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साधक उम्मेद सिंह जी और प्रशांत उर्फ़ पीडी से एक छोटी सी मुलाकात चैन्नई में

आज की मुलाकात का विवरण बाद में, केवल एक फ़ोटो देखिये ..

 

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साधक उम्मेद सिंह जी की कलम इस मुलाकात के लिये -

प्यारी सी यह सुबह, सार्थक भी लगती कुछ ज्यादा.

विवेक के संग प्रशान्त पाया, लिये अर्थ तात्विक सा.

लिये अर्थ तात्विक सा, चर्चा खुद की और जगत की.

ब्लाग पे क्या लिखते, क्यों लिखते? सारी बातें मन की.

कह साधक यह मुलाकात तीनों को याद रहेगी.

सार्थक भी लगती कुछ ज्यादा, यह सुबह प्यारी सी.

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बीमा कराया है आपने, बीमा पर कवितायें लिखीं हैं आपने ... (अविनाश वाचस्‍पति)

बीमा कराया है आपने
लिखी हैं बीमे पर कवितायें
वैसे बीमा कराने की जरूरत
तो कवितायें सुनने वाले को होती है
पर कवि भी आजकल करवाते हैं बीमा
इतने श्रोता नहीं हुए तो
इतनी क्षतिपूर्ति करेगी बीमा कंपनी
क्षतिपूर्ति में नकद नहीं देगी
श्रोता उपलब्‍ध करवायेगी कई हजार
देने होंगे सिर्फ कुछ सौ रुपये।

ऐसी और इससे ज्‍यादा
ऐसी और तैसी करती कवितायें
बीमा कराने को
बीमा नामांकन पर
बीमा प्रीमियम पर
और बीमा भुगतान पर
नई तान छेडि़ये
कवितायें लिखिये बीमा पर
और भेजिए
tetaalaaa@gmail.com पर
एक सुनहरा अवसर आपकी
प्रतीक्षा में है
और हम आपकी कविताओं के
इंतजार में है
समय सीमा
इसके प्रकाशन के सात दिन के भीतर।

आप इस ई मेल को कर दीजिए
अपनी अच्‍छी अच्‍छी बीमा संबंधी
कविताओं से तरबतर
अपना बायोडाटा और चित्र भी भेजिएगा
पसंद आने, चयन किये जाने पर
पत्र-पुष्‍प का प्रावधान भी है
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डॉ० डंडा लखनवी का व्यंग्य : लाइम लाइट

                                          लाइम लाइट
 

विवर रहीम ने शताब्दियों पूर्व पानी एवं मनुष्य, मोती और चूने के बीच के अंतःसंबंधों को भली-भाँति समझ लिया था। इसलिए वे मरते-मरते लिख गए थे कि-‘‘पानी गए न ऊबरे मानुष, मोती, चून।’’ ज़माना बदला तो अर्थ की दादागीरी आ गई। उसके समक्ष इस प्रकार के विचार डस्ट-बिन की वस्तु हो गए। मनुष्य में वो पानी अब बचा कहाँ, मोतियों की अब पहले जैसी अहमियत न रही। हाँ, चूना अभी मैदान में हुआ डटा है। आजकल तो उसकी बड़ी वक़त है। बात अधिक पुरानी नहीं है। गत चुनाव में पिटा एक नेता, जब पान के काराबार में कूदा तो, आलीशान दूकान के उद्घाटन में भारी भीड़ जमा हुई। एक माफ़िया ने फीता काटा, दो ने ए0 के0-47 दागीं, शेष ने हवा में असलहे लहरा कर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई। सलामी की रस्म पूरी हुईं तो शोफासेटों, कुर्सियों, तथा दरियों पर जम माननीय दादाओं ने करतल ध्वनि की। जबरन आयातित भद्र-जन एक कोने में दुबके रहे। आखि़र नेता की आधुनिक दुकान का उद्घाटन था। कोई ऐसा-वैसा उद्घाटन तो था, नहीं। ऐसी जगह पर जो हो सकता था, वह सब हुआ। गुटका मुख में रख कर जुगाली करने वालों ने जी भर कर जुगाली की। सिगरेट के धुएं से वातावरण को प्रदूषित करने वालों के लिए आज का दिन बड़ा शुभ था। वे मुफ़्त में मिली सिगरेटों से जब तक वहाँ रहे, अपनी मुराद पूरी करते रहे। इस जमावडे़ में जिन्हें बैठने का ठीक-ठाक स्थान नहीं मिल पाया था, वे मंच पर वैसे लदे गए, जैसे भइए लोग रेलगाड़ियों की छतों पर लद जाया करते हैं।

उचित अवसर पा कर एक पत्रकार ने उक्त नेता से पूछा-‘‘आप राजनीति छोड़ कर पान के व्यवसाय में क्यों कूद पड़े हैं?’’ नेता बोला-‘‘मेरा जन्म ‘जनता एक्सप्रेस’ में हुआ था। इस नाते मैं जन्मजात जनता का हूँ। अतः जनता की सेवा करने का पहला हक़ तो मेरा ही बनता है। मैंने अब तक जनता भरपूर की सेवा की है। उसे आगे भी करते रहने का वचन देता हूँ।’’ पत्रकार ने प्रश्न किया-‘‘आपने पिछले चुनाव में कहा था कि गाँव-गाँव में शु़द्ध-जल की व्यवस्था करवा देंगे। कहाँ चला गया आपका वचन?’’ नेता बोला-‘‘देखो, भाई! नशे में किए गए वादों की अब बात मत करो।’’ पत्रकार ने कहा-‘‘वादा करते समय आप.....नशे में तो नहीं थे।’’ नेता ने कहा-‘‘आपका अनुमान ग़लत है। मैं उस समय.....पूरे नशे में था।’’ पत्रकार ने पूछा-‘‘कैसा नशा ?’’ नेता न कहा-‘‘चुनाव का नशा। वह भी तो नशा है।’’ इस वार्तालाप में एक अन्य पत्रकार ने धीरे से दूसरा प्रश्न ठूंस दिया-‘‘आप तो चुनाव हार चुके हैं, ऐसी दशा में जनसेवा कैसे करेंगे?’’ गुटका के उत्तिष्ठ को फर्श की चाँदनी पर उगल कर वे बोले-‘‘ एक बार हमने कह दिया न ! इस बारे में मुझे और कुछ नहीं कहना है। अगर कुछ करना-धरना है तो वह जनता को ही करना है। वह चाहे तो चुनाव जितवा कर देश पर चूना लगवा ले अथवा चुनाव हरवा कर पान पर चूना लगवा ले। मुझे तो दोनों हाल में चूनेदारी ही करनी है। चूने ने मुझे पूरी तरह पकड़ रखा है और मैंने चूने को.......बिना चूने के राजनीति में सफेदी आ ही नहीं सकती है-समझे भाई!’’ वे आगे बोले-चूना लगाना तो अपनी डियुटी मे सामिल है।’’ पत्रकार ने पूछा-‘‘ऐसा क्यों ?’’ उन्होंने उत्तर दिया-‘‘चूना को अंग्रेजी में लाइम कहते हैं न....ऽ....ऽ.... बिना लाइम के देश लाइट में कैसे आएगा ?’’

इस तरह उस नेता के श्वेत विचार सुन कर पत्रकार की मुसकान छूट गई। वे ठहरे आधुनिक युग के महाजन। महाजनों का अनुकरण करना सामाजिकों का सदैव धर्म रहा है। उनका अनुकरण हो भी रहा है अथवा नहीं यह विचार आते ही बुजु़र्गों की बताई हुई कुछ बातें मुझे याद आने लगीं। आज़ादी मिलने के पूर्व अंग्रेजों ने इस देश को बड़ा चूना लगाया था। उनके जाने बाद इस कला को देशी लोगों ने आगे बढ़ाया। अपने देश में इस कला का भविष्य बड़ा उज्ज्वल है। बहुत आश्चर्य नहीं कि विश्वविद्यालयों में चूना लगाने की कला को आगे चल कर ‘लाइम-आर्ट’ के रूप में मान्यता मिल जाए। आजकल तो अनेक क्षेत्रों में चूना लगाने पर मौलिक प्रयोग हो रहे हैं। अस्पतालों में डाक्टर मरीजों को चूना लगाने के लिए प्राइवेट पैथालाजी में भेज देते हैं। अध्यापक-गण विद्यार्थियों को ट्युशनालयों में बुलाते हैं। प्रकाशक लेखकों की रायल्टी पर बड़े प्यार से चूना लगा देते हैं। लेखकगण अमौलिक सामग्री प्रकाशकों को थमा कर चूना लगाने से परहेज़ नहीं करते हैं। सिंथेथिक मिल्क और रगीं हुई सब्जियों से उपभोक्ताओं को चूना-चूना किए जाने के किस्से प्रायः सुनने को मिलते ही रहते हैं।

इधर इस कला की ओर लोगों का रुझान बहुत बढ़ गया है। जिसे देखो वही चुनौटी हाथ में लिए है। लगाने की ज़रा -सी जगह मिलते ही चूना लगा देता है। आप क्या कहते हैं-‘खैनी’? हां, खैनी रगड़ना तो एक बहाना मात्र है। रगड़ने वाला खाता कम है, वह खिलाता ज्यादा है। आम आदमी तो भूखा है। उसे चूना मिल रहा है, तो चूना खा रहा है। भले ही उसका मुंह फट रहा हो, पेट कट रहा हो अथवा काटा जा रहा हो। आज़ादी का वास्तविक अर्थ अब लोग चूना लगाने की आज़ादी मान बैठे हैं। कभी भारत की गणना कृषि-प्रधान देशों में होती थी, परन्तु अब कुर्सी-प्रधान में होती है। कुर्सियों पर बैठते-बैठते हम भूमि की पंगत-परंपरा को बिसार चुके हैं। अब तो हर तरफ कुर्सियों पर बैठने की होड़ लगी है......क्योंकि उन पर बैठ कर चूना लगाने की बात ही कुछ और है।

                                            
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बदलते वक्‍त की जरूरत (रश्मि रविजा)


