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होली के दिन मोबाइल फोन काल अटैंड करने पर रंगों की बौछार आपके चेहरे को भिगो देगी (अविनाश वाचस्‍पति)

नुक्‍कड़ द्वारा होली के अवसर पर एक्‍सक्‍लूजिव सनसनीखेज पेशकश


विश्‍वस्‍त सूत्रों से समाचार मिला है कि इस होली पर एक मार्च को होली के दिन प्रात: 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक आने वाली मोबाइल फोन काल अटैंड करने पर उसमें से रंगों की इन्‍द्रधनुषीय फौहार छूटेगी जो कि कॉल सुनने वाले के गाल के साथ-साथ अपनी अद्भुतता से मन को भी रंग देगी। जैसा कि जानकारी मिली है, के अनुसार समस्‍त दूरसंचार कंपनियों ने होली के अवसर को अविस्‍मरणीय बनाने के लिए तकनीकी सुविधायुक्‍त ऐसा तालमेल बिठाया है कि कहीं से भी कॉल प्राप्‍त होने पर सामान्‍य मोबाइल फोन से भी अटैंड करने पर तुरंत रंगों की एक बौछार फोन सुनने वाले के चेहरे पर रंगों की रंगभरी बारिश कर देगी जिससे चेहरा पूरी तरह होली के रंग में रंग जाएगा। इस सुविधा के लिए किसी सुविधा को सक्रिय करने की आवश्‍यकता नहीं होगी। यह सुविधा ऑटोमैटिक पद्धति से प्रात: 9 बजे देश के सभी मोबाइल फोन उपकरणों में सक्रिय हो जाएगी और दोपहर 1 बजे स्‍वयं ही निष्क्रिय हो जाएगी।

यह जानकारी इसलिए दी जा रही है कि जब आपका मोबाइल फोन होली के इस उत्‍सव में शामिल हो रहा होगा तो आप उपकरण की खराबी समझकर कहीं उसे फोन के डॉक्‍टर की तलाश में न चल दें। मजे की बात तो यह भी है कि इस प्रकार रंगीन पानी के होली के दिन चार घंटों के लिए प्रत्‍येक काल अटैंड करने पर निकलने पर भी आपके मोबाइल फोन उपकरण को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी। इसलिए आप निश्चिंत होकर अपने मोबाइल फोन को अपने साथ होली खेलने दे सकते हैं।
माना जा रहा है कि इस सुविधा की जानकारी पाने पर आपके पास उन चार घंटों में लगातार फोन कॉल आ सकती हैं। इस खबर के आने से देश-विदेश की पिचकारी और गुब्‍बारा विक्रेताओं कंपनियों की जान सांसत में फंस गई है क्‍योंकि यदि यह जानकारी सबके पास पहुंच जाती है तो पिचकारी और गुब्‍बारों की बिक्री में बेतहाशा गिरावट आ जाएगी।

एक तो पहले ही बजट और नकली रंगों के आने से दुकानदार त्रस्‍त हैं उस पर इस खबर ने उनकी होली को बेरंग और पानीदार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। दूरसंचार कंपनियों की तकनीकी में खोज के इस आविष्‍कार ने सबके चेहरे खिला दिए हैं। समाचार मिल रहे हैं कि होली के दिन प्रकाशित होने वाले सभी समाचार पत्रों में यह खबर मुख्‍य पेज पर मेन खबर के तौर पर प्रकाशित होगी।

दूरसंचार कंपनियों ने पहले ही कॉल दरों में जंग छेड़ कर कई क्षेत्रों में सनसनी मचा रखी है। इस हैरतअंग्रेज खबर से हर हिन्‍दी प्रेमी ने खुशी जतलाई है।

विशेष सूचना : कैमरायुक्‍त मोबाइल फोन से रंगों की बौछार छूटने के साथ एक चित्र भी तुरंत खिंच जाएगा।
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नेचर का देखो फैशन शो

                                    -डॉ० डंडा लखनवी

क्या    फागुन   की   फगुनाई   है।
हर   तरफ   प्रकृति    बौराई    है।।
संपूर्ण     में      सृष्टि    मादकता   -
हो    रही    फिरी    सप्लाई    है।।1
     
धरती      पर     नूतन     वर्दी   है।
ख़ामोश     हो     गई     सर्दी    है।।
भौरों     की    देखो    खाट    खड़ी-
कलियों     में     गुण्डागर्दी     है।।2

एनीमल     करते    ताक -  झांक।
चल    रहा     वनों  में   कैटवाक।।
नेचर    का     देखो    फैशन    शो-
माडलिंग  कर   रहे   हैं पिकाक।।3
   
मनहूसी        मटियामेट       लगे।
खच्चर     भी     अपटूडेट     लगे।।
फागुन    में    काला     कौआ   भी-
सीनियर      एडवोकेट       लगे।।4

उस  सज्जन  से  अब  आप मिलो।
एक   ही   टाँग    पर   जाता   सो ।।
पहने     रहता    है    धवल   कोट-
वह बगुला अथवा सी0एम0ओ0।।5

इस  ऋतु    में   नित   चौराहों  पर।
पैंनाता       सीघों     को    आकर।।
उसको    मत  कहिए   साँड  आप-     
फागुन में  वही पुलिस अफसर।।6

गालों       में      भरे     गिलौरे  हैं।
पड़ते    इन     पर  ‘लव’  दौरे   हैं।।
देखो    तो    इनका    उभय   रूप-
छिन  में  कवि, छिन  में भौंरे हैं।।7

जय   हो   कविता   कालिंदी  की।
जय   रंग  -  रंगीली  बिंदी   की।।
मेकॅप  में   वाह   तितलियाँ  भी-
लगतीं    कवयित्री   हिंदी   की।8

ये    मौसम    की   अंगड़ाई    है।
मक्खी    तक    बटरफ्लाई है ।।
घोषणा  कर  रहे  गधे  भी  सुनो-
इंसान      हमारा     भाई     है।।9


                                      सचलभाष-09336089753                
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थारी भली होवे मीडिया ................ !


सचिन तेंदुलकर ने पुरुषों के एकदिवसीय क्रिकेट मैं २०० रन बनाने का कीर्तिमान अपने नाम सुरक्षित कर लिया | निश्चित रूप से यह भारत देश और क्रिकेट के लिए एक महानतम उपलब्धि है | किसी ने सचिन को अवतार बताया और किसी ने कुछ और | मेरे पास भी एसएम्एस का भण्डार लग गया | मध्यप्रदेश की सरजमी पर ये कारनामा हुआ तो शिवराज सिंह और उनके मंत्रिमंडल को इस पारी मैं भी अपने हिस्से फल चख लिया | उधर सचिन की पारी सज रही थी और इधर शिवराज सिंह का उड़नखटोला | विधान सभा मैं भी इसकी चर्चा हुई | यही नहीं राष्ट्रपति भवन से लेकर संसद भवन तक सचिन के नाम के जयकारे लगे | और तो और राज ठाकरे ने भी गुण गाये | यानी इस बहती गंगा मैं सभी ने अपने अपने हिस्से के हाथ धो लिए |

पर मेरी इससे नाराजी है ! एसा नहीं कि मैं सचिन के प्रदर्शन से खुश नहीं हूँ या मुझे भारत देश के नाम इस रिकॉर्ड के कारण कोई व्यक्तिगत हानि हुई है | मैं केवल यह कहना चाहता हूँ की सचिन नाम के इस देवता के पहले एक देवी इससे भी बड़ा कारनामा कर चुकी है | जी हाँ ! चौंकिए मत ! भारत की सरजमीं पर ही आज से १३ साल पहले (१६ दिसम्बर 199) ऑस्ट्रेलिया की स्टार बल्लेबाज बेलिंडा क्लार्क ने मुंबई मैं डेनमार्क के खिलाफ २२९ रनों की नाबाद पारी खेली थी | यह दोहरा शतक किसी भी एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच मैं तब तक पहला दोहरा शतक था | बेलिंडा ने ३० अर्धशतक और ५ शतक भी बनाये हैं | इसी साल अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैं सईद अनवर ने १९४ का रिकॉर्ड अपने नाम किया था |

यहाँ एक बार मीडिया ने फिर अपना पुरुषवादी चेहरा दिखला ही दिया | मीडिया ने एक बार भी यहाँ पुराने रेकॉर्डों की टोह लेने की कोशिश भी नहीं की या मीडिया लेना भी नहीं चाहता | सवाल यह है कि मीडिया कब तलक इस तरह का गैर जिम्मेदारना व्यवहार करता रहेगा ? एसा ही नहीं की किसी एकाध अखबार ने बल्कि सभी लगभग अखबारों और चैनलों ने यही किया | दैनिक भास्कर ने लिखा वन डे क्रिकेट के इतिहास मैं २०० रनों के एवरेस्ट को छूने का यह पहला मौक़ा है | जागरण ने लिखा कि वन डे क्रिकेट इतिहास कि पहली डबल सेंचुरी बलस्टर के नाम | पत्रिका ने लिखा कि वन डे इतिहास मैं पहली बार किसी बल्लेबाज ने बनाया दोहरा शतक | पीपुल्स समाचार ने लिखा कि मैदान मैं सचिन ने बल्ले का जादू दिखाते हुए वन डे क्रिकेट इतिहास मैं दोहरा शतक जमा डाला | नव दुनिया, राज एक्सप्रेस और तो और हिन्दुस्तान टाईम्स और हिन्दू जैसे अखबारों ने भी यह गलती की | मैं उन अखबारों की बात कर रहा हूँ जिन्हें मैं देख पाया | वो तो भला हो जनसत्ता का, जिसने तमाम मीडिया को आइना दिखाया | जनसत्ता ने लिखा है कि तेंदुलकर ने रचा एक और इतिहास | और उसने बेलिंडा के कारनामे का सम्मान किया है |

सवाल यही है कि मीडिया इतना गैरजिम्मेदार कैसा हो सकता है ? और जनसत्ता जैसे अखबार क्यूँ अपनी जिम्मेदारी सही से निभाते रहे हैं | इसका दूसरा पहलु यह भी है कि मीडिया ने एक बार फिर अपना पुरुषवादी चेहरा उजागर किया है | लेकिन मीडिया कैसे इन तथ्यों को दरकिनार करके आगे जा सकता है | आज जनमानस में एक ही चीज है कि सचिन ने ही यह कारनामा किया और जिसकी मीडिया ने खूब मुखालफत की, लेकिन ये जनमानस को कौन बताये कि सचिन नामक भगवान् से पहले भी एक देवी रही है | ज्ञात हो कि इस वर्ष हम सभी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शताब्दी मना रहे हैं | इस वर्ष की थीम है "समान अधिकार, समान अवसर : सबकी उन्नति |" अभी से इस मीडिया इस प्रसंग पर बड़ा चिंचित है | अखबार अभी से आलेख लिखवा रहे हैं , गोष्ठियों में वक्ता बुक किये जा रहे हैं वगैरह वगैरह | लेकिन महिला के किये कारनामों को सम्मान देने की ना तो तैयारी किसी की दिखती है और ना ही मंशा | बेलिंडा और सचिन का ये प्रसंग इसका एक ताजा उदाहरण है |

सचिन को भगवान् का दर्जा दिया जाना कोई गलत काम नहीं है लेकिन एक देवी ने जो कारनामा आज से १३ साल पहले कर दिया हो उसे बिसारना कहाँ तक उचित है | मीडिया के इस गैर जिम्मेदारना रवैये पर बालिका वधु की तर्ज पर यही कहने को दिल करता है कि थारी भली होवे मीडिया |

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उत्‍सव, उल्‍लास, उमंग की उत्‍साही भावना




फागुन की दोपहरी तपे,  च्‍यूंटी काटे रात
प्रीत बिन बीते घड़ी, भली न लगतीं बात

भींज-भांज कोरे रहें,  तर रंगों की बरसात
मलें गुलाल गाल पर,  हम तो केवल हाथ

      रंग अबीर गुलाल संग, ठिठोली की बौछार
 लाए कितनी बिसरी यादें, होली का त्‍यौहार  

होली नुक्‍कड़ गली जले, जले मन छौना
नैनन की पिचकारी चले, जैसे जादू टोना

उत्‍सव, उल्‍लास, उमंग की उत्‍साही भावना
हो रंगों का हुड़दंग शुभ,यह फागुनी कामना


                   *राजे त्‍साही

            

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टेलीविजन एंकर बनूँगी ऐसा कभी सोंचा भी नहीं था - अल्का सक्सेना, कंसल्टिंग एडिटर, जी न्यूज़

मेरा पत्रकरिता के पेशे में आना कुछ हद तक इतेफाक था. क्योंकि मुझे पहला मौका अनजाने में मिला. मैं जब स्कूल/कालेज में पढ़ती थी तब पॉकेट मनी के लिए आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के लिए बच्चों पर आधारित कुछ प्रोग्राम करती थी. उन दिनों मैं 12 वीं क्लास में थी. इन कार्यक्रमों से पॉकेट मनी ठीक हो जाती थी. मेरे भाई उन दिनों थियेटर और ऐसी चीजों में सक्रिय थे. इसलिए मुझे पता रहता था कि कहाँ जाना है और किससे बात करनी है. इस वजह से मुझे जल्दी-जल्दी काम मिलने लगा. लेकिन ये सब करने के बावजूद यह मेरा प्रोफेशन बन जायेगा , ऐसा कभी सोंचा नहीं था. वैसे भी मैंने साईंस से ग्रेजुएशन किया है. मेरे परिवार में भी उस वक़्त पत्रकारिता से सम्बन्ध रखने वाला कोई नहीं था. READ MORE....
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हिन्‍दी ब्‍लॉगरों को खींच कर नई दुनिया में आलोक मेहता ने फैलाया होली पर आलोक

अब इसे पढ़ने के लिए आपको सिर्फ चित्र पर क्लिक करना होगा और आप सरलता से पढ़ सकेंगे। पाबला जी के पवित्र सहयोग स्‍वरूप।


नईदुनिया की साप्ताहिक पत्रिका के होली विशेषांक में संपादक श्री आलोक मेहता ने होली के बहाने ब्लॉग जगत की खिंचाई की है। पढ़िए और बुरा ना मानिए क्योंकि, होली है।

http://www.naidunia.com/  पर जाकर SUNDAY MAGAZINE में पढ़ें ।
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बुरा न मानो होली है !

सोचा कि क्यों न होली की यह रस्म भी निभा दी जाये आइये होली की मस्ती में इन दिग्गजों को देखें !
  • अरविन्द मिश्रा - मन ऊबा मेरा यार फकीरी से  
  •  अजय कुमार झा - हमको ऐसा वैसा ना समझो हम बड़े काम की चीज़ ..
  • अनूप शुक्ल - मैं तो ऐसा करुँ धमाल , सीधी हो जाये तेरी चाल ....
  • विवेक सिंह -जिनके लड़िका  समरथ हुइगे  उनका कौन पडी परवाह ...
  • डॉ टी एस दराल - डाक्टर विद गोल्डेन हार्ट 
  • डॉ अमर ज्योति - एक तकलीफ अपने दिल में लिए फिरता हूँ ....
  • राकेश खंडेलवाल- देख कर आधुनिक गीतकारों को हम, सिर को धुनते रहे शारदा के लिए ... 
  • रचना - बहिना मेरी  ! राखी के बंधन को निभाना 
  • मसिजीवी- कागदु कालपी को लई लीनो , अपनों  कलमदानु लई हांत  

    !
  • ताऊ रामपुरिया - भैस बियाई गढ़ ब्लॉगर में ताऊ तुझे खबर है नाय !
  • मिथिलेश दुबे- नयी उम्र की फ्रेश फसल 
  • शहरोज- साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर, अफ़सोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते  !
  • ज्ञानदत्त पाण्डेय - छोरा गंगा किनारे वाला ....
  • दिनेश राय द्विवेदी - मजबूत तराजू   
  • सुमन - तेरा हुस्न अल्ला अल्ला तेरा रूप राम राम ..
  • सुरेश यादव - साला मैं तो साहब बन गया ..
  • समीर लाल - मैं जहाँ चला जाऊं ,बहार चली आये , महक जाएँ राहों  के फूल ...
  • अविनाश वाचस्पति - मस्त साहित्य  
  • लवली कुमारी - कुछ अलग बात है हममे 
  • डॉ कविता वाचकनवी : कविता नहीं प्रेरणा जिसकी, गीत नहीं भाषा है दिल की .. 
  • महफूज़ अली - किसी की चौखट पर अरमान लुटाने का दिल करता है !
  • इस्मत जैदी - मेरे देश की बच्ची ..
  • अनिल पुसाद्कर : गरीब धरती  पर अमीर लोगों की चिंता करते अनिल ...
  • दिगंबर नसवा -निर्विकार दिगंबर 
  • आशा जोगलेकर -दूर बैठी  स्वप्निल स्वप्नरंजिता 
  • सरवत जमाल -एक शायर - हाथ फैलाये खड़े थे दोनों ही फूटपाथ पर , चीथड़ों में एक था और दूसरा वर्दी में था  !
  • खुशदीप सहगल - मस्त प्रोडयूसर 
  • राज भाटिया - पराये देश में बैठा  हमारे ताऊ का पार्टनर !
  • विनीत कुमार - गंभीर बच्चा 
  • राजीव तनेजा - होली की मस्ती में प्यारे 
  • संगीता पुरी : हिम्मती कलम  
  • सतीश सक्सेना - कबिरा खड़ा बाज़ार में माँगे सबकी खैर / ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर !डॉ कविता वाचक्नवी  

डॉ कविता वाचक्नवी ने मुझे भी इस होली में शामिल किया है , यकीनन मैं गौरवान्वित हूँ और उनका आभारी हूँ लगता है अब होली ही होली !
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होली विशेष : हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में प्रेम विकसित हो रहा है (अविनाश वाचस्‍पति)


बनाते हैं जो दाल वो गलती नहीं है
वे चला रहे हैं जी ब्‍लॉग आजकल
बतला रहे हैं पूरी दाल को काली
पर इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।

संगठन बनाने मिलने मिलाने
सामने आने से डरते हैं वही
जिनको अनुभव कटु हुए हैं
सदा ही गठन ने जिनके
मन में गांठ लगा दी है
उस विद्वेष की गांठ को
जिसमें निकले हैं कांटे
बचाना है कांटों को
सच्‍चे प्‍यार से
अपनेपन से।


मिल सकते हैं वे
मिलना भी चाहते हैं
पर नेह से भरा
भरपूर स्‍नेह से पगा
निमंत्रण उनको चाहिए।

जनहित का विश्‍वास
भीतर समाना चाहिए
आभासी दुनिया से
आयेंगे तुरंत बाहर
बनायेंगे और बढ़ायेंगे
प्रेम का व्‍यापार
इसके लिए होली से
अच्‍छा सच्‍चा नहीं
कोई और त्‍योहार।

मेल से ब्‍लॉग तक का सफर
सफर से पोस्‍ट
और पोस्‍ट से
टिप्‍पणी का गियर
जब बदला जाता है
तो बैकगियर डल जाता है
उलट जाता है सब कुछ
जो नहीं चाहता है कोई
वही हो जाता है सब ओर
पर अब हालात
सुधर रहे हैं
अपनापन बढ़ रहा है
ब्‍लॉगजगत महक रहा है।

मनाते हैं सभी होली का त्‍यौहार
देते हैं सभी को रंगकामनाएं
अपनाएं प्रेम से, रंग प्रेम का लगाएं।
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आग होली की


पोस्‍ट नंबर - 20

*आग*

कहीं दूर …… दूर कहीं ……

एक बहुत बड़े ज्‍वालामुखी का विस्‍फोट होता है,

जंगलों में आग लग जाती है,

और एक तूफान समंदर को ,

अपनी बाहों में जकड़ लेता है।

फिर कहीं दूर किसी नाव में ,

खारा पानी भर जाता है।

जो न उलीचने से खत्‍म होता है

और न नाव ही डूब पाती है।

ऐसे में जड़ता का लिहाफ ओढ़कर

मैं चुपचाप पड़ जाना चाहता हूं ,

क्‍योंकि मैं नितांत अकेला होता हूं।

****** ****** ****** ******

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WISHING TO ALL BLOGGERS VERY VERY HAPPY HOLI.

:--Specially dedicated those who find them selves quite alone at certain occassions. --:

From the desk of: MAVARK


अपनी राय देने के लिए यहां चटकाएं
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हिन्‍दी ब्‍लॉगरों से राय चाहिये - क्‍या नुक्‍कड़ को वेबसाइट बना देना चाहिए (अविनाश वाचस्‍पति)


नुक्‍कड़ को वेबसाइट बना लें
आपकी क्‍या राय है
कृपया बतला दें ?

अगर हां कहेंगे
तो सोच लें
इसका व्‍यय उठाना होगा
साफ कहता हूं
जेब से नहीं लगायेंगे
विज्ञापन लायेंगे
उसी से इसको
मिलजुलकर आगे बढ़ायेंगे।

आप बतलायें
नुक्‍कड़ पर आयेंगे
या अपने घर (ब्‍लॉग)
में ही घुस जायेंगे।

आयेंगे तो बतलायेंगे
क्‍या क्‍या चाहेंगे
वेबसाइट कैसी बनवाना चाहेंगे
जरूर आपको पसंद आती होंगी
कुछ वेबसाइटें
उनके फीचर और उसका लिंक
हमें भिजवायेंगे।

हम चाहते हैं
बेहतर बनायें
आपस में मिलकर
हिन्‍दी को महकायें
सुगंध हिन्‍दी की
चहुं ओर फैलायें।

और भी हम
जानना चाहते हैं
जो भी आप
बतलाना चाहते हैं ?

होली की शुभकामनायें
होली वह हो जो सबके
मन उपवन को रंग जाए।
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मौसम चुहुल मसखरी वाला

  


हास्य :
    

       -डॉ०डंडा लखनवी



ली  देखिए    घाट  देखिए।
रंगबिरंगी    हाट    देखिए।।


मौसम चुहुल-मसखरी वाला-
आज  हुआ    स्टार्ट देखिए।।


इनको जनसेवक मत कहिए-
ये   अबके   सम्राट  देखिए।।


उनकी निधियों में मत झाँको-
उनके   केवल  ठाठ देखिए।।


आज   सदाचारी   हैं   वे  भी-
जो  कल  थे  खुर्राट  देखिए।।


पॉलिस्टर    झाड़े   है    कोई-
कोई    पहने    टाट  देखिए।।


शिवजी    के   बाराती   जैसे-
होरिहारों  के  पाट   देखिए।।


उनको भी कुछ कुछ होता है,
उम्र   भले  हो  साठ देखिए।।


दर्पण  के   सामने   निहारें-
बाबा  टाई     नॉट देखिए।।


यूँ  झटके   दे गया आयकर-
खड़ी  हो  गई  खाट देखिए।।


कहीं   कचैड़ी, कहीं   पकौड़ी-
कहीं चल रही चाट देखिए।।


भाभी की स्पिन बालिंग पर,
देवर जी  के  शॉट  देखिए।।


पढ़ा रही साली जीजा को-
सोलह दूनी आठ देखिए।।


लव  लाइन  छूने   के पहले-
उसका   मेगावाट   देखिए।।


होली कहती खोल के बैठो-
मन के बंद कपाट देखिए।।


सचलभाष-09336089753
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(अवधी-हास्य)





               
 
                         मुक्तक
                         
                                 
                                   

                                  -डॉ० डंडा लखनवी


वैसी    तनिक    निहारौ,   रंग   खेलि  आए दद्दू।

अपने  ही  मुख मा  करिखा, खुद मेलि आए दद्दू।।

उद्धाटनन     के   पाथर    देखौ   कहत     कहानी-

पापड़    समाज    सेवा    के   बेलि   आए   दद्दू।।


  सचलभाष- 09336089753


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हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की गोष्‍ठी : क्‍या आपको इसकी खबर थी


21 फरवरी 2010 को सांय 3 बजे हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक गोष्‍ठी का आयोजन साहित्‍यकार सदन, सन्‍त नगर, नई दिल्‍ली में किया गया। गोष्‍ठी में सर्वश्री/सतीश सक्‍सेना, शहरोज, सुरेश यादव, पवन चंदन, खुशदीप सहगल, कनिष्क कश्‍यप और अविनाश वाचस्‍पति उपस्थित रहे। गोष्‍ठी का आयोजन एकदम शार्ट नोटिस पर किया गया था। पहले यह आयोजन श्री राजीव तनेजा के आवास पर तय था परन्‍तु किन्‍हीं अ‍परिहार्य कारणों के चलते यह आयोजन अविनाश वाचस्‍पति के निवास पर किया गया। पूर्व निर्धारित व्‍यस्‍तता के कारण गोष्‍ठी में सर्वश्री/ डॉ. टी. एस. दराल, अजय कुमार झा, सुभाष नीरव, राजीव तनेजा,संजू तनेजा, नीरज बधवार, एम. वर्मा, प्रवीण शुक्‍ला प्रार्थी, चिराग जैन, सुमित प्रताप सिंह उपस्थित नहीं हो सके। पर इन सबने कहा कि इस गोष्‍ठी में हमारी उपस्थिति मान ली जाये और इस गोष्‍ठी में लिए गए सभी निर्णयों पर हमारी सहमति दर्ज कर ली जाये। इन सभी के विश्‍वास के हम कायल हैं।
गोष्‍ठी का आरंभ आपस में परिचय से हुआ। अपना अपना परिचय सबने खुद ही दिया बिल्‍कुल उसी प्रकार जिस प्रकार ब्‍लॉग पर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता होती है। इन सबके परिचय के लिए अलग से कुछ नहीं लिखा जा रहा है, सबके नामों में ही उनके परिचय के लिंक जोड़ दिए गए हैं जिससे इनके चित्र के जरिए ब्‍लॉग पर भी जाया जा सकता है और इनकी रचनाओं और इनसे परिचित हुआ जा सकता है।

हिन्‍दी ब्‍लॉगरों का एक संगठन बनाने के संबंध में विचार किया गया और इसका नाम क्‍या रखा जाए, यह कार्य ब्‍लॉगजगत के पाठकों पर छोड़ा जाता है कि इस अंतरराष्‍ट्रीय संगठन का क्‍या नामकरण किया जाये और क्‍यों, संगठन का गठन किया भी जाये अथवा नहीं, और जो सुधी ब्‍लॉगजन इस संबंध में अपनी राय देना चाहें, उनका सहर्ष स्‍वागत है।

यह विचार लेकर चला गया था कि आर्थिक रूप से सक्षम ब्‍लॉगर प्रतिदिन दस रुपये के हिसाब से अंशदान जोड़ेंगे जिससे हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के हित संधान के लिए सम्‍मेलन, गोष्ठियों इत्‍यादि पर व्‍यय किया जा सके और हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की बेहतरी के लिए किए जा रहे कार्यों में धन की बाधा न हो। इस पर काफी गहन विचार विमर्श के उपरान्‍त सतीश सक्‍सेना जी की सलाह के अनुसार यह तय किया गया कि भविष्‍य में आयोजित किए जाने वाले हिन्‍दी ब्‍लॉगर सम्‍मेलन/गोष्‍ठी इत्‍यादि में आने वाले व्‍यय का भार किसी भी एक ब्‍लॉगर पर आये, इस स्थिति से बचा जाना चाहिए और इन खर्चों के लिए स्‍वैच्छिक आर्थिक अंशदान एकत्र किया जाना चाहिए जो कि आयोजनबेस हो और आयोजन संपन्‍न होने के साथ ही खर्च का हिसाब भी संपन्‍न हो जाना चाहिए। तभी इस प्रकार के आयोजन लंबे समय तक अनवरत रूप से चल पायेंगे।
शहरोज़ भाई ने मुखालफ़त और खिलाफ़त, जलील और ज़लील, खुदाई जैसे शब्दों के अर्थ और फर्क बड़ी अच्छी तरह समझाए...अब जैसी खुशदीप सहगल की पहचान है स्लॉग ओवर तो उन्होंने एक गुगली से सबको हंसाते हंसाते लोट-पोट कर दिया...इसके बाद एक बड़ा अच्छा सुझाव आया कि ब्लॉगिंग को समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने के लिए कुछ करना चाहिए...खुशदीप सहगल के इस सुझाव को सतीश सक्सेना जी ने बहुत पसंद किया और इसी काम के लिए अपने ट्रस्ट की भी जानकारी दी...एक सुझाव ये भी आया कि ब्ल़ॉगर बंधुओं को अपने आस-पास के घरों में रहने वाले बुज़ुर्गों के लिए ज़रूर कुछ करना चाहिए...उनके लिए प्यार के दो मीठे बोल ही बहुत होते हैं...सुरेश यादव जी और पवन चंदन जी ने अपनी कुछ कविताओं से भी समां बांध दिया...

संगठन बनने पर अविनाश वाचस्‍पति का सुझाव है कि संगठन में प्रत्‍येक सदस्‍य के लिए वार्षिक 100/- रुपये रखे जा सकते हैं और विद्यार्थी ब्‍लॉगर जो यह भी वहन न कर पायें उन्‍हें इससे भी छूट दी जानी चाहिए।
इन दोनों ही विचारों पर सबकी सहमति रही।

भाई खुशदीप सहगल जी से अनुरोध है कि गोष्‍ठी में सुनाए गए स्‍लाग ओवर को बतौर टिप्‍पणी अवश्‍य दर्ज करें ताकि अन्‍य पाठक भी उसका भरपूर आनंद ले सकें। इसी प्रकार पवन चंदन जी अपनी सुनाई गई काव्‍य पंक्तियां और सुरेश यादव जी अपनी कविता बतौर टिप्‍पणी दर्ज करने का कष्‍ट करें।

यह पोस्‍ट लगने तक ताजा अपडेट यह है कि ब्‍लॉगरों का होली मिलन समारोह संभवत: 13 या 20 मार्च 2010 को होगा। जिससे अधिक से अधिक और दूर देश के ब्‍लॉगर भी इसमें शिरकत कर सकेंगे। यह भी स्‍थान की उपलब्‍धता पर है। पर अभी किसी तिथि को निश्चित मानकर मत चलियेगा।

लगभग ढाई से तीन घंटे तक चली इस गोष्‍ठी में और भी अनेक विषयों पर विचार विमर्श किया गया। जिन्‍हें कि उपस्थित ब्‍लॉगर इसमें टिप्‍पणी रूप में दर्ज कर सकते हैं। गोष्‍ठी में सभी ब्‍लॉगर इतने तन्‍मय हो गए कि खुशदीप सहगल अपना मोबाइल फोन गोष्‍ठी स्‍थल पर ही भूल गए और उन्‍हें तब उसके न होने का भान हुआ जब उन्‍होंने अपने घर में प्रवेश करने से पहले अपनी जेब में हाथ डाले तो मोबाइल को नदारद पाया। खैर ... इससे पहले ही कनिष्‍क कश्‍यप उनका मोबाइल लेकर उनकी तलाश में निकल चुके थे और कनिष्‍क ने खुशदीप को उनके घर पर पहुंचकर मोबाइल थमाया। शायद खुशदीप सहगल के आसपास वो मोबाइल किसी चित्र में नजर भी आ रहा हो।

आप बतलाते जाइये कौन से चित्र में कौन हैं ?
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बच्‍चों की कविता

जंगल की होली

लगा महीना फागुन का होली के दिन आये
इसीलिए वन के राजा ने सभी जीव बुलवाये

भालू आया बड़े ठाठ से शेर रह गया दंग
दुनिया भर के रंग उड़ेले चढ़ा न कोई रंग

हाथी जी की मोटी लंबी सूंढ़ बनी पिचकारी
खरगोश ने घिघियाकर मारी तब किलकारी

उसका बदला लेने आया वानर हुआ बेहाल
लगा लगाकर थका बेचारा चैदह किलो गुलाल

मौका ताड़े खड़ी लोमड़ी रंगू गधे को आज
लगा दुलत्‍ती नो दो ग्यारह हो गये गर्दभराज

घायल हुई लोमड़ी उसको अस्पताल पहुंचाया
गर्दभ को जंगल के जज ने दण्डित कर समझाया

होली है त्योहार प्रेम का मौका है अनमोल
भूलो द्वेष खूब रंग खेलो गले मिलो दिल खोल

यहां राज है जंगल का सबको न्याय मिलेगा
वरना जग में हमें आदमी फिर बदनाम करेगा
------------
पी के शर्मा
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दुई घाटन के बीच...

तीन दिनों के लिए संस्थान की ओर से महाकुम्भ की कवरेज के लिए हरिद्वार में था....दिन भर खबरें तलाशने के बाद जब सब सो रहे होते थे....मैं कुम्भ के तिलिस्म....देश की संस्कृति और जनजीवन के रहस्य टटोलने....या शायद खुद का भी वजूद तलाशने हरिद्वार की गलियों...घाटों....और नागाओं के साथ साथ आम आदमी के शिविरों को घूमा करता था.....ऐसे में ही एक दिन दो घाटों के बीच दोनो ओर देखते हुए कुछ सवाल उठे जो कविता बन गए......

देवापगा की
इस सतत प्रवाहमयी
प्रबल धारा के साथ
बह रहे हैं
पुष्प
बह रहे हैं
चमक बिखेरते दीप
स्नान कर
पापों से निवृत्त होने का
भ्रम पालते लोग

अगले घाट पर
उसी धारा में
बह रहे हैं
शव
प्रवाहित हैं अस्थियां
तट पर उठ रही हैं
चिताओं से ज्वाला

दोनों घाटों के बीच
रात के तीसरे पहर
मैं
बैठा हूं
सोचता हूं
क्या है आखिर
मार्ग निर्वाण का?

पहले घाट पर
जीवन के उत्सव में...
दूसरे घाट पर
मृत्यु के नीरव में....?
या फिर
इन दोनों के बीच
कहीं
जहां मैं बैठा हूं.....

मयंक सक्सेना -12-02-2010, हर की पैड़ी, हरिद्वार
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' आंखों में कल का सपना है'


ओफिस से रात में लौटना होता है, अमूमन आधी रात चढ जाया करती है। जब गांव वाले अपनी नींद को बिदाई देने के लिये अंतिम खर्राटे लिया करते हैं तब मैं अपने घर पहुंच कर या तो दरवाजा खटखटाता हूं या फिर बेल बजाता हूं। अज़ीब सी जिन्दगी है महानगरों की। खैर..लौटा ही था कि अपने पोस्ट बाक्स में कोई किताब आई हुई दिखी, झट से बाक्स ओपेन किया। सीढियां चढते चढते ही उसका कवर खोला और दरवाजे की बेल बजाने से पहले आंखों के सामने थी ' आंखों में कल का सपना है' गज़ल संग्रह। डा.अमर ज्योति 'नदीम' का गज़ल संग्रह। दरअसल यह आर्कुट का कमाल है जब डाक्टर साहब से परिचय हुआ। और उनके ब्लोग तक जा पहुंचा। उनके बारे में लिखा हुआ पढा और थोडा बहुत उन्हे जाना। फिर जी मेल से चेट पर उन्हें पक़डा और उनसे शुरू हुई बातचीत। गम्भीर और सधे हुए उनके शब्दों ने प्रभावित किया। आदमी की उम्र और उसके अनुभव परिपक्वता प्रदान करते हैं,और ज्ञान बन कर बरसते हैं। मुझे तो इसी बरसात में नहाना अच्छा लगता है सो डाक्टर साहब जब भी नेट पर दिखते हैं मैं उन्हें पकड लेता हूं। वे भी मुझसे बात करते हैं बिल्कुल ऐसे जैसे मुझे बरसों से जानते हों। यह उनका बडप्पन है। हालांकि आजकल ऐसे लोग कम ही मिल पाते हैं। मेरा तगडा अनुभव है कि ज्यादातर लोग अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिये छोटा होना नहीं चाहते। पद का, प्रतिष्ठा का, पैसों का या फिर ज्ञान का ऐसा मद उनमें भरा होता है कि वे झुकना नहीं चाहते। झुकने को अक्सर छोटापन मान लिया जाता है जबकि कहा जाता है कि ज्ञानी हमेशा सरल और लचीला होता है। किंतु आज नमस्कार भी ऐसे किया जाने लगा हैं मानों एहसान जता रहे हों। खैर..मैने कहीं पढा था कि छोटा होना या झुकना जब आदमी भूल जाता है उसका पतन वहीं से शुरू हो जाता है। ख्यातिनाम ला त्सू का एक कथन भी प्रसंगवश कहता हूं कि "झुकना समूचे को सुरक्षित रखना होता है।" अपन तो छोटे हैं इसलिये पतन का प्रश्न ही नहीं है। न नाक कटने का डर, न अहम भंग होने का भय। और किस्मत भी अच्छी कि डाक़्टर साहब जैसे लोग भी मुझे मिल जाते हैं। जिनमें किसी तरह की दुनियाई स्वर्ण परत नहीं चढी होती,और आदमी होने का 24 कैरेट खरापन भी होता है। दरअसल मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं यह भी बताता चलूं, डाक्टर साहब की जिन गज़लों को मैने पढा उनमे बहुत सारी गज़ले मेरे मनोभावों को छूती हुई गईं। यानी आज के दौर में सामाजिक स्तर पर पतन हो या व्यवहारिक स्तर पर टूटन या नौकरी पेशे में चल रही अव्यवस्थायें हों, आदमीयत कैसे खत्म होती जा रही है उसे बखूबी से उन्होंने शब्दों में उतार कर लक्ष्य पर सीधे चोट की है। जैसे-
" चूक हो जाये न शिष्टाचार में, दुम दबा कर जाइये दरबार में।
कुर्सियों के कद गगनचुम्बी हुए, आदमी बौना हुआ आकार में...।"

