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जनानों की मर्दानगी....

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  • by
  • मयंक
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  • महिला दिवस पर मुझे करीब डेढ़ साल पहले लिखी अपनी एक कविता याद आ रही है...उसे आप सब के साथ बांटना चाह रहा हूं....क्योंकि आधी आबादी अब पूरी दुनिया जीतने को तैयार है....आप मानें या न मानें....


    माँ अब तुम तैयार रहो

    बनने के लिए पिता

    यकीन करो

    तुम उतनी ही जिम्मेदार हो


    बहन अब तुम जान लो

    हो सकता है रक्षा करनी पड़े

    तुम्हे भाई की अपने

    क्या तुम तैयार हो ?


    गृहस्वामिनी क्या तुम्हे नहीं लगता

    कि घर तुम्हारी क्षमताओं के आगे

    छोटा पड़ गया है

    क्यूँ ना अब सीमाएं तोड़ भागें


    दुलारी बेटियों क्यूँ अब तुम्हे

    सड़क के मोड़ पर बैठा

    कोई दानव करेगा परेशान

    उठाओ हाथों को उसे अहसास कराओ

    तुम में भी है जान


    छोड़ कर दायरों को

    तोड़ बंधनों को

    अपेक्षाओं से परे

    सीमाओं से आगे


    तुम्हारा आकाश खिड़की से दीखता

    बादल का टुकडा नहीं

    वो क्षितिज का कोना है

    कोई दुस्वप्न या दुखडा नहीं


    उनकी भाषा में उनको जवाब देना

    अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है

    उन्होंने बहुत मर्दानगी

    अब जनानो की बारी है


    -मयंक सक्सेना

    14 comments:

    भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

    बिल्कुल सही बात उकेर दी है.

    devika ने कहा…

    बहन अब तुम जान लो

    हो सकता है रक्षा करनी पड़े

    तुम्हे भाई की अपने

    क्या तुम तैयार हो
    I agree chona i think i am already doing that....hihihi...just kiddin ...today girls know their potential and they are ready to win d world with their skills like me..men like u are required more in this world. hope every girl gets a good household full of males like u...nice poem anyways as usual beta.....

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

    मातृ-दिवस पर मातृ-शक्ति को नमन!

    वन्दना ने कहा…

    bahut hi zabardast rachna .........shandaar.

    महेन्द्र मिश्र ने कहा…

    bahut sahi rachana ...abhaar

    'अदा' ने कहा…

    sach kaha hai..
    main bhi taiyyar hun..
    MAHILA DIWAS par aapki bhent acchi lagi...

    राज भाटिय़ा ने कहा…

    क्या बात है जी, बहुत सुंदर

    Suman ने कहा…

    nice

    डॉ टी एस दराल ने कहा…

    सकारात्मक सोच से परिपूर्ण रचना ।

    शहरोज़ ने कहा…

    अच्छी पेश कश...अच्छी रचना की.

    काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

    nice

    अनुपम अग्रवाल ने कहा…

    क्यूँ अब तुम्हे कोई दानव करेगा परेशान
    उसे अहसास कराओ तुम में भी है जान
    अपेक्षाओं से परे ,सीमाओं से आगे
    क्यूँ ना अब सीमाएं तोड़ भागें

    बदलते समय में अब यह सभी की ज़िम्मेदारी है

    बहुत देखा औरों को ,अब ज़नानों की बारी है

    HARI SHARMA ने कहा…

    वेहद उर्जावान कविता और जोश भरते हुए विचार.
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/2009/09/blog-post_2067.html

    shyam jagota ने कहा…

    bahoot sateek

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