बुलंद छत्तीसगढ़
में कर रहे हैं
ललित शर्मा
जो चर्चाआप भी पढ़ लीजिए
आनंद मिलने की
पूरी गारंटी है
डॉ. टी एस दराल, संगीता पुरी और जी के अवधिया की चर्चा की गई है।
बुलंद छत्तीसगढ़
में कर रहे हैं
ललित शर्मा
जो चर्चाआप भी पढ़ लीजिए
आनंद मिलने की
पूरी गारंटी है

जैसा कि आप सभी को विदित है कि आगामी कुछ महीनों बाद लखनऊ में अन्तराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग उत्सव मनाने की तैयारी चल रही है और इसके क्रियान्वयन की दिशा में ब्लोगोत्सव-२०१० की टीम पूरीतरह कटिबद्ध है । उल्लेखनीय है कि ब्लोगोत्सव-२०१० में अपनी सकारात्मक टिप्पणियों तथा रचनाओं के साथ शामिल प्रमुख उद्योगपति ,चिन्तक और आर्ट ऑफ लिविंग के प्रमुख सदस्य श्री सुमन सिन्हा जी ने इस आयोजन को भव्यता के साथ संचालित करने दिशा में हर प्रकार से सहयोग करने का वचन दिया है ।
मेरे समझ से ब्लोगोत्सव-२०१० में शामिल सभी रचनाकार आज के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में सर्वाधिक अग्रणी हैं । सभी एक से बढ़कर एक हैं । सभी की रचनाएँ प्रेरणादायक और सारगर्भित है । यही वह कारण था कि बिभिन्न वर्गों से श्रेष्ठ रचनाकारों के चयन में हमारी ब्लोगोत्सव की टीम पूरे पंद्रह दिनों तक माथापच्ची करती रही, आपस में मैतेक्य बनाने का लगातार प्रयास होता रहा और मेल से सुझाव प्राप्त किये जाते रहे । कई वर्गों में दो-तीन नाम ऐसे थे जिसमें से श्रेष्ठ का आकलन कठिन था , खैर जहां हमारी टीम को नाम चयन में कठिनाई महसूस हुई वहां जानकारी जुटाकर उनकी सक्रियता और उनकी रचनाओं पर टिप्पणी को महत्व देते हुए सम्मान हेतु चयन कर अंतिम निर्णय हेतु मुझपर छोड़ दिया गया ......अब मेरे लिए वह क्षण ज्यादा पीडादायक था जब इस सम्मान के लिए मैं अपने प्रिय रचनाकारों के नाम पर विचार नहीं कर पाया । दोषी अफसरान को भाल का तिलक क्यों बनाती रहीं सरकारें
जीएमओ में कमल नाथ का क्या काम
अर्जुन की अध्यक्षता वाले जीएमओ की सिफारिश का क्या हुआ!
क्या जनता के ध्यान भटकाव के लिए गठित होते हैं जीएमओ
(लिमटी खरे)
भारत गणराज्य का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सत्तर के दशक के उपरांत
देश में नैतिकता को पूरी तरह से विस्मृत कर दिया गया है। मानवीय मूल्यों
पर निहित स्वार्थ पूरी तरह हावी हो गए हैं। कहने को भारत गणराज्य का
प्रजातंत्र समूचे विश्व में अनूठा है, पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है।
आज सत्ताधारी दल के साथ ही साथ विपक्ष ने अपने आदर्श, नैतिकता, जनसेवा पर
अपने खुद के बनाए गए स्वार्थांे को हावी कर लिया है। ''हमें क्या लेना
देना, हमारे साथ कौन सा बुरा हुआ, हम क्यों किसी के पचडे में फंसें, जनता
कौन सा खाने को देती है, कल वो हमारे खिलाफ खडा हो गया तो, हमें राजनीति
करनी है भईया, हम उनके मामले मंे नहीं बोलेंगे तो कल वे हमारे मामले में
मुंह नहीं खोलेंगे, आदि जैसी सोच के चलते भारत में राजनैतिक स्तर रसातल
से भी नीचे चला गया है।
छब्बीस साल पहले देश के हृदय प्रदेश भोपाल में हुई विश्व की सबसे भीषणतम
औद्योगिक त्रासदी के बाद उसके लिए जिम्मेदार रहे अफसरान को न केवल उस
वक्त केंद्र और सूबें में सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस ने मलाईदार
ओहदों पर रखा, वरन जब विपक्ष में बैठी भाजपा को मौका मिला उसने भी भोपाल
गैस त्रासदी के इन बदनुमा दागों को अपने भाल का तिलक बनाने से गुरेज नहीं
किया। देश की सबसे बडी अदालत में जब जस्टिस ए.एस.अहमदी ने धाराओं को बदला
तब केंद्र सरकार शांत रही। फिर उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों को
सेवानिवृत्ति के बाद मोटी पेंशन देने के बाद भी उनके पुनर्वास के लिए
उन्हें किसी निगम मण्डल, आयोग, ट्रस्ट का सदस्य या अध्यक्ष बनाने की अपनी
प्रवृत्ति के चलते इनकी लाख गलतियां माफी योग्य हो जाती हैं।
इसी तर्ज पर जस्टिस अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया
गया। क्या सरकार ने एक बारगी भी यह नहीं सोचा कि इन धाराओं को बदलकर
जस्टिस अहमदी ने भोपाल में मारे गए बीस हजार से अधिक लोगों और पांच लाख
से अधिक पीडित या उनके परिवारों के साथ अन्याय किया है। सच ही है राजनीति
को अगर एक लाईन में परिभाषित किया जाए तो ''जिस नीति से राज हासिल हो वही
राजनीति है।'' कांग्रेस या भाजपा को इस बात से क्या लेना देना था और है
कि किन परिस्थितियों में धाराओं को बदला गया।
भोपाल में न्यायालय में मोहन प्रकाश तिवारी ने जो फैसला दिया उस पर उंगली
नहीं उठाई जा सकती क्योंकि उन्होंने अपने विवेक से सही फैसला दिया है। जब
प्रकरण को ही कमजोर कर प्रस्तुत किया गया तो भारतीय कानून के अनुसार उसके
लिए जितनी सजा का प्रावधान होगा वही तो फैसला दिया जाएगा। चूंकि देश की
सबसे बडी अदालत ने पहली बार आरोप तय किए थे, तो उससे निचली अदालत उसे किस
आधार पर बदल सकती है। भारतीय काननू में यह अधिकार उपरी अदालतों को है कि
वे अपने नीचे की अदालतों के फैसलों की समीक्षा कर नई व्यवस्था दें।
जब फैसला आ चुका है, देश व्यापी बहस आरंभ हो चुकी है, तब फिर पूर्व
न्यायाधिपति को भोपाल मेमोरियल का अध्यक्ष बनाए रखने का ओचित्य समझ से
परे है। सरकार को चाहिए था कि तत्काल प्रभाव से उन्हें इस पद से हटा
देेते। मामला आईने की तरह साफ है। सबको सब कुछ समझ में आ रहा है कि दोषी
कौन है, पर ''हमें क्या करना है'' वाली सोच के चलते जनता गुमराह होती जा
रही है।
प्रधानमंत्री को भी लगा कि मामला कुछ संगीन और संवेदनशील होता जा रहा है।
देश भर में इसके खिलाफ माहौल बनता जा रहा है तो उन्होंने भी मंत्री समूह
के गठन की औपचारिकता निभा दी। इस मंत्री समूह में केंद्रीय भूतल परिवहन
मंत्री कमल नाथ को भी रखा गया है। कमल नाथ अस्सी से लगातार संसद सदस्य
हैं, चोरासी में भी वे संसद सदस्य थे। राजीव और संजय गांधी के उपरांत
प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे कमल नाथ का यह पहला
टेन्योर था सांसद के रूप में। वे मध्य प्रदेश के छिंदवाडा संसदीय क्षेत्र
से चुगे गए थे। इसके बाद वे नरसिंहराव सरकार में वन एवं पर्यवरण तथा
वस्त्र मंत्री रहे हैं। इसके बाद वाणिज्य उद्योग और अब भूतल परिवहन
मंत्री हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि बतौर सांसद मध्य प्रदेश का
प्रतिनिधित्व करने के बाद भी कमल नाथ ने आज तक भोपाल गैस कांड के लिए
क्या किया है!
इसका उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही आएगा। जब तीस सालों में उन्होंने
अपने निर्वाचन वाले सूबे में भोपाल गैस कांड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर
कुछ नहीं कहा और किया तो अब मंत्री समूह में रहकर वे क्या कर लेंगे।
वरिष्ठ पत्रकार ''आलोक तोमर'' अपनी वेव साईट में लिखते हैं कि कमल नाथ
भोपाल के गुनाहगार कैसे हैं! वे लिखते हैं कि कमल नाथ के खिलाफ एक बात
उछाली जा रही है कि वाशिंगटन में 28 जून 2007 को कमल नाथ की एक पत्र
वार्ता को उछाला जा रहा है कि जिसमें उन्होने कहा था कि डाओ केमिकल ने
यूनियन कार्बाईड को खरीद लिया है, हादसे के वक्त डाओ केमिकल अस्तित्व में
नहीं थी। वरिष्ठ राजनेता और तीस साल की सांसदी कर चुके कमल नाथ को डाओ
केमिकल का पक्ष लेने के बजाए भोपाल गैस कांड के मृतकों के परिजनों और
पीडितों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए था, जो उन्होंने किसी भी दृष्टि
से नहीं दिखाया। भोपाल कांड के मृतकों की कीमत पर डाओ केमिकल को देश में
फिर से आमद देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। हमें यह
कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह भोपाल गैस कांड के मृतकों और पीडितों
को एक गाली से कम नहीं है। आज आरोप प्रत्यारोप के कभी न थमने वाले दौर
आरंभ हो चुके हैं। भोपाल गैस कांड के फैसले से सियासी तंदूर फिर गरम होकर
लाल हो चुका है। सभी जनसेवक अब अपने अपने हिसाब से इसमें अपने विरोधियों
के खिलाफ तंदूरी रोटी सेंकना आरंभ कर चुके हैं। एक दूसरे के कपडे उतारने
वाले राजनेता यह भूल जाते हैं कि मृतकों के परिजनों और पीडितों को उनके
वर्चस्व की लडाई से कोई लेना देना चहीं है, वे तो बस न्याय चाह रहे हैं।
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान गैस राहत मंत्री बाबू लाल
गौर का जमीर भी अचानक जागा है। उन्होंने भी इस तंदूर में अपनी दो चार
रोटियां चिपका दी हैं। गौर का कहना है कि 1991 में जब वे गैस राहत मंत्री
थे तब उन्होने 9 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव को पत्र
भी लिखा था। बकौल गौर भोपाल के गैस प्रभावित 36 वार्ड के पांच लाख 58
हजार 245 गैस प्रभावितों में से महज 42 हजार 208 पीडितों को ही मुआवजा
देने की बात कही थी उस समय के मंत्री समूह ने। गौर के इस प्रस्ताव पर कि
शेष बीस वार्ड के पांच लाख 16 हजार 37 पीडितों को मुआवजा देने पर उस समय
गठित मंत्री समूह के अध्यक्ष कुंवर अर्जुन सिंह सहमत थे। बाबू लाल गौर
खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, पर वे इस बात को बताने से क्यों कतरा रहे
हैं कि उन्होंने विधायक रहते इस मामले को कितनी मर्तबा विधानसभा के पटल
पर उठाया। वे भोपाल शहर से ही विधायक चुने जाते आए हैं, वे प्रदेश के
मुख्यमंत्री भी रहे हैं, फिर उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने
विधानसभा क्षेत्र के भोपाल शहर के गैस पीडितों के लिए क्या प्रयास किए।
बाबू लाल गौर को इन बातों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री डॉ मन मोहन सिंह क्या सारे राजनेता इस बात को जानते हैं कि
पब्लिक मेमोरी (जनता की याददाश्त) बहुत ही कमजोर होती है। अमेरिका के
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर या संसद पर हमला हो या फिर देश की व्यवसायिक राजधानी
मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले की बात। हर मामले में जैसे ही
घटना घटती है, वैसे ही चौक चौराहों, पान की दुकानों पर बहस गरम हो जाती
है, फिर समय के साथ ही ये चर्चाएं दम तोड देती हैं। भोपाल गैस कांड में
भी कुछ यही हो रहा है। मामला अभी गर्म है सो कुछ न कुछ तो करना ही है।
मंत्री समूह का गठन कर जनता को भटकाना ही उचित लगा सरकार को। क्या भाजपा
के अंदर इतना माद्दा है कि वह कंेद्र सरकार से प्रश्न करे कि गैस कांड के
वक्त मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिंह की अध्यक्षता में 1991 गठित
मंत्री समूह की सिफारिशें क्या थीं, और क्या उन्हें लागू किया गया, अगर
नहीं तो अब एक बार फिर से मंत्री समूह के गठन का ओचित्य क्या है! क्या
इसका गठन मामले को शांत करने और जनता का ध्यान मूल मुद्दे से भटकाने के
लिए है। मीडिया अगर ठान ले और इस मामले को सीरियल के तौर पर चलाते रहे तो
देश प्रदेश की सरकारों के साथ ही जनसेवकों को घुटने टेकने पर मजबूर होना
पडेगा, यही गैस कांड के मृतकों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजली होगी और
न्याय की आस में पथरा चुकी पीडितों की आखों में रोशनी की किरण का
सूत्रपात हो सकेगा।
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आईएएफ ने एक बयान में कहा, 'सशस्त्र बल के सम्मानित रैंक की स्वीकृति अधिनियम के अंतर्गत भारतीय सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति से सचिन रमेश तेंदुलकर को भारतीय वायुसेना के 'ग्रुप कैप्टन' रैंक से नवाजने की सिफारिश की गई है।' बयान में कहा गया, 'आईएएफ से उनके [सचिन] जुड़ने से युवा पीढ़ी वायुसेना से जुड़कर देश की सेवा करने के लिए प्रेरित होंगे।' उधर मास्टर ब्लास्टर ने भी कहा कि वह आईएएफ परिवार से जुड़कर गौरवांवित महसूस करेंगे।
तेंदुलकर ने लंदन में बयान में कहा, 'यह बहुत बड़े सम्मान की बात है कि मुझे आईएएफ के ग्रुप कैप्टन के पद से सम्मानित करने लायक समझा गया। एक भारतीय होने के नाते मुझे वायुसेना से जुड़कर गर्व होगा और मैं इस सेना का ब्रांड एंबेसडर बनकर पूरा योगदान दूंगा।' वैसे अब तक कुल मिलाकर 21 लोगों को आईएएफ ने सम्मानित रैंक से नवाजा है लेकिन तेंदुलकर पहले खिलाड़ी हैं जिन्हें यह सम्मान देने की सिफारिश की गई है। वर्ष 2008 में विश्व कप विजेता टीम के कप्तान कपिल देव को प्रादेशिक सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल के सम्मानित रैंक से नवाजा गया था। रिकार्डो के बादशाह सचिन तेंदुलकर ने वनडे और टेस्ट क्रिकेट में कुल 93 रिकार्ड अंतरराष्ट्रीय शतक ठोके हैं और वह इन दोनों प्रारूपों में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी हैं।
यह पोस्ट डॉ. सुभाष राय जी द्वारा लिखी गई है परंतु इसे पोस्ट करने का कार्य मैंने किया है। अब यह रिपोर्ट आपके मनन के लिए पेश है। इस संबंध में इत्तेफाक रखते हुए मैं अपनी सभी पोस्टें दिल्ली पहुंचने के बाद ही लिख-प्रकाशित कर पाऊंगा। अतएव, जिज्ञासा रखते हुए धैर्य बनाए रखिएगा। >
अविनाश जी के साथ होना अपने आप में एक अनुभव है। वे जिस आत्मीयता से मिलते हैं, बांध लेते हैं। मेरे उनके परिचय के बाद यह उनकी दूसरी आगरा यात्रा है। उनकी हर यात्रा एक नयी ब्लॉगगाथा होती है। कभी-कभी मैं समझ नहीं पाता हूं कि उनकी इस ब्लॉगमयता के क्या मायने हैं। पर जब भी इस तरह की उलझन होती है, भीतर से ही जवाब आता है कि इस आदमी के भीतर एक नयी दुनिया की कल्पना है. ब्लॉगों के जरिये एक दूसरे से जुड़ते लोग विचारों की जो नयी दुनिया रच रहे हैं, उसमें इस असल दुनिया से ज्यादा अपनापन, एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने या खड़े रहने का ज्यादा गहरा भाव होगा। यह अभी से दिखता भी है। हम सभी चिंतित रहते हैं कि इस कल्पना को पंख लगने हैं तो पहले से ही सजग रहना होगा, देखना होगा कि कोई इस उड़ान पर जाल न फेंक दे, कोई बहेलिया छिप-छिपाकर इस जमात में न शामिल हो जाये जो नयी कोंपल की शक्ल में उगते सपनों को पिंजरे में कैद कर दे या उन पर छुरी चला दे।
शायद इसीलिए अविनाश जी और उनके हम जैसे तमाम मित्र यह चाहते हैं कि ब्लॉग अपनी निजी डायरी की छवि से बाहर निकले। निजी जीवन की मनोरंजक उत्तेजनाओं का जो आनंद है, ब्लॉग उससे मुक्ति पाये। जब हम दूसरों के दुख की पहचान कर पायेंगे, उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा की तरह देख पायेंगे और उन लोगों को भी पहचान सकेंगे, जो उन दुखों के अंधियारे चीरकर कुछ रोशनी करने के लिए लड़ रहे हैं, ऐसी रोशनाई की चमक मनों में चमकाना चाह रहे हैं, तभी हम ब्लॉगों में जीवन की जीवंतता, उसके संघर्ष, उसकी सफलता का चित्र उकेर सकेंगे. तभी हम सूरज की, रोशनी की बात कर पायेंगे और तभी हम विपन्नता के पायदान पर खड़े अकिंचनों को ऊपर उठाने में कामयाब होंगे। ब्लॉगलेखकों की ऐसी दृष्टि निश्चय ही चिंतन और संघर्ष की नयी चेतना जगाने में कामयाब होगी। यही तो अविनाशजी की नयी दुनिया की कल्पना है। भले ही वह आरंभ में छोटी हो पर धीरे-धीरे वह विस्तार लेगी, लोग जुड़ते जायेंगे और कारवां बनता जायेगा। ऐसा ही एक कारवां बना आगरा में. इसे ही आप चाहें तो ब्लॉगर मिलन कह सकते हैं।
सोम ठाकुर के जीवंत गीतों की प्रेरणा समझिये या डॉ. बीना शर्मा जी के प्रयासों का आकर्षण, हम सोमवार की सुबह प्रयास के आंगन में उन बच्चों के साथ थे, जिन्हें अगर प्रयास के हाथ बढ़कर नहीं थामते तो उनकी जिंदगी का अंधेरा और गहरा हो जाता। मैं था, अविनाशजी थे, सरवत जमाल साहब थे, अल्का मिश्र थीं। बच्चे सामने थे, घंटे भर बातचीत हुई। लखनऊ से आये शायर सरवत जमाल ने बच्चों को लखनऊ की तहजीब के बारे में बताया, वहां के भूगोल की जानकारी दी और उनसे वचन लिया कि वे जिंदगी में झूठ नहीं बोलेंगे, खूब पढ़ेंगे और दूसरों की मदद करेंगे। अविनाशजी ने जीवन में सद्गुणों की, अनुशासन की जरूरत पर जोर दिया। अल्काजी ने अपने आयुर्वेद के कुछ जीवंत नुस्खे बताये। धूप चढ़ रही थी, इसलिए बच्चों को छोड़ दिया गया और हम सब बीनाजी के ड्राइंग रूम में जम कर बैठे। फिर अपने आस-पास की उस दुनिया के बारे में बात हुई, जो धीरे-धीरे अपना संवेदन खो रही है। इस धारा को कैसे पलटा जाय और इसमें ब्लॉगरों का क्या योगदान हो सकता है, इस पर भी विचार हुआ। बातचीत में अविनाशजी, जमाल साहब, अल्का जी, बीनाजी के अलावा बीनाजी के पुत्र डॉ. वरुण भारद्वाज, सुधीर कुमार जी और ओम प्रकाश मखीजाजी पूरी तन्मयता से शामिल रहे। मैं भी रहा। ये सभी किसी न किसी रूप में ब्लॉग की दुनिया से जुड़े हुए हैं। तो यह ब्लॉगर मिलन ही तो रहा।
पर यह मिलन इस दायरे से बाहर भी फैला रहा। जिन लोगों को पता था कि अविनाशजी आगरा में हैं, उनमें से कुछ ने उसी समय फोन किये, जब हम विचार-विमर्श में व्यस्त थे। शशि सिंहल, शिवम् मिश्र और पाखी से प्रतिभाजी अनायास ही इस मिलन का हिस्सा बन गये । मैं उन लोगों को भी इस दायरे में शामिल करता हूं जो किसी न किसी रूप में इस आगरा चर्चा को लेकर उत्सुक रहे, जिन्होंने नुक्कड़ पर पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्शायी। उड़नतश्तरी की ओर से प्रणाम बांचा गया, वेद व्यथित और राम त्यागी की शुभकामनाओं से बल मिला और सजीव शर्मा, शशिजी तथा शिवम् की हाजिरी लगाई गयी. ये सभी एक तरह से मिलन में उपस्थित रहे. इसके अलावा घर से न निकल पाने के बावजूद डॉ. त्रिमोहन तरल हमारे साथ रहे। उनका गहराइयां ब्लॉग निजी डायरी की तरह होकर भी अपने सार्वजनीन संदेशों के कारण हमारी नजर में है। उन्हें सलाह दी गयी कि वे अपना ब्लॉग सार्वजनिक करें, ब्लॉग संयोजकों से जोड़ें। शाम होते-होते व्यंग्यकार डॉ. राकेश शरद से भी अविनाशजी की मंत्रणा हो गयी। वे व्यंग्यम् शरणम् गच्छामि नाम से ब्लॉग लिखते हैं। यह ब्लॉग यात्रा का एक पड़ाव भर है। अभी आज-कल दो दिन और अविनाशजी आगरे में हैं। उम्मीद है कि यह समय भी रचनात्मक सोच-विचार के साथ ही गुजरेगा।
अविनाशजी की यह ब्लॉगर मिलन यात्रा थमेगी नहीं अपितु 24 जून 2010 को जयपुर पहुंचेगी और हिन्दी ब्लॉग क्रांति के चतुर्दिक स्नेह की यह मिसाल ज्वाला बन कर हिन्दी ब्लॉगरों के ब्लॉगों की और उनके मन की रोशनाई बनके हिन्दीहित में अपनी संपूर्णता में दहकेगी।