हां उनसे उनके गज़ल संग्रह के बारे में एक बार पूछा था, सो उन्होने डाकविभाग का सदुपयोग करते हुए मुझे अपनी हस्ताक्षरयुक्त किताब प्रेषित कर दी। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और आप सब के लिये किताब का निचोड प्रस्तुत करने की कोशिश कर बैठा। हालांकि मैं जानता हूं यह कोशिश किताब की पूरी तरह निचोड नहीं है उसके लिये तो वह पढनी ही होगी फिर भी जो कर पाया, जितना कर सका, आपके लिये नज़र है।
मैने उनकी कृति पढनी शुरू की तो हिन्दी और ऊर्दू सम्मिश्रण युक्त उनके शब्द खिलखिलाते हुए मेरी आंखों के सामने थे जो उनके जीवन का बहुत सारा भाग उढेल रहे थे। जिसमे जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, दुष्यंत कुमार ,प्रेमचन्द और मैक्सिकम गार्की से ली गई प्रेरणा स्पष्ट झलक रही थी। उनकी ज्यादतर गज़लें समाज़ और दुनिया की अव्यवस्थाओं के खिलाफ आक्रोश से भरी हुई महसूस होती है। और सचमुच उनकी आंखों में कल का सपना है जो उम्मीद व्यक्त करता है कि बदलाव सुखद हो।
प्रसादजी का छ्न्दबोध गज़लों में समाहित करना कठिन होता है किंतु
"जो कुछ भी करना है, कर ले
इसी जनम में, जी ले, मर ले।"

डाक्टर साहब का यह शे'र प्रसाद्जी के श्रद्धा और मनु के बीच से निकलती जीवन धारा माना जा सकता है। किंतु इसी के आगे उन्होने प्रेमचन्द का यथार्थबोध भी करवाया कि-
" अवतारों की राह देख मत
छीन-झपट कर झोली भर ले।"

गार्की का मर्म और समाज़ की पीडा इस किताब में ज्यादा है जो व्यवस्था के साथ भिडती हुई प्रतीत होती है। तो दुष्यंतजी शे'रों के साथ चलते नज़र आते हैं। यह अद्भुत है कि गोर्की और दुष्यंतजी को पढने वाले उनका अक़्स अमर ज्योति साहब के शब्दों के नेपथ्य में ढूंढ सकते हैं।
"कह गया था, मगर नहीं आया
वो कभी लौट कर नहीं आया।"

तो
" नहीं कोई भी तेरे आसपास, क्यों आखिर?
सडक पर तन्हा खडा है उदास, क्यों आखिर?"

आप देखिये डाक्टर साहब का आक्रोश, वेदना और राजनीतिक,सामाजिक तंत्र के प्रति धधकते सवाल कि-
"राम के मन्दिर से सारे पाप कट जायेंगे क्या?
बन गया मन्दिर तो चकले बन्द हो जायेंगे क्या?
कितने लव-कुश धो रहे हैं आज भी प्लेट-ओ- गिलास
दूध थोडा, कुछ खिलौने उनको मिल पायेंगे क्या?
चिमटा,छापा,तिलक,तिर्शुल,गांजे की चिलम
रहनुमा-ए-मुल्क अब इस भेस में आयेंगे क्या?
अस्पतालों, और सडकों, और नहरों के लिये
बोलिये तो कारसेवा आप करवायेंगे क्या?"

अध्यापन और इसके बाद बैंक की नौकरी विचित्र लग सकती है किंतु पठन पाठन, दर्शन और फिर गणित का गुणा-भाग वाला व्यक्ति जीवन के हर स्तर को अनुभव करने में ज्यादा समर्थ हो जाता है जिसका निष्कर्ष, परिणाम यही निकलता है कि-
"खूब मचलने की कोशिश कर
और उबलने की कोशिश कर
व्याख्यायें मत कर दुनिया की
इसे बदलने की कोशिश कर।"

सचमुच डा.अमर ज्योति 'नदीम' की आंखें (कृति) कल का सपना देखती हैं और अपने अनुभवों से आने वाले पीढी की दिशा तय करती हैं। कुल 86 गज़लों से बनाया गया है यह गुलदस्ता जिसके प्रत्येक फूल ताज़े, महकते हुए हैं। या यूं कहें अमर हैं, ज्योति की तरह रोशनी बिखेरते से हैं। अब आप सोचिये कैसे मूरख हैं वे प्रकाशक जो सिर्फ बाज़ारवाद को देखते हुए बेहतरीन कृतियों को नज़रअन्दाज़ करते हैं, जिन्हे जन-जन में जाने से रोकते हैं। और ये आजकल की नई पीढी के फेशनेबल, आधुनिक मानेजाने वाले हाडमांस के अर्धजीवित पुतले हिन्दी साहित्य से क्यों दूर हैं? शुक्रिया अयन प्रकाशन का जिसने इस कृति को आकार दिया। और शुक्रिया डाक्टर साहब का भी जिन्होनें मुझे अपनी कृति से परिचय कराया।
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होली की वजह से..........

हास्य

   -डॉ० डंडा लखनवी


कुछ का  हृदय  उदार है होली की वजह से।
कुछ की नज़र कटार है होली की वजह से।।

कल तक वो किसी तरह से  पसीजता न था,
अब दे रहा उधार है  होली  की  वजह से।।

सोते  में  साले  आए  थे,  बन्दर बना  गए-
साली को नमस्कार है, होली की वजह से।।

रिक्से का  भाड़ा कर रहे चुकता दरोगा जी,
यह सारा  चमत्कार है, होली  की वजह से।।

वो  संत   नहीं  महासंत, छूते   कहाँ   मय?
आँखों में बस खुमार है, होली की वजह से।।

साहब की  पे तो उड गई  मेकॅप  में मेम  के,
ऊपर  का  इंतिजार है, होली की वजह से।।

उनको न हुआ कुछ भी बदन उसका छू लिया,
मुझपे  चढ़ा  बुखार है, होली  की वजह से।।

रंगों से  लबालब  भरी  नर्से  लिए  सिरेन्ज,
हर  डाक्टर  फ़रार है होली  की वजह से।।

सोचा था  देंगी गोझिया होंली में भाभियाँ,
पर, लठ्ठ  पुरस्कार है, होली  की  वजह से।

          सचलभाष- 093360-89753
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जीवन सूत्र


                    
डॉ०  तुकाराम वर्मा

गुण-अवगुण  से कीजिए,  भले  बुरे का  भेद।
अंध - भक्त जाने नहीं, क्या है स्याह-सफेद।।

संत  पुरुष निज तेज से, करे तिमिर का नाश।
अंतिम  क्षण तक वे भरें, जग में प्रभा-प्रकाश।।

अग्नि, भूमि, जल, वायु, नभ, कहते सत्य प्रत्यक्ष।
मानव     सब   समकक्ष हैं, सब  हो सकते  दक्ष।।

भूलें  हो  सकतीं मगर, जिन्हें  सत्य  स्वीकार।
वे निज त्रुटि को समझ कर, करते स्वयं सुधार।।

जीवन   के  भूषण  यही, इन्हें  करे  स्वीकार।
सत्य,  अहिंसा,  शिष्टता, शील, स्नेह सहकार।।

कुण्ठाओं  की   परिधि  में, कोई   रचनाकार।
क्या उदात्त अभिव्यक्ति को, दे सकता आकार।।

कवि का जीवन वृक्ष-सा, जगहित में अभियान।
हरे   प्रदूषण  अरु करे, प्राणवायु   का   दान।।

उसे  कभी  मत  मानना, तुम साहित्यिक छंद।
जिसको सुनकर व्यक्ति की, तर्कशक्ति हो मंद।।

जिसको  पढ़ने  से बने, पाठक  स्वयं  समर्थ।
उस कविता को जानिए, है  शाश्वत-अव्यर्थ।।



ई-1/2, अलीगंज, हाउसिंग स्कीम, सेक्टर-बी
लखनऊ-226024
सचलभाष-09936258819
http://dandalakhnavi.blogspot.com
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नक्सलवादी, आतंकवादी और भगत सिंह - राजीव रंजन प्रसाद

कुहु बिटिया अब हाथी-घोडे की कहानियों से आगे आ गयी है, क्यों न हो वह अब कक्षा दूसरी में जो जाने वाली है। आज मैंने भगत सिंह से उसका परिचय कराया।

“बेटा भगत सिंह नें संसद के भीतर बम और आजादी के पर्चे फेंके” मैं कहानी सुना रहा था।

”लेकिन पापा बम क्यों फेंका इससे तो कितने लोग मर गये होंगे न?” कुहू नें बहुत मासूम सवाल किया।

”नहीं बेटा वो क्रांतिकारी थे, उनका मक्सद किसी को मारना नहीं था। बस जैसे पटाखे जोर से आवाज करते हैं न वैसी ही आवाज वो संसद के भीतर पैदा कर के अपनी माँगों की तरफ कानून बनाने वाले लोगों का ध्यान खींचना चाहते थे”।

“फिर क्या हुआ पापा”

”बेटा अंग्रेजों को उनका यह कदम इतना गुस्से से भर गया कि उन्होंने भगत सिंह को फाँसी पर लट्का दिया?”

“पर पापा फिर बम फेंक कर आवाज करने से तो कोई फायदा नहीं हुआ?”

”बेटा यह आवाज बहुत असर करने वाली थी, इससे पूरे देश में जोश और क्रांति की लहर दौड गयी। इतना विरोध बढ गया कि अंग्रेजों को भारत छोड कर जाना पडा, इस तरह अपना बलिदान दे कर इस क्रांतिकारी नें असंभव काम कर दिखाया”

”पापा तब तो नक्सलवादी क्रांतिकारी नहीं होते न” कुहू नें अपना मासूम सवाल मुझसे आँखों में आँखें डाल कर किया। मैं बेहद आश्चर्य से भर उठा चूंकि इस उम्र के मासूम बच्चे से इस तरह के प्रश्न की उम्मीद की नहीं जा सकती थी।

“तुम्हे नक्सलवादी कैसे पता बेटा” मैंने कुहु को गोद में उठा लिया था।

“पापा मैंने टीवी में देखा था वो लोग बम फोडते हैं और क्रांति करते हैं” बिटिया नें बेहद सहजता से उत्तर दिया।

“तो फिर तुम्हे क्यों लगा कि नक्सलवादी क्रांतिकारी नहीं होते?”

“क्योंकि पापा वो तो कितने सारे लोगों को मार देते हैं”

इस उत्तर से मैं सिहर गया था। पिछले दो दिनों से टीवी पर मिदनापुर के नक्सली हमले में चौबीस मौतें, सहरसा के नक्सली हमले में ग्यारह मौतें ब्रेकिंग न्यूज थी। फिर मैंने महसूस किया कि बच्ची नें क्रांति का बुनियादी अर्थ तो जान ही लिया है।

“तो फिर नक्सलवादी कौन होते हैं पापा?”

“आतंकवादी” मैंने कहा।
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अ‍स्‍त्र-शस्त्र


                                      
                -डॉ० तुकाराम वर्मा 





अ‍स्‍त्र  - शस्त्र   निर्माण    का,  यही   मूल  आधार।
स्वार्थ   हेतु   पर   प्राण  पर,  कैसे    करें   प्रहार।।

चीख-चीख कर कह रहा,  अब  तक  का इतिहास।
अस्त्रों - शस्त्रों  ने  किया,  बाधित  विश्व  विकास।।

अणु -  आयुध   की  मार  से, होगा   सर्व  विनाश।
निर्जन   धरती    देख     कर, रोएगा     आकाश।।

अस्त्र - शस्त्र   धारी   कभी,  कहीं   न   पाएं   चैन।
किन्तु शास्त्र ज्ञाता करे, सुख अनुभव दिन-रैन।।

अस्त्र  शक्ति  से  शब्द   का, क्षमता   क्षेत्र   महान।
हरे  अस्त्र  हर  प्राण   को,  शब्द    करे  कल्याण।।

ई-1/2, अलीगंज, हाउसिंग स्कीम, सेक्टर-बी
लखनऊ-226024
सचलभाष-09936258819
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ब्‍लॉगरों को मिलने के लिए बहाना नहीं, जगह चाहिये (अविनाश वाचस्‍पति)

सामूहिकता में सफलता का वास है
पसंद पर चटकाना मत भूलिएगा


हम हिन्‍दी ब्‍लॉगर आभासी दुनिया से निकलकर आपस में रूबरू हो रहे हैं। रचनात्‍मक विचार और ऊर्जा को सार्थकता की ओर ले जाने की ओर कटिबद्ध हैं। इन प्रयासों को गति देने के लिए वर्ष 2009 में फरीदाबाद में साहित्‍य शिल्‍पी के वार्षिक कार्यक्रम में नुक्‍कड़ की पहल पर हिन्‍दी ब्‍लॉगर आपस में रूबरू हुए। इनके सकारात्‍मक परिणामों को देखकर तदन्‍तर श्री अजय कुमार झा जी ने दिल्‍ली में 15 नवम्‍बर 2009 तथा हाल में 7 फरवरी 2010 में हिन्‍दी ब्‍लॉगरों को जोड़ने का जो कार्य किया, वो अद्भुत है। 15 नवम्‍बर 2009 के दिल्‍ली ब्‍लॉगर मिलन के कार्यक्रम में इच्‍छा होते हुए भी मैं शामिल नहीं हो सका जिसका मुझे बहुत दुख रहा। उसी दिन मैं दिल्‍ली से गोवा में आयोजित किए जा रहे भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के आयोजनपूर्व तैयारियों के लिए सरकारी आदेश के तहत दिल्‍ली से गोवा जा गया था। गोवा से अपना सरकारी कार्य पूरा करके मैं अपने हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के मित्रों के आग्रह पर पांच दिन के लिए मुंबई गया और वहां पर श्री विवेक रस्‍तोगी, श्री महावीर सेमलानी इत्‍यादि के प्रयासों से 6 दिसम्‍बर 2009 को आयोजित किए गए मुंबई के हिन्‍दी ब्‍लॉगर मिलन में शामिल हुआ, जो बेहद सफल रही। यह सामूहिकता में सफलता रही। 5 फरवरी 2009 को मैं श्री अमिताभ श्रीवास्‍तव, श्री कमल शर्मा, श्रीमती अनिता कुमार और सबरंग काव्‍य गोष्‍ठी में शामिल हुआ।

यह मिलना जुलना हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को तकनीकी भाषा में कहें तो टॉप गियर यानी पांचवें गियर में दौड़ा रहा है। आपसी संपर्कों में विस्‍तार हुआ है। इसी मिलने जुलने से हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में आ रही समस्‍याओं का भी निराकरण किया जा रहा है।
आपस में दो तीन पांच हिन्‍दी ब्‍लॉगर तो आपस में मिलते रहते हैं और मिलने के लिए जगह की भी कोई समस्‍या नहीं आती है। पर समस्‍या तब होती है जब यह संख्‍या दस पन्‍द्रह पच्‍चीस या इससे भी अधिक हो जाती है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में काफी समर्थ लोग भी जुड़े हुए हैं।

हिन्‍दी के हित को ध्‍यान में रखकर यह पोस्‍ट इस आशय से लगाई जा रही है कि यदि आपके पास या आपके संपर्क में ऐसे स्‍थान हैं (सिर्फ दिल्‍ली ही नहीं सभी प्रदेशों में) जहां पर आपस में मिलने जुलने के ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकें। तो उसकी जानकारी दीजिए। ऐसे महानुभावों की भी जानकारी अपेक्षित है जो इस प्रकार के कार्यक्रमों के लिए सभी प्रकार से सहयोग दे सकते हैं और देने के लिए तत्‍पर हैं। यह जानकारी आप मुझे मेरे ई मेल पते avinashvachaspati@gmail.com पर या मोबाइल नंबर 9868166586/9711537664 पर भी दे सकते हैं।

हिन्‍दी और हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को गति देने के पावन उद्देश्‍य से इस सत्‍कर्म में आपका सहर्ष स्‍वागत है। इसी संदर्भ में मैं यह भी बतलाना चाह रहा हूं कि आने वाली 7 मार्च 2010 को होली पर्व पर हिन्‍दी ब्‍लॉगर सपरिवार मंगल मिलन का आयोजन दिल्‍ली में प्रस्‍तावित है। संभवत: यह पहली परिकल्‍पना है जिसमें हिन्‍दी ब्‍लॉगरों का एक कवि सम्‍मेलन, महत्‍वपूर्ण मुद्दों और उद्देश्‍यों पर चर्चा के साथ ही परिवारजनों का आपस में अनौपचारिक मिलना जुलना भी होगा। इस परिकल्‍पना को साकार करने में सबसे बड़ी कठिनाई, जो अभी तक है, वो स्‍थान की है। इस समस्‍या के स्‍थाई समाधान के लिए यह पोस्‍ट लगाई गई है ताकि इसमें और भविष्‍य में सिर्फ दिल्‍ली में ही नहीं, कहीं भी आयोजित किए जाने वाले हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के मिलने में सरलता हो सके। इसी से हिन्‍दी की ताकत का भी परिचय मिल सकेगा और सभी एक सूत्र में जुड़ सकेंगे।
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क्या भारतीय हाकी टीम को बैसाखियो की जरूरत है?

आज कल हम सब टी.वी पर कुछ विग्यापन देख रहे है जिसमे हाकी वर्ल्ड कप को समर्थन करते हुये कुछ खिलाडियो को दिखाया जा रहा है. यह देख कर खुशी हुई कि हमारी लडखडाती हुई हाकी टीम को प्रोत्साहित करने मे जो अनदेखी लम्बे समय से हो रही थी अब उसकी ओर कम से कम मीडिया का ध्यान जा तो रहा है. मगर एक बात मेरे गले नही उतर रही और शायद मेरे जैसे कितने ही लोग होगे जिनको यह बात असमंजस मे डालती होगी कि भारतीय हाकी के खेल को जो लोग बढावा देने की बात करते दिख रहे है वो फिल्मी सितारे है जैसे प्रियांका चोपडा जी, अभिषेक बच्चन जी है और तो और क्रिकेट जगत के धुरन्धर खिलाडी जैसे वीरेन्द्र सहवाग भी हाकी जैसी लडखडाती टीम का साहस बढाते दिखाई दे रहे है. इतना सारा प्रोत्साहन देखकर अच्छा लगता है. मगर फिर एक बात मेरे मन को शंका से भर देती है कि ये प्रोत्साहन कार्यक्रम कही हाकी को बैसाखी के रूप मे तो प्राप्त नही हो रहे?? क्योकि इन चेहरो मे किसी हाकी खिलाडी का चेहरा तो दिखाई ही नही दे रहा !!! भारत की भोली जनता तो उनके हाकी खिलाडियो को देखने के लिये मैच की टिकट ही लेनी होगी क्या ??? कितना अच्छा होता अगर इन प्रोत्साहन कार्यक्र्मो मे किसी हाकी खिलाडी को भी फिल्माया गया होता. क्योकि ये कार्यक्र्म भारतीय हाकी को बैसाखी की तरह दिये गये है कि जैसे भारतीय हाकी खिलाडियो का कोई अस्तित्व ही नही है या फिर उनमे आत्मबल की कभी है??एक भारतीय होने के नाते मेरा यह विचार है कि हाकी टीम के खिलाडियो को भी मीडिया जगत मौका दे, समर्थन दे उन्हे सीधे तौर पर भारतीय जन-मानस तक पहुचाये . तभी तो हम सीधे सीधे अपने खिलाडियो से जुड पायेगे. आपका क्या कहना है???
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क्या भारतीय हाकी टीम को बैसाखियो की जरूरत है?

आज कल हम सब टी.वी पर कुछ विग्यापन देख रहे है जिसमे हाकी वर्ल्ड कप को समर्थन करते हुये कुछ खिलाडियो को दिखाया जा रहा है. यह देख कर खुशी हुई कि हमारी लडखडाती हुई हाकी टीम को प्रोत्साहित करने मे जो अनदेखी लम्बे समय से हो रही थी अब उसकी ओर कम से कम मीडिया का ध्यान जा तो रहा है. मगर एक बात मेरे गले नही उतर रही और शायद मेरे जैसे कितने ही लोग होगे जिनको यह बात असमंजस मे डालती होगी कि भारतीय हाकी के खेल को जो लोग बढावा देने की बात करते दिख रहे है वो फिल्मी सितारे है जैसे प्रियांका चोपडा जी, अभिषेक बच्चन जी है और तो और क्रिकेट जगत के धुरन्धर खिलाडी जैसे वीरेन्द्र सहवाग भी हाकी जैसी लडखडाती टीम का साहस बढाते दिखाई दे रहे है. इतना सारा प्रोत्साहन देखकर अच्छा लगता है. मगर फिर एक बात मेरे मन को शंका से भर देती है कि ये प्रोत्साहन कार्यक्रम कही हाकी को बैसाखी के रूप मे तो प्राप्त नही हो रहे?? क्योकि इन चेहरो मे किसी हाकी खिलाडी का चेहरा तो दिखाई ही नही दे रहा !!! भारत की भोली जनता तो उनके हाकी खिलाडियो को देखने के लिये मैच की टिकट ही लेनी होगी क्या ??? कितना अच्छा होता अगर इन प्रोत्साहन कार्यक्र्मो मे किसी हाकी खिलाडी को भी फिल्माया गया होता. क्योकि ये कार्यक्र्म भारतीय हाकी को बैसाखी की तरह दिये गये है कि जैसे भारतीय हाकी खिलाडियो का कोई अस्तित्व ही नही है या फिर उनमे आत्मबल की कभी है??एक भारतीय होने के नाते मेरा यह विचार है कि हाकी टीम के खिलाडियो को भी मीडिया जगत मौका दे, समर्थन दे उन्हे सीधे तौर पर भारतीय जन-मानस तक पहुचाये . तभी तो हम सीधे सीधे अपने खिलाडियो से जुड पायेगे. आपका क्या कहना है???
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