बदलते वक्‍त की जरूरत

पहले कतरन पर क्लिक करके पूरा पढियेगा तभी अपनी राय दीजिएगा।
यह पोस्‍ट दिनांक 27 जनवरी 2009 के राष्‍्ट्रीय सहारा दैनिक, नई दिल्‍ली के सहारा इंडिया मास कम्‍यूनिकेशन द्वारा प्रकाशित साप्‍ताहिक पत्रिका आधी दुनिया में पेज नंबर 7 पर सचित्र प्रकाशित हुई है। आप इसे पढि़ये और एक बार फिर सच्‍चाईयों की गहराईयों में उतर जाइये।
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आज होगा स्व.प्रभाष जोशी पर किताब का विमोचन आज होगा स्व.प्रभाष जोशी पर किताब का विमोचन

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झूठ को स्वीकार्य नहीं है बिहार का सच

श्री प्रदीप श्रीवास्तव की रपट ”झूठ की परतों में छिपा बिहार का सच” 23 जनवरी को जनसत्ता के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था। श्री श्रीवास्तव का मानना है कि बिहार आज भी बीमारु राज्य है। इस राज्य के विकास के संबंध में सीएसओ द्वारा प्रस्तुत आँकड़ा महज नितीश कुमार के आँकड़ों की बाजीगिरी का पर्याय है, क्योंकि सीएसओ के द्वारा प्रस्तुत आँकड़ा बिहार सरकार का ही आँकड़ा है। कृषि और उधोग में पिछड़ा हुआ राज्य 11 फीसदी के औसत विकास दर को कभी प्राप्त नहीं कर सकता है। लेकिन आश्चर्यजनक रुप से श्री श्रीवास्तव ने अपनी रपट में रपट के स्रोत का खुलासा तक नहीं किया है। और पढ़ें ...
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खुशूबू के साथ यह कैसा न्याय

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'मुश्फिक' की फिक्र


जी हां, गज़ल को लेकर पत्र-पत्रिकायें थोडी कंज़ूस तो रहती हैं किंतु गज़ल निर्बाध रूप से बह रही हैं, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिये। मुझे लगता है कि गज़ल को अपनी दिशा का भान है। उसके अपने दीवाने हैं। वर्ग विशेष होने का यह फायदा भी है कि उसके रूप, रंग, उसकी रवानी, फसाहत और कायदे पर अभी तक किसी प्रकार की ज्यादती नहीं हुई है, और विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि उसके मुस्तकबिल पर कभी कोई आंच नहीं आने वाली। बहरहाल, आज मैं आपका एक ऐसे शायर से परिचय करा रहा हूं जिनके बारे में आज की गज़ल प्रेमी पीढी शायद न जानती हो। जिन्होने रिवायती और क्लासिकी शायरी से हटकर समाज और मुल्की हालात को अपने मखसूस अन्दाज़ में पेश किया, जिनकी शायरी सेहतमन्द और संज़ीदा अदब से हमेशा लबरेज़ रही। जनाब मुस्तफा हुसैन 'मुश्फिक'। रायगढ (छत्तीसगढ) के गांजा चौक का एक जानापहचाना नाम। अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों, आकाशवाणी आदि मंचों की रौनक। हिन्दी, ऊर्दू और छत्तीसगढी में समान गति से लिखने वाले शायर, गीतकार और कवि। गज़ल क्षेत्र की यह बहुत बडी क्षति है कि मुश्फिक साहब इस दुनिया में नहीं हैं। महज़ चौथी तक की शिक्षा और जीवनयापन के लिये टेलरिंग का व्यवसाय। ताउम्र गुरबत के साये में रहे, और शायद यही वजह रही कि उनके अनुभव ने जीवन को कलाम में बान्धकर कागज़ पर हूबहू उतार दिया। उन्हें कभी गोपालदास नीरज की बगल मिली तो कभी रूपनारायण त्रिपाठी, मुकुटबिहारी सरोज जैसे उम्दा फनकारों के बीच बैठ कर शायरी करने का मौका। यानी आप जान ही गये होंगे कि डिग्रियां हासिल कर लेने वाला ही पढा-लिखा नहीं माना जा सकता, बल्कि कबीर जैसे अनेक लोग भी साहित्य के पुरोधा हैं, उनमें से मैं मुश्फिक को भी एक मानता हूं। पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहने वाले मुश्फिक के लिये गज़ल पर कोई किताब टेडी खीर ही थी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान में 26 दिसम्बर 1959 को पहली रचना प्रकाशित हुई थी, इसके बाद रचनाये छपती रहीं, गज़ले वे कहते, सुनाते रहे मगर उन्हें किताबी शक़्ल कभी नहीं दे पाये। चार दशक बाद यह सब भी हुआ। 1 मई 1998 को "मेरी फिक़्र शायरी" के नाम से उनका कलाम किताबी शक़्ल में शाये हुआ। इसके दो वर्ष पूर्व मेरे विवाह के अवसर पर वे भी शामिल हुए थे। मुझे नहीं पता था कि वो अंतिम मुलाकात होगी। खैर, उनकी किताब और स्मृतियां मौज़ूद हैं।
जनाब मुश्फिक़ ने जैसी जिंदगी देखी उसे उतार दिया। मुझे लगता है कि आदमी मुख्तालिफ परेशानियों की गिरफ्त के बावज़ूद, अपनी जीने की ललक नहीं छोडता, वो मुसीबतों से दो चार होता है और हंसने की पुरजोर कोशिशे करता रहता है, मुश्फिक कहते हैं कि-

" इस गरानी में भी, नातवानी में भी
लोग जिन्दा हैं, जिन्दादिली देखिये।"

गज़लों में यह खासियत तो सनी हुई है कि वो जीवन के करीब, बिल्कुल सट कर चलती है। खैर, मुश्फिक ने उम्र के करीब छह दशक बाद जब थोडी राहत महसूस की ही थी जहां वो कह सके कि-
" कितने मलाल हमको जमाने से मिले हैं
अब जाके लोग ठीक ठीकाने से मिले हैं।"

कि सांसों ने उनका साथ छोड दिया। बहरहाल, आज उनकी वो गज़ल जो मुझे ज्यादा पसन्द है आप तक पहुंचा रहा हूं, शायद मेरी ही तरह आपको भी पसन्द आयें?


इंसा भी मसीयत का अनमोल खिलौना है
हर खेल का आखिर है और खेल भी होना है।

फितरत का करिश्मा है जादू है ना होना है
सोना कभी मिट्टी है मिट्टी कभी सोना है।

जो दिल पे गुजरती है नग्मों में पिरोना है
पत्थर के कलेजे को हंसना है न रोना है।

गुजरी हैं कई सुबहें हर शाम गुजरती है
हम खानाबदोशों का तकिया न बिछौना है।

वीराना ही अच्छा है बदकार इमारत से
सुख चैन की नींदे हैं और ख्वाब सलोना है।

जिसने निबाह दी है हर गर्दिशे दौरां से
उस सच को ढूंढना भी अपनों ही को खोना है।

मुद्दत से ये हसरत है हो ताबे नज़र 'मुश्फिक'
फिर उसके नज़ारों से हो जाये जो होना है।
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स्वास्थ्य बीमा के बारे में आवश्यक बातें जो सभी को पता होना चाहिये। (What You Should know about Mediclaim ..)


स्वास्थ्य बीमा दावा दायर करने की प्रक्रिया -

    स्वास्थ्य बीमा कौन सा लेना चाहिये और कितना प्रीमियम भरना चाहिये यह सब एक अलग बात है और स्वास्थ्य बीमा के दावे की प्रक्रिया बिल्कुल अलग। बीमा सुविधाओं का दावा करते समय आपको दावा दायर करने का फ़ार्म भरते समय होशियारी और सावधानी दिखानी होती है। स्वास्थ्य बीमा का दावा करते समय आपको और क्या सावधानियाँ रखनी चाहिये।

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उम्‍मेद सिंह साधक पहुंचने वाले हैं चैन्‍नै, विवेक रस्‍तोगी जी तो पहले ही वहां मौजूद हैं

विवेक रस्‍तोगी जी
कल्‍पतरू लेकर
चैन्‍नै में पहले से
मौजूद हैं

पी डी वहां पर
हैं ही

साधक जी भी
पहुंच रहे हैं
अब ब्‍लॉगर मिलन
साधना साध ली जाये।

जो जो तकनीक नहीं जानता
उसे वो तकनीक सिखाई जाये
यूं ही मिल कर
पल पल हर पल
न गंवाया जाये।

जैसे साधक जी जानना चाहते हैं
लिंक कैसे बनाया जाता है
पोस्‍ट में चित्र कैसे लगाया जाता है
स्‍नैप शॉट कैसे लिया जाता है

और भी वो सब कुछ
जो वे नहीं जानते हैं
वे बदले में कविता रचना
सिखलायेंगे जो सीख जायेंगे
वे कवि हो जायेंगे।

चैन्नै के लिये यात्रा आज शाम ४ बजे से.... कल प्रातः ७ बजे पहुँचूंगा...........



इसका अर्थ ये हुआ कि
लगभग 11 घंटे शेष हैं
साधक जी के चैन्‍नै पहुंचने में
उनका मोबाइल नंबर है
09903094508

बाद में मैं ही नहीं
सब जानना चाहेंगे
कि किसने क्‍या सीखा
किसने क्‍या सिखाया

स्‍नैपशॉट बेस्‍ट जानकारी
तैयार हो जिनके पास
ब्‍लॉगजनहिताय
सार्वजनिक कर सकते हैं
प्रतीक्षा रहेगी ...
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साधक की काव्य यात्रा-२

अविनाशजी ने इसी नुक्कङ पर चैन्नई में ब्लागर मीट की संभावना बताई. तत्काल अपना कार्यक्रम चैन्नई जाने का बनाया, टिकट बनने के बाद लिखा.

मिल ही लें,मिलना उत्तम, मिलने से ही वो मिलता.
जिससे मिलने की चाहत में, मनवा सबका खिलता.
मनवा खिल जाता है, उसकी एक झलक से यारों.
बस उससे मिलने की राहें,मिलकर बैठ विचारो.
कह साधक, वो मिल जाये तो हमें भी लिख दें.
मिलने से वो मिलता, मिलना उत्तम, मिल ही लें.

अब यह मिलना-मिलाना कब होता है, यह तो मिलने से ही पता चलेगा. मगर इस बीच लोक संघर्ष वाले सुमन जी से मिल लेते हैं. सुमन जी सदा संघर्ष के लिये तैयार मिलते हैं, और अपना अब संघर्ष में कोई विश्वास रहा नहीं. उनका धर्म उन्हें मुबारक- वामपंथी हैं ना! इस सङे-गले तन्त्र से न्याय पाने की आशा में हैं, जबकि तन्त्र बिचारा अपने अस्तित्व को किसी तरह बचाने में लगा है.! अब यहाँ न्याय-अन्याय पर सोचने की फ़ुर्सत किसे है? सुमन जी क्या मेरी बात सुन रहे हैं!

न्याय चाहते अब भी! सङे हुये इस तन्त्र से यारा.
कौन तुम्हें समझाये, कैसे हो सकता है गुजारा.
आगे यहाँ चटका दें. साधक उम्मेदसिंह बैद
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... और एक हिन्‍दी ब्‍लॉगर अविनाश वाचस्‍पति गिरफ्तार

अपनी विजय से बहुत प्रसन्न मन से चहक रहे हैं एम आई पंड्या जी। सबको मेल कर करके बतला रहे हैं कि उनको चोर बतलाने वाले उच्‍चारण ब्‍लॉग के मयंक जी के टिप्‍पणीकार साथी अविनाश वाचस्‍पति को मैंने गिरफ्तार करवा कर जेल में डलवा दिया है और बाकियों को लाईन में लगा रहा हूं। फोन भी कर रहे हैं। चार चार फोन उनके हाथ में हैं। अपने घर की दीवारों पर उन्होंने अपनी इस उपलब्धि को पोस्टरित करवा लिया है। पर्चे बंटवा रहे हैं और एक हेलीकॉप्टर भी किराए पर ले लिया है जिससे टनों के हिसाब से रंगीन पर संगीन पर्चे उड़वा रहे हैं। वे सभी पर्चे इस प्रकार अर्थ की ओर जा रहे हैं कि वे सीधे हिन्दी ब्लॉगरों के घर की छतों और दरवाजों पर लैंडिंग कर रहे हैं। चारों ओर गहमा गहमी का वातावरण है। दूसरी ओर ब्लॉगवाणी, चिट्ठाजगत, ब्लॉगप्रहरी इत्यादि में इसी पर दे दनादन पोस्टें लग रही हैं। पोस्टों में दुख व्यक्त किया जा रहा है और उस एक ब्‍लॉगर को जेल से छुड़ाने और जमानत पर लाने की योजनायें बनाई जा रही हैं। रायपुर, छत्‍तीसगढ़ में होने वाली ब्लॉगर बैठकी में भी एक ब्लॉगर के जेल जाने की घटना पर दो मिनिट का मौन रखा गया है। इस प्रकरण से दूरसंचार का बहुत लाभ हुआ है जबकि अविनाश वाचस्पति के दोनों मोबाइल में से एक पर भी बात नहीं हो रही है। सब ब्लॉगर आपस में एक दूसरे से बतिया रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनके मन में मोतीचूर के लड्डू फूट रहे हैं। जबकि अधिकांश इस पर बहुत रोष में हैं। अविनाश वाचस्पति का कहना है कि यह सब क्रिया कलाप तो जिंदगी का एक हिस्सा हैं। हमें हिन्दी ब्लॉगिंग के रास्ते में आने वाली ऐसी बाधाओं से तनिक भी विचलित नहीं होना है। अगर मैं हिन्दी ब्लॉगिंग के नाम, रचना चोरी के विरोध में एक टिप्पणी देने के जुर्म में, जबकि वो सीधे से सच्चाई का साथ है, शहीद भी हो जाता हूं तो मुझे रंच मात्र भी अफसोस नहीं होगा। पर आप लोग सच्चा्ई का साथ तनिक न छोड़ना।
प्रिंट मीडिया पर ब्‍लॉग चर्चा ब्‍लॉग में कई समाचार पत्रों में इस खबर की सूचना है। मैं इधर क्लिक करता हूं और तभी तालियों की आवाज के बीच दोप‍हरिया नींद टूट जाती है। सामने टेलीविजन पर स्‍टार चैनल पर लाफ्टर चैनल पर किसी बात सिद्धू के कथन पर हंसी और ठहाकों भरी तालियां स्‍वप्‍न से हकीकत में पहुंचा देती हैं। फिर वही सच्‍चाई सामने है लेकिन अब स्‍वप्‍न से सच्‍चाई ... में आ चुका हूं और स्‍वप्‍न को स्‍मरण कर क्‍या करूं, सोचूं समझ नहीं आ रहा है इसलिए इसे आप सबके सामने ज्‍यों का त्‍यों पेश कर रहा हूं। मनन के लिए। वैसे दिन का स्‍वप्‍न सच नहीं होता - मैंने तो अब तक ऐसा ही सुना जाना है।
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27 जनवरी से 4 फरवरी 2010 तक का ग्रहयोग भी मौसम के बिल्‍कुल प्रतिकूल है !!

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के द्वारा मौसम से संबंधित भविष्‍यवाणियां करने के क्रम में हमारी एक नजर दूर तक फैली होती है तो दूसरी नजर नजदीक तक। एक ही व्‍यक्ति के द्वारा हर प्रकार के काम को करने की ये विवशता ही समझें कि हम दूरबीन का प्रयोग करते हुए हर स्‍थान के पत्‍थरों की सही माप नहीं ले पाते हैं। जिस प्रकार रास्‍ते में चलते वक्‍त हमें दूर के बडे बडे पत्‍थर ही दिखाई पडते हैं , पर नजदीक जाने पर छोटे छोटे पत्‍थर भी हमारी दृष्टि से नहीं बच पाते , बिल्‍कुल वैसी ही दृष्टि हम मौसम का अनुमान करने वक्‍त रखते हैं। यही कारण है कि मैं मौसम के बारे में एक भविष्‍यवाणी दो तीन महीने पहले और एक बिल्‍कुल निकट में करती हूं।

प्रवीण जाखड जी को जबाब देने के क्रम में 3 अक्‍तूबर को ही मैने मध्‍य दिसंबर में देश के मौसम के खराब होने की सूचना दे दी थी, जिसे 10 दिसंबर को मैने पुन: दुहराया था। पर तबतक मौसम विभाग का पूर्वानुमान आ चुका था, इसलिए दिनेशराय द्विवेदी जी को मेरी सूचना उनकी नकल लगी और उन्‍होने मुझे भारत के मौसम खराब होने का दो महीने बाद का डेट मांगा , जिसके लिए मैने उन्‍हें 3 - 4 फरवरी की तिथि दी थी। 3 फरवरी के दस दिन पहले पुन: इसकी सूचना पाठकों को देनी मैं आवश्‍यक समझती हूं , जिसके कारण आज मौसम के बारे में मेरा पोस्‍ट लिखना आवश्‍यक था। पर कल प्रवीण शाह जी की टिप्‍पणी भी मिली , जिसमें उन्‍होने मुझसे पूछा ...

आदरणीय संगीता जी,
यहाँ पर आपने भविष्यवाणी की है कि 6 जनवरी से ही थोडी राहत मिलनी शुरू हो जाएगी , जबकि 16 जनवरी के बाद ठंड से काफी राहत मिलेगी। 
अभी तो उत्तर भारत भीषण शीत लहर से त्रस्त है...इस काफी राहत को मिलते-मिलते काफी देर नहीं हो गई ?



उनको भी मैने लिखा कि कल के पोस्‍ट में आपको इसका जबाब मिल जाएगा , इसलिए आज पोस्‍ट लिखना अधिक आवश्‍यक था। दरअसल जाडे के इस मौसम में मौसम खराब रहने वाली जो बडी ग्रहीय बाधा थी , वह 16 दिसंबर तक ही थी , इसलिए मैने उसकी चर्चा की थी और उसके बाद बहुत स्‍थानों पर मौसम में सुधार होता देखा गया। पर 18 जनवरी से 22 जनवरी तक मौसम को बाधित करने वाली एक छोटी बाधा पुन: आकर उपस्थित हो गयी , जिसके कारण पुन: मौसम में गडबडी आयी , जिसपर मेरा ध्‍यान पहले नहीं जा सका। इस दृष्टि से 23 जनवरी से 26 जनवरी तक का मौसम थोडा सुधरा हुआ रहेगा।


अब चलती हूं मौसम से संबंधित अगली भविष्‍यवाणी की ओर, 3-4 फरवरी के जिस योग के बारे में चर्चा मैने 9 दिसंबर 2009 को ही कर रखा है , अब वह बहुत निकट है और इसका प्रभाव मुझे 27 जनवरी से ही पडता दिखाई दे रहा है , जो 3-4 फरवरी 2010 तक अपनी चरम सीमा पर रहेगा। इस कारण अब 6 या 7 फरवरी के बाद ही मौसम में कुछ बदलाव आने की संभावना दिखती है। हमेशा की तरह इस ग्रह योग का प्रभाव पूरे विश्‍व में जहां तहां तहां पडता ही है , उत्‍तर भारत के अधिकांश राज्‍यों को भी मैं इससे प्रभावित होते देखा करती हूं। इसलिए दो तीन दिनों में भले ही ठंड में थोडी कमी दिखाई दे , पर 4 फरवरी तक उत्‍तर भारत को स्‍थायी तौर पर राहत मिलने की बात मुझे नहीं दिखाई देती। शायद यही कारण है प्रवीण शाह जी कि इस काफी राहत को मिलते-मिलते काफी देर होती जा रही है !!



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तेलंगाना –दबाव और अन्तर्विरोध के स्वर

जन-जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त.
आये दिन बन्द
हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री
आये दिन आत्म-हत्यायें
छात्रों का आन्दोलन
तीन विश्व-विद्यालयों में परीक्षायें स्थगित
पूरा सेमिस्टर बर्बाद
दसियों छात्र शहीद हो गये
बीसीयों पुलिस-कर्मी भी.
अनगिनत वाहन जलाये गये
सार्वजनिक सम्पत्ति स्वाहा हुई.
राजनेताओं को कोई मार्ग ही नहीं दिखता
दबाव में पहले माँग मान ली
दबाव में पलट भी गये
दबाव में ही कई विधायकों का इस्तीफ़ा
दबाव में चल रहा मन्त्रणाओं का नाटक…
दबाव का एक और भी पक्ष है
जिस पर बात करना भी
नये खतरे को निमंत्रण देना होगा…
…. छात्रों की आत्म-हत्यायें …
किसी और ही दबाव का नतीजा हैं…
…कहीं गरीबी, कहीं असफ़ल प्रेम
…कहीं फ़ेल होने का भय,
तो कहीं जलती पूरा पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें और अपनी राय दें

साधक उम्मेदसिंह बैद
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ये लघु संदेश सेवा है , अरे एस एम एस है यार ...अजय कुमार झा



कुछ दिनों से मोबाईल में एस एम एस आ रहे थे , जाहिर है कि आपको भी आ रहे होंगे , मुझे कुछ को पढ को हंसी आई कुछ को पढ के नहीं आई , अब जरूरी तो नहीं कि मुझे नहीं आई तो और भी किसी को न आए , तो लीजीये न एक पोस्ट झेलिए ऐसी भी
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लपटन जी : सुना ,चांद पर पानी मिला है ...........


झपटन जी :- ओह ये तो बहुत बडी खबर है, बस इतना और पता चल जाए कि नमकीन, गिलास और दारू यहीं से ले के जाना पडेगा कि वो भी ........

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एक इश्वरीय संदेश :-
तू करता वो है जो तू चाहता है , मगर होता वो है जो मैं चाहता हूं , तू वो कर जो मैं चाहता हूं , फ़िर वही होगा जो तू चाहता है ....

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लपटन जी ने अपनी प्रेमिका का फ़ोन लेकर देखा कि आखिर मिस लपटन ने उनका नंबर किस नाम से सेव कर रखा है .......जानू, डीयर , मिस्टर ......अरे नहीं लिखा था ........टाईम पास नंबर ....आठ

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दोस्त रूठे तो रब रूठे ........

दोस्त फ़िर रूठे तो जग छूटे,

दोस्त फ़िर रूठे तो ......

चप्पल मारो साले को रोज का एक ही ड्रामा
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मेरे भाई कभी याद किया करो,

यार कभी कभी तो मिल लिया करो,

सिर्फ़ जनाजे में आना दोस्ताना नहीं होता

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लपटन जी ने अपनी लपटानी से कहा, ओ जाने तमन्ना हटा लो ये जुल्फ़ें अब तो ,,,,,,जो अब खाने में मिला एक भी बाल तो खुदा कसम .........सजनी से सीधा , गजनी बना दूंगा ....

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लपटानी की बेटी सयानी ने शादी के अगले दिन श्रीमती लपटानी को फ़ोन किया , "मां , मेरी इनसे लडाई हो गई है ?

श्रीमती लपटानी, " कोई बात नहीं बेटा, घबराने की कोई बात नहीं , सब ठीक हो जाएगा ॥

सयानी : " मां, वो तो ठीक है , मगर अब ये तो बताओ कि इनके लाश का क्या करूं ????
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इंसान की चार मां होती हैं

एक जिसने पैदा किया ,
एक वो जिसने पढाया ,
एक सासू मां , और

चौथी वो जिसके लिए मम्मी कहती है ," ओये कंजरा,राति दो बजे , केडि मा नाल गल्ला मारि जान्दा है "

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लपटन जी अपनी प्रेमिका से , " यार तुम चाईनीज़ जैसी क्यों दिखती हो ?

प्रेमिका ," क्योंकि मेरे पिता चाईनीज़ थे , इसलिए ।

लपटन जी ," अच्छा अच्छा, अब वे कहां हैं ?

प्रेमिका ," वे तो मर गए ।

लपटन जी ," हां , भई आखिर चाईना का माल था चलता भी कितना
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टीचर जी : लपटन translate करो,"बाजार में गोलियां चल रही थीं "

लपटन काफ़ी सोचने के बाद " the tablets are walking in the market "

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अरे बस जी , अभी तो मोबाईल भी है और मैसेज भी बाकी फ़िर कभी
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चैन्नई में हूँ मैं कल्पतरु विवेक रस्तोगी और यहाँ के ब्लॉगर्स से मिलने की तमन्ना है।

मैं कल्पतरु विवेक रस्तोगी आज ही चैन्नई पहुँचा हूँ। और अब थोड़े दिन यहीं रहने वाला हूँ। अगर कोई ब्लॉगर बन्धु यहाँ पर हों तो कृप्या मुझे ईमेल करें, मैं चैन्नई के हिन्दी ब्लॉगरों से मिलना चाहता हूँ।

ईमेल है - rastogi.v@gmail.com
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स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम राशि को कम कैसे करें, स्वास्थ्य बीमा के बारे में जानें


स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम राशि को कम कैसे करें –


    कोई भी कीमत से ज्यादा भुगतान देना पसंद नहीं करता है। सबसे उपयुक्त और उचित दामों पर स्वास्थ्य बीमा कुछ पहलुओं पर आधारित होते हैं। यह आपकी पसंद पर भी निर्भर करता है कि आप कौन सी योजना लेते हैं, और पॉलिसी खरीददार का स्वास्थ्य कैसा है। लेकिन कुछ निम्न बातों से आप अपनी स्वास्थ्य बीमा की राशि को काफ़ी हद तक कम कर सकते हैं।

  • धूम्रपान करने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य हमेशा खतरे में रहता है और धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को गैर धूम्रपान करने वाले व्यक्ति से ज्यादा प्रीमियम राशि का भुगतान करना पड़ता है। तो प्रीमियम राशि कम अदा करने के लिये आपको धूम्रपान छोड़ देना चाहिये।
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अर्थशास्त्र के स्थापित सिद्वांत बदल गये हैं बिहार में

अर्थशास्त्र के सिद्वांतों को मानें तो बिना उधोग-धंधों के विकास के, किसी भी प्रदेश की विकास की बात करना बेमानी है। आमतौर पर माना जाता है कि विकास की प्रथम सीढ़ी कृषि के क्षेत्र में विकास का होना होता है। विकास का रास्ता खेतों से निकल कर के ही कल-कारखानों के आँगन तक जाता है। उसके बाद ही वह सेवा क्षेत्र की ओर रुख कर पाता है।
बीमारु राज्य के रुप में पहचाने जाने वाले बिहार में 2004-09 के दौरान जादुई तरीके से विकास हुआ और इसने 11.03 फीसदी के दर के आँकड़े को आसानी से प्राप्त कर लिया। आगे पढ़ें...
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BIG Home Video in association with Universal Pictures International BV brings to you "The Soloist"

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डॉ.अभिज्ञात को अम्बडेकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान


नुक्‍कड़ की बधाई

कोलकाताः रविवार की देर रात तक आयोजित एक भव्य समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए अम्बेडकर सम्मान प्रदान किये गये। डॉ.अभिज्ञात को उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान आरके एचआईवी एड्स रिसर्च एंड केयर सेंटर के चेयरमैन डॉ.धर्मेन्द्र कुमार ने प्रदान किया। दो दशकों से पत्रकारिता कर रहे डॉ.अभिज्ञात सम्प्रति सन्मार्ग में वरिष्ठ उप-सम्पादक हैं। वे साहित्य में भी सक्रिय हैं और छह कविता संग्रह तथा दो उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पांच पुरस्कार-सम्मान मिले हैं। यह समारोह उपनगर टीटागढ़ में आयोजित था।

महिलाओं के विकास में योगदान के लिए डॉ.सुरंजना चौधरी, ग्लोबल पर्सनालिटी आफ द ईयर रमेश प्रसाद हेला, औद्योगिक उपलब्धि सम्मान लोकनाथ गुप्ता, अम्बेडकर गुरुद्रोण सम्मान नृत्यानंद जी महाराज, सामाजिक जागरुकता सम्मान डॉ.संतोष गिरि, मैन आफ द ईयर सम्मान आत्माराम अग्रवाल, उभरता मीडिया उद्योग सम्मान विजन खबरा खबर (चैनल विजन) और यूथ आइको आफ द ईयर अवार्ड शिव प्रसाद गोसाईं को प्रदान किया गया।

कार्यक्रम डॉ.भीमराव अम्बेडकर शिक्षा निकेतन और आरके एचआईवी एड्स रिसर्च एंड केयर सेंटर की ओर से आयोजित था। इस अवसर पर टीटागढ़ डॉ.भीमराव अम्बेडकर शिक्षा निकेतन संस्था का उद्घाटन, डॉ.अम्बेडकर और संस्था के संस्थापक स्व.मक्खनलाल की मूर्ति का अनावरण उद्योगपति आत्माराम अग्रवाल ने किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का लुत्फ उपस्थित श्रोताओं ने उठाया। आराधना सिंह ने भोजपुरी गीत पेश किये।
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स्मृति शेष रांगेय राघव - जन्म तिथि १७ जनवरी

जन्म तिथि १७.०१.१९२३

निधन १२.०९.१९६२
 आज जिनका जन्म दिवस है
प्रतिभाशाली लोगो का जीवन बहुत छोटा होता है लेकिन वो इस अल्प समय मे इतना कुछ कर जाते है कि उन्हे सदियो तक याद किया जाता है.  ऐसी ही एक प्रतिभा का नाम रांगेय राघव है. १७ जनबरी,  १९२३ को आगरा मे जन्मे रांगेय राघव ने सेन्ट जोन्स कालेज आगरा से परा- स्नातक हिन्दी मे करने के बाद गुरु गोरखनाथ पर शोध किया और अपने लिये साहित्य के डाक्टर की उपाधि हासिल की. उनका पूरा नाम तिरूमल्ली नम्बकम वीर राघव आचार्य था. उन्हे अंग्रेज़ी, हिन्दी, संस्कृत और उस बृज भाषा पर पूर्ण अधिकार था. हम जब छोटे थे तब पढे लिखे लोग उनकी चर्चा एक किवदन्ती पुरुष की तरह करते थे. मेरे पिता और उनके  साथी इस बात पर बहुत फ़क्र करते थे कि उन्होने अपनी जिन्दगी मे एक महान लेखक को देखा है और मुझे ये सौभाग्य मिला कि उनकी अर्धान्गिनी श्रीमती सुलोचना राघव और उनकी पुत्री से बाद मे मिला.   


सिर्फ़ १३ साल की उमर मे उन्होने लेखन शुरु कर दिया था और सबसे पहले साहित्य जगत मे उनकी चर्चा बन्गाल के अकाल पर उनकी रिपोर्ट से हुई  तब उनके उमर १९ साल थी. उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी जिसमे चित्रकला, सन्गीत, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, सन्स्मरण लेखन, आलोचना  और अनुवाद शामिल है. और इस विविधता ने लेखक के रूप मे उनकी प्रतिभा को नये आयाम और विशिष्टता प्रदान की. लम्बी बीमारी से झूझते हुए ३९ बर्ष की बहुत ही अल्प आयु मे १२ सितम्बर १९६२ को निधन से पहले उन्होने करीब १५० किताबे लिखी.


अपनी सृजन-यात्रा के बारे में रांगेय राघव ने स्वयं कोई खास ब्योरा नहीं छोड़ा है—खास कर अपने प्रारंभिक रचनाकाल के बारे में। लेकिन एक जगह उन्होंने लिखा है, ‘‘...चित्रकला का अभ्यास कुछ छूट गया था। 1938 ई॰ की बात है, तब ही मैंने कविता लिखना शुरू किया। सांध्या-भ्रमण का व्यसन था। एक दिन रंगीन आकाश को देखकर कुछ लिखा था-वह सब खो गया है—और तब से संकोच से मन ने स्वीकार किया कि मैं कविता कर सकता हूँ। ‘प्रेरणा कैसे हुई’ पृष्ठ लिखना अत्यंत दुरुह है। इतना ही कह सकता हूं कि चित्रों से ही कविता प्रारंभ हुई थी और एक प्रकार की बेचैनी उसके मूल में थी’’ (साहित्य संदेश, जनवरी-फरवरी, 1954)।

कहानी लिखना वे इससे पहले शुरू कर चुके थे—1936 से, जब वे सिर्फ तेरह वर्ष के थे। हालाँकि उनकी उस उम्र की कहानियों और दूसरी रचनाओं के संबंध में निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना मुश्किल है। मुमकिन है, उनमें से कुछ बाद के वर्षों में नष्ट कर दी गई हों, क्योंकि उनके मित्र परिजनों के मुताबिक न जँचने पर वे अपनी रचनाओं के साथ यही सलूक करते थे। फिर भी इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ रचनाएँ बाद में दोबारा लिखी या दुरुस्त न की गईं या बतौर लेखक स्थापित होने के बाद दस्तावेजीकरण की दृष्टि से छपाई न गई होगीं। मसलन अंधेरे की भूख और बोलते खँडहर जो क्रमशः 1954-55 में प्रकाश में आई, जिन पर लेखक ने किशोरावस्था में पढ़े रोमांचक विदेशी उपन्यासों का स्पष्ट प्रभाव स्वीकार किया है।



रांगेय राघव को जो पुरुस्कार मिले उनमे प्रमुख रहे - १. हिन्दुस्तान अकेदेमी अवार्ड ( १९४७ ), २. डाल्मिया अवार्ड ( १९५४ ), ३. उत्तर प्रदेश सरकार अवार्ड {१९५७, १९५९), ४. राजस्थान साहित्या अकादमी अवार्ड ( १९६१ ), ५. महात्मा गान्धी अवार्ड ( १९६६ ) - निधन के बाद.

अपनी प्रसिद्ध पुस्तक पुस्तक प्राचीन ब्राह्मन कहानिया की प्रस्तावना मे वो लिखते है कि "आर्य परम्पराए अनेक अनार्य परम्परओ से मिलन हुआ है. भारत की पुरातन कहानियो मे हमे अनेक परम्परओ के प्रभाव  मिलते है. महाभारत के युद्ध के बाद हिन्दू धर्म मे वैष्नव और शिब चिन्तन की धारा वही और इन दोनो सम्प्रदयो ने पुरातन ब्राहमन परम्पराओ को अपनी अपनी तरह स्वीकार किया..इसी कारण से वेद और उपनिषद मे वर्णित पौराणिक चरित्रो के बर्णन मे वदलाव देखने को मिलता है. और बद के लेखन मे हमे अधिक मानवीय भावो की छाया देखने को मिलती है. मै ये महसूस करता हू कि मेरे से पहले के लेखको ने अपने विश्वास और धारणाओ के आलोक मे मुख्य पात्रो का बर्णन  किया है और ऊन्चे मानवीय आदर्श खडे किये है और अपने पात्रो को साम्प्रदायिकता से बचाये रखा है इसलिये मैने पुरतान भारतीय चिन्तन को पाठको तक पहुचाने का प्रयास किया है."


उनकी लिखी प्रमुख पुस्तको के नाम है. - 
घरौन्दा 
कब तक पुकारू
रत्ना की बात 
भारती का सपूत 
देवकी का बेटा
लूई का ताना
यशोधरा जीत गई 
आखरी आवाज़
पथ का पाप
लखिमा की आखे 
उनके बारे मे कहा जाता था कि वो दोनो हाथो से रात दिन लिखते थे और उनके लिखे ढेर को देखकर समकालीन ये भी कयास लगाते थे कि शयद वो तन्त्र सिद्ध है नही तो इतने कम समय मै कोइ भी इतना ज्यदा और इतना बढिया कैसे लिख  सकता है. उन्हे हिन्दी  का पहला मसिजीवी कलमकार भी कहा जाता है जिनकी जीबिका का साधन सिर्फ़ लेखन था. 



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आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP..]

यूलिप के तहत आयकर पर छूट
य़ुलिप में निवेश की गई राशी आपको आयकर के तहत छूट भी प्रदान करते हैं। यूलिप में किया गया निवेश आयकर की धारा 80 C  के तहत ज्यादा से ज्यादा १,००,००० तक के निवेश को आयकर में छूट मिलती है।निवेशक द्वारा चुनी गई योजनाओं से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
कड़ियाँ पढ़ने के लिये नीचे दी गईं लिंक पर चटका लगाईये।
भाग १ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 1]
भाग २ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 2]
भाग ३ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 3]
भाग ४ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 4]
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मेहदी हसन के जीवन संघर्षों और रोचक किस्‍सों से रू-ब-रू कराती एक किताब

अभी हाल ही में गजल के आसमान के ध्रुवतारे मेहदी हसन (वैसे गजल गायकी के क्षेत्र में मेहदी हसन साहब की शख्सियत ऐसी है कि उनके लिए कोई भी विशेषण नाकाफी मालूम होता है) पर एक किताब आई है- ‘मेरे मेहदी हसन’, जिसके बारे में प्रकाशक, लेखक और खुद मेहदी हसन साहब के परिजनों का दावा है कि ये उन पर लिखी गई पहली किताब है। जैसाकि किताब के शीर्षक से ही जाहिर है, यह लेखक अखिलेश झा के मेहदी हसन साहब के प्रति उस दीवानगी की उपज है, जिसने लेखक को उनसे मिलने और अंतत: उन पर किताब लिखने के लिए प्रेरित किया। खुद लेखक के शब्‍दों में- ‘मेहदी हसनसाहब को सुनने की जितनी बेकरारी जिंदगी भर रही, उतनी ही बेकरारी उनसे मिलने की भी रही और उनसे मिलने के बाद उन पर लिखने की उससे कम नहीं। लिखने की बेकरारी इसलिए कि मैंने उनके चाहने वालों का उनके लिए दीवानापन देखा है। जिसे आप इतनी शिद्दत से सुनते हैं, उसके बारे में जानने की बेकरारी भी तो होगी ही।’ Read More..
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रूम हीटर कौन सा लूं : ठंड कड़ाकेदार है (अविनाश वाचस्‍पति)


ठंड कड़ाकेदार है
तबीयत हुई नासाज है
पूछता हूं सबसे
हीटर लूं
तो कौन सा लूं ?

सुना है
गैस का भी आता है
जो किफायती भी है
पर स्‍वास्‍थ्‍य के लिए
मालूम नहीं कैसा हो ?
पर जानकारी नहीं है
मेरे पास
जिनके पास होगी
वे बतलायें
सबका ज्ञान बढ़ाएं।

बिजली के तो
बहुत सारे हैं
सस्‍ते हैं
महंगे भी हैं
पर चाहत है
खरीदूं ऐसा
जो टिकाऊ तो हो ही
स्‍वास्‍थ्‍य के लिए महंगा
भी साबित न हो।

हीटर जो सस्‍ते आते हैं
वो हवा में से
पानी की मात्रा घटाते हैं
स्‍वास्‍थ्‍य को उससे
होता है नुकसान
और जो होते हैं ब्‍लोअर
वे भी करते हैं
शायद ऐसा ही कुछ।

सुना है
अब अधुनातन तकनालॉजीयुक्‍त
हीटर जो आ रहे हैं
उनमें ऐसी प्रक्रिया होती है
पहचाने जाते हैं ऑयल बेस्‍ड
उनकी धमनियों में तेल होता है गर्म
जिससे वातावरण ठंडा नहीं होता
स्‍वास्‍थ्‍य को भी उनसे
हानि नहीं होती
पर उसकी जानकारी चाहिये
दाम के साथ
उत्‍तम ब्रांड भी बतलाइये
जो ट्रबलरहित सर्विस दे।

जो कर रहे हों उपयोग
या रखते हों जानकारी
वे बतलायें कि क्‍या
खरीदना चाहिये
ऐसा न हो
कि खरीदना कुछ हो
और हम खरीद कुछ लायें
फिर बाद में पछतायें
और चिडि़या चुग जाये ...

हीटर ऐसा चाहिये
जो सर्दी की
थर्र थर्राहट खत्‍म कर दे।
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सहारा के कैम्पस में धूम्रपान करेंगे तो सजा पाएंगे

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लड़किया पतंग उडाती है



लडकियां उडाती हैं पतंगे
लेकिन चरखी कोई और पकड़ता है
वो डोर पकड़ती है
पतंग को छुट्टी कोई और देता है


वो पतंग तो उडाती हैं
तंग कोई और ही बांधता है
या वो उडाती हैं
पतंगे जो कटके छत पे आती हैं


उनकी पतंग उडती भी है
आकाश में लेकिन
घरवाले आगाह करते हैं
पेच ना लड़ाने की सीख देते हैं


जो लडकियां पतंग उडाती हैं
तो उनसे ये भी कहा जता है कि
भले कोई ढील दे
तुम्हें अपनी डोर खीचके ही रखनी है


हाँ लड़किया पतंग उडाती है
पर क्या पता उसे आसमान निगलता
या धरती खाती है
शाम होते गगन में आवारा पतंगे रहती हैं
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टीआरपी सिस्टम पर सवाल कौन उठाएगा ?

सैमुअलसन की थ्योरी है डॉलर वोट की। सैमुअलसन जैसे अर्थशास्त्री न कहते तो भी निजी अनुभवों से हम जानते हैं कि हर आदमी की बराबर हैसियत नहीं होता। हैसियत का मतलब सीधे तौर पर पैसा पढ़ें तो कुछ गलत नहीं होगा। तो इस बात पर बहस की गुंजाइश नहीं है कि दर्शकों की संख्या नापने के लिए लगाए गए टीआरपी के मीटर तो महानगरों और खाते-पीते इलाकों और घरों में ही लगेंगे। अब जबकि कुछ लोग कह रहे हैं कि टीवी न्यूज चैनलों में गड़बड़ियों की सबसे बड़ी वजह टीआरपी का मौजूदा सिस्टम ही है तो सवाल उठता है कि क्या मीडिया इस सिस्टम पर सवाल उठाने के लिए क्वालिफाइड है।
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भोजपुरी के कबीर थे भिखारी ठाकुर

भोजपुरी के कबीर थे भिखारी ठाकुर-
बिदेशिया शैली के प्रवर्तक एवं लोक वीणा के तारों की मधुर झंकार के साथ स्वयं मंच पर थिरकने वाले भिखारी ठाकुर अपने युग के सर्वश्रेष्ठ कलाकार थे। भिखारी के कंठ में अपूर्व माधुर्यं, स्वर में सरस संगीत एवं नाट्य कला में अद्वितीय सौन्दर्य था। उनका बिदेशिया नाटक महाराष्ट्र की तमाशा, गुजरात की भवाई और ब्रज की रासलीला शैली की तरह प्रसिद्व है।
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टर्म इंश्योरेन्स क्या होता है.. (What is Term Insurance…)

टर्म जीवन बीमा योजना लेने के लिये जो राशि आपने खर्च की है उस राशि पर आपको आयकर की धारा ८०(सी) के तहत छूट मिल जायेगी।

और बची हुई राशि जो कि आमतौर पर हम लोग इंश्योरेन्स के लिये निवेश करते हैं, उसे अच्छे म्यूचयल फ़ंड में या अच्छे शेयर में निवेश करें, तो आपको लंबे समय में बेहतर रिटर्न मिलेंगे।


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टीआरपी टेलीविजन पत्रकारिता के लिए अभिशाप है - अजीत अंजुम

टीआरपी टेलीविजन पत्रकारिता के लिए अभिशाप है - अजीत अंजुम
आईबीएन -7 के साप्ताहिक कार्यक्रम मुद्दा में अलग-अलग विषयों पर गरमा-गरम बहस होते रहता है. तेज -तर्रार और अपनी आक्रामक शैली के लिए अलग पहचान रखने वाले एंकर संदीप चौधरी इसे पेश करते हैं. इस हफ्ते प्रसारित मुद्दा का विषय कुछ अलग हटकर था. इस बार की बहस के केंद्र में खुद टेलीविजन चैनल थे. विषय था - खबर या तमाशा. बहस करने वाले पैनल में राजदीप सरदेसाई, चंदन मित्रा, अजीत अंजुम, एनके सिंह और सतीश जेकब थे. Media Khabar – Hindi Journalists News – News in Hindi by Media Khabar
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विकास के पथ पर बिहार का बढ़ता कारवां

‘जहाँ चाह वहाँ राह’ वाली बरसों पुरानी कहावत को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चरितार्थ कर दिया है। केन्द्रीय सांख्यकीय संगठन के ताजा रपट को यदि सच मानें तो बिहार का विकास दर 11.03 फीसद है जो गुजरात के विकास दर 11.05 फीसद से मात्र 00.02 फीसद कम है, पर राष्ट्रीय औसत जो कि 8.49 फीसद है से 2.54 फीसद अधिक है। रपट प्रवासी बिहारी एवं गैर बिहारी दोनों के लिए चौकाने वाला हो सकता है, किन्तु है यह शत -प्रतिशत सही।
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हंसने कि बारी है !

एक बार एक समाज सेवक मृतु  के पश्चात यमलोक पहुंचा तो वहां उसने कई प्रकार की दीवार घड़ी देखीं ,जो विभिन्न गति से चल रही थीं !उसने यमराज से कारण पूछा,तो यमराज बोले " ये विभिन्न देशों कि घड़ियाँ हैं ,जिस देश में जितना ज्यादा भ्रस्टाचार, उतनी उसकी गति !" उस व्यक्ति ने नजर दौड़ाई लेकिन कहीं उसे भारत कि घड़ी नजर न आई ,उसने यमराज से पूछा "बताओ भारत कि घड़ी न लगाने की कितनी घूस खाई!" तब यमराज बोले "नाराज क्यों होते हो मेरे भाई मेरे कमरे में जाकर देखो ,वह तो मेरे पंखे का काम कर रही है !"
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साधक-परिक्रमा-२

कृष्ण कुमार की चिन्ता - जहर की खेती, bharatiyapaksha.com पर देखी, तो कुण्डली बनी-

विचार ही जब दूषित हो तो , क्या सब्जी की बात!
राह रुद्ध है मानवता की, दानव करता घात.
दानव करता घात, मोह-लालच की शकल में .
कितना भी कर लो, ना घुसता सही अकल में.
कह साधक कवि , हुई धरा- आकाश कलुषित.
सब्जी की क्या बात, विचार ही है जब दूषित.

Bhadas.blogspot.com पर अमर सिंह के इस्तीफ़े की चर्चा में एक तीन लेख देखे, एक पर ट्टिपणी करके लौट आया.

अमर बेल हैं अमरसिंह, राजनीति के गाँव.
वहीं पे बँटा ढार है, जहाँ पङे ये पाँव.
जहाँ पङे ये पाँव, जमीनें धंस जाती हैं.
अच्छी-भली- मुलायम गाङी फ़ंस जाती है.
कह साधक कवि, दल्लालों का यही खेल है.
राजनीति के गाँव, अमरसिंह अमर बेल हैं.
bhadas.blogspot.com पर ही उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री श्री निःशंक की तारीफ़ में एक आलेख पढा.कवि हैं, वाजपेयी की परम्परा को आगे बढायेंगे, अच्छी बात लगी. अच्छी बात की तारीफ़ होनी ही चाहिये, सो लिखा-

शंका नहीं कवित्व में, निशंक पाया नाम.
राज्यनीति के भाल पर,टीका ललित-ललाम.
टीका ललित-ललाम, यही आशा है इनसे.
काजल की कोठरी है, बचना कालेपन से.
कह साधक कवि प्रश्न उठे सीता-सतीत्व में.
निशंक तेरा नाम, शंका नहीं कवित्व में.

Bhadas.blogspot.com पर दन्तेवाङा के एक लेखक विशाल ने आदिवासियों और माओवादियों के समीकरण में मेधा पाटकर की गोलमोल चर्चा की. पूछा उनसे-

हिमांशु- मेधा जिक्र में, सही-गलत है कौन?
कलम आपकी भ्रमित है, सुनना बन्धु विशाल.
सुनना बन्धु विशाल, बहुत मुश्किल होता है.
समस्या को कह देने से क्या हल होता है?
कह साधक कवि सत्य खोजना सही स्वयं में.
सही-गलत है कौन हिमांशु- मेधा जिक्र में !

तिवारी जी की यौन-शक्ति से अचम्भित/प्रेरित एक आलेख bhadas.blogspot.com पर देखा तो बरबस कुण्डली निकली-

पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए क्लिक कीजिए -साधक उम्मेदसिंह बैद
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आज़ाद भारत की समस्याएं

नमस्कार दोस्तों ! हिन्दुस्तान को आज़ाद हुए सालों हो गए पर अभी भी ऐसी बहुत सी समस्याएं हैं जो देश को खोखला कर रही हैं ! पर हम आशा करते हैं या कहें कि कोशिश है हमारी कि हम अपने देश को इन सभी समस्याओं  से निजात  दिला सकें! पेश है यह कविता !


भारत की आजादी को वीरों 
ने दिया है लाल रंग !
यह लाल रंग क्यों बन रहा है ,
मानवता का लाल रंग !
आज़ादी हमने ली थी ,
समस्याएँ मिटाने के लिए 
सब खुश रहें जी भर जियें 
जीवन है जीने के लिए 
पर आज सुरसा की तरह 
मुंह खोले समस्याएं खड़ी
और हर तरफ चट्टान बनकर 
मार्ग में हैं यह अड़ी
अब कहाँ हनु शक्ति 
जो इस सुरसा का मुंह बंद करे 
और वीरों की शहीदी  में
नए रंग वह भरे 
भुखमरी,बीमारी ,बेकारी
यहाँ घर कर रही 
यह वही भारत भूमि है 
जो चिड़िया सोने की रही 
विद्या की देवी भारती
जो ज्ञान का भण्डार है 
अब उसी भारत धरा पर 
निरक्षरता का प्रसार है
ज्ञान और विज्ञान जग  में 
भारत ने ही है दिया 
वेदों की वाणी अमर वाणी 
को लुटा हमने दिया 
वचन की खातिर  जहां पर 
राज्य छोड़े जाते थे
प्राण बेशक त्याग दें 
पर प्रण न तोड़े जाते थे 
वहीँ झूठ,लालच ,स्वार्थ का है 
राज्य फैला जा रहा 
और लालची  बन आदमी
बस वहशी बनता जा रहा 
थोड़े से पैसे के लिए 
बहू को जलाया जाता है 
माँ के द्वारा आज सुत का
मोल लगाया जाता है 
जहां बेटियों को देवियों के 
सदृश पूजा जाता था 
पुत्री धन पा कर मनुज 
बस धन्य-धन्य हो जाता था 
वहीँ अब पुत्री को जन्म से 
पहले मारा जाता है 
माँ बाप से बेटी का वध 
कैसे सहारा जाता है ?
राजनीती भी जहां की 
विश्व में आदर्श थी 
राम राज्य में जहां 
जनता सदा ही हर्षित थी 
ऐसा राम राज्य जिसमें 
सबसे उचित व्यवहार था 
न कोई छोटा ,न बड़ा 
न कोई अत्याचार था 
न जात  पात ,न किसी 
कुप्रथा का बोलबाला था 
न चोरी लाचारी जहां पर 
रात भी उजाला था 
आज उसी भारत में 
भ्रस्टाचार  का  बोलबाला है
रात भी  क्या यहाँ पर 
दिन भी काला काला है
हो गयी वह राजनीति
भी भ्रष्ट इस  देश में
राज्य था जिसने किया 
बस सत्य के ही वेश में
मजहब,धर्म के नाम पर 
अब सिर भी फोड़े जाते हैं 
मस्जिद कहीं टूटी , कहीं 
मंदिर ही तोड़े जाते हैं 
अब धर्म के नाम पर 
आतंक फैला देश में 
स्वार्थी कुछ तत्व ऐसे 
घुमते हर वेश में 
आदमी ही आदमी का 
खून पीता जा रहा 
प्यार का बंधन यहाँ पर 
तनिक भी तो ना रहा 
कुदरत की संपदा का भारत 
वह अपार भंडार था 
कण कण में सुन्दरता का 
चंहु और प्रसार था 
बक्शा नहीं है उसको भी 
हम नष्ट उसको कर रहे
स्वार्थ वश हो आज हम 
नियम प्रकृति  के तोड़ते 
कुदरत भी अपनी लीला अब
दिखा रही विनाश की 
ऐसे लगे ज्यों धरती पर 
चद्दर बिछी हो लाश की 
कहीं बाढ़ तो कहीं पानी को भी 
तरसते  फिर रहे लोग 
भूकंप,सुनामी कहीं वर्षा है 
मानवता के रोग 


ये समस्याएं  तो इतनी 
कि ख़त्म होती नहीं 
पर दुःख तो है इस बात का 
एक आँख भी रोती नहीं !


                                      नमस्कार !
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दिल्‍ली में आज मिलेंगे ब्‍लॉगर, पाठक, साहित्‍यकार और पत्रकार : जिन्‍हें चाहिये खबर वे भी अवश्‍य आयें (अविनाश वाचस्‍पति)

दिल्‍ली में
ब्‍लॉगर्स मीट कल
पर वो होगी आज
भ्रमित मत हों
कल आज ही बनता है
इसी पर वर्तमान का
तंबू तनता है।

मिलना तो है दो बजे से
पर मिलेंगे ग्‍यारह बजे भी
यह दो-दो बार मिलना
ऐसे लगेगा जैसे
मिल रहे हों हजार बार।

मैं तो अवश्‍य पहुंचूंगा
ग्‍यारह बजे ही
क्‍योंकि न जाने
किससे क्‍या सीखने को
वहीं पर मिल जाए।

तकनीक कोई हमारे
दिमाग में घुस जाए
कि कैसे लिखा जाता है
बढि़या, सिर्फ बढि़या ही नहीं
बेहतर भी
बदतर की हो जानकारी
तो उससे बचना ही
बेहतर की ओर बढ़ना है।

इसलिए घर से निकलना है ऐसे
कि पहुंच जाएं हम ग्‍यारह बजे
जैसे तैसे और सीख जाएं हम भी
वैसे सर्दी कड़ाके की है
पर सीखने की गर्मी
का करेगा कौन मुकाबला ?

वैसे विनीत कुमार ने लिखा है
आज दिल्‍ली में है ब्‍लॉगर्स मीट
सिर्फ ब्‍लॉगर्स ही नहीं आयेंगे
तो यह अर्थ मत निकालिये
ब्‍लॉगर्स नहीं आयेंगे
इसका सीधा मतलब है कि
वे तो जरूर आयेंगे
आयेंगे वे भी
जिनका सीधा नाता नहीं है
ब्‍लॉग जगत से।

अब ये टेढ़े संबंध वाले
सीधे ही होते होंगे
हम पहुंचेंगे तो
हम भी जान जायेंगे
किसी को जानना
पहचानना एक पूरी प्रक्रिया
से
गुजरना होता है
लगता है थोड़े से ही सही
आंशिक रूप से हम भी
वहां पर गुजर ही जायेंगे।

आप भी आइये
हम तो आपसे
मिलने वहां पर आयेंगे
आपको वहां नहीं पायेंगे
तो उदास हो जायेंगे
इसलिए आप मत होइये
मजबूरी के दास।

इस बारे में अधिक जानकारी के लिए
ravikant@sarai.net पर संपर्क करें
पर रविकांत जी ने अपना मोबाइल नंबर
दिया होता तो अच्‍छा होता
भला भटकेंगे जो
वो फोन करके ही तो
ले पायेंगे जानकारी
उस समय मेल कहां से भेजेंगे
और कहां पर बांच पायेंगे।

रविकांत जी अपना नंबर टिप्‍पणी में दे दें
तो जरूर लाभ होगा
दूरसंचार कंपनियों का ही सही
पर भटकने वाला भी
बेअटके पहुंच जाएगा।

फिर भी जो भटक जाएं रास्‍ता
वे नंबर मिलायें पर आहिस्‍ता
9811853307
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साधक-परिक्रमा-१

अविनाश वाचस्‍पतिजी लिखचीत(चैट) पर मिल गये. सुबह-सुबह तबियत हरी हो गई. उनसे पाँच मिनट की बात में ही नुक्कङ पर नियमित लिखने का भाव बन गया.

निर्णय हुआ तो क्रियान्विति भी होनी चाहिये. समय हालाँकि बहुत कम है, पर इसे सरकारी खाते में तो नहीं ही डाला जा सकता ना, तो यहीं से शुरु करते हैं

विस्फ़ोट पर प्रकाशित एक आलेख पढा. जीडीपी का मानव के सुख के साथ कोई लेना-देना नहीं, ऐसा लेखक का मत रहा. मुझे इससे असहमति है. मुझे तो यह दिखता है कि जैसे-जैसे जीडीपी का आंकङा ऊपर उठता है, वैसे वैसे दुःख भी बढता है. आम जनता का और गरीब होना, अमीरी-गरीबी के बीच खाई का बङा होना तो लेखक ने ही बताया…. सब जानते-मानते भी हैं; पर जिसने धन कमा लिया- याने जो अरबपति-करोङपति बन गया; उसके दर्द को कोई नहीं समझना चाहता. वह भी दुखी-दरिद्र ही है, बल्कि उसका दुख और दरिद्रता और बढे. शोषण कभी सुख नहीं देता, शोषक को सुखा देता है.

जीडीपी का आंकङा, शोषण की सौगात.
खुशियाली परिवार में, जहाँ प्रेम की बात.
चले प्रेम की बात, सिर्फ़ देना ही देना.
बाज़ारी यह तन्त्र सिखाता लेना-लेना.
यह साधक कवि, पाठ पढाता सिर्फ़ प्रेम का.
है शोषण साक्षात, आकंङा जीडीपी का.

बीजेपी पर एक लेख पढा. गडकरी के नैतृत्व में बीजेपी पुनः सँवरेगी….. तो!

चुस्त और तन्दुरुस्त हुई तो क्या कर लेगी?
सङे आम को कौन व्यवस्था स्वस्थ करेगी?
स्वस्थ करे चिन्तन-धारा, वह बिन्दु कहाँ है?
सबको करे समाहित, ऐसा सिन्धु कहाँ है?
कह साधक कवि प्रश्नों का अनवरत सिलसिला.
बीजेपी को घेरे बैठा कठिन सिलसिला.

कठिनाईयों का सिलसिला पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिएगा
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ईश्‍वर से साक्षात्‍कार : सुधा ओम ढींगरा

एक हूं मैं
पर नये नये रूपों में
आता जाता हूं
मैं हूं एक
रूप अनेक
पर सब रहें नेक।


सम्पादक का आदेश मिला --
''ईश्वर से साक्षात्कार करो,
पहले पन्ने पर छपवाओ,
अखबार की सर्कुलेशन बढ़वाओ.''

लगा, काम तो बहुत आसान है,
किसी गुरु के यहाँ जाते हैं,
भगवान से मिलते हैं,
और इंटरव्यू छाप देते हैं .

गुरु के द्वार पहुँची,
चेलों ने मुलाकात करवाई,
गुरु ने ऊँची-नीची भवें बढ़ाईं,
काफी देर मौन रह वे बोले-
''तू पत्रकार है, तेज़ तर्रार है,
लेखनी से मालामाल है,
समझदार है, पर बेकार है.''

जानती हो क्यों ?
गुरु सेवा के लिए,
तन, मन, धन चाहिए-दे सकोगी?
अन्धविश्वासी-बन सकोगी ?
गुरु की वाणी ही सत्य है- कह सकोगी ?
गुरु के अन्दर ही भगवान है -मान सकोगी ?
तभी तुम भगवान से मिल सकोगी....

लगा काम आसान नहीं,
गुरु का द्वार छोड़, मन्दिर का द्वार पकड़ा,
जोतें जलाईं, घंटियाँ बजाईं,
व्रत उपवास रख, वेद पुराण पकड़ा.
अन्धविश्वासी, रुढ़िवादी बनी,
पर भगवान पकड़ ना पाई.

मन्दिर छोड़,
माँ के घर लौटी-
माँ ने कहा-
'' बेटी, भगवन तो तेरे अन्दर है,
स्वयं को पहचान, तू इसे पा लेगी.''

स्वयं संचेतना में लग गई,
भीतर कहीं रावण की कुटिलता,
दुर्योधन की दुष्टता,
कृष्ण का दर्शन, राम की मर्यादा पाई.
पुराणों का ज्ञान, वेदों का सार,
सब ऋचायें कोशिकाओं में पाईं.
कौरवों-पांडवों का युद्ध- मेरी भावनाएँ हैं,
कृष्ण-अर्जुन संवाद-मेरे तर्क वितर्क हैं,
भगवन शक्ति है, विश्वास है-जो मेरे भीतर है.....

आलेख ले, सम्पादक के पास गई,
उन्हें बात पसन्द नहीं आई.
नौकरी से हटा, महीने की पगार पकड़ा, बोले--
कट्टर पंथियों से टक्कर लेना चाहती हो--
ईश्वर से साक्षात्कार के मार्ग,
तू बंद कर आई है--
उसने तुझे बनाया, तूने उसे पाया, यह भ्रम है.

उस तक जाने के रास्ते हैं...
एक रास्ता पकड़ नहीं तो भटक जाएगी...
तेरा कल्याण नहीं होगा....
आज खड़ी हूँ ...
ईश्वर और स्वयं की पहचान की ऊहापोह में......

सुधा ओम ढींगरा
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भगवान से बातचीत : आगाज है यह नुक्‍कड़ पर (अविनाश वाचस्‍पति)

भगवान का इंटरव्‍यू

आए हैं स्‍वयं दयानिधान
विचारों की खान
आगाज देखिए

रहते कहां हो भगवन ?
सबके मन में

मन में या स्वप्न में ?
स्वप्न‍ में नहीं सच में

तो सच क्या है ?
भगवान कुछ नहीं है मतलब कुछ नहीं होते हुए भी जो बहुत कुछ है वो सब इंसान का किया धरा है

इंसान का ?
हां इंसान का, इंसान मौजूद है और भगवान अशरीरी है। आस्था और विश्वास का मेल है यह। शरीर रूपी इंसान की कारिस्तानी ही कही जायेगी अशरीरी भगवान

कारिस्तानी कैसे ?
इंसान ने अपने पर संयम रखने के लिए ही यम की संरचना की। स्वर्ग नरक बनाये। खूब सारे भगवान बनाये और इंसान खुद इंसान नहीं रहा। अपना नुकसान करने में अव्वल है इंसान। पर्यावरण का कर रहा है सत्यानाश। इसे ही कह रहा है विकास।

विकास भी तो जरूरी है ?
पर विचारों का प्रकाश पहले चाहिए। उसके बाद बाकी सब कुछ।

विचार भी तो आपकी ही देन हैं ?
इसे यूं कहिए कि विचारों की देन हूं मैं।

लगता तो यही है कि सही कह रहे हैं आप ?
जो मैं कह रहा हूं वह भी आप ही कह रहे हैं।

बातचीत से साफ हुआ कि भगवान को अपने भगवान होने का कोई मुगालता नहीं है। पर इंसान इंसान नहीं रहना चाहता और न इंसानियत को ही कायम रखना चाहता है।
बातचीत लंबी है रोचक भी। अभी जारी है ...

फिर मिलेंगे एक ब्रेक के बाद। पहला ब्रेक है इसलिए जल्‍दी लगाया है।
कहीं आप इस बातचीत से बोर न हो जायें और वापिस इस ब्लॉग पर न आयें। आपका लौटना ही विजय है। इंसान की जय है।
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गुलाबड़ी फिल्‍म का प्रदर्शन : इंडिया हैबीटेट सेंटर में : सब सादर आमंत्रित हैं

गुलाबड़ी की आयु सोलह बरस
गुलाबड़ी कौन है
आप जानने आइये
मैं तो मौन हूं

सोलह बरस की उम्र
कातिल होती है
और उस पर नाम हो
गुलाबड़ी
तो शरूर आ ही जाता है

शरूर अवश्‍य आएगा
आप 5 जनवरी 2009 को
इंडिया हैबीटेट सेंटर में
सुबह 11 बजे
स्‍टाइन आडिटोरियम
लोधी रोड, नई दिल्‍ली
में सादर आमंत्रित हैं

मौका मत चूकिएगा
बहुत बेहतरीन फिल्‍म है
मैं तो सोलह बरस पहले
देख चुका हूं
आप सोलह बरस बाद देखेंगे
तब भी वैसी ही पायेंगे
जैसी मैंने देखी थी
फिल्‍म का यही तो कमाल है
असली कमाल तो
अशोक चक्रधर का है
वो आप फिल्‍म में ही देखेंगे

वैसे वहां अशोक चक्रधर
भी आपको मौजूद अवश्‍य मिलेंगे।
जब देखकर आयें तो
अपने अनुभव नीचे टिप्‍पणी में
अथवा अपने ब्‍लॉग पर
सबके साथ अवश्‍य साझा कीजिएगा

कंजूसी कहीं भी करें
पर यहां मत कीजिएगा।

लवस्‍कार
बतर्ज अशोक चक्रधर
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अलबेला खत्री हिन्‍दी ब्‍लॉगरों को कई हजार रुपये पुरस्‍कार में दे रहे हैं

संदर्भ : ब्‍लॉगर सम्‍मान वर्ष 2009
अलबेला जी वास्‍तव में यथार्थ में सच में अलबेला हैं। नोट हैं जिनके पास अंबार ऐसे तो बहुत हैं यार पर नोटों से अधिक जो करते हैं सच्‍चाई से प्‍यार सच्‍चाई पर लुटा देते हैं कई हजार कमाते हैं तो लुटाते भी हैं दिल खोल कर दिल इतना बढ़ा है इनका बहुत बड़ों का भी नहीं मिला है अब तक हमें। तो चलो उनकी बेवसाइट पर HOME पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन करें रजिस्‍ट्रेशन प्रक्रिया जल्‍दी ही पूरी करें फिर डालेंगे वोट कह रहे हैं डंके की चोट जो अच्‍छा लगेगा जो सच्‍चा जचेगा कोई भेदभाव नहीं चलेगा http://www.albelakhatri.com/index.php?option=com_comprofiler&task=registers जो सच्‍चा है जो अच्‍छा है उसका तो सबको पता है क्‍या है जो सूची में नंबर नीचे जरा है वैसे यह पहेली भी हो सकती है पर इस पहेली पर पुरस्‍कार नहीं है आओ रजिस्‍ट्रेशन करें लिंक यह है http://www.albelakhatri.com/ समय सचमुच में कम है पर 15 में से चुनना उन्‍हें है जिसमें दम है यह पन्‍द्रह का दम है दस का दम नहीं वैसे आप भी किसी से कम नहीं जिनका नाम नहीं है सूची में वे अपनी वर्ष 2009 में प्रकाशित एक पोस्‍ट का लिंक सबमिट कर सकते हैं आप अपने किसी मित्र की पोस्‍ट या जो आई हो खूब भाई हो उसका भी लिंक भेज सकते हैं चयन के लिए मनन के लिए। जो पहले करें रजिस्‍टर फिर डालें वोट परंतु जल्‍दी करें कहीं देर न हो जाये।

आज और अभी करें रजिस्‍ट्रेशन
जिससे कोई परेशानी हो रही हो
तो पूछ सकें
और समय से वोट दे सकें
अंतिम तिथि तक नहीं करना
हमें इंतजार।
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नववर्ष में परिवार को सुरक्षित करें और परिवार को तोहफ़ा दें आज ही, जल्दी सोचिये और अमल करें [Secure your family, Think fast ….by Term Insurance]

नववर्ष में परिवार को सुरक्षित करें अगर आप ने अभी तक अपने परिवार को सुरक्षित करने की नहीं सोची है तो अब तत्परता से सोचिये और नये साल का तोहफ़ा दीजिये।

परिवार को सुरक्षित कैसे करेंगे इंश्योरेन्स से, जी हाँ आपने बिल्कुल सही पढ़ा है इंश्योरेन्स से। केवल इतना सोचिये अगर कल आप अपने परिवार के साथ न रह पायें तो परिवार कैसे अपना गुजारा करेगा, नहीं ९९% लोगों ने कभी इस बारे में नहीं सोचा है, केवल १% लोगों ने ही इस बारे में सोचा है। जी हाँ बिल्कुल कटु सत्य है यह, जबाब आपको अपने आप से या आसपास के लोगों से पूछ्कर ही पता चल जायेगा कि आप कितने जागरुक हैं अपने परिवार की सुरक्षा के लिये।

अब बहुत से लोग बोलेंगे कि हमने इंश्योरेन्स करवा रखा है तो अब हम इस बारे में बात करते हैं, अगर आपने LIC का इंश्योरेन्स करवा रखा है तो आपके परिवार को कितनी सुरक्षा मिल रही है, अरे देखिये भई पाँच लाख या उससे भी कम या थोड़ी सी ज्यादा, क्यों ?



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ब्लॉगिंग पर किताब...ब्योरा चाहिए

नए साल पर नई सूचना... हिंदी ब्लॉगिंग पर एक महत्वपूर्ण किताब का प्रकाशन हो रहा है. मार्च तक किताब प्रकाशित होने की पूरी संभावना है. पुस्तक में शामिल करने के लिए कृपया ये जानकारी मुहैया कराएं. ब्योरा कृपया मेरे ई-मेल chandiduttshukla@gmail.com पर भेजें. अपना विवरण / परिचय फ़ोटो मूल व्यवसाय ब्लॉगिंग में चुनौती, टिप्पणीकारों का महत्व आपकी नज़र में टॉप-10 ब्लॉग आपके ब्लॉग का विषय और लिंक... कहां से मिली प्रेरणा नए ब्लॉगर्स को आपका संदेश (इसके साथ कोई शुल्क नहीं है) महत्वपूर्ण 1. कृपया ई-मेल की सब्जेक्ट लाइन में ज़रूर लिखें....blog-book : (your name) जैसे- blog-book : chandiduttshukla 2. विवरण यूनिकोड में भेजें और इसके लिए तीन दिन का समय ही लें. पुस्तक में कुछ इनपुट जोड़ना बाकी रह गया है और किताब इसी माह के अंत में प्रोडक्शन के लिए चली जाएगी. -- एक अनुरोध और है. मेरे पास जितने ब्लॉगर्स का मेल आईडी है, मैं उन्हें तो सूचना भेज ही रहा हूं. यदि आपके परिचय सूत्र में कोई अन्य साथी हैं, तो उन्हें भी कृपया ये ई-मेल फारवर्ड कर दें. धन्यवाद, चण्डीदत्त शुक्ल टेलिविजन पत्रकार नोएडा मेरा मोबाइल नंबर है 09873779183. www.chauraha1.blogspot.com

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