चेतावनी है सारे तन्त्र को जो विकास के पश्चिमी माडल का विकल्प सुनना ही नहीं चाहते. पहले सिंगुर से भगाया, अब साणण्द में भी प्रतिरोध का स्वर उठने लगा है.
साणंद में भी हो गया, नैनो का प्रतिरोध.
समझ गई जनता स्वयं,तभी हुआ गतिरोध.
हुआ तीव्र प्रतिरोध, कि पर्यावरण बचाने.
कार्बन उत्सर्जन से धरती माँ को बचाने.
साधक इस विकास माडल का अन्त हो गया.
नैनो का प्रतिरोध साणंद में भी हो गया.

मैंने सिंगुर प्रकरण पर पचासेक कुण्डलियाँ लिखी थी. यब मैं कोलकाता में था, वहाँ के स्पन्दन महसूस कर पाता हूँ. अभी राजस्थान के इस छोटे से कस्बेमें बैठा वही स्पन्दन अनुभव कर रहा हूँ. यदि मशीन फ़ोर्मेट करते समय वे कुण्ड्लियाँ नष्ट ना हो गई होंगी, तो आप पाठकों/दर्शकों को मिल जायेगी. अभी इतना ही.... साधक उम्मेद.
Read More...

आज की डायरी से-

१०-१२-२००९,प्रातः ८ बजे = कल दिनभर कम्प्युटर, दिनचर्या अस्त-व्यस्त, फ़ोन आये, मैंने नहीं किया. सिर्फ़ स्नेहको बताया कि तुम्हारे बिना ऐसा बेहाल है. खाना भी दोनों समय हनुमानजी के हाथ की बनी बाजरे की मीठी रोटी-दही खाया. ब्लाग पर काफ़ी आलेख पोस्ट किये. विस्फ़ोट, लोकमंच और हिन्दी ब्लाग्स पर एक भी आलेख बिना ट्टिपणी के नहीं छोङा. अपने ब्लाग पर कुछ और उपकरण सजाये, बाकी सजाने की विधा जानी. यु-ट्युब से पा-फ़िल्म लेनी चाही, नीतेशसे सीखूँगा. मेरा एक पूरा डोकूमेन्ट गायब हुआ, कल नीतेश को आना था, नहीं आया. बाबूदानजी आये, खेत का औजार जेरणी बनवा कर लाये. काम कुछ नहीं सत्संग-चाय चली.
आज प्रातः ३-३० पर जाग गया. ६-३० तक कम्प्युटर, फ़िर साफ़-सफ़ाई, नाश्ता, पानी भरा और कम्प्युटर. दिनचर्या के छोटी-छोटी बातें जीवन-जागृति में सहायक बन रही हैं. १- आज टंकी का पानी चढाया, बह गया, काफ़ी पानी बेकार गया. इन दिनों एक-एक बूँद पानी का सदुपयोग चल रहा है. पानी नीली में ना बहकर बगिया में सींचा जा रहा है. मित्र खूमारामजी ने पानी का उलाहना दिया तो अच्छा लगा. २- बगिता के एक क्यारे को आधा फ़ुट खोदकर सारे कंकर-पत्थर निकाले. पहले तो लगा कि दो-दिन में भी पूरा नहीं होगा, लेकिन मात्र एक घंटे में काम पूरा हुआ, मन उत्साह से भर गया. .... कल कहानी शुरु ना कर सका. और दो दिनमें कहानी ना लिखी तो प्रवाह दूसरा बन सकता है, आज शुरु करना है. सारे दिनके सार्थक व्यस्तता अच्छी लगती है. घर से बाहर जाने की जरुरत ही नहीं, समय बचता है.
परसो जी की भैंसें सर्दी में बिना छत के ठंड पी गई. दो- दिन दूध नहीं आया, तो दसियों परिवार परेशान हुये. आसरा बनाने के लिये पैसे नहीं हैं. मुझसे और पैसे लेना स्वीकार नहीं. पहले आगे की उधारी चुकायेंगे, फ़िर .... जबकि मैंने उनको उधार नहीं दिया है. मेरे पास बेकार पङे थे, उनकी जरूरत दिखती है. इस बारे में इस्लाम सही है. ब्याज को कुफ़्र माना है. एक भाई का पैसा दूसरे भाई के काम आ गया, ब्याज कैसा! ब्याज किससे? अपने ही भाई के साथ कौन ऐसा व्यापार करेगा! वैसे भी व्यापार का आधार तो ठगी और शोषण ही है. मगर परसो जी ना माने. गरीब आदमी की पूँजी उसकी ईमानदारी है, अमीर तो दोनों तरहसे दरिद्र ठहरा.
Read More...

लिब्राहन आयोग- एक नजरिया!

लिब्राहन आयोग को लेकर सर्वत्र घमासान मचा है- संसद, प्रिन्ट मीडीया और ब्लाग्स पर .अच्छा है. पाप की चर्चा जितनी ज्यादा, उतना अच्छा. कुछ ट्टिपणियाँ कुण्डलियों में भेजी, उनका जायजा लें.
लिब्राहन आयोग की हुई फ़जीती मित्र.
राजनीति ने नीति का खूब बिगाङा चित्र.
खूब बिगाङा चित्र, इसे ही अच्छा मानो.
घङा पापका फ़ूटेगा, निश्चित ही जानो.
पर साधक बिन समझ के क्या होगा बोलो तो.
समझ की खातिर अन्तर के ताले खोलो तो.

समझ बने, तभी समाधान है. गोविन्दाचार्यजी ने भी आपत्ति दर्ज कराई, क्या जरूरत थी! इस व्यवस्था (!) से न्याय की आशा क्यों?
भ्रमित व्यवस्था से करें, अगर न्यायकी आस.
हे गोविन्दाचार्यजी, बात नहीं है खास.
बात नहीं यह खास, लिब्राहन क्या कर सकते.
सोचके देखें आप स्वयं, कुछ ना कर सकते.
कह साधक खुद जागें, समझें प्रकृति-व्यवस्था.
ना कर न्यायकी आस, क्योंकि है भ्रमित व्यवस्था.
अगर न्याय चाहिये तो पहले न्याय को समझना पङेगा जी! शासन तो खुद अपनी बला टाल रहा है. वह किसका भला करेगा?
अपनी बला को टालना, शासन का दस्तूर.
रक्षक ही भक्षक बने, लोग बहुत मजबूर.
लोग हुये मजबूर, न्याय की आशा टूटी.
हर हिस्से में आग, देश की किस्मत फ़ूटी.
कह साधक कवि मानव संभले, स्वयं छला जो.
शासन का दस्तूर टालना अपनी बला को.४
मानव खुद समझे कि प्रकृति की व्यवस्था क्या है. सृष्टि की सर्वोच्च कृति है मानव. अस्तित्व में मानव की प्रत्येक न्यायपूर्ण इच्छा पूरी होने की व्यवस्था है, फिर भी वह दरिद्र क्यों? समझ नहीं तो समाधान नहीं.
सच कहते हैं गौतमजी, राजनीति की चाल.
मानव बिखरा ही रहे, रहे सदा बेहाल.
सदा रहे बेहाल, प्रकृत्ति की उत्तम कृति यह.
नित्य-निरन्तर सुख पानेका अधिकारी यह.
सुन साधक जीवन विद्याके सुर कहते हैं.
राजनीति है चाल गौतमजी सच कहते हैं.९

फिरभी सुनलो मित्रवर, कहा अधूरा सत्य.
सभी विधायें भ्रमित हैं, समझो सच्चा तथ्य.
समझो सच्चा तथ्य, रहो मत किसी भरोसे.
देश-समाज-मानव है केवल राम भरोसे.
कह साधक लौटे मानव-विश्वास ये गुनलो.
जानो पूरा सत्य, मित्रवर फिरसे सुनलो.
गौतम जी के आलेख पर यह ट्टिपणी कई बातें एक साथ कहती हैं. पता नहीं उन्होंने इसे देखा भी है या नहीं. कोई बताये उनको भी. बताये कि भारत मानव के लिये है, पूरी धरती मानव के उत्सव का मंच है.
देश ना मुस्लिम-हिन्दू का, मानवता का देश.
मानव बनकर सोचना, कोई नहीं विशेष.
कोई नहीं विशेष, राजनीति को छोङो.
समझो मानव, जीवन के तारों को जोङो.
सुन साधक इस देहको समझो जीवन-वेश.
जागृति पाकर जानलो, भारत मानव-देश.१२

बाँट दिया इंसान को,कितने टुकङे देख.
पूजास्थल ही हिंसा के निम्मित्त बनते देख.
निमित्त बनते देख, राम-अल्ला और लल्ला.
परमेश्वर है एक, झगङते नित्य पुच्छल्ला.
कह साधक कवि समझ बने तो भ्रम टूटेगा.
सम्प्रदाय की कैद से मानव तब छूटेगा. १७
आज बस! बाकी कल फ़िर मिलेंगे.
Read More...

ग्रामीण जनता का हमें शुक्रगुजार होना चाहिए..

