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आओ आजादी की क्‍लोजिंग करें - डीएलए में पढ़ें

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हिन्‍दी ब्‍लॉगर, तथाकथित अनजान ब्‍लॉगर के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए अमिताभ बच्‍चन की चेतावनी का समर्थन करते हैं

हम आपके साथ हैं बिग भाई
समाचार पढ़ने के लिए इमेज पर क्लिक कीजिएगा
यह अमिताभ बच्‍चन जी की सराहनीय पहल है। 
इन अनजान और बदतमीज ब्‍लॉगर और उनके समूह पर अंकुश लगाए जाने और उन्‍हें सजा दिए जाने का मैं समर्थन करता हूं। जबकि मेरा यह भी मानना है कि इंटरनेट के जरिए एक्‍सेस करने वाले किसी भी व्‍यक्ति को यह सुविधा नहीं होनी चाहिए कि वो बिना पहचान जाहिर किए, किसी भी प्रकार की टिप्‍पणी कर सके अथवा ब्‍लॉग इत्‍यादि बना सके। अभिव्‍यक्ति की आजादी के यह मायने नहीं हैं कि आप बेनामी और छद्म रूप रखकर अनर्गल कहते रहें। ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं, जो कि सामने आकर इस प्रकार की बदतमीजियां करते हैं। इन पर लगाम लगाए जाने के लिए बिग भाई का कदम वक्‍त की एक बहुत बड़ी जरूरत है।  
इस मुहिम में हिन्‍दी ब्‍लॉगर, साथी अमिताभ बच्‍चन जी के साथ हैं, और बतौर टिप्‍पणी अपनी आवाज, उनकी बुलंद आवाज में शामिल करते हैं और उस बेनामी के निंदनीय कृत्‍यों की घोर भर्त्‍सना करते हैं। 
मैं उस विवरण में तो नहीं जाना चाहता, जिसकी वजह से मजबूर होकर बिग बी जी को यह निर्णय लेना पड़ा। 
हम सब आपके साथ हैं अमिताभ भाई। 
सादर /सस्‍नेह
नुक्‍कड़ ब्‍लॉग परिवार
(इसमें ब्‍लॉग लेखक और फालोअर्स और पाठक सभी सम्मिलित माने जाएंगे।)
नवभारत टाइम्‍स दिनांक 31 अगस्‍त 2010 के सौजन्‍य से  समाचार साभार
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मैने कैसे रची कामायनी-उत्तमा

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कंप्‍यूटर PC खरीदना है, कौन सा खरीदूं ? कहां से खरीदूं ?

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घर में घुसकर डॉ. जगदीश चंद्रिकेश को मार डाला

घर में घुसकर डा. जगदीश चंद्रकेश को मार डाला

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार डॉ. जगदीश चंद्रिकेश की कल रात उनके घर के अध्ययन कक्ष में हत्या कर दी गई. उनका आवास दिल्ली के लारेंस रोड पर स्थित है. एचटी ग्रुप की मैग्जीन कादंबिनी में करीब 25-26 वर्ष तक काम करने के बाद छह वर्ष पहले रिटायर हुए डा. चंद्रिकेश की हत्या किस इरादे से की गई, यह पता नहीं चल पाया है. वे अपने मकान के उपर बने अध्ययन कक्ष में सोए हुए थे. हत्यारों ने अध्ययन कक्ष में घुसकर उनकी जान ले ली. वे इन दिनों एक किताब लिखने में लगे हुए थे. कुछ महीनों पहले ही उनकी तीन-चार किताबें मार्केट में आईं.



आगरा के रहने वाले डॉ. जगदीश चंद्रिकेश पुरातत्व व संस्कृति के विशेषज्ञ माने जाते थे. इन विषयों पर उन्होंने काफी कुछ काम किया है. डॉ. चंद्रिकेश की उम्र करीब 67 वर्ष रही होगी. आज सुबह परिजन जब स्टडी रुम गए तो उनकी लाश खून से लथपथ मिली. डॉ. चंद्रिकेश दिल्ली प्रेस प्रकाशन समूह में भी काम कर चुके हैं. बताया जाता है कि उनके घर में पहले भी एक बार चोरी हो चुकी है. उनके शव के अंतिम संस्कार की तैयारी की जा रही है. डॉ. चंद्रिकेश की हत्या की खबर जिसे भी मिल रही है, वह हतप्रभ हो जा रहा है. सभी का यह कहना है कि राजधानी दिल्ली जैसी जगह पर किसी पत्रकार-साहित्यकार की इस तरह हत्या हो जा रही है, यह बेहद शर्मनाक है. यह सब तब हो रहा है जब कामनवेल्थ गेम्स बहुत नजदीक हैं और पुलिस के लोग चप्पे चप्पे पर सुरक्षा का दावा कर रहे हैं.

भड़ास 4 मीडिया से साभार
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अविनाश के सम्मान में आगरा में ब्लागर मीट

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आगरा ब्‍लॉगर मिलन : एक सचित्र रिपोर्ट

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ब्यूटी का बाज़ार या बाज़ार की ब्यूटी...?

इसे माया की विडम्बना कहें या विडम्बना की माया, चकाचौंध से भरी फैशन और खूबसूरती की दुनिया के पीछे भी जो माया रची जाती है उसमें बाज़ार का एक बना बनाया फ़ॉर्मूला काम करता है। हमारे लिए इस माया कि विडम्बना यह है कि इसने पिछले कुछ सालों में हमारे देश की महिलाओं की पूरी सोच और समझ को ही बदल के रख दिया है ।
कृपया पूरी पोस्ट यहाँ पढ़ें......
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लो कर लो कमाई : खबर खुशी की है आई : आप भी पढ़ लो ब्लॉगर भाई

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क्या आप चेतन भगत के बात से सहमत हैं?

(सुनील)
प्रसिध्द लेखक चेतन भगत के 26 अगस्त, दैनिक भास्कर में कॉमनवेल्थ गेम्स पर छपी उस लेख जिसमें उन्होंने देश की जनता से इस खेल का बहिष्कार और स्टेडियम में न जाने की अपील की है, क्या उचित है और क्या आप उनके इस बात से सहमत है। स्तंभ में छपी कुछ बातें -
'यदि हम इस आयोजन का समर्थन करते हैं तो यह हमारी गलती होगी। यह भारत के नागरिकों के लिए एक सुनहरा मौका है कि वे इस भ्रष्ट और संवेदनहीन सरकार को शर्मिंदगी का एहसास कराए। आमतौर पर भ्रष्टाचार के मामले स्थानीय होते हैं और वे पूरे देश का ध्यान नहीं खींचते लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों के मामले में ऐसा नहीं है। यह एक ऐसा आयोजन है जिसमें किसी एक क्षेत्र या प्रदेश विशेष की जनता नहीं बल्कि पूरे देश की जनता ठगी गई है। यह सही समय है जब हम भ्रष्टाचार के खेल का पर्दाफाश कर सकते हैं और इसके लिए हमें वही रास्ता अख्तियार करना होगा, जो हमें बापू ने सुझाया है - असहयोग। मैं काफी सोच-समझकर ऐसा कह रहा हूं। राष्ट्रमंडल खेलों का बहिष्कार करें। न तो खेल देखने स्टेडियम में जाएं और न ही टीवी पर देखें। हम धोखाधडी के खेल में चीयरलीडर की भूमिका नहीं निभा सकते। भारतीयों का पहले भी काफी शोषण किया जा चुका है। अब हमसे यह उम्मीद करना और भी ज्यादती होगी कि इस खेल में मुस्कुराते हुए मदद भी करें। यदि वे संसद से वॉकआउट कर सकते हैं तो हम भी स्टेडियमों से वॉकआउट कर सकते हैं।'
      ये सच है कि गेम्स से जुडे अधिकारियों और नेताओं ने भ्रष्टाचार की नई मिसाल खडी करते हुए भारत की प्रतिष्ठा को ताक पर रख दिया है। उन्होंने तो आदतन वैसा ही किया जैसा उनसे उम्मीद की जाती है। यदि ऐसे में देश की जनता भी स्टेडियमों में जाने से इंकार कर दे तो विश्वस्तर पर हमारी क्या इज्जत रह जाएगी। ये वक्त देश में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के बहिष्कार का नहीं बल्कि हमारी प्राथमिकता इसके सफल आयोजन पर होनी चाहिए। हमें यह याद रखना होगा कि ये कोई घरेलू आयोजन नहीं है, पूरे विश्व की इस पर नजर है। ऐसे में देश की जनता का सहयोग नितांत जरूरी है। जरा सोचिए कि देश में होने वाले गेम्स में यदि भारतीय दर्शक नजर नहीं आएंगे तो विश्व में हमारी क्या छवि रह जाएगी। इस गेम में देश का हजारों करोड रुपया फंसा हुआ है और यदि भारतीय दर्शक स्टेडियम नहीं पहुंचते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। जहां तक बात है बापू के असहयोग आंदोलन का तो वह विदेशी दुश्मनों को देश से बाहर खदेडने के लिए था लेकिन यहां तो देश का दुश्मन अपने ही लोग हैं। इनसे निपटने के लिए नेताओं का असहयोग करना होगा न कि खेलों का।
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रक्षा बंधन के तीन दिन बाद आपने कुछ क्‍यों नहीं लिखा है

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ब्‍लॉ‍गविद्या के बाबा रामदेव, व्‍यंग्‍यकार डॉ. राकेश शरद की कलम ने जो कहा : आप भी पढि़ए


जानने की उत्‍कंठा जाग गई है तो आज चार बजे मेरी चौखट पर आपका स्‍वागत है। चौखट पर आइये और जानिये कि कौन हैं हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के बाबा रामदेव। तब तक आप कयास लगा सकते हैं। इन कयासों को टिप्‍पणी के तौर पर नीचे जमा कर सकते हैं। जिनका अनुमान शत-प्रतिशत ठीक बैठेगा। उन्‍हें बतौर टिप्‍पणी उनकी सभी पोस्‍टों पर ब्‍लॉगिंग के बाबा रामदेव की यूनीक टिप्‍पणी के लिए संस्‍तुति की जाएगी। इसलिए मौका मत चूकिए। व्‍यंग्‍यकार डॉ. राकेश शरद आज यह राज खोल रहे हैं।
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अनु शर्मा से मिलने आ रहा हूं : मन मेरा प्रसन्‍न है # कहां जा रहा हूं मैं (अविनाश वाचस्‍पति)

http://uday-prakash.blogspot.com/

अनु शर्मा 

कौन हैं ?

कहां हैं 
क्‍या करते हैं
बतला चुका हूं मैं

मिलता हूं वहां पर
डॉ. मुनीश्‍वर
जिनके नाम भूलवश रह गए हैं, वे कृपया टिप्‍पणी में सूचित करने का कष्‍ट करें ताकि उन्‍हें जोड़ा जा सके। 
इनके नाम पर क्लिक करके आप इन सबसे मेरे से पहले मिल सकते हैं, मैं  तो इनसे 24 - 25 अगस्‍त 2010 को मिल रहा हूं।
उड़ते-छपते खबर मिली है शिवम् मिश्रा जी के दर्शन भी हो सकते हैं।
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हरिशंकर परसाई के लेखन के उद्धरण







आज 22 अगस्त को व्यंग्य सम्राट स्व. हरिशंकर परसाई का 86 वा जन्मदिवस है, आइये उनकी याद में उनकी कुछ रचनाओं से कुछ  उद्धरण पढ़ते हैं।



1.इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.

2.जो कौम भूखी मारे जाने पर सिनेमा में जाकर बैठ जाये ,वह अपने दिन कैसे बदलेगी!

3.अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिये.जरूरत पडी तब फैलाकर बैठ गये,नहीं तो मोडकर कोने से टिका दिया.

4.अद्भुत सहनशीलता और भयावह तटस्थता है इस देश के आदमी में.कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले तो वह दान का मंत्र पढने लगता है.

5.अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है.

6.चीनी नेता लडकों के हुल्लड़ को सांस्कृतिक क्रान्ति कहते हैं, तो पिटने वाला नागरिक सोचता है मैं सुसंस्कृत हो रहा हूं.

7.इस कौम की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है.

8.अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.

9.जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छना पी जाते हैं .

10.नशे के मामले में हम बहुत ऊंचे हैं. दो नशे खास हैं--हीनता का नशा और उच्चता का नशा, जो बारी-बारी से चढ़ते रहते हैं.

11.शासन का घूंसा किसी बडी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बडी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूंसा पड़ जाता है.

12.मैदान से भागकर शिविर में आ बैठने की सुखद मजबूरी का नाम इज्जत है.इज्जतदार आदमी ऊंचे झाड़ की ऊंची टहनी पर दूसरे के बनाये घोसले में अंडे देता है.

13.बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है.

14.मानवीयता उन पर रम के किक की तरह चढती - उतरती है,उन्हें मानवीयता के फिट आते हैं.

15.कैसी अद्भुत एकता है.पंजाब का गेहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है और मध्यप्रदेश का चावल कलकत्ता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है. देश एक है. कानपुर का ठग मदुरई में ठगी करता है, हिन्दी भाषी जेबकतरा तमिलभाषी की जेब काटता है और रामेश्वरम का भक्त बद्रीनाथ का सोना चुराने चल पडा है. सब सीमायें टूट गयीं.

16.रेडियो टिप्पणीकार कहता है--'घोर करतल ध्वनि हो रही है.'मैं देख रहा हूं,नहीं हो रही है.हम सब लोग तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं.बाहर निकालने का जी नहीं होत.हाथ अकड जायेंगे.लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं फिर भी तालियां बज रही हैं.मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं ,जिनके पास हाथ गरमाने को कोट नहीं हैं.लगता है गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है.गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की तालियां मिलती हैं,जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा नहीं है.

17.मौसम की मेहरवानी का इन्तजार करेंगे,तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी.मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होता.वसंत अपने आप नहीं आता,उसे लाना पडता है.सहज आने वाला तो पतझड होता है,वसंत नहीं.अपने आप तो पत्ते झडते हैं.नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं.वसंत यों नहीं आता.शीत और गरमी के बीच जो जितना वसंत निकाल सके,निकाल ले.दो पाटों के बीच में फंसा है देश वसंत.पाट और आगे खिसक रहे हैं.वसंत को बचाना है तो जोर लगाकर इन दो पाटों को पीचे ढकेलो--इधर शीत को उधर गरमी को .तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसंत.

18.सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं.एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की.उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है.चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है.पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं.वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं.हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है.

19.एक और बडे लोगों के क्लब में भाषण दे रहा था.मैं देश की गिरती हालत,मंहगाई ,गरीबी,बेकारी,भ्रष्टाचारपर बोल रहा था और खूब बोल रहा था.मैं पूरी पीडा से,गहरे आक्रोश से बोल रहा था .पर जब मैं ज्यादा मर्मिक हो जाता ,वे लोग तालियां पीटने लगते थे.मैंने कहा हम बहुत पतित हैं,तो वे लोग तालियां पीटने लगे.और मैं समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसे,उसमे क्या कभी कोई क्रन्तिकारी हो सकता है?होगा शायद पर तभी होगा जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबडे टूटेंगे .

20.निन्दा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं.निन्दा खून साफ करती है,पाचन क्रिया ठीक करती है,बल और स्फूर्ति देती है.निन्दा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं.निन्दा पयरिया का तो सफल इलाज है.सन्तों को परनिन्दा की मनाही है,इसलिये वे स्वनिन्दा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं.

21.मैं बैठा-बैठा सोच रहा हूं कि इस सडक में से किसका बंगला बन जायेगा?...बडी इमारतों के पेट से बंगले पैदा होते मैंने देखे हैं.दशरथ की रानियों को यज्ञ की खीर खाने से पुत्र हो गये थे.पुण्य का प्रताप अपार है.अनाथालय से हवेली पैदा हो जाती है.
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नाइस वाले सुमन जी ने मुँह खोला।

nice वाले सुमन जी ने मुँह खोला। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए सुमन जी ने मेरे ब्लॉग पर एक शेर कहा, आप भी गौर फरमाएँ  :-
गाँधी के सपनो का यह भारत, यही स्वराज्य का मूल मन्त्र है।
सौगंध तुम्हे सत्ताधीशों, सच बतलाओ यह लोकतंत्र है ॥
nice 

पोस्ट और उनका कमेन्ट आप भी देख सकते हैं। 
http://vyangyalok.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html
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यार हद होती है चापलूसी की भी....

क्या होता जा रहा है हमारे मीडिया को? खबरें खोजने की बजाये हमारे पत्रकार महिमामंडन या कटु परन्तु सीधी-सपाट भाषा में कहें तो चापलूसी पर उतर आये हैं.क्या राहुल गाँधी का एक पोलीथीन का टुकड़ा उठाकर कचरापेटी में डालना इतनी बड़ी खबर है जिसे घंटों तक आम आदमी को झिलाया जाये? आप पूछ सकते हैं कि मुझे क्या पड़ी थी लगातार उस खबर को देखने की? तो साहब सभी न्यूज़ चैनलों का यही हाल है.जब पूरी दाल ही काली हो तो फिर बेस्वाद दाल खाना मज़बूरी हो जाती है.यह माना जा सकता है कि चैनल राहुल कि सादगी को आम लोगों को प्रेरित करने के लिए दिखा रहे थे तो इतनी प्रेरणा किस काम की, कि देखने वाले को ही खीज होने लगे. शायद इसीलिए लोग चिडकर यह कहते सुने गए कि राहुल गाँधी ने कौन सा अलग काम किया है-अरे वे अपने पिता की समाधि को ही तो साफ़-सुथरा कर रहे थे और यह परंपरा तो सदियों से हमारे समाज का हिस्सा है कि हम अपना घर/पूर्वजों का स्थान/आस-पास का क्षेत्र साफ़ रखते हैं.
पूरा पढ़ने के लिए देखें:www.jugaali.blogspot.com
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हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के आसाराम बापू कौन हैं ?

बतलाइये जल्‍दी से
दौड़ाइये मानस बहुत तेज
जिनकी आती हैं
खूब सारी पोस्‍टें
या उनकी पोस्‍टों पर
आती हैं बेशुमार टिप्‍पणियां।

वही हो सकते हैं
या हो सकते हैं कौन
मत रहिये मौन
शीघ्र बतलाइये
पूछ कर भी आ सकते हैं
और सही बतलाने पर
पा सकते हैं पुरस्‍ कार।

पुरस्‍कार का निर्धारण
आसाराम बापू जी से ही
करवायेंगे
उन्‍हीं के हाथों से दिलवायेंगे
उससे पहले उनका एक इंटरव्‍यू
हम लेकर आयेंगे।

हम पूछ सकते हैं
विजेता से प्रश्‍न
आसाराम बापू जी ने
अगर बनाया होता
हिन्‍दी ब्‍लॉग
तो उसका क्‍या नाम होता ?

संभावित पुरस्‍कार विजेता
अभी से लगा सकते हैं
विचारों में गोता।
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हिन्‍दी साहित्‍य का स्‍वर्णिम काल है या शीशे का घर : आप क्‍या कहते हैं ?

मुझे क्लिक कर करके पढ़ सकते हैं
आप भी एक पत्‍थर मार कर देखिए
पर सचमुच का पत्‍थर मत उठा लीजिएगा
आपका मॉनीटर ही टूट कर बिखर जाएगा
यहां पत्‍थर टिप्‍पणी करके मारा जाता है
यह हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत का निराला अंदाज है
जो सबको खूब खूब बहुत खूब पसंद आता है।


दैनिक जनसत्‍ता दिनांक 19 अगस्‍त 2010 में प्रकाशित चौपाल स्‍तंभ में प्रकाशित श्री राजेन्‍द्र उपाध्‍याय का पत्र जो आपको मंथन के जरूर विवश करेगा। यह पत्र लेखों से भी अधिक सशक्‍त है।
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अच्छा रचनाकार अच्छा आलोचक हो सकता है.: प्रेम जनमेजय

कभी-कभी यूँ ही बातचीत में कोई ऐसी बात निकल आती है, जो बहुत महत्त्व की होती है. ऐसा ही हुआ व्यंग्य यात्रा और गगनांचल के सम्पादक प्रेम जनमेजय से बतियाते हुए. सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या एक रचनाकार अपनी रचनाओं का आलोचक हो सकता है? यह प्रश्न अनायास ही सामने आ गया और प्रेम जी ने उसका उत्तर भी दिया. हालाँकि उनकी सलाह थी कि यह विषय बहुत गंभीर है और इस पर गहराई और विस्तार से बात की जानी चाहिए लेकिन मैं चाहता हूँ कि उनकी संक्षिप्त टिप्पड़ी उन सभी लोगों तक पहुंचा दूं, जो लिखने-पढ़ने का काम करते हैं. बाद में इस पर विस्तार से चर्चा करूंगा.
पढ़ें बात-बेबात पर
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उषा राठौड की नन्ही शिकायत

उषा राठौड की बेटियों के प्रति सामाजिक सोच पर प्रहार करती एक मार्मिक रचना पढने के लिये यहां चटका लगायें
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क्या महिलाओं की सफलता के पीछे किसी का हाथ नहीं है.......?

अक्सर यह सुनने में आता है की पुरुषों की सफलता के पीछे किसी न किसी(माँ ,पत्नी, बहन) रूप में एक महिला का हाथ होता है। ऐसे में यह सवाल भी लाज़मी है की दुनिया भर में अपनी कामयाबी का परचम लहराने वाली भारतीय महिलाओं के पीछे क्या किसी पुरुष का सहयोग और साथ नहीं है? यह सच है की औरतों के साथ कुछ घरों आज भी सामंतवादी सोच के चलते अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता पर तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना जरूरी है। हमारे समाज में आज ऐसे घरों की भी कमी नहीं है जहाँ पूरे घर-परिवार से लड़कर भी पिता अपनी बेटियों को घर से दूर पढने और काम करने की इज़ाज़त देकर उनका हौसला बढ़ा रहे है। ऐसे जीवनसाथी भी मिल जायेंगे जिनके साथ और सहयोग से कई लड़कियां शादी के बाद भी अपनी पढाई लिखाई जारी रख रही हैं और करियर में नए आयाम छू रही है। बहन की कोई इच्छा पूरी न होने पर माता-पिता से लड़ने वाले भाई भी कम नहीं । मैंने ऐसे कई घर देखे हैं जहाँ करियर और पढाई के बाबत बहन पर रोकटोक हो तो भाई बहन की जमकर वकालत करते हैं।
आये दिन सफलता की नयी इबारत लिख रही महिलाओं के पीछे भी किसी न किसी रूप में पुरुषों का सहयोग जरूर है। फिर चाहे वो मनोबल और मार्गदर्शन देने वाले पिता हों, संबल देने वाला जीवनसाथी या बहन की सफलता से गौरान्वित होने वाले भाई।
मौजूदा दौर में सशक्त बनती बेटियों के पीछे उनके स्नेहिल पिताओं का बहुत बड़ा हाथ है। क्योंकि बात चाहे ऊंची तालीम की हो या करियर बनाने की बेटियों को पीछे रखने का विचार भी उनके मन में नहीं होता। आज के पापा बेटी की परवरिश में भी कोई कमी नहीं रखना चाहते। अनुशासन और व्यवहारिकता का पाठ पढ़ने वाले पापा ही बेटी के सपनों को पंख फ़ैलाने का असमान देते हैं । पिता के रूप में एक पुरुष बेटी के जीवन की नीव को वो मजबूती देता है जिसके दम पर वो पूरी जिंदगी हौसले के साथ जी सकती है। तभी तो आजीवन बेटियां अपने पिता के व्यक्तित्व से प्रभावित रहतीं हैं। इसी तरह स्नेह और सुरक्षा का नाता भाई बहन का होता है। भाई जो चाहे उम्र में छोटा हो या बड़ा बहन के लिए हमेशा फिक्रमंद रहता है। आजकल कई घरों में देखने में आ रहा है की बहन कि पढ़ाई या नौकरी के बारे में अगर माता-पिता को कोई संकोच होता है तो भाई उन्हें समझाते हैं कि लड़कियों का पढना लिखना कितना जरूरी है? हर तरह से बहन का बचाव करना हमारे यहाँ के भाई अपना फ़र्ज़ समझाते है।

शादी के बाद किसी महिला के लिए संबल और स्नेह का स्रोत होता है पति का साथ। बीते कुछ बरसों में जीवनसाथी की सोच में आये सकारात्मक बदलावों ने महिलाओं को और सशक्त किया है। वे पत्नी की तरक्की में अपना पूरा योगदान दे रहे हैं। देखने में आ रहा है उन्हें पत्नी कि कामयाबी और उपलब्धियां हीन भावना नहीं देतीं बल्कि गौरव का अहसास कराती हैं । बहुत अच्छा लगता है यह देखकर कि शादी के बाद भी कई पति अपनी पत्नी को आगे पढने और आत्मनिर्भर बनने कि राह सुझाते हैं और ज़रुरत पड़े तो परिवार के उन सदस्यों से भी लड़ जाते हैं जिनकी सोच रूढ़िवादी है।
हमारे समाज में ऐसे परिवारों की गिनती आज भले कम है जहाँ बेटियां पिता की विरासत तक संभाल रही हैं पर हकीकत यह भी है की इस संख्या में हो रहा इजाफा उस बदलाव की ओर इशारा करता है जहाँ पुरुषों को हर हाल, हर रूप में शोषक की उपाधि देना सही नहीं है। क्योंकि जिंदगी के अच्छे-बुरे वक़्त में पिता, पति या भाई किसी न किसी रूप में पुरुष भी हमारे साथ खड़े नज़र आते है।








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हरि शर्मा - नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे: क्रिकेट के नियम बने खलनायक - सहवाग है असली नायक

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नो डैथ नो एयर क्रेश !

                        ये पुस्तक आजाद हिंद फौज की रानी झाँसी रेजिमेंट लेफ्टिनेंट मानवती आर्या की पुस्तक है -  "नो डैथ नो एयर क्रेश "  इस पुस्तक में नेताजी के गुमनामी  का रहस्य उजागर किया गया है.
                        :"सुभाषचंद्र बोस के जीवन से जुड़ी विमान दुर्घटना जापानियों की मदद से नेताजी द्वारा ही तैयार एक नाटक था, क्योंकि तात्कालिक राजनैतिक कारणों से नेता जी को सोवियत संघ में शरण लेनी पड़ रही थी. बाद में गुमनामी बाबा की मृत्यु कि बाद मिले प्रमाण संकेत करते हैं कि वह नेता जी ही हो सकते हैं. "
                          शायद ये हमारा दुर्भाग्य है कि आजादी के इस वीर सिपाही को अपनी ही आजाद देश में गुमनामी बाबा के नाम से शेष जीवन व्यतीत करना पड़ा.  ये प्रश्न कई बार उठा कि सुभाष जीवित हैं लेकिन न हमारी सरकार ने उनको खोजने कि कोशिश की और न ही जानने की. ऐसा सिपाही जिसने अपने शेष जीवन को देश की आजादी के नाम पर कुर्बान कर दिया. मालाएं वे पहनते रहे जो अंगुली कटा कर शहीद कहलाये, नहीं तो जो वाकई सेनानी थे वे चले गए या फिर सुभाष बन गए. हमने तो सदा ही आजादी गाँधी  की देन समझी . १८५७ से १९४७ तक जो अपना जीवन होम कर गए वे बागी के नाम से जाने गए.
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नेताजी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ के दिन किसी विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी।

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गोली से न डराएं किसानों को

सरकार को किसान और कृषि क्षेत्र के लिए स्पष्ट नीति बनानी होगी अन्यथा  मुश्किलों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। छल, कपट या दमन  का कोई भी रास्ता अगर अख्तियार किया जाता है तो किसानों को भी उसके प्रतिकार का विकल्प चुनना पड़ेगा। बेहतर होगा कि सरकार मुआवजे के लिए छिड़े इस आंदोलन को नंदीग्राम या सिंगुर जैसी लड़ाई में बदलने की भूमिका न बनाये और किसानों के पक्ष में माकूल फैसला करे।     
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हिन्दी ब्लोग्गिंग का स्वर्णिम काल आया है

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अदरक बुला रही है, सीटी नहीं बजा रही है

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हिन्‍दी ब्‍लॉगरों : पुरस्‍कार में मोबाइल देने के लिए ज्‍यूरी का गठन किया जा रहा है : नाम भजें

और जो ज्‍यूरी में शामिल होंगे
उन्‍हें मोबाइल नहीं मिलेगा
इसलिए बतलाइये इस ज्‍यूरी में
कौन-कौन आना चाहते हैं
वैसे आप किसी का नाम
शामिल करने के लिए
भेजना चाहते हैं तो
स्‍वागत है
पर सावधान रहिएगा

निर्णय ज्‍यूरी का ही
होगा मान्‍य
कि किस ब्‍लॉगर को
पुरस्‍कार में कौन सा
मोबाइल दिया जाये

इसके लिए अलग से कोई
प्रविष्टियां नहीं मंगाई गई हैं
वे हिन्‍दी ब्‍लॉगर ही पात्र होंगे
मोबाइल फोन पुरस्‍कार में पाने के
जिन्‍होंने मेरे ब्‍लॉगों पर सिर्फ
व्‍यंग्‍यों पर अपनी टिप्‍पणियां की होंगी

वैसे प्रविष्टियां मतलब टिप्‍पणियां
सितम्‍बर 2010 के पहले सप्‍ताह तक
खुली रहेंगी
टिप्‍पणियां नई पुरानी व्‍यंग्‍य पोस्‍ट
मतलब किसी पर भी किसी जा
सकती हैं पर सात सितम्‍बर के बाद
की गई टिप्‍पणियां अगले बरस के लिए
वैध होंगी
जब पुरस्‍कार में नोटबुक दी जाएगी
पर शर्त वही रहेगी
कि आपका नाम ज्‍यूरी के लिए
न किया गया हो प्रस्‍तावित।

जो शामिल होना चाहें
वे बेहिचक आएं पर
जांच लें कि कहीं उनके नाम की संस्‍तुति
उनके किसी ब्‍लॉगर बंधु ने
ज्‍यूरी में शामिल करने के लिए
न कर दी हो।

ब्‍लॉग सूची यहां पर मिलेगी
मैं आपसे मिलना चाहता हूं


I had a beautiful translation of your blog by google-
  And the jury will include
They will not find mobile
So the jury Bhliye
Who - Who wants to come
You name it
To include
Want to send
Welcome
But careful Arhicga

The decision of the jury
Be valid
Which Blogger
Which Awards
Mobile must be delivered

For that no separate
No entries have been floated
They will be eligible only Hindi Bloggers
Mobile phones to get award
Just me who blogs
Wyngyoan of their comments will be

It means Entries Comments
By the first week of September 2010
Will open
New Old satirical comments posted
Anyone going to mean a
Can the seven following September
Next year for the comments
Be valid
Awards will be given when the notebook
Would bet on him
Your name for jury
Has not been proposed.

Who want to join
They feel free to come
Check whether their names recommended
A blogger by his brothers
Jury to include
Not be made.

It will list Blogs
I want to meet you
मैं आपसे मिलना चाहता हूंby Ratna Pathak thanks to Ratna ji angreji ke pathko ke liye.
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बरसात की बेबाक बयानी

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सूनापन:शेखावत हिम्मत की पहली रचना

बॉलीवुड में फेशन फोटोग्राफी करने वाले हिम्मत सिंह शेखावत में आज हिंदी ब्लॉग जगत में अपना पहला कदम रखते हुए ज्ञान दर्पण पर एक शानदार रचना प्रस्तुत की | जो आप यहाँ चटका लगाकर पढ़िए व हिम्मत सिंह शेखावत का हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत कीजिये
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गाली भी सुनेगा और साहब भी बोलेगा यह जमाना अब नहीं चलेगा

विभूति नारायण राय कोई इकलौते पुलिस वाले तो है नहीं, जिन्होंने महिलाओं को छिनाल कहा हो / हिंदी भाषी क्षेत्र के किसी भी थाने में आप चले जाइए, थानेदार , मुंशी, हवलदार या फिर सिपाही दिन में कई बार कई महिलाओं को उनके सामने ना जाने कितनी तरह की गालियाँ देते है और उनकी शिकायत सुने बगैर थाने से गाली कर्देज भगा देते है / ये महिला बिरादरी या साहित्यकारों की बिरादरी को इस बात में गुस्सा नहीं आता है कि, थाने में महिलाओं को जाते हुए डर लगता है, क्योंकि पुलिस वाले महिलाओं के साथ बुरा सुलूक करते है, गाली देते है और मौक़ा देख कर छेडते है, थाने में बलात्कार की भी कई घटनाएं हुई है / लेकिन इन पढ़े लिखे बुद्धिजीवी लोगों को इससे फरक नहीं पडता है और ना ही वे इस पर कोई सार्वजनिक चर्चा करते है / चूंकि विभूति नारायण राय जो कि एक सेवानिवृत्ति पुलिस वाले है, और वर्धा विश्वविद्दालय के कुलपति है ने बुद्धिजीवी महिलाओं को छिनाल कह दिया तो कोहराम मच गया अखबार, मैग्जीन, इन्टरनेट और रेडियो सब के सब एक सुर से इस प्रकरण में चर्चा में जुट गए / चर्चा का पटाछेप हुआ विभूति नारायण के सार्वजनिक रूप से माफी मागने के बाद / पुलिस महकमा और हिंदी भाषी राज्यों के गृह विभाग कब अपने पुलिस वालो के द्वारा गरियाई गयी, छेड़ी गयी या प्रताडित की गयी महिलाओं से माफी मागेंगे / मुझे इन्तेज़ार रहेगा उस दिन का, हालांकि उम्मीद कम है, क्योंकि वे महिलाए जिन्हें पुलिस वाले गाली देने के पहले एक बार भी नहीं सोचते कि उनके खुद के घर में भी कुछ या एकाध महिला तो होंगी ही / गाली देना, डाट कर बात करना या फिर बात - बात पर घुडकी देना झापड़ मारना तो जैसे पुलिस वाले का कर्तव्य है/ मैं स्वयं देखा या सूना तो नहीं है लेकिन दूसरों से सूना है कि, जब पुलिस वालो को प्रशिक्षण दिया जाता है तो उन्हें गाली देना भी सिखाया जाता है / हमारे समाज में गाली देना और मारना पीटना नैतिक और कानूनी रूप से गलत माना जाता है / फिर पुलिस वालों को अनैतिकता का पाठ क्यों पढाया जाता है ? गाली देना मारना पीटना क्यों सिखाया जाता है, क्यों नहीं उन्हें मनोविज्ञान, समाजविज्ञान और अपराधशास्त्र का पाठ पढाया जाता है जिससे वे सही मायने में जन सेवा कर सके जिसके लिए पुलिस विभाग होना चाहिए / सभ्य पुलिस वाले होगे तो पूरे देश कि महिलायों को किसी पुलिसवाले से कभी कोई शिकायत नहीं होगी / थाने में जाते हुए किसी कलावती या फूलकली को डर नहीं लगेगा कि, दरोगा बाबु शिकायत सुनने के पहले भी गाली देंगे और सुनने के बाद भी / जिन लोगों ने विभूति नारायण के छिनाल कहने के बाद महिलाओं के बारे में सोचा, कुछ लिखा या कुछ पढ़ा कृपया भारत की सभी महिलाओं के बारे में भी कुछ लिखो, एक विभूति के माफी मागने से महिलाओं की जीत नहीं हो सकती सभी पुलिसवालों को माफी मागनी चाहिए देश की सभी महिलाओं से / पुलिसवालों के प्रशिक्षण के तरीकों में जरूरी बदलाव किये जाए जिससे एक अच्छी पुलिस व्ववस्था बन सके / पुलिस थाना भय का केंद्र नहीं होना चाहिए, भय का केंद्र होगा तो कभी कोई थाने में जाने से घबराएगा और जाएगा भी तो सच नहीं बोल पायेगा / बोलेगा वही जो पुलिस चाहेगी, गाली भी सुनेगा और साहब भी बोलेगा यह जमाना अब नहीं चलेगा /
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आजादी की निराली अदा

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आज किस बुनियाद पर मैं यह दिवस मनाऊ?

आज आम आदमी स्वतंत्र हैं भ्रष्टाचार सहने के लिए, अपमान सहने के लिए, स्वतंत्र हैं भुखमरि से मरने के लिए, वह आज भी परतंत्र है न्याय के लिए। आज किस बुनियाद पर मैं यह दिवस मनाऊ और आप को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं दूँ?
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आजादी के मायने-प्रेम जनमेजय

आजादी के मायने

बहुत गहरे मायने हैं हमारे देश की आजादी के। इतने गहरे की आप जितना डूबेंगें उतना ही लगेगा कि आप स्वयं को अज्ञानी समझेंगें। इन मायनों को समझने के लिए किसी शब्दकोश की आवश्यक्त नहीं है। वैसे जैसे प्रेम, प्यार, घृणा, अत्याचार, भ्रष्टाचार आदि के मायने नहीं बदलते हैं वैसे ही आजादी के मायने भी कभी नहीं बदलते हैं। हां आजादी का प्रयोग करने वाले बदलते रहते हैं।
आजादी से पहले अंग्रेज शासकों इस देश का धन विदेश ले जाने की आजादी थी अब स्वदेशी शासकों को वो आजादी है। पहले गोरे अफसर अपने ‘सदाचारण’ से दफतरों में जनता की सेवा करते थे और उनसे सेवा शुल्क लेने की उन्हें आजादी थे, अब काले अफसरों को यह आजादी है। थाने वही हैं और उनमें वही आजादी बरकरार है, बस थानेदार बदले हैं। पहले राजा प्रजा के विकास के नाम पर कर लगाकर अपना विकास करने को स्वतंत्र था आजकल मंत्रीपदों की शोभा बढ़ा रहे जनसेवक अपना विकास करने के लिए स्वतंत्र हैं। पहले कोई जर्नल डायर कितना भी अत्याचार कर ले, बस उसपर आयोग बैठता था और वो अपनी मौत मर जाता था, आजकल भी हमारा कानून वैसा ही है। पहले भी गरीब पिटता था आज भी उसे पिटने की पूरी आजादी है।
ऐसा नहीं है कि हमने आजादी के वही मायने समझे है जो हमारे पूर्वजों ने समझे थे। हमने अपनी समझ में पर्याप्त विकास किया है। हमने भ्रष्टाचार के कूंए के स्थान पर विशाल सागर का निर्माण किया है। हमने मंहगाई के क्षेत्र में अद्भुत विकास किया है। पहले बाजार को महंगाई बड़ाने का अधिकार था अब सरकार को भी है। हमने अमीरों को और अमीर तथा गरीबों केा और गरीब बनाया है। किसानों को आत्महत्या करने की हमने पूरी आजादी दे दी है। आज आजादी का मायना उसी के लिए है जिसकी जेब में पैसा है, जो ठनठन गोपाल है वह मंदिरों में भजन करता है और उपवास रखता है
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आजाद रहकर नौकरी करेंगे

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आजादी आजादी आजादी

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नाचो गाओ जश्‍न मनाओ 15 अगस्‍त है

लो फिर आ गया स्वाधीनता दिवस!

आज जगेगा देशप्रेम का जज्बा गीतों के माध्यम से

मदिरालय होंगे बंद, पर बिकेगी अवैध मदिरा

(लिमटी खरे)

14 और 15 अगस्त की दर्मयानी रात को 1947 में गोरे ब्रितानियों ने भारत को अपनी गुलामी की जंजीरों से आजादी दी थी। आजाद भारत को संवारने, दिशा देने में उस वक्त के शासकों ने बहुत सारे सपने देखे थे। इन सपनों को साकार करने का माद्दा भी था तत्कालीन शासकांे में। देश के आखिरी आदमी तक आजादी की खुशबू फैलाने के लिए वचनबद्ध थे उस वक्त देश पर शासन करने वाले कांग्रेस के नुमाईंदे। कालांतन मंे आजादी के मायने सिर्फ रसूखदार, नौकरशाह, जनसेवक और धनाड्य वर्ग के लोग ही समझ पाए। देश के गरीब गुरबे आज भी दो वक्त की रोटी के लिए रोज की मारामारी में इतना उलझकर रह गया है कि उसे इस बात का इल्म ही नहीं रहा कि असल आजादी क्या होती है।

विडम्बना देखिए सुबह उठकर पानी भरने से लेकर रात को सोने तक भारत गणराज्य का आम आदमी करों के भारी भरकम बोझ से लदा फदा ही नजर आता है। लोग टेक्स क्यों चुकाते हैं, जाहिर है कि भारत सरकार के पास नोट का पेड तो नहीं लगा है, जो वह आधारभूत संरचना, संस्थागत खर्चे, स्थापना व्यय आदि का भोगमान भोग सके। आजाद भारत में छः दशकों बाद आम आदमी की थाली में अनाज और नौकरशाह और जनसेवकों की मोटी पगार का ही अनुपात देख लिया जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है। आज चहुंओर भ्रष्टाचार, अनाचार की गूंज मची है। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस सबकों देख सुनकर आंखें मीचे न केवल बैठी है, वरन एसा उपजाउ माहौल प्रशस्त कर रही है कि इन सारी बातों की फसल और अच्छी तैयार हो सके।

हालात देखकर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज का युवा आजादी के मायने पूरी तरह से भूलता जा रहा है। सत्तर के दशक के उपरांत तो ब्रितानियों के कहर को चित्रित करने वाली रोंगटें खड़े कर देशवासियों के मन में देशप्रेम का सागर हिलोरे मारे इस तरह की फिल्में ही बनना बंद हो गईं। इस सबसे के लिए निश्चित तौर पर देश का सूचना और प्रसारण मंत्रालय ही जवाबदार माना जा सकता है। आज देशप्रेम का जज्बा जगाने के लिए 15 अगस्त, 26 जनवरी और 02 अक्टूबर के दिन ही जगह जगह गाने बजाए जाते हैं।

कितने जतन के बाद भारत देश में 15 अगस्त 1947 को आजादी का सूर्योदय हुआ था। देश को आजाद कराने, न जाने कितने मतवालों ने घरों घर जाकर देश प्रेम का जज्बा जगाया था। सब कुछ अब बीते जमाने की बातें होती जा रहीं हैं। आजादी के लिए जिम्मेदार देश देश के हर शहीद और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कुर्बानियां अब जिन किताबों में दर्ज हैं, वे कहीं पडी धूल खा रही हैं। विडम्बना तो देखिए आज देशप्रेम के ओतप्रोत गाने भी बलात अप्रसंगिक बना दिए गए हैं। महान विभूतियों के छायाचित्रों का स्थान सचिन तेंदुलकर, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार जैसे आईकान्स ने ले लिया है। देश प्रेम के गाने महज 15 अगस्त, 26 जनवरी और गांधी जयंती पर ही दिन भर और शहीद दिवस पर आधे दिन सुनने को मिला करते हैं।

गौरतलब होगा कि आजादी के पहले देशप्रेम के जज्बे को गानों में लिपिबध्द कर उन्हें स्वरों में पिरोया गया था। इसके लिए आज की पीढी को हिन्दी सिनेमा का आभारी होना चाहिए, पर वस्तुतः एसा है नहीं। आज की युवा पीढी इस सत्य को नहीं जानती है कि देश प्रेम की भावना को व्यक्त करने वाले फिल्मी गीतों के रचियता एसे दौर से भी गुजरे हैं जब उन्हें ब्रितानी सरकार के कोप का भाजन होना पडा था। देशप्रेम की अलख जगाने वाले गीतकारों को ब्रितानियों के कितने जुल्म का शिकार होना पड़ा था इस बात को भी आज की पीढी नहीं जानती।

देखा जाए तो देशप्रेम से ओतप्रोत गानों का लेखन 1940 के आसपास ही माना जाता है। उस दौर में बंधन, सिकंदर, किस्मत जैसे दर्जनों चलचित्र बने थे, जिनमें देशभक्ति का जज्बा जगाने वाले गानों को खासा स्थान दिया गया था। मशहूर निदेशक ज्ञान मुखर्जी द्वारा निर्देशित बंधन फिल्म संभवतः पहली फिल्म थी जिसमें देशप्रेम की भावना को रूपहले पर्दे पर व्यक्त किया गया हो। इस फिल्म में जाने माने गीतकार प्रदीप (रामचंद्र द्विवेदी) के द्वारा लिखे गए सारे गाने लोकप्रिय हुए थे। कवि प्रदीप का देशप्रेम के गानों में जो योगदान था, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।

इसके एक गीत "चल चल रे नौजवान" ने तो धूम मचा दी थी। इसके उपरांत रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जगाने का सिलसिला आरंभ हो गया था। 1943 में बनी किस्मत फिल्म के प्रदीप के गीत "आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है" ने देशवासियों के मानस पटल पर देशप्रेम जबर्दस्त तरीके से जगाया था। लोगों के पागलपन का यह आलम था कि लोग इस फिल्म में यह गीत बारंबार सुनने की फरमाईश किया करते थे।

आलम यह था कि यह गीत फिल्म में दो बार सुनाया जाता था। उधर प्रदीप के क्रांतिकारी विचारों से भयाक्रांत ब्रितानी सरकार ने प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया, जिससे प्रदीप को कुछ दिनों तक भूमिगत तक होना पडा था। पचास से साठ के दशक में आजादी के उपरांत रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जमकर बिका। उस वक्त इस तरह के चलचित्र बनाने में किसी को पकडे जाने का डर नहीं था, सो निर्माता निर्देशकों ने इस भावनाओं का जमकर दोहन किया। दस दौर में फणी मजूमदार, चेतन आनन्द, सोहराब मोदी, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे नामी गिरमी निर्माता निर्देशकों ने आनन्द मठ, लीजर, सिकंदरे आजम, जागृति जैसी फिल्मों का निर्माण किया जिसमें देशप्रेम से भरे गीतों को जबर्दस्त तरीके से उडेला गया था।

1962 में जब भारत और चीन युद्ध अपने चरम पर था, उस समय कवि प्रदीप द्वारा मेजर शैतान सिंह के अदम्य साहस, बहादुरी और बलिदान से प्रभावित हो एक गीत की रचना में व्यस्त थे, उस समय उनका लिखा गीत "ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी . . ." जब संगीतकार ए.रामचंद्रन के निर्देशन में एक प्रोग्राम में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने सुनाया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी अपने आंसू नहीं रोक सके थे।

इसी दौर में बनी हकीकत में कैफी आजमी के गानों ने कमाल कर दिया था। इसके गीत कर चले हम फिदा जाने तन साथियो को आज भी प्रोढ हो चुकी पीढी जब तब गुनगुनाती दिखती है। सत्तर से अस्सी के दशक में प्रेम पुजारी, ललकार, पुकार, देशप्रेमी, कर्मा, हिन्दुस्तान की कसम, वतन के रखवाले, फरिश्ते, प्रेम पुजारी, मेरी आवाज सुनो, क्रांति जैसी फिल्में बनीं जो देशप्रेम पर ही केंदित थीं।

वालीवुड में प्रेम धवन का नाम भी देशप्रेम को जगाने वाले गीतकारों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। उनके लिखे गीत काबुली वाला के ए मेरे प्यारे वतन, शहीद का ए वतन, ए वतन तुझको मेरी कसम, मेरा रंग दे बसंती चोला, हम हिन्दुस्तानी का मशहूर गाना छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी, महान गायक मोहम्मद रफी ने देशप्रेम के अनेक गीतों में अपना स्वर दिया है। नया दौर के ये देश है वीर जवानों का, लीडर के वतन पर जो फिदा होगा, अमर वो नौजवां होगा, अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं . . ., आखें का उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता. . ., ललकार का आज गा लो मुस्करा लो, महफिलें सजा लो, देश प्रेमी का आपस में प्रेम करो मेरे देशप्रेमियों, आदि में रफी साहब ने लोगों के मन में आजादी के सही मायने भरने का प्रयास किया था।

गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता मनोज कुमार का नाम आते ही देशप्रेम अपने आप जेहन में आ जाता है। मनोज कुमार को भारत कुमार के नाम से ही पहचाना जाने लगा था। मनोज कुमार की कमोबेश हर फिल्म में देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत गाने हुआ करते थे। शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम, क्रांति जैसी फिल्में मनोज कुमार ने ही दी हैं, जो फिल्म सादगी भरी कम बजट की होने के बाद भी उस दौर में बाक्स आफिस पर धूम मचा चुकी हैं।

अस्सी के दशक के उपरांत रूपहले पर्दे पर शिक्षा प्रद और देशप्रेम की भावनाओं से बनी फिल्मों का बाजार ठंडा होता गया। आज फूहडता और नग्नता प्रधान फिल्में ही वालीवुड की झोली से निकलकर आ रही हैं। आज की युवा पीढी और देशप्रेम या आजादी के मतवालों की प्रासंगिकता पर गहरा कटाक्ष कर बनी थी, लगे रहो मुन्ना भाई, इस फिल्म में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के बजाए शुष्क दिवस (इस दिन शराब बंदी होती है) के रूप में अधिक पहचाना जाता है। विडम्बना यह है कि इसके बावजूद भी न देश की सरकार चेती और न ही प्रदेशों की। जनसेवकों ने मुन्ना भाई के उस डायलाग पर ठहाके अवश्य ही लगाए होंगे, पर हंसने वाले जनसेवक यह भूल जाते हैं कि यह कटाक्ष आज के नेताओं पर ही है।

सत्तर के दशक में स्कूल का वो नजारा आज भी हमारे दिलो दिमाग पर जीवंत है, जिसमें पंद्रह अगस्त या 26 जनवरी का दिन छुट्टी का होता है से ज्यादा इस बात के लिए याद किया जाता था, कि इस दिन भारत आजाद हुआ या गणतंत्र की स्थपना हुई थी। इस दिन जिला मुख्यालय में मुख्य कार्यक्रम में जब नेताजी संदेश का वाचन करते थे, तब एक एक शब्द गौर से सुना जाता था। उस वक्त के नेता वाकई आदर्श हुआ करते थे, आज के नेताओं का नैतिक तौर पर इतना पतन हो चुका है कि आजादी के छः दशकों बाद भी देश में जात, पात, मजहब, भाषा, क्षेत्रीयता आदि जैसे मुद्दों पर लोगों को बांटकर राजनीति की जा रही है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार और राज्यों की सरकारें भी आजादी के सही मायनों को आम जनता के मानस पटल से विस्मृत करने के मार्ग प्रशस्त कर रहीं हैं। देशप्रेम के गाने 26 जनवरी, 15 अगस्त के साथ ही 2 अक्टूबर को आधे दिन तक ही बजा करते हैं। कुल मिलाकर आज की युवा पीढी तो यह समझने का प्रयास ही नहीं कर रही है कि आजादी के मायने क्या हैं, दुख का विषय तो यह है कि देश के नीति निर्धारक भी उन्हें याद दिलाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं।
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आएं हुजूर आपको यादों में ले चलूं...राजेश उत्‍साही

स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

समय मिले तो कभी आइए, आपका स्‍वागत है उत्‍सव के रंग  
और  उत्‍सव हमारे घर में 
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शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई -- 14

हिन्दी बोलने से परहेज ही करतीं हैं सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की प्राचार्य!


अंग्रेजी माध्यम शाला में एक परिचारिका के सहारे हिन्दी समझती और बोलती हैं प्राचार्य

सिवनी। भारत गणराज्य का इससे अधिक दुर्भाग्य और क्या होगा कि इसाई मिशनरी द्वारा जिला मुख्यालय सिवनी में संचालित होने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी के स्थान पर देश के उपर डेढ सौ से अधिक सालों तक राज करने वाले ब्रितानियों की अंग्रेजी भाषा को प्रमुखता से परोसा जा रहा हो। सिवनी में वैसे भी केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई का लालच देकर अनेक शालाओं द्वारा पालकों को भ्रमित कर उनकी जेब काटने का जतन किया जा रहा है।

गौरतलब है कि जिला मुख्यालय सिवनी में संचालित होने वाले और स्तरीय शिक्षण प्रदान करने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल स्कूल को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने मान्यता देने से साफ इंकार कर दिया है। इसका कारण यहां सीबीएसई के नार्मस के मुताबिक पर्याप्त भूखण्ड, खेल का मैदान, पुस्तकालय में किताबों की कमी और अप्रशिक्षित स्टाफ आदि को आधार बनाया गया है। इस लिहाज से चालू शैक्षणिक सत्र 2010 - 2011 के लिए सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को सीबीएसई बोर्ड ने मान्यता देने से इंकार कर दिया है।

शाला प्रबंधन द्वारा इस शाला में इसी शैक्षणिक सत्र के लिए कक्षा नवमीं में प्रवेश देकर कक्षाएं आरंभ की जा चुकी हैं। सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल इस मामले में पूरी तरह मौन साधे हुए है कि इस साल कक्षा नवमीं के प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों का नामांकन माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल या केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के तहत किया जाएगा। पालक असमंजस में हैं कि क्या करें? उधर शाला प्रबधन की रहस्यमय चुप्पी भी अनेक संदेहों को जन्म दे रही है।

शाला के विद्यार्थियों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार शाला की प्राचार्य या तो दक्षिण भारत की एक स्थानीय भाषा में ही बात करतीं हैं, या फिर वे पश्चिमी देशों में ज्यादातर बोली जाने वाली आंग्ल भाषा का इस्तेमाल ही करती हैं। बताया जाता है कि अगर प्राचार्य से भारत गणराज्य की राष्ट्रभाषा हिन्दी में बात की जाती है तो वे बगलें झांकने लगती हैं। देश की आधिकारिक भाषा हिन्दी को समझने और फिर जवाब देने के लिए सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की प्रायार्य अपनी एक सहायक शिक्षक (टीचर) पर पूरी तरह निर्भर हैं। कहा जाता है कि जिस दिन उक्त टीचर अवकाश पर होती हैं, उस दिन प्राचार्य को हिन्दी समझने में तकलीफ तो होती होगी ही साथ ही हिन्दी बोलने के मामले में उन्हें मौन वृत ही रखना होता है।

शाला के अंदरखाते से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो शाला में अध्ययापन करा रहा अधिकांश स्टाफ या तो दक्षिण भारत में अधिकांश स्थानों पर बोली जाने वाली भाषा में ही आपस में बात करते हैं या फिर आंग्ल भाषा में। विद्यार्थियों के बीच इस बात को लेकर कई तरह के चुटकले बनने भी आरंभ हो गए हैं। कभी भारत की आन बान शान का प्रतीक माने जाने वाला ''गुरू'' का उच्चारण भी सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में उपनिवेशवाद में बोले जाने वाला ''टीचर'' में तब्दील हो चुका है। जब उक्त टीचर्स आपस में दक्षिण भारत की एक विशेष भाषा में बात की जाती है तो विद्यार्थी एक दूसरे को यह ताने कसते भी पाए जाते हैं कि फलां टीचर उसे बुरा भला कह रहा है, क्यांेंकि विद्यार्थियों को उनकी बातचीत का ओर छोर ही पता नहीं चल पाता है।

विद्यालय में अध्ययनरत एक विद्यार्थी के पालक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि उन्हें डर है कि कहीं उनका बच्चा इस शाला में पढते पढते हिन्दी को पराई भाषा और दक्षिण भारत की बोली विशेष और आंग्ल भाषा को ही हिन्दी के बजाए अपनी मातृभाषा न समझने लगे। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि भारतीय पुरातन संस्कृति की हिमायती भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में अगर हिन्दी की चिंदी इस कदर उडाई जा रही हो और शासक ही खामोश बैठे हों।

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल चूंकि वर्तमान में केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के अधीन नहीं हुआ है, अतः सिद्धांततः वर्तमान में यह मध्य प्रदेश सरकार के नियंत्रण में है, फिर राज्य शासन की ओर से शिक्षा विभाग के पाबंद जिला शिक्षा अधिकारी, जिला प्रशासन के प्रभारी डिप्टी कलेक्टर आदि को इस तरह की शालाओं की अनियमितताओं की जांच करने में क्या तकलीफ है? अगर प्रशासन और शिक्षा विभाग शालाओं को लूट की खुली छूट दे रहा है तो इससे प्रशासन की मंशा भी स्पष्ट नजर नहीं आती है, कि प्रशासन आखिर इस मामले में विद्यार्थियों के साथ खडा हुआ है या फिर शाला प्रबंधन की कमियों को ढांकने का प्रयास कर रहा है।
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आइये जरा इधर भी घूम जाइये

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हे भारत माँ शत-शत बार प्रणाम
ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम,
भारत माँ  शत-शत बार प्रणाम।
तेरे उर में शायित गांधी, 'बुद्ध औ' राम,
भारत माँ शत-शत बार प्रणाम।
हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,
तेरे चरण चूमता सागर,
श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ
वाणी में है गीता का स्वर।
ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।
भारत माँ शत-शत बार प्रणाम।
हरे-भरे हैं खेत सुहाने,
फल-फूलों से युत वन-उपवन,
तेरे अंदर भरा हुआ है
खनिजों का कितना व्यापक धन।
मुक्त-हस्त तू बाँट रही है सुख-संपत्ति, धन-धाम।
भारत माँ शत-शत बार प्रणाम।
प्रेम-दया का इष्ट लिए तू,
सत्य-अहिंसा तेरा संयम,
नयी चेतना, नयी स्फूर्ति-युत
तुझमें चिर विकास का है क्रम।
चिर नवीन तू, ज़रा-मरण से -
मुक्त, सबल उद्दाम, भारत माँ शत-शत बार प्रणाम।
एक हाथ में न्याय-पताका,
ज्ञान-द्वीप दूसरे हाथ में,
जग का रूप बदल दे हे माँ,
कोटि-कोटि हम आज साथ में।
गूँज उठे जय-हिंद नाद से -
सकल नगर औ' ग्राम, भारत माँ शत-शत बार प्रणाम।
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उषा राठौड़ का आज का ख्याल

आजकल के अभिभावकों द्वारा जाने अनजाने अपने बच्चों का बचपन छिनने से व्यथित उषा राठौड़ का आज का ख्याल यहाँ चटका लगाकर पढ़े जहाँ उषा इस विषय पर चिंता जाहिर कर आव्हान कर रही है -
जीने दो अपना बच्चपन उनको जो जी मैं आये करने दो .उनके गंदे कपडे धोने मैं जितनी तकलीफ नहीं होंगी उससे कही ज्यादा ख़ुशी उनके चहरे की चमक देख कर होगी ,और जब भारत का भविष्य ऐसे मुस्कुराएगा तो हर साल भारत भी अपनी आजादी का जश्न इतनी ही ख़ुशी से मनायेगा .क्योंकि कल का भारत आज के बच्चो के हाथो में हैं...
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पन्द्रह अगस्त का पोरोग्राम और नेताजी का भासड़

व्यंग्यलोक पर पढ़े व्यंग्य - पन्द्रह अगस्त का पोरोग्राम और नेताजी का भासड़
http://vyangyalok.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html
आपकी प्रतिक्रिया आलोचना समालोचना का इन्तज़ार रहेगा।

प्रमोद ताम्बट

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फैशन में पगड़ी

पगड़ी का इस्तेमाल हमारे देश में सदियों से होता आया है | प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ पगड़ी को व्यक्तित्व,आन,बान,शान और हैसियत का प्रतीक माना जाता रहा है | पगड़ी हमारे देश में चाहे हिन्दू शासक रहें हों या मुस्लिम शासक सभी की प्रिय रही है | आज भी पगड़ी को इज्जत का परिचायक समझा जाता है | पगड़ी को किसी के आगे रख देना सर झुकाना व उसकी अधीनता समझना माना जाता है | महाराणा प्रताप ने वर्षों में जंगल में रहना पसंद किया पर अकबर के आगे अपनी पगड़ी न झुका कर मेवाड़ी पाग (पगड़ी )की हमेशा लाज रखी |
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टाटा को बाय बाय कहने की तैयारी में रतन

'रतन' के बाद कौन कहेगा 'टाटा'



रतन टाटा के उत्ताराघिकारी की खोज आरंभ



अगले 29 माह में पद छोड देंगे रतन टाटा



टाटा ग्रुप के छटवें अध्यक्ष की ताजपोशी की तैयारियां



(लिमटी खरे)



भारत गणराज्य में टाटा समूहएक किंवदंती बनकर रह गया है। टाटा ग्रुप के वर्तमान अध्यक्ष रतन टाटा ने 1991 में इसके अध्यक्ष का कार्यभार संभाला था, उसके बाद टाटा गु्रप ने पीछे मुडकर नहीं देखा। लगभग बीस सालों के कारोबार में रतन टाटा के नेतृत्व मंे टाटा गु्रप के राजस्व में पच्चीस फीसदी बढोत्तरी दर्ज की गई है। टाटा समूह के वर्तमान अध्यक्ष लगभग ढाई साल बाद अपना पद छोड देंगे।

टाटा समूह की नींव जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा ने रखी थी। वे ही टाटा समूह के पितामह और संस्थापक माने जाते हैं। जब देश गुलाम था, उस वक्त जमशेदजी के बुलंद इरादों के आगे गुलामी की जंजीरें भी टिक न सकीं। जमशेदजी ने अपने परिश्रम और लगन के साथ टाटा के छोटे से पौधे को सींच सींच कर खडा किया। जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा इस समूह के अध्यक्ष पद पर 1868 से 1904 तक काबिज रहे।

इनके उपरांत टाटा समूह की बागडोर थामी उनके पुत्र दोराबजी टाटा ने। वे इस समूह के अध्यक्ष रहे 1904 से 1932 तक। दोराबजी के पद छोडने के बाद टाटा परिवार से इतर किसी अन्य व्यक्ति को इसकी बागडोर सौंपी गई, और वे थे नौरोजी सकलतवाला। नौरोजी ने टाटा समूह के अध्यक्ष का कामकाज महज छः साल अर्थात 1932 से 1938 तक संभाला।

टाटा समूह के अध्यक्ष की सबसे लंबी पारी जमशेदजी टाटा के भतीजे जे.आर.डी.टाटा ने खेली वे 1938 से 1991 तक लगभग 23 साल तक टाटा समूह के अध्यक्ष रहे। जमशेदजी टाटा के सम्मान में टाटा नगर को जमशेदपुर भी कहा जाता है। 1991 में टाटा समूह की बागडोर संभालने वाले रतन टाटा मूलतः जमशेदजी टाटा के पड़पोते हैं। इन्होंने 1962 में जेआरडी टाटा के मशविरे पर आईबीएम समूह का एक आकर्षक ऑफर ठुकराकर टाटा समूह से जुड़ना बेहतर समझा।

काम को ही पूजा मानने वाले रतन टाटा की कार्यशैली दूसरों से हटकर ही है। रतन टाटा ने काम की शुरूआत जमशेदपुर स्टील प्लांट से की थी, जहां उन्होंने अपने साथी कामगारों के साथ लोहा गलाने वाली धमन भट्टी तक के काम की देखरेख करने में भी शर्म महसूस नहीं की।

आज टाटा का करोबार विश्व के 85 देशों में फैला हुआ है। बाजार में सात सेक्टर्स एसे हैं जिसमें टाटा समूह सक्रिय भागीदारी निभा रहा है। वर्ष 2008 - 2009 में टाटा का कुल टर्न ओवर 71 बिलियन डालर का था। टाटा की वर्तमान में कुल 114 में से 28 फर्म लिस्टिड हैं। टाटा समूह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके 65.8 फीयदी शेयर आज भी जनकल्याण में संचालित होने वाले चेरिटेबल ट्रस्ट के पास हैं।

अब टाटा के इस विशाल साम्राज्य को कौन संभालेगा इस बारे में बहस आरंभ हो गई है। टाटा समूह के नए अगुआ के लिए सही एवं योग्य व्यक्ति की तलाश का जिम्मा पांच लोगों की एक समिति बनाकर सौंपा गया है। टाटा समूह के उत्तराधिकारी की दौड़ में रतन टाटा के चचेरे भाई नोएल टाटा सबसे प्रबल दावेदार के तौर पर सामने आए हैं। नोएल टाटा जून 2010 में टाटा इन्वेस्टमेंट के चेयरमेन बने। इसके उपरांत वे 29 जुलाई को टाटा इंटरनेशनल के प्रबंध संचालक नियुक्त किए गए।

टाटा समूह के अध्यक्ष पद के लिए रिनॉल्ट निसान के सीईओ कार्लोस घोष, पेप्सिको की प्रमुख इंदिरा नूरी, वोडाफोन के पूर्व अध्यक्ष अरूण सरीन, सिटी बेंक के प्रमुख विक्रम पंडित, इंफोसिस के संस्थापक एन.आर.नारायण मूर्ति के अलावा यूनिक आईडेंटिटी परियोजना के प्रमुख नंदन नीलकेणी के नामों की बयार बह रही है। इनमें से कौन सा भाग्यशाली चेहरा होगा जो टाटा समूह के अध्यक्ष का ताज पहनेगा यह बात तो अभी भविष्य के गर्भ में ही छिपी है।

उधर रतन टाटा ने इस बात को खारिज कर दिया है कि टाटा सरनेम वाला कोई पारसी व्यक्ति ही टाटा समूह की बागडोर संभालेगा। बकौल रतन टाटा जो भी अध्यक्ष चुना जाएगा, वह न तो पारसी धर्म का समर्थक होगा और न ही विरोधी, वह एक योग्य व्यक्ति ही होगा।
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सर्वोच्च न्यायालय ने कसी शिक्षण संस्थाओं की लगाम

मान्यता नहीं तो फीस करनी होगी वापस

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली 13 अगस्त। गैर मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थाओं को अगर मान्यता नहीं मिलती है तो उन्हें अपने विद्यार्थियों की फीस वापस करना होगा। उक्ताशय का फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराया है जिसमें गैर मान्यता प्राप्त महाविद्यालय को मान्यता न मिलने की स्थिति में एक छात्र की फीस लौटाने का आदेश दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय में दायर विनायक मिशन डेंटल महाविद्यालय की एक छात्रा की अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति टी.एस.ठाकुर और मार्कण्डेय काटजू की युगल बैंच ने दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराया है। माननीय न्यायालय छात्रा की इस दलील से पूरी तरह सहमत था कि महाविद्यालय को मान्यता न मिल पाने से उसका एक साल खराब हो गया।

सर्वोच्च न्यायालय की युगल पीठ ने अपने फैसले में विनायक मिशन डेंटल महाविद्यालय की छात्रा को फीस की पूरी राशि 5 लाख 15 हजार रूपए, 12 फीसदी सालाना ब्याज के साथ लौटाने के आदेश जारी कर दिए हैं। न्यायालय ने आयोग के उस फैसले को उलट दिया है जिसमें आयोग ने महाविद्यालय पर ढाई लाख रूपए का जुर्माना ठोंका था।
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शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई (13)

जमीन, प्लेग्राउंड, लाईब्रेरी, अप्रशिक्षित स्टाफ के चलते हुआ सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का मान्यता आवेदन रद्द

चालू शैक्षणिक सत्र के लिए सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को नहीं मिली सीबीएसई मान्यता

सिवनी। ''जिला मुख्यालय सिवनी में संचालित होने वाले और स्तरीय शिक्षण प्रदान करने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल स्कूल को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने मान्यता देने से साफ इंकार कर दिया है। इसका कारण यहां सीबीएसई के नार्मस के मुताबिक पर्याप्त भूखण्ड, खेल का मैदान, पुस्तकालय में किताबों की कमी और अप्रशिक्षित स्टाफ आदि को आधार बनाया गया है।'' उक्ताशय की जानकारी केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के मध्य प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर के सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराई गई है।

सूत्रों ने बताया कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकन्डरी एजूकेशन शिक्षा केंद्र, 2, कन्यूनिटी सेंटर, प्रीत विहार विकास मार्ग नई दिल्ली 110092 की एफीलेशन ब्रांच के सहायक सचिव खुशाल सिंह के हस्ताक्षरों से 12 मई 2005 को जारी पत्र क्रमांक सीबीएसई / एएफएफ / एस एल / 1701 - 1011 / 2010 में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के प्रबंधक को उक्ताशय की बात से आवगत करा दिया गया है।

सूत्रों ने बताया कि पत्र में लिखा गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला प्रबंधन के आन लाईन आवेदन नंबर एस.एल. - 1701 - 1011 के संदर्भ में एक और दो फरवरी 2010 को शाला के हुए निरीक्षण के उपरांत निरीक्षण प्रतिवेदन और बोर्ड को सौंपे गए प्रपत्रों के अध्ययन के उपरांत उक्त निर्णय लिया गया है।

पत्र की कंडिका एक में कहा गया है कि शाला द्वारा जिस भवन में स्कूूल का संचालन किया जा रहा है वह बोर्ड के द्वारा निर्धारित नार्मस डेढ से दो एकड से कम है। जिसमें शाला भवन का निर्माण और शेष भाग में खेल का मैदान होना आवश्यक है। शाला द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उसके द्वारा दिए गए प्रपत्रों में इंफ्रास्टकचर, कक्षाएं, दो स्थानों के बीच की दूरी,, हर साईट का क्षेत्रफल आदि क्या है?

सीबीएसई अजमेर कार्यालय के सूत्रों ने आगे बताया कि इस पत्र की कंडिका दो में उल्लेख किया गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में अध्ययापन कराने वाले कई शिक्षक अप्रशिक्षित हैं, अतः सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला प्रबंधन को ताकीद किया गया है कि वह बोर्ड के नार्मस के मुताबिक क्वालिफाईड और प्रशिक्षित शिक्षकों को नियुक्त करे।

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को एफीलेशन विभाग के सहायक सचिव खुशाल सिंह के हस्ताक्षरों से जारी उक्त पत्र की कंडिका तीन कहती है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला का पुस्तकालय काफी छोटा है, अतः शाला प्रबंधन को चाहिए कि अपने पुस्तकालय को कक्षाआं के मुताबिक और किताबें शामिल कर और अधिक समृद्ध बनाया जाए। इसी पत्र की चौथी कंडिका में उल्लेख किया गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल प्रबंधन द्वारा शाला ने नाम पर जमीन या भवन के कागज नहीं संलग्न किए गए हैं, अतः सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल प्रबंधन सेल डीड की कापी संलग्न की जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जमीन को सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला संचालित करने वाली सोसायटी या शाला के नाम पर रजिस्टर्ड किया गया है।

सूत्रों का कहना है कि इस पत्र की कंडिका पांच में महत्वपूर्ण बात कही गई है, जिसके चलते ही इस नए शैक्षणिक सत्र में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के शाला प्रबंधन ने आनन फानन में जबलपुर रोड पर निर्माणाधीन शाला भवन में शाला को स्थानांतरित कर दिया है। इस कंडिका में कहा गया है कि शाला का नया भवन अभी निर्माणाधीन है, और शाला को उसमें अभी स्थानांतरित किया जाना बाकी है। शाला प्रबंधन ने भले ही 21 जून से आरंभ हुए शैक्षणिक सत्र में निर्माणाधीन भवन में शाला को स्थानांतरित कर दिया हो किन्तु उसकी मान्यता का आवेदन तो निरस्त ही कर दिया गया है।

इस पत्र की अंतिम और छटवी कंडिका में कहा गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला को अभी भी पर्याप्त संख्या में क्वालिफाईड और प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती आवश्यक है जो बोर्ड के नार्मस के हिसाब से 1: 1.5 का अनुपात हर स्तर पर बनाए रख सके। अंत में सहायक सचिव खुशाल सिंह आदेशित करते हैं कि उक्त सारी कमियों के चलते शाल प्रबंधन के केंद्रीय शिक्षा बोर्ड से मान्यता के आवेदन को जिसमें शाला प्रबंधन ने 2010 - 2011 के लिए मान्यता चाही गई थी को निरस्त किया जाता है।

सीबीएसई के सहायक सचिव ने आगे कहा है कि इन कमियों को दूर कर सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को चाहिए कि वह मान्यता हेतु नया मान्यता आवेदन बाकायदा निर्धारित फीस के प्रस्तुत करे ताकि उस पर विचार किया जा सके। खुशाल सिंह ने सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को साफ तौर पर कहा है कि शाला सीबीएसई पेटर्न पर नवमीं, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं में कक्षाएं आरंभ कतई न करे अन्यथा किसी भी तरह के विवाद के लिए सीबीएसई बोर्ड की कोई जवाबदारी नहीं होगी।

(क्रमशः जारी)
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रसूखदारों को भी खरीदनी होगी टिकिट

कामन वेल्थ गेम्स में जारी नहीं होंगे 'पास'
 
खेलों में नहीं होगा कोई ''पास'' वेध
 
मीडिया और वालंटियर्स के पास होंगे मान्यता प्राप्त कार्ड
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 13 अगस्त। 03 अक्टूबर से नई दिल्ली में आरंभ होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों में अतिविशिष्ट व्यक्तियों (व्ही.व्ही.आई.पी.) के लिए निशुल्क प्रवेश करना आसान नहीं होगा। आयोजन समिति ने इसके लिए कड़ा रूख अख्तियार किया है। अब तक आयोजन समिति पर लगने वाले आरोप कि आयोजन के शुभारंभ और समापन अवसर पर पांच हजार से अधिक निशुल्क पास की व्यवस्था की जा रही है, की खबरों के बाद आयोजन समिति ने फैसला लिया है कि इसके लिए बाकायदा टिकिट पर ही प्रवेश सुनिश्चित किया जाए।
 
कामन वेल्थ गेम्स की आयोजन समिति से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आयोजन समिति ने उद्घाटन, समापन के साथ ही साथ समस्त खेल गतिविधियों के लिए 17 लाख टिकिटें बेचने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सूत्रों ने दावा किया है कि इस वृहद आयोजन में किसी भी तरह के पास जारी करने का कोई प्रावधान ही नहीं रखा गया है। खेलों को कवर करने के लिए मीडिया और खेल में सहायक होने वाले वालंटियर्स के मान्यता कार्ड के अतिरिक्त और कोई भी पास प्रवेश के लिए वेध नहीं होगा।
 
उधर केंद्रीय खेल एवं युवा मामलों के मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सरकार को अब तक इन खेलों में पास जारी करने का कोई अनुरोध अब तक प्राप्त नहीं हुआ है, और अगर एसा प्रस्ताव अब प्राप्त भी हो तो सरकार उस पर विचार नहीं करेगी। आयोजन समिति को यह भय सता रहा है कि अगर खेलों के लिए पास जारी कर दिए गए तो मंहगी टिकिटों को कौन खरीदकर खेल देखना पसंद करेगा।
 
आयोजन समिति से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि इस विशाल आयोजन में टिकिटों की कीमत पचास रूपए से पचास हजार रूपए सममूल्य की रखी गई हैं। उद्घाटन समारोह की टिकिट की कीमत साढे सात सौ रूपए से पचास हजार रूपए रखी गई है। पचास रूपए सममूल्य की टिकिट उन खेलों के लिए रखी गई है, जिन खेलों को देखने में खेल प्रेमी दर्शक कम दिलचस्पी दिखते हैं। सूत्रों ने दावा किया है कि शुभारंभ कार्यक्रम की एक हजार रूपए सममूल्य की सारी की सारी टिकिटें बिक चुकी हैं, और आयोजन समिति इन एक हजार रूपए वाली टिकिटों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर रही है।

उधर सरकार और जनता को भटकाने के लिए आयोजन समिति का कहना है कि महज तेरह दिनों के इस आयोजन में आयोजन समिति को सत्रह सौ अस्सी करोड रूपए की आय होना अनुमानित है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) आयोजन समिति की इस राय से इत्तेफाक कतई नहीं रख रहा है। सीएजी का कहना है कि यह आंकडा बढा चढा कर बताया गया है। बहरहाल जो भी हो अगर कामन वेल्थ गेम्स में पास की व्यवस्था नहीं हो पाई तो रसूखदार लोगों के परिवारजन निराश अवश्य ही हो जाएंगे।
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पीपली लाइव : दा ग्रेट इंडियन ट्रेजडी

पीपली लाइव : दा ग्रेट इंडियन ट्रेजडी

और मीडिया का नंगा नाच कौन नहीं जानता है ! पीपली लाइव देखते समय मुझे मग्सेसे पुरस्कार से नवाजे गए मशहूर पत्रकार पी साईनाथ का वह कथन याद आता है जब वो कहते हैं कि २००८ में जब विदर्भ के किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब देश सुर दुनिया के पत्रकार मुंबई में लक्मे फैशन वीक कवर करने को जुटे थे | लेकिन मुंबई से कुछ ही दूर तक चल कर जाने की जहमत किसी ने ना उठाई, और उठाये भी क्यूँ किसान/मरता किसान/ भूखा/ बेबस किसान/कर्ज के फंदे में उलझता किसान मीडिया का टीजी नहीं है

पूरा पढने के लिए यहाँ जाएँ
http://atmadarpan.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html#links
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आज का ख्याल -३ : उषा राठौड़

अपने आप पास घटित होने वाली छोटी-छोटी साधारण घटनाओं व बातों से उषा राठौड़ बड़ी गंभीर बात निकाल लाती है और उस साधारण सी बात की हमारी आदतों से तुलना कर एक बहुत बड़ा सन्देश दे जाती है | एसा ही एक सन्देश उन्होंने हमारी ट्रैफिक मानसिकता व आदतों पर हमारी तुलना चींटियों से कर ,चींटियों के अनुशासन से प्रेरणा लेने का सन्देश दिया है जिसे यहाँ चटका लगाकर पूरा पढ़ा जा सकता है
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नुक्‍कड़ के लेखकों से विनम्र अनुरोध

मैंने कुछ दिन पूर्व विनम्र निवेदन किया था कि अन्‍य ब्‍लॉग पर लगाई गई अपनी पोस्‍टें नुक्‍कड़ पर पूरी प्रकाशित न किया करें और जब उसके कुछ अंश का उल्‍लेख करें तो उसका टिप्‍पणी बॉक्‍स बंद कर दिया करें। अब मैं यह भी कहने को विवश हुआ हूं कि वे लेखक जो अन्‍य ब्‍लॉग पर लगाई गई पूरी पोस्‍टें, नुक्‍कड़ पर तो पोस्‍ट करते ही हैं अन्‍य ब्‍लॉग के लिंक भी पोस्‍ट के साथ जोड़ देते हैं। आप अपनी पूरी पोस्‍ट की जगह पर सिर्फ पोस्‍ट की दो या तीन पंक्तियां लगाएं और पूरी पोस्‍ट का लिंक दे दें। पर उस पर अमल नहीं किया गया है।

आप सबसे पुन: अनुरोध है कि अति-पोस्‍टवादिता से बचें और ऐसा भी न करें कि एक भी पोस्‍ट न लगाएं। शीघ्र ही एक आकलन किया जाएगा और ऐसे लेखकों के पोस्‍ट लेखक के अधिकार निरस्‍त कर दिए जाएंगे। इसके साथ ही जिन लेखकों ने एक भी पोस्‍ट आज तक इस ब्‍लॉग पर नहीं लगाई है, उनके नाम भी लेखकों की सूची से निकाल दिए जाएंगे।

यदि आपको इस संबंध में कुछ कहना है तो यहां पर टिप्‍पणी बॉक्‍स में खुलकर कहें। विवाद की स्थिति में नुक्‍कड़ ब्‍लॉग को बंद करने पर भी विचार किया जा सकता है। इसे अन्‍यथा मत लीजिएगा। नुक्‍कड़ को बंद करने की स्थिति में जुड़े हुए लेखकों को अन्‍य ब्‍लॉग की सदस्‍यता दी जा सकेगी।
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अविनाश वाचस्पति गुरु चीज हैं -सतीश सक्सेना

अविनाश वाचस्पति  गुरु चीज हैं , आज उनके घर एक आमंत्रण कार्ड आया जिसमें उनके नाम पर बुलावा आया , दर्शकों कि कमी थी और गुरु जी के पास समय नहीं सो कार्ड के लिफ़ाफ़े को अलग फ़ेंक , स्कैन कर निमंत्रण पत्र सारे ब्लाग चेलों को भिजवा दिया ..इस मंशा के साथ कि सब हाज़िर हों ..!
सो गुरु को प्रणाम कर ....उनकी  ही भाषा में यह प्रतिक्रिया लिखदी और प्रकाशित कर रहा हूँ ताकि सनद रहे आज के गुरु और उनके शिष्यों का परिचय ! 


पत्र में आप नहीं  ? 
आप होंगे कि नहीं?
दोस्त  का नाम नहीं 
तो फिर हम भी नहीं

हम तो होंगे ही वहां 
अविनाश होंगे जहाँ 
अगर अविनाश नहीं 
हमारा भी काम नहीं
खुद वहां जाओ नहीं 
चेलों को भेज देते 
नाम अपना कमाओ 
मूर्ख हम ऐसे नहीं  !

आशा है समझ लोगे 
आज के चेलों को भी
एकलव्य लगते हैं , 
अंगूठा देंगे   नहीं  ! 
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घर और अदालत का लोकार्पण है शुक्रवार यानी आज शाम को : पहुंच रहे हैं आप

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आत्‍मकथा का आनंद
जानता है
लिखने वाला और
पढ़ने वाला।

आज अर्थात् शुक्रवार
13 अगस्‍त 2010 को
है लोकार्पण ।

गुलमोहर सभागार
इंडिया हैबिटेट सेंटर
लोधी रोड
नई दिल्‍ली
सायं 7.00 बजे।

मैं आपसे
आप मुझसे
सब सबसे  मिलेंगे।

लीला सेठ संग इरा पांडे
संवाद के नये रंग खिलेंगे।
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