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शहीद-ए-आजम भगत सिंह

शहीद-ए-आजम भगत सिंह

भारत माता जब रोती थी,
जंजीरों में बंध सोती थी .
पराधीनता की कड़ियाँ थीं,
जकड़ी बदन पर बेड़ियाँ थीं .

देश आँसुओं में रोता था,
ईस्ट इंडिया को ढ़ोता था .
भारत का शोषण होता था,
नैसर्गिक संपत्ति खोता था .

दुर्दिन के दिन गिनता था,
हर साल अकाल को सहता था .
अंग प्रत्यंग जब जलता था,
घावों से मवाद रिसता था .

बंदी बन नतमस्तक माता,
देश की हालत बदतर खस्ता,
हर पल था अंधियारा छलता,
सहमी रहती थी जब जनता .

आँसू जलधर से बहते थे,
सहमे सहमें सब रहते थे .
यौवन पतझड़ सा सूखा था,
सावन भी रूखा रूखा था .

भारत भू का कण कण शोषित,
त्रास यातना से अपमानित .
’कल्याण-भूमि’ आतंकित थी,
निज स्वार्थ हेतु संचालित थी .

राष्ट्र हीनता से जकड़ा था,
दिन दासता ने पकड़ा था .
मृत्यु प्राय सी चेतनता थी,
स्तब्ध सिसकती मानवता थी .

अवसाद गरल बन बहता था,
स्वाभिमान आहत रहता था .
गौरव पद तल त्रासित रहता,
झुका हुआ था अंबर रहता .

निष्ठुर क्रीड़ा खेली जाती,
अनय अहिंसा झेली जाती .
धन संपत्ति को लूटा जाता,
ब्रिटिश राज को भेजा जाता .

हिम किरीट की सुप्त शान थी,
पुरा देश की लुप्त आन थी .
राष्ट्र खड़ा पर शिथिल जान थी,
सरगम वंचित अनिल तान थी .

विषाद द्रवित नही होता था,
वेदन में आँसू घुलता था .
आवेग प्रबल उत्पीड़न था,
विवश कसमसाता जीवन था .

कलरव जब कर्कश लगता था,
नत दिव्य भाल जब दिखता था .
आकाश झुका सा लगता था,
चिर ग्रहण बाग्या पर दिखता था,

युगों युगों से गौरव उन्नत,
हिम का अलाय झुका था अवनत .
विषम समस्या से था ग्रासित,
विकल, दग्ध ज्वाला से त्रासित .

’पुण्य भूमि’ जब मलिन हुई थी,
पद के नीचे दलित हुई थी .
’तपोभूमि’ संताने व्याकुल,
व्याल घूमते डसने आकुल .

हीरे, पन्ने, मणियां लूटीं,
कलियाँ कितनी रौंदी टूटीं .
आन देश की नोच खसोटी,
कृषक स्वयं न पाये रोटी .

चीर हरण नारी के होते,
भारत निधियां हम थे खोते .
वैभव सारा लुटा देश का,
ध्वस्त हुआ सम्मान देश का .

बाट जोहते सब रहते थे,
तिमिर हटाओ सब कहते थे .
भाव हृदय में सदा मचलते,
मौन परंतु सब सहते रहते .

कवि कुलवंत सिंह

2 comments:

वन्दना ने कहा…

bahut sundar prastuti.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

यह आजादी भगत सिंह जैसे दीवानों का ही नतीजा है.

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