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दीपावली पर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के जेम्‍स बांड (ब्रांड) का चयन किया जा रहा है, नाम भेजिएगा

दीपावली पर ऐसा कुछ ऐसा कर गुजरें
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में भी उजाला निराला हो जाये
ऐसा नाम एक नेक मिल जाए जिसे बे‍हिचक
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का जेम्‍स बांड कहा जाए
ब्रांडिड होती इस दुनिया में अब अवश्‍य
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को एक जेम्‍स बांड मिल जाए।

इसलिए अनुरोध है कि नाम प्रस्‍तावित करें, अपना नाम सिर्फ एक बार ही प्रस्‍तावित कर सकते हैं। प्रस्‍ताव खुले मैदान में, टिप्‍पणियों के तौर पर रहेंगे। व्‍यक्तिगत लड़ाईयां, विवाद नहीं होंगे। जो भी होगा सार्वजनिक होगा और खुले मैदान में होगा, सबके बीच होगा। तो बनने के लिए हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का जेम्‍स बांड कूद पडि़ए अपना लैपटाप, नेटबुक या डेस्‍कटॉप लेकर और दाग दीजिए एक अदद जेम्‍सबांडीय टिप्‍पणी या पोस्‍ट। पोस्‍ट दागेंगे तो उसका लिंक टिप्‍पणी में जरूर चटकाइयेगा।
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दीवाली निकाल रही है दिवाला : कैसे दूं शुभकामना

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मेरी भी बात सुनो मम्मा

जी हाँ ,बच्चे को स्कूल भेज कर इतने निश्चिन्त मत हो जाईये|अपने लाडले के लिए शहर का चुनिन्दा स्कूल खोज कर और उसकी फीस भरकर ही आपका दायित्व समाप्त नहीं हो जाता | नवंबर कान्वेंट विद्यालयों में नन्हे मनों के प्रवेश का समय होता है हर तरफ मारा-मारी है माता पिता हीनही पूरा परिवार उनके प्रवेश को लेकर चितित है | और अब पूरी जुगाड लगाकर प्रवेश भी हो गया है |माता बहुत खुश है पर उस नन्हे मन पर दबाव बहुत अधिक है | सबकी अपेक्षाए उस नन्ही जान से जुड गई है|अंकों और प्रतिशत का भूत अभी से सवार हो गया है | मम्मियो के मन खुशियों से भरे-पूरे है | अब वह इठला -इठला कर बता रही है -पता है उस स्कूल में प्रवेश कितना कठिन है पर हम तो गंगा नहा लिए| मुझे आश्चर्य हो रहा है कि पहले तो बेटी के हाथ पीले कर माता-पिता गंगा नहाते थे अब उस शिशु के विद्यारंभ पर ही इति हो गई |
बच्चा नए माहौल और विदेशी भाषा के मध्य अपने को अजनबी पा रहा है | सुबह देर तक सोना चाहता है माँ के साथ बतियाना चाहता है पर स्कूल बस जो आगई समय हो गया | उसकी नींद भी पूरी नहीं होती तब तक तो उसे बिस्तर से निकालकर नहला धुला कर जबरदस्ती उनीफोर्म पहना कर ताईबेल्ट जूते मौजे से लैस कर जल्दी जल्दी नाश्ता करने के निर्देश देना शुरू हो जाता है | बेचारा क्या करे ?अभी तो वह ढंग से फ्रेश भी नहीं हुआ है पर क्या किया जा सकता है जबरदस्ती लाडले के मुह में नाश्ता ठूसा जारहा है ,पापा टिफिन और बस्ता लेकर खड़े है| सब उसके लिए ही किया जा रहा ही पर उसके मन में क्या चल रहा हैउसे कोई नहीं देखना चाहता | अब इतनी आपाधापी का युग है कि यदि मन वन पर ध्यान देने लगे तो उसके करियर का क्या होगा |उसे तो बहुत बड़ा डाक्टर या इन्जीनिय र नुमा जीव बनाना है और उसके लिए ही ये सारी कवायदे की जा रही है|
स्कूल पहुँच कर अपनी मेडम को अपने मन की बात बताना चाह रहा है पर वहाँ तो मेडम जी को पाठ्यक्रम पूरा कराबाना है | उनके पास कहाँ समय है इस बकवास को सुनाने के लिए | बस्जो कहा जा रहा है उसे चुपचाप रातो और लिखो| बस एक ही रत है अच्छे नंबर लाओ | भारी बोझ से लड़ा फदा अपराह्न में घर पहुंचता है और सोचता है अब तो छुट्टी हुई | पर माँ को जल्दी है उसे लंच कराने की ,स्कूल का काम पूरा कराने की ,और फिर ट्यूशन वाले सर भी तो चार बजे आजाते है | बेचारी क्या करे | बच्चा खेलने के लिए तरस रहा है उसका मन है माँ से ढेरो बाते करे ,अपने स्कूल की फिजूल वाली अपने दोस्तों वाली बाते बताएं , अपने दोस्त के विषय में बताना चाहता है पर उसे चुपचाप केवल वही करना है जो मम्मा कह रही है आखिर उसके करियर का सवाल जो है |
अब शाम हो गई ,अब होबी क्लास के लिए जाना है ,स्विमिंग पूल लेजाना है और अब कम्पूटर सीखना भी तो बहुत जरूरी है |लो सोचा था शाम तो अपनी होगी वह भी गई|
रात हो गई| पापा घार आगये हैं | आते ही पूछते है बेटा होम्बर्क पूरा हो गया है या नहीं और कुछ नहीं क्या पापा दिन भर बाद तो आपको देखा सोचा था माँ नहीं तो कम से कम आप तो गोदी लोगे कुछ मेरी सुनोगेपर आप भी| बच्चा रूआसा हो आया है | जल्दी जल्दी डिनर लगा दिया है बेटा जल्दी खाऊ और जल्दी बिस्तर पर जाओ नहीं तो सुबह स्कूल जाने में फिर देर हो जायेगी |
लो अब पूरी जिंदगी यही दिनचर्या जीनी है|
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मौका गर चूक गया तो .... आनंद नहीं आयेगा

आज देखिये
समय पर
समय निकल गया
तो
यू ट्यूब पर
खोज कर
किस्‍तों में
देख पायें
लगता है कि
फिर आनंद
उतना नहीं उठा पायेंगे।

इसे सुन जायें
भली बातों को अपनायें
सबको बतलायें
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में
सार्थक करें और
करने वालों का साथ निभायें।

सुनने-देखने के बाद
अपनी प्रतिक्रिया अवश्‍य
यहां पर दर्ज करायें।
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सोलह बरस में आत्महत्या या ऑनर किलिंग

      जन्म:1994                                                                                      मौत:2010


मृत्यु का कारण:परिवार वालों के मुताबिक ऑनर किलिंग अर्थात दबंगों ने असमय गला घोंट कर मार डाला. वहीँ दूसरे पक्ष का कहना है कि बढ़ती आवारागर्दी और लापरवाही ने जान ले ली.
सोलह साल की उम्र बड़ी कमसिन होती है.इस उम्र में जवानी और रवानगी आती है,सुनहरे सपने बुनने की शुरुआत होती है परन्तु यदि इसी आयु में दुनिया देखने के स्थान पर दुनिया छोड़ना पड़ जाये तो इससे ज़्यादा दुखद स्थिति और क्या हो सकती है?लेकिन यह हुआ और सार्वजनिक रूप से हुआ,सबकी आँखों के सामने हुआ और सब लोग इस असमय मौत पर भी दुखी होने की बजाए खुशियाँ मानते रहे दरअसल उसके काम ही ऐसे थे कि अधिकतर लोग उसके मरने की दुआ मनाने लगे थे. कहा जाता है कि...............
आगे पढ़े: http://www.jugaali.blogspot.com/
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क्‍या मेरी टाटा इंडिका कार आज मुझे टाटा करने के मूड में थी

मेरी क्‍या गलती है
आज शाम को सीरी फोर्ट स्थित अपने कार्यालय से घर वापसी पर कमला नेहरू कॉलेज की लाल बत्‍ती से दांये मुड़ते ही मेरी चर्चित टाटा इंडिका जीएलजी डी एल 3 सी ए वाई 5018 कार के बोनट से धुंआ निकला शुरू हो गया। गाड़ी रोक कर, बोनट खोलकर देखा, तो अंदर जहां पर सेल्‍फ होता है, वहां पर वायरिंग में आग लगी हुई थी, जिसे मैंने तुरंत बुझा दिया। शुक्रवार का दिन होने के कारण शुक्र यह रहा कि सेंट्रल लॉकिंग ने काम करना बंद नहीं किया। अन्‍यथा अपनी सीट के साथ रखे लकड़ी के मजबूत मोटे डण्‍डे से शीशा तोड़कर बाहर निकलना पड़ता। तिराहा होने के कारण भीड़ लगी परंतु जल्‍दी ही छंट भी गई क्‍योंकि धुंआ अधिक था, आग कम और हवा में रबड़ की जलन की गंध फैल गई। टाटा मोटर्स के सान्‍या ऑटोमोबाइल्‍स सर्विस सेंटर, ओखला में फोन करने पर बतलाया गया कि हेल्‍पलाईन सेवा कल मिल पाएगी। तब तक इंतजार करें। आफिस फोन करके चार साथियों को बुलाया और धकेल कर वापिस सीरी फोर्ट सभागार के गेट नंबर 1 की पार्किंग में पहुंचाया। कार वहीं पर टाटा सर्विस सेंटर के कारिन्‍दों का इंतजार कर रही है। वे कल ही आयेंगे, यह मैंने कार को नहीं बतलाया है।
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अमिताभ बच्‍चन का अंगूठा और प्रिय भाई शिवम् मिश्रा

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ब्‍लॉग की दुनिया का नक्‍शा : आप यहां हैं

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परदेस में खिलती परंपरा......!

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दो चौके आठ पढ़ें ब्‍लॉगरी का पहला पाठ

पहचान तो आप दोनों को ही लेंगे
मान गए हैं आपको
मजबूत हिन्‍दी ब्‍लॉगर हैं आप
पहचान गए मुझको
मैं भी पहचान लेता आपको
पर दिख नहीं रहे हैं आप।





हिन्‍दी ब्‍लॉगर इन्‍हें न पहचानें
मानने योग्‍य बात नहीं है
फोटो जब खींची है
दिन है रात नहीं है
दिन का भरपूर उजाला है
ब्‍लॉगरी का शुभ दिन है
चर्चा का मतवाला है
छलक रहा है आंखों से
शब्‍दों से झर रहा है
बरस रहा है
मन में सीधे उतर रहा है।
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लडकी की शादी के लिए क्या जरूरी है –शिक्षा ,नौकरी या दहेज?

लडकी की शादी के लिए क्या जरूरी है –शिक्षा ,नौकरी या दहेज ? बात तो कई दिनों से मथ रही थी पर आज तो इंतहा हो गई और मैं यह पोस्ट लिखे बिना नहीं रह पाई।मेरी मौसी जात बहिन की शादी 18 नवम्बर की तय हुई,निमंत्रण पत्र भी भेज दिए गये ।मैं बहुत उत्साह में थी ,सबसे मिलने –जुलने का अवसर जो हाथ आया था। पति देव ने भी छुट्टियो के लिए आवेदन दे दिया था और मैं योजनाए बनाने में व्यस्त हो गई। कल शाम मेरे बहनोई का फोन आया । उन्होने जानकारी दी कि दीदी शादी केंसिल कर दी गई है क्योंकि ऐन वक्त पर लडके वालों की मांग बढ़ गई और मैं पूरा करने की स्थिति में नहीं हूं।फोन मेरे पति ने ले लिया और उन्हें सांतवना देने लगे , आपने बिल्कुल ठीक निर्णय लिया, हम आपके साहस की प्रंसंशा करते है और आपके साथ है।
बात तो केवल इतनी सी है पर मैं बहुत सारे सवालों से घिर गई हूं। यदि लडकी की शिक्षा दीक्षा की बात है तो लडकी उच्च शिक्षित है ,नौकरी पेशा की बात है तो बैंक
मेनेजर है, दहेज की बात करें तो कन्या के पिता मध्य्वर्गीय जरूरतों को पूरा कर लेते हैं जिस लड्के से सम्बन्ध तय हुआ वह नौकरी की दृष्टि से लड़्की से एक पायदान नीचे ही है फिर ये शादी क्यों न हो सकी ?पहले तो यह माना जाता था कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार माता –पिता जो धन सम्पत्ति ,गहने आदि देते हैं ,उसे ही दहेज कह दिया जाता है । फिर माता-पिता अपनी लड कियों को पढाने लगे ।उनमें जागरूकता आई पर शादी की समस्या मे दहेज के मामले में कोई परिवर्तन नही हुआ। अब लडकिया शिक्षित भी हो गई लडकों के बराबर बल्कि उनसे एक कदम आगे ही ,नौकरी पेशा भी हो गई लेकिन दहेज की समस्या में कोई रियायत नहीं मिली । हम लडकियो की समझ में नहीं आता कि हम करें तो कया करें?
जब पढाई की बात आती है तब भी एक तनाव होता है कि यदि ज्यादा पढ लिख लिए तो मुसीबत कि उतना योग्य लडका नहीं मिला तो ,शोध के लिए जाएं तो शोध निर्देशक का पहला सवाल होता है _अरे भाई तुम् लडकियों साथ एक ही मुसीबत है अब कहीं बीच में शादी वादी हो गई तो तुम शोध का कार्य क्या करोगी अपनी गृहस्थी में लग जाओगी पर यही प्रश्न कभी भी किसी शोध छात्र के सामने नही उठाया जाता जबकि शादी तो उनकी भी होती है ।
जोब के लिए जाये तो फिर वही प्रश्न कि शादी के बाद नौकरी कर पाओगी या नहीं । लगता है जिन्दगी के सारे प्रश्न केवल विवाह और विवाह से ही जुडे हुए हैं । कभी- कभी तो लगता है कि शादी केवल हम लडकियों की ही होती है क्या ?अब यदि किसी कारण से कहीं सम्बन्ध न हो पाये तो भी मीन मेख लडकी में ही निकाली जाती है अरे वो पहले से ही तेज है क्या किसी के साथ घर बसायेगी ।अरे पहले मां पिता की जिम्मेवारी तो उठा ले तब शादी की बात हो ।यदि परिवार में पुत्री ही पुत्री है और यदि कहीं अपने माता-पिता की देखभाल करने का संकल्प ले लिया तो और मुसीबत ।अब उसे शादी के बारे में तो बिल्कुल ही नहीं सोचना चाहिए। हमेशा से लडका अपने माता पिता के साथ रहता है शादी से पहले और शादी के बाद भी और यह बहुत सम्मान की बात समझी जाती है पर यदि आपने कन्या की योनि में जन्म लेकर कहीं गलती से भी इस विषय में सोच भर लिया तो समझो आफत आ गई। बेचारा लडका तो जिन्दगी भर बीच मझदार में पड जायेगा ।अब वह यदि अपनी पत्नी की बातों का समर्थन करता है तो अपने माता पिता की नजरों में ससुराल का मजनू कहलायेगा । आज तक समझ नहीं आया जिन मांबाप की सेवा करके बहू को पुण्य प्राप्त होता है ,उसी सेवा को करते हुए जामाता को निन्दा का पात्र बनना पड़्ता है और लड्की को भी लगातार आलोचना का पात्र बनना पडता है।यदि कडा दिल करके घर की बहू कहीं माता – पिता के विषय में सोचना प्रारंभ कर दें तो यह मान लिया जाता है कि वह ससुराल को क्या देखेगी उसे तो अपने पीहर वालो से ही फुरसत नहीं मिलती
मेरी अनेक मित्र है जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया है । उनका पूरा जीवन किसी एक परिवार की सेवा और केवल अपनी ही संतानो के लिए नहीं वरन समाज के एक बडे वर्ग की सेवा में बीत जाता है। हमें तो खुश होना चाहिये पर इसमेंभी हमें इतराज हो जाता है हम खोद –खोद कर यह जानने में लगे रहते हैं कि आखिर उनकी शादी क्यों नहीं हुई ? जरूर कुछ कमी रही होगी और हम तब तक चुप
नहीं बैठते जब तक कि हम अपनेमन की संतुष्टि ना कर लें।कैसी गन्दी मानसिकता है और कैसे गन्दे समाज के बीच रहते हैं हम? कन्या के माता –पिता होना ही इतना दुर्भाग्य पूर्ण होता है कि वे कभी गंगा नहीं नहा पाते ?उच्च शिक्षा दिलाकर तो वे अपने
पैरो पर और कुलहाडी मार लेते हैं। फिर कहीं बच्ची की नौकरी और लग जायें तो माना तो यह जाता है कि सोने में सुहागा पर शादी के लिए यह भी एक समस्या ही है । मसलन जिस शहर में उसकी शादी हो रही है क्या वहां लडकी को नौकरी मिल पायेगी?
क्या लडकी नौकरी के साथ अपने विवाहोपरांत के दायित्वों को पूरा कर पायेगी ? अब उसके सामने दो ही विकल्प हैं या तो वह नौकरी छोड दे और नई स्थितियों मे स्वयम को समायोजित कर ले अथवाऐसी नौकरी खोजें जिससे घर और परिवार बाधित न हो ।
अब इन स्थितियों में क्या यह ज्यादा उचित नहीं है कि वह नौकरी विवाह के बाद ही करना शुरु करे।उससे पूर्व वह स्वयम को नौकरी के लिए तैयार अवश्य कर ले, अपनी शिक्षा दीक्षापूरी कर ले ।
बस आज इतना ही पर मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई ।बाकी का अगली पोस्ट में।
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हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग खुशियों का फैलाव है

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प्रिय भाई शिवम् मिश्रा जी दिल्‍ली में हैं

जैसा कि फोन पर बात हुई थी, नियत कार्यक्रम के अनुसार भाई शिवम् को दिल्‍ली में होना चाहिए। मैं उनके फोन की प्रतीक्षा में हूं। कृपया उन तक यह सूचना पहुंचाने का कष्‍ट कीजिएगा ताकि उनसे बात हो सके और फिर मुलाकात हो सके। और हो सके एक फोटो सैशन।
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अरुधंति से सावधान

क्या अरुधंति राय जैसी बाइयों से देश को सावधान रहने की आवश्यकता नहीं है? खुद को अतिबुद्धिजीवी मानने वाली अरुधंति का विचार देश को बांटने वाला है, और यह पहला अवसर भी नहीं है कि बाई ने ऐसा कहा हो। समय-समय पर अरुधंति ने आग में घी डालने वाले बयान दिये हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह कत्तई नहीं होता है कि देश के बंटवारे या देश के हिस्से के विरोध में अपने बयान देकर चर्चा में बने रहने का मोह पूर्ण किया जाये। क्योंकि यह देश कोई मज़ाक नहीं है। इस देश की आज़ादी के लिये कइयों-कइयों ने अपना बलिदान दिया है। जी हां अरुधंतिजी कश्मीर भी इसी देश में है जिसके लिये आज भी हमारे देशभक्त अपने खून से उसे सींच रहे हैं, जिसे आपने भारत से अलग बताया है। अरुधंति का बयान महज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को महान कहलवाने और यह साबित कराने के लिये है कि दिखिये हम भारत में रहने के बावज़ूद भारत के खिलाफ बोलते हैं, और किसी की हिम्मत नहीं कि हमसे ऐंठ जाये। ऐसी बाइयां या ऐसे लोग पहले तो बयान देकर सुर्खियों में छा जाते हैं, फिर अपने बयान या अपने बचाव के लिये देश को भ्रमित करने वाले बयान देते हैं, प्रेस कांफ्रेंस लेते हैं और फिर सुर्खियां ढूंढते हैं। फिलवक्त अरुधंति को कानूनी पेंच में लेने की कवायद जारी है। लिया ही जाना चाहिये। कानून की जंजीरों में ऐसे विकृत मानसिकता वाले लोगों को बांधना ही चाहिये जो देश के सौहार्द के लिये खतरा हैं।
क्या जानती हैं अरुधंति कश्मीर के बारे में? कश्मीरी पंडितों से पूछ कर देखें या फिर कश्मीर का इतिहास ईमानदराना होकर पढ लें। वैसे मैं जानता हूं कि अरुधंति जैसे लोग जिस परिवेश, जिस मानसिकता और जिस उद्देश्य के लिये जी रहे हैं उसमें दूसरों की सही राय या सही इतिहास या विशुद्ध भारतीय होकर कभी नहीं सोच सकते। उनकी रगों में विरोध और विवाद पैदा करने वाला ही खून दौडता नज़र आता है। अरुधंति राय की यह किस्मत है कि यह देश उन जैसे लोगों को फिज़ुल में महत्व दे देता है। शायद यही कारण है कि देश को ऐसे लोगों की बयानबाजी से कभी कभी बडी कीमत चुकानी पड जाती है। होना यह चाहिये कि हम अरुधंति जैसे लोगों को महत्व देना छोड दें। दूसरी बात यह है कि कश्मीर का इतिहास या भारत का इतिहास ठीक से पढा जाये। उसका अध्ययन किया जाये। अरुधंति को यह पता होगा कि हमारी संसद में सर्व सम्मति से पारित है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। अगर नहीं तो वे चाहें तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में वी के कृष्णमेनन या एम सी छागला या फिर सरदार स्वर्ण सिंह जैसे महानुभावों की दलीलें देख-पढ लें कि कश्मीर किसका हिस्सा है? और यदि इतने से भी उनकी तथाकथित तीक्ष्ण बुद्धि में कश्मीर के प्रति ज़हर खत्म न हो तो प्राचीन भारतीय इतिहास की किताबें खरीद कर लायें और पढें कि कश्मीर किसके नक्शे में हमेशा विद्ममान है या नहीं? भारतीय इतिहास बताता है कि भारत में ईसा पूर्व (गौर से पढें अरुधंतिजी ईसा पूर्व) तीसरी शताब्दी से ही कश्मीर में एक समृद्ध नवपाषाण संस्कृति रही थी। और इस संस्कृति का जो महत्वपूर्ण स्थल मिला है वह है बुर्जहोम। यह आधुनिक श्रीनगर से ज्यादा दूर नहीं है। कहने का मतलब यह है कि मैं भारतीय इतिहास के नवपाषाण युगीन कश्मीर की बात कर रहा हूं। सिन्धु सभ्यता के विस्तार में जम्मू-कश्मीर के एक स्थल मांदा का नाम भी है जो अखनूर के निकट है। यह तो माना जायेगा न कि सिन्धु सभ्यता भारतीय इतिहास की सबसे मज़बूत सीढी है। चलिये 150 ईसवीं के भारत पर नज़र दौडा लीजिये। यह काल शक, कुषाण, सातवाहन का काल माना जाता है। अरुधंतिजी कनिष्क को जानती हैं? कुषाण वंश का तीसरा शासक कनिष्क। कनिष्क को इतिहासकारों ने कुषाण वंश का महानतम शासक माना है। उसका राज्यारोहण का काल 78 से 105 ईसवीं के बीच में अलग अलग इतिहासकारों ने माना है। जो भी हो कनिष्क के राज्यारोहण के समय कुषाण साम्राज्य में अफगानिस्तान, सिन्ध, बैक्ट्रिया व पार्शिया के प्रदेश शामिल थे। कनिष्क ने भारत में अपना राज्य विस्तार मगध तक फैलाया था और कश्मीर को तो उसने अपने राज्य में मिलाकर वहां एक नगर ही बसा लिया था जिसका नाम था कनिष्कपुर। यानी कश्मीर कनिष्क के शासनकाल के समय तो था ही यह ऐतिहासिक तथ्य है। इसके भी पहले प्राचीनतम या वैदिक कालीन इतिहास को अगर अरुधंतिजी मानती हो तो वह भी उठाकर पढ सकती हैं कि कश्मीर भारतवर्ष के नक्शे में रहा है। वे ललितादित्य के शासनकाल पर नज़र डाल सकती हैं या रणजीत सिंह के इतिहास को खंगाल कर देख लें कि कश्मीर कहां था? अरे हमारे पुराण कश्मीर की गवाही देते हैं। इसका नामकरण तो कश्यप मुनि के नाम पर हुआ माना जाता है। फिर कैसे अरुधंति राय को कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं लगता? खैर..यहां मैं साफ-साफ कह देना चाहता हूं कि मैं अरुधंति को समझाने की चेष्ठा कत्तई नहीं कर रहा, वे महान हैं..। मैं अपने भारत के इतिहास को संक्षिप्त में दर्शा कर अपने देशभक्त लोगों के सामने फिर से रख रहा हूं। मुगलों ने भारत पर काफी लम्बा राज किया, यह माना ही नहीं बल्कि लिखा भी गया है। मुगल शासको में कश्मीर किसी जन्नत से कम नहीं था। जहांगीर हो या शाहजांह भारत के इस बेमिसाल स्थान कश्मीर को विशेष प्रेम करते थे। आधुनिक भारतीय इतिहास की परतों पर तो कश्मीर स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। चाहे आप महाराजा गुलाब सिंह को ले लें या महाराजा हरिसिंह के इतिहास को खंगाल लें..क्या ये किसी विदेश में शासन करते रहे? अजी ज्यादा दूर क्यों जाते हैं..हरिसिंह के बेटे कर्ण सिंह से तो पूछ कर भी देखा जा सकता है कि कश्मीर भारत का हिस्सा है या नहीं?
अरुधंति का यह बयान था ही कि एक अन्य महाशय का बयान भी अरुधंति के बयान को बल दे गया। दिलीप पाडगांवकर का। इन महानुभाव ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिये पाकिस्तान को शामिल करके ही हल निकल सकता है, जैसी बात कही। मानों इन्हें यह अधिकार दिया हो कि भाई दिलीपजी आप जो कहेंगे वही मान्य होगा। सिर्फ एक वार्ताकार के रूप में दिलीपजी को भेजा गया था। भाईजान ने हल ही खोज निकाला। कश्मीर का मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुलझाने का मतलब क्या है? वो हमारा है, हम सोचने में समर्थ हैं कि किससे, कब और कैसी बातचीत करनी होगी? विडंबना यह है कि हमारे इतिहास में गद्दारों का भी एक इतिहास है। इनकी बडी फौज रही है, जिन्होने समय-समय पर भारत को आघात पहुंचाया है। चाहे वो जयचंद के रूप में हो या रानी लक्ष्मीबाई के समय, गद्दारों ने इतिहास के प्रत्येक कालखंड में भारत की संप्रभुता पर वार किया है। और अफसोस कि इसी वजह से हम मज़बूत नहीं बन सके। गद्दारों का इतिहास दफ्न नहीं हो सका है। किंतु हां, आज हम इतने समझदार तो हो गये हैं कि गद्दारों को पहचान सकते हैं। समय यही है कि सबकुछ सरकार ही निपटेगी जैसा विचार त्याग कर हमें अपने धर्म, अपने कर्तव्य को पहचानते हुए भारत को मज़बूत व एकजुट रखने के लिये आगे बढना ही होगा। अन्यथा इसकी कीमत भयावह होगी यह तय है, जो हम सबको भुगतनी ही होगी। भारत कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक एक है..कहने में ही नहीं इसे स्वीकारने का गर्व भी महसूस करना चाहिये।
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प्रेम जनमेजय को आचार्य निरंजननाथ सम्‍मान : दोनों के बारे में जानिये


सम्‍मान के बारे में ज्ञान

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हिन्‍दी चेतना का महामना मालवीय विशेषांक

पढ़ने के लिए शीर्षक पर क्लिक कीजिए 
संजो लीजिए और पढ़ जाइये

व्‍यंग्‍य यात्रा और गगनांचल के संपादक
श्री प्रेम जनमेजय को प्रदान किए जा रहे
आचार्य निरंजननाथ सम्‍मान की विस्‍तृत जानकारी
इन्‍हीं पन्‍नों पर पढ़ें
पर थोड़ा सा इंतजार करें
जल्‍द ही गगनांचल के ताजा अंक के साथ
नुक्‍कड़ पर ......
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क्या खाक मने दिवाली

नईदुनिया में प्रकाशित मेरा व्यंग्य क्या खाक मने दिवाली पढ़िये व्यंग्यलोक पर। आपकी प्रतिक्रिया, आलोचना समालोचना का इंतज़ार रहेगा।
प्रमोद ताम्बट
भोपाल
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आओ बातें करें।

पाठक गण, आपको आज का विषय अटपटा लग सकता है पर कितना जरूरी है इस छोटे से मुद्दे पर बात करना । आपने प्रताप नारायण मिश्र का आलेख बात तो पढा ही होगा ।तब से कितना पानी गुजर गया पर बात अपनी जगह अब भी कायम है। यह भी हो सकता है कि आज संचार् क्रांति के युग में फोन ,चेटिंग और एस एम एस ने बातों की जगह ले ली हो ।
और अब आमने सामने आप किसी से बातें करने का मौका न पाते हों। हम कितना बोलते हैंऔर कैसा बोलते हैं क्या कभी इस पर विचार किया है? क्या बोलने से पहले हम अपने शब्दों को तौलते है ? क्या जिससे बातें की जारही है उसके पद और गरिमा का ध्यान हम रख पा रहे है ं? हमारे मुंह से निकला एक एक शब्द कभी व्यतर्थ नहीं जाता ।हमारे शब्द किसी के चेहरे पर प्रसन्नता ला सकते हैं उअर किसी के चेहरे के नूर को छीन भी सकते हैं।कुछ दिनों पूर्व हमारे यहां एक सज्जन आये । यदि उनकी बातों का पूरा ब्योरा यहां दूं तो आप स्वत: ही समझ जायेंगे कि वे ह्रजरत ्पूरे समय केवल अपना गुणगान ही करते रहे ही करते रहे ।कभी- कभी तो अपने को इतने ऊंचे पाय्दान पर रख देते कि सुनने वाले को खीझ पैदा हो जाती।इतना बडबोला होना ठीक नहीं ।
बोलने से पहले शब्दों का चुनाव करें,उनकी वाक्य में स्थिति निशिचित करें ,माहौल का ध्यान रखें किसी खुशी के अवसर पर गये हैं तो वहा6गमी के े प्रसंग न सुनायें ,किसी बीमार को देखने गए हैं तो स्वस्थ होने की बातें करें न कि उन् प्रसंगों को छेडे जिनमें उस तरह के मरीज चल बसे हों। जीवम मृत्यु तो निशिचित है पर आप्की बातें बीमार और उनकेघर वालों पर बहुत प्रभाव डालती हैं।शादी सम्बन्ध के मामलों में बातें करते समय तो और भी सतर्क रहना चाहिए। सब कुछ सच बता देने पर कम से कम सम्बनधों में कटुता नहीं आती। पहले सब्ज्बाग दिखाकर सम्बन्ध तो तय किए जा सकते हैं पर उनका अंत कभी सुखद नहीं हुआ करता। भले ही यह सुझाव आपको व्यावहारिक न लगे पर सोलह आने सच तो यही है कि बातोमें स्पष्टता आपकी स्थिति को मजबूत बनाय्रए रखती है।
बहुत अधिक बोलने वाले अक्सर मात खा ही जाते है । बचपन में जब कहीं पत्र भेजना होता था तोमां कहती थी बेटा पहले रफ कागज पर ल्ख लो कहीं सक्शात्कार देने जाना होता तो उसका अभ्यास पहले घर पर करने की सलाह दी जाती थी ।आज मुझे उन सब बातो का औचित्य समझ आता है।बातें तो सभी करते हैं पर सोच समझ कर बोलंने वालों की तो बात ही कुछ और होती हैं।
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कलाकार यानी?

पिछले दिनों जब टीवी शो 'बिग बॉस' शुरू हुआ तो इसमे दो पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर महाराष्ट्र की दो पार्टियों नें विरोध प्रदर्शन किया। इसके पहले भी ऐसा हो चुका है जब पाकिस्तानी कलाकारों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। विरोध प्रदर्शन कानून रोक देता है। वो रुक जाता है। मगर पाकिस्तानी कलाकारों का आना बद्स्तूर जारी है। इस मुद्दे पर बहस-मुबाहस भी काफी हो चुकी है। और अब सबके मुंह बक बक करके थक से गये हैं। किंतु निष्कर्ष नहीं निकला कि क्या सही है और क्या गलत? मैं फिर से यह मुद्दा उछाल रहा हूं और यह खोजने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर सही कौन है? वो जो पाकिस्तान से कलाकार आयात कर रहे हैं या वे जो इसका विरोध कर रहे हैं या फिर वे लोग जो बक-बक कर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं? हालांकि लब्बोलुआब यही है कि सबके धन्धे चल रहे हैं। किंतु बावज़ूद इसके..कुछ तो है जो नहीं होना चाहिये। वो क्या नहीं होना चाहिये? शुद्ध भारतीय मानसिकता की नज़र तो यही कहती है कि हमे पाकिस्तान से किसी कलाकार को आमंत्रित नहीं करना चाहिये। क्यों? क्योंकि पाकिस्तान में भारतीय कलाकारों पर अघोषित बैन हैं। क्योंकि पाकिस्तान भारत की रीढ में घुस कर हमला करने की मानसिकता रखता है। क्योंकि आज के ऐसे हालात नहीं हैं जो इन दो देशों के बीच किसी गैरराजनीतिक तरीकों से दोस्ती का तर्क दे सकते हों। क्योंकि हम ही इतने उतावले क्यों होते रहें? अब कलाकारों को इस लिहाज़ में शामिल नहीं करना चाहिये, ये दलीलें होती हैं। किसकी? कलाकारों की, कुछ राजनीतिक दलों की, कुछ अति बुद्धिजीवियों की..। सोचिये यदि हम घोषित तौर पर बैन लगा देते हैं तो क्या बिगड जायेगा? वोट बैंक। दुनिया को दिखाया जाने वाला ढोंग। राजनीतिक पार्टियों का संतुलन। रीयलीटी शो वालों का हिसाब-किताब। न्यूज चैनल वालों की टीआरपी। और यह सब बाज़ार को प्रभावित कर देने वाला होगा। आइये अब पाकिस्तान पर नज़र करें- विस्फोटों और आतंक से लगभग बदहाल हो चुके इस देश में कला, संस्कृति, खेल आदि की वाट लगी हुई है। ऐसे में भारतीय कलाकारों के जरिये वे लाखों-करोडों के वारे-न्यारे कर सकते हैं, बिगडी हुई अर्थ व्यवस्था को पटरी पर ला सकते हैं..किंतु कट्टरता ऐसी है कि भारत से नफरत उनकी नसों में व्याप्त है। भूखे मरने की कगार वाले कलाकारों को अगर दुनिया में कोई पूछने वाला देश है तो वो भारत है..। बावज़ूद नमकहलाली की मानसिकता से परे पाकिस्तान में भारत..जानी दुश्मन की तरह है। इसलिये भारतीय कलाकारों, खिलाडियों या किसी शो-वो वाले माध्यमों पर वहां स्वचलित बैन है। अब लौट आइये अपने देश, हमारी क्या मजबूरी? क्या महज़ इस बाबत हम पाकिस्तानी कलाकारों को दूर रखें कि वहां हमारे कलाकारों के साथ सही बर्ताव नहीं होता या पाकिस्तान हमारे देश में आतंक फैलाने वाला देश है तो आखिर इसमे हर्ज़ ही क्या है? किंतु कमाई में हर्ज़ है। तो क्या सिर्फ कमाई के लिहाज़ से हम अपनी भावनाओं का कत्ल कर दें?
हां, यह भी मजेदार है जैसा कि हाल ही में बिग बॉस से बेघर हुई पाकिस्तानी कलाकार बेगम ने खुद को शांति दूत की तरह पेश किया। यानी शांति दूत की तरह आते हैं कलाकार। पर यह तो तब सम्भव है जब इन तथाकथित दूतों को वहां की सरकार कायदे से दूत बनाकर भेजती। भारत की ज़मीन पर शांति के दूत की बातें..क्या कमाई का हथकंडा नहीं लगता? अगर शांति की इतनी ही इमानदारी है तो पाकिस्तान में कभी ऐसा नज़ारा क्यों नहीं देखने मिलता कि वहां के तमाम कलाकार एकजुट होकर बैनर लेकर निकल पडे हो सडकों पर कि हमे भारत से प्यार है..शांति चाहिये। भाई, अपनी बुद्धि इस मसले पर कुछ समझ ही नहीं पाती है। और खोजने की कोशिश हर बार यहीं आकर टिक जाती हैं कि आखिर ये क्या लगा रखा है कि पाकिस्तान से कलाकार बुलाये जा रहे हैं? हमारे यहां कम पड गये हों ऐसा भी नहीं। अब आप सुझाइये..सही क्या है? क्योंकि फिलवक्त मुझे कई नज़रियों से अपना यही तर्क सही लग रहा है..। पर ऐसा भी कतई नहीं है कि आपका तर्क मैं टीवी शो वालों की तरह काटूं, या विवाद पैदा करूं। मैं कोई राजनीतिक पार्टी वाला बन्दा नहीं, न ही अतिबुद्धिजीवी वाला प्राणी। अदना सा दिमाग है दौड रहा है। सोच रहा है। बस्स।
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ओवर कम्युनिकेशन यानि नॉन कम्युनिकेशन

आज के दौर में वर्चुअल वर्ल्ड में आई नजदीकियों की हकीकत.......
पूरी पोस्ट कृपया यहाँ पढ़ें
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राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह पुरस्‍कार वितरण समारोह संपन्‍न होने के बाद के कुछ चित्र

मध्‍य में कौन
शांतनु मोइत्रा
सिर्फ एक को पहचानें
हो नहीं सकता इन्‍हें न पहचाना जाये
अभी इतने ही बाकी बाद में।
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अमिताभ बच्‍चन राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार समारोह की रिहर्सल में

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इस वीडियो में दो ब्‍लॉगर दिखलाई दे रहे हैं, आपको इन्‍हें पहचानना है और बतलाना है नाम

इस अस्‍पष्‍ट वीडियो में जो आज राजधानी दिल्‍ली में बनाया गया है, आपने किन्‍हीं दो ब्‍लॉगरों को पहचानना है
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हम स्वयं में खुश क्यों नहीं रह पाते ?

हमारा अपना वजूद इतना छोटा हो गया है कि हमने सारी खुशियों का आधार दूसरो को मान लिया है |कल हम इसलिए दुखी थे कि सामने वाले ने हमें तरजीह नहीं दी और आज इसलिए दुखी है कि मिस्टर क हमसे खुश नहीं है ,आने वाले दिनों में हम इसलिए परेशान रहेंगे कि हमें हमारा मनाचाहा नहीं मिला |क्यों भाई ,क्या हम स्वयं में खुश रहने की आदत नहीं डाल सकते | हमेशा अपने दुःख के लिए सामने वाले को दोषी ठहराना जरूरी है क्या?हम स्वयं में झाकने की कोशिश क्यों नहीं करते ?क्या हमारे साथ जो भी घटा ,उसके लिए हमेशा तीसरा व्यक्ति ही जिम्मेदार होता है / हम उसी काम को ही तो करते है जिसमे सुख मिलता है |यदि हम दबाव में काम कर रहे है तो हमें सोचना होगा आखिर हम उस दबाव में क्यो है ?कही ऐसा तो नहीं हम स्वयं भी उस कार्य में रुचि रखते है और ठीकरा दूसरों ...........................................  जारी रखने के लिए क्लिक कीजिएगा
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तू ही तो मेरा हॉर्न है!

दोस्तों, शौक ही नहीं इंसान जिज्ञासा भी कैपेसिटी के हिसाब से पालता है। आप उतने ही जिज्ञासु हो सकते हैं, जितना आपकी बुद्धि अफोर्ड करती है। यही जिज्ञासा आपको हर वक़्त बेचैन करती है। आप शोध-खोज में लग जाते हैं। मसलन, हॉकिंग्स लम्बे समय तक बेचैन रहे कि सृष्टि का निर्माण ईश्वर ने किया या भौतिकी ने। न्यूटन सेब को पेड़ से गिरता देख उसकी वजह जानने में लग गए। वैज्ञानिकों की पूरी टोली आज तक ये जानने में लगी है कि ब्लैक हॉल का निर्माण किन हालात में हुआ। मगर ये सब बड़े लोगों की जिज्ञासाएं हैं। 'मुफ्त धनिए’ के लिए बनिए से झगड़ने में ज़िंदगी गुज़ारने वाला आम आदमी ऐसी चुनौतियां मोल नहीं लेता।

उसकी ज़िंदगी और जिज्ञासाएं अलग होती हैं। अपनी ही बात करूं तो सालों से दिल्ली के ट्रैफिक में हिंदी और अंग्रेज़ी के सफर के बावजूद मैं नहीं जान पाया कि लोग हॉर्न क्यों बजाते हैं? वो कौनसे भूगर्भीय, समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक कारण हैं, जो आदमी को हॉर्न बजाने पर मजबूर करते हैं। इन्हीं बातों से परेशान हो मैंने हॉर्नवादकों पर शोध करने का फैसला किया। यहां-वहां भटकने के बजाय मैंने मशहूर हॉर्नवादक दिल्ली के दल्लूपुरा निवासी आहत लाल से मिलना बेहतर समझा। इससे पहले कि आहत से हुई बातचीत का ब्यौरा पेश करूं....बता दूं कि छात्र जीवन से ही आहत को हॉर्न बजाने का खूब शौक था। शुरू में ये सिर्फ शौकिया तौर पर हॉर्न बजाते थे मगर कालांतर में मिली अटेंशन के चलते इन्होंने इस शौक को गंभीरता से लिया। लोकप्रियता का आलम ये है कि आज आसपास के सैंकड़ों गांवों से इन्हें शादियों में हॉर्न बजाने के लिए बुलाया जाता है। पिछले तीन सालों में देश-विदेश में हॉर्नवादन के चार हज़ार से ज्यादा कार्यक्रम दे चुके हैं। उभरते नौजवानों के लिए हॉर्न वादन की वर्कशॉप चलाते हैं। इनसे सीखे छात्र दल्लूपुरा घराने के हॉर्नवादक कहलाते हैं। इन्होंने तो सरकार से मांग तक की थी कि वूवूज़ेला की तर्ज़ पर कॉमनवेल्थ खेलों में ट्रैक्टर-ट्राली के किसी हॉर्न को पारंपरिक वाद्य यंत्र के रूप में शामिल किया जाए।


बहरहाल, बिना वक़्त गंवाए मैं बातचीत पेश करता हूं। आहत बताइए, आपकी नज़र में हॉ़र्न बजाने का सबसे बड़ा फायदा क्या है। देखिए, आज देश में जैसे हालात हैं उसमें आम आदमी के हाथ में अगर कुछ है, तो सिर्फ हॉर्न। नौजवान पचास जगह अप्लाई करते हैं, उन्हें नौकरी नहीं मिलती, दस लड़कियों को प्रपोज़ करते हैं मगर कोई हां नहीं कहती। ऐसे में यही नौजवान जब सड़क पर निकलता है तो हॉर्न बजा अपनी फ्रस्ट्रेशन निकालता है। किसी भी लंबी काली गाड़ी को देख यही सोचता है कि जिन कम्पनियों में उसे नौकरी नहीं मिली, हो न हो उन्हीं में से किसी एक का सीईओ इसमें होगा। बाइक के पीछे बैठी लड़की देख उसे चिढ़ होती है कि तमाम टेढ़े-बांके लौंडे लड़कियां घुमा रहे हैं और एक वही अकेला घूम रहा है। इसी सब खुंदक में वो और हॉर्न बजाता है। उसका मन हल्का होता है। आप ही बताइए अब ये हॉर्न न हो तो वो बेचारा नौकरी और छोकरी की फ्रस्ट्रेशन में सुसाइड नहीं कर लेगा?

हां, ये बात तो ठीक है मगर आजकल मोटरसाइकिल में जो ट्रक वाला हॉर्न लगावने लगे हैं, उसके पीछे क्या दर्शन है? देखिए, जो जितना कुंठित होगा, उसकी अभिव्यक्ति उतनी ही कर्कश होगी। इसके अलावा ध्यानाकर्षण की इच्छा भी एक वजह हो सकती है। हो सकता है उस बेचारे की बचपन से ख़्वाहिश रही हो कि जहां कहीं से गुजरूं, लोग पलट-पलट कर देखें। मगर उसे इसका कोई जायज़ तरीका न मिल पा रहा हो। अब हर कोई तