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बुलंद छत्‍तीसगढ़ में ब्‍लॉग 4 वार्ता (अविनाश वाचस्‍पति)

बुलंद छत्‍तीसगढ़
में कर रहे हैं 
ललित शर्मा 
जो चर्चा 
आप भी पढ़ लीजिए 
आनंद मिलने की 
पूरी गारंटी है


















डॉ. टी एस दराल, संगीता पुरी और जी के अवधिया की चर्चा की गई है।
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प्रवासी भारतीयों की मासिक पत्रिका गर्भनाल

पढ़िए प्रवासी भारतीयों की मासिक पत्रिका गर्भनाल का जुलाई 2010 अंक http://www.garbhanal.com पर।
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एमरजेंसी पोस्‍ट : जल्‍दी पहचानिए

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क्‍या इतना ही दर्द था भोपाल गैस कांड के लिए

 

कहां गया भोपाल गैस कांड का दर्द

मंहगाई के शोर में गुम गया गैस कांड

ध्यान भटकाने, केंद्र सरकार का नायाब तरीका

विपक्ष, मीडिया सभी ने साधा मौन

सब चिंतित पर आम आदमी की चिंता किसी को नहीं

(लिमटी खरे)

भोपाल गैस कांड का फैसला आने के उपरांत मीडिया ने इसे जिस तरह से पेश किया उससे देश भर में गैस पीडितों के प्रति सच्ची हमदर्दी उपजी थी। चहुं ओर से कांग्रेस सरकार को लानत मलानत भेजने का काम किया जा रहा था। गैस कांड के प्रमुख दोषी एवं यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को देश से भगाने और गैस पीडितों के लिए कम मुआवजा दिलवाने के लिए तत्कालीन राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र और कंुवर अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार को दोषी माना जा रहा था। मीडिया की संजीदगी की वजह से मामला आग पकडने लगा था, लगने लगा था कि आने वाले दिनों में कहीं कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को शर्मसार होकर गद्दी न छोडना पड जाए।

छब्बीस साल साल पुराने मामले में जैसे ही कांग्रेस ने अपने आप को घिरता महसूस किया, उसके प्रबंधको ने तत्काल अपनी राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के कान फूंके और मंहगाई कें जिन्न को बोतल से बाहर निकालने का मशविरा दे डाला। इतिहास साक्षी है जब जब सत्ताधारी दल किसी भी मुद्दे पर घिरने की स्थिति में आते हैं, वे सबसे पहले मंहगाई को बढाने का ही उपक्रम करते हैं, क्योंकि मंहगाई का सीधा सीधा संबंध आम जनता से होता है। आम जनता जैसे ही मंहगाई को बढता देखती है, उसे सारे मामलों से कोई लेना देना नहीं रह जाता है, फिर रियाया सिर्फ और सिर्फ अपने पेट के लिए ही फिकरमंद हो उठती है।

इस बार भी यही हुआ केंद्र सरकार ने प्रट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढा दी। यद्यपि यह बात काफी समय से चली आ रही थी कि इसकी मूल्यवृद्धि अत्यावश्यक है, किन्तु मंहगाई से जुडे इस महत्वपूर्ण मामले में मूल्यवृद्धि को केंद्र सरकार ने इसलिए रोककर रखा था, कि वक्त आने पर यह ब्रम्हास्त्र चलाया जा सके। सरकार चाहे अपने कदम को न्यायोचित ठहराने के लिए जो जतन कर लें, पर यह सत्य है कि पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और मिट्टी के तेल के दाम बढाकर सरकार ने आम आदमी को जीवन यापन में और दुष्कर दिनों का आगाज करवा दिया है। लुटा पिटा आम आदमी अपने नसीब को कोसने के अलावा और कुछ करने की स्थिति मंे अपने आप को नहीं पा रहा है, क्योंकि आम आदमी के लिए लडने वाला विपक्ष भी रीढविहीन होकर सत्ताधारी दल के एजेंट की भांति ही कार्यकरता नजर आ रहा है।

सरकार इस बात से नावाकिफ हो यह संभव नहीं है कि डीजल की दरें बढाने का असर पिन टू प्लेन अर्थात हर एक चीज पर पडने वाला है। डीजल मंहगा होगा तो आवागमन मंहगा होगा, रेल बस का किराया बढेगा, माल ढुलाई बढेगी, जाहिर है बडी दरों की भरपाई कोई अपनी जेब से तो करने से रहा, तो इसकी भरपाई जनता का गला काटकर ही की जाएगी। जनसेवकों को इससे क्या लेना देना। जनसेवकों को तो ''आना फ्री, जाना फ्री, रहना फ्री, बिजली फ्री, सब्सीडाईज्ड खाना, उपर से मोटी पगार और पेंशन'' फिर भला उन्हें आम आदमी के दुख दर्द से क्या लेना देना।

आज सत्तर फीसदी जनता को दो जून की रोटी के लिए कितनी मशक्कत करनी पडती है, यह बात किसी जनसेवक को क्या और कैसे पता होगी। गरीब के घर का चूल्हा कैसे जलता है, गरीब अपने और अपने परिवार के लिए कैसे दो वक्त की रोटी का जुगाड कर पाता है, इस बात के बारे में तानाशाह शासक क्या जानें। वनों के राष्ट्रीयकरण के बाद चूल्हे के लिए लकडी जुगाडना कितना दुष्कर है, यह बात कोई गरीब से पूछे। इन परिस्थितियों में गैस कंपनियों के आताताई डीलर्स के पास से चार सौ रूपए का गैस सिलेंडर खरीदकर गरीब अपना चूल्हा जलाए तो कैसे। सरकारों चाहे वह केंद्र हो या राज्यों की, सभी को चाहिए कि पेट्रोलियम पदार्थों पर उन्होंने जो उपकर और कर लगाए हैं, उसे हटाएं सेस हटाएं, स्वर्णिम चतुर्भुज के लिए एक रूपए सेस, अस्सी के दशक में लगाया गया तीन रूपए का खाडी अधिभार, आदि अब तक जारी हैं, इन सबको तत्काल प्रभाव से अगर हटा लिया जाए तो भी आम जनता को पेट्रोल डीजल आज से सस्सा ही मिलेगा।

हम इस बात से सहमत हैं कि विपक्ष द्वारा धरना, प्रदर्शन, अनशन आदि के माध्यम से ही अपना विरोध दर्ज करा सकता है, किन्तु पिछले कुछ सालों में विपक्ष का विरोध प्रतीकात्मक ही रहा है। समय के साथ विपक्ष ने अपने विरोध की धार बोथरी कर सत्ताधारी दल के एजेंट की भूमिका ही निभाई है। नब्बे के दशक के आरंभ के उपरांत एसा कोई भी उदहारण नहीं मिलता है, जिसमें विपक्ष ने आम आदमी के लिए अहिंसा की जंग की हो। जब संसद या विधानसभा में उन्हें अपना पराक्रम दिखाने का मौका मिलता है तो वे सत्ताधारी दल के फेंकी गई रोटी के टुकडे से ''मैनेज'' हो जाते हैं।

आज के परिदृश्य को देखें तो सारी बातें साफ ही हो जाती हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को आपने पुत्र राहुल गांधी को कांग्रेस का सर्वेसर्वा बनाने की चिंता है, राहुल को उत्तर प्रदेश और बिहार पर कब्जा करने की चिंता है, उधर मायावती उत्तर प्रदेश में अपनी साख बचाने चिंतित हैं। मुलायम चिंतित हैं कि किस तरह यूपी से मायाराज को समाप्त किया जाए, अमर सिंह को चिंता सता रही है कि वे मुलायम से अपने अपमान का बदला कैसे लें, ममता बनर्जी को रेल मंत्रालय से ज्यादा चिंता पश्चिम बंगाल में सत्ता पाने की है, विपक्ष में बैठी भाजपा के नेताओं को चिंता है अपने खिसकते जनाधार की, सो वे पुराने नेताओं की घरवापसी के लिए चिंतित हैं, वहीं भाजपा का दूसरा धडा इसलिए चिंतित है कि कहीं भाजपा को पानी पी पी कर कोसने वाले नेताओं की घरवापसी न हो जाए। अब आप ही बताएं कि इस सबमें आम आदमी की चिंता किसे है! जाहिर है किसी को भी नहीं। इन परिस्थितियों में बस एक ही चारा रह जाता है कि आम आदमी को ही अब सडक पर उतरकर अपनी लडाई का परचम बुलंद करना होगा।

पेट्रोलियम पदार्थ की कीमतें बढाने के मामले में सरकार का कदम ठीक हो सकता है, पर हमारी नजर में यह समय किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है। सरकार को बिना किसी दबाव में इस निर्णय को वापस लेना चाहिए। देश में भोपाल गैस कांड के बारे में चल रही बहस को स्वस्थ्य और स्पोर्टिंग वे में लेना चाहिए। अगर कहीं कांग्रेस ने गल्ती भी की है तो उसे स्वीकारना होगा। अपनी गल्ति छिपाने के लिए तरह तरह के तर्क कुतर्क तो सभी दिया करते हैं, पर जिसके अंदर जरा भी नैतिकता होती है वह अपनी गल्ति को स्वीकारने में जरा भी नहीं हिचकता। कांग्रेस को नेतिकता दिखानी ही होगी, भले ही वह उसका प्रहसन करे। जब विपक्ष को कांग्रेस ने अपने घर की लौंडी बना लिया है, विपक्ष ज्वलंत मुद्दों पर कांग्रेस के साथ विरोध का स्वांग रचता है, देश की भोली भाली जनता सत्ता और विपक्ष में बैठे दलों के डमरू पर खुदको नचा रही हो, फिर कांग्रेस को ईमानदार होने का स्वांग रचने में भला क्या आपत्ति।

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हंगामा है क्यूँ बरपा

विवेका बाबाजी ने खुदकुशी क्या कर ली, हंगामा मचा हुआ है। मारीशस से मुंबई आयी एक लड़की देखते-देखते सुपरमाडल बन गयी और कुछ ही वर्षों में अकूत पैसा जमा कर लिया। सारी सुख-सुविधाएं, ठाट-बाट, ऐश्वर्य भोग के बाद भी आखिर क्या करे पैसे का। सो बिजिनेस में लगा दिया। यह सब कुछ ध्यान से देखें तो एक लिजलिजी कहानी की ओर संकेत जाता है। ऐसी कहानियां जिस हाई-फाई अंदाज में शुरू होती हैं, उसी तरह खत्म हो जाती हैं। जहां जीवन का मतलब केवल पैसा कमाना हो, अनहद भोग करना हो, वहां लालची निगाहें पहुंच ही जाती हैं। और पैसे के लिए जिस तरह की छीना-झपटी, बेहयाई और अपराध हमारे समाज में चारों ओर दिखायी पड़ रहा है, उसके खतरे से कोई भी मुक्त नहीं है। लेकिन जिस तरह सरकार इस मामले को लेकर सक्रिय है, पुलिस मुस्तैद है और मीडिया रोज नयी-नयी सूचनाएं जुटाने में लगा हुआ है, क्या वह एक ऐसे देश में निरर्थक सी बात नहीं  है, जहां हर साल सैकड़ों बच्चे मानसिक दबाव में खुदकुशी कर लेते हैं और हजारों किसान कर्ज में डूबकर अपनी जान दे देते हैं। दरअसल बाबाजी की खुदकुशी भी बिकाऊ माल बन गयी है। बच्चों और किसानों की खुदकुशी में वैसा गलैमर कहां?  पूरा पढ़ें
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जयपुर हिन्‍दी ब्‍लॉगर मिलन : टेलीफोन पर भी प्रसारित हुआ समाचार : आप भी सुनिए






जयपुर हिन्‍दी ब्‍लॉगर मिलन में तकनीक के एक नए पक्ष से परिचय हुआ। इसकी जानकारी व्‍यंग्‍यकार अनुराग वाजपेयी जी के माध्‍यम से मिली, जिनका यह आइडिया है। अनुराग वाजपेयी जयपुर के नामी व्‍यंग्‍यकार हैं।
उन्‍हें आप इस चित्र में देख सकते हैं और उपर दिए गए लिंक पर
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क्या अमीर दाल-रोटी नहीं खाते..?

एक पुरानी नैतिक कथा है-एक राजा धन का बहुत लालची था(हालाकि अब यह कोई असामान्य बात नहीं है).उसका खजाना सम्पदा से भरा था,फिर भी वह और धन इकट्ठा करना चाहता था.उसने जमकर तपस्या भी की.तपस्या से खुश होकर भगवान प्रकट हुए और उन्होंने पूछा -बोलो क्या वरदान चाहिए? राजा ने कहा -मैं जिस भी चीज़ को हाथ से स्पर्श करूँ वह सोने में बदल जाये. भगवान ने कहा-तथास्तु . बस फिर क्या था राजा की मौज हो गयी. उसने हाथ लगाने मात्र से अपना महल-पलंग,पेड़ -पौधे सभी सोने के बना लिए. मुश्किल तब शुरू हुई जब राजा भोजन करने बैठा. भोजन की थाली में हाथ लगाते ही थाली के साथ-साथ व्यंजन भी सोने के बन गए! पानी का गिलास उठाया तो वह भी सोने का हो गया. राजा घबराकर रानी के पास पहुंचा और उसे छुआ तो रानी भी सोने की हो गयी. इसीतरह राजकुमार को भूलवश गोद में उठा लिया तो वह भी सोने में बदल गया. अब राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने पश्चाताप में स्वयं को ही हाथ लगाकर सोने की मूर्ति में बदल लिया. कहानी का सार यह है कि लालच हमेशा ही घातक होता है और संतोषी व्यक्ति सदैव सुखी रहता है.
लेकिन हाल ही में दो अलग-अलग अध्ययन सामने आये हैं जो "संतोषी सदा सुखी" की चिरकालीन भावना को गलत ठहराते से लगते हैं.एक अध्ययन में बताया गया है कि संपन्न व्यक्ति दाल-रोटी जैसा मूलभूत भोजन नहीं करते इसलिए यदि देश में महंगाई को कम करना है तो सम्पन्नता बढ़ानी होगी क्योंकि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ेगी लोग दाल-रोटी-सब्जी खाना कम करते जायेंगे और जब इनकी मांग घट जाएगी तो इनकी कीमतें भी अपने आप कम हो जाएँगी! इस अध्ययन के मुताबिक देश की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार जितनी तेज़ होगी अनाज की खपत उतनी ही कम होगी। सुनने में यह अटपटा लगता है लेकिन रिपोर्ट कहती है कि लोगों की मासिक आमदनी जितनी ज्यादा होगी अर्थात उनकी जेब में जितना ज्यादा पैसा होगा वे उतना ही पारंपरिक दाल -रोटी के बजाए फल, मांस जैसे अधिक प्रोटीन वाले दूसरे व्यंजन खाएंगे और उससे खाद्यान्न मांग घटेगी। नेशनल काउंसिल आफ एप्लायड इकोनामिक रिसर्च (एनसीएईआर) के इस शोध मे कहा गया है, आर्थिक वृद्धि दर यदि नौ फीसद सालाना रहती है तो खाद्यान की सकल मांग जो कि 2008-09 में 20.7 करोड़ टन पर थी 2012 तक 21.6 करोड़ टन और 2020 तक 24.1 करोड़ टन तक होगी। यदि आर्थिक वृद्धि 12 फीसद तक पहुंच जाती है तो अनाज की खपत 2020 तक कम होकर 23 करोड़ टन से भी कम रह जाएगी। अगर आर्थिक वृद्धि घटकर 6 फीसद रह जाती है तो 2012 तक खाद्यान्न मांग बढ़कर 22 करोड़ टन और 2020 तक 25 करोड़ टन हो जाएगी। मूल बात यह है कि खाद्यान्न की मांग-आपूर्ति के बीच संतुलन अनुमान से संबंधित इस रिपोर्ट को कृषि मंत्रालय के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग ने तैयार करवाया है।
दूसरी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में करोड़पतियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. इस अध्ययन के मुताबिक अब देश में सवा लाख से ज्यादा करोड़पति हो गए हैं. यह बात अलग है कि संपन्न लोगों की संख्या बढ़ने के बाद भी महंगाई तो जस की तस बनी हुई है-उल्टा दाम घटने की बजाय बढ़ने की ही ख़बरें ज्यादा आ रही हैं. रही दाल-रोटी खाने की बात तो अभी तक मैंने तो अमीरों मसलन अंबानी,टाटा,मित्तल या फिर फ़िल्मी दुनिया के बड़े सितारों (जिनकी फीस ही प्रति फिल्म करोड़ों में है)जैसे शाहरुख़ खान,आमिर खान,अमिताभ बच्चन,एश्वर्या राय,काजोल इत्यादि के जितने भी साक्षात्कार(interview)पढ़े हैं उनमें इन सभी ने अपनी दैनिक खुराक में दाल-रोटी का जिक्र अवश्य किया है.फ़िल्मी दुनिया में सबसे कमनीय काया की मालकिन शिल्पा शेट्टी भी भोजन में दाल-रोटी के महत्त्व को खुलकर स्वीकार करती हैं अपनी आय बढ़ाना तो अच्छी बात है लेकिन यह बात कहाँ से आ गयी कि अमीर लोग दाल-रोटी नहीं खाते या सम्पन्नता बढ़ने से दाल-रोटी की मांग घट जाएगी? यहाँ तक कि डॉक्टर भी अपने अमीर-गरीब मरीजों को दाल-रोटी,दलिया या खिचड़ी खाने की सलाह देते हैं.इस तरह के सर्वे की मंशा कहीं आम लोगों को उनके पारंपरिक भोजन से दूर करने की तो नहीं है? या यह महंगाई घटाने का कोई नया नुस्खा है? आप क्या सोचते हैं..?
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भारत व्यर्थ के आशावाद में उलझा

भारत व्यर्थ के आशावाद में उलझा हुआ है। हिंदुस्तान के नेता यहां जिस तीखे अंदाज में बोलते हैं, पाकिस्तान की जमीन पर पहुंचते ही उनकी आवाज ठंडी हो जाती है। पता नहीं कौन सा अपनापन उमड़ आता है, किस तरह का दया भाव पैदा हो जाता है कि वे नरम पड़ जाते हैं। गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि मुंबई हमले की जांच को लेकर पाकिस्तान की मंशा पर भारत को कतई संदेह नहीं है परंतु परिणाम तो आना चाहिए। शायद उन्हें यह भय सताता रहता है कि ज्यादा सख्त हुए तो बातचीत टूट जायेगी। क्या बातचीत जारी रखने की जिम्मेदारी केवल भारत की है? पाकिस्तान चाहे जितना ऐंठता रहे, हम उसकी मनौवल करते रहेंगे, यह कौन सी बात है?

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ब्लॉगवाणी की धोकेबाजी


ब्लॉगवाणी ने तो इस बार हद ही कर दी। पहले भी कई बार ब्लॉगवाणी में परेशानियाँ आई हैं मगर इसके लिए परेशान होने वाले ब्लागरों को संचालकों ने बाकायदा सूचित किया और असुविधा के लिए खेद भी जताया, मगर इस बार तो संचालक एक अजीब सी रहस्यमय खामोशी अख्तियार कर के बैठे है। यहां वहां से उडत्ती उड़ती खबरें आती हैं ब्लॉगवाणी अब ठीक हो रहा है तब ठीक हो रहा है मगर दस दिन से ज्यादा हो गया संचालकों ने आज तक अपना मुँह नहीं खोला । यह हज़ारों ब्लॉगरों के साथ सरासर धोकेबाजी है जो ब्लॉगवाणी पर विश्वास करते है। ब्लॉगवाणी संचालकों को तुरंत सामने आकर वस्तुस्थिति से ब्लॉगरों को अवगत कराना चाहिए।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in
http://vyangyalok.blogspot.com
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आगरा-जयपुर से दिल्‍ली वापसी : मेरा दिल तो लूट लिया आगरा-जयपुर के हिन्‍दी ब्‍लॉगरों ने (अविनाश वाचस्‍पति)

अब मैं रोजाना कुछ दिन लगातार कभी इस तो कभी उस ब्‍लॉग पर यात्रा के चित्र और विवरण पेश करूंगा। ब्‍लॉगवाणी भी आजकल खर्राटे भरकर सो रही है, तो सोने दो। आपका चिट्ठाजगत तो है। नहीं हो चिट्ठाजगत भी। तब भी एक बात गांठ बांध लें कि
जीवन रूकता नहीं है किसी के जाने या आने से।
जीवन सदा चलता रहता है कभी इस तो कभी उस बहाने से।
कितना भी बहा तो विचारों का दरिया।
कभी चुकता नहीं है पानी नल खुला छोड़कर जाने से।
रहेगा बहेगा तो इसी धरती पर, विचारों का दरिया है इसे समा जाने दो धरती के सीने में।
सोता बनकर निकलेगा ऊर्जा का, हमारे सबके दिमागों से।
बादलों को पहचानिए, कहां के बादल हैं हम

अपनी इस यात्रा के किस्‍से आपके लिए कल से पेश करूंगा। आप पढ़ना चाहें तो मेरे ब्‍लॉग खंगाल सकते हैं। आगरा में 19 जून से लेकर 23 जून 2010 तक रहा। कई नए ब्‍लॉग शुरू हुए। कई नेक लोग सक्रिय हुए। उन सबकी दास्‍तां शुरू होने ही वाली है। आगरा में डॉ. सुभाष राय जी के साथ मुलाकात का जो सफर शुरू हुआ, उसका सचित्र विवरण भी अगली पोस्‍टों में मिलेगा। सुभाष जी के साथ प्रत्‍येक मुलाकात एक नई तरंग लाई। उस तरंग का रंग किस किस पर चढ़ा, आप पढ़ेंगे। आपके मन भी निराले रंगों से रंगे मिलेंगे।


जयपुर पहुंचा - वहां पर जो मुलाकातें शुरू हुईं हरिप्रसाद शर्मा जी से, वे संपन्‍न हुईं व्‍यंग्‍यकार अनुराग वाजपेयी जी के साथ। बीच-बीच में जो सफर के साथी बने, उनसे रूबरू होने के लिए आप भी तैयार रहें। इस यात्रा में जो आनंद आया उसे सबके साथ लुटाने के लिए तैयार बैठा हूं।

मेरी इस यात्रा के साथी मेरा परिवार, मेरी कार, पवन चंदन का कैमरा, नई लेनोवा की एस 10-3 नेटबुक, दो मोबाइल फोन वगैरह रहे। सब अपनी दास्‍तां अपने निराले अंदाज में ब्‍यां करेंगे।
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कला के माध्यम से ही हम समाज को सकारात्मक दिशा में मोड़ सकते हैं: सुमन सिन्हा

जैसा कि आप सभी को विदित है कि आगामी कुछ महीनों बाद लखनऊ में अन्तराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग उत्सव मनाने की तैयारी चल रही है और इसके क्रियान्वयन की दिशा में ब्लोगोत्सव-२०१० की टीम पूरीतरह कटिबद्ध है । उल्लेखनीय है कि ब्लोगोत्सव-२०१० में अपनी सकारात्मक टिप्पणियों तथा रचनाओं के साथ शामिल प्रमुख उद्योगपति ,चिन्तक और आर्ट ऑफ लिविंग के प्रमुख सदस्य श्री सुमन सिन्हा जी ने इस आयोजन को भव्यता के साथ संचालित करने दिशा में हर प्रकार से सहयोग करने का वचन दिया है ।


अचानक दिनांक २४.०६.२०१० को श्री सुमन सिन्हा जी का मेल मुझे प्राप्त हुआ कि मैं कल यानी २५.०६.२०१० को इंडिगो की फलाईट से मुम्बई से चलकर लखनऊ आ रहा हूँ और आपके साथ एक संक्षिप्त बैठक करना चाहता हूँ , ताकि कार्यक्रम को संपादित करने की दिशा में किसी निर्णय पर पहुंचा जा सके ।


जिस समय सूचना मिली मैं भी लखनऊ से बाहर था , किन्तु मिलने की आतुरता और सुयोग बन जाने के कारण यह सकारात्मक मुलाक़ात संभव हुई ।


अन्तराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग उत्सव-२०१०
की पहली तैयारी बैठक में मेरे साथ ब्लोगोत्सव के सांस्कृतिक सलाहकार श्री जाकिर अली रजनीश और लोक संघर्ष के श्री रणधीर सिंह सुमन उपस्थित थे । ज्ञातब्य हो कि श्री सुमन सिन्हा जी के समक्ष कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गयी तथा कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों से उन्हें अवगत कराया गया, साथ ही उन्हें इस कार्यक्रम के संभावित बज़ट की जानकारी भी दी गयी । इस तैयारी बैठक में उनके द्वारा कई सुझाव सभा पटल पर रखे गए तथा आगे की रणनीति पर व्यापक चर्चा की गयी ।
उनके द्वारा दिए गए सुझाव में प्रमुख था , कि इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में आर्ट ऑफ लिविंग से संवाधित कार्यक्रम भी हो और प्रत्येक सत्र की शुरुआत से पूर्व १० या १५ मिनट मेडिटेशन के लिए सुरक्षित रखा जाए , ज्यादा से ज्यादा नए और युवा चिट्ठाकारों को शामिल किया जाए । सम्मान समारोह की भव्यता पर विशेष ध्यान दिया जाए......आदि । लीजिये पढ़िए उन्ही के शब्दों में कि उन्होंने क्या कहा ?

"निश्चित रूप से अन्तराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग उत्सव मनाने की ये पहल प्रशंसनीय है . मैं इस पहल का स्वागत करता हूँ और इसके क्रियान्वयन में अपनी सकारात्मक सहभागिता का विश्वास दिलाता हूँ .साथ ही रविन्द्र जी को एक सुझाव भी देना चाहता हूँ कि परिकल्पना के माध्यम से एक ऐसा कार्यक्रम अंतरजाल पर चलाया जाए जिसमें ज्यादा से ज्यादा बच्चों की सहभागिता सुनिश्चित हो तथा उन्हें कला और संगीत की सही तालीम देते हुए समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाया जा सके, क्योंकि कला के माध्यम से ही हम समाज को सकारात्मक दिशा में मोड़ सकते हैं ..........

................सुमन सिन्हा "

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कलम की सूली पर

अगर आप को राजनीति करनी है तो यह बात ठीक से समझ लेनी होगी कि दलगत हित में अनेक अवसरों पर आप सहर्ष युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र की भूमिका का निर्वाह करेंगे। कभी अर्धसत्य बोलना पार्टी के लिए फायदेमंद होगा, तो आप को नरो वा कुंजरो की शैली अख्तियार करनी होगी, भले ही आप सच जानते हों। कई बार ऐसे मौके भी आयेंगे, जब आप को झूठ बोलना होगा क्योंकि उस समय वही पार्टी का भला करने वाला होगा। इतना ही नहीं उन हालातों से भी आप रूबरू होंगे, जब आंखें खुली होते हुए भी आप को कुछ नहीं दिखायी पड़ने का नाटक करना होगा।

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वहुप्रतिक्षित परिकल्पना सम्मान की उद्घोषणा शीघ्र



जैसा कि आप सभी को विदित है कि विगत १५ अप्रैल को परिकल्पना पर ब्लोगोत्सव-२०१० की भव्य शुरुआत हुई थी । उल्लेखनीय है कि पहली बार इंटरनेट पर इसप्रकार का अनोखा प्रयोग हुआ है और यह उत्सव हिंदी ब्लॉग जगत के लिए कामयाबी की एक नयी परिभाषा गढ़ने में समर्थ हुआ है . ब्लोगोत्सव के समूचे परिदृश्य को लोकसंघर्ष पत्रिका द्वारा एक आकर्षक विषेशांक का स्वरुप प्रदान किया जा रहा है ताकि दस्तावेज के रूप में सुरक्षित रखा जा सके और इस उत्सव से जुड़े प्रतिभागियों को एक नया आयाम प्रदान किया जा सके . इसी अनुक्रम में आगामी कुछ महीने बाद लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग उत्सव की परिकल्पना की जा रही है, जिसमें ब्लोगोत्सव-२०१० में शामिल ५० श्रेष्ठ चिट्ठाकारों को सम्मानित किये जाने की योजना है । इस दिशा में कई बैठकें हो चुकी है और यह प्रक्रिया भी अपने आखिरी और निर्णायक दौर में है ।
मेरे समझ से ब्लोगोत्सव-२०१० में शामिल सभी रचनाकार आज के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में सर्वाधिक अग्रणी हैं । सभी एक से बढ़कर एक हैं । सभी की रचनाएँ प्रेरणादायक और सारगर्भित है । यही वह कारण था कि बिभिन्न वर्गों से श्रेष्ठ रचनाकारों के चयन में हमारी ब्लोगोत्सव की टीम पूरे पंद्रह दिनों तक माथापच्ची करती रही, आपस में मैतेक्य बनाने का लगातार प्रयास होता रहा और मेल से सुझाव प्राप्त किये जाते रहे । कई वर्गों में दो-तीन नाम ऐसे थे जिसमें से श्रेष्ठ का आकलन कठिन था , खैर जहां हमारी टीम को नाम चयन में कठिनाई महसूस हुई वहां जानकारी जुटाकर उनकी सक्रियता और उनकी रचनाओं पर टिप्पणी को महत्व देते हुए सम्मान हेतु चयन कर अंतिम निर्णय हेतु मुझपर छोड़ दिया गया ......अब मेरे लिए वह क्षण ज्यादा पीडादायक था जब इस सम्मान के लिए मैं अपने प्रिय रचनाकारों के नाम पर विचार नहीं कर पाया ।
परिकल्पना सम्मान-२०१० हेतु विभिन्न वर्गों से ५० चिट्ठाकारों के नाम -चयन का कार्य लगभग पूरा हो चुका है । अगले महीने के प्रथम सप्ताह में हम वहुप्रतिक्षित परिकल्पना सम्मान की उद्घोषणा परिकल्पना पर करने जा रहे हैं
() रवीन्द्र प्रभात
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सांप के भागने के बाद लकीर तक नहीं पीटी जनसेवकों ने!


सुस्सुप्तावस्था के 26 साल

वोट बैंक की खातिर अब घडियाली आंसू बहा रहे हैं नेता

एंडरसन को लाने के बजाए देश के दोषियों को डाला जाए जेल में

आखिर क्यों खामोश हैं कांग्रेस की राजमाता

(लिमटी खरे)

अस्सी के दशक तक माध्यमिक शिक्षा के अध्ययन के दरम्यान प्राणी विज्ञान विषय मंे मेंढक के बारे में सविस्तार पढाया जाता था। मेंढक बारिश में पूरी तरह सक्रिय हो जाते हैं फिर उसके बाद शनैः शनैः वे निष्क्रीय होने लगते हैं। साल में कुछ माह एसे होते हैं, जिनमें मेंढक न कुछ खाते हैं न पीते हैं, बस पडे रहते हैं, यह कहलाती है ''सुस्सुप्तावस्था''। आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य की सरकारें रीढ विहीन विपक्ष दोनों ही दुनिया की अब तक की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी 'भोपाल गैस कांड' के छब्बीस साल बीतने तक सुस्सुप्तावस्था में रहे। इसका फैसला आने के बाद फिर इन दोनों ही बिरादरी के मेंढकों ने अपना मुंह खोला और बारिश की फुहार होते ही टर्राना आरंभ कर दिया है।

कितने आश्चर्य की बात है कि बीस हजार लोगों को असमय ही मौत के मुंह में ढकेलने और लाखों को स्थाई या आंशिक अपंग और बीमार बनाने के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को भारत सरकार के नुमाईंदे, अखिल भारतीय पुलिस और प्रशासनिक सेवा के मध्य प्रदेश काडर के अधिकारी तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिह और जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी दोनों ही सरकारी वाहन में उस हत्यारे के चालक परिचालक बनकर उसे राजकीय अतिथि के मानिंद विमानतल तक छोडने गए। सभी ने इस तरह के फुटेज निजी समाचार चेनल्स में देखे हैं।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी छोटी मोटी बात को तानकर चद्दर बनाने वाले राजनेताओं ने छब्बीस साल तक इस मामले में मौन साधे रखा था। किसी ने इसमें हताहत हुए या जान गंवा चुके लोगों की सुध नहीं ली। न्यायालय ने चाहे जो सजा दी है, किन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी और मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह तो इस मामले में जनता के कटघरे में दोषी सिद्ध हो चुके हैं। मामला आईने के मानिंद साफ है कि कांग्रेस के सर्वेसर्वा रहे नेहरू गांधी परिवार की चौथी पीढी के पायोनियर स्व.राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र और कांग्रेस की ही कुंवर अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार ने हत्यारे वारेन एंडरसन को सुरक्षित भारत से बाहर जाने के मार्ग प्रशस्त किए थे।

1984 के गैस हादसे के उपरांत के घटनाक्रम से साफ हो जाता है कि कार्पोरेट जगत में यह संदेश साफ तौर पर चला गया कि जहरीले कीटनाशकों का करोबार करने वाली अंतर्राष्ट्रीय फर्म चाहें तो अपनी लापरवाही के बाद हजारों हत्याएं और लाखों को मजबूर बनने के बाद भी पैसे के दम पर साफ बचकर निकल सकते हैं। भारत गणराज्य की नपुंसक तत्कालीन कांग्रेस सरकार और मध्य प्रदेश की सरकार ने अपनी रियाया के प्रति जवाबदेही दर्शाने के बजाए आरोपी गोरी चमडी वालों की जवाबदेही को ढांकने का ही प्रयास किया, जो निंदनीय है। 1992 में विश्व विकास प्रतिवेदन मेें अमेरिका के लारेंस समर्स ने प्रस्तवा दिया था कि प्रदूषणकारी उद्योगों को तीसरी दुनिया अर्थात गरीब या अविकसित देशों की ओर भेज वहां की अर्थव्यवस्था को सुद्रढ किया जाए। दरअसल यह अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाए अपने देशों को प्रदूषण से मुक्त करने का कुत्सित प्रयास था, जिसे हिन्दुस्तान के तानाशाह शासक नहीं समझ सके।

आज मीडिया सहित सभी लोग इस बात पर अडिग हैं कि नब्बे के पेटे में जी रहे वारेन एंडरसन को भारत लाया जाए। भारत को अमेरिका के साथ की गई प्रत्यार्पण संधि के तहत अब तक यह कदम उठा लेना चाहिए था, किन्तु ''समरथ को कहां दोष गोसाईं।'' अमेरिका दुनिया का चौधरी है, भारत उससे दबता है, डरता है, दहशत खाता है, यह बात सत्य है। यही कारण है कि अमेरिका के सामने वह उंची आवाज में बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। एंडरसन को भारत नहीं लाया गया और भविष्य में भी उसके आने की संभावनाएं बहुत बलवती नहीं प्रतीत होती हैं, फिर सवाल यह उठता है कि एंडरसन को भारत से भगाने के लिए दोषियों के मामले में केंद्र सरकार मौन क्यों साधे हुए है। क्या वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह सहित कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का यह दायित्व नहीं बनता है कि वे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह से जोर डालकर इस बात को पूछें कि आखिर कौन था जिसने हजारों लाखों लोगों की हत्या और बीमार होने के दोषी एंडरसन को भारत से भगाया! जाहिर सी बात है दोनों ही कुंवर अर्जुन सिंह से यह बात पूछने का साहस नहीं कर पाएंगे, क्योंकि अगर कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी गाडी का स्टेयरिंग तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी के पति स्व.राजीव गांधी की ओर कर दिया तब क्या होगा। बस इतनी सी बात से खौफजदा होकर कांग्रेस चुपचाप बैठी अपनी भद्द पिटवा रही है।

भोपाल गैस कांड के उपरांत सरकारी मशीनरी द्वारा उठाए गए हर कदम को ''विचित्र किन्तु सत्य'' की श्रेणी में रखा जा सकता है। 1996 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूरे मामले को कमजोर कर दिया, आरोपों की लीपापोती कर दी गई और सीबीआई चुपचाप सब कुछ देखती सुनती रही। कांग्रेस का जमीर तो देखिए कितना गिर गया, उसने सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्याधीश जस्टिस ए.एम.अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट अस्पताल का प्रमुख बना दिया। इतना ही नहीं भाजपा ने कुछ घंटों के लिए एंडरसन के सारथी और बाडी गार्ड बने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को राज्यमंत्री का दर्जा दिया। जब बात उछली तो उन्हें हटा दिया गया। बाद में स्वराज पुरी को कांग्रेस ने एंडरसन को भगाने का पारितोषक दे दिया। मनरेगा में पुरी की नियुक्ति एमीनंेट सिटीजन के तौर पर कर दी गई। आखिर यह सब कुछ कर कांग्रेस और भाजपा क्या संदेश देना चाहती हैं, यह बात समझ से परे ही है। विदेश यात्रा से लौटने पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि इस हासदे के लिए व्यवस्था नहीं व्यक्ति दोषी है! जिसका जो मन आ रहा है दे रहा है वक्तव्य जमा कर। विज्ञप्तिवीर, और बयानवीर नेताओं की सेनाएं सज चुकी हैं, चारों तरफ से बयान और विज्ञप्तियों के तीरों की बौछारें हो रहीं हैं। देश की जनता विशेषकर गैस से प्रभावित लोगों के परिवार अवसाद में जा रहे हैं, पर किसी को इस बात की कोई परवाह नहीं है।

देखा जाए तो भोपाल गैस पीडितों के लिए सरकार के अब तक के प्रयास नाकाफी ही हैं। राजधानी भोपाल का कमला नेहरू चिकित्सालय बनने के बाद कितने दिनों तक शोभा की सुपारी बना रहा। हमीदिया अस्पताल के छोटे से मिक वार्ड में ठसाठस भरे कराहते मरीजों ने न जाने कितने दिनों तक हिटलर के गेस चेम्बर की यातना भोगी है। वस्तुतः देखा जाए तो यूनियन कार्बाईड के संयत्र का विषेला कचरा अभी तक हटाया नहीं गया है। इतना ही नहीं आसपास के रहवासियों को आज भी पीने का साफ पानी मुहैया नहीं है। छब्बीस सालों में भी अगर कांग्रेस और भाजपा ने सत्ता की मलाई खाने के बाद भी गैस पीडितों के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए हैं तो उन्हें सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार कतई नहीं है। हमारे कहने से क्या होता है, आज मोटी चमडी वाले जनसेवकों को तो यह भी पता नहीं है कि नैतिकता किस चिडिया का नाम है।

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मुनव्वर राणा की एक गजल

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क्या हो गया नेहरू गांधी की कांग्रेस को!

 

वर्तमान कालिख पोत रहा है कांग्रेस के स्वर्णिम इतिहास पर

हजारों के कातिल एंडरसन के बाडीगार्ड को उपकृत करने में जरा भी नहीं शर्माई कांग्रेस

मनरेगा का एमीनंेट सिटीजन बनाया स्वराज पुरी को

(लिमटी खरे)

''भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका किसने निभाई? भारत गणराज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सत्तर के दशक तक ईमानदारी तक किसने प्रयास किया? देश को विकास के पथ पर कौन ले जाने प्रयासरत रहा है? भारत पर जान न्योछावर करने वाले  सच्चे वीर सपूत किस दल से संबद्ध थे?'' इन सारे जवाबों का एक ही उत्तर आता है और वह है ''कांग्रेस''। वर्तमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चेहरा इससे उलटा ही दिख रहा है। अस्सी के दशक के उपरांत की कांग्रेस ने सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का मौखटा अवश्य ही लगाया हुआ है, पर वह काम अपने मूल आदर्श और उद्देश्यों से हटकर ही कर रही है। सच ही कहा है ''जब नास मनुस का छाता है, तब विवेक मर जाता है।'' कांग्रेस के साथ भी कुछ इसी तरह का हो रहा है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कांग्रेस का विवेक, आत्म सम्मान और स्वाभिमान या तो मर चुका है, या फिर उसने विदेशियों के हाथों गिरवी रख दिया है।

भोपाल गैस कांड के घटने के बाद छब्बीस साल तक वही कांग्रेस जिसने देश पर आधी सदी से ज्यादा राज किया है, अनर्गल उल जलूल हरकतों पर उतारू हो गई है। कांग्रेस के कदम देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि देश में अब प्रजातंत्र नहीं बचा है, देश में हिटलर शाही हावी हो चुकी है। कांग्रेस को जो मन में आ रहा है, वैसे फैसले ले रही है, बिना रीढ का विपक्ष भी आंखों पर पट्टी बांधकर चुपचाप देशवासियों के साथ अन्याय हो सह रहा है। वामदल हों या भाजपा या और किसी दल के सियासी नुमाईंदे सभी मलाई खाने को ही अपना प्रमुख धर्म मानकर काम करने में जुटे हुए हैं, आवाम के दुख दर्द से किसी को कुछ भी लेना देना नहीं रहा है। रियाया मरती है तो मरती रहे, हम तो नोट छाप रहे हैं, जिसको जो सोचना है, सोचता रहे हम तो शतुर्मुग के मानिंद अपना सर रेत में गडाकर यह सोच रहे हैं कि हमें कोई देख नहीं रहा है।
 


2 और 3 दिसंबर 1984 में देश के हृदय प्रदेश में घटे भोपाल गैस हादसे में बीस हजार से अधिक लोग असमय ही काल कलवित हो गए थे, पांच लाख से ज्यादा प्रभावित या तो अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं या फिर घिसट घिसट कर जीवन यापन करने पर मजबूर हैं, पर जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। लेना देना हो भी तो क्यों, उनका अपना कोई सगा इसमें थोडे ही प्रभावित हुआ है। देश की जनता की जान की कीमत इन सभी जनसेवकों के लिए कीडे मकोडों से ज्यादा थोडे ही है। मोटी चमडी वाले जनसेवकों ने तो भोपाल हादसे में मारे गए लोगों के शवों पर सियासी रोटियां सेकने से भी गुरेज नहीं किया। छब्बीस साल तक गैस पीडित अपना दुखडा लेकर सरकारांे के सामने गुहार लगाते रहे पर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई है। अब जब फैसला आ गया है तब सारे दलों के लोगों का जमीर जागा है, वह भी जनता को लुभाने और दिखाने के लिए, अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए।

भोपाल गैस कांड के प्रमुख आरोपी वारेन एंडरसन को भारत लाकर उसकी सुरक्षित वापसी में प्रत्यक्षतः प्रमुख भूमिका वाले भोपाल के तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी को प्रदेश में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी ने पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्ति के बाद मध्य प्रदेश में नर्मदा घटी विकास प्राधिकरण में शिकायत निवारण अथारिटी में पदस्थ कर राज्य मंत्री का दर्जा देकर उपकृत किया, अब किस मुंह से भाजपा गैस पीडितों के लिए लडने का दावा कर रही है यह बात समझ से ही परे है। 14 जून को मीडिया ने जब पूर्व मुख्यमंत्री सुंदर लाल पटवा से यह सवाल किया तब भाजपा का जमीर जगा और 15 जून को स्वराज पुरी को उनके पद से हटा दिया गया।

सेवानिवृत वरिष्ठ नौकरशाहों पर पता नहीं क्यों जनसेवक और सरकारें मेहरबान रहा करती हैं। हो सकता है कि सेवाकाल में जनसेवकों के अनैतिक कामों को अंजाम देने के बदले में उन्हें सरकारों द्वारा इस तरह का पारितोषक दिया जाता हो। मध्यप प्रदेश की भाजपा सरकार ने स्वराज पुरी को उनके पद से प्रथक किया तो ''तेरी साडी मेरी साडी से सफेद कैसे'' की तर्ज पर केद्र में सत्तारूढ कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एंडरसन के ''बाडी गार्ड'' रहे स्वराज पुरी को हाथों हाथ ले लिया है। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की पसंद बने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने स्वराज पुरी को महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में एमिनेंट सिटीजन बना दिया गया है। स्वराज पुरी की नियुक्ति दो वर्षों के लिए की गई है।

खबर है कि पुरी सहित पांच दर्जन से अधिक लोगों की नियुक्ति इस पद पर की गई है। इनका काम मनरेगा की जमीनी हालातों का जायजा लेकर केंद्र को रिपोर्ट सौंपना है। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री जोशी ने सभी सूबों के ग्रामीण विकास मंत्रियों को पत्र लिखकर न केवल इनकी नियुक्ति की सूचना दी है, वरन् पुरी सहित अन्य सिटीजन्स को उनके भ्रमण के दौरान आवश्यक सहयोग और सुविधाएं भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। चूंकि पुरी पर मध्य प्रदेश में दबाव है, अतः उन्हें छत्तीसगढ के राजनांदगांव का प्रभार सौंपा गया है।

आवाम ए हिन्द (भारत गणराज्य की जनता) की स्मृति से अभी यह विस्मृत नहीं हुआ है कि चंद दिनों पहले ही समाचार चेनल्स ने गैस कांड के प्रमुख आरोपी वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी के प्रहसन और उसके बाद एंडरसन के ''बाडीगार्ड'' और ''सारथी'' बनकर सरकारी वाहन में तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह के साथ विमानतल तक पहुंचाने और राजकीय अतिथि के मानिंद उसे भगाने के फुटेज दिखाए गए थे। जनता के मन मस्तिष्क में कांग्रेस और भाजपा के प्रति यह सब देख सुनकर भावनाएं किस तरह की होंगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

कांग्रेस का इतिहास अस्सी के दशक तक स्वर्णिम माना जा सकता है। अस्सी के दशक के उपरांत जब स्व.राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा आम जनता के लिए भेजे गए एक रूपए में से चंद पैसे ही जनता के हित में खर्च हो पाते हैं। जब भारत गणराज्य जैसे शक्तिशाली देश का वजीरेआजम ही इस तरह की बात को स्वीकार करे वह भी सार्वजनिक तौर पर तो क्या कहा जा सकता है। इसका मतलब साफ है कि कांग्रेस के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार की जडों में खाद और पानी तबियत से डाला गया है। एक समय था जब सरकारी कार्यालयों में दप्तियां चस्पा होती थीं, जिन पर लिखा होता था, ''घूस (रिश्वत) लेना और देना अपराध है, घूस लेने और देने वाले दोनों ही पाप के भागी हैं।'' कालांतर में इस तरह के जुमले इतिहास की बात हो चुके हैं। नैतिकता आज दम तोड चुकी है, हावी हैं तो निहित स्वार्थ।

रीढ विहीन विपक्ष भी अपनी बोथली धार लिए सत्तापक्ष से युद्ध का स्वांग रच रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीन दशकों से चल रही ''नूरा कुश्ती'' से जनता उब चुकी है। अब विपक्ष की कथित हुंकार सुनकर जनता को उबकाई आने लगी है। बीस हजार लोगों के कातिल वारेन एंडरसन के बाडीगार्ड को भाजपा ने अपनी दहलीज से भगाया तो उसी स्वराज पुरी को उपकृत करने में जरा भी नहीं शर्माई कांग्रेस, और पुरी को नियुक्त कर दिया मनरेगा का एमीनंेट सिटीजन, वह भी दो साल के लिए। आज जनता जनार्दन के मानस पटल पर यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक ही है कि नेहरू गांधी के सिद्धांतो पर चलने वाली कांग्रेस को अचानक क्या हो गया है?

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चीन से सावधान रहें

चीन ने भारत के खिलाफ हमेशा पाकिस्तान को उकसाने का काम किया है। भारत कभी उसकी इन हरकतों का खुलकर विरोध नहीं करता। लगता है कि इतने वर्षों बाद भी अभी हमारे मनोमस्तिष्क से 62 का डर निकला नहीं है। चीन के आक्रामक रवैये को हम चुपचाप बर्दाश्त कर जाते हैं। पूरा पढ़ें
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भोपाल गैस कांड के तंदूर पर रोटियां सेंकने से बाज आंए राजनेता

समझ से परे है सरकार का अहमदी प्रेम

दोषी अफसरान को भाल का तिलक क्यों बनाती रहीं सरकारें

जीएमओ में कमल नाथ का क्या काम

अर्जुन की अध्यक्षता वाले जीएमओ की सिफारिश का क्या हुआ!

क्या जनता के ध्यान भटकाव के लिए गठित होते हैं जीएमओ

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सत्तर के दशक के उपरांत
देश में नैतिकता को पूरी तरह से विस्मृत कर दिया गया है। मानवीय मूल्यों
पर निहित स्वार्थ पूरी तरह हावी हो गए हैं। कहने को भारत गणराज्य का
प्रजातंत्र समूचे विश्व में अनूठा है, पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है।
आज सत्ताधारी दल के साथ ही साथ विपक्ष ने अपने आदर्श, नैतिकता, जनसेवा पर
अपने खुद के बनाए गए स्वार्थांे को हावी कर लिया है। ''हमें क्या लेना
देना, हमारे साथ कौन सा बुरा हुआ, हम क्यों किसी के पचडे में फंसें, जनता
कौन सा खाने को देती है, कल वो हमारे खिलाफ खडा हो गया तो, हमें राजनीति
करनी है भईया, हम उनके मामले मंे नहीं बोलेंगे तो कल वे हमारे मामले में
मुंह नहीं खोलेंगे, आदि जैसी सोच के चलते भारत में राजनैतिक स्तर रसातल
से भी नीचे चला गया है।

छब्बीस साल पहले देश के हृदय प्रदेश भोपाल में हुई विश्व की सबसे भीषणतम
औद्योगिक त्रासदी के बाद उसके लिए जिम्मेदार रहे अफसरान को न केवल उस
वक्त केंद्र और सूबें में सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस ने मलाईदार
ओहदों पर रखा, वरन जब विपक्ष में बैठी भाजपा को मौका मिला उसने भी भोपाल
गैस त्रासदी के इन बदनुमा दागों को अपने भाल का तिलक बनाने से गुरेज नहीं
किया। देश की सबसे बडी अदालत में जब जस्टिस ए.एस.अहमदी ने धाराओं को बदला
तब केंद्र सरकार शांत रही। फिर उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों को
सेवानिवृत्ति के बाद मोटी पेंशन देने के बाद भी उनके पुनर्वास के लिए
उन्हें किसी निगम मण्डल, आयोग, ट्रस्ट का सदस्य या अध्यक्ष बनाने की अपनी
प्रवृत्ति के चलते इनकी लाख गलतियां माफी योग्य हो जाती हैं।

इसी तर्ज पर जस्टिस अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया
गया। क्या सरकार ने एक बारगी भी यह नहीं सोचा कि इन धाराओं को बदलकर
जस्टिस अहमदी ने भोपाल में मारे गए बीस हजार से अधिक लोगों और पांच लाख
से अधिक पीडित या उनके परिवारों के साथ अन्याय किया है। सच ही है राजनीति
को अगर एक लाईन में परिभाषित किया जाए तो ''जिस नीति से राज हासिल हो वही
राजनीति है।'' कांग्रेस या भाजपा को इस बात से क्या लेना देना था और है
कि किन परिस्थितियों में धाराओं को बदला गया।

भोपाल में न्यायालय में मोहन प्रकाश तिवारी ने जो फैसला दिया उस पर उंगली
नहीं उठाई जा सकती क्योंकि उन्होंने अपने विवेक से सही फैसला दिया है। जब
प्रकरण को ही कमजोर कर प्रस्तुत किया गया तो भारतीय कानून के अनुसार उसके
लिए जितनी सजा का प्रावधान होगा वही तो फैसला दिया जाएगा। चूंकि देश की
सबसे बडी अदालत ने पहली बार आरोप तय किए थे, तो उससे निचली अदालत उसे किस
आधार पर बदल सकती है। भारतीय काननू में यह अधिकार उपरी अदालतों को है कि
वे अपने नीचे की अदालतों के फैसलों की समीक्षा कर नई व्यवस्था दें।

जब फैसला आ चुका है, देश व्यापी बहस आरंभ हो चुकी है, तब फिर पूर्व
न्यायाधिपति को भोपाल मेमोरियल का अध्यक्ष बनाए रखने का ओचित्य समझ से
परे है। सरकार को चाहिए था कि तत्काल प्रभाव से उन्हें इस पद से हटा
देेते। मामला आईने की तरह साफ है। सबको सब कुछ समझ में आ रहा है कि दोषी
कौन है, पर ''हमें क्या करना है'' वाली सोच के चलते जनता गुमराह होती जा
रही है।

प्रधानमंत्री को भी लगा कि मामला कुछ संगीन और संवेदनशील होता जा रहा है।
देश भर में इसके खिलाफ माहौल बनता जा रहा है तो उन्होंने भी मंत्री समूह
के गठन की औपचारिकता निभा दी। इस मंत्री समूह में केंद्रीय भूतल परिवहन
मंत्री कमल नाथ को भी रखा गया है। कमल नाथ अस्सी से लगातार संसद सदस्य
हैं, चोरासी में भी वे संसद सदस्य थे। राजीव और संजय गांधी के उपरांत
प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे कमल नाथ का यह पहला
टेन्योर था सांसद के रूप में। वे मध्य प्रदेश के छिंदवाडा संसदीय क्षेत्र
से चुगे गए थे। इसके बाद वे नरसिंहराव सरकार में वन एवं पर्यवरण तथा
वस्त्र मंत्री रहे हैं। इसके बाद वाणिज्य उद्योग और अब भूतल परिवहन
मंत्री हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि बतौर सांसद मध्य प्रदेश का
प्रतिनिधित्व करने के बाद भी कमल नाथ ने आज तक भोपाल गैस कांड के लिए
क्या किया है!

इसका उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही आएगा। जब तीस सालों में उन्होंने
अपने निर्वाचन वाले सूबे में भोपाल गैस कांड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर
कुछ नहीं कहा और किया तो अब मंत्री समूह में रहकर वे क्या कर लेंगे।
वरिष्ठ पत्रकार ''आलोक तोमर'' अपनी वेव साईट में लिखते हैं कि कमल नाथ
भोपाल के गुनाहगार कैसे हैं! वे लिखते हैं कि कमल नाथ के खिलाफ एक बात
उछाली जा रही है कि वाशिंगटन में 28 जून 2007 को कमल नाथ की एक पत्र
वार्ता को उछाला जा रहा है कि जिसमें उन्होने कहा था कि डाओ केमिकल ने
यूनियन कार्बाईड को खरीद लिया है, हादसे के वक्त डाओ केमिकल अस्तित्व में
नहीं थी। वरिष्ठ राजनेता और तीस साल की सांसदी कर चुके कमल नाथ को डाओ
केमिकल का पक्ष लेने के बजाए भोपाल गैस कांड के मृतकों के परिजनों और
पीडितों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए था, जो उन्होंने किसी भी दृष्टि
से नहीं दिखाया। भोपाल कांड के मृतकों की कीमत पर डाओ केमिकल को देश में
फिर से आमद देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। हमें यह
कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह भोपाल गैस कांड के मृतकों और पीडितों
को एक गाली से कम नहीं है। आज आरोप प्रत्यारोप के कभी न थमने वाले दौर
आरंभ हो चुके हैं। भोपाल गैस कांड के फैसले से सियासी तंदूर फिर गरम होकर
लाल हो चुका है। सभी जनसेवक अब अपने अपने हिसाब से इसमें अपने विरोधियों
के खिलाफ तंदूरी रोटी सेंकना आरंभ कर चुके हैं। एक दूसरे के कपडे उतारने
वाले राजनेता यह भूल जाते हैं कि मृतकों के परिजनों और पीडितों को उनके
वर्चस्व की लडाई से कोई लेना देना चहीं है, वे तो बस न्याय चाह रहे हैं।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान गैस राहत मंत्री बाबू लाल
गौर का जमीर भी अचानक जागा है। उन्होंने भी इस तंदूर में अपनी दो चार
रोटियां चिपका दी हैं। गौर का कहना है कि 1991 में जब वे गैस राहत मंत्री
थे तब उन्होने 9 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव को पत्र
भी लिखा था। बकौल गौर भोपाल के गैस प्रभावित 36 वार्ड के पांच लाख 58
हजार 245 गैस प्रभावितों में से महज 42 हजार 208 पीडितों को ही मुआवजा
देने की बात कही थी उस समय के मंत्री समूह ने। गौर के इस प्रस्ताव पर कि
शेष बीस वार्ड के पांच लाख 16 हजार 37 पीडितों को मुआवजा देने पर उस समय
गठित मंत्री समूह के अध्यक्ष कुंवर अर्जुन सिंह सहमत थे। बाबू लाल गौर
खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, पर वे इस बात को बताने से क्यों कतरा रहे
हैं कि उन्होंने विधायक रहते इस मामले को कितनी मर्तबा विधानसभा के पटल
पर उठाया। वे भोपाल शहर से ही विधायक चुने जाते आए हैं, वे प्रदेश के
मुख्यमंत्री भी रहे हैं, फिर उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने
विधानसभा क्षेत्र के भोपाल शहर के गैस पीडितों के लिए क्या प्रयास किए।
बाबू लाल गौर को इन बातों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री डॉ मन मोहन सिंह क्या सारे राजनेता इस बात को जानते हैं कि
पब्लिक मेमोरी (जनता की याददाश्त) बहुत ही कमजोर होती है। अमेरिका के
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर या संसद पर हमला हो या फिर देश की व्यवसायिक राजधानी
मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले की बात। हर मामले में जैसे ही
घटना घटती है, वैसे ही चौक चौराहों, पान की दुकानों पर बहस गरम हो जाती
है, फिर समय के साथ ही ये चर्चाएं दम तोड देती हैं। भोपाल गैस कांड में
भी कुछ यही हो रहा है। मामला अभी गर्म है सो कुछ न कुछ तो करना ही है।
मंत्री समूह का गठन कर जनता को भटकाना ही उचित लगा सरकार को। क्या भाजपा
के अंदर इतना माद्दा है कि वह कंेद्र सरकार से प्रश्न करे कि गैस कांड के
वक्त मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिंह की अध्यक्षता में 1991 गठित
मंत्री समूह की सिफारिशें क्या थीं, और क्या उन्हें लागू किया गया, अगर
नहीं तो अब एक बार फिर से मंत्री समूह के गठन का ओचित्य क्या है! क्या
इसका गठन मामले को शांत करने और जनता का ध्यान मूल मुद्दे से भटकाने के
लिए है। मीडिया अगर ठान ले और इस मामले को सीरियल के तौर पर चलाते रहे तो
देश प्रदेश की सरकारों के साथ ही जनसेवकों को घुटने टेकने पर मजबूर होना
पडेगा, यही गैस कांड के मृतकों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजली होगी और
न्याय की आस में पथरा चुकी पीडितों की आखों में रोशनी की किरण का
सूत्रपात हो सकेगा।
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" 'ग्रुप कैप्टन' तेंदुलकर रिपोर्टिंग सर ! "

" 'ग्रुप कैप्टन' तेंदुलकर रिपोर्टिंग सर ! "


भारतीय वायु सेना [आईएएफ] मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को 'ग्रुप कैप्टन' के पद से सम्मानित करेगी और इस महान बल्लेबाज ने कहा कि वह आईएएफ से जुड़कर खुद को गौरवांवित महसूस करेंगे। सचिन को इससे पूर्व देश के सर्वोच्च खेल सम्मान 'राजीव गांधी खेल रत्न' और पद्म विभूषण से भी नवाजा जा चुका है।

आईएएफ ने एक बयान में कहा, 'सशस्त्र बल के सम्मानित रैंक की स्वीकृति अधिनियम के अंतर्गत भारतीय सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति से सचिन रमेश तेंदुलकर को भारतीय वायुसेना के 'ग्रुप कैप्टन' रैंक से नवाजने की सिफारिश की गई है।' बयान में कहा गया, 'आईएएफ से उनके [सचिन] जुड़ने से युवा पीढ़ी वायुसेना से जुड़कर देश की सेवा करने के लिए प्रेरित होंगे।' उधर मास्टर ब्लास्टर ने भी कहा कि वह आईएएफ परिवार से जुड़कर गौरवांवित महसूस करेंगे।

तेंदुलकर ने लंदन में बयान में कहा, 'यह बहुत बड़े सम्मान की बात है कि मुझे आईएएफ के ग्रुप कैप्टन के पद से सम्मानित करने लायक समझा गया। एक भारतीय होने के नाते मुझे वायुसेना से जुड़कर गर्व होगा और मैं इस सेना का ब्रांड एंबेसडर बनकर पूरा योगदान दूंगा।' वैसे अब तक कुल मिलाकर 21 लोगों को आईएएफ ने सम्मानित रैंक से नवाजा है लेकिन तेंदुलकर पहले खिलाड़ी हैं जिन्हें यह सम्मान देने की सिफारिश की गई है। वर्ष 2008 में विश्व कप विजेता टीम के कप्तान कपिल देव को प्रादेशिक सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल के सम्मानित रैंक से नवाजा गया था। रिकार्डो के बादशाह सचिन तेंदुलकर ने वनडे और टेस्ट क्रिकेट में कुल 93 रिकार्ड अंतरराष्ट्रीय शतक ठोके हैं और वह इन दोनों प्रारूपों में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी हैं।

इस लिए अब कुछ दिनों में अगर आपको सचिन यह कहते दिखें तो चौकना नहीं ........." 'ग्रुप कैप्टन' तेंदुलकर रिपोर्टिंग सर ! "


ग्रुप कैप्टेन सचिन रमेश तेंदुलकर को इस उपलब्धि पर हम सब की बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
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बदली किस्मत कुत्तों की

(उपदेश सक्सेना)
घोड़ों को नहीं मिलती घास,
गधे खाते च्यवनप्राश
यह लाइनें चाहे मज़ाक में ही कही जाती हैं मगर अब यह मज़ाक हकीक़त में भी बदलने लगी है. बहुत साल पहले इसी से मिलती-जुलती लाइनें राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ भी लिख चुके हैं-श्वानों को मिलता दूध-भात,
भूखे बच्चे अकुलाते हैं...
गलियों में आवारा घूमते-भौंकते कुत्तों के भी अब दिन फिरने लगे हैं. बड़ी गाड़ियों में इठलाकर घूमते रहने वाले बंगलों के कुत्तों के अब अपनी किस्मत पर रश्क करने के दिन फिर गए हैं क्योंकि गली के कुत्तों की दुर्दशा से चिंतित होकर गुजरात के कुछ लोगों ने एक विशाल श्वान भंडारे का आयोजन किया. अपने जीवन में संभवतः पहली बार मिले इस सम्मान से अभिभूत होकर गली के कुत्तों ने छककर दावत तो उडाई ही, सम्मान देने वालों का, मुंह ऊपर कर, एक सुर में भौंककर धन्यवाद ज्ञापित भी किया.इस आयोजन में लगभग दस हज़ार आवारा कुत्ते शामिल हुए. भंडारे के मीनू में रोटी,लड्डू,दूध,बिस्किट, नमकीन आदि का भरपूर इंतज़ाम किया गया था. भंडारे के आयोजकों के अनुसार शहर के 23 वार्डों में यह भंडारा आयोजित किया गया था.इसमें कुल 25 हज़ार रोटियां, दस हज़ार लीटर दूध,दो हज़ार किलो लड्डू तैयार किये गए थे. मानते हैं ना कि इनके दिन वास्तव में फिरे, चाहे एक दिन के लिए ही सही.
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जयपुर वाले हिंदी ब्लोगरो ! मैं आपको तंग करने आ रहा हूँ (अविनाश वाचस्पति)

मैं 24 जून को दोपहर तक सपरिवार जयपुर पहुंच रहा हूं और 27 की सुबह दिल्‍ली के लिए वापिस निकलूंगा। इस दौरान मैं चाहता हं कि किसी दिन जयपुर वालों की  व्‍यस्‍त दिनचर्या को भंग करूं। पर वो दिन और समय कौन सा होगा और स्‍थल कौन सा होगा, यह निर्णय आपके ऊपर छोड़ता हूं वैसे हरिप्रसाद शर्मा जी आपसे संपर्क कर रहे होंगे  क्योंकि आपसे और आपके और अपने हिन्‍दी ब्‍लॉग और साहित्‍य जगत के साथियों से मिलने का बहुत मन है। संभवतः यह दिन शनिवार होगा.  इस मन को सबके मन से जोड़ने का कुछ उपक्रम आप कीजिएगा। जैसा भी तय कीजिएगा, उसकी जानकारी अपने ब्‍लॉग या नुक्‍कड़ पर लगाई जा सकती है। यह निर्णय भी आपका ही रहेगा।
हरिप्रसाद शर्मा जी और राजीव जैन और अन्य प्रतिष्ठित हिंदी साथी इस संवंध में सक्रिय हो चुके हैं. दिल्ली फरीदाबाद से माननीय रतन सिंह शेखावत जी और योगेश समदर्शी जी भी इस दिन जयपुर में मोजूद मिलेंगे. हरिप्रसाद यानि एच पी शर्मा जी का फोन नंबर ०९००१८९६०७९ है .
सादर/सस्‍नेह
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शिव के राज में बाघों का शिकार


शिव के राज में माता के वाहन पर संकट!
सरताज हैं वन मंत्री, पर मर रहे बाघ एक एक कर

पंेच नेशनल पार्क बना शिकारियों के लिए साफ्ट टारगेट

एक के बाद एक बाघ हो रहे कालकलवित, वनाधिकारी मशगूल मटरगश्ती में

(लिमटी खरे)

देश के हृदय प्रदेश में पिछले कुछ सालों से शिवराज सिंह चौहान का राज कायम है। शिवराज सिंह चौहान के राज में सूबे के सिवनी जिले में मां दुर्गा के वाहन शेर का अस्तित्व समाप्ति की ओर है। भारी भरकम वन महकमे की फौज, विशेष सशस्त्र बल और पुलिस के जवानों के होने के बावजूद भी शिकारी सरेआम जंगल महकमे के अफसरान की खुली आंख से काजल चुराकर भागने में सफल हो रहे हैं। विश्व भर में अपनी पहचान बना चुके भेडिया बालक ''मोगली'' की कर्मस्थली सिवनी जिले के पेंच नेशनल पार्क के इर्दगिर्द तो क्या समूचे सिवनी जिले में वन्य जीव विशेषकर बाघ बुरी तरह संकट में हैं।

पेंच नेशलन पार्क वैसे भी देश में काफी हद तक चर्चा का विषय बना हुआ है, इसका कारण वर्तमान भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के बीच पेंच को लेकर खिची तलवारें हैं। गौरतलब होगा कि स्वर्णिम चतुर्भुज के अंर्तगत उत्तर दक्षिण गलियारे का निर्माण पेंच नेशनल पार्क के करीब से हो रहा है। कहते हैं जयराम रमेश को यह बताया गया है कि उक्त सडक कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र से होकर जा रही है, (जो कि सर्वथा गलत है) जिसके चलते रमेश के वन एवं पर्यावरण विभाग ने इस मार्ग के निर्माण में अनेक पेंच और फच्चर फसा दिए हैं।

इसके साथ ही साथ पेंच नेशनल पार्क कथित तौर पर जंगल में पले बढे भेडिया बालक मोगली की कर्मस्थली माना जाता है सो इसकी पहचान न केवल हिन्दुस्तान वरन् विश्व के अनेक देशों में बन चुकी है। यहां व्यवसायिक उपयोग के लिए आदिवासियों की जमीनों को धनपतियों और यहां पदस्थ रहे अधिकारियों ने कोडियों के भाव खरीदक उन पर मंहगे आलीशान स्टार होटल का निर्माण करवा दिया। पूर्व में यहां पदस्थ रहे एक अनुविभागीय दण्डाधिकारी, ने नेशनल पार्क से सटे इलाके में जमीन खरीदी थी। इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजस्व के एक अनुविभगीय अधिकारी के लिए यह काम कितना मुश्किल होगा! इसी तरह एक अतिरिक्त जिला दण्डाधिकारी ने भी सिवनी से नागपुर मार्ग पर अपने परिजन के नाम से बहुत बडा सा फार्म हाउस खरीद लिया है। चर्चा है कि सिवनी से खवासा का निर्माण करा रही सदभाव कंपनी ने इस फार्म हाउस को पूरी तरह विकसित कर कुआ आदि खोदा गया है जिसमें लगभग एक करोड रूपए की राशि खर्च की गई है। ''जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का'' की तर्ज पर अधिकारियों द्वारा पेंच नेशनल पार्क के आसपास और जिले की जमीनों पर कब्जा जमा लिया है।

जहां तक रही वन्य जीवों के शिकार की बात तो इस मामले में इतिहास के चंद पन्ने पलटने आवश्यक होंगे। नब्बे के दशक के आरंभ में जिले की वन संपदा इतनी जबर्दस्त थी कि लोग यहां सागौन के साथ ही साथ चंदन बगीचा घूमने देखने आया करते थे। बताते हैं कि कुरई के सकाटा का जंगल इतना सघन हुआ करता था कि लोगों के आकर्षण का केंद्र था यह। इसके उपरांत जब दिग्विजय ंिसह की सरकार सत्ता में आई उसके बाद के वनमंत्रियों की अर्थलिप्सा और निहित स्वार्थ तथा कर्तव्यों के प्रति अनदेखी के चलते सिवनी जिले के जंगल बुरी तरह साफ हो गए। जिले का इतना विशाल चंदन बगीचा आज किन हालातों में हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है, कांग्रेस के शासनकाल में दुर्दशा का शिकार हुआ चंदन बगीचा और उजडी वन्य संपदा को विपक्ष में बैठी भाजपा और उसके विधायक, सांसदों ने चुपचाप उजडने दिया। इस तरह देखा जाए तो जिले की वन्य संपदा के उजडने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ही बराबरी के दोषी हैं।

याद पडता है कि जब प्रहलाद सिंह पटेल संसद सदस्य थे, उस दौरान 1995 में तीन शेरों का शिकार कर बेकार अंगो को सडक के किनारे फेंक दिया गया था। उस समय प्रहलाद सिंह पटेल ने इस मामले को संसद में गुंजाया था। केंद्रीय दल इसकी जांच के लिए आया, किन्तु वन्य जीवों के तस्कर और लकडी माफिया इतना ताकतवर था कि केंद्रीय दल ने इसे दुर्घटना में मौत बताकर मामले को रफा दफा कर दिया था। वन्य जीवों के तस्करों का साहस तो देखिए। पेंच नेशनल पार्क में सेलालियों के आकर्षण का केंद्र रही एक शेरनी को परधियों ने 1999 में जिंदा ही उठा लिया गया था। दरअसल यह शेरनी इतनी सीधी थी कि पर्यटक इसे नजदीक जाकर छू भी लिया करते थे।

अभी आठ माह पूर्व ही एक शेर की संदेहास्पद मौत हुई थी। वन्य महकमे ने अपनी खाल बचाने के लिए इसे स्वाभाविक मौत ही बता दिया था। इतना ही नहीं छः माह पूर्व एक बाघ की जहर से मौत हो गई थी। साफ साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मौत पानी में जहर मिले होने के कारण हुई थी। वन विभाग इसे भी स्वाभाविक मोत ही बताने पर आमदा था। बाद में फोरंेसिक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हो सकी कि उसकी मौत जहर देने से हुई थी। हाल ही में पेंच पधारे प्रदेश के वन मंत्री से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने भी गोल मोल जवाब देकर वन महकमे की खाल बचाने का ही उपक्रम किया है।

हाल ही में प्रकाश में आए मामले ने तो होश ही उडा दिए हैं। पेंच नेशनल पार्क से गायब एक शावक का शव एक माह बाद वन विभाग को दिखाई देना अपने आप मंे ही अनेक प्रश्नों को अनुत्तरित ही छोड गया है। कहा जा रहा है कि इस शावक को तंत्र मंत्र के लिए मौत के घाट उतार दिया गया। इस शावक के दो पंजे एक तांत्रिक के पास ले जाते समय छिंदवाडा के वन महकमे द्वारा जप्त किए गए। आश्चर्य की बात तो यह है कि पंेच के रखरखाव के लिए राज्य शासन द्वारा भारी भरकम अलमा पदस्थ किया है जो जनता के द्वारा दिए जा रहे कर से भारी भरकम वेतन पा रहा है फिर एसी लापरवाही कैसे! क्या शिवराज सिंह चौहान स्वयं इस मामले में संज्ञान लेकर वन विभाग में शिख से लेकर नख तक माता दुर्गा के वाहन के साथ किए इस वीभत्स काम के लिए दण्ड देने का साहस कर पाएंगे?

कहा जा रहा है कि 9 मई को उक्त शावक को पंेच नेशनल पार्क के उप संचालक ने स्वयं ही कमजोर हालत में देखा था, इसके बाद से वह कथित तौर पर ''लापता'' था। एसा नहीं कि जिस स्थान पर उसका शव मिला है, वहां पर से उडन दस्ता न गुजरा हो। अगर नहीं गुजरा तो उडन दस्ते को वेतन और उडन दस्ते का डीजल कौन पी जाता है। जब बागड ही खेत को चरने लगे तो फिर खेत को कोई ताकत नहीं बचा सकती है। जब वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी ही अपने कर्तव्यों में बेशकीमती इमारती लकडी और वन्य जीवों का दोहन करने का मानस बना लें तो फिर इनकी रखवाली भगवान ही आकर कर सकता है।

सिवनी जिले में काले हिरण भी बहुतायत में पाए जाते हैं। जिला मुख्यालय सिवनी से बमुश्किल पांच सात किलोमीटर के दायरे में ही काले हिरणों के झुण्ड दिखाई पड जाते हैं। इन काले हिरणों का शिकार बडे पैमाने पर किया जा रहा है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। हमने अपने पूर्व के आलेख में इन काले हिरणों के लिए एक सेंचुरी बनाने की बात कही थी, पर न तो मध्य प्रदेश सरकार के कानों में ही जूं रेंगी और न ही केंद्र की सरकार को इससे कोई सरोकार दिख रहा है। वन्य जीवों के शिकार और इमारती लकडी की दनादन कटाई को लेकर प्रहलाद सिंह पटेल के अलावा किसी और ने बात किसी मंच पर उठाई हो इसका उदहारण अभी तक तो नहीं मिल सका है। क्या कांग्रेस के जिले के इकलौते विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह सहित सत्तारूढ भाजपा के विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, कमल मस्कोले, श्रीमति शशि ठाकुर सहित केंद्र में सत्ता और विपक्ष में बैठे जिले के दोनों सांसद बसोरी सिंह मसराम और के.डी.देशमुख इस मामले को उठाने का मद्दा रखते हैं।

इस तरह के शिकार को दुर्घटना में मौत बताकर एनएचएआई के उत्तर दक्षिण गलियारे के गुजरने में अडंगे कसे जा रहे हैं। एक बार चर्चा के दौरान जिले के एक वरिष्ठतम अधिकारी ने एनएचएआई के सडक निर्माण में फसे पेंच कारीडोर के फच्चर के बारे में अनोपचारिक तौर पर कहा गया था कि शिकारियों द्वारा किए गए शिकार को सडक दुर्घटना बताने से इस सडक का निर्माण और दुष्कर होता जा रहा है। सवाल यह उठता है कि केंद्र में बैठे वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश जो वनों और पर्यावरण के बारे में अपनी चिंता का स्वांग रचते हैं वे क्या पेंच का दौरा कर इन सारे अनसुलझे सवालों पर गौर फरमाएंगे। अगर वे एसा करते हैं तो यह न केवल वन और पर्यावरण के मामले में उनका स्वागतयोग्य और अनुकरणीय प्रयास समझा जाएगा, वरन् सिवनी वासियों के साथ पूरा न्याय भी माना जाएगा।

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झूठी प्रतिष्ठा के लिए बच्चों का खून

हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में पंचायतों के आतंक की जो दिल दहला देने वाली कथाएं अक्सर सुनने को मिलती रहती हैं, वैसी कहानी देश की राजधानी से सुनने को मिलेगी, कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन यह सच है। मोनिका और कुलदीप की हत्या इसलिए कर दी गयी कि उनके घर वालों को उनके द्वारा किया गया शादी का फैसला उनकी जातिगत पहचान को चुनौती की तरह लगा, उनके सम्मान के खिलाफ लगा।
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जनता का गला काट अपनी जेबें भर रहे जनसेवक


धनपतियों का संसद में क्या काम!
राजनीति जनसेवा है, पूंजीपति चाहें तो वैसे ही कर सकते हैं

चार सौ चोदह फीसदी बढी है युवराज की संपत्ति पांच सालों में

करोडपति सांसदों की तादाद बढी राज्य सभा में

राज्यसभा में हैं 139 करोडपति सांसद

सांसदों की भारी होती जेबंे

(लिमटी खरे)

देश की सबसे बडी पंचायत संसद एवं राज्यसभा के साथ ही साथ सूबों की आला पंचायत विधानसभा और विधानपरिषदों में चुने जाने वाले ''जनसेवकों'' की संपत्ति का समूचा ब्योरा वर्षवार अगर सार्वजनिक किया जाए तो देश की जनता चक्कर खाकर गिर पडेगी कि जनता की सेवा के लिए जनता द्वारा चुने गए नुमाईंदों के पास इतनी तादाद में दौलत आई कहां से जबकि आम जनता की क्रय शक्ति और जीवन स्तर का ग्राफ दिनों दिन नीचे आता जा रहा है। अखिर इन जनसेवकों के पास एसा कौन सा जादुई चिराग है जिससे ये अपनी संपत्ति दिन दूगनी रात चौगनी बढाते जा रहे हैं और जनता के शरीर का मांस दिनों दिन कम ही होता जा रहा है। देश में आज आधी से अधिक आबादी के पास पहनने को कपडे, रहने को छत और खाने को दो वक्त की रोटी नहीं है और इन जनसेवकों की एक एक पार्टी में लाखों पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। अनेक संसद सदस्य तो एसे भी हैं जिन्होंने आज तक यात्रा करने में रेल तो क्या यात्री बस का मुंह भी नहीं देखा। अपने या किराए से लिए गए विमानों में ही इन जनसेवकों ने लगातार यात्राएं की हैं।

2004 और 2009 में ही अगर तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो पता चल जाएगा कि किसकी संपत्ति में कितने फीसदी इजाफा हुआ है। देश की नंगी भूखी गरीब निरीह जनता को यह जानकार आश्चर्य ही होगा कि कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री और नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढी के सदस्य एवं कांग्रेसियों के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी की संपत्ति में पांच सालों में 414.03 फीसदी की प्रत्यक्ष वृद्धि दर्ज की गई है। उत्तर प्रदेश सूबे से चुने गए राहुल गांधी की 2004 में घोषित संपत्ति 45 लाख 27 हजार 880 रूपए थी। पांच सालों में उन्होंने कहीं कोई उद्योग धंधा नहीं किया, बस सांसद रहे और ''जनसेवा'' की इस जनसेवा में उनकी संपत्ति को मानो पर लगा गए हों। 2009 मंे उनकी घोषित संपत्ति 414 फीसदी बढकर 2 करोड 32 लाख 74 हजार 706 रूपए हो गई। है न कमाल की बात। इस मामले में विपक्ष मूकदर्शक बना हुआ है।

आखिर विपक्ष मुंह खोले भी तो कैसे। राजग के पीएम इन वेटिंग को ही लिया जाए। लाल कृष्ण आडवाणी गुजरात से सांसद हैं, उन्होंने 2004 में अपनी संपत्ति एक करोड 30 लाख 42 हजार 443 रूपए घोषित की थी, जो पांच सालों में 172.52 गुना बढकर तीन करोड 55 लाख 43 हजार 172 रूपए हो गई। क्या आडवाणी और राहुल गांधी देश की जनता के सामने आकर बताने का माद्दा रखते हैं कि उनकी संपत्ति में पंख कैसे लग गए। अगर वे वाकई जनसेवा कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर उन्हें धन को हर साल 82 गुना बढाने की तरकीब सभी को बतानी चाहिए। एक रूपए के अस्सी रूपए तो मुंबई का मटका किंग रतन खत्री ही देता है, वह भी सट्टे के माध्यम से। कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी की कौन सी नोट छापने की फेक्टरी लगी है, इसका जवाब विपक्ष ने सवा साल में क्यों नहीं मागा यह बात समझ से परे ही है।

हमाम में सभी नग्नावस्था में ही खडे हैं, क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, क्या दूसरे दल और क्या निर्दलीय। संसद चाहे लोकसभा हो या राज्य सभा इस हमाम के बाहर सभी एक दूसरे के खिलाफ नैतिकता की तलवार लिए खडे होकर जनता को बेवकूफ बनाने का स्वांग रचते हैं, और जैसे ही हमाम के अंदर प्रवेश करते हैं, सारी की सारी नेतिकता को वे अपने कपडों की तरह हमाम के बाहर उतारकर छोड जाते हैं। जार्ज फर्नाडिस की संपत्ति तीन करोड 39 लाख 87 हजारा चार सौ दस रूपए थी जो पांच सालांे में 180.81 फीसदी बढकर 9 करोड 54 लाख 39 हजार 978 हो गई। आरजेडी के सुप्रीमो और चारा घोटाला के आरोपी स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव की संपत्ति महज 86 लाख 69 हजार 342 थी, जिसमें 365.69 फीसदी उछाल दर्ज किया गया है, यह 2009 में बढकर तीन करोड 17 लाख दो हजार 693 हो गई।

सबसे अधिक उछाल उत्तर प्रदेश के सांसद अक्षय प्रताप सिंह की संपत्ति में ही दर्ज किया गया है। इनकी संपत्ति 2004 में 21 लाख 69 हजार 847 रूपए थी, जो पांच सालों में महज 1841.06 गुना ही बढी और 2009 में बढकर चार करोड 21 लाख 18 हजार 96 रूपए हो गई। संपत्ति में उछाल के मामले में दूसरी पायदान पर सचिन पायलट हैं। सचिन की संपत्ति पांच सालों में 1746 गुना बढी है। पहले यह दो करोड 51 लाख नो हजार थी, जो 2009 में बढकर 46 करोड, 48 लाख नो हजार पांच सौ अठ्ठावन हो गई है। तीसरी पायदान पर मध्य प्रदेश के समाजवादी संसद सदस्य चंद्र प्रताप सिंह हैं, जिनकी संपत्ति 7 लाख 95 हजार 619 से 1466.69 गुना बढकर 12 करोड 46 लाख चार हजार नो सौ बाईस रूपए हो गई है। चौथे नंबर पर वसुंधरा राजे के पुत्र राजस्थान के सांसद दुष्यंत सिंह हैं। इनकी संपत्ति पहले सात लाख 82 हजार 67 रूपए से 790.34 गुना बढकर छः करोड तीस लाख चउअन हजार 275 रूपए हो गई है। पांचवें नंबर पर दुष्यंत के ममेरे बेटे और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। उनकी संपत्ति मेें 430.83 फीसदी इजाफा हुआ है। इनकी संपत्ति 2004 में 2 करोड 80 लाख 87 हजार 39 थी, जो बढकर 2009 में 14 करोड 90 लाख 94 हजार 212 रूपए हो गई।

इतना ही नहीं यह फेहरिस्त काफी लंबी है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सांसद पुत्र संदीप दीक्षित सेंतालीस लाख चोंसठ हजार नो सौ एक रूपए से अपनी संपत्ति को पांच सालों में बढाकर 2 करोड 27 लाख 46 हजार चार सौ अठ्ठाईस तक अर्थात 377.37 फीसदी ही बढा सके। जेवीएम नेता झारखण्ड के बाबूलाल मरांडी इस मामले में कंधे से कंधा मिलाकर ही चल रहे हैं। वे अपनी संपत्ति को पांच लाख से 327.54 फीसदी बढाकर 21 लाख 37 हजार 675 रूपए तक ले गए। बीमार पडे जार्ज फर्नाडिस की संपत्ति अपने आप ही बढती जा रही है। उनकी संपत्ति 3 करोड 39 लाख, 87 हजार 410 रूपए से 265.69 गुना बढकर 2009 में नो करोड 54 लाख 39 हजार 798 रूपए हो गई है।

इस साल के आरंभ तक पीछे के रास्ते से संसदीय सौंध में पहुंचने वाले जनसेवकों में से सौ करोडपति सांसद थे। राज्य सभा को पीछे का रास्ता इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इसमें प्रवेश के लिए नेताओं को जनता का विश्वास हासिल नहीं करना होता है। इसके लिए जनता के चुने विधायकों द्वारा ही संसद सदस्य का चुनाव किया जाता है, इस तरह कुल मिलाकर अच्छे प्रबंधक, ध्नबल, बाहुबल अर्थात इसमें प्रवेश की ताकत सिर्फ और सिर्फ महाबली ही रखते हैं। राज्य सभा में राहुल बजाज के पास तीन सौ करोड तो जया बच्चन के पास 215 करोड रूपए, और तो और अमर सिंह के पास 79 करोड की संपत्ति है। जनता दल के एमएएम रामास्वामी के पास 278 करोड, टी.कांग्रेस के सुब्बारामी रेड्डी 272 करोड की संपत्ति है। अप्रेल तक राज्य सभा में 33 सांसद कांग्रेस के, भाजपा के 21 और समाजवादी पार्टी के सात सांसद करोडपति थे। वर्तमान में राज्यसभा पहुंचे 49 सांसदों में से 38 सांसद करोडपति हैं।

हमारे मतानुसार भारत गणराज्य में रहने वाली भूखी, अधनंगी, बिना छत और बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती आम जनता को यह जानने का हक है कि आखिर ''आलादीन का कौन सा जिन्न'' इन जनसेवकों के पास है जिसे घिसकर ये जनसेवक पांच सालों में अपनी संपत्ति को कई गुना बढा लेते हैं, वहीं दूसरी ओर देश में आम जनता का जीवन स्तर कई गुना नीते आता जा रहा है। भारत सरकार को चाहिए कि जनसेवकों के लिए नया कानून बनाकर जिसकी संपत्ति पचास लाख से अधिक हो उसकी संपत्ति को देश की संपत्ति मानकर उसका उपयोग आम जनता के कल्याण के लिए करने का नियम बनाए। इससे संसद और विधानसभाओं में धनपतियों का आना रूक सकेगा। धनपति की सोच विशुद्ध व्यापारिक होती है, उसे आवाम के दुख दर्द से कोई लेना देना नहीं होता है। सरकार के साथ ही साथ रियाया को भी अब जागना होगा, वरना कहीं देर न हो जाए और धनपति देश और सूबों की पंचायतों मंे बैठकर देश प्रदेश को अपने निहित स्वार्थ और लाभ के चलते विदेशियों के हाथों गिरवी न रख दें।

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अर्जुन के पेंतरे से घबराई कांग्रेस


ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
अंततः अर्जुन ने चला ही दिया ब्रम्हास्त्र
भोपाल गैस कांड के वक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिह जो कि पिछले दो सालों से निर्वासित जीवन जी रहे थे, ने अपना मौन चिरपरिचित अंदाज में तोड ही दिया है। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में कांग्रेस के माने हुए चाणक्य ने भोपाल गैस कांड से जुडे अनछुए पहलुओं के बारे में एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में साफ कह दिया है कि वे उस मसले में जो भी बात कहेंगे वह उनकी ''आत्मकथा'' का हिस्सा बनेगी। साक्षात्कार में कुंवर साहेब ने साफ शब्दों में कहा है कि एंडरसन अगर भारत लोटा था तो वह राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के इस भरोसे पर लौटा था कि उसे भोपाल से वापस अमेरिका भेज दिया जाएगा। अर्जुन के इस ब्रम्हास्त्र से कांग्रेस अब रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दे रही है। गौरतलब है कि भोपाल गैस कांड के वक्त देश में नेहरू गांधी परिवार की चौथी पीढी के सदस्य राजीव गांधी देश के वजीरे आजम थे, और आज उनकी अर्धांग्नी श्रीमति सोनिया गांधी कांग्रेस की राजमाता की भूमिका में हैं, एवं कांग्रेस की नजरों में पांचवी पीढी के राहुल गांधी देश की बागडोर संभालने को आतुर दिख रहे हैं। कांग्रेस के प्रबंधकों की राय के चलते सोनिया ने कुंवर अर्जुन सिंह को दूध में से मख्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया है। भोपाल गैस कांड के फैसले के उपरांत उनके सरकारी आवास में लाल बत्ती और हूटर्स की आवाजें फिर गूंजने लगीं हैं। अर्जुन सिंह ने अभी सिर्फ इशारा किया है, अगर उन्होंने साफ तौर पर कुछ कह दिया तो आने वाले दो तीन दशकों तक कांग्रेस इस बदनुमा दाग को शायद ही धो पाए।
राशि पीडितों के लिए थी आपके लिए नहीं नितीश जी
बिहार का दर्द माना जाता है कोसी नदी को। हर साल कोसी नदी की बाढ से बिहार वासी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की इमदाद इसमें पूरी नहीं पडती है। देश भर के हर सूबे से लोग कोसी नदी के प्रभावितों के लिए मदद भेजते हैं। इसी तारतम्य में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्य की ओर से पांच करोड रूपए की राशि की सहायता पहुंचाई थी, जिसे बिहार के निजाम नितीश कुमार ने वापस लौटा दिया है। पिछले दिनों नितीश कुमार और नरेंद्र मोदी के फोटो युक्त विज्ञापनों से नितीश कुमार खासे खफा हैं, क्योंकि मोदी ने भाजपा की कार्यकारिणी में भी इस इमदाद का जिकर कर दिया था। नितीश के पैसा वापस करते ही सियासत की बासी फिर उबाल मारने लगी है। कांग्रेस का कहना है कि यह गुजरात की जनता का अपमान है, तो भाजपा इसे सीधे सीधे स्वाभिमान पर ठेस का मामला मान रही है। आपसी अहं और सियासी लाभ हानी का गणित अपने आप में अलग मामला हो सकता है पर नितीश कुमार को कम से कम इस मामले को मानवीय नजरिए से देखना चाहिए था। कारण चाहे जो भी हो पर यह राशि मोदी ने नितीश कुमार को व्यक्तिगत खर्च के लिए नहीं वरन कोसी प्रभावितों के लिए दी थी, और अपने अहं को निश्चित तौर पर नितीश को प्रथक ही रखना चाहिए था।
युवराज का अधेडावस्था में प्रवेश
कांग्रेस के युवराज ने चालीस बसंत देख लिए हैं, वे अब अधेडावस्था में कदम रख चुके हैं, फिर भी युवा और उर्जावान का तगमा उनके साथ है। नोकरी पेशा में जरूर साठ साल में सेवा निवृति का नियम हो या लोग बचकानी या बेहूदगी की बात पर ''सठिया गए हैं'' अर्थात साठ पूरे कर चुके हैं का मुहावरा कहें पर राजनीति में युवा की आयु 45 से 65 मानी जाती है। अरे देश जो चला रहे हैं राजनेता तो उनके हिसाब से अगर 45 से 65 की आयु युवा की है तो मानना ही पडेगा। इस हिसाब से कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी अभी बच्चे हैं, पांच साल के उपरांत वे युवा होंगे। विदेशों में पले बढे देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने और आजादी की लडाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने अपना चालीसवां जन्म दिन हिन्दुस्तान में किसी दलित की झोपडी में मनाने के बजाए हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने वाले ब्रिटेन के लंदन शहर में मनाना उचित समझा। हो सकता है कि दलित और गरीब प्रेम के प्रहसन से राहुल गांधी उकता चुके हों और वे खुली हवा में विदेश में जाकर चेन की सांस लेने की इच्छा रख रहे हों।
घट सकती है बिटियों की तादाद
देश में एक बार फिर स्त्री पुरूष के अनुपात में और अधिक गिरावट होने की आशंका जताई जा रही है। चालू जनगणना में प्रति हजार पुरूषों पर महिलाओं की तादाद में और कमी आ सकती है। 2001 में शून्य से छः वर्ष तक की आयु वर्ग में प्रति एक हजार बालक पर बालिकाओं की तादाद 927 ही रह गई थी। वैसे यह अनुपात 931 का है पर शून्य से छ साल में पांच की कमी आई थी, जो चिन्ता का विषय थी। आने वाले समय में इसी आयु वर्ग में जनसंख्या में अनुपातिक कमी दर्ज होने की आशंका निर्मूल नहीं कही जा सकती है। 2004 में यह बालिकाओं की संख्या 892, तो 2005 से 2007 के मध्य यह संख्या बढकर नौ सौ पार हो गई थी, इसके बाद 2006 से 2008 के मध्य यह 904 तक ही पहुंची थी। इस जनगणना में उम्मीद जताई जा रही है कि शून्य से छः साल के बीच प्रति हजार बालकों में बालिकाओं की संख्या 915 के उपर शायद ही पहुंच सके। अगर एसा है तो बालिका बचाओ के सरकारी नारे पर व्यय होने वाली करोडों अरबों रूपए की राशि कौन डकार गया इस बात के लिए एक आयोग का गठन करना ही होगा।
पेंच के निर्माण को तुडवाओ जयराम जी
लगता है केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को सिर्फ और सिर्फ भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से ही कोई शिकवा शिकायत है, तभी तो एसा लगता है कि चाहे कुछ हो जाए पर वे एनएचएआई के मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर गुजरने वाले हिस्से को पेंच नेशनल पार्क के आसपास से गुजरने नहीं देंगे। यह कारण है कि इसका निर्माण आज भी बंद पडा हुआ है, महज बीस किलोमीटर की सडक ही नहीं बनी है। इस सडक का रखरखाव भी कोई नहीं कर रहा है सो इसकी चमडी उधड चुकी है। सडका का निर्माण करने वाली कंपनी ने मध्य प्रदेश की सीमा पर खवासा के पास पांच सौ मीटर के हिस्से को बनाने से हाथ खडे कर लिए हैं। जयराम रमेश को सडक बनने से पर्यावरण का नुकसान तो दिख रहा है, किन्तु पेंच नेशनल पार्क में धडाधड बन रहे रिसोर्ट काटेज और निर्माण कार्य नहीं दिख रहे हैं, जिससे पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। पेंच नेशनल पार्क से लगी आदिवासियों की बेशकीमति जमीन कोडियों के दाम धन्नासेठ खरीदकर इन पर आलीशान होटल बनवा रहे हैं। अरे रमेश जी, कम से कम इन निर्माण को तुडवाओ और वन्य जीवों के साथ ही साथ पर्यावरण का नुकसान होने से बचाएं।
देशी नहीं अंग्रेजी कहो जनाब!
देशी और अंग्रेजी शराब में बहुत अंतर होता है। नशा दोनों का एक जैसा हो सकता है, पर सूरत सीरत अलग अलग ही होती है, स्वाद और सुगंध या दुर्गंध अलग होती है। आने वाले समय में देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में देशी शराब पीने वालों को अंग्रेजी का जायका मिलेगा। यह शुद्ध होने के साथ ही साथ मदिरा सेवन करने वालों के शरीर के लिए तुलनात्मक कम हानिकारक होगी। अब तक दिल्ली में बिकने वाली देशी शराब को रेक्टीफाईड एल्कोहल से बनाया जाता है, पर अब इसके निर्माण में एक्सट्रा न्यूट्रल एल्कोहल का प्रयोग किया जाएगा। देशी शराब में अल्कोहल की तादाद 28.5 तो अंग्रेजी में 42.8 होती है, देशी शराब को जिससे बनाया जाता है, वह शरीर के लिए काफी घातक हो जाता है। वैसे भी दिल्ली में बेवडों ने सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर रखे हैं। अवैध और जहरीली शराब के मामले में भी दिल्ली ने पताके गाड रखे हैं। जहरीली शराब पीकर मरने वालों की तादाद सबसे अधिक दिल्ली में ही है। एसे में अगर सरकार बेवडों का ध्यान रखे तो कम से मयकशों को तो शीला दीक्षित सरकार को सलाम बजाना ही चाहिए।
रहें अतिरिक्त करारोपण के लिए तैयार
आने वाले समय में मंहगाई से टूट चुकी आम आदमी की कमर और बुरी तरह टूटने की आशंका है। मानव संसाधन और विकास मंत्रालय एक एसी योजना बनाने जा रहा है जिसमें देश भर के पचास लाख से अधिक स्कूली शिक्षकों को कुछ सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। सूत्रों की मानें तो मानव संसाधन विकास मंत्री ने एक एसा खाका तैयार किया है, जिसमें शिक्षकों का बीमा, चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाएगी। इसके साथ ही साथ उन्हें सस्ती दरों पर निवास के लिए मकान भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं। बताते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के एक चहेते ने अपने बिल्डर मित्र के कहने पर सिब्बल ने मकान उपलब्ध कराने पर सहमति जता दी है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि पचास लाख से अधिक मकानों के निर्माण के लिए केंद्रीय स्तर पर ही टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाएगी। बीमा, मकान और चिकित्सा सुविधा में होने वाले व्यय का भोगमान अंततोगत्वा अतिरिक्त करारोपण कर आम जनता की जेब से ही वसूला जाएगा, सो कमर टूटा आम आदमी रहे आगे और टूटने को तैयार।
बनारस के रईस भिखारी!
भीख वही मांगता है जिसके पास कुछ नहीं होता है। न खाने को हो न पहनने को और न ही ओढने को तभी कहा जाता है किसी को भिखारी। देश की धार्मिक नगरी बनारस में भिखारी के मायने कुछ और ही समझ में आ रहे हैं। बनारस के गंगा तट पर फिल्मी भजनों को गाकर भीख मांगने वाले भिखारियों की असलियत जानकर आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। इन भिखारियों के पास मोबाईल, पेन कार्ड, बैंक खाते, बीमा पालिसी, मकान, दुकान, गाडी क्या क्या नहीं है इनके स्वामित्व में। बनारस में भिखारियों की संख्या पच्चीस हजार से अधिक है जिनमें से पांच हजार से अधिक भिखारी गंगा के घाट और मंदिरों में बैठकर श्रृद्धालुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड करते हैं। एक भिखारिन की तीन बच्चियां कान्वेंट में पढती हैं, तो कई के नाम पर बचत खातों में हजारों रूपए हैं। पांच बरस पहले संकटमोचन हनुमान मंदिर के पास मरे एक भिखारी के बिस्तर से पुलिस ने लगभग दो लाख रूपए की रकम भी बरामद की थी। सच ही है भीख मांगना भी आजकल मुनाफे का व्यवसाय बन गया है।
कांग्रेसी संस्कृति से दूर रहें भाजपाई
भाजपा के निजाम नितिन गडकरी का कहना है कि कांग्रेस की पांव छूने और माला पहनाने की संस्कृति से भाजपा को दूर ही रहना चाहिए। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के सम्मेलन में नितिन गडकरी ने यह गर्जना की। दरअसल कार्यकर्ता नेताओं से करीबी बनाने के चक्कर में उनके पैर पडने और माला पहनाने को आतुर रहते हैं। नेताओं की गणेश परिक्रमा के कारण नेताओं के कद पार्टी से बडे होने लगे हैं। यही कारण है कि व्यापक जनाधार वाली पार्टियों के बजाए अब उनका स्थान छोटे दलों अथवा निर्दलियों ने ले लिया है। कांग्रेस में गणेश परिक्रमा जबर्दस्त हावी हो चुकी है। अब तो एक ही जिले में अनेक नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण कार्यकर्ता गुटों में बंटे नजर आते हैं, यही कारण है कि पार्टियांे का ग्राफ नीचे की ओर जाता जा रहा है। नितिन गडकरी ने बहुत ही सही नस को पकडा है, मगर समस्या इस बात की है कि गडकरी के इस मशविरे को मानेगा कौन। पैर पडवाने और माला पहनने के आदी हो चुके नेताओं क्या गडकरी की नसीहत रास आएगी!
सपनि बंद होने से पूर्व विधायक परेशान
देश के हृदय प्रदेश में मध्य प्रदेश राज्य सडक परिवहन निगम (सपनि) के बंद होने से पूर्व विधायक और मीडिया बिरादरी बुरी तरह हलाकान परेशान हैं। दरअसल पूर्व विधायकों और मीडिया के अधिमान्य पत्रकारों को सपनि में निशुल्क यात्रा करने का अधिकार पत्र प्राप्त है। पूर्व में विधायक, पूर्व विधायक और पत्रकार यात्री बस में निशुल्क यात्रा के लिए अधिकृत हुआ करते थे। मध्य प्रदेश से सटे महाराष्ट्र सूबे में पूर्व विधायकों को यह सुविधा मुहैया है। मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक इस सुविधा को बहाल करने के लिए लामबंद भी हुए थे, पर नतीजा सिफर ही था। पिछले साल पूर्व विधायक मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस संबंध में पत्र भी लिखा था। पूर्व विधायक तो होश में आ गए पर अधिमान्य पत्रकारों ने इस बारे में अभी मानस तैयार ही नहीं किया है कि क्या कदम उठाए जाएं। लगता है भारतीय रेल में पचास फीसदी में यात्रा कर ही मीडिया बिरादरी संतोष कर रही है।
थाने में जप्त कार का कटा चालान!
क्या यह संभव है कि कोई कार थाने में जप्त कर ली गई हो और जप्त अवधि में ही उसका चालान दूसरे थाना क्षेत्र में काट दिया गया हो। जी हां दिल्ली के रोहणी निवासी जी.बी.सिंह के साथ कुछ इसी तरह का वाक्या हुआ। 27 दिसंबर 2003 को किसी मामले में शकरपुर थाने के स्टाफ ने उनकी कार को जप्त कर लिया था, और कोर्ट के आदेश पर 5 मार्च 2004 को उसे सुपर्दनामे पर सौंपा था। दिल्ली यातायात पुलिस की मुस्तैदी देखिए 13 फरवरी 2004 को उसकी कार में बिना सीट बेल्ट बांधकर चलाने के जुर्म में चालान काट दिया गया। अरे भले मानस जिस कार को थाने में जप्त कर दिया गया हो, वह सडक पर कैसे दौड सकती है, और कौन उसमें बिना सीट बेल्ट बांधे जा सकता है। हो सकता है शकरपुर थाने वाले ही जप्तशुदा कार में बिना सीट बेल्ट बांधे सफर कर रहे हों। बहरहाल, कडकडडूमा कोर्ट ने याचिका कर्ता की अपील पर आदेश दिया कि 1653 रूपए का मुआवजा सिंह को दिया जाए। दिल्ली पुलिस अदालत के इस आदेश को भी धता बताने से नहीं चूक रही है।
कानून के दायरे से बाहर हैं जनसेवकों के बंग्ले
नियम कायदे कानून बनाना नौकरशाह और राजनेताओं अर्थात जनसेवकों का काम है, पर उसका पालन करने में उन्हें पूरी छूट मिलती है। राजस्थान में इसकी जीती जागती मिसाल देखने को मिल रही है। राजस्थान में जितने भी बंग्ले मंत्री या अफसरान के हैं उनमें इसकी तस्वीर साफ दिखाई पड जाती है कि नियम कायदों की कितनी परवाह है उन्हें। राजस्थान में भवन मालिकों के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके लिए भवन मालिकों को बाकायदा नोटिस भी जारी किए गए हैं। मजे की बात तो यह है कि गुलाबी शहर जयपुर में पांच सौ वर्ग मीटर से अधिक साईज वाले नेता मंत्री अफसरान के बंग्लों में न तो वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम ही लगा है और न ही बिजली और पानी की बचत का कोई प्रयास किया जाता है। भरी गरमी में जब जनता पानी पानी चिल्ला रही थी, तब इन जनसेवकों के बंग्लों के बाग बगीचे पानी से तर हुआ करते थे। बताते हैं कि राजस्थान के मुख्यमंत्री के आवास को छोडकर किसी भी सरकारी आवास में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगा हुआ है।
पुच्छल तारा
दिल्ली सरकार चोरी और सीना जोरी के लिए बहुत ही बदनाम हो चुकी है। कोई भी काम दिल्ली में अगर हो रहा हो तो वह समय सीमा में तो पूरा हो ही नहीं सकता है। इस साल के अंत में होने वाले कामन वेल्थ गेम्स को ही ले लें। पूरी दिल्ली का सीना खुदा पडा है। जहां तहां हवा में उडती धूल नागरिकों का स्वास्थ्य बिगाड रही है। इस खेल के लिए अभी तैयारी अधूरी ही है। इसी पर केंद्रित एक मजेदार ईमल भेजा है रोहणी दिल्ली निवासी अभिषेक दुबे ने। वे लिखते हैं अखबार में एक खबर छपी कि कामन वेल्थ गेम्स की टिकिटों की बिक्री शुरू। इसे पढकर उनके एक मित्र ने चुटकी ली - ''सडकें, स्टेडियम, पानी की निकासी की योजना, साफ पेयजल आदि तैयार नहीं, फिर भी टिकिटें बेच लेंगे। मानते हैं सरकार को, इसी को कहते हैं असली दिलेरी

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....मेरी "गंगा माँ" को बचा लो प्लीज

मेरी ममतामयी माँ की जान संकट में है. वह तिल -तिलकर मर रही है और मैं ऐसा अभागा बेटा हूँ जो चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता. दरअसल मेरी माँ की इस हालत के लिए सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि आप सभी ज़िम्मेदार हैं. आप में से कुछ लोगों ने उसे बीमार बनाने में अहम भूमिका निभाई है तो कुछ ने मेरी तरह चुप रहकर इस दुर्दशा तक लाने में मूक सहयोग दिया है.यही कारण है कि आज मुझे आप सभी से माँ को बचने की अपील करनी पड़ रही है.
मेरी माँ का नाम गंगा है...अरे वही जिसे आप सब गंगा नदी(river ganga) या गंगा मैया के नाम से पुकारते हैं. आप सब भी इस बात को मानेंगे कि मेरी माँ ने कभी किसी का ज़रा सा भी नुकसान नहीं किया. वह तो ममता, त्याग, करुणा, वात्सल्य और स्नेह की प्रतिमूर्ती है. आज क्या सदिओं से मेरी माँ हम सब के पाप धोते आ रही है और अनादिकाल से सम्मान पाने में सर्वोपरि रही है. तभी तो इस स्रष्टि के निर्माता ब्रम्हा उसे अपने कमंडल में लेकर चलते थे और सर्वशक्तिमान भगवान् शंकर ने उसे अपनी जटाओं में स्थान दिया. मेरी माँ के विशाल ह्रदय का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति देने के लिए वह धरती पर उतर आई. गंगोत्री से लेकर समुद्र में समाने तक मेरी माँ इलाहाबाद, हरिद्वार, बनारस सहित तमाम जगहों पर हम सब के पाप धोकर सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने का काम ही तो कर रही है. वह न केवल हमारी प्यास बुझा रही है बल्कि हमारा पेट भरने के लिए ज़रूरी अनाज पैदा करने में भी सहभागी बनी हुई है. ...और बदले में हम उसे क्या दे रहे हैं - कारखानों की ज़हरीली गंदगी, नालों का सड़ांध से बजबजाता पानी, अधजले शव, चमड़ा उद्योग का प्रदूषण, गटर का पानी, तमाम शहरों का मलमूत्र, पोलीथिन और पता नहीं क्या-क्या ? मेरी माँ इतना अपमान सहकर भी कभी क्रोधित नहीं होती बल्कि इस सब गंदगी को अपने में समेटकर हमें शीतल, मीठा और शुद्ध जल प्रदान करती आ रही है लेकिन बर्दाश्त कि भी हद होती है?अब यदि हम पुण्यसलिला और ममतामयी माँ का अस्तित्व ही ख़त्म करने पर उतारूँ हो गए हैं तो उसे बचने की गुहार तो लगानी ही पड़ेगी.
जिस माँ को धरती तक लाने के लिए भागीरथ को सदिओं तपस्या करनी पड़ी अब उसी माँ को धरती से विदा करने के लिए हम कोई कसर नहीं छोड़ रहे ? याद है मेरी माँ की एक बहन थी जिसे हम सभी 'सरस्वती 'के नाम से जानते हैं और माँ के साथ मिलकर वे इलाहाबाद (प्रयाग) में 'त्रिवेणी' बनाती थी लेकिन हमारी लापरवाही के कारण माँ को अपनी इस बहन को असमय ही खोना पड़ा और अब प्रयाग में त्रिवेणी के स्थान पर 'संगम' ही रह गया है? तो क्या अब मेरी माँ को भी अपनी बहन की तरह असमय ही अपना अस्तित्व खोना पड़ेगा? क्या हम सब ऐसे ही चुपचाप सहते रहेंगे? या मेरी माँ को बचाने के लिए मिल-जुलकर आवाज़ उठायंगे? वैसे हमारी सरकार कई सालों से माँ को बचाने के लिए ढेरों योजनायें बना रही है और अब तक अरबों रूपए खर्च कर चुकी है. आप सभी जानते हैं कि सरकार की योजनायें ज़मीन पर कम और कागजों पर ज्यादा बनती हैं इसलिए इतने साल बाद भी माँ गंगा की बीमारी ठीक नहीं हो सकी है. हाल के कुछ अध्ययनों से खुलासा हुआ है की गंगा जल से अब कैंसर होने तक का खतरा उत्पन्न हो गया है
क्यों न हम सभी मिलकर एक बार प्रयास करें और गंगा माँ को स्वस्थ करके ही दम लें. तो अब इंतजार किस बात का है? गंगा माँ की बेहतरी की पहल आज से ही क्यों नहीं...?
(क्षमा याचना सहित:हो सकता है कुछ साथी इस पोस्ट को पहले भी पढ़ चुके हों.दरअसल इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर आप सब की बेपरवाह प्रतिक्रियाओं के कारन मैं अपने मित्रों की सलाह पर इस पोस्ट को आंशिक सुधर के साथ फिर से दल रहा हूँ ताकि कुछ तो हलचल हो,कहीं तो लहरें उठे और गंगा माँ हमें फिर से अपने स्नेह के आँचल में ढक लें...)

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एसोसियेशन की इस बैठक को कोई नाम तो दो : ब्‍लॉगवाणी के बंद होने पर चिंता व्‍यक्‍त की जा रही है

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आगरा में खिलखिलाई हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रेम की नई रोशनाई

यह पोस्‍ट डॉ. सुभाष राय जी द्वारा लिखी गई है परंतु इसे पोस्‍ट करने का कार्य मैंने किया है। अब यह रिपोर्ट आपके मनन के लिए पेश है। इस संबंध में इत्‍तेफाक रखते हुए मैं अपनी सभी पोस्‍टें दिल्‍ली पहुंचने के बाद ही लिख-प्रकाशित कर पाऊंगा। अतएव, जिज्ञासा रखते हुए धैर्य बनाए रखिएगा। >




अविनाश जी के साथ होना अपने आप में एक अनुभव है। वे जिस आत्मीयता से मिलते हैं, बांध लेते हैं। मेरे उनके परिचय के बाद यह उनकी दूसरी आगरा यात्रा है। उनकी हर यात्रा एक नयी ब्लॉगगाथा होती है। कभी-कभी मैं समझ नहीं पाता हूं कि उनकी इस ब्लॉगमयता के क्या मायने हैं। पर जब भी इस तरह की उलझन होती है, भीतर से ही जवाब आता है कि इस आदमी के भीतर एक नयी दुनिया की कल्पना है. ब्लॉगों के जरिये एक दूसरे से जुड़ते लोग विचारों की जो नयी दुनिया रच रहे हैं, उसमें इस असल दुनिया से ज्यादा अपनापन, एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने या खड़े रहने का ज्यादा गहरा भाव होगा। यह अभी से दिखता भी है। हम सभी चिंतित रहते हैं कि इस कल्पना को पंख लगने हैं तो पहले से ही सजग रहना होगा, देखना होगा कि कोई इस उड़ान पर जाल न फेंक दे, कोई बहेलिया छिप-छिपाकर इस जमात में न शामिल हो जाये जो नयी कोंपल की शक्ल में उगते सपनों को पिंजरे  में कैद कर दे या उन पर छुरी चला दे। 
शायद इसीलिए अविनाश जी और उनके हम जैसे तमाम मित्र यह चाहते हैं कि ब्लॉग अपनी निजी डायरी की छवि से बाहर निकले। निजी जीवन की मनोरंजक उत्तेजनाओं का जो आनंद है, ब्लॉग उससे मुक्ति पाये। जब हम दूसरों के दुख की पहचान कर पायेंगे, उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा की तरह देख पायेंगे और उन लोगों को भी पहचान सकेंगे, जो उन दुखों के अंधियारे चीरकर कुछ रोशनी करने के लिए लड़ रहे हैं, ऐसी रोशनाई की चमक मनों में चमकाना चाह रहे हैं,  तभी हम ब्लॉगों में जीवन की जीवंतता, उसके संघर्ष, उसकी सफलता का चित्र उकेर सकेंगे.  तभी हम सूरज की, रोशनी की बात कर पायेंगे और तभी हम विपन्नता के पायदान पर खड़े अकिंचनों को ऊपर उठाने में कामयाब होंगे। ब्लॉगलेखकों की ऐसी दृष्टि निश्चय ही चिंतन और संघर्ष की नयी चेतना जगाने में कामयाब होगी। यही तो अविनाशजी की नयी दुनिया की कल्पना है। भले ही वह आरंभ में छोटी हो पर धीरे-धीरे वह विस्तार लेगी, लोग जुड़ते जायेंगे और कारवां बनता जायेगा। ऐसा ही एक कारवां बना आगरा में. इसे ही आप चाहें तो ब्लॉगर मिलन कह सकते हैं।
 
सोम ठाकुर के जीवंत गीतों की प्रेरणा समझिये या डॉ. बीना शर्मा जी के प्रयासों का आकर्षण, हम सोमवार की सुबह प्रयास के आंगन में उन बच्चों के साथ थे, जिन्हें अगर प्रयास के हाथ बढ़कर नहीं थामते तो उनकी जिंदगी का अंधेरा और गहरा हो जाता। मैं था, अविनाशजी थे, सरवत जमाल साहब थे, अल्का मिश्र थीं। बच्चे सामने थे, घंटे भर बातचीत हुई। लखनऊ से आये शायर सरवत जमाल ने बच्चों को लखनऊ की तहजीब के बारे में बताया, वहां के भूगोल की जानकारी दी और उनसे वचन लिया कि वे जिंदगी में झूठ नहीं बोलेंगे, खूब पढ़ेंगे और दूसरों की मदद करेंगे। अविनाशजी ने जीवन में सद्गुणों की, अनुशासन की  जरूरत पर जोर दिया। अल्काजी ने अपने आयुर्वेद के कुछ जीवंत नुस्खे बताये। धूप चढ़ रही थी, इसलिए बच्चों को छोड़ दिया गया और हम सब बीनाजी के ड्राइंग रूम में जम कर बैठे। फिर अपने आस-पास की उस दुनिया के बारे में बात हुई, जो धीरे-धीरे अपना संवेदन खो रही है। इस धारा को कैसे पलटा जाय और इसमें ब्लॉगरों का क्या योगदान हो सकता है, इस पर भी विचार हुआ। बातचीत में अविनाशजी, जमाल साहब, अल्का जी, बीनाजी के अलावा बीनाजी के पुत्र डॉ. वरुण भारद्वाज, सुधीर कुमार जी और ओम प्रकाश मखीजाजी पूरी तन्मयता से शामिल रहे। मैं भी रहा। ये सभी किसी न किसी रूप में ब्लॉग की दुनिया से जुड़े हुए हैं। तो यह ब्लॉगर मिलन ही तो रहा। 
पर यह मिलन इस दायरे से बाहर भी फैला रहा। जिन लोगों को पता था कि अविनाशजी आगरा में हैं, उनमें से कुछ ने उसी समय फोन किये, जब हम विचार-विमर्श में व्यस्त थे। शशि सिंहल, शिवम् मिश्र  और पाखी से प्रतिभाजी अनायास ही इस मिलन का हिस्सा बन गये । मैं उन लोगों को भी इस दायरे में शामिल करता हूं जो किसी न किसी रूप में इस आगरा चर्चा को लेकर उत्सुक रहे, जिन्होंने नुक्कड़ पर पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्शायी। उड़नतश्तरी की ओर से  प्रणाम बांचा गया, वेद व्यथित और राम त्यागी की शुभकामनाओं से बल मिला और सजीव शर्मा, शशिजी तथा शिवम् की हाजिरी लगाई गयी. ये सभी एक तरह से मिलन में उपस्थित रहे.  इसके अलावा घर से न निकल पाने के बावजूद डॉ. त्रिमोहन तरल हमारे साथ रहे। उनका गहराइयां ब्लॉग निजी डायरी की तरह होकर भी अपने सार्वजनीन संदेशों के कारण हमारी नजर में है। उन्हें सलाह दी गयी कि वे अपना ब्लॉग सार्वजनिक करें, ब्लॉग संयोजकों से जोड़ें। शाम होते-होते व्यंग्यकार डॉ. राकेश शरद से भी अविनाशजी की मंत्रणा हो गयी। वे व्यंग्यम् शरणम् गच्छामि नाम से ब्लॉग लिखते हैं। यह ब्लॉग यात्रा का एक पड़ाव भर है। अभी  आज-कल दो दिन और अविनाशजी आगरे में हैं। उम्मीद है कि यह समय भी रचनात्मक सोच-विचार के साथ ही गुजरेगा।   
अविनाशजी की यह ब्‍लॉगर मिलन यात्रा थमेगी नहीं अपितु 24 जून 2010 को जयपुर पहुंचेगी और हिन्‍दी ब्‍लॉग क्रांति के चतुर्दिक स्‍नेह की यह मिसाल ज्‍वाला बन कर हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के ब्‍लॉगों की और उनके मन की रोशनाई बनके हिन्‍दीहित में अपनी संपूर्णता में दहकेगी।  
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