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ब्लोगोत्सव की आखिरी परिचर्चा : क्या आत्मा अमर है ?

आज दिनांक 31.05.2010 को परिकल्पना ब्लोगोत्सव-2010 के अंतर्गत बीसवें दिन के कार्यक्रम का लिंक -

ब्लोगोत्सव की आखिरी परिचर्चा : क्या आत्मा अमर है ?
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_31.html

सुमन सिन्हा की कविता : तुम्हारे नाम
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_4302.html


मैं पुनर्जन्म नही मानता : कर्नल अजय कुमार
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_607.html

बसंत आर्य की लघुकथा : खिडकियाँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_31.html


कई उदहारण भी हैं....जिससे यह प्रमाणित होता हैं कि पुनर्जन्म है : नवीन कुमार
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_4928.html


दिविक रमेश की दो
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मेरे विचार से पुनर्जन्म होता है : वंदना श्रीवास्तव
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7060.html


रजिया मिर्ज़ा का संस्मरण : सलाम एक ग़रीब की महानता को
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_6910.html


हाँ कुछ है जिसे हम पुनर्जन्म कह सकते है...क्या आप मानते है??" : नीता
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मंजू गुप्ता की कविताएँ
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मेरे लिए मेरा अनोखा बंधन ही पुनर्जन्म है ... प्रीती मेहता
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कारगिल के शहीदों को नमन :पवन चन्दन की कविता
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विनाश का द्वार दिखता ही नहीं

आदमी अकेला नहीं जी सकता। उसकी जिंदगी धरती के अन्य प्राणियों से बेतरह जुड़ी हुई है। वह बहुत खतरनाक समय होगा, जब धरती पर केवल आदमी बच जायेगा। यद्यपि इस तरह की कल्पना की अभी कोई गुंजाइश नहीं दिखती लेकिन हम धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। दरअसल आदमी बहुत स्वार्थी हो गया है। वह सिर्फ और सिर्फ अपनी चिंता करता है। बाकी जीवधारियों की चिंता के लिए उसके पास वक्त नहीं है।


सभी जानते हैं कि पर्यावरण में हर प्राणी की अपनी जगह है और कोई न कोई महत्वपूर्ण भूमिका उसे मिली हुई है। बहुत सारे पक्षी और छोटे उड़ने वाले जीव फलों और बीजों को दूर तक ले जाते हैं और इस तरह प्रकृति की विविधता के विस्तार में सहायक होते हैं। अनेक जानवर आदमी द्वारा इकट्ठे किये गये कूड़े-कचरे को साफ करते हैं, वह उनकी भोजन की कड़ी के रूप में इस्तेमाल होता है। कई पशु-पक्षी मरे हुए जानवरों को खाते हैं और इस तरह वे वातावरण को संतुलित रखने में मदद करते हैं। कई कीड़े ऐसे होते हैं जो जमीन की उर्वरा बढ़ाने में सहायक होते हैं और इस तरह आदमी की खाद्यान्न समस्या हल करने में मदद करते हैं।


ध्यान से देखें तो प्रकृति ने सभी प्राणियों के जीवन में अन्योन्याश्रय का संबंध बना रखा है। सृजन और विनाश की जो प्रक्रिया प्रकृति में निरंतर चलती रहती है, वह बड़ी ही अद्भुत है। जंगल में एक जानवर मरता है तो उसके शरीर से अनेक जानवर पोषण प्राप्त करते हैं। हड्डियों से चिपका जो कुछ थोड़ा-बहुत बच जाता है, उस पर छोटे-छोटे कीट पलते हैं। बचे हुए हिस्से का भी विघटन हो जाता है और वह मिट्टी के साथ मिलकर उसकी उपजाऊ शक्ति को बढ़ा देता है। दूर कहीं से हवा में उड़ते हुए बीज आकर जब वहां गिरते हैं तो अपने-आप उग आते हैं। नयी सृष्टि नयी कोंपलों में व्यक्त हो उठती हैं। यह विनाश पर सृजन नहीं तो और क्या है।


प्रकृति अपना कुछ भी जाया नहीं करती। जो चीजें आदमी के लिए घृणास्पद और त्याज्य हैं, उनका भी मनुष्य के उपयोग के लिए ही प्रकृति रूपांतरण कर देती है। हम जो त्याग देते हैं, उससे भी कुछ प्राणी पोषण प्राप्त कर लेते हैं और जो बच जाता है, वह रूपांतरित होकर अन्न या फल के रूप में हमारे पास ही वापस आ जाता है। बड़ी अद्भुत व्यवस्था है। लेकिन इस व्यवस्था को आदमी ही अपनी नासमझी से नष्ट कर रहा है।


शहर बढ़ रहे हैं, जंगल कम हो रहे हैं, पेड़ कट रहे हैं। इस नाते तमाम प्राणियों का प्राकृतिक आवास खत्म हो रहा है। जाहिर है वे खुले आसमान में अपनी रक्षा नहीं कर सकते। इससे दुहरा नुकसान हो रहा है। एक तो कई पशु-पक्षी धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर हैं, दूसरे प्राकृतिक संतुलन डगमगा रहा है। इस बार की गर्मी को ही लीजिए. कितनी भयानक है, आप कल्पना नहीं कर सकते। आम तौर पर 45 डिग्री से ऊपर तापमान। कई जगहों पर इससे भी ज्यादा। सहना मुश्किल है। जब आदमी इससे परेशान है तो पशु-पक्षियों का क्या हाल होगा।


सौ साल का रिकार्ड टूट रहा है। इतनी गर्मी पहले नहीं पड़ी। गर्मी ही क्यों, पिछली ठंड ने यूरोप और अमेरिका को जमा ही दिया था। दुबई में बर्फ पड़ी, कोई सोच भी नहीं सकता। बारिश अमूमन या तो बहुत भयानक होती है या होती ही नहीं। यह सारे खतरे आदमी ने खड़े किये हैं। खास तौर से औद्योगिक रूप से विकसित देशों ने। अब वे खतरा पहचानने भी लगे हैं लेकिन पीछे लौटने में बड़ी मुश्किल है। आगे विनाश का द्वार है पर तय कर लिया है कि आगे ही बढ़ते जाना है।


पिछले दिनों बड़ी चर्चा हुई, अब गिद्ध नहीं दिखते। पर अब तो बहुत सारे पक्षी नहीं दिखते, बहुत सारे कीट-पतंग जो हम-आप बचपन में गांवों में देखते थे, अब कहां हैं। गौरेया कितनी बची हैं? भगजोगनी कहां गयी? जुलाहे कहां हैं? बतखें कितनी बचीं? अगर हम इनके बारे में नहीं सोचेंगे तो हमारे जीवन के बारे में प्रकृति भी नहीं सोचेगी, यह साफ-साफ समझ लेने की जरूरत है।
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तम्बाकू निषेध दिवस!


                                    आज तम्बाकू निषेध दिवस - हर वर्ष आता है और हर वर्ष इसी तरह से चला जाता है, लोग अखबार में आलेख देखते हैं और रख देते हैं. 
                              पर आज ये क्रांति दिवस ब्लॉग की दुनियाँ में भी छाएगा. ऐसा नहीं है कि हमारे ब्लॉगर बन्धु इस शौक से दोस्ती न रखते हों और रखने वाले इन बातों को बेकार की दलीलें  न मानते हों  और कहते हों  कि देखो अमुक तो कुछ भी नहीं खाता था और उसको मुंह या गले का कैंसर हो गया. ये आप किसे झुठलाने की कोशिश करते हैं , खुद को या घर वालों या अपने शुभचिंतकों को. अगर आग पर चलेंगे तो आज नहीं कल पैर जरूर जलेंगे और छाले भी आपको ही पड़ेंगे उसकी तपिश आप अकेले नहीं झेलेंगे अपितु आपके घर वाले भी उसमें झुलसेंगे. अभी भी देर नहीं हुई है - जो इसके सेवन में लिप्त हैं छोड़ने का मन बना लें तो दुनियाँ में असंभव कुछ भी नहीं है. 
                            मैंने इस विभीषिका को झेला है इसलिए जानती हूँ, मेरे ससुर जी तम्बाकू खाते थे और उससे ही उन्हें कैंसर की शुरुआत हुई थी. उनके कष्ट को मैं नहीं झेल सकती थी लेकिन मैंने बहुत कुछ झेला. इस लिए यही चाहती हूँ कि कोई और क्यों झेले? अगर मेरे इस जानकारी भरे आलेख से कुछ लोगों ने भी इस का सेवन छोड़ दिया तो मेरा लेखन सार्थक हो जाएगा. इसीलिए मैं इसको आज कई ब्लॉग में डालूंगी.
                    तम्बाकू धूम्र सहित और रहित दोनों से तरीके से सेवन की जाती है. सिगरेट, बीडी, सिगार , चिलम, हुक्का आदी धूम्रपान के साधन है और तम्बाकू, चाहे उसे सीधे खाएं या पान में या पानमसाले के रूप में सब घटक हैं. इस तरह से इस बारे में अपनी जानकारी के अनुरुप आपको बतलाने की कोशिश कर रही हूँ.


आँख और कान - जब धूम्रपान करते हैं तो उसका धुंआ पूरे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है. जिसका प्रभाव अन्धपन और श्रवण ह्रास के रूप में प्रकट हो सकता है. 
मुँह और दाँत -  इसका सीधा सम्बन्ध मुँह से ही होता है, इससे दांतों में विकार, मसूड़ों में विकार और मुख कैंसर होने की पूरी पूरी संभावना बन जाती है. अब भी देर नहीं होती है, अगर आप इसका उपयोग करते हैं और अपने मुँह को खोल कर देखें अगर वह पूरा नहीं खुल रहा है तो उसके लिए तुरंत डॉक्टर के पास जाकर सलाह ले सकते हैं. अगर मुँह के अन्दर दोनों ओर सफेद लाइने या फिर सफेदी आ रही हैं तब भी आप कैंसर की ओर कदम बढ़ा रहे हैं लेकिन रोका जा सकता है. 


फेफड़े - सिगरेट और इसी श्रेणी की तमाम चीजें सीधे फेफड़ों को प्रभावित करती हैं और इससे खांसी, टी बी, कैंसर , ब्रोंकाइटिस , इन्फैसेमा आदी रोग हो सकते हैं.

मांसपेशियां और जोड़ - धूम्रपान मांसपेशियों से आक्सीजन खीचकर आपको कमजोर बनाता है और साथ ही जोड़ों के लिए दर्द युक्त संधि शोथ के खतरे को बढ़ा सकता है.

मष्तिष्क - मानव शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग, जिससे कि सम्पूर्ण शरीर का सञ्चालन होता है. निकोटिन इन पदार्थों में होता है और ये मनुष्य को अपना आदी बना लेता है. ये जब मष्तिष्क में प्रवेश करती तो आपको लगता है की आप बहुत ही अच्छा अनुभव कर रहे हैं , तनाव मुक्त हो रहे हैं जब कि वह आपके मष्तिष्क को शिथिल कर देती है. इसके पश्चात की स्थिति में आप व्यग्र , उत्तेजित और हतोत्साहित हो जाते हैं. 

गला - सिगरेट , तम्बाकू, पानमसाला गले और स्वरयंत्र के कैंसर का कारण हो सकता है क्योकि यही से होकर तम्बाकू अंदर प्रवेश करती है या धुआं अंदर जाता है. 

ह्रदय - धूम्र  सहित या धूम्र रहित तम्बाकू की निकोटीन रक्त नलिकाओं को संकुचित करती है और जो आपके हृदय को अधिक कार्य करने के लिए मजबूर करती हैं. धूम्रपान धमनियों को भी अवरुद्ध कर सकता है जो की हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक्स का कारण बनाता है. धूम्रपान शिराओं में जमकर उन्हें संकुचित और अवरुद्ध करता है जो की हृदयाघात का कारण बनाता है. 

अन्य रोग - धूम्रपान या अन्य वस्तुएं गुर्दे, पैन्कियाज, पेट, प्रजानना अंगों के कैंसर के खतरे को बढ़ता है इससे प्रजनन क्षमता भी क्षीण होती है कभी कभी समाप्त तक हो जाती है. 

                    मेरी करबद्ध प्रार्थना है की इसको पढ़ाने वाले सभी बन्धु अगर खुद इसके ग्रसित नहीं हैं तो जो उनके मित्र हों उनके इस बारे में जरूर अवगत कराएँ तभी मेरे इस आलेख की सार्थकता सिध्ध होगी.
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असर खो रहे हैं फ़तवे?

