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किसी उपनिषद की तरह है यह परिकल्पना

आज दिनांक 30.04.2010 को ब्लोगोत्सव-२०१० के अंतर्गत प्रकाशित पोस्ट का लिंक

किसी उपनिषद की तरह है यह परिकल्पना :
इमरोज़ http://www.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_9889.html

ब्लोगोत्सव-२०१० : बच्चे भी तो बेरौनक जगह जाना नही चाहते नाबhttp://www.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_8696.html

ब्लोगोत्सव-२०१० : ग्यारह बजे भी बिस्तर छोडे तो क्या फर्क पड़ जायेगा? http://www.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_1961.html

ब्लोगोत्सव-२०१० : ये बेचारा हृदय की जन्मजात् बीमारी की वज़ह से नीला पड़ चुका है http://www.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_1707.html

ब्लोगोत्सव-२०१० : क्या वह भौतिक पदार्थों के मोह से ऊपर उठ चुका है ? http://www.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_30.html

ब्लोगोत्सव-२०१० : आपको इंतज़ार था, लीजिये आ गए .........! http://www.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_7519.html

ब्लोगोत्सव-२०१० : आज का दिन कुछ ख़ास है
http://www.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_29.html

जड़ से विच्छिन्न लेखन की आयु बहुत छोटी होती है : श्री कृष्ण बिहारी मिश्र http://utsav.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_30.html

श्रीमती सरस्वती प्रसाद की कहानी : मूढीवाला
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_785.html

निर्मला कपिला जी की कहानी : सच्ची
साधना http://utsav.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_8754.html

श्री रवि रतलामी की कहानी :आशा ही जीवन है
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रश्मि रविजा की कहानी : http://utsav.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_2218.html

शमा की कहानी : नीले पीले फूल
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विज्ञान कथा : वेदों में वर्णित सोम की नई दावेदारी : ‘यार सा गुम्बा’ http://utsav.parikalpnaa.com/2010/04/blog-post_7958.html

हमें गर्व है हिंदी के इन प्रहरियों पर -1
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क्या वास्तव में गांधी ऐसे थे?

                      (उपदेश सक्सेना)

मोहनदास करमचंद गांधी को भारत में बापू का दर्ज़ा भले ही दिया गया हो, अंग्रेज उनकी छवि बिगाड़ने का कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं देते.महात्मा गाँधी ने अपनी लाठी के बल पर अंग्रेजों को इस देश से भागने में अपना सर्वोच्च योगदान दिया था मगर ब्रिटिश लोग आज भी शायद अपनी इस बेदखली के कारण गांधी से नाराज़ हैं.अब एक ब्रिटिश इतिहासकार जेड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन(?) और शोध के बाद “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” किताब लिखी है जिसमें गांधी को सेक्स कुंठित व्यक्ति बताया गया है. इस विवादित पुस्तक के बारे में जानकारी होने के बावजूद भारत में गांधी के नाम पर सरकार चलाने वाले खामोश हैं. पुस्तक में मुख्यतः गांधी और विभिन्न लड़कियों के ‘रिश्तों’ को सनसनीखेज़ तरीके से पेश किया गया है.एक जगह ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में नग्न स्नान भी करते थे. 288 पेज की करीब आठ सौ रुपए मूल्य की यह किताब जल्द ही भारतीय बाज़ार में उपलब्ध होगी।
दुनिया ने भी गांधी के भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में दिए योगदान के कारण और उनके निजी जीवन में सादगी को लेकर उन्हें आध्यात्मिक नेता माना है.एडम्स की किताब यह कहती है कि गांधी उन युवा महिलाओं के साथ ख़ुद को संतृप्त किया करते थे जो उनकी पूजा करती थीं और अकसर उनके साथ बिस्तर का हिस्सा बनती थीं.ऐडम्स का दावा है कि लंदन से क़ानून की पढ़ाई करने के बाद गांधी की छवि सेक्स के मामले में एक ऐसे कठोर नेता की बनी जो अपनी शारीरिक भूख की मांग से अपने समर्थकों को वशीभूत कर लेता है.किताब में लिखा है कि ‘गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब-क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे.लेखक के मुताबिक गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे.किताब में एक जगह लिखा गया है कि,हालांकि अन्य उच्चाकांक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे.इस किताब की शुरुआत गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ने ख़ुद लिखा कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता करमचंद गांधी जब मृत्यु-शैया थे उस समय किशोर गांधी अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे। किताब में कहा गया है कि विभाजन के दौरान नेहरू गांधी को अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानने लगे थे। ऐडम्स ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर उन्हें अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है.किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य के प्रयोग का भी वर्णन किया है,जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। इस बारे में हालांकि गांधी ने ख़ुद लिखा है,कि “नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कस कर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है.”किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18साल की मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें.”ऐडम्स का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला,मनु और आभा ने गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा अस्पष्ट बात कही. जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग है.कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स-प्रयोगों से जुड़े सच को छुपाती रही है.गांधी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई.सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं.ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायर,मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं.कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं.बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है.हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी “आध्यात्मिक पत्नी” हैं. किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया। एडम्स मानते हैं कि ‘मैं जानता हूं इस एक किताब को पढ़कर भारत के लोग मुझसे नाराज़ हो सकते हैं लेकिन जब मेरी किताब का लंदन विश्वविद्यालय में विमोचन हुआ तो तमाम भारतीय छात्रों ने मेरे प्रयास की सराहना की, मुझे बधाई दी.’
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सत्ता सदा ही फिसली है गुरूजी के हाथ से

सत्ता सदा ही फिसली है गुरूजी के हाथ से

राजनैतिक अस्थिरता नियति बन गई है झारखण्ड की

विवाद और सोरेन का चोली दामन का साथ

(लिमटी खरे)

झारखण्ड के मुख्यन्त्री शिबू सोरेन कहीं रहें और वे विवादित और चर्चित न हों एसा कैसे हो सकता है। सोरेन और विवाद का तो चोली दामन का साथ है। केन्द्र हो या सूबाई सरकार। जब कभी भी सोरेन की ताजपोशी की गई उसके बाद से ही उनके पदच्युत होने की खबरें फिजां में तैरती रहीं हैं। चार माह पूर्व भाजपा की मदद से सोरेन तीसरी मर्तबा झारखण्ड के मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर बैठे थे। चूंकि वे सदन (विधानसभा) के सदस्य नहीं थे, अत: नियमानुसार उन्हें छ: माह के भीतर विधायक बनना बहुत जरूरी था। सोरेन को विधायक बनने के लिए अपने ही दल के 18 सदस्यों में से एक का त्यागपत्र चाहिए था, जहां से उपचुनाव करवाकर वे सदन के सदस्य बनते। लोगों के आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा जब सोरेन संसद मेें अचानक सांसद की हैसियत से ही प्रकट हो गए। अपने ही दल में सोरेन को एक भी सीट खाली करने वाला नहीं मिला। वे जामा सीट पर किस्मत आजमाना चाहते थे, पर यहां से उनके बेटे स्वर्गीय दुगाZ की पित्न सीता विधायक हैं, और उन्होंने अपने ससुर को दो टूक शब्दों में जवाब दे दिया कि वे सीट खाली करने तैयार नहीं हैं। रही बात उनके पुत्र हेमन्त की तो दुमका सीट हेमन्त छोडने को तैयार हैं, पर सोरेन को लगता है कि अगर उन्होंने कुर्सी छोडी तो राजपाट सम्भालने के लिए हेमन्त से मुफीद और कोई नहीं होगा, सो पुत्रमोह में वे इस सीट से हेमन्त का त्यागपत्र नहीं दिलवाना चाहते हैं।

इतिहास साक्षी है कि सोरेन इसके पहले भी दो बार मुख्यमन्त्री बन चुके हैं पर निजाम की कुर्सी पर वे ज्यादा दिन काबिज नहीं रह पाए थे। 2005 में सोरेन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के सहयोग से मुख्यमन्त्री बन पाए थे, इस समय वे महज नौ दिन में ही टें बोल गए थे। इसके बाद एक बार फिर 2008 में यूपीए ने ही सहयोग कर उन्हें मुख्यमन्त्री बनाया इस बार भी महज चार महीनों का ही राजपाट उन्हें नसीब हुआ था। इस बार उन्होंने तमाड सीट से उपचुनाव लडा, पर हारने के कारण उन्हें कुर्सी त्यागनी पडी थी। सोरेन केन्द्र में कोयला मन्त्री रहे हैं, कोयला मन्त्री रहते हुए उन पर लदे प्रकरणों के चलते उनका आधा समय अदालत की दहलीज पर ही गुजर रहा है। इतना ही नहीं सोरेन पर हत्याओं के जघन्य आरोप भी हैं। उनके निजी सचिव शशिकान्त झा हत्याकाण्ड, कुडको हत्याकाण्ड, चीरूडीह नरसंहार जेसे मामलों से सोरेन उबर नहीं पाए हैं।

11 जनवरी 1944 में जन्मे सोरेन की राजनैतिक यात्रा 1971 से आरम्भ हुई। इस साल वे झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महासचिव बने और 1980 में वे सातवीं लोकसभा के लिए चुने गए। इसके छ: साल बाद 1986 में वे झामुमो के अध्यक्ष बने और 1989, 1996, 2002, 2004 में लोकसभा सदस्य बने। मई 2004 में वे कोयला और खान मन्त्री बने और जुलाई 2004 में उन्होंने यह पद त्यागकर सूबाई राजनीति की ओर कदम बढा लिए। सोरेन 01 जनवरी से अपने 61 वें जन्म दिन 11 जनवरी 2005 तक झारखण्ड के सीएम बने। इसके बाद वे 29 जनवरी 06 से 28 नवंबर 2006 तक कोयला मन्त्री रहे। 2009 में एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद गुरूजी 30 दिसम्बर 2009 को झारखण्ड के मुख्यमन्त्री बने।

गुरूजी की चालों को समझ पाना असान नहीं है। झारखण्ड में सोरेन भाजपा के पेरोल पर ही टिके हुए हैं। बावजूद इसके लोकसभा में कटौती के प्रस्ताव पर भाजपा के खिलाफ ही अपना वोट डालने के बाद सोरेन ने रात का भोजन भाजपा के निजाम नितिन गडकरी के घर पर ही किया। सोरेन के लिए मेजबानी करने वाले नितिन गडकरी को जब पता चला कि गुरूजी ने भाजपा की पीठ पर ही खंजर घोंप दिया है, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन ही निकल गई।

गठबंधन धर्म से हटकर अपने निहित स्वार्थों की बलिवेदी पर शिबू सोरेन ने झारखण्ड जैसे छोटे राज्य में राजनैतिक अस्थिरता पैदा कर दी है। भाजपा के समर्थन वापस लेने से अब जेवीएम के बाबूलाल मराण्डी के साथ मिलकर सरकार बनाने के रास्ते साफ नहीं दिखाई पड रहे हैं। कांग्रेस के मैनेजरों ने अगर उन्हें तैयार भी कर लिया तो भी यह गठबंधन बहुत ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा। समूचा घटनाक्रम गुरूजी की राजनैतिक महात्वाकांक्षा की ओर ही इशारा कर रहा है। गुरूजी चाहते हैं कि वे अपनी राजनैतिक विरासत को अपने पुत्र हेमन्त के हाथों सौंप सकें। इसके लिए वे जमीन तैयार करने में जुटे हुए हैं। उन पर लदे मुकदमों के बोझ से उनकी कमर टूटने की कगार पर है। अगर वे संसद में कांग्रेस का साथ न देते तो जांच एजेंसियों की धार पैनी होना स्वाभाविक ही था। अब सोरेन को जांच में कुछ हद तक राहत मिलने की उम्मीद है। यह है भारत गणराज्य का इक्कीसवीं सदी का प्रजातन्त्र, जिसमें सरकारी एजेंसियों को देश के निजाम अपने नफा नुकसान के हिसाब से इस्तेमाल करने से नहीं चूकते हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि नए राज्य के अस्तित्व में आने के दस सालों बाद भी सूबे के मतदाता किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत देने को तैयार नहीं हैं। झारखण्ड में उपजी परिस्थितियों में अब राष्ट्रपति शासन एक विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आया है। केन्द्र सरकार के लिए यह विकल्प काफी हद तक सरल होगा, क्योंकि इसमें परोक्ष तौर पर शासन की बागडोर कांग्रेस के हाथ में होगी। इसके अलावा कांग्रेस द्वारा मरांउी और सोरेन के साथ गठबंधन कर सरकार चलाई जा सकती है। इसमें सोरेन को केन्द्र में मन्त्रीपद तो मराण्डी को सीएम और हेमन्त सोरेन को उपमुख्यमन्त्री पद से नवाजना विकल्प है। कुल मिलाकर हर पहलू से देखने से यही प्रतीत होता है कि आने वाले दिनों में सोरेन की राह बहुत आसान तो प्रतीत नहीं होती है।

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वजीरे आजम पेश करेंगे रिपोर्ट कार्ड

वजीरे आजम पेश करेंगे रिपोर्ट कार्ड

यूपीए 2 की पहली सालगिरह 22 को

पीएमओ कर रहा जोर शोर से तैयारियां

अंग्रेजी में होगा मन्त्रालयों का लेखा जोखा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 29 अप्रेल। गांधी नेहरू परिवार से इतर पहले कांग्रेसी प्रधानमन्त्री होने का खिताब पाने वाले डॉ.मनमोहन सिंह जिन्होंने लगातार दूसरी बार 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमन्त्री का सरकारी आवास) पर अपना कब्जा बरकरार रखा है, के द्वारा अब अपनी दूसरी पारी के पहले साल में कुछ नया करने की ठानी है। 22 मई को एक साल का कामकाज पूरा होने पर प्रधानमन्त्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता के समक्ष रखा जा सकता है, ताकि जनता फैसला कर सके कि यह सरकार काम करने वाली सरकार है, न कि बतोले बाजी में वक्त जाया करने वाली।

पीएमओ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि प्रधानमन्त्री के प्रमुख सचिव टी.के.ए.नायर द्वारा अनेक मन्त्रियों और मन्त्रालय को पत्र लिखकर समय सीमा (टाईम लिमिट) में उनके मन्त्रालयों की उपलब्धियां भेजने के लिए खत लिख चुके हैं। सूत्रों के अनुसार भारत गणराज्य की भाषा हिन्दी है, पर यह रिपोर्ट कार्ड अंग्रेजी में ``रिपोर्ट टू द प्यूपिल`` के नाम से जारी किया जाएगा। कहा जा रहा है कि जनता के बजाए इसे एलीट क्लास के लोगों को समझाने के लिए जारी की जा रही है। आखिर सरकार चलती भी तो उन्हीं के इशारों पर ही है।

भले ही मन्त्रालयों पर काबिज मन्त्री भ्रष्टाचार के तराने गा रहे हों, आसमान छूती मंहगाई के चलते जनता की कमर टूटी हो, शशि थुरूर के कारण कांग्रेस की भद्द पिट रही हो पर प्रधानमन्त्री चाहते हैं कि उनकी सरकार का उजला पक्ष जनता के सामने आए। वैसे इस प्रतिवेदन में महिला आरक्षण बिल, शिक्षा का अधिकार, फुड सिक्यूरिटी बिल को प्रमुखता के साथ शामिल किए जाने की खबर है। गौरतलब है कि प्रधानमन्त्री ने शिक्षा के अधिकार के लागू होने वाले दिन प्रधानमन्त्री ने लीक से हटकर राष्ट्र को संबोधित किया था।

प्रधानमन्त्री की मंशा के चलते अनेक मन्त्रियों की सांसे थम गई हैं। दूसरी पारी में नए विभागों से सजे धजे मन्त्रियों द्वारा अपना पूरा समय मौज मस्ती और पुरानी रंजिशें निकालने में गंवा दिया है, अत: उनके पास अब नया करने को कुछ खास नहीं है, जिसे वे अपनी उपलब्धि के बतौर बता सकें। कहा जा रहा है कि विभाग की सूरत और सीरत को रंग रोगन कर संवारने के लिए मन्त्रियों ने कुछ प्रोफेशनल्स की मदद भी ली जा रही है, ताकि पुरानी उपलब्धियों को नए मन्त्रियों के खाते में डालकर अपनी जान छुडाई जा सके।

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गडकरी नहीं दे रहे आडवाणी को ज्यादा भाव

आडवाणी की ओर से आंखें फेरी संघ ने
 
गडकरी भी नहीं दे रहे आडवाणी को ज्यादा भाव
 
सिंघल भी दिखा चुके हैं तीखे तेवर
 
संघ चाहता है कमल एक बार फिर देश में छा जाए
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 29 अप्रेल। मुरझाए कमल के फूल की पंखुडियों को एक बार फिर नई उर्जा देकर खडा करने की कोशिश में लगे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अब अपना रोड मेप तय कर लिया है। पिछले कुछ सालों में हुई गिल्तयों पर मनन करने के बाद संघ ने अब आत्मकेन्द्रित घाघ नेताओं के पर कतरने की कार्ययोजना बना ली है। लगता है कि इस मुहिम में सबसे पहले राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की लाटरी लगी है, वे आजकल संघ के निशाने पर बताए जा रहे हैं।
 
संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि अटल बिहारी बाजपेयी के सक्रिय राजनीति से सन्यास लेते ही पार्टी के स्वयंभू नए खिवैया बनकर उभरे एल.के.आडवाणी ने खुद को प्रधानमन्त्री बनवाने के लिए पार्टी का बंटाधार करने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। आडवाणी की कीर्तन मण्डली ने उन्हीं को उपकृत किया था, जो आडवाणी की चरण वन्दना में विश्वास रखते थे, एसी परिस्थितियों में पार्टी के अनेक कुशल नेताओं ने अपने आप को एक दायरे में समेटकर रख लिया था।
 
संघ ने आडवाणी के पर करतने के उपक्रम में उन नेताओं को एक छतरी के नीचे लाना आरम्भ कर दिया है, जो कभी आडवाणी के कट्टर विरोधी रहे हैं। सूत्रों की माने तो संघ का शीर्ष नेतृत्व इन दिनों उमा भारती, गोविन्दाचार्य, सुब्रहामण्यम स्वामी, अशोक सिंघल, मदन लाल खुराना, कल्याण सिंह, यशवन्त सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेताओं से सतत संपर्क बनाए हुए है। इन्ही के साथ रायशुमारी कर संघ अपने अगले कदम तय कर रहा है। संघ के नेतृत्व की इच्छा है कि कालराज मिश्र जैसे सीजन्ड नेताओं को देश में कमल को खिलाने के लिए एक बार फिर जवाबदारी दी जा सकती है। सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि मोहन भागवत सहित भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने आडवाणी को हाशिए में ढकेलने के अभियान की कमान सम्भाल रखी है।
 
भाजपा से बिछुडे कल्याण सिंह और उमा भारती अब गोविन्दाचार्य के अगले कदम की बाट जोह रहे हैं। कल्याण सिंह की घर वापसी के लिए भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी ने कल्याण पुत्र राजवीर को दाना डाला हुआ है। हरिद्वार में सन्तों के बीच विहिप के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल भी आडवाणी के खिलाफ जहर बुझे तीर चला चुके हैं। बकौल सिंघल आडवाणी की रथ यात्रा के कारण मन्दिर नहीं बन पाया था। सिंघल ने तो आडवाणी को आडे हाथों लेते हुए यह तक कह दिया कि उनकी रथयात्रा वोट बैंक के लिए थी। कहा जा रहा है कि गडकरी और संघ का शीर्ष नेतृत्व मिलकर कुछ नए एक्सपेरीमेंट करने की तैयारी में हैं। इस तरह के प्रयोग एल.के.आडवाणी, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू, अरूण जेतली आदि को शायद ही रास आएं।

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राजधानी की फिजां में जहर!

राजधानी की फिजां में जहर!

साढे तीन सौ गुना ज्यादा हैं सूक्ष्म कण
 
श्वसन तन्त्र, किडनी, लीवर की बज रही है बारह
 
कामन वेल्थ के नाम पर शीला सरकार का नंगा नाच
 
लोगों के स्वास्थ्य की कीमत पर कैसी तैयारी
 
किसने दिया लोगों के स्वास्थ्य के साथ खेलने का लाईसेंस
 

 
(लिमटी खरे)

राष्ट्रमण्डल खेल की तैयारियों में विलंब को लेकर सन्देह के दायरे में आई शीला सरकार के हाथ पैर फूलना स्वाभाविक ही है। तीन चार साल तक सोने के बाद जब समय कम बचा तब कम समय में युद्ध स्तर पर कार्यवाही को अंजाम देने के लिए काम कराया जा रहा है, जिससे दिल्लीवासियों का दम फूलने लगा है। समूची दिल्ली का सीना खुदा पडा है। जहां तहां तोडफोड और गेन्ती फावडे, जेसीवी मशीन का शोर सुनाई पड रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि स्वास, किडनी और लीवर के रोगियों की तादाद में आने वाले समय में तेजी से इजाफा हो सकता है।
 
प्रदूषण के लिए दिल्ली का नाम सबसे उपर ही आता है। एक समय में डीजल पेट्रोल से चलने वाले वाहनों ने लोगों का जीना दुश्वार कर रखा था। दिल्ली में सडक किनारे लगे पेड पौधे तक काले पड गए थे। न्यायालय के आदेश के बाद दिल्ली में डीजल पेट्रोल के व्यवसायिक वाहनों को सीएनजी के माध्यम से चलाने का निर्णय लिया गया। उस समय भी खासी हायतौबा मची थी। शनै: शनै: मामला पटरी पर आया और दिल्ली में प्रदूषण का स्तर कुछ हद तक काबू में आ गया।
 
कामन वेल्थ गेम्स इसी साल के अन्त में होने हैं। 2006 में इसकी तैयारियां आरम्भ कर दी गईं थीं। विडम्बना देखिए कि पांच सालों तक दिल्ली की गद्दी पर राज करने वाली शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली सरकार सोती रही और जब अन्तिम समय आया तब जागकर इसकी तैयारियों के लिए कमर कस रही है। आज हालात यह है कि दिल्ली के किसी भी इलाके में अगर साफ प्लेट रख दी जाए तो बमुश्किल घंटे भर के अन्दर ही उस पर गर्त चढी हुई मिलेगी।
 
दिल्ली के दिल कहलाने वाले कनाट सर्कस (कनाट प्लेस) में पिछले साल रंगरोगन और निखारने का काम आरम्भ हुआ था। साल भर से यहां खुदाई और तोडफोड का काम चल रहा है। समय की कमी के चलते कनाट प्लेस के तीनों सिर्कल का काम एक साथ ही आरम्भ किया गया था। इससे लोगों को बेहद असुविधा का सामना करना पड रहा है। यहां चलने वाले निर्माण कार्य के चलते कनाट प्लेस के आउटर सिर्कल में वाहन रेंगते ही नज़र आते हैं। इन वाहनों से निकलने वाला धुंआ भी लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नहीं है।
 
दिल्ली के दिल में वायू प्रदूषण के चलते नई दिल्ली महानगर पलिका निगम ने इटली की एक कंपनी के सहयोग से यहां सिस्टम लाईफ (सीआईटीटीए) नामक मशीन संस्थापित की। यह मशीन वातावरण के वायू प्रदूषण को खींचकर वातावरण में स्वच्छ हवा को छोडती है। कहा जाता है कि उक्त मशीन 95 फीसदी तक प्रदूषण मुक्त कर देती है। इस साल 06 मार्च को लगी इस मशीन के बारे में कहा जाता है कि यह मशीन चालीस एकड क्षेत्र की आबोहवा को साफ कर देती है।
 
27 अप्रेल को जब इटली की कंपनी ने मशीन में एकत्र हुए जहरीले और हानिकारक तत्वों के बारे में मोडेना विश्वविद्यालय इटली में हुए शोध के परिणामों को उजागर किया तो सभी की सांसे थम गईं। प्रतिवेदन बताता है कि कनाट सर्कस की आबोहवा में पाए गए तत्व इंसान के लिए बहुत ही ज्यादा घातक हैं। पीएम एक, दो दशमलव पांच और दस की श्रेणी में विभाजित इन तत्वों में पीएम एक सबसे अधिक नुकसानदेह बताया जाता है। बताते हैं कि सूक्ष्म कण (पीएम एक) की अधिकतम मात्रा 60 होनी चाहिए जो कनाट प्लेस में बीस हजार है।
 
जानकार चिकित्सकों का कहना है कि इतनी अधिक मात्रा में सूक्ष्म कण के पाए जाने से इंसान के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडने से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह के कण सीधे सीधे स्वशन तन्त्र, तन्त्रिका तन्त्र, लीवर, फेंफडे, दिल, किडनी पर सीधा हमला करते हैं। इससे आम आदमी को लीवर, रक्त और फैंफडों के कैंसर के होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। सबसे ज्यादा फजीहत तो यहां काम करने वाले श्रमिकों की है, जिन्हें बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के सीधे मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। इसके अलावा कनाट प्लेस और आसपास काम करने वाले कर्मचारियों के साथ ही साथ यहां के दुकानदार मुनाफे में ही इस तरह की संगीन बीमारियों को गले लगाने पर मजबूर हैं। कमोबेश यही आलम समूची दिल्ली का है।
 
हमारा कहना महज इतना ही है कि जब समय था तब अगर मन्थर गति से ही सही तैयारियां की जातीं तो आज सरकार को आनन फानन में दिल्ली को एक साथ नहीं खोदना पडता। दिल्लीवासियों के स्वास्थ्य की कीमत पर राष्ट्रमण्डल खेल करान कहां की समझदारी है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि आखिर दिल्ली और केन्द्र सरकार को दिल्ली के निवासियों और बाहर से आने जाने वाले लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड करने का लाईसेंस किसने दिया। वह तो भला हो सिस्टम लाईफ मशीन का जिसने इस खतरे से आगाह कर दिया, वरना सरकार तो लोगों को बीमार बनाने का पुख्ता इन्तजाम कर चुकी थी। वैसे मशीन के चेताने से भी भला क्या होने वाला है, सरकार को अपना काम करना है, ठेकेदार को अपना, पर सदा की तरह पिसना तो आम जनता को ही है।

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अन्तत: मध्य प्रदेश का ताज प्रभात झा को

अन्तत: मध्य प्रदेश का ताज प्रभात झा को
 
उमाश्री मामले के चलते शिवराज ने दी अपनी सहमति
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 28 अप्रेल। लंबी जद्दोजहद के बाद अन्तत: मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष के लिए प्रभात झा का नाम तय हो ही गया है। 02 मई को प्रदेश के प्रभारी कालराज मिश्र देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में उनके नाम की औपचारिक घोषणा करेंगे। मध्य प्रदेश में लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने वाले प्रभात झा मूलत: पत्रकार हैं, और उन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों के लिए काम भी किया है।
 
भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक मध्य प्रदेश संगठन के लिए अध्यक्ष का चुनाव आसान नहीं था। प्रदेश में अस्तित्व वाले अनेक गुटों द्वारा अपने अपने पसन्द के नेता का नाम इसके लिए उछाला जा रहा था। जैसे ही प्रभात झा का नाम सामने आया वैसे ही उनके बिहार मूल के होने की बात राजनैतिक फिजां में तैरा दी गई। सूत्रों ने बताया कि संघ और भाजपा नेतृत्व को बताया गया कि भले ही प्रभात झा बिहार के रहने वाले हों पर उनकी कर्मभूमि तो मध्य प्रदेश ही रही है।
 
प्रभात झा का नाम सामने आते ही एक गुट द्वारा इन्दौर की संसद सदस्य सुमित्रा महाजन का नाम जोर शोर से उछाला जाने लगा। तब लगने लगा था कि महिलाओं को प्रसन्न करने तेन्तीस फीसदी आरक्षण की हिमायत करने वाली भाजपा द्वारा कहीं प्रदेश के निजाम के बतौर सुमित्रा महाजन को न बिठा दिया जाए। इसके अलावा इन्दौर के ही दूसरे क्षत्रप और मध्य प्रदेश के एक वजनदार गायक मन्त्री कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ सामने आए मामलों से उन्हें कमजोर करने के लिए भी सुमित्रा महाजन की ताजपोशी की खबरें चल पडी थीं।
 
सूत्रों ने बताया कि उमा भारती के फेक्टर के चलते शिवराज सिंह चौहान बुरी तरह खौफजदा थे, और वे चाहते थे कि संगठन की बागडोर उनके किसी पिट्ठू को ही सौंपी जाए। उन्होंने प्रभात झा को अध्यक्ष की कुर्सी से दूर रखने के लिए एडी चोटी लगा दी थी। सूत्रों के अनुसार जब पार्टी नेतृत्व द्वारा शिवराज सिंह चौहान को भरोसा दिलाया गया कि प्रभात झा के अध्यक्ष बनने से मध्य प्रदेश में संगठन को काफी लाभ पहुंचेगा तब जाकर उन्होंने अपनी सहमति जताई। वैसे भी संघ के सह सरकार्यवाहक सुरेश सोनी ने प्रभात झा को अध्यक्ष बनने के लिए अभैद्य दीवार का काम ही किया है।
प्रभात झा के करीबी बताते हैं कि राजमाता सिंधिया के गृह जिले ग्वालियर में प्रभात झा द्वारा स्वदेश अखबार में काम करने के दौरान ही संध की रीतियों नीतियों से प्रभावित होकर वे बरास्ता संघ भाजपा में सक्रिय भूमिका में आए। इसके बाद उनकी कर्मभूमि चंबल से हटकर राजधानी भोपाल हो गई, जहां वे संवाद और संपर्क प्रमुख के बतौर काम करने लगे। राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने के उपरान्त उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सचिव बना दिया गया। प्रभात झा को मध्य प्रदेश से राज्य सभा में भेजा गया है। सूत्रों का कहना है कि 02 मई को उनके नाम की औपचारिक घोषणा के बाद वे किसी भी दिन अपना कार्यभार ग्रहण कर लेंगे।

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सिब्बल का एक और महाप्रयोग

और अब केन्द्रीय विद्यालय निजी हाथों में
 
पीपीपी के तहत होगा क्रियान्वयन
 

सिब्बल का एक और महाप्रयोग
 

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 28 अप्रेल। केन्द्रीय विद्यालयों में अब पढाई से इतर कामों के लिए विद्यालय प्रशासन को भागदौड नहीं करनी होगी। मानव संसाधन विकास मन्त्रालय एक एसी योजना पर विचार कर रहा है, जिससे समूचे देश में केन्द्रीय विद्यालयों को स्कूल के रखरखाव की समस्या से निजात मिलने की उम्मीद है। केन्द्रीय विद्यालय प्रबंधन अब अपना समूचा ध्यान सिर्फ और सिर्फ पढाई पर ही केन्द्रित करेगा, विद्यालय भवनों के रखरखाव की जवाबदारी अब निजी हाथों को दी जाने वाली है।
 
केन्द्रीय विद्यालय संगठन के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि जब भी कोई नया मानव संसाधन मन्त्री आकर जवाबदारी सम्भालता है, वह एक नया प्रयोग अवश्य ही करता है। कभी शिक्षा का भगवाकरण हो जाता है, तो कभी भारतवर्ष के इतिहास से ही छेडछाड होने लगती है। हाल ही में एचआरडी मिनिस्टर कपिल सिब्बल द्वारा ग्रेडिंग सिस्टम को लागू करवाकर एक नया प्रयोग किया है, और अब विद्यालय भवनों के रखरखाव की जिम्मेदारी विद्यालय प्रबंधन के हाथ से लेकर निजी हाथों में देने पर विचार किया जा रहा है।

एचआरडी मिनिस्टर कपिल सिब्बल के करीबी सूत्रों का कहना है कि सिब्बल का मानना है कि एसा करने से विद्यालय प्रशासन अपना पूरा ध्यान शैक्षणिक गतिविधियों पर केन्द्रित कर सकेंगे। वैसे इमारतों के रखरखाव आदि का काम पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत दिए जाने पर जोर शोर से विचार किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि सिब्बल मानते हैं कि इस अभिनव प्रयोग से शालाओं की दिशा और दशा दोनों ही में सुधार की उम्मीद है।

गौरतलब है कि वर्तमान में केन्द्रीय विद्यालय वैसे भी माडल स्कूल के तौर पर जाने जाते हैं। इन शालाओं में दाखिला आज भी प्रतिष्ठा का ही प्रश्न बना हुआ है। इसमें प्रवेश के लिए केटेगरी निर्धारित की गई है, जिसके चलते निजी या व्यवसाय में रत लोगों के बच्चे इसमें प्रवेश से वंचित रह जाते हैं। माना जा रहा है कि पढाई से इतर अन्य प्रबंधन निजी हाथों में आ जाने से एक ओर जहां विद्यालय प्रशासन का ध्यान पढाई में ही केन्द्रित होगा जिससे पढाई का गिरता स्तर सुधरेगा, वहीं दूसरी ओर रखरखाव का काम भी योजनाबद्ध तरीके से समयसीमा में पूरा किया जा सकेगा।

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इंडियन पिसाई लीग इन हरिभूमि टुडे


इंडियन पिसाई लीग की असलियत
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ब्लोगोत्सव-२०१० के अंतर्गत सातवें दिन प्रकाशित पोस्ट

...आज दिनांक २८.०४.२०१० को परिकल्पना ब्लोगोत्सव-२०१०
 के अंतर्गत सातवें दिन प्रकाशित पोस्ट........

ब्लोगोत्सव-२०१० : ऑनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति है ब्लोगिंग
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हिंदी माँ हमें माफ करना.......

(उपदेश सक्सेना)
हिंदी भाषा को हमारी मातृभाषा का दर्ज़ा तो प्राप्त है, मगर इसे राष्ट्रभाषा या राजभाषा कहने का कोई संवैधानिक हक हमें नहीं दिया गया है. यानि माँ तो हमारी है मगर शायद सौतेली! सौतेली शब्द से कई लोगों को पीड़ा हो सकती है, क्योंकि इतिहास में इस शब्द को कभी सकारात्मक ढंग से पेश नहीं किया गया है. हिंदी की दुर्दशा पर प्रेस विज्ञप्तियों के ज़रिये अपनी पीड़ा जताने वालों को भी इस बात का मलाल होगा कि इस समृद्ध भाषा को वह सम्मानजनक स्थान अब तक नहीं मिला, जिसकी वह हक़दार है. मैं मध्यप्रदेश के उस मालवा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूँ जहां की मीठी बोली में कई बार किसी की बे-इज्ज़ती होने पर उसे उलाहना दिया जाता है कि “....तेरी हिंदी हो गई”. अ से अमिताभ और ब से बच्चन तो हमारे देश में वर्षों पहले से पढ़ा जाने लगा है.जब हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा नहीं मिल सका है, तो यह बात विचारणीय है कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों जैसी संस्थानों का क्या औचित्य है?
यह जानकार दुःख भी होता है और प्रसन्नता भी, कि हिंदी भाषा के कुल शब्दों की संख्या अंग्रेजी के मुकाबले महज़ दस फ़ीसदी ही है, दुःख इस बात का है कि यह संख्या काफी नगण्य है, प्रसन्नता इस बात की है कि हमारी भाषा में कम शब्दों में भी अभिव्यक्ति दी जा सकती है, कम शब्दों में अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने वाले को ही समझदार माना जाता है, हालांकि यह प्रसन्नता केवल दिल को समझाने के लिए ही है. चीरहरण चाहे किसी स्त्री का हो या मातृभाषा का, वह सदैव से असहनीय रहा है. अंग्रेजीदां लोगों ने नयी भाषा हिंगलिश तैयार कर जले पर नमक छिडकने का काम किया है. मोबाइल के आने के बाद एसएमएस की वर्णमाला किसी को भी हतप्रभ करने में सक्षम है, खुले आम हिंदी के चीरहरण पर भी मौन रहने वाला “हिंदी पुत्र” नहीं हो सकता. आज़ादी चाहे किसी की गुलामी से हो या विचारों से, हमेशा सुखकर होती है. देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग देने वालों की तर्ज़ पर हिंदी को भी उसका सम्मान दिलवाने-उसे अंग्रेजी से आज़ाद करने भगत सिंह, सुखदेव,राजगुरु जैसे दीवानों की एक बार फिर ज़रूरत महसूस हो रही है. वैश्विक भाषाओं पर नज़र रखने वाली एक संस्थान की रिपोर्ट पर नज़र डालें तो शायद सभी की आँखें खुल सकती हैं इस रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में अंग्रेजी भाषा में शब्दों का भंडार 10 लाख की गिनती को पार कर गया है जबकि हिंदी में अभी तक मात्र 1 लाख 20 हज़ार शब्द ही हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा दस लाख शब्दों के साथ सबसे समृद्ध है जबकि कुल आठ भाषाओं की इस सूची में हिंदी महज़ एक लाख बीस हज़ार शब्दों के साथ सातवें क्रम पर है पूरी सूची इस प्रकार है-(१) अंग्रेजी- १0,00,000,(२)चीनी-500,000,(३)जापानी-232,000,(४)स्पेनिश-225,000,(५)रूसी-195,000,(६)जर्मन- 185,000,(७)हिंदी-120,000,(८)फ्रेंच-100,000. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अंग्रेजी में उन सभी भाषाओं के शब्द शामिल कर लिए जाते हैं जो उनकी आम बोलचाल में आ जाते हैं, लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं किया जाता। आँखें खोलें, .....”जग अभी जीता नहीं है, हम अभी हारे नहीं हैं.”

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75 साल से बिना खाए पिए जिंदा हैं यह बाबा (अविनाश वाचस्‍पति)


गुजरात में दिन में हो रहा है जो

वो रात में भी पॉसीबल नहीं कहीं

पर पॉसीबल सब कुछ है बंधु

इंपॉसीबल कुछ भी नहीं।

माताजी नाम से जाने जाते हैं

माताजी से पाया था आशीर्वाद।

लोग तो पीकर भी शर्मिन्‍दा नहीं होते

पर प्रह्लाद भाई जानी नहीं पीते पानी

फिर भी जिन्‍दा हैं

खाते नहीं खाना

फिर भी जिन्‍दा हैं

कहां से मिलती है एनर्जी

रिसर्च की जा चुकी है


अब दोबारा जारी है

दरअसल सब असल है

7 मई को इसका फल आएगा

चौंक तो अब भी रहे हैं

रिजल्‍ट क्‍या चौंकाएगा

पर यह सब भारत में ही होता है

अथाह ज्ञान का यहां पर सोता है।

नवभारत टाइम्‍स दैनिक दिनांक 29 अप्रैल 2010 से साभार
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कमल नाथ और कांग्रेसी सूबों के बीच ठनी रार

कमल नाथ और कांग्रेसी सूबों के बीच ठनी रार

सडक निर्माण में कांग्रेस शासित राज्य बने बाधक

भूमि अधिग्रहण बना सरदर्द

जयराम रमेश और नाथ का शीतयुद्ध बना अखाडा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 27 अप्रेल। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी ने देश के गांव गांव को सडकों से जोडने का सपना देखा था। इसके बाद देश के ग्रामीण इलाकों में सडकों का जाल फैलना आरम्भ हो गया। सडक निर्माण में गफलत, भ्रष्टाचार, अनियमितताओं की शिकायतें आम हो गईं। इस सबसे बचने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा राजग शासित राज्यों से इस मामले में सहयोग न देने की आरोप लगाए जा रहे हों पर वास्तविकता यह है कि कांग्रेस शासित सूबों में सडकों के निर्माण में सबसे ज्यादा परेशानी महसूस की जा रही है।

कमल नाथ के नेतृत्व वाले भूतल परिवहन मन्त्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राजमार्गों के निर्माण में हो रही देरी के पीछे केन्द्र की यूपीए सरकार नहीं वरन् राज्यों द्वारा भूमि अधिग्रहण में की जा रही देरी प्रमुख कारक बनकर उभरा है। सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस शासित असम जिसके मुख्यमन्त्री तरूण गगोई की ताजपोशी पिछली मर्तबा कमल नाथ ने बतौर कंाग्रेस के असम सूबे के प्रभारी महासचिव की हैसियत से की थी में ही 18 मामले लंबित हैं। इसी तरह देश में राष्ट्रीय राजमार्ग के कुल 82 मामले आज भी लंबित ही हैं।

सूत्रों ने आगे बतायाि क राजमार्ग का काम आरम्भ होने में विलंब के अधिकतर ममाले भूमि अधिग्रहण से जुडे हुए हैं। अमूमन देखा गया है कि कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण सबसे अधिक तेजी से हो जाता है, पर उसकी प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम छ: माह का समय लग जाता है। अगर कोई कानूनी बाधा आ जाती है तो मामला लंबा ही खिच जाता है। इसके अलावा राज्य सरकारों द्वारा सक्षम प्राधिकारों के नामांकन में विलंब, सक्षम भूमि अधिग्रहण प्राधिकारी का बारंबार स्थानान्तरण, संरचना में कमी, मुआवजा देने में देरी होने जैसी गफलतों के चलते विलंब हो जाता है।

राजग शासित दलों में मध्य प्रदेश में ही सात राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्माण काम बाधित पडा हुआ है। पंजाब में पांच, बिहार में चार, उत्तर प्रदेश में रिकार्ड 16 राजमार्गों का काम बाधित है। कुल मिलाकर देखा जाए तो लगभग एक हजार किलोमीटर सडक का काम रूका हुआ है। इनमें सबसे अधिक विलंब कांग्रेस शासित राज्यों में ही उभरकर सामने आ रहा है। कांग्रेस शासित राज्यों और केन्द्रीय भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ के बीच समन्वय के अभाव के चलते केन्द्र सरकार की इस महात्वाकांक्षी परियोजना के काम में पलीता लगता जा रहा है।

रही सही कसर वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश द्वारा पूरी की जा रही है। पिछली सरकार में तत्कालीन वाणिज्य मन्त्री कमल नाथ के मातहत रह चुके जयराम रमेश इस बार कमल नाथ के बराबरी वाले आसन पर विराजमान हैं। दोनों के बीच की तिल्खयां किसी से छिपी नहीं हैं। कमल नाथ के विभाग के कामों में वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा जमकर अडंगे लगाए जा रहे हैं। यही कारण है कि कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिन्दवाडा से सटे सिवनी जिले से होकर गुजरने वाले शेरशाह सूरी के जमाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात के हिस्से को जिसे एनएचएआई ने टेक ओवर कर लिया है, का निर्माण का काम बाधित हो रहा है

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अक्षय को मदद चाहिए....

अक्षय को मदद चाहिए....

एक युवा जो जीवन जीने के लिये संघर्ष कर रहा है जी हां मैं अक्षय कात्यानी जिसके इलाज़ हेतु मात्र दो लाख रुपयों की ज़रूरत है विस्तृत जानकारी इन लिंक्स पर प्राप्त की जाए और अविनाश जी की तरह हम मदद कर सकतें है

अविनाश वाचस्पति - कुछ दिनों से देख पढ़ रहा हूं। पर आज इस पोस्‍ट में खाता संख्‍या संबंधी निम्‍न जानकारी मिल गई है।

Name- Sudhir Kumar Katyayani,

Account No.- 09322011002264,

Bank Name- Oriental Bank of Commerce,

Branch- Arera Colony Branch, Bhopal (M.P.)

कल मतलब मंगलवार को ही मैं इसमें एक हजार रुपये जमा कर रहा हूं। एक शुरूआत है। आप भी अगर आर्थिक रूप से सक्षम हैं तो ऐसा ही नेक कदम उठाएं। मैं अतुल पाठक से तो परिचित नहीं हूं परन्‍तु मदद करने के लिए परिचितता आवश्‍यक नहीं है। मुझे यह भी नहीं लगता कि कोई सरकारी मदद मिल सकती है, मिल सकेगी। पर उसकी उम्‍मीद क्‍यों करें हम, हम तो बस शुरू हो जाएं अभी।

जो भी सक्षम हैं और मदद करने का जज्‍बा रखते हैं। हम अपनी बेमर्जी से अपनी जेब तो कटवा सकते हैं। अपना वर्षों से संचित माल-असबाब तो लुटवा सकते हैं। पर ऐसे मौकों पर चुप्‍पी क्‍यों साध लेते हैं ? वैसे निश्चित रूप से मदद पहुंचना आरंभ हो चुकी होगी।

तो हाथ मत बांधिए

कतार बांधिए

और बांधिए बंधन ऐसा

जिस पर मानवता

कर सके गर्व

ऐसा निभायें धर्म

सबसे बड़ा मानवधर्म

इसे अनदेखा मत कीजिए

अपने मन से पूछिए

वो आपकी नेक विचारों की

अवश्‍य तस्‍दीक करेगा।

यह मत सोचिए कि मेरे एक हजार रुपये से क्‍या होगा ? एक हजार भी नहीं चाहिए सिर्फ एक हजार रुपये देने वाले 200 इंसान चाहिएं। नुक्‍कड़ पर अवश्‍य ही 50 इंसान तो मिल सकेंगे। चाहते तो सब होंगे मदद करना। पर 50 ने भी कर दी तो हो गई है शुरूआत। न भी हो, पर मैं क्‍यों रूकूं, मैं तो अपना कर्म करता चलूं। मालूम नहीं दिन कितने हैं, पर दिनों की प्रतीक्षा क्‍यों करें, आज ही इस नेक काम को क्‍यों नहीं करें

BLOGER MITRA GIRESH BILLORE SAYS :

मेरी सारी उम्र ले ले यम राज़ किंतु एक मां को संतान का तिल तिल जीवन रसता न दिखाये आज सारे ब्लागर्स जो जितना भी कर रहें है उनको प्रणाम . अक्षय कौन है किसका बेता क्या है सब सेकण्डरी हो गया बस लगता है धन्वंतरी कहें:"आयुष्मान भव:" 
टीवी पत्रकार अक्षय को बचा लीजिए, वह जीना चाहता है

अक्षय कात्यानी की मदद हेतु एकाउंट नम्बर  09322011002264 of ORIENTAL BANK OF COMMERSE में सहयोग राशि जमा कीजिये


योगेश पाण्डेय - 09826591082,

सुधीर कत्यानी (अक्षय के पिता) - 09329632420,

अंकित जोशी (अक्षय के मित्र) - 09827743380,09669527866

जब भोपाल भर के पत्रकार इस साथी की हालत को लेकर निद्रामग्न थे....एक चैनल के पत्रकार की स्टोरी को उस क्षेत्रीय चैनल ने ड्रॉप कर दिया....तब सीएनईबी के भोपाल संवाददाता ने इस ख़बर को न केवल कवर किया....बल्कि चैनल ने अपने नैतिक दायित्व को भली भांति निभाते हुए इस मार्मिक व्यथा गाथा को अपील के साथ प्रसारित किया...जिसका असर भी दिखना शुरू हो गया है....सीएनईबी न्यूज़ के संवाददाता...से....सम्पादक तक सभी इसके लिए बधाई के पात्र हैं.....

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कोई दीवाना कहता है फेम कुमार विश्‍वास कल से आपको आपके शहर में मिलेंगे आप उनसे मिलना मत भूलिएगा उनके स्‍वर पाठ के झूले में झूलिएगा (अविनाश वाचस्‍पति)


कोई दीवाना कहता है
से प्रख्‍यात डॉक्‍टर कवि कुमार विश्वास अब कल से अपने काव्य पाठ से विदेशी धरती को अपनी कविता डॉक्‍टरी के स्‍वर पाठ से आलोकित करेंगे । कुमार 29 अप्रैल से 30 मई तक यूएसए तथा कनाडा के दौरे पर रहेंगे । जहां वे अपने तय कार्यक्रम के तहत अलग - अलग जगहों पर काव्य पाठ करेंगे ।
कार्यक्रम के अनुसार न्यू जर्सी में आयोजित हिन्दी महोत्सव में एक व दो मई , बुफ़ैलो में सात मई , कनाडा [ मोन्ट्रियल व टोरंटो ] में 8-9 मई , वाशिंगटन डीसी में 15 मई , अटलांटा में 16 मई , सेन फ्रांसिस्को में 22 मई , लॉस एंजिलिस में 23 मई , कनैक्टिकट में 29 मई को विदेशी श्रोता कुमार के काव्य पाठ का भरपूर लुत्फ उठाएंगे ।
अगर आप वहां है
जहां वे आ रहे हैं
उड़नतश्‍तरी वाले देश में
अदा जी के हां नहीं तो में
वे आपके देश में आ रहे हैं
और आप उनकी खबर पा रहे हैं
तो यहां पर अपनी राय अवश्‍य दें
उनकी एफआईआर नुक्‍कड़ पर दर्ज करें
इससे हमें पता लगता रहेगा
वे कहां पर किसको दीवाना बना रहे हैं

कविता का मस्‍ताना समां महका रहे हैं
जहां जहां रहते हैं नुक्‍कड़वासी
वहां पर विश्‍वास भी मौजूद मिलेंगे

यह मैं नहीं कह रहा हूं
कोई दीवाना कहता है
दीवाना वही तो सबके
दिलों में रहता है
आप तो सुन ही रहे होंगे
दीवाने की आवाज
हम मन में सुन रहे हैं
मन की ताकत सबसे बड़ी
विश्‍वास की चल रही है
आज इंटरनेटीय घड़ी।
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अडवाणी युग की समाप्ति का आगाज

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

अडवाणी युग की समाप्ति का आगाज

1980 में अस्तित्व में आई भाजपा ने अब अटल आडवाणी युग की बिदाई का आगाज कर ही दिया है। भाजपा के पितृ संगठन संघ को लगने लगा था कि अटल आडवाणी का नाम पार्टी से बडा होकर उभर रहा था, संघ काफी दिनों से इस प्रतीक्षा में था कि भाजपा के प्रतीक चिन्ह कमल के इन नेताओं के समक्ष बौने होते स्वरूप को एक बार फिर विशालकाय बनाकर समूचे दल को इसकी छत्रछाया में आकार दिया जाए। पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह के समय भी इस तरह के प्रयास किए गए पर सफल नहीं हो पाए। इस बार नितिन गडकरी के पहले प्रभावी प्रदर्शन में मंच पर पहली मर्तबा अटल आडवाणी सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं के चित्रों के स्थान पर कमल का फूल ही दिखाई दिया, जिसे अटल आडवाणी युग के औपचारिक पूर्ण विराम के तौर पर देखा जा रहा है। पहली बार भाजपा के कार्यकर्ताओं ने किसी नेता विशेष के नारे लगाने से परहेज किया, और भाजपा ज़िन्दाबाद और भारत माता की जय के गगनभेदी नारे लगाए। इसके अलाव इस रैली में एक और महत्वपूर्ण बात उभर कर सामने आई है, वह है गडकरी का सबसे अन्त में दिया गया भाषण। अमूमन अन्त में सबसे वरिष्ठ नेता का उद्बोधन हुआ करता रहा है। यह पहला मौका था जबकि आडवाणी की उपस्थिति के बावजूद भी नितिन गडकरी ने सबसे अन्त में अपनी बात रखी। पार्टी में चल रही चर्चाओं के अनुसार अटल जी अब सक्रिय रहे नहीं और आडवाणी को उनकी मर्जी के खिलाफ ही बलात ही पाश्र्व में ढकेलने की तैयारी चल रही है।
 
कमल नाथ का दांव रमेश चित्त

जब देश के भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ को सरफेस ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री मिली तब लोग मान रहे थे कि यह नाथ के पर कतरने के लिए उनके कद से छोटा विभाग दिया गया है, साथ ही इस मन्त्रालय से जहाजरानी को अलग कर दिया गया था। कहा जा रहा है कि दस जनपथ में अपनी खासी दखल का लाभ उठाकर रमेश ने कमल नाथ के पर कतरने का प्रयास किया था। चूंकि पिछली बार नाथ वाणिज्य मन्त्री थे, तो रमेश उनके अधीन राज्य मन्त्री। अब रमेश वन एवं पर्यावरण मन्त्री जैसे महात्वपूर्ण विभाग को पाकर कमल नाथ के आगे वाली कुर्सी पर काबिज हो गए हैं। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि कमल नाथ ने अपनी राजनैतिक चाल से अब वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय को दो फाड करने का बीजारोपण कर दिया है। पीएमओ ने इसके लिए सैद्धान्तिक सहमति दे दी है। आने वाले समय में रमेश के पास या तो वन बचेगा या पर्यावरण महकमा।
 
किसे सच माने किसे माने झूठ

देश का दुर्भाग्य है कि नौकरशाहों के भरोसे पर चलने वाले जनसेवकों द्वारा विरोधाभासी वक्तव्यों की बौछार की जाती है, देश की जनता संशय में है कि किस वक्तव्य को वह सच माने किसे माने झूठ। मामला देश के वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश के श्रीमुख से निकले वक्तव्यों का है। कुछ दिनों पूर्व जयराम रमेश ने बिना दस्ताने पहने यूनियन काबाZईड के कचरे को हाथ में उठाकर मीडिया को फोटो जारी करते हुए कहा था कि इससे कोई खतरा नहीं है। अब राज्य सभा में अपनी ही उस बात से वे पलट गए हैं। रमेश ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा है कि केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने भोपाल गैस त्रासदी स्थल के आसपास की जमीन, भूमीगत जल में पाए जाने वाले तत्वों का अध्ययन किया और पाया है कि वहां धातुओं, कीटनाशकों और कुछ हानिकारक जैव योगिक मौजूद हैं। अब समझ में नहीं आता कि भारत गणराज्य के वन एवं पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण ओहदे पर बैठे एक जिम्मेदार मन्त्री के भोपाल यात्रा के दौरान दिए वक्तव्य को सच माना जाए या राज्य सभा में कही बात को।
 
मितव्ययता : मन्त्रियों का विदेश दौरा खटाई में

पहली बार विपक्ष सरकार को पूरी तरह घेरने के मूड में दिखाई दे रहा है। इस बार विपक्ष ने कटौती के प्रस्ताव की तैयारियां आरम्भ कर दी हैं। विपक्ष की इस कवायद ने सरकार के पसीने छुडा दिए हैं। सबसे ज्यादा वे जनसेवक मन्त्री खौफजदा हैं, जिनका आधे से ज्यादा समय सरकारी दौरों के नाम पर विदेशों के सैर सपाटे में गुजरता है। विपक्ष के तीखे तेवर देखकर लगने लगा है कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की साख का प्रश्न बन चुके महिला आरक्षण बिल और प्रधानमन्त्री की प्रतिष्ठा से जुडे नाभिकीय क्षतिपूर्ति उत्तरदायित्व विधेयक शायद ही इस बार परवान चढ सके। सरकार की पहली प्राथमिकता इस बार वित्त विधेयक को पास करावाने की है। कांग्रेस के मैनेजरों को निर्देश दिए गए हैं कि वित्त विधेयक के पास होते समय एक एक मन्त्री सांसद को सदन में अनिवार्य तौर पर उपस्थित रखा जाए। वजीरे आजम 28 और 29 अप्रेल को दक्षेस सम्मेलन के लिए भूटान में तो विदेश मन्त्री कृष्णा 27 को थिंपू में और मिल्लकार्जुन खडगे भी विदेश यात्रा पर रहेंगे। इसके अलावा अनेक मन्त्रियों की विदेश यात्रा के प्रस्ताव पीएमओ के पास लंबित हैं। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि जब तक वित्त विधेयक पास नहीं होता किसी भी मन्त्री को सदन से किसी भी कीमत पर गैरहाजिर नहीं रहने दिया जाएगा।
 
रतन खत्री को पीछे छोडा मोदी ने

देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई से चलने वाले सट्टा न केवल महाराष्ट्र को अपनी जद में लिए हुए है, वरन् आसपास के सूबों में भी इसका जोर है। इसको चलाता है रतन खत्री नामका एक शख्स। रात नौ बजे ओपन तो बारह बजे क्लोज। एक अंक अगर लग गया तो एक का नौ गुना और अगर दोनों अंक अर्थात जोडी आ गई तो सवा रूपए के सौ रूपए। है न फायदे का सौदा। अरे हुजूर सवा रूपए में सौ कण्डे भी नहीं आते हैं। आईपीएल के विवादित कमिश्नर ललित मोदी के दमाद गौरव बर्मन ने सारे नियम कायदे ताक पर रख दिए हैं। आईपीएल के आधिकारिक मीडिया पार्टनर ग्लोबल क्रिकेट वेंचर्स (जीसीवी) की वेवसाईट पर सरेआम सट्टा खिलाया जा रहा है। जीसीवी की वेवसाईट क्रिकेट डाट काम पर चलने वाले सट्टे में टीमों के भाव अलग अलग तय किए जाते हैं, जो समय के साथ बदलते रहते हैं। मजे की बात यह है कि जीसीवी में ललित मोदी के दमाद गौरव बर्मन की बडी हिस्सेदारी है। अरे भई कहावत है न समरथ को नहीं दोष गोसाईं, सो मोदी और बर्मन पर कार्यवाही होने की उम्मीद करना बेमानी ही है।
 
अब लगा न तीर कलेजे पर

देश के गरीब गुरबे बिजली के बिना किस तरह की परेशानी झेलते हैं, इस बात का अहसास देश की सबसे बडी पंचायत में जनसेवकों को भी हुआ और उनका पसीने से हाल बेहाल हो गया। सोमवार 19 अप्रेल को संसद के चलते समय एक दर्जन से अधिक बार बिजली गोल हुई। कल तक गरमी की मार झेलने वाले आज एयर कण्डीशनर के बिना पग न धरने वाले जनसेवकों के तेवर इस दौरान देखते ही बने। यद्यपि यह कटौती सीपीडब्लूडी के बिजली स्टेशन में तकनीकि गडबडी के कारण हुई बताई जा रही है, पर गरमी में बिजली के बिना पसीने के दो चार सांसदों के हाल बेहाल हो गए। वैसे देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बिजली की आंख मिचौली नई बात नहीं है। संसद में जब बिजली ने अपना ताण्डव दिखाया तो बिहार के सांसद के मुंह से बरबस ही निकल पडा ``अब तीर लगा कलेजे पर, अरे भई अब तो अहसास कर लो कि देश के गरीब गुरबे किस तरह बिजली के बिना परेशान होते होंगे।

आई पी के परिणाम : विद्या पास, कुलपति फेल!

जेसिका लाल प्रकरण में देश की सबसे बडी अदालत उधर अपना फैसला सुना रही थी, वहीं इससे महज एक किलोमीटर दूर गुरू गोविन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में जेसिका पर ही बन रही फिल्म ``नो वन किल्ड जेसिका`` पर जबर्दस्त हंगामा हुआ। दरअसल यूनिवर्सिटी के अन्दर निदेशक राज कुमार गुप्ता और अभिनेत्री विद्या बालान शूटिंग में व्यस्त थे। यूनिवर्सिटी का दरवाजा बन्द था, और वहां तैनात थे मसल मेन। इसी बीच वहां के कुलपति आन पहुंचे। काफी मशक्कत के बाद भी दरवाजा नहीं खोला गया। कुलपति प्रो.डी.के.बन्दोपाध्याय का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। उन्होंने अन्दर बैठे अधिकारियों से संपर्क किया तब जाकर कुलपति को अपने ही विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल सका। उधर चर्चा है कि सेंटर फार मीडिया स्टेडीज के एक कंसलटेंट ने शूटिंग के लिए पन्द्रह लाख रूपए लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन को अंधेरे में रखकर इस कारनामे को अंजाम दिया है। बहरहाल जो भी हो विश्वविद्यालय के छात्र पूरे प्रसंग के बाद कुटिल मुस्कान के साथ यह कहते जरूर नज़र आए कि आईपी यूनिवर्सिटी का रिजल्ट आ गया। विद्या बालान पास और प्रो.डी.के.बन्दोपाध्याय फेल।
 
रेल में पानी नहीं था तो कौन सा पहाडा टूट गया!

देश के एक जिम्मेदार मन्त्री कमल नाथ कहते हैं कि देश के लोग ज्यादा खाने लगे हैं सो मंहगाई बढ रही है, मंहगी चीनी पर शरद पंवार कहते हैं कि ज्यादा चीनी खाने से शुगर हो जाती है, और अब रेल मन्त्री ममता बनर्जी ने भी इसी परंपरा को आगे बढाते हुए कह दिया कि रेल में अगर पानी नहीं था तो कौन सा पहाड टूट पडा है। मामला राज्यसभा में माकपा की वृन्दा करात ने उठाया कि विकलांग दिल्ली प्रदर्शन करने आ रहे थे, इसके लिए उन्होंने 17 लाख रूपए में विशेष रेलगाडी बुक की थी। इस गाडी में शौचालयों में पानी तक नहीं था, और वह 12 घंटे विलंब से पहुंची, इसके बावजूद भी ममता बनर्जी महादुरन्तो चलाने की बात करती हैं। वृन्दा के आरोप से बोखलाकर ममता बनर्जी तैश में आ गईं और बोली अगर रेल में पानी नहीं था तो कौन सी आफत आ गई। अरे कोई तो ममता दीदी को समझाए कि जब कोई पैसा देकर किसी चीज को लेता है तो वह उपभोक्ता हो जाता है और उपभोक्ता को पूरा सन्तोष देना किसी ओर का नहीं सेवा प्रदाता का ही काम है। अगर विकलांगों ने उपभोक्ता फोरम का सहारा ले लिया तो लेने के देने भी पड सकते हैं ममता दी।
 
मैं तो पीकर टुल्ली हो गया यारां

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सरमायादार प्रफुल्ल पटेल के अधीन काम करने वाले ड्राईवर और ट्रक चालकों के बीच अब कोई समानता नहीं रह गई है। ट्रक चलाने वाले भी दारू के नशे में टुन्न होकर गाडी चलाते हैं और आसमान में हवाई जहाज उडाने वाले पायलट भी नियम कायदों को ताक पर रखकर दारू में टुल्ली होकर हवाई यात्रियों की जान जोखम में डालने से नहीं चूक रहे हैं। जी हां यह बात झूठ नहीं है, संचालक नागर विमानन (डीजीसीए) ने पिछले साल विभिन्न एयर लाईंस के 42 पायलट्स को नशे में टुन्न होकर विमान उडाते पाया। सूचना के अधिकार कानून के तहत यह जानकारी सामने आई है। यद्यपि डीजीसीए ने एयरलाईंस के नामों का खुलासा नहीं किया है, पर यह गम्भीर चूक की श्रेणी में ही आता है। सावधानी घटी दुघZटना घटी का जुमला सडक, रेल, पानी या आकाश मार्ग से यात्रा करने पर चालकों के लिए ही लागू होता है। वैसे एयरक्रफ्ट नियम 24 के अनुसार उडान के 12 घंटे पहले क्रू के सदस्यों के लिए मद्यपान प्रतिबंधित है। और एसा करते पाए जाने पर न्यूनतम चार सप्ताह के लिए ग्राउण्डेड कर दिया जाता है।

प्रियंका से क्या पे्ररणा ली नलिनी ने

राजीव गांधी की हत्या के समय चर्चा में आई नलिनी धीरे धीरे चर्चाओं से गायब हो गई थी। वह एक बार फिर चर्चा में तब आई जब कांग्रेस की नज़रों में देश की युवरानी प्रियंका वढेरा उससे मिलने जेल में गई। प्रियंका किस उद्देश्य से वहां गई थी, यह बात तो वे ही जाने पर कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों ने इस बात को खासी पब्लिसिटी दिला दी। फिर एक बार राजीव गांधी की हत्या के आरोप में उमर केद काट रही नलिनी वेल्लूर की उच्च सुरक्षा वाली जेल में गुमनामी में खो गई। हाल ही में वह एक बार फिर चर्चा में आ गई है, उच्च सुरक्षा वाली जेल की अभैद्य सुरक्षा में सेंध लग गई है। नियमित जांच के दौरान नलिनी के पास एक मोबाईल मिला है, जिससे उसने विदेशों में काल किया है। अब वह मोबाईल उसके पास प्रियंका की मुलाकात के पहले ही था या उसके बाद में आया यह प्रश्न शोध का विषय है। लोग तो यहां तक कहने से नहीं चूक रहे हैं कि प्रियंका ही उससे मिलने गई थी, दोनों सखियां बन गई होंगी सो अब नलिनी अपनी सखी प्रियंका वढेरा से ही बतियाती होगी।
 
नितीश का अंग्रेजी प्रेम

बिहार के मुख्यमन्त्री नितीश कुमार और ब्रितानी हुकूमतकर्ताओं में क्या सामनता है। दोनों में कम से कम एक समानता तो है कि ब्रितानी अपनी मातृभाषा अंग्रेजी को बहुत प्यार करते हैं और नितीश को भी अंग्रेजी से बेहद लगाव है। यकीन नहीं होता न। जनाब मुख्यमन्त्री नितीश कुमार ब्लागर बन गए हैं। वे भी ब्लाग लिखने या लिखवाने लगे हैं। नितीशस्पीक्स डाट ब्लागस्पाट डाट काम पर िक्लक करिए और बिहार के मुख्यमन्त्री नितीश कुमार से रूबरू होईए। हिन्दुस्तान में ब्लाग बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। देश के अनेक ब्लागरों के प्रयास से आज इंटरनेट पर हिन्दी खासी न केवल लोकप्रिय हुई है वरन् हिन्दी को अहम स्थान भी मिल चुका है। आज देश में हिन्दी में लिखने वालों ब्लागर्स की तादाद लाख की तीन दहाई तक पहुंच गई है। इस सबके बाद लोगों को अफसोस यह जानकर होगा कि नितीश ने अपना ब्लाग सिर्फ और सिर्फ एलीट क्लास के लिए बनाया है, मतलब साफ है कि यह आंग्ल भाषा में है। बिहार के गरीब गुरबे क्या इसे पढ पाएंगे इस पर संशय ही है।
 
सांसदों का विदेशी वस्तु प्रेम

महात्मा गांधी जिन्होंने आधी लंगोटी पहनकर देश को ब्रितानियों से मुक्त कराया और स्वदेशी अपनाने के लिए प्रेरित किया, क्या आप यकीन कर सकते हैं कि उसी गांधी के देश में आज के जनसेवक सांसद विदेशी वस्तुओं से प्रेम जताने से नहीं चूक रहे हैं। जी हां यह सच है, एक सैकडा से अधिक सांसदों ने विदेशी हथियारों को खरीदकर जता दिया है कि उन्हें देश में बने हथियारों पर कितना यकीन है। सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई जानकारी में यह बात उभरकर सामने आई है। पिछले दस सालों में अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर जनसेवकों ने विदेशी हथियारों को जमकर खरीदा। केद्रीय मन्त्री जयप्रकाश जायस्वाल, जनार्दन द्विवेदी, विनोद खन्ना, परनीत कौर, योगानन्द शास्त्री, अबू आसिम आजमी आदि सहित एक सौ से अधिक सांसदों ने विदशी हथियारों पर इत्तेफाक जताया है। दरअसल विदेशों से अवैध तरीके से लाए जाने वाले हथियारों की जप्ती कर राजस्व खुफिया महानिदेशालय, सीमा शुल्क और पुलिस आदि द्वारा इन हथियारों को केवल सरकारी उपयोग के लिए अथवा वित्त मन्त्रालय की स्वीकृति के उपरान्त इनकी नीलामी की जाती है। मजे की बात यह है कि औने पौने दामों में मिलने वाले इन हथियारों को खरीदने के पहले सांसद को इस बात को लिखित तौर पर देना होता है कि उनके पास खरीदी के समय कोई हथियार नहीं है।
 
क्या गौमांस अवैध है हिन्दुस्तान में!

गाय हमारी माता है, गाय की रक्षा के लिए राजनैतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जब तब बयानबाजी की जाती है, पर लगता है दिल्ली सरकार इससे इत्तेफाक नहीं रखती है। कामन वेल्थ गेम्स के दौरान अतिथियों को गोमांस परोसे जाने को लेकर पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा में जमकर रार हुई। शीला दीक्षित सरकार पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार ने गेम्स के दौरान आने वाले विदेशी महमानों को गोमांस परोसे जाने की सहमति गुपचुप तरीके से दे दी है। विपक्ष का तर्क था कि जब दिल्ली में गोमांस रखने और परोसने तक पर पाबन्दी है तब दिल्ली के मुख्य सचिव कैसे इसकी अनुमति दे सकते हैं। पहले भी गेम्स के दौरान गो मांस परोसे जाने को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में काफी हद तक जद्दोजहद हो चुकी है।

पुच्छल तारा

देश में निर्वतमान विदेश राज्य मन्त्री शशि थुरूर और आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के आईपीएल को लेकर हुए विवाद की धूम मची हुई है। हर जगह आईपीएल आईपीएल का ही शोर नज़र आ रहा है। एसी परिस्थियों पर सटीक व्यंग्य करते हुए रायपुर से एन.के.श्रीवास्तव ने ईमेल भेजा है कि देश कह रहा है गरीबी रेखा के नीचे अर्थात बीपीएल बीपीएल, पर नेता हैं कि मानते ही नहीं वे चिल्ला रहे हैं आईपीएल, आईपीएल। गांधी तेरा देश महान।

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बौद्धिक क्षमता से लबरेज़ हैं चिदम्बरम

              (उपदेश सक्सेना)
केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम से सतारूढ़ और विरोधी राजनेताओं की चिढ़ने की वजह है उनकी तीव्र बौद्धिक क्षमता, तल्ख हाजिर जवाबी और उस पर डटे रहने वाला साहस। गृहमंत्री पी चिदम्बरम उस समय बेबाक़ हो जाते हैं जब उनके सही कार्यों को, उनके धैर्य को, उनकी बौद्धिक क्षमता और कर्त्तव्य परायणता को पक्ष-विपक्ष या कहीं से भी चुनौती दी जाती है। दंतेवाड़ा की दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के परिसर में बैठकर ज़ुबानी जमा-खर्च की जुगाली से काम नहीं चलेगा। जरूरत है माओवादी, नक्सलवादी समस्या से दो टूक निपटने की। आम आदमी अब त्रस्त है। स्वयं नक्सलवाद के प्रणेता चारू मजूमदार हों या कानु सान्याल अन्त में निराशा से उत्पन्न हुई इस हिंसा से सबका मोहभंग हो चुका था। पर निराशा की व्यापकता में कमी नहीं आई बेरोजगारी, गरीबी और अभाव नक्सलवाद के लिए उर्वरक का काम करने लगे। नक्सलवाद भी महानगरों से क़स्बों और फिर गांवों और जंगलों में जाकर सक्रिय हो गया। उसकी विष वेल को बड़ा होने में तीन-चार दशक लगे। पिछले कई सालों से नक्सलवाद ने तकनीकी हथियारों, सूचना तन्त्रों वाले उपकरणों का प्रयोग तीव्रता से किया। धन जुटाने के लिए उसने अब आम आदमी को भी घेरना शुरू कर दिया और मध्यप्रदेश, बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश व महाराष्ट्र के कई जिलों में पसरने लगा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने शुरू-शुरू में इसे कानून व्यवस्था का मुद्दा मानकर इस हिंसा की अनदेखी की और धीरे-धीरे नक्सलवाद का नासूर बढ़ता चला गया। जब केंद्रीय रिजर्व बल के 76 जवानों को एक साथ भून दिया गया तो सरकार सकते में आ गई। गृह मंत्री पी चिदम्बरम घरेलू नक्सल समस्या से दो-चार होने के लिए भारतीय सेना का इस्तेमाल नहीं चाहते थे। उन्हें अपना और भटका हुआ मानकर उनसे बातचीत द्वारा समस्या का हल चाहते थे। पर जब पानी सिर से ऊपर निकल गया तो सरकार को कठोर कदम उठाने पड़े। बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और उनकी वामपंथी सरकार चिदम्बरम की आलोचक बन गई। पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने चिदम्बरम की नक्सल नीति को कोरी बौद्धिक तल्खी का नाम दिया। चिदम्बरम धैर्य रखते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अमेरिकी-ब्राजील यात्रा पर जाने से पहले अपने इस्तीफे की पेशकश की थी। जिसको डॉ. सिंह ने नहीं माना और उन्हें डटे रहने को कहा। लोकसभा में दंतेवाडा सैन्य हत्या काण्ड पर श्रध्दांजलि अर्पित की गई और उसके बाद चिदंबरम ने अपना वक्तव्य दिया। भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद के संदर्भ में गृहमंत्री के साहस-धैर्य और अडिग रहने की नीति की प्रशंसा की और उन्हें नक्सलवाद के मुद्दे पर पूरा समर्थन देने का आश्वासन दिया।
चिदम्बरम ने अपने विरोधियों को आड़े हाथों लेते हुए साफ कहा कि आज छत्तीसगढ़ राज्य में नक्सलवादी हिंसा का जोर है जहां 76 केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की जघन्य हत्या कर दी गई है। छत्तीसगढ़ आज इस समस्या से जूझ रहा है। यह सब वहां बरसों से चल रहा है। सन् 2000 तक छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश का ही एक हिस्सा था जहां दस साल तक स्वयं दिग्विजय सिंह ही मुख्यमंत्री थे। उनका इशारा था कि अगर उस समय विकास और रोजगार एवं गरीबी की ओर ध्यान दिया जाता तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। हमें जहां हिम्मत से नक्सलवाद से निपटना है वहां विकास क कार्यों को भी तीव्रता से लागू करना होगा। दोनों काम साथ-साथ चलाने होंगे। यह नक्सलवाद का अन्तिम अलार्म है। नक्सलवाद की समस्या अब असहनीय और हिंसक बनकर शत्रुता का रूप ले चुकी है। बकौल राज्यसभा में विपक्षी नेता अरूण जेटली के सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी अपने ही होम मिनिस्टर की टांग खींचने में लगी हुई है. गृहमन्त्री ने कहा कि देश को भ्रम से बाहर निकालना होगा। अब नक्सल राजनीतिक सत्ता चाहते हैं। पीपुल्स लिबरेशन की बात करते हैं। उनकी गुरिल्ला सेना जो पीपुल्स आर्मी की शक्ल ले चुकी है, सत्ता की कुर्सी हथियाना चाहती है। सीधे अब युद्ध का आह्वान करती है। नक्सलवादी हमें अपना शत्रु मानते हैं। वे संसद को एक चिल्लाने वाला सुअरबाड़ा मानते हैं। गृह मंत्री ने कहा, मैं नक्सलवादियों से नहीं डरता-अपनी नैतिक जिम्मेदारी को मानते हुए दंतेवाड़ा सैनिक हत्याकाण्ड के संदर्भ में मैंने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपा था। सोनिया गांधी (कांग्रेस अध्यक्ष), प्रधानमंत्री दोनों ने मुझमें विश्वास जताया है और मेरे इस्तीफे को नामंजूर कर दिया। गृहमंत्री चाहते हैं कि राज्य सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्र में प्रशासन को अपने हाथ में पुन: ले और वहां विकास कार्यों को शिद्दत से शुरू कर दे। स्मरण रहे कि मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ डॉ. रमन सिंह ने भी विकास कार्यों में तेजी लाने और विकास कार्यों में लगे लोगों की पूरी मदद और सुरक्षा देने का वायदा व व्यवस्था की है। भारत जब तालिबानों की धमकियों के बावजूद अफगानिस्तान में विकास कार्यों में डटा हुआ है तब यह तो अपने देश और अपनी मातृभूमि की बात है। डॉ. रमन सिंह पिछले एक वर्ष से केंद्रीय सरकार की सतर्कता व गंभीरता से अत्यन्त प्रभावित हैं और गृहमंत्री के प्रति प्रदेश की ओर से अहसानमंद भी हैं।
गृहमंत्री नक्सल क्षेत्र में बाकायदा ट्रेंड सैनिकों को बेहतर हथियारों के साथ भेजना चाहते हैं। सेन्टर-स्टेट व इंटर स्टेट को आर्डिनेशनल के भी पक्षधर हैं। राज्यों के मुख्यमंत्रियों (नक्सल प्रभावित क्षेत्रों) के समर्थन और सहयोग से नक्सल विरोधी नकसल आपरेशन  की नीति बनाई और अपनाई गई है। नीति है : पुलिस एक्शन और विकास दोनों साथ-साथ चलेंगे। आबादी वाले क्षेत्रों, आदिवासी क्षेत्रों में नीति कैसे लागू की जाए या वहां किस प्रकार हमें काम करना है-क्या-क्या नये कदम उठाने हैं-कहां चूक हुई है, इसके लिए ईएन राममोहन कमेटी की रपट आने के बाद ही बाकी चीजों का खुलासा हो सकेगा। पी.चिदंबरम बौध्दिक ही नहीं कार्यशील व हाजिर जवाब मंत्री भी हैं। शायद यही वजह है कि उनके पार्टी के अंदर विपक्ष के बजाय ज्यादा लोग डाह रखते हैं। पर श्री चिदंबरम साहसी हैं, मंत्रालय जो भी हो वे काम को समझते हैं, विचारते हैं, नीति बनाते हैं। कार्यान्वित करते हैं। लोकतन्त्र में हैं इसलिए संवेदनशील भी हैं। शायद उनकी सफलता भी लोगों में द्वेष का एक कारण हैं। विशेषकर राजनेताओं में। 



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संकट में नौजवान टीवी जर्नलिस्ट





- लेखक : अतुल पाठक, 25-Apr-10
बात अक्षय की जो एक बीमारी से पीडित है। बीमारी ने उसे ऐसा जकड़ा कि इलाज में पिता की जीवन भर की पूंजी खर्च हो गई इसके बाद भी वो ठीक नही हुआ क्योंकि तब तब इस बीमारी की सही थेरेपी नही आई थी। अब जबकि बीमारी के इलाज की कारगर पद्धति आ गई है पिता के पास बेटे के इलाज के लिए पैसे नही है। यदि समय पर इलाज नही मिला तो युवक का जीवन बचाना मुश्किल होगा।
नाम अक्षय कत्यानी हटटा कटटा गबरू जवान 70 किलो वजन दिखने में स्मार्ट, लेकिन एक बीमारी ने उसे 40 किलो का हाडमांस का पुतला बना दिया । पढाई पूरी की तो टीवी जर्नलिस्ट बन गया लेकिन इस बीमारी के कारण नौकरी छोडनी पड गई और बिस्तर पकड लिया। प्रायवेट बिजनेस करने वाले पिता सुधीर कात्यानी ने बेटे के इलाज के लिए अपने जीवन भर की कमाई खपा दी। गाड़ी बंगला बेच दिया। लेकिन वो ठीक नही हुआ। अब अचानक डाक्टरों ने बताया कि इस बीमारी का कारगर इलाज आ गया है। सिर्फ दो लाख खर्च होंगे। लेकिन अब जबकि वो दाने - दाने को मोहताज हो गए हैं। बेटे के इलाज के लिए दो लाख कहां से लाएं तो क्या इकलौते जवान बेटे को यूँ ही हाथ से चले जाने दे।
मजबूर पिता क्या करे? मदद के लिए सबने हाथ खडे कर दिए हैं। बेटे को अल्सरेटिव्ह कोलाईटिस है। खून की उल्टी दस्त होते हैं। खाना खाते नही बनता। कैंसे माँ - बाप अपने जिगर के टुकडे को तिल - तिल मरते देखें। एक तो बीमारी दूसरा मां - बाप की बेबसी बेटे से देखी नही जाती वो भी ऐंसी जिंदगी से निराश होता जा रहा है। आखिर क्या करे वो कहां जाए। उसकी भी इच्छा है कि मां-बाप के सपनो को पूरा करे। अभी तो पूरी जिंदगी पडी है उसके सामने। सिर्फ दो लाख के पीछे क्या जान जली जाऐगी उसकी। फिलहाल पैसे के अभाव में इलाज रूका है। क्या इस नौजवान को हम दुनिया से विदा हो जाने दें। ऐसे समय में समाज को सामने आना होगा। इस नौजवान की मदद के लिए आईए और इसकी मदद कीजिए। रोशन कीजिए अक्षय की दुनिया को जी लेने दीजिए एक जवान को अपनी पूरी जिंदगी ।
(अतुल पाठक , संपर्क : atul21ap@gmail.com_)
यदि आप अक्षय की कोई मदद करना चाहते हैं तो इन नम्बरों पर संपर्क कर सकते हैं :
योगेश पाण्डेय - 09826591082,
सुधीर कत्यानी (अक्षय के पिता) - 09329632420,
अंकित जोशी (अक्षय के मित्र) - 09827743380,09669527866

Thanks & Regards,
Pushkar Pushp
Editor - in - Chief,
Media Mantra
http://mediakhabar.com
http://mediamantraonline.com
India's First Bilingual Media Website
09999177575.

Respected all,
I am extremely shocked to read this. Although I was unknown to him but called him today and wish for his quick betterment. God bless him.
Regards-
Rajnish Kumar
www.rajnisharai.blogspot.com

Information for making help-
Name- Sudhir Kumar Katyayani,
Account No.- 09322011002264,
Bank Name- Oriental Bank of Commerce,
Branch- Arera Colony Branch, Bhopal (M.P.),
Residential Address- M 365, Bharat Apartment (Near Water Tank),
Gautam Nagar, Bhopal (M.P.),
Mob-09329632420
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ब्लोगोत्सव-२०१० में आज छठे दिन का कार्यक्रम

 दिनांक :  २६ .०४.२०१० को "ब्लोगोत्सव-२०१०" के
अंतर्गत आज छठे दिन प्रकाशित पोस्ट का लिंक :


ब्लोगोत्सव-२०१० : हम व्यस्क कब होंगे ?

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की ताकत को कम करके आंकना बिल्‍कुल ठीक नहीं है:अविनाश वाचस्पति

चिट्ठाकारिता ने हमें एक नया सामाजिक आस्वादन दिया है

अपनी बात : हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर


आईये हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर एक नजर डालते हैं..

मानवीय सर्जना का नवोन्मेष है यह.....गिरीश पंकज

हम लेकर आये हैं आज निर्मला जी की कुछ और गज़लें

ब्लोगोत्सव-२०१० : नीरज गोस्वामी,गौतम राजरिशी और अर्श की गज़लें

निर्मला कपिला की तीन गज़लें

गौतम राजरिशी की दो गज़लें

नीरज गोस्वामी की दो ग़ज़लें

अर्श की तीन गज़लें

ब्लोगोत्सव-२०१०: श्रेष्ठ पोस्ट और बच्चों का कोना

बच्चों का कोना : शुभम सचदेव की तीन बाल-कहानियां

ब्लोगोत्सव-२०१० : आज का कार्यक्रम उत्सवी स्वर के साथ संपन्न

रश्मि प्रभा के उत्सवी स्वर

बुद्धिजीवी होना भी एक चस्का : डा० अरविन्द मिश्र
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हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की ताकत को कम करके आंकना बिल्‍कुल ठीक नहीं है : अविनाश वाचस्‍पति


आप साहित्‍यकार उदय प्रकाश, दिविक रमेश, प्रताप सहगल, प्रेम जनमेजय, सूरज प्रकाश, सुभाष नीरव, बलराम अग्रवाल, रूपसिंह चंदेल, पवन चंदन कुछ नाम ही ले रहा हूं, इनके ब्‍लॉग देखते ही होंगे, उन्‍हें देखकर आपको अपने प्रश्‍न का सकारात्‍मक उत्‍तर मिलेगा। साहित्‍यकारों की यही प्रवृत्ति अब ब्‍लॉगरों में भी दिखलाई दे रही है जो कि इस क्षेत्र में ब्‍लॉगरों की सफलता को दिखला रही है। ...


जहां-जहां देसी जमीन का स्‍पर्श दिखलाई देता है वो तन-मन को निश्चित ही आलोडि़त और झंकृत कर जाता है। पर अब देसी जमीन ही नहीं है जो है भी वो भी पूरी तरह व्‍यावसायिक हो चुकी है। जिसके पास है भी वो कैरियर के चलते उसे छोड़ने को विवश है। फिर भी देसी जमीन आज भी कविताओं में अपनी भरपूर शिद्दत से मौजूद है। इसका औसत निश्‍चय ही कम हुआ है जबकि मिसाल के लिए आप कवि दिविक रमेश के ‘गेहूं घर आया है’, सुरेश यादव के ‘चिमनी पर टंगा चांद’, लालित्‍य ललित के ‘इंतजार करता घर’, मोहन राणा के ‘धूप के अंधेरे में’ जैसी पुस्‍तकों की कविताओं में बिना तलाशे पा सकते हैं। पर यह स्थिति और 30 साल बाद नहीं होगी। तब देसी के स्‍थान पर विदेसी जमीन का स्‍पर्श ही सब जगह मौजूद मिलेगा। ...

पूरा पढ़ने के लिए या तो यहां पर क्लिक कीजिए अथवा शीर्षक पर।
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हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग एड़ी से चोटी तक

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ब्‍लॉग से नहीं, पर ब्‍लॉग के रास्‍ते कमाई : एक रास्‍ता इधर भी है (अविनाश वाचस्‍पति)


पंकज शुक्‍ल
क्‍या कहा नहीं जानते ?
तो पहचानिए
जो कह रहे हैं
जरूर मानिए
pankajshuklaa@gmail.कॉम
लिखिए ई मेल बेझिझक
और फटाफट लिख भेजिए

अगर आप बच्‍चे हैं
बच्‍चे न भी हों
पर मन के सच्‍चे जरूर हो
तो यह मौका आपके लिए है

आपको लिखनी है एक पटकथा
पर समय अधिक नहीं है बचा
वैसे तो पूरा सप्‍ताह है
पूरा ब्‍लॉग जगत गवाह है

पसंद आ गई
मन को भा गई
तो फिर होगी वाह वाह

वैसे नकद नारायण भी मौजूद हैं
11 हजार का कम नहीं वजूद है
पर बच्‍चा बनना होगा
मानसिकता को समझना ही नहीं
जो लिखेंगे उसमें उकेरना होगा

मैं बीच में से हटता हूं
जल्‍दी से करिए ई मेल
पंकज शुक्‍ल जी से मांगिए
एक प्‍लॉट (भूमि) जमीन नहीं
आप तो पूरे ही बच्‍चे बन गए
प्‍लॉट मतलब घूमेगी
किस मुद्दे के इर्द गिर्द पटकथा
फिर आपको कलम घुमानी होगी

ई मेल से ही भिजवानी होगी
जल्‍दी लिखिए समय कम है
क्‍योंकि फिर गर्मी अधिक हो जाएगी
गर्मी में कलम भी नहीं पकड़ी जाएगी
पंखा चलायेंगे तो हवा में उड़ जाएगी

2 मई 2010 वैसे तो दूर है
एक सप्‍ताह कम नहीं होता हुजूर है
पटकथा लिखना तो लेखन का
हीरा-ए-कोहिनूर है

पंकज जी पहले तो
एक प्‍लॉट मुझे भिजवाइये
मैं उस पर पटकथा रूपी बनाता हूं मकान
फिर आप उसे आसमान पर चढ़ाइयेगा
पर रूकिए पहले लिखने तो दीजिए

इंतजार है
पूरे एक सप्‍ताह की ले लेंगे छु्ट्टी
ब्‍लॉग जगत से
नहीं करेंगे टिप्‍पणी
नहीं लगायेंगे पोस्‍ट
पर पटकथा लिखने में
अपनी सारी कलम की स्‍याही
खर्च कर देंगे
रातों को जागेंगे
दिन में सो लेंगे।
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नीरज भूषण बने ब्लॉगर ऑफ़ द वीक

पत्रकार और ब्लॉगर नीरज भूषण को यूनाईटेड नेशन वर्ल्ड प्रोग्राम के तहत ब्लॉगर ऑफ़ द वीक चुना गया है. उन्हें भूख के मुद्दे पर जागरूकता फ़ैलाने के लिए ब्लॉगर ऑफ़ द वीक चुना गया है. वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के वेबसाइट पर यह सूचना जारी गयी है. READ MORE...
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फोर लेन प्रकरण में मेरा कोई हाथ नहीं :: कमल नाथ

फोर लेन प्रकरण में मेरा कोई हाथ नहीं :: कमल नाथ
 
राजेश ने समस्याओं से आवगत कराया भूतल परिवहन मन्त्री को
 
मुख्यमन्त्री ने किया सिवनी आने का वादा

(लिमटी खरे)
नई दिल्ली 23 अप्रेल। अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल की महात्वाकांक्षी स्विर्णम चतुभुZज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में सिवनी जिले में चल रही भ्रामक स्थिति के बारे में पहली बार किसी जनसेवक ने भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ से बेबाक चर्चा करने का साहस किया है। नगर पालिका परिषद सिवनी के युवा एवं उत्साही अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने भाजपा की दिल्ली रेली के उपरान्त अगले दिन मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान और भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ से चर्चा की।
 
बुधवार को चाणक्यपुरी स्थित मध्य प्रदेश भवन में शाम को मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह से राजेश त्रिवेदी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमण्डल ने भेंट की। राजेश त्रिवेदी के साथ भाजपा के नगर उपाध्यक्ष सन्तोष नगपुरे एवं युवा भाजपाई पवन मेंहदीरत्ता ने मुख्यमन्त्री को सिवनी की स्थिति के बारे में आवगत कराया। इस दौरान प्रतिनिधमण्डल ने नगर पालिका परिषद द्वारा नगर विकास, अतिक्रमण विरोधी अभियान, पेयजल योजना, साफ सफाई आदि के बारे में सविस्तार जानकारी दी। राजेश त्रिवेदी द्वारा चिल्हर सब्जी मण्डी के लिए सरकार से दो करोड रूपयों की मांग भी की गई। साथ ही साथ प्रतिनिधिमण्डल ने मुख्यमन्त्री को सिवनी आने का आमन्त्रण दिया। मुख्यमन्त्री ने मुस्कुराते हुए इस आमन्त्रण स्वीकार कर भविष्य में जल्द ही सिवनी आने का आश्वासन दिया गया।
 
गुरूवार अपरान्ह नगर पालिका परिषद सिवनी के अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने केन्द्रीय भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ से चर्चा भी की। कमल नाथ से चर्चा के दौरान सिवनी नगर में ट्रांसपोर्ट नगर की आवश्यकता पर बल देती हुए इसकी मांग रखी। कमल नाथ को सिवनी की सडकों की जानकारी विस्तार से देते हुए राजेश त्रिवेदी ने कहा कि नवीन बायपास के जबलपुर की ओर वाले सिरे से शहर के अन्दर होकर नागपुर वाले सिरे तक जाने वाली सडक को ``माडल रोड`` बनाकर उसका रखरखाव किया जाए। शहर की समस्या को वजनदारी से रेखांकित करते हुए राजेश त्रिवेदी ने कहा कि वर्तमान में चालू एस.के.बनर्जी द्वारा निर्मित बायपास से भारी वाहनों की रसीद काटकर विशेषकर रात में उन्हें शहर के अन्दर से होकर गुजरने की छूट प्रदान की जा रही है, जिससे शहर की सडकें का कचूमर निकल रहा है, इसलिए नवीन बायपास को तत्काल प्रभाव से आरम्भ कराने की मांग उनके द्वारा रखी गई।
 
कमल नाथ के करीबी भरोसेमन्द सूत्रों का दावा है कि सिवनी के दर्द को पहली बार किसी जनसेवक ने कमल नाथ के समक्ष रखा। नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने कमल नाथ से कहा कि जिले की जनता फोरलेन विवाद के लिए कमल नाथ को दोषी मानती है। इस पर कमल नाथ ने छूटते ही कहा कि इस प्रश्न का उत्तर अगर चाहिए तो सिवनी वालों को वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश से इसका जवाब लेना चाहिए। कमल नाथ ने कहा कि फोर लेन विवाद प्रकरण में उनका कोई हाथ नहीं है। वे चाहते हैं कि फोरलेन सिवनी से होकर ही जाए, पर पर्यावरण के अडंगे से मामला खटाई में है। इसके अलावा बंजारी घाट में फोंर लेन के रूके काम को जल्द ही आरम्भ कराने का आश्वासन भी कमल नाथ द्वारा दिया गया। कमल नाथ ने कहा कि लखनादौन से बरास्ता जबलपुर रीवा मार्ग के फोरलेन करने की स्वीकृति के बाद इसका प्राक्कलन तैयार करवाया गया है।

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