इस बार झारखंड के चुनाव में शहरी मतदाताओं के अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं ने भारी संख्या में शिरकत की। यहां शहरी या ग्रामीण होने से फर्क नहीं पड़ता। फर्क ये सोचकर पड़ता है कि हम जिन्हें काबिल, दुनियादारी के लिहाज से उत्तम और सूचनाओं के भंडार के बीच पाते हैं, वे ही सिर्फ एक वोट डालने की कवायद से खुद को दूर रखते हैं। ऐसा डिटैचमेंट या विमोह क्यों? क्यों ऐसा है कि शहरी लोग इस मामले में पीछे हैं। सिस्टम को गरियानेवालों में मीडिया की मुख्य धारा में शहरी सबसे ज्यादा होते हैं। ग्रामीण इलाकों के लोग तो दूर से टकटकी लगाए बस परिवर्तन को मुंह बाए देखते रहते हैं। ये सोचनेवाली बात है कि एक दिहाड़ी मजदूर या गरीब ग्रामीण व्यवस्था में सुधार को किस महत्वपूर्ण नजरिये से देखता है, जबकि शहरी लोग सारी सुविधाएं मिलने के कारण, सिस्टम जाए भांड़ में वाली मानसिकता से ऊपर उठ ही नहीं पाते। चाहे नक्सल समस्या या नाली की, उन्हें बस ड्राइंग रूम तक जिंदगी को समेट कर रखने की आदत सी हो जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे मुंबइया फिल्मों में निर्माता गरीबी और अन्य समस्याओं को लेकर फिल्में तो बनाते हैं, लेकिन वे ये नहीं जानते कि गरीबी क्या है? भूखे पेट रहने का दर्द क्या है? बेरोजगारी या तंगहाली किसे कहते हैं? गरीब ग्रामीण जानते हैं कि निजीकरण के रास्ते से उनकी समस्याएं हल होनेवाली नहीं। वे महंगे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठ सकते, वे बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में नहीं पढ़ा सकते। उनके लिए अंतिम और आखिरी विकल्प सरकार ही नजर आती है। वही उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी की सुविधा दे सकती है। और ये बेहतर नेताओं के चुनाव से ही संभव है। इसलिए ग्रामीण जमकर भागीदारी कर रहे हैं। ये भारत के मानसिक स्तर पर हो रहे विभाजन को भी इंगित करता है। ये बताता है कि यहां इंडिया और भारत देश को लेकर दो धाराएं काम कर रही हैं। इंडिया के रूप में वह देश है, जो अंगरेजी मीडिया, जानकारों और खाते-पीते लोगों को देश है, जबकि भारत उन तमाम मेहनतकशों और जद्दोजहद से रू-ब-रू होते लोगों का देश है, जो बेहतर सरकार के होने या न होने का फर्क जानते हैं। ऐसे में टीवी पर चाय की प्याली के साथ मीडिया द्वारा बार-बार अपील किया जाना भी एक हास्यास्पद कदम लगता है, क्योंकि चुनाव से पहले या रोजमर्रा के कामों में शहरी मतदाताओं के लिए उनके पास सिवाय अपराध की चटकीली दुनिया और बेशर्म राजनीतिक कारनामों के अलावा जागरूक करने के लिए कुछ नहीं होता। टाइम पास और गैर-जिम्मेदाराना कार्यक्रम के सहारे टीआरपी को ऊंचा करने की कोशिश होती है। इससे शहरी मतदाताओं, खासकर युवाओं के जेहन में समाज, सरकार के प्रति एक कोई मतलब नहींवाली मानसिकता घर कर गयी है। यही कारण है कि शहरी लोग, मात्र शहर के अपने उस दरबे के कबूतर हो गए हैं, जो सिर्फ गुटरगूं करना जानता है। हाशिये पर जा रहे सिस्टम को बदलने के लिए अभी भी ग्रामीण ही पहल कर रहे हैं। ग्रामीण जनता के लिए हमें शुक्रगुजार होना चाहिए।
Read More...

नक़वी का नगमा

प्रिय अविनाशजी, नमस्कार.
नुक्कङ पर लिखने का मोह बना है.
हिन्दीब्लाग्स पर नजीम नकवी ने पर्यावरण मुद्दे पर सुन्दर आलेख लिखा है, उसी पर मेरी यह ट्तिपणी, आप भी देखें.
मुझे बतायें कि मुझे आगे किस प्रकार लिखना चाहिये. वेब साईट वाले के साथ सही सम्बन्ध बनने में गलतफ़हमी की दिक्कत है, क्या आप दिल्ली-सम्पर्कों से मदद करेंगे. कुछ समय इस पर दे सकेंगे?
और हाँ, यह भी बतायें कि आपकी तरह सुन्दर ब्लाग कैसे बनाऊँ!
वाह नजीम नकवी मियाँ, शब्दों में है सत्य.
समझ बने तब ही मिले, ऐसा प्यारा सत्य.
ऐसा प्यारा सत्य, मानसिकता ना बदले.
साढे चारसे ऊपर उठने से ही बदले.
कह साधक कवि साढे चार ही बना समस्या.
दस पर आओ, स्वयं मिटेगी सभी समस्या.

मध्यस्थ दर्शन में है, साढे चार और दस.
समझो प्यारे ध्यानसे, यहीं समस्या बस!
यहीं समस्या बस!, बचेगी प्यारी धरती.
मानव बनता देव, स्वर्ग बन जाये धरती.
यह साधक कवि करता है समग्र का चिन्तन.
साढे चार से दस समझो मध्यस्थ दर्शन.
Read More...

पहचान पहेली पर मेरे सिवाय (अविनाश वाचस्‍पति)

आइये पहचानें मिलकर सारे
जितने थे पधारे और हुए
शामिल फिर जंगल से
बच कर लिए निकल।

पर ब्‍लॉगिंग और हिन्‍दी
नहीं बचेगी अब सदा
छाई रहेगी बन कर बिन्‍दी
मुंबई के भाल पर सर्वदा।

इनमें एक का संदेश
मोबाइल के जरिए सीधे
मुंबई ब्‍लॉ्गर मिलन में
सुना गया।



ब्‍लॉगवाणी पर पहुंचें ब्‍लॉग खोलें पढ़ें और फिर पहचानें। यही है हिंट जो आपको कराएगा हिट।
Read More...

7 दिसम्‍बर 2009 को पूना का कार्यक्रम है (अविनाश वाचस्‍पति)

मुंबई में हूं तो सोचा
और बना है संयोग
पूना भी हो आये
तो पूना कल
पहुंच रहा हूं मैं
सुबह 8 बजे
वापसी 11 बजे तय है
इस बीच जो मिलना चाहें
कार्यक्रम बनाएं और
फोन पर मेरे
09404148870 पर
मुझे बतलायें

चाहता हूं मैं मिलना
जन जन से जुलना
यही तो होता है
मिलना और जुलना।

बाकी मिलने पर
नेट नहीं खोल पाऊंगा
अपना पता व फोन
यदि केन्द्रित रहे
पूना में एक जगह
तो उचित रहेगा।

मोबाइल पर संदेश
भेज दें मुझे
सुबह जगना है जल्‍दी
इसलिए अब सोने
जा रहा हूं मैं।

मुंबई ब्‍लॉगर मिलन
बहुत रहा है सफल
जल्‍दी ही चित्र और
पोस्‍टें पढि़एगा।
Read More...

मुंबई हमको जम गई : आज ब्‍लॉगर मिलन है (अविनाश वाचस्‍पति)

प्‍यार और विश्‍वास मुंबई में भी बेशुमार है

सबसे पहले मैं मिला श्री मनोज गुप्‍ता जी से कुर्ला पूर्व में
और मिला मनोहर सिंह जी से
मिला साथ ही श्री दुर्गाप्रसाद मित्‍तल जी से भी।

पहली मुलाकात अमिताभ श्रीवास्‍तव जी से
दूसरी पर पहली मुलाकात कमल शर्मा जी से
तीसरी पर पहली मुलाकात अनिता कुमार जी से
चौथी पर पहली मुलाकात सबरंग काव्‍य गोष्‍ठी में
कवि कुलवंत जी से और अवनीश तिवारी जी से
सूची है काफी लंबी
पर आप पढ़ते रहें जी
श्रीमती शकुंतला शर्मा, श्रीमती अलका पाण्‍डे, श्री मनोज कुमार श्रीवास्‍तव, लखनऊ, श्री विपुल जैन लखनवी, श्री नंदलाल थापर, श्रीमती मंजु गुप्‍ता, श्री गिरीश थापर, श्री वी के चड्ढा, श्री ओ पी चतुर्वेदी, श्री स्‍पर्श देसाई, श्री शेतवाडेकर, श्री कुमार जैन, श्री सुरिंदर रत्‍ती, श्रीमती शैली ओझा, श्री आर पी गुप्‍ता,श्रीमती मनोज श्रीवास्‍तव और श्री शशांक श्रीवास्‍तव।

इनके अलावा मिला मैं
अनिता कुमार जी की कार से
मुंबई की टैक्‍सी और स्‍कूटर से भी
वे सब किस्‍से बाद में
दिल्‍ली पहुंचकर बतलाऊंगा।