                           (उपदेश सक्सेना) हालांकि यह विषय काफी गंभीर है, और मुझ जैसे नाचीज़ को इस बहस में नहीं पड़ना चाहिए, मगर बात गंभीर है और मुझे अपने विचार सार्वजनिक करने का ह्क़ भी, इसलिए यह पोस्ट लिखने का साहस बढ़ा है. विषय है मुस्लिम समाज में हर दिन दिया जाने वाला नया फ़तवा. मैं समझता हूँ शायद इस्लाम में इतनी पाबंदियां नहीं बताई गई होंगी जितनी आज के मौलवी फतवे के रूप में इस्लाम का वास्ता देकर लगभग हर दिन जारी कर रहे है. कुछ मौलवी कहते हैं कि इस्लाम में फ़तवे का अर्थ शरई हुक्म है, जबकि कुछ धार्मिक नेताओं का मानना है यह इंसानी राय है. यहाँ यह लिखना भी लाज़मी है कि इंसान कई बार खुद भी गलत हो सकता है और इस सभ्य समाज में क्या किसी को धर्म के नाम पर क्या अपनी राय के बोझ में दबाया जा सकता है? देखा जा रहा है कि मुस्लिम समाज में पिछले कई वर्षों से हर मामले में मज़हब की आड़ लेने का दस्तूर सा बन गया है, ज़रूरत होती है मौके की.
क्या खाएं, कैसे खाएं, क्या पहनें,कैसे चलें, जैसे नितांत व्यक्तिगत विषयों पर मुस्लिम धार्मिक संस्थाएं फ़तवे जारी कर चुकी हैं.मुस्लिम समाज की सर्वोच्च नियामक संस्था दारुल उलूम देवबंद का कहना है कि हज़ारों साल पहले यह नियम-क़ायदे बने हैं ऐसे में इन्हें थोपे गये बताना ग़लत है.हालांकि अब समाज के बुद्धिजीवियों और कुछ धर्मगुरुओं के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या फतवों के मसले पर देवबंदी ज़्यादा सख्त नहीं है?वैसे फ़तवे की परिभाषा भी स्वयं मुस्लिम समाज में बहस का विषय है. पर उपदेश कुशल बहुतेरे....यहाँ भी चल रहा है, मसलन दारुल उलूम देवबंद का एक फ़तवा है कि बैंक में खाता खुलवाना शरियत के खिलाफ़ है, लेकिन स्वयं देवबंद के कई बैंकों में खाते चल रहे हैं.जबकि इस्लाम में ब्याज़ लेना हराम बताया गया है.इन तमाम बातों पर स्थिति साफ़ होना ज़रूरी है.
कई मुस्लिम नेताओं को इस बात पर आपत्ति है कि कई गंभीर विषयों, समाज की दुर्दशा, सामाजिक बुराइयों जैसे विषयों पर कोई मौलवी फ़तवा जारी क्यों नहीं करता? अशिक्षा के दंश और आरोपों की गर्मी से झुलस रहे मुस्लिम समाज के लिए हालांकि लखनऊ के एक मौलवी का यह फ़तवा कि मुस्लिम लड़कियों को तालीम हांसिल करना उनका फ़र्ज़ है, सचमुच एक पुरसुकून ठंडी हवा का झोंका जैसा है. ज़्यादा फ़तवे भी कहीं मुस्लिम समाज के पिछड़े होने का कारण तो नहीं?
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शनिवार 5 जून 2010 को याद रखना मित्रों, भूल न जाना, भूल गए तो चित्र देखकर ही सब्र करना होगा

आप भूल तो नहीं गए
रखकर कार्ड कहीं  या
अभी तक आपको
मिला ही नहीं, पर
अगर मिला हो तो
साथ लाना भूलें नहीं।

 दीपक शर्मा की रोशनी
पहुंच रही है जमाने तक
जमाने के दिमागों तक
आप जानना चाहेंगे
जमाने का दिमाग
पहली बार सुना है
पर मानिए आप
जमाना भी तो
आपको और हमको
मिलाकर ही तो बना है
और हम सबका दिमाग
जमाने का ही दिमाग है
जिसमें विचारों की
अद्भुत आग है
आग जो जलाती है
शीतलता भी पहुंचाती है
कितनी भी गर्मी हो
बिन ए सी ठंड और
बिन हीटर तपा देती है।

विचारों को मत भूलें
इसकी विविधता में झूलें
सामान्‍य नहीं
भर भर कर पींगें।

ख़लिश (तेरी आवाज़ मेरे अल्‍फ़ाज़)
का लोकार्पण है
जिसमें ऐसी ही आग भरी है

निमंत्रण का चित्र है ऊपर
पर भूल न जाना इसे लाने को
साथ ही लेकर आना है
बेकार्ड आना परेशानी का सबब बन सकता है।

कार्डधारकों रहेगा आपका इंतजार
पहुंचना अवश्‍य करेंगे आपके दीदार।

सूचना नहीं दोहराऊंगा
बस एक बार तारीख बतलाऊंगा
शनिवार 5 जून 2010 को सायं 6.00 बजे
कहां पर है
कौन कौन शामिल होंगे
सारी जानकारी कार्ड ही बतलाएगा
उसी से पूछें
जो कार्ड मिला है
उससे हिल मिल लें।
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पुणे, इलाहाबाद के ब्लॉगर्स, आपकी मदद चाहिए...खुशदीप

मुझे पुणे और इलाहाबाद में पर्सनल काम है, लेकिन दोनों ही जगह पहले कभी गया नहीं...दरअसल पुणे में मेरी भतीजी का एमबीए में एडमिशन कराना है...वहां कोई सिंगर कालेज या यूनिवर्सिटी है...अगर किसी ब्लॉगर भाई या बहन को वहां के मैनेजमेंट कोटे के बारे में या अन्य कोई जानकारी हो तो कृपया अपना ई-मेल दें...


इलाहाबाद में मुझे सीबीएसई के दफ्तर में छोटा सा काम है...मेरे बेटे ने इस बार दसवीं का इम्तिहान दिया था...उसके चार विषयों में ए-वन ग्रेड है...सिर्फ इंगलिश में बी-वन ग्रेड है...लेकिन वो पूरी तरह श्योर है कि उसकी कॉपी चेक होने में कुछ गड़बड़ हुई है या नंबरों के टोटल में...वो क्लास में भी इंग्लिश में हमेशा टॉप आता रहा है...मैंने सीबीएसई की वेबसाइट से नंबरों के वेरीफिकेशन का जो प्रोसिजर था वो तो अपना कर आवेदन कर ही दिया है...मैं चाहता था कि इलाहाबाद के कोई ब्लॉगर भाई मेरे लिए थोड़ा कष्ट कर सीबीएसई के इलाहाबाद आफिस से एक बार पर्सनल जाकर इस संबंध में बात कर लें..,मैं उनका आजीवन आभारी रहूंगा...
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नजर एटवी के जाने का मतलब

(मकबूल शायर शाहिद नदीम द्वारा प्रस्तुत)

शऊर फिक्रो-अमल दूर-दूर छोड़ गया, वो जिंदगी के अंधेरों में नूर छोड़ गया.
नजर एटवी साहब बिना किसी को खबर किये चुपचाप रुखसत हो गए. हम सबको आंसू बहाने का भी मौका नहीं दिया. पता नहीं कितने लोग होंगे जिनको कई सप्ताह  तक खबर नहीं हुई. मीडिया भी अब साफ-सुथरे, इमानदार और नेक इंसानों की मौत की परवाह नहीं करता, इसीलिए  उनके जाने की खबर एटा के अख़बारों में भले ही छप कर रह गयी हो, पर बड़ी खबर नहीं बन सकी. यह  उलाहना इसलिए  मुनासिब लग रहा है क्योंकि वे  केवल अच्छे इन्सान ही नहीं, उर्दू-हिंदी और हिन्दुस्तानी के एक बड़े अदीब थे, चमकते शायर थे. उनके जाने से हिन्दुस्तानी जुबान और अदब का जो नुकसान हुआ है, वह कभी पूरा नहीं हो सकता. उर्दू मुशायरों पर वे लगातार ३५ सालों से छाये हुए थे. विदेशों से भी उन्हें मुशायरों में बुलाया जाता था. वे खुद भी अदबी गोष्ठियां और मुशायरे करते रहते थे और हमेशा इस बात का ख्याल रखते थे कि  उसका मयार और संजीदगी कायम रहे. उनकी अपनी शायरी के क्या कहने. उसमें समाज और मुल्क के मुस्तकबिल के चिराग रोशन थे. उन्होंने कुछ समय तक लकीर नाम से एक अख़बार भी निकाला. उर्दू जुबान की जो खिदमत उन्होंने की, उसकी कितनी भी तारीफ की जाय काम होगी.


नजर एटवी का जन्म २८ फरवरी १९५३ को एटा के हाता प्यारेलाल में हुआ था. उनका बचपन का नाम शमसुल हसन था. उनके पिता अब्दुल लतीफ़ सिविल कोर्ट में काम करते थे. प्रारंभिक शिक्षा आर्य विद्यालय एटा में हुई. एटा से ही उन्होंने बी ए किया. पहले उनकी दिलचस्पी  फिल्मों में थी. १९७२ में वे उर्दू शायरी की ओर  मुड़े और बहुत जल्दी वहां अपना बेहतर मुकाम बना लिया.

अभी  उम्र भी क्या थी. यही कोई ५६  साल. यह भी कोई जाने की उम्र है. अभी तो उनसे समाज को, शायरी को बहुत कुछ हासिल होना था. वह एक मई  २०१० का मनहूस दिन था, जो उन्हें हमसे छीन ले गया. बुखार आया और चढ़ता ही गया. रक्तचाप कम होता गया और वे बचाए नहीं जा सके.  इतने वक्त तक उनके जाने की खबर एटा से आगरा तक दो सौ किलोमीटर भी नहीं पहुंची. पहुंची भी तो कुछ ऐसे लोगों के पास रही, जिन्होंने दूसरों से शेयर नहीं किया. उनकी याद में लोग बैठे नहीं, एक गोष्ठी तक कायदे से नहीं हुई. समाज और अदब के लिए जीने-मरने वालों की क्या इतनी ही कद्र यह समाज करता है? बड़े अफसोस की बात है. इतने कम समय में भी उन्होंने बहुत लिखा, बहुत काम किया, पर वह सब भी पता नहीं अब शायरी के प्रेमियों तक पहुँच पायेगा  या नहीं. एक संग्रह जरूर उनके नाम साया हुआ है. उसका उन्वान है, सीप. उनके लिए यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी कि उनके कलाम लोगों तक पहुंचें. सीपी से नजर साहब की तीन गजलें यहाँ पेश हैं-

१.
तूने चाहा नहीं हालात बदल सकते थे
मेरे आंसू तेरी आँखों से निकल सकते थे.

तुमने अल्फाज की तासीर को परखा ही नहीं
नर्म लहजे से तो पत्थर भी पिघल सकते थे

तुम तो ठहरे ही रहे झील के पानी की तरह
दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे

क्यूँ बताते उन्हें सच्चाई हमारे रहबर
झूठे वादों से भी जो लोग पिघल सकते थे

होठ सी लेना ही बेहतर था किसी का
लबकुशाई से कई नाम उछल सकते थे

क़त्ल इन्साफ का होता है जहाँ शामो-सहर
ऐसे माहौल में हम किस तरह ढल सकते थे

डर गए हैं जो हवाओं के कसीदे सुनकर
वो दिए तुमने जलाये नहीं, जल सकते थे

हादसे इतने जियादा थे वतन में अपने
खून से छप के भी अख़बार निकल सकते थे

२.
तेरे लिए जहमत है मेरे लिए नजराना
जुगनू की तरह आना, खुशबू की तरह जाना

मौसम ने परिंदों को यह बात बता दी है
उस झील पे  खतरा है, उस झील पे मत जाना

मैंने तो किताबों में कुछ फूल ही रखे थे
दुनिया ने बना डाला कुछ और ही अफसाना

जब मैंने फसादों की तारीख को दुहराया
रोती मिली आबादी हँसता मिला वीराना

खाई है कसम तुमने वापिस नहीं लौटोगे
कश्ती को जला देना जब पार उतर जाना

चेहरे के नुकूश इतने सदमों ने बदल डाले
लोगों ने मुझे मेरी आवाज से पहचाना

३.
उनकी यादों का जश्न जारी है
आज की रात हम पे भारी है

फासले कुर्बतों में बदलेंगे
होंठ उनके दुआ हमारी है

अब बहुत हंस चुके मेरे आंसू
कहकहों  अब तुम्हारी बारी है

मुझसे ये कह के सो गया सूरज
अब चरागों की जिम्मेदारी  है

सिर्फ मीजाने-वक्त है वाकिफ
आसमाँ से जमीन  भारी है

जिक्र जिसका नजर नजर है नजर
उस नजर पर नजर हमारी है.
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राय साहबों की महिमा

(उपदेश सक्सेना)
आपका साबका कभी न कभी ऐसे लोगों से ज़रूर पड़ा होगा, जिन्हें बिन मांगी सलाह देने की आदत होती है. किसी के भी फटे में टांग अडाने की उनकी आदत, उनकी जिंदगी की ज़रूरत हो सकती है, मगर इससे आपको अवश्य कोफ़्त पैदा कर जाती होगी. शादी-ब्याह के मौकों पर ऐसे “राय साहबों” की खेप देखने को मिल जाती है, हर बात में नुक्स निकालना इनकी फ़ितरत में शुमार होता है. कोई माने-न माने यह तबका अपनी बात ज़रूर कहने को उतारू मिलता है. आपने कुछ खरीदा हो या नया घर बनवाया हो, बात किसी के रिश्ते ही क्यों ना हो, आपको इनकी सुनना ज़रूर पड़ेगी..... पहले क्यों नहीं बताया, वहाँ से खरीदवा देता, वह मेरा परिचित है, काफी सस्ता मिल जाता.......यदि घर में यह खिडकी वहाँ लग जाती तो बात कुछ और होती......उस घर में रिश्ता मत करना उनके बेटे के लक्षण अच्छे नहीं हैं.....और हाँ ये राय साहबगण किसी भी जगह अपना ‘राष्ट्र चिंतन’ करना शुरू कर देते हैं. अब इस चरित्र पर ज़्यादा क्या लिखूं, आप इसके बारे में भाल-भाँति जानते ही होंगे.

एक स्वरचित कविता रुपी पंक्तिया ऐसे ही “राय साहबों” को समर्पित कर रहा हूँ.-
हमारे पुरखों ने दिये थे उपदेश,
उनके पुरखों ने भी दिये होंगे उपदेश,
हम भी दे रहे हैं उपदेश,
शान से, नमक-मिर्च लगाकर,
कल आने वाले भी,
देंगे उपदेश,
उसी आन-बान-शान से,
इस तरह बढ़ती जा रही है,
उपदेश देने वालों की
लंबी कतार,
मगर क्या हम,
वही रहेंगे,
उपदेश संस्कृति के संवाहक............

आज का उपदेश भी लगे हाथों झेल ही लें –कान में कही गई बात अक्सर सौ मील के फासले पर सुनी जाती है और किसी व्यक्ति या विषय के बारे में की गई कोई बात जब चार मुंह से अलग-अलग निकलती है तो उसके बाद उस व्यक्ति का भी उन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता,उस वक़्त वह आदमी, आदमी ना होकर एक चरित्र बन जाता है. और वह विषय, एक कथा.



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क्या आपको भी मिला है ऐसा इनाम ?

दोस्तों , आजकल इ-मेल पर रोज ऐसे कई मेलरहे हैं

कोइ बता पर है , इनके राज़ ?

नाम पता पूछ रहे हैं । अपना नाम पता और फोन नंबर भी दिया है ।
है कोई इनाम लेने वाला ?

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Saturday, 29 May, 2010 3:12 ऍम
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उड़नखटोले से उतरकर “राम” पूछेंगे, कब से भूखे हो...?

(उपदेश सक्सेना)
एक खबर है, खबर क्या जी, धांसू शोध का विषय. बिहार हिंदी डिक्शनरी का एकमात्र ऐसा शब्द है जिसके बारे में ही शायद - हरि अनंत, हरि कथा अनंता.... कहा गया होगा. बिहार केवल खबर नहीं पूरा अखबार है, यह आप-हम अच्छी तरह से जानते हैं. अब इसी अखबार से एक एक खबर, वह यह कि बक्सर की डुमरांव विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक दद्दन पहलवान पूरे पाँच महीने तक ज़मीन पर पैर नहीं धरेंगे. आप अन्यथा न लें, वे इस दौरान पलंग पर आराम नहीं करेंगे, वे जनप्रतिनिधि हैं सो अपनी जनता की सुध-बुध लेने पाँच महीनों तक हेलीकॉप्टर से उडेंगे, गरीबों से मिलेंगे, उनकी भूख-प्यास का हाल जानेंगे. कल्पना कीजिये, कितना भावप्रवण दृश्य होगा जब भूखी-नंगी जनता के बीच उनका ‘खेवनहार’ उड़नखटोले से उतरेगा, पूछेगा कि कब से खाना नहीं खाया, पानी नहीं पिया, कब से कपडे तन पर नहीं हैं?
1 जून से 30 सितम्बर तक के लिए दद्दन भाई ने एक निज़ी कम्पनी का हेलीकॉप्टर किराए पर लिया है, इसका किराया है 75 हज़ार रुपये प्रति घंटा और वे इस पर हर दिन साढ़े तीन घंटे की उड़ान भरेंगे, हर दिन करीब तीन लाख का खर्चा. इस किराए में पायलट और देखभाल का खर्च शामिल नहीं है. इस हिसाब से पहलवान क़रीबन 7 करोड़ रुपये खर्च कर अपनी गरीब जनता का हाल जानेंगे. इस हवाई यात्रा में वे सरकारों की कारगुज़ारियों का अपनी गरीब जनता के सामने पर्दाफाश करेंगे.
पहलवान जी, पहले समाजवादी पार्टी में थे. राबड़ीदेवी सरकार में वे मलाईदार विभाग के मंत्री भी रहे हैं, जब दलगत राजनीति से मोहभंग हो गया तो, डुमरांव से निर्दलीय विधायक बन गए. अब लालू यादव और नितीश कुमार दोनों उनके निशाने पर हैं. वैसे पहलवान खुद अपना हेलीकॉप्टर खरीदना चाहते थे, मगर इसके लिए उनके पास योग्य स्टाफ नहीं होने से उन्होंने यह आइडिया ड्रॉप कर दिया. पूरा खर्च (उनके अनुसार) उन्होंने अपनी भोजपुर, पटना, बनारस की ज़मीनें बेचकर जुटाया है. भविष्य में कभी खुद का हेलीकॉप्टर खरीदने का फिर प्लान बना तो, इसके लिए भी अभी से तैयारी शुरू कर दी गई है, उनका बेटा करतार अमरीका में पायलट का प्रशिक्षण ले रहा है.गरीबों तक किसी जनप्रतिनिधि के पहुँचने के जज़्बे से मेरी तो आँखें भीग गईं हैं, आपकी...........?
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शिव के माथे पर लगा बदनुमा दाग

शिव के माथे पर लगा बदनुमा दाग

हृदय प्रदेश में फिर दागदार हुई वर्दी

एसपी को लेना होगा नैतिक जिम्मेवारी

(लिमटी खरे)

हरियाणा प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर के द्वारा रूचिका गहरोत्रा के साथ की गई ज्यादती, रूचिका का काल कलवित होना और इंसाफ के लिए बीस साल तक रगडना, यह सब अभी लोगों की स्मृति से विस्मृत नहीं हुआ है, कि अचानक ही देश के हृदय प्रदेश के छतरपुर जिले में दो कोमलांगी बालाओं द्वारा पुलिस की अमानवीय बर्बरता के सामने घुटने टेककर आत्महत्या करने का दिल दहलाने वाला वाक्या सामने आया है।

एक ओर मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान अपनी कमान वाले सूबे को स्वर्णिम प्रदेश बनाने के ताने बाने बुन रहें हैं, वहीं दूसरी और उनकी सरकार के ही खाकी वर्दी वाले नुमाईंदों द्वारा आवाम के साथ बर्बरता की नायाब पेशकश प्रस्तुत की जा रही है। शिवराज सिंह चौहान इस हादसे में यह कहकर अपना पल्ला झाडने का प्रयास कर रहे हैं कि रक्षक ही भक्षक बन गए हैं। मामले की जांच अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी से करवाई जा रही है। इस मामले में छतरपुर के पुलिस अधीक्षक प्रेम सिंह बिष्ट ने ओरछा रोड थाना प्रभारी के.के.खनेजा सहित तीन को निलंबित कर दिया है।

दरअसल बिन मां की दो बच्चियों के पिता राजकुमार सिंह देश के नौनिहालों का भविष्य संवारने का काम करते हैं, वे पेशे से शिक्षक हैं। जब इनमें से एक अपने मित्र के साथ झांसी मार्ग से अपने घर लौट रही थी, तब ओरछा रोड थाने में पदस्थ सिपाही अरविंद पटेल और कन्हैया लाल ने उन्हेें धमकाया और जबरिया उस युवती को निर्वस्त्र कर अपने मोबाईल से उसके अश्लील वीडियो बना लिए। पीडिता ने इसकी शिकायत पुलिस अधीक्षक प्रेम सिंह बिष्ट से की, मगर नतीजा सिफर ही निकला।

शिव के राज में मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और बेलगाम अफसरशाही के बेलगाम घोडे तो पहले से ही दौडते आ रहे हैं, अब रियाया की जान माल का जिम्मा संभालने वाली खाकी वर्दी पहनने वालों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि वे अबोध मासूम बालाओें की इज्जत पर सरेआम हाथ डालने का दुस्साहस भी करने लगे हैं। इनके इस तरह के दुष्कृत्य की अगर उच्चाधिकारियों से शिकायत की जाती है, तो उच्चाधिकारी दोषियों को इस शर्त पर निलंबित करते हैं कि अगर पीडिता अपनी शिकायत वापस ले लें तो उन पर कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।

जाहिर है कि उच्चाधिकारियों के इस तरह के प्रश्रय का लाभ उठाकर आरोपियों द्वारा अपनी खाकी वर्दी का रौब तो गांठा ही जाएगा। फिर अगर हाथ में लट्ठ लिए सिपाही गर्जेगा तो बेचारी आम जनता तो चूहे की तरह बिलों में छिपने को मजबूर होगी ही। गौरतलब होगा कि अभी दो दिन पहले ही इंदौर के अन्नपूर्णा नगर थाने में प्रदेश की सरकारी और गैरसरकारी जमीनों की हेराफेरी के एक बहुत बडे आरोपी और भूमाफिया बॉबी छावडा को इंदौर पुलिस हवालात में एयर कंडीशनर की व्यवस्था के लिए चर्चित होती है, फिर दो दिन बाद ही छतरपुर में अबोध बालाओं को इहलीला समाप्त करने पर मजबूर कर देती है।

छतरपुर की यह घटना निश्चित तौर पर मध्य प्रदेश पुलिस के साथ ही साथ सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान के माथे पर कभी न धुलने वाले कलंक के मानिंद ही माना जा सकता है। याद पडता है कि जैसे ही भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश में सत्ता संभाली थी, तभी सवर्ण और दलित के बीच हुई तकरार के चलते सिवनी जिले में भोमाटोला कांड घटित हुआ था, इसमें सर्वण समाज के दर्जनों लोगों ने सारे गांव के सामने एक अधेड दलित महिला और उसकी जवान बहू का बलात्कार किया था। इस मामले में दोषियों को सजा मिल चुकी है, पर यह कांड भाजपा के सत्ता में आने के साथ ही हुआ था।

इस मामले में बताया जाता है कि भोपाल में प्रशिक्षण ले रहे छतरपुर के पुलिस अधीक्षक ने प्रभारी पुलिस अधीक्षक एवं छतरपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए थे कि दोनों ही आरोपियों को निलंबित किया जाए। जैसे ही उपर से कार्यवाही के डंडे की आशंका हुई इन दोनों ही आरोपियों ने पीडिता के बयान लेने गए सहयोगी आरक्षक दिनेश सिंह और प्रवीण त्रिपाठी के माध्यम से दोनों ही बालाओं पर अपनी शिकायत वापस लेने दबाव बनाया। किसी भी अधिकारी ने यह जानने का प्रयास अब तक नहीं किया है कि महिलाओं के बयान लेने के लिए महिला पुलिस को ले जाना सिंह और त्रिपाठी ने उचित क्यों नहीं समझा।

छतरपुर की यह घटना प्रदेश के उस हर मां बाप की पेशानी पर चिंता की लकीरें उभार सकती है, जिनकी जवान बच्चियां हैं। खाकी वर्दी के गुरूर में कोई भी सरकारी नुमाईंदा किसी के साथ भी मनमानी कर सकता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मध्य प्रदेश सूबे में आज की तारीख में कानून और व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची है। प्रदेश में पूरी तरह जंगलराज कायम है। कहीं आम जनता पर जुल्म ढाया जा रहा है तो कहीं मीडिया के इस तरह की गफलतों के खिलाफ आवाज उठाने पर उनके खिलाफ दमनात्मक कार्यवाहियां की जा रहीं हैं। यह सब देख सुन कर भी सूबे के निजाम ''नीरो'' के मानिंद बांसुरी बजा रहे हैं।

रूचिका का मामला देश में मीडिया ने उछाला। जोर शोर से उछले मामले में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी राठौर को सजा दिलवाने में बीस बरस का समय लग गया है। उस हिसाब से यह मामला तो बहुत छोटा ही है। आज प्रिंट मीडिया की यह सुर्खियां बना हुआ है, पर निहित स्वार्थ में उलझा मीडिया भी इस खबर को एकध सप्ताह में बीच के पन्नों में लाकर इसका दम तोड देगा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चेतना होगा। मीडिया को मध्य प्रदेश सरकार की तंद्रा तोडनी होगी। इस मामले में पुलिस अधीक्षक या प्रभारी पुलिस अधीक्षक को नैतिक जिम्मेदारी लेनी ही होगी, क्योंकि हर मामले में विभाग का प्रमुख ही जवाबदार होता है। सरकार को इस मामले में कठोर कदम उठाना ही होगा, अन्यथा आने वाले समय में शांत और सौम्य समझे जाने वाले देश के हृदय प्रदेश, मध्य प्रदेश के बिहार बनते देर नहीं लगेगी।

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ममता से ‘हत्या का लायसेंस’ छुड़ा लो मनमोहन


                 (उपदेश सक्सेना)
महिलाओं को भले ही आधी आबादी कहा जाता हो, समाज में उनकी बराबरी की बातें कही जाती हों, उनके उत्थान के लिए कई स्तर पर सरकारी प्रयास किये जा रहे हों फिर भी कुशलता से घर चलाने वाली महिलाओं को अक्सर अच्छा वाहन चालक नहीं माना गया है, इस तथ्यात्मक सत्य को जानते हुए भी मनमोहन सिंह सरकार में रेल का स्टेयरिंग ममता बैनर्जी को सौंपा गया है. शायद रेल चलाने के लिए किसी ड्राईविंग लायसेंस की ज़रूरत न रहने के चलते ऐसा किया गया हो सकता है, या मनमोहन सरकार की राजनीतिक मजबूरी भी, मगर इन दोनों कारणों से बेकसूर यात्रियों की “हत्या” का लायसेंस भी तो किसी को नहीं दिया जा सकता.
ममता बैनर्जी के पास लोकसभा में 19 सदस्य हैं, वहीँ राज्यसभा में उनके मात्र 2 सदस्य, यही सबसे बड़ा लायसेंस उनके पास है जिसके बल पर उन्हें निर्दोषों की जान लेने का अघोषित हक़ सा मिला हुआ है. ममता को इस सरकार में रेल मंत्रालय संभाले एक साल हो चुका है, और यदि आंकड़ों को देखें तो इस दौरान हुईं रेल दुर्घटनाएं इसके पहले किसी भी रेल मंत्री के इतने कार्यकाल में नहीं हुईं थी. देश के दूसरे रेल मंत्री रहे लालबहादुर शास्त्री ने एक के बाद एक हुईं तीन रेल दुर्घटनाओं की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में रेल मंत्री रहे माधवराव सिंधिया ने भी ऐसी ही एक दुर्घटना के बाद पद छोड़ने में देर नहीं लगाईं थी, अब ऐसी तो क्या किसी भी तरह की नैतिकता की बात राजनेताओं में सोचना बेमानी सा लगता है.
ममता बैनर्जी के क्रियाकलापों पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ, ज़्यादा लिखने से मुझे उनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त समझा जा सकता है, लेकिन में भी आम जनता हूँ और मेरे पास अपनी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता (?) के अलावा दुःख जताने का कोई हथियार भी तो नहीं है. दुर्घटना चाहे आतंकी हरकतों के कारण हो रही हों या मानवीय चूक के, इस देश का क़ानून किसी को किसी की जान लेने का हक़ नहीं देता. भारतीय रेल में हर दिन लाखों की संख्या में यात्री अपनी जान इसलिए जोखिम में नहीं डालते कि सरकार किसी दुर्घटना की स्थिति में उनके परिवार को चंद लाख रूपये का “ममता का सदका” न्योछावर कर दे. सरकार क्यों नहीं ऐसा क़ानून बनाती कि किसी दुर्घटना की स्थिति में किसी ज़िम्मेदार के खिलाफ़ सामूहिक ह्त्या का मुकदमा चलाया जा सके, या विभागीय मंत्री को इसके बाद राजनीति के अयोग्य घोषित कर दिया जा सके, शायद सरकार में इतना साहस नहीं है, क्योंकि जनता से ज़्यादा उसकी सहयोगी दलों के प्रति भी तो ज़िम्मेदारी है, बात चाहे पटरियों (रेल) की हो या हवा (विमानन) की.
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अम्बानी को करोड़पति मैंने बनाया

(उपदेश सक्सेना)
अम्बानी समूह को देश का सबसे बड़े औद्योगिक समूह बनाने में मेरा भी काफी योगदान है. हालांकि इस परिवार से मेरे पुरखों का भी कोई निकट क्या दूर-दूर तक नाता नहीं रहा है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि यदि आपका किसी से कोई नाता नहीं हो तो आप उसकी उन्नति में सहभागी नहीं बन सकते, वैसे भी नज़दीकी रिश्तेदारी “लक्ष्मी” को कबूल नहीं रही है, उदहारण खुद दोनों अम्बानी हैं. अब बात फिर मूल मुद्दे की, मैं कह रहा था कि अम्बानी मेरे पैसों से कुबेरपति हुए हैं तो इसमें आश्चर्य करने या मेरे किसी घटिया नशे की हालत में होने की भूल कतई ना करें. मेरे पास अम्बानी की रिलायंस कंपनी के चार मोबाईल कनेक्शन हैं. हर माह इनमें श्रद्धानुसार बैलेन्स डलवाया जाता है, इसमें से टेक्स के नाम पर काफी राशि काट ली जाती है, यह रकम जाती है अम्बानी की ज़ेब में. इसी तरह देश भर में मेरे जैसे कई करोड़ ग्राहक इस कंपनी की मोबाइल सेवा का उपयोग करते हैं, इस तरह यह रकम हर दिन लाखों में बैठती है.
मैं बात की इतनी गहराई तक कभी नहीं जाता, और न ही इस तरह होने वाले लाखों के नुकसान का ही कोई हिसाब-क़िताब ही रखता, यदि मेरे मोबाइल खाते से अचानक 30 रूपये बिना कारण कट गए. मैं इतनी बड़ी रकम कट जाने से सन्न रह गया. मैनें तुरंत कम्पनी की ग्राहक सेवा केन्द्र पर फोन लगाया, लंबे दिशा निर्देशों का पालन करने के बाद कम्पनी प्रतिनिधि से बात हो पाई. उसे मैनें अपने भीषण नुकसान के बारे में बताया, उसने काफी देर तक इंतज़ार करवाने के बाद कहा “आपकी शिकायत दर्ज़ हो गई है, आपकी रकम 24 घंटे में आपको वापस मिल जायेगी, मैं खुश हुआ कि चलो घाटा नहीं हुआ, मगर जब एक हफ्ते बाद भी जब मेरी रकम वापस नहीं मिली तो मैंने फिर कम्पनी की ग्राहक सेवा केन्द्र पर फोन लगाया, फिर लंबे दिशा निर्देशों का पालन करने के बाद कम्पनी प्रतिनिधि से बात हुई, उसने सब कुछ समझ लार लगभग 20 मिनट इंतज़ार करवाया, फिर मुझसे खुद को जबरन माफ करवाते हुए बोला “ दो दिन में आपको पैसे वापस मिल जायेंगे.” उसकी भी बात पर भरोसा करने के अलावा मैं कुछ नहीं करने की स्थिति में ही था. अब दो दिनों का पहाड़ जैसा इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा भी नहीं है.
इस हिसाब से गुणा-भाग किया जाए तो मेरे जैसे सेंकडों ग्राहकों के पैसे यदि दो-दो दिन ही कम्पनी के खाते में जमा रह गए तो ही कम्पनी करोड़ों रुपया ब्याज़ से कमा लेती होगी. तो हुई ना मेरी बात सच, अम्बानी को करोड़पति मैंने बनाया. एक बात और जिससे आप भी कभी न कभी ज़रूर दो-चार हुए होंगे, आपने गौर किया होगा कि जब कभी आपने किसी कम्पनी की ग्राहक सेवा केन्द्र पर कोई शिकायत करने के लिए फोन लगाया होगा, लंबा इंतज़ार करने के बाद कम्पनी प्रतिनिधि से बात हो पाई होगी. इस दौरान आपने अक्सर ‘सभी प्रतिनिधियों के दूसरे कॉल पर व्यस्त’ होने का टेप भी सुना होगा, इस बारे में क्या कभी सोचा है? क्या यह नहीं सोचा जाए कि सम्बंधित कम्पनी के खिलाफ़ ग्राहकों को बहुत ज़्यादा शिकायतें रहती हैं इसलिए लाइनें या कम्पनी प्रतिनिधि अक्सर व्यस्त मिलते हैं.
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कौन बनेगा वर्ष का श्रेष्ठ ब्लोगर ?

आज दिनांक 28.05.2010 को परिकल्पना ब्लोगोत्सव-2010 के अंतर्गत उन्नीसवें दिन के कार्यक्रम का लिंक -



तीन दिवसीय प्रथम अन्तराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग उत्सव लखनऊ में ....
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_28.html

यह प्रस्ताव केवल ब्लोगोत्सव-२०१० से जुड़े रचनाकारों एवं शुभचिंतकों हेतु है http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_6266.html


मेरा व्यापार, यह अख़बार : डा. सुभाष राय
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_8411.html


राजेन्द्र स्वर्णकार की कविताएँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_3461.html


समान्तर मीडिया की दृष्टि से कितनी सार्थक है हिन्दी ब्लोगिंग ....... http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_9843.html


मयंक सक्सेना की कविता
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_1140.html


कौन बनेगा वर्ष का श्रेष्ठ ब्लोगर ?
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_4332.html


बागवानी की एक शाम....
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_3173.html
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बंदूकों की नाल से सत्ता नहीं निकलेगी

बंदूकों की नाल से सत्ता नहीं निकलेगी


फिर एक बार नक्सलियों ने सत्ता को चुनौती दी है। मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के ट्रैक पर धमाका करके 65 लोगों की जान ले ली है। नक्सलियों के समर्थक बुद्धिजीवी उनका पक्ष लेते हुए कहते हैं कि समस्या के मूल में जाना होगा, समझना होगा कि वे आखिर बंदूक उठाने को मजबूर क्यों हुए। क्या वे बता सकते हैं कि इन हत्याओं से आदिवासियों की, गरीबों की समस्याएं हल हो जायेंगी? क्या इस तरह नक्सली बहुसंख्य देशवासियों की सहानुभूति खो नहीं रहे हैं? यह सर्वहारा के कल्याण का दर्शन है या निरा पागलपन?

मार्क्सवाद अपने सैद्धांतिक चेहरे में पूरी तरह मानवीय दिखता है क्योंकि वह शक्तिसंपन्न वर्ग के हाथों शोषण के शिकार लोगों के हक की बात करता है, वह तमाम असुविधाओं में जिंदगी बसर करने वाले मजदूरों, किसानों, दलितों और गरीबों की बात करता है। यह सही है कि मौजूदा व्यवस्था गरीब को और गरीब तथा अमीर को और अमीर बनाने का औजार बन गयी है लेकिन केवल इसलिए किसी को निर्दोषों की हत्या की आजादी नहीं मिल सकती।

माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है और माओवादी नक्सली जानते हैं कि माओ का प्रयोग अभी असफल नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें पूरा भरोसा है कि वे बंदूक और बारूद की ताकत से एक न एक दिन हिंदुस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लेंगे। वे शायद इस बात पर नहीं सोचते कि दार्शनिक माओ और शासक माओ में कितना अंतर था? क्या चीन में क्रांति के बाद सत्ता सर्वहारा के हाथ में आयी? क्या वहां सचमुच सामाजिक बराबरी आ पायी? सच तो यह है कि जब तक क्रांति नहीं होती है तब तक तो सर्वहारा के शासन की बात की जाती है, गरीबों के अधिकार की बात की जाती है लेकिन एक बार सत्ता हाथ में आते ही सारे अधिकार मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सिमट जाते हैं, विरोध और असहमति की आजादी छीन ली जाती है, किसी एक प्रभुतासंपन्न तानाशाह या समूह की तानाशाही के हाथ में मनमानी ताकत आ जाती है। सर्वहारा मुंह ताकता रह जाता है।

हिंदुस्तान के नक्सलियों को यह भी नहीं दिखायी पड़ता कि चीन ने किस चालाकी के साथ संभावित उथल-पुथल से बचने के लिए अपनी सत्ता की गाड़ी पूंजीवादी समाजवाद के रास्ते पर मोड़ दी। चीन की समृद्धि देखकर यह अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि वहां के सत्तानायकों में उदारता आ गयी है, वे अपने किसी भी विरोधी के प्रति न सिर्फ परम अनुदार हैं, बल्कि निर्मम और क्रूर भी हैं। तिब्बत में क्या किया उन्होंने? अपने ही राज्य शिनजियांग में क्या किया उन्होंने? क्या सत्ता में आकर किसान या सर्वहारा इतना कसाई हो सकता है?

छिपकर लोगों पर हमला करना और उन्हें मार देना, इसमें कौन सा शौर्य है। यह पागल, अंधी और बेवजह हत्याएं क्या नक्सलियों के लिए सत्ता के द्वार खोल देंगी? इस समस्या को इतना बिकराल बनाने में सरकारों की उदासीनता जितनी जिम्मेदार रही है, उतनी ही जिम्मेदार देश में एक खास किस्म के बुद्धिजीवियों द्वारा नक्सलियों को दिया जा रहा समर्थन भी है। क्रांति ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए एक फैशन बन गयी है। गरीबों के हित की बात करना कोई गुनाह नहीं है, उनके हको-हुकूक के लिए लड़ना भी कोई अपराध नहीं है लेकिन क्या केवल इस नाते कि सरकारों ने गरीबों के लिए अपेक्षा के अनुरूप काम नहीं किया, निर्दोष और निरपराध नागरिकों तथा अदने सरकारी मुलाजिमों की हत्या करने का उन्हेंं अधिकार दिया जा सकता है? वे यह नहीं सोचते कि यह स्वतंत्रता उन्हें नक्सलवादियों के डर से नहीं दी गयी है बल्कि यह लोकतंत्र के बीजमंत्र की तरह उन्हें अपने आप मिली हुई है। वे यह भी जरूर जानते होंगे कि सर्वहारा के शासन में इस तरह की छूट नहीं मिलती।

बेहतर यही होगा कि पहले जनपक्षधरता के छद्म की आड़ में जनाकांक्षाविरोधी संग्राम में जुटे लोगों से बातचीत करने की पूरी कोशिश की जाय। जरूरत हो तो इस काम में उनके समर्थक दार्शनिक बुद्धिजीवियों को भी लगाया जाय। फिर भी बात न बने तो उन्हें खदेड़ दिया जाये, वे लड़ते हैं तो उन्हें नष्ट करने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए। इसी में गरीबों का, आदिवासियों का, जनता का, सरकार का और देश का, सबका भला है। परंतु भविष्य में वे गलतियां जरूर सुधार ली जायं, जिनकी वजह से नक्सलियों को देश के हृदयभाग में इतनी दूर तक अपने पांव पसारने का मौका मिला था।
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मुफ्त के आदी हो चुके जनसेवक

मुफ्त के आदी हो चुके जनसेवक

(लिमटी खरे)

देश को नीति अनीति का मार्ग दिखाने वाले जनसेवकों के मुंह में बत्तीसी के बजाए तेंतीसी है, अर्थात उनकी एक और दाढ है, और वह है हराम दाढ। इस तरह की बात अस्सी के दशक के उपरांत लोगों के बीच होती आई हैं। लोगों का कहना है कि इस दाढ के माध्यम से जनसेवकों का प्रयास होता है कि उन्हें अपने कार्यकाल या सेवानिवृति के उपरांत भी वे हर चीज का लाभ एकदम निशुल्क उठाएं एसा उनका प्रयास होता है। चूंकि नियम कायदे कानून उन्हें ही बनाने होते हैं तो वे अपने फायदे के सौदे के वक्त जबर्दस्त एका का प्रदर्शन करते हैं। भारत गणराज्य का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी सांसद विधायकों के वेतन और सुविधाओं के बढने की बात आई है, जनसेवकों ने सदन में मेजे थपथपाकर इसका स्वागत किया है। किसी ने भी खाली खजाने का हवाला देकर इसका विरोध नहीं किया है। कोई करे भी क्यों, उनका फायदा इस सबमें है, इसलिए वे जनता जनार्दन का ख्याल रखने के बजाए अपनी झोली भरने में ही दिलचस्पी रखते हैं।

जनसेवकों की मुफ्त में पाने की चाहत इस कदर बुलंद है कि उन्हें आवाम की तकलीफों से कोई लेना देना भी नहीं है। यही कारण है कि आलीशान सर्व सुविधायुक्त सरकारी आवास, बिजली, दूरभाष, परिवार के साथ मुफ्त हवाई और रेल यात्रा के बाद भी उन्हें संतोष नहीं है। राज्य सभा, लोकसभा के सदस्य, विधायक, विधानपरिषद के सदस्यों ने अब राजमार्ग पर बिना किसी शुल्क, टोल के दिए हुए समूचे देश की सडकों पर अपने वाहन दौडा सकेंगे।

केंद्रीय राजमार्ग मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अब सांसद, विधायक, केंद्र और राज्य सरकार के वाहन, वीरता पुरूस्कार से नवाजे गए लोगों के वाहन राजमार्गों पर बिना शुल्क चुकाए अपना वाहन दौडा सकेंगे। वर्तमान में विधायकों को उनके सूबे में ही इस तरह की सुविधा मुहैया है। 2008 की टोल नीति में विधायकों को इस सुविधा से महरूम कर दिया गया था, जिसमें भारत के प्रधान न्यायधीश, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों तक को इस सुविधा का लाभ नहीं दिया गया था। अब यह सुविधा एक बार फिर बहाल कर दी गई है। भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की उपस्थिति में यह फैसला लिया गया हैै। तीनों ने इस बार मीडिया को इससे मुक्त रखने की जहमत नहीं उठाई है, सो मीडिया के कार्पोरेट घरानों द्वारा इसका विरोध किया जाना लाजिमी है।

अब नेताजी को टोल से छूट मिल गई है, जाहिर है कि उनके काफिले में चलने वाले नेहले देहले भी इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए अपने आका जनसेवकों पर दवाब बनाएंगे। एक बार फिर मंथन होगा और संभव है कि आने वाले समय में जनसेवकों के काफिले में शामिल कुछ निर्धारित वाहनों को इससे मुक्त रखने का फैसला ले लिया जाए। इनके वाहनों से जो राजस्व नहीं वसूला जाएगा, उस राजस्व हानि को सरकार द्वारा आम जनता की जेब पर डाका डालकर ही वसूला जाएगा।

अमूमन हर बार जनसेवकों को मिलने वाले वेतन, भत्ते, सुख सुविधाओं पर उंगलियां उठती ही रही हैं। आवाम की तरफ से मुंह मोडे जनसेवकों को मिलने वाली अनगिनत छूट में एक और सुविधा का इजाफा करना देश की रियाया के साथ अन्याय ही माना जा सकता है। आम सामान्य लोगों की तुलना में सरकारी खजाने से सौ गुना ज्यादा लाभ उठाने वाले इन जनसेवकों सडक विकास की मद में विकास के मकसद से वसूले जाने वाले टोल से छूट देना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है। सडक परिवहन मंत्री कमल नाथ जानते होंगे कि अगर उन्होंने जनसेवकों को इस तरह की छूट प्रदान की है तो इससे टोल के जरिए वसूले जाने वाले राजस्व में दस फीसदी की कमी दर्ज हो सकती है।

आसमान छूती सुरसा के मुंह की तरह बढती मंहगाई में आम जनता किस तरह दो वक्त की रोटी जुटा पा रही है, इस बात से किसी भी जनसेवक को कुछ लेना देना नहीं है। कहने को खाली सरकारी खजाने और वैश्विक आर्थिक मंदी का कथित तौर पर प्रलाप कर तमाम तरह की कटौतियों को आम जनता पर ही लादा जा रहा है। इस कटौती का जनसेवकों की मोटी खाल पर कोई असर परिलक्षित नहीं हो रहा है। जनसेवकों का इस दौर में भी मंहगे कपडे पहनना, विलासितापूर्ण जीवन जीना, आलीशान बंग्लों में सरकार के खजाने से करोडों रूपए फूंकना, तीन या पांच सितारा होटलों में रात गुजारना, मंहगी सरकारी दावतें देना, विदेश यात्राएं आदि का क्रम अनवरत ही जारी है। सांसदों का सरकार पर दवाब बना हुआ है कि उनके वेतन और भत्तों में बढोत्तरी की जाए।

सरकार का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के साथ ही साथ कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी मितव्ययता बरतने का प्रहसन कर चुके हैं, बावजूद इसके अगर केंद्र सरकार का भूतल परिवहन मंत्रालय इस तरह का कदम उठाता है तो कहना ही पडेगा कि बीसवीं सदी में नेतृत्व की परवाह किसी को भी नहीं है। जिस तरह उपनिवेशवाद में आवाम और शासकों के बीच एक खाई हुआ करती थी, उसी की एक बानगी माना जा सकता है भूतल परिवहन मंत्रालय का यह फैसला, इस फैसले से शासक और रियाया के बीच खुदी खाई तेजी से बढने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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कब मिल सकेगा साफ पेयजल!

कब मिल सकेगा साफ पेयजल!

हर जिले में खुलेगी पेयजल परीक्षण प्रयोगशाला

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 27 मई। भारत गणराज्य को ब्रितानी हुकूमत की गुलामी जंजीरें तोडे हुए छः दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है फिर भी आवाम को साफ पीने का पानी मुहैया न होना अब तक की सरकारों के लिए शर्म की बात कही जा सकती है। आम आदमी खाने के बिना गुजारा कर सकता है, पर पानी के बिना गुजारा संभव ही नहीं है। ब्रितानी राज में अंग्रेजों द्वारा साफ तौर पर कहा जाता था कि सारी सुविधाएं मुहैया कराना ब्रितानी हुकूमत की जवाबदारी है, पर पानी के लिए रियाया को खुद ही पहल करनी होगी। यही कारण था कि उस समय हर घर में एक कुंआ खोदा गया था। अमूमन हर घर में पानी की व्यवस्था खुद ही की जाती रही थी, आजादी के पहले तक।

आजादी के उपरांत 2010 में एक बार सरकार की तंद्रा टूटती नजर आ रही है। केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि आम जनता को पीने का पानी मुहैया करवाने के लिए अब हर जिले में पेयजल परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना की जाए। कंेद्र सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय देश के हर जिले में चार लाख रूपए व्यय कर इस तरह की प्रयोगशाला की संस्थापना करने जा रही है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत संचालित राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार की एक महात्वाकांक्षी योजना सामने आई है, जिसमें देश के हर नागरिक को साफ पीने का पानी मुहैया करवाना प्रमुख माना गया है।

ग्रामीण विकस मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि विभाग के पेयजल आपूर्ति विंग ने इस योजना को युद्ध स्तर पर अमली जामा पहनाने की ठान ली है। इस हेतु विभाग द्वारा शत प्रतिशत अनुदान भी मुहैया करवाया जा रहा है। सूत्रों ने कहा कि इस योजना को राज्यों की सरकारें चाहें तो अपने अपने स्तर पर आगे बढवा सकती हैं। केंद्र ने राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं कि अगर वे चाहें तो राष्ट्रीय पेयजल सहायता योजना में मिलने वाली राशि का पांच प्रतिशत हिस्सा प्रयोगशाला को बनाने में खर्च कर सकती हैं।

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हिंद का जिन्दा



















क्या हिंद का जिन्दा कॉप रहा है ????

गूंज रही है तदबिरे,


उकताए है शायद कुछ कैदी.......


और तोड़ रहे है जंजीरे !!!!!


दीवारों के नीचे आ आ कर यू जमा हुए है ज़िन्दानी .....


सीनों में तलातुम बिज़ली का,


आखो में जलाकती शमशीरे !!!!


क्या उनको ख़बर थी होठो पे जो मोहर लगाया करते थे ....


एक रोज़ इसी खामोशी से टपकेगी दहकती तकरीरे!!!


संभालो के वोह जिन्दा गूंज उठा,


झपटो के वोह कैदी छूट गए ,


उठो के वोह बैठी दीवारे ,


दौड्रो के वोह टूटी जंजीरे !!!!!










यह नज़्म आज़ादी से पहेले की है जिस में कि शायर देशवासियों को यह बता रहा है कि तैयार हो जाओ अपने जो साथी क़ैद में है वोह जल्द ही जिन्दा तोड़ कर, क़ैद से आजाद हो, आ जायेगे और तब हम सब मिल कर लड़ेगे और अपने हक की आवाज़ बुलंद करेगे |

आज आज़ादी के ६२ साल बाद भी क्या हम सब में इतना एका है की हम अपने हक कि आवाज को मिल कर बुलंद करे ????
आज हम में से हर एक अपनी - अपनी आवाज़ की बुलंदी की परवाह करता है | इतना समय किस के पास है की किसी और की ओर भी देख ले ?? क्या फर्क पड़ता है साहब, जो पड़ोसी किसी मुश्किल में है, हम तो ठीक है न बस इतना काफ़ी है | आज 'मैं , मेरा और मेरे लिए' का ज़माना है | अब 'हम' बहुवचन नहीं एकवचन हो गया है |

आज के समय की मांग है कि "हम" को दोबारा बहुवचन बनाया जाए | हम सब फ़िर मिले और सब का एक ही मकसद हो ------- देश की उन्नति में अपना योगदान देना | आज भी हम सब पूरे तरीके से आजाद नहीं है , आज भी हमारे कुछ साथी किसी न किसी जिन्दान में क़ैद है | यह क़ैद जाहिलपन की हो सकती है , यह क़ैद बेरोज़गारी की हो सकती है , यह क़ैद किसी भी तरह की हो सकती है | एसा नहीं है कि सिर्फ़ हमारे हुक्मरान ही हमारे उन साथियो को उनकी क़ैद से आजाद करवा सकते है .......हम सब भी अपने - अपने तरीके से उनकी आज़ादी के लिए बहुत कुछ कर सकते है बस जरूरत है सिर्फ़ एक जज्बे कि एक सोच , एक ख्याल कि मैं भी कुछ करना चाहता हूँ उन लोगो के लिए जो अपनी मदद ख़ुद नहीं कर पा रहे है |

आईये एक अहद करे अपने आप से कि जब जब मौका मिलेगा उन लोगो के लिए कुछ न कुछ करेगे जो किसी न किसी कारण से अपने लिए बहुत कुछ नहीं कर पा रहे है |

जय हिंद |
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कथाक्रम पत्रिका में 'ब्‍लॉग पर कुछ ट्वीटिंग' - संपादकीय में शैलेन्‍द्र सागर जी ने जैसा लिखा है

कथाक्रम पत्रिका के अप्रैल-जून अंक में ..पत्रिका के संपादक शैलेन्द्र सागर जी ने वर्तमान अंक में ब्लॉग की विसंगतियों पर "ब्लॉग पर कुछ ट्वीटिंग" शीर्षक से सम्पादकीय लिखा है. 
यहां क्लिक करके आप भी पढि़ए 
और अपनी राय रखिए।  इस पर सार्थक विमर्श जरूरी है।
साभार : कथाक्रम पत्रिका और उसका सच ब्‍लॉग से।

 
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जाति-जनगणना के खिलाफ़ सबल भारत

(उपदेश सक्सेना)
1857 के स्वतंत्रता आंदोलन से डरे हुए अंग्रेज़ों ने 1871 की जनगणना में जाति-मज़हब का कॉलम भी जोड़ दिया था ताकि भारत में जनता की एकता भंग हो जाए, इसके बाद 1947 में हुआ भारत का विभाजन जातीय आधार पर हुआ था, अब एक बार केन्द्र की कांग्रेस नेतृत्व की गठबंधन सरकार उसी नीति पर चल पड़ी है. देश में चल रही जनगणना में जातीय आधार जोड़ने की कवायदें अब केन्द्रीय कैबिनेट से होकर मंत्रिमंडलीय समूह के पास तक जा पहुंची हैं. देश के बुद्धिजीवीवर्ग ने इसके खिलाफ़ एकजुटता बनाना शुरू कर दिया है.
हालांकि 1931 में कांग्रेस के खासे विरोध के बाद अंग्रेज़ सरकार ने जाति-जनगणना का ख्याल दिमाग से निकाल दिया था, मगर अब पुनः ऐसा होने जा रहा है. इस बारे में सबल भारत नाम का एक अभियान शुरू किया गया है, जिसके सूत्रधार राजनीतिक चिन्तक वेदप्रताप वैदिक बनाए गए हैं. इस अभियान को बलराम जाखड, वसंत साठे, जगमोहन. राम जेठमलानी, एमजीके मेनन,सोली सोराबजी जैसे ख्यात लोगों ने अपना समर्थन दिया है, वहीँ इसका संचालन आरिफ मुहम्मद खान,सुभाष कश्यप, जगदीश शर्मा, दिलीप पडगांवकर,रजत शर्मा, जैसी हस्तियों के पास है.अभियान के तहत जुलूस, धरना, उओवास, विरोध यात्राएं जैसे कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे.
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एटीएम बब्बा नहीं रहे

एटीएम बब्बा नहीं रहे

पहली बार 1967 में हुआ था एटीएम का प्रयोग

भारत में जन्मा था एटीएम का जनक

(लिमटी खरे)

आधुनिकता के इस युग में लोग बहुत ही अधिक सुविधाभोगी हो चुके हैं। इस काल में जीवन चक्र को सहज बनाने में जिन लोगों ने अपना अपना योगदान दिया है, उनमें जान शेफर्ड बेरान का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा, वह इसलिए कि उन्होंने लोगों को पैसा निकालने के लिए बैंक की समयसीमा और लंबी लंबी कतारों से छुटकारा दिलाते हुए आटोमेटेड टेलर मशीन (एटीएम) का अविष्कार किया था, जो आज कमोबेश हर एक नागरिक के पास है।

स्काटलैंड मूल के माता पिता की संतान शेफर्ड का भारत से गहरा नाता रहा है। उनका जन्म भारत गणराज्य के मेघालय सूबे के शिलांग में हुआ था। कहते हैं आवश्यक्ता ही अविष्कार की जननी है। इसे ही चरितार्थ किया था शेफर्ड ने। सप्ताहांत का आनंद लेने के शौकीन शेफर्ड को बैंक से पैसा निकालने की झंझट के चलते वीकेंड के मजे खराब हो जाया करते थे। एक दिन नहाते नहाते उनके दिमाग में आया कि क्यों न एसी मशीन को इजाद किया जाए जिससे कहीं भी कभी भी धन की निकासी की जा सके। शेफर्ड ने स्वचलित चाकलेट वेंडिग मशीन को देखकर सोचा कि क्यों न इसी तर्ज पर धन निकासी की व्यवस्था की जाए।

धुन के पक्के 23 जून 1925 को जन्मे शेफर्ड ने एटीएम मशीन को बना ही दिया। पहली बार 27 जून 1967 को उत्तरी लंदन के एनफील्ड में बारक्लेज बैंक की शाखा में इसे प्रयोग के तौर पर लगाया गया। यह मशीन वर्तमान एटीएम मशीन से बिल्कुल भिन्न हुआ करती थी। इसका नाम उस वक्त डी ला रूई ऑटोमेटिक कैश सिस्टम (डीएससीएस) कहा जाता था। उस वक्त रसायन युक्त कोडिंग से विशेष जांच के उपरांत ही पैसा निकाला जाता था। इसमें एक खांचे में उपभोक्ता द्वारा अपना चेक रखकर अपनी निजी पहचान संख्या दर्ज करता था, तब दूसरे खांचे से दस पाउंड के नोट बाहर आते थे। एटीएम नोट निकालने वाला पहला उपभोक्ता मशहूर फिल्म 'आन द बजेस' फिल्म के नायक रेग वर्नी थे।

यही युग था जब एटीएम मशीन के युग का सूत्रपात हुआ था। शेफर्ड ने आरंभिक समय में इसका पिन नंबर छः अंकों का रखा था। बाद में उनकी पत्नि का कहना था कि उन्हें चार अंकों की संख्या ही आसानी से याद रह पाती है, सो शेफर्ड ने इसे छः से बदलकर चार अंकों में कर दिया। आज समूची दुनिया में पिन कोड चार अंकों का ही है।

ब्रिटेन मंे स्काटलेंड के लोगों को वैसे तो बहुत ही कंजूस माना जाता है, पर ब्रितानी इस बात को गर्व से कह सकते हैं कि उनके बीच का ही एक व्यक्ति जो भारत मंे जन्मा हो, ने एक मशीन का अविष्कार कर दुनिया भर के बैंक की तिजोरियों के ताले चोबीसों घंटे के लिए खोल दिए हों। आज प्रोढ हो चली पीढी के स्मृति से यह बात कतई विस्मृत नहीं हुई होगी कि एटीएम संस्कृति के आने से पहले किस तरह लोग घंटों लाईन में लगकर बैंक में अपना जमा धन निकलवाया करते थे। रविवार या अवकाश के दिनों में लोगों को किस कदर परेशानियों से दो चार होना पडता था। कहा जाता था कि बैंक कभी भी लगातार तीन दिन तक बंद नही रहते। आज वे सारे मिथक टूट चुके हैं।

आज बिजली, बल्व, सायकल आदि के अविष्कारकों को हमने अपने पाठ्यक्रम की किताबों में पढा है, पर अनेक एसे अविष्कारक हुए हैं, जिनके बारे में बहुत ज्यादा प्रचारित नहीं हो सकता है। मसलन इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के जनक सुजाता को कम ही लोग जानते हैं। सुजाता दक्षिण भारत के एक फिल्मकार थे। सरकार की उपेक्षा के कारण इस तरह की प्रतिभाओं के बारे में लोग जान ही नहीं पाते हैं। टेलीफोन के अविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल, बिजली के बल्व के अविष्कारक टॉमस आल्वा एडिसन को तो लोग जानते हैं, किन्तु फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन, गैस चूल्हा, मोबाईल आदि रोजमर्रा उपयोग में आने वाली वस्तुओं के अविष्कारकों के बारे में कम ही लोग जानते हैं।

बीसवी शताब्दी के उत्तारर्ध में विज्ञान और टेक्नालाजी का विकास जिस दु्रत गति से हुआ और बदलाव की प्रक्रिया इतनी तेज रही कि लोगों केा इनके अविष्कारकों के बारे में जानने या याद रखने की फुर्सत ही नहीं मिल सकी। आने वाले दिनों में कागज की मुद्रा के स्थान पर प्लास्टिक मनी जिसे ई ट्रांजक्शन भी कहते हैं, का प्रचलन बहुत ज्यादा बढ सकता है। आज भी क्रेडिट, डेबिट कार्ड पूरी तरह प्रचलन में आ चुके हैं। लोग आज अपनी अंटी में ज्यादा रूपया रखने के बजाए इस तरह के कार्ड रखने में ही ज्यादा समझदारी समझते हैं। हमें धन्यवाद देना चाहिए जान शेफर्ड बैरन का जिन्होंने बैंक की तिजोरियों के दरवाजे चौबीसों घंटों के लिए खोल दिए वरना आज भी हम बाबा आदम के जमाने की व्यवस्था पर ही चलने को मजबूर रहते। शेफर्ड को एटीएम का जनक नहीं पितामह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। एटीएम बब्बा नहीं रहे इस बात का दुख सभी को होना चाहिए।

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साथी हाथ बढ़ाना साथी रे : राजेश उत्‍साही

दोस्तो दो दिन पहले मैंने अपने ब्लाग  गुल्‍लक  पर एक पोस्ट- अनुभव की गुल्लक में जो है उसे बांट रहा हूं- लगाई है। पर मैं यह देखकर हैरान-परेशान हूं कि ब्लाग पर पाठक आ तो रहे हैं,पर कोई उस पर टिप्पणी नहीं कर रहा। आमतौर पर औसतन दो टिप्पणी तो मेरी हर पोस्ट पर आ ही जाती हैं। मैं इस बात को लेकर चितिंत हूं कि कहीं इसमें कोई तकनीकी समस्या तो नहीं है। इसीलिए नुक्कड़ पर अपनी समस्या को रख रहा हूं। जानकार साथी मदद करेंगे,यह उम्मीद तो है ही।

अनुभव की गुल्लक में जो है उसे बांट रहा हूं
लिखने के दौरान मेरे जो अनुभव रहे हैं, मैंने जो सीखा है वह मैं औरों तक पहुंचाने की कोशिश करता रहा हूं। इस बात का जिक्र मैंने अपनी एक पोस्ट नसीम अख्तर की कविताओं के बहाने से में भी किया है। पिछले दिनों किसी एक ब्लाग पर मैं अपनी आदत के मुताबिक टिप्पणी करके आ गया। अगले‍ दिन यह देखकर सुखद आश्चर्य से भर उठा कि उस ब्लागर ने मेरी बात को गंभीरता से लिया था और मुझे इमेल करके अपनी कविताओं के संदर्भ में मदद मांगी थी। साथ में अपनी एक अप्रकाशित कविता भी भेजी थी। मैंने अपनी तरफ से उस कविता में आवश्यक संपादन करके उसे वापस प्रेषित कर दिया। जवाब में मुझे जो मेल मिला उसका संपादित अंश मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।........ कृपया आगे पढ़ने के लिए मेरे ब्‍लाग गुल्‍लक पर आने का कष्‍ट करें। धन्‍यवाद।
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इंटरनेशनल दिल्‍ली हिन्‍दी सम्‍मेलन ब्‍लॉगर : दिल्‍ली वालों का दिल लेकर फरार हुए ललित शर्मा (भाग-3)

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ब्लोगोत्सव-२०१० की आखिरी शाम हिंदी ब्लॉग जगत के लिए एक यादगार शाम होने जा रही है !

आज दिनांक 26.05.2010 को परिकल्पना ब्लोगोत्सव-2010 के अंतर्गत अठारहवें दिन प्रकाशित पोस्ट का लिंक-

एक सीमा तक करें शैतानियाँ, ना किसी का दिल दुखाना चाहिए।
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_1497.html


अजित कुमार मिश्र की दो कविताएँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_844.html


हल्ला हुआ गली दर गल्ली। तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली।।
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7061.html


कविता रावत की दो कविताएँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_2453.html


अंग्रेज तो हिन्दुस्तान को आज़ाद छोड़ कर चले गए, लेकिन अपने पीछे हिंदी भाषा को अंग्रेजी का गुलाम बना कर गए!
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_4631.html


सुरेश यादव की दो कविताएँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_9870.html


मैं तुम्हारा हूँ !
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7471.html


गोपाल जी की दो कविताएँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_5523.html


उनके बच्चे कैसे पँख निकलते ही आकाश मे उड़ान लेते हैं.........
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7016.html


प्रताप सहगल दो कविताएँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_9459.html


आओ, मेरे लाडलों, लौट आओ !!!
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_5794.html


अमित केशरी की कविता : पंख
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7682.html


ब्लोगोत्सव-२०१० की आखिरी शाम हिंदी ब्लॉग जगत के लिए एक यादगार शाम होने जा रही है !
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_26.html


आजादी के लिये लड़ने वाले दीवानों ने क्या इसी स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी?
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_26.html
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http://www.srijangatha.com/prerakprasang_26may2k10

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इंडिया शाइनिंग, 50 हज़ार में बिके 9 भूखे आदिवासी

                                 (उपदेश सक्सेना)
50 हज़ार रूपये में आज एक अच्छी मोटर सायकिल नहीं आती, इस राशि में कोई अच्छा क़ारोबार नहीं किया जा सकता, महंगाई के इस दौर में 50 हज़ार रूपये में भले ही कुछ ज़्यादा नहीं आ सकता हो, मगर इतने धन में जीते-जागते मनुष्य ज़रूर खरीदे जा सकते हैं, वह भी एक-दो नहीं पूरे 9, साथ में दो बच्चे फ्री. यह हकीकत है देश के उस राज्य मध्यप्रदेश की, जिसे कृषिप्रधान कहा जाता है. इंसानी खरीद-फ़रोख्त का यह मामला है दतिया जिले का. इस घटना ने एक बार पुनः यह साबित कर दिया है कि दबंगों-सामंती मानसिकता के लोगों के लिए इंसान और इंसानियत की कोई क़ीमत नहीं है.
राज्य के इस जिले से प्रदेश के विधि मंत्री नरोत्तम मिश्रा प्रतिनिधित्व करते हैं, मगर वे भी इन आदिवासियों की “विधि का विधान” नहीं बदल सके. हालांकि राज्य की शिवराजसिंह सरकार हमेशा से इस बात के दावे करती आई है कि प्रदेश में भुखमरी की कहीं-कोई स्थिति नहीं है, लेकिन भूख से बिलबिला रहे इन 9 आदिवासियों को भरपेट रोटी और बेहतर काम का आमंत्रण बुरा नहीं लगा, क्योंकि सरकार की ज़मीनी हकीकत तो वे ही जानते हैं. कहने को हम सायबर युग के प्रवेश द्वार पर खड़े हैं, 21 दीं सदी को छूने ही वाले हैं, मगर यह इंसानी खरीद-फ़रोख्त हमें धुर आदम युग की याद दिलाने को काफी है. यह घटना किसी को पता भी नहीं चलती यदि एक “बिका हुआ” आदिवासी क़ैद से छूटकर भाग नहीं आता. अब सरकार और प्रशासन इस बात की लीपा-पोती में जुटे हैं (यही इनका काम भी है), परम्परागत रूप से जांच के आदेश हो चुके हैं, यदि यह आदिवासी सच्चा हुआ तो ही बाकी “गुलामों” को छुडवाने टीम भेजी जायेगी. भूखा-नंगा आदिवासी झूठा भी तो हो सकता है. आखिर मेरा भारत महान है. सच है–भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां विदेशों से अनाज़ आयात किया जाता है, उसी तरह जैसे– भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां आये दिन साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं.
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राठौर को दिखा आईना, आरुषि को कब मिलेगा न्याय?

(उपदेश सक्सेना)
हर हँसी प्रसन्नता की नहीं होती, कई बार हँसने वाला व्यक्ति खिसियाया हुआ भी हो सकता है. हरियाणा के पुलिस महानिदेशक रहे शम्भू प्रताप सिंह राठौर को भारतीय न्याय व्यवस्था ने आईना दिखा दिया है.अपनी बेटी से भी कम उम्र की रुचिका गिरहोत्रा के साथ यौन छेड़छाड़ के आरोपी राठौर को अदालत ने डेढ़ साल की सज़ा सुनाई है. आखिरकार रुचिका व उसके परिवार को इंसाफ मिल गया। कोर्ट के इस फैसले के बाद राठौर को गिरफ्तार कर लिया गया है और उसे बुड़ैल जेल भेज दिया गया है.
इस साल जनवरी में जमानत पाने के बाद राठौर के चेहरे पर पुरानी मुस्कान फिर लौट आई थी। अदालत से निकलते हुए वह खुल कर मुस्कुरा रहा था। उसने मीडियाकर्मियों को ताना मारते हुए यह भी कहा कि उसने मुस्कुराना जवाहरलाल नेहरू से सीखा और वह आगे और मुस्कुराएगा। उसने मीडिया पर जम कर गुबार निकाला। उसने कहा, मैं न्याय व्यवस्था को उस तरह नष्ट नहीं करना चाहता जैसे कि मीडिया कर रहा है। इसलिए मैं जांच से जुड़े किसी भी मुद्दे पर कुछ नहीं बोलूंगा।
लेकिन, अगर आप चाहते हैं तो मैं अपनी मुस्कुराहट पर जरूर बोलूंगा जिस पर आप कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं। मैंने पंडित जवाहर लाल नेहरू से सीखा है कि मुश्किलों में कैसे मुस्कुराते हैं। मैं और ज्यादा मुस्कुराऊंगा। अगर आप मुझे नुकसान पहुंचाते हैं तो मैं और ज्यादा मुस्कुराऊंगा।' आज भी अदालत में सज़ा सुनाये जाने के बाद उसके चेहरे पर हँसी की बारिक़ लकीरें दिखाई दीं थी. रुचिका के परिवार और सीबीआई ने याचिका दायर की थी कि राठौर को इस मामले की अधिकतम दो साल की सजा दी जाए। कोर्ट ने राठौड़ की याचिका अस्वीकार कर दी जबकि सीबीआई और रुचिका के परिवार की ओर ये दायर याचिका को स्वीकार करते हुए राठौड़ की सजा को बढ़ाकर डेढ़ साल कर दिया।देश भर में ऐसे कई मामले अदालतों की तारीखों के जाल में उलझे हुए हैं, जिनमें राठौर जैसे नर-पिशाचों के पापों की सज़ा का इंतज़ार लंबा होता जा रहा है. एक अन्य मामले (आरुषि तलवार) मामले में तो जांच एजेन्सी की जांच की दिशा पर ही सवालिया निशान लगाए गए हैं. निठारी जैसे कांड के आरोपियों को सजाओं का इंतज़ार लंबा होता जा रहा है. यौन उत्पीडन जैसे अपराधों को सबसे घृणिततम प्रकृति का बनाते हुए ऐसे मामलों के आरोपियों को तुरंत सज़ा का प्रावधान होना चाहिए. देरी से मिला न्याय अपना नैसर्गिक असर खो देता है. उस देश में जहां राष्ट्राध्यक्ष महिला हो, जहां सर्वशक्तिमान महिला का सरकार पर नियंत्रण हो वहाँ महिला अपराधों को लेकर लचर क़ानून होना हमारी न्यायप्रियता पर संदेह पैदा करता है, होना यह चाहिए कि, ऐसे मामलों के लिए त्वरित अदालतें बनाई जाएँ जहां कोई राठौर, कोई पंढेर, कोई कोहली न्याय प्रक्रिया का उपहास न उड़ा सके.
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राह से भटक गया है आर्य समाज?

(उपदेश सक्सेना)
अपनी स्थापना के १३५ साल बाद आर्य समाज संगठन अपने उद्देश्यों से भटक गया लगता है. 10 अप्रैल 1875 को जब बम्बई में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का गठन किया था तब उसका मुख्य उद्देश्य वेदिक संस्कृति को मानने वाले ऐसे लोगों का समूह बनाना था जो सामाजिक बुराइयों के खिलाफ़ लड़ सकें. इसके कामकाज में गुरुकुल-स्कूलों का संचालन, शुद्धि सभाएं करना आदि थे, इसे Society of Noble people का नाम दिया गया था. अब आर्य समाज ने अपनी भूमिका केवल प्रेम विवाह करवाने वाली संस्थान तक सीमित कर ली है. देश भर में चल रहे आर्य समाज मंदिरों में आज सामाजिक बुराइयाँ मिटाने से ज़्यादा जातीय-अंतरजातीय विवाह करवाए जाते हैं, यह ज़मीनी हकीकत है, इससे कई लोगों को ख़ासा बुरा भी लग सकता है.
आंकड़े गवाह हैं कि पिछले कुछ दशकों में देश में हुए अधिकाँश विवाह इन आर्य समाज मंदिरों में हुए हैं. इन तथ्यों की तस्दीक की है हरियाणा के आर्य समाज ने. वहाँ आर्य समाज के एक धड़े ने माता-पिता और गांव वालों की अनुमति के बिना समाज के मंदिरों में होने वाली शादियों पर रोक लगाने का फैसला किया है। सभा के प्रतिनिधि के अनुसार “हम एक ही गोत्र और गांव में शादी की अनुमति नहीं दे सकते। समाज के कायदे-कानून का उल्लंघन करने वाली शादियों को भी स्वीकृति नहीं देंगे।“ अपनी सफाई में सभा के प्रतिनिधि की ओर से यह भी कहा गया है कि वे अंतरजातीय विवाह का विरोध नहीं करते, लेकिन भविष्य में शादी करने वाले जोड़ों को मंदिरों में अपने माता-पिता और गणमान्य लोगों के साथ आना होगा। उनके मुताबिक प्रेम विवाह हितकर नहीं है क्योंकि ऐसी शादियों में युवा सिर्फ सुंदरता देखते हैं।वे शादी के आधार की प्रकृति और गुणों को नहीं देखते। इस लंबे चौड़े स्पष्टीकरण में आगे कहा गया है कि भावी संतान को सुसंकृत करने के लिए सोलह संस्कारों का आदेश है. चाहे किसी भी विकृत अवस्था मे हो सम्पूर्ण भारत वर्ष के हिंदु समाज मे इन संस्कारों का किसी न किसी रूप मे पालन किया जाता रहा है. सब का नही तो कुछ महत्वपूर्ण संस्कारों का प्रचलन तो है ही, यही भावनाएं यम और नियम भी हमे याद कराती हैं. एक हिंदु का सामाजिक व्यवहार विश्व के सब लोगों से पृथक इन्ही भावनाओं के कारण होता है. जिन मे से विकृतियों के कारण कुछ हमारे समाज के लिए एक अभिशाप भी सिद्ध हो रहे हैं.
हरियाणा और कुछ अन्य जगहों की खाप पंचायतों द्वारा पिछले लंबे समय से सगोत्र विवाह करने वालों को हिंसक दंड दिए जाने की घटनाएं बढ़ गई हैं. इस समानांतर क़ानून व्यवस्था को कतई जायज़ नहीं कहा जा सकता, हालांकि यह लंबी बहस का मुद्दा हो सकता है कि एक ही जाति में विवाह करना कितना बड़ा ज़ुर्म है, लेकिन इसकी आड़ में होने वाली हत्याएं भी किसी क़ीमत पर जायज़ कैसे कही जा सकती हैं. वेदिक तकनीक और मनु की आचार-संहिता का पालन हो अथवा वेदिक संस्कृति की पुनर्स्थापना यह तभी संभव होंगे जब इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए गठित आर्य समाज जैसी संस्थाएं अपनी लीक से हटकर काम न करें.......देश तो वैसे भी रसातल में जा रहा है.
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हां, राठौर की सजा बढ़ गयी

समाज में अपराधियों की कमी नहीं है लेकिन लोग शांति से जीना चाहते हैं। कोई नहीं चाहता कि उसका ऐसे लोगों से पाला पड़े, जिन्होंने अपराध को अपनी जीवन-शैली के रूप में स्वीकार कर लिया है। अपराधी जब केवल अपराधी होता है, तब उससे मुकाबला करना आसान हो जाता है। क्योंकि तब पूरा समाज इस मुहिम में साथ खड़ा नजर आता है। भौतिक रूप से भले कोई सामने न आये लेकिन जब भी कोई आदमी समाज के दुश्मनों से जूझता है तो लोग भीतर ही भीतर उसके लिए प्रार्थना तो करते ही हैं।
दिन पर दिन भीरु होते समाज में अभी इतनी जान बाकी है तो भला समझिये। पुलिस, प्रशासन भी देर-सबेर ऐसी मुहिम का साथ देता ही है। परंतु अगर वह अपराधी सरकारी तंत्र में हो, पुलिस में हो, प्रशासन में हो तो बहुत मुश्किल हो जाती है। कोई साथ नहीं आना चाहता, कोई पहल नहीं करना चाहता। कौन अपनी जान सांसत में डाले? और ऐसा अपराधी अपने पद, अपनी हैसियत, अपने रसूख का इस तरह इस्तेमाल करता है कि सीधे उसकी संलिप्तता उजागर होती ही नहीं। एसपीएस राठौर ने यही किया।

अभी कुछ ही महीने पहले रुचिका का मामला जब सुर्खियों में आया था तो कितनी सारी कहानियां मीडिया में उछलीं थीं। इन कहानियों ने राठौर को एक क्रूर खलनायक के रुप में सबके दिमाग में ठूस दिया था। किस तरह उसने रुचिका के भाई को उत्पीड़ित कराया, किस तरह उसने रुचिका को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया, किस तरह उसने पूरे परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया, उन्हें मकान बेचकर भाग जाने को मजबूर कर दिया।

मीडिया की पक्षधरता ने आखिरकार पूरी व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। केंद्र सरकार तक हिल गयी और उसे कई महत्वपूर्ण फैसले करने पड़े। राठौर को मिले पदक छीन लिये गये। सीबीआई अदालत के निर्णय के बाद बाहर निकलते हुए उसके चेहरे पर जो विजय दर्प की मुस्कान उभरी थी, उसने कितना बवाल कराया था, सबको याद है। तब सभी यही अंदाज लगा रहे थे कि इस खलनायक को बड़ी सजा जरूर मिलेगी, कम से कम उम्र कैद तो होगी ही। परंतु तब भी उसकी वकील पत्नी जिस तरह के दावे ठोंक रही थी, वह अनायास नहीं था।

वह जानती थी कि उसके पति ने जो भी कराया है, उसके बहुत कम सबूत छोड़े हैं। अब जब सत्र अदालत ने राठौर को सजा सुनायी है तो इस सचाई को समझना कठिन नहीं रह गया है। कुल 18 महीने कैद की सजा। फिर भी यह सीबीआई अदालत द्वारा सुनाई गयी सजा की तीनगुनी है। यह समझा जाना चाहिए कि उसकी सजा बढ़ा दी गयी है। हालांकि अभी राठौर को आगे अपील करने का पूरा अवसर है लेकिन अगर उसे डेढ़ साल भी कैद काटनी पड़ी तो यह उस जैसे सुविधाभोगी आदमी के लिए एक दुस्वप्न की तरह होगी।

असल में ऐसे सफेदपोश अपराधियों की सजा समाज को खुद निश्चित करनी चाहिए। लोग ऐसे लोगों का संपूर्ण बहिष्कार कर सकते हैं। समाज से अलगाव की यंत्रणा बहुत कठिन होती है और यह किसी भी कैद से कई गुना भयानक होती है। राठौर को जेल की रोटी कब तोड़नी पड़ेगी, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन समाज तो उसकी सजा तुरंत शुरू कर सकता है। अभी से, आज ही से।
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ब्लोगोत्सव-२०१० में शामिल समस्त प्रतिभागियों हेतु आवश्यक सूचना

ब्लोगोत्सव-२०१० में शामिल सभी प्रतिभागियों को अवगत कराना है कि पूर्व में किये गए वायदे के मुताबिक़ ब्लोगोत्सव से जुड़े समस्त रचनाकारों को लोक संघर्ष पत्रिका की आजीवन सदस्यता मुफ्त दी गयी है .

  इस पत्रिका का नया जून-२०१० अंक प्रकाशित हो चुका है, जिसे समस्त सदस्यों को डाक से उनके पते पर प्रेषित किया जाना है .....पत्रिका के प्रबंध संपादक श्री रंधीर सिंह सुमन के द्वारा  ब्लोगोत्सव में शामिल प्रतिभागियों का पत्राचार का पता और टेलीफोन न. की मांग की गयी है .

 अत: आप सभी से निवेदन है कि जो रचनाकार ब्लोगोत्सव में शामिल हो चुके हों अथवा शामिल होने की प्रक्रिया में हों वे अपना नाम,पत्राचार का पता, टेलीफोन न. अविलंब निम्न लिखित ई-मेल आई डी पर प्रेषित करें-

पत्रिका का यह अंक आपके लिए प्राप्त करना ज्यादा  महत्वपूर्ण है,  क्योंकि इस अंक में मेरे द्वारा विगत वर्ष परिकल्पना पर २५ खण्डों में वृहद् रूप से प्रकाशित ब्लॉग विश्लेषण-२००९ का संक्षिप्त रूप ०९ पृष्ठों में प्रकाशित हुआ है शीर्षक है- "हिंदी ब्लोगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-२००९"

जो चिट्ठाकार ब्लोगोत्सव से नहीं जुड़े हैं वे इस आलेख में अपने चिट्ठे को ढूंढ सकते हैं ....जिसे इस सन्देश के साथ संलग्न किया जा रहा है .
भवदीय-
रवीन्द्र प्रभात
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आलेख : सामाजिक मीडिया का उदय : हिंदी ब्लोगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-२००९
पृष्ठ सं. १० से १८ तक
यहाँ पढ़ें :


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इंटरनेशनल दिल्‍ली हिन्‍दी ब्‍लॉगर मिलन : कुछ नाम मैं बतला रहा हूं बाकी आप पहचानें, खुद भी पहचान सकते हैं खुद को

चित्र में बांए से पहले प्रख्‍यात कार्टूनिस्‍ट इरफान, संगीता पुरी, अविनाश वाचस्‍पति, डॉ. वेद व्‍यथित, नाम बतलाएं , बागी चाचा, सुलभ सतरंगी, दूसरी कतार में बांए से प्रतिभा कुशवाहा, संजू तनेजा, आशुतोष मेहता, खुशदीप सहगल, नीरज जाट (उनसे नीचे) शाहनवाज (पीली कमीज में),नाम बतलाएं, मयंक सक्‍सेना (गले में साफा डाले , बैग उठाते हुए जय कुमार झा, इसकी पिछली कतार में बाएं से चंडीदत्‍त शुक्‍ल, ललित शर्मा, अजय कुमार झा, इनके पिछली कतार में योगेश गुलाटी, डॉ. प्रवीण चोपड़ा, लाल टी शर्ट में उमाशंकर मिश्र, लाल कमीज में राजीव तनेजा, हरी कमीज में राजीव रंजन, पवन चंदन (अजय झा के पीछे राजीव रंजन के साथ), उनके साथ रतनसिंह शेखावत, अजय यादव।
इसके अतिरिक्‍त भी जिन साथियों का चेहरा तो स्‍मरण रहा है पर नाम नहीं, कृपया वे अपना बतलाएं या साथी जन जो उन्‍हें पहचानते हों उनके नाम बतलायें।
सादर/सस्‍नेह
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राजवी फ़कीरी का राजकवि - राज लखतरवी Web-Patrika Srijangatha

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इंटरनेशनल दिल्‍ली हिन्‍दी ब्‍लॉगर मिलन - बेहद गोपनीय परंतु ओपनीय झलकियां (अविनाश वाचस्‍पति)

हुक्‍का इंतजार करता ही रह गया, ब्‍लॉगरों में से उसे कोई गुड़गुड़ाने वाला इसलिए नहीं मिला क्‍योंकि सब अपनी गुड़ जैसी मीठी बातों में मिठास का आनंद लेते रहे। 

एड़ी चोटी ब्‍लॉगर श्री उपदेश सक्‍सेना के पैर में  इस मिलन समारोह में शामिल होने के लिए अपने एक साथी के साथ आते समय राजीव चौक मेट्रो स्‍टेशन पर उतरते समय  मोच आ गई। तुरंत उन्‍हें उनके साथी की मदद से राहत मिली जो उनके साथ आ रहे थे। इसकी सूचना फोन से भाई उपदेश ने जब मुझे फोन पर दी तो मैंने तुरंत उन्‍हें वापिस लौटने और चिकित्‍सा कराने की सलाह दी। उनके एक मित्र साथ में थे, यह जानकर चिंता कम हुई, वरना मैं तो सबसे क्षमा मांग वापिस ही दौड़ पड़ता किसी को साथ लेकर।
एक अति-आवश्‍यक बैठक एकाएक होने के कारण थाईलैंड से दिल्‍ली आए  हुए श्री प्रशांत भगत मिलन समारोह में नहीं पहुंच सके परन्‍तु विदेश से भाई समीर लाल जी, अदा जी, दीपक मशाल जी के आए फोन कालों और शुभकामना संदेशों ने इस मिलन समारोह का  इंटरनेशनल जलवा कायम रखा और  ताऊजी,   शोभना चौरे इत्‍यादि   के संदेशों में उत्‍सव की सफलता की कामना की गई। शोभना चौरे के दिल्‍ली में होने पर भी न शामिल होने की विवशता इसलिए रही क्‍योंकि जिस ट्रेन में उनकी वापसी की बुकिंग थी, वो अपने नियत समय पर जाने के लिए अड़ी थी।

भाई राजीव तनेजा जी और उनका पूरा परिवार इस समारोह के आयोजन में ऐसे जुटा हुआ था जैसे उन्‍हें इस आयोजन से अच्‍छी खासी कमाई होने वाली हो और उन्‍होंने कमाई की भी परन्‍तु वो कमाई सबके द्वारा उनके जज्‍बे को सराहे जाने की थी। ऐसी कमाई में धन निवेश नहीं होता परन्‍तु मुनाफा बहुमूल्‍य होता है जबकि नकद मूल्‍य नहीं मिलता है। (एक राज की बात इसे अपने तक ही रखिएगा - इस ब्‍लॉगर मिलन में नाश्‍ता, जलपान इत्‍यादि में किया गया सारा खर्च राजीव तनेजा जी ने ही किया और बहुत आग्रह करने पर भी एक पाई तक लेने से इंकार कर दिया। वैसे आजकल पाई चलती भी कहां है जबकि जाट धर्मशाला में चारपाई मौजूद थी।

मुझे खूब याद आई जब अपने बचपन में मैं बाहर सड़क पर चारपाई बिछाकर खुले आकाश में सोता था और तब कोई भय नहीं हुआ करता था और न मच्‍छर हुआ करते थे। दिल कह रहा था अगर रात में यहीं रूकना पड़ा तो खाट बिछाकर खुले आसमान के नीचे ही सोऊंगा।

भाई अजय कुमार झा के आते ही मिलन समारोह में रौनक आ गई और सब ब्‍लॉगरों में उनसे जफ्फी पाने की होड़ लग गई। उन्‍होंने दस मिनिट बाद ही ढाई हजार रुपये का एक चैक प्रयास की बीना शर्मा जी को देने के लिए मु्झे सौंप दिया।  इसकी घोषणा समारोह में तुरंत कर दी गई।


भाई राजीव तनेजा जी ने नकद एक हजार रुपये अक्षय कत्‍यानी की मदद के ऑनलाईन ट्रांसफर के लिए मुझे सौंप दिए जिन्‍हें उनके खाते में कल ट्रांसफर कर दिया जाएगा।

राजीव तनेजा की मोटर साईकिल ने भी ब्‍लॉगर मिलन में खूब योगदान किया। इसी पर सवार होकर नांगलोई रेलवे स्‍टेशन से जाट धर्मशाला तक का सफर खुशदीप सहगल ने किया और जब उसी पर सवार इरफान भाई दिखलाई दिए तो महफूज भाई की अनुपस्थिति का गम जाता रहा। बहुत ही हसीन लम्‍हा था, वो जिसे कैमरे कैद करने से चूक गए।


साहित्‍य शिल्‍पी की टीम  भाई राजीव रंजन सहित जिस कार में बैठकर फरीदाबाद से चले थे। उसका चालक नया था और उसके चलाने के तरीके से सभी भयभीत थे। खासकर राजीव रंजन भाई। आखिर उन्‍होंने किसी एक स्‍थान पर उसे विदा किया ताकि कोई अनहोनी न हो और वहां से एक ऑटो में सवार होकर नांगलोई रेलवे स्‍टेशन पर पहुंचे। वहां पर एक और राजीव लाल रंग की शर्ट में उनके स्‍वागत के लिए मौजूद मिले। वैसे राजीव रंजन खुद भी अच्‍छे चालक हैं जब मैंने उन्‍हें कहा कि आपने चालक की सीट हथिया लेनी थी और उसे साथ वाली सीट पर बिठाकर अगर मिलन समारोह स्‍थल पर पहुंचते तो हम उसे भी एक हिन्‍दी ब्‍लॉगर ही समझते और दूसरा वो राजीव जी की ड्राइविंग से कुछ सीखता। इस पर राजीव जी ने सहमति जतलाते हुए स्‍वीकार किया कि यह विचार तो अच्‍छा है पर उनके ध्‍यान में ही नहीं आया।

कड़ी धूप के होने पर तनेजा परिवार का कड़ा सेवा भाव काबिल-ए-तारीफ रहा। मुझे तो ऐसा महसूस हुआ कि यह ब्‍लॉगर मिलन भी उनके घर पर ही हो रहा था क्‍योंकि इससे पहले अलबेला खत्री जी के दिल्‍ली आगमन पर उनके निवास पर हुए मिलन की बार बार याद आ रही थी। वैसे राजीव जी की खिड़की दरवाजों की दुकान वहीं पर है परंतु अंत में समय अधिक होने पर हम लोग वहां न जा सके परंतु किसी दिन वहां पहुच कर उनकी दुकान के साथ अपने चित्र खिंचवा कर ब्‍लॉग पर लगाऊंगा और आपसे पहचानने के लिए कहूंगा, इसलिए इस बात को याद रखिएगा।

सोच रहा हूं कि अगले ब्‍लॉगर मिलन के लिए खूब सारी चारपाईयों को भी ब्‍लॉगर मिलन में शामिल होने के लिए निमंत्रण भेज दूं पर उनकी ई मेल आई डी कहां से प्राप्‍त होगी। अगर आपके पास उपलब्‍ध हो तो अवश्‍य भिजवाएं।

ललित शर्मा, संगीता पुरी, रतन सिंह शेखावत की तरह ही मिलन के दौरान समय मिलने पर साथ-साथ बैठे ब्‍लॉगर आपसी चर्चा में मग्‍न हो जाते थे। आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि अपनी उन बातों को भी सबके साथ साझा करें ताकि कोई राज राज न रहने पाए और सबको ऐसा अहसास हो कि सब सबके साथ ही बैठे हुए थे। इसे कहते हैं कम समय में अधिक से अधिक सार्थक विमर्श। आप सभी अभी से इस नेक कार्य में  जुट जाएं।  

इसकी एक कड़ी और आ सकती है। क्‍या आप चाहते हैं ऐसी ही कुछ बातें और आपके साथ साझा की जाएं। अवश्‍य बतलाएं। 
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ब्लोगोत्सव-२०१० .....शोखियों में घोला जाये,फूलों का शबाब

आज दिनांक 24.05.2010 को परिकल्पना ब्लोगोत्सव-2010 के अंतर्गत सत्रहवें दिन प्रकाशित पोस्ट का लिंक-


ब्लोगोत्सव-२०१० : ..मॉल , यानी.....शोखियों में घोला जाये,फूलों का शबाब http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_24.html


बाघों को बेच कमा रहे अपना नाम : देवेन्द्र प्रकाश मिश्र
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_24.html


यार ये कैसी है इज्जत कांच की ?
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_6459.html


चिराग जैन की कविता : अनपढ़ माँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_21.html


बजट का क्या? देख लेंगे बाद में और फिर क्रेडिट कार्ड किस मर्ज़ की दवा है ? http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_1970.html


अरुण चन्द्र राय की दो कविताएँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_8746.html


उदारीकरण की प्रक्रिया ने हमारे देश में एक नव धनाढ्य मध्यमवर्ग को जन्म दिया है http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7203.html


अशोक कुमार पाण्डेय की कविता : माँ की डिग्रियाँ
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_3377.html


सबल और निर्बल के बीच की खाई को और चौड़ा करने की साजिश आज की मॉल संस्कृति http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_2482.html


कवि कुलवंत सिंह की कविता
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_5962.html


हमारे देश की अधिकाँश जनता की बुनियादी जरूरतें नहीं पूरी हो पातीं http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_3210.html


शील निगम की कविता
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_5962.html


यह मॉल है या कि अजायबघर है.. ?
http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_1394.html

ब्लोगिंग को विचारों का साझा मंच बनाएं, गुणवत्ता का ध्यान रखें : देवमणि पाण्डेय
http://shabd.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_24.html

पढ़िए और सुनिए श्री राजेन्द्र स्वर्णकार के द्वारा रचित और स्वरबद्ध रचना :मन है बहुत उदास रे जोगी !
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_3561.html
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धैर्य का इम्तेहान न लें

मनमोहन सिंह अभी आप को भूले नहीं हैं। उनको याद हैं आप सब। उन्हें याद है कि इसी जनता ने उन्हें कुर्सी सौंपी है। उन्हें याद है कि जनता महंगाई से बहुत परेशान है। जीवन कठिन हो गया है। चादर छोटी हो गयी है। लोग पांव ढंकते हैं तो सिर बाहर आ जाता है और सिर ढंकते हैं तो पांव खुल जाता है। देशवासियों का क्या दोष?

बड़ों की, अमीरों की, धनपतियों की बात नहीं कर रहा परंतु गरीब और मध्यवर्ग का मानुष तो वैसे ही परेशान रहता है। घर चलाना, बच्चों को पढ़ाना कोई आसान काम नहीं रहा। एक ईमानदार जिंदगी के लिए बहुत मुश्किल है। इसीलिए वे बेचारे तो हमेशा इसी कोशिश में रहते हैं कि जितनी बड़ी चादर हो, उतना ही पांव पसारें लेकिन अगर कोई उनकी चादर ही फाड़ने पर उतारू हो तो वे क्या करें। महंगाई ने यही तो किया। खाने-पीने के सामान से लेकर कपड़े, तेल, साबुन, बच्चों की किताबें, सबकी कीमतें बढ़ गयीं। छोटे दुपहिया से चलने वालों की मुश्किल तब और बढ़ गयी, जब पेट्रोल के दाम बढ़ा दिये गये।

आम आदमी एक तो महंगाई से त्रस्त था, दूसरे मनमोहन सरकार के मंत्री उसके घाव पर अपने जले-भुने बयानों का नमक छिड़कते रहे। कोई कहता कि उसके पास जादू की छड़ी नहीं है, जो छू दे और महंगाई नीचे उतर आये। कोई कहता उसे क्या मालूम महंगाई कब कम होगी, वह कोई ज्योतिषी तो है नहीं। अरे भाई, किस बात के मंत्री हो, जब तुम्हें कुछ भी नहीं पता, जब तुम कुछ भी नहीं कर सकते। अब क्या प्रधानमंत्री ज्योतिषी हैं जो उन्होंने कह दिया है कि दिसंबर तक महंगाई पर काबू कर लेंगे?

चलो इस तरह उन्होंने बहुत लंबा समय जनता से मांग लिया है। अगर उस समय भी महंगाई नीचे नहीं उतरी तो कोई न कोई वाजिब कारण तो होगा ही। जनता को पूरी ईमानदारी से बता दिया जायेगा कि महंगाई क्यों काबू में नहीं आ पायी। मनमोहन सिंह से इमानदारी की तो उम्मीद कर ही सकते हो। कई राज्यों में नक्सली सरकारों को परेशान किये हुए हैं, उन पर भी काबू करना है। वह भी कर लेंगे। बस आप थोड़ा धैर्य रखिये। जनता के पास और अस्त्र क्या है? धैर्य रखना और चुपचाप सरकारों और मंत्रियों की गैरजिम्मेदारी का खामियाजा भुगतना, जनता के ये दो महान कर्तव्य हैं और वह कहां इन्हें निभाने में कोई चूक करती है।

यह सरासर छल है, अन्याय है, प्रशासनिक नियंत्रण के अभाव का परिणाम है, समय से उचित और माकूल निर्णय न ले पाने का अंजाम है। आखिर इसका दुष्परिणाम जनता क्यों भुगते? सरकार को यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिए कि इस तरह के वादे, बहकावे बहुत लंबे समय तक नहीं चलते। जनता धैर्य तो रखती है, पीड़ाएं चुपचाप तो सहती है लेकिन समय आने पर वह ठोकर भी मारती है। और उसकी ठोकर झेलना बड़े-बड़ों के वश की बात नहीं होती। इसलिए एक नेक सलाह मानें तो आम आदमी के धैर्य का इम्तेहान न लें।
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