पर आज मुंबई ब्‍लॉगर मिलन
कल्‍पतरू की पोस्‍ट का विवरण निम्‍न है :-
मुंबई ब्लॉगर मीट के लिये मेरी बहुत से ब्लॉगरों से बात हुई पर ऐसा लगा ही नहीं कि मैं उनसे पहली बार बात कर रहा हूँ ऐसा लगा कि हम लोग जाने कब से एक दूसरे को जानते हैं और बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।

कुछ ब्लॉगर्स को मैंने फ़ोन लगाये कुछ ने मुझे फ़ोन किये कुछ ब्लॉगर्स से चेटिंग हुई। सबको अपने बेहद करीब पाया।

मुंबई ब्लॉगर्स मीट त्रिमूर्ती जैन मंदिर, संजय गांधी नेशनल पार्क बोरीवली में सायं ३.३० बजे रविवार ६ दिसंबर को आयोजित की गई है, जो कि वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर बोरिवली ईस्ट में है। आप यहाँ सीधे लोकल रेल्वे स्टेशन से २९९ नंबर बस से टाटा स्टील से भी सीधे आ सकते हैं नहीं तो मुख्य द्वार जो कि वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर है वहाँ से सीधे आ सकते हैं, प्रति व्यक्ति नेशनल पार्क का टिकिट २० रुपये है।

लगभग १४ ब्लॉगर्स की मंजूरी मिल चुकी है। अविनाश जी दिल्ली वाले मुंबई पहुंच चुके हैं और उनका भी ब्लॉगर्स से मिलने का बहुत व्यस्त कार्यक्रम है।

इस मीट का उद्देश्य एक दूसरे को जानना और वास्तविक दुनिया में मिलना है, हम सब एक दूसरे को आभासी दुनिया में बहुत अच्छी तरह से परिचित हैं, जब वास्तविकता में मिलेंगे तो बात ही कुछ ओर होगी। इस मीट में सभी ब्लॉगर्स के मानस मंथन से जो भी मुद्दे निकलेंगे वही अगली ब्लॉगर्स मीट का उद्देश्य होगा। यह मीट केवल एक गेट टुगेदर है जिसमें सब एक दूसरे को जान पायेंगे।

इस मीट के लिये ताऊ जी और समीर लाल जी ने विशेष सहयोग दिया है, और मुंबई टाईगर महावीर जी सेमलानी जी का भी विशेष सहयोग है। अविनाश वाचस्पति जी जो कि हमारे दिल्ली से आये हुए मुख्य अतिथि हैं, उनका भी भरपूर सहयोग है, कृप्या अपने आने की स्वीकृती दें जिससे व्यवस्था में सहयोग मिलेगा।

मेरा नंबर 09404148870 पर मैं उपलब्‍ध हूं और
श्री विवेक रस्‍तोगी 09223394566 पर सदा की तरह।
Read More...

रोज दिखावे करते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर

रोज दिखावे करते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर,

ज़ख़्मों पे मरहम धरते हैं,बस झूठी शोहरत के खातिर.


घर तक है नीलाम पड़ा,दारू की ठेकेदारी में,

देखो फिर भी दम भरते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर.


इंसानों से कब का रिश्ता, तोड़ चुके हैं ये साहिब,

इंसानियत कहरते है,बस झूठी शोहरत के खातिर.


लिए गुरूर-अहम सत्ता का,हैवानो से हाथ मिलाते,

हैवानियत से डरते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर.


हरकत गिरी हुई है,जिनकी आदत से लाचार हैं जो,

बड़ी बड़ी बातें करते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर.


रोज ग़रीबों की आहों पर, नाम लिखा होता है जिनका,

मानवता पर वो मरते हैं,बस झूठी शोहरत के खातिर.


गंगाजल को तरस गये, बाबू जी अंतिम वक्त में अपने,

मरघट पर आँसू गिरते हैं,बस झूठी शोहरत के खातिर.

Read More...

इस ब्‍लॉगर को प‍हचानिये : पहले पहेली तो मानिये : पहेली रेल की : मेल की

रेल का नाम

कोंकण कन्‍या एक्‍सप्रेस

रेल का पहचान नंबर ०११२

चलेगी मडगांव से

ब्‍लॉगर सवार करमाली से होंगे।

करमाली कहां है

यह हम नहीं बतायेंगे

5 दिसम्‍बर की सुबह

वो ब्‍लॉगर मुंबई में नजर आयेंगे।

जिन्‍हें हिंट चाहिये

वे 09404148870

पर तुरंत हिट करें।

Read More...
 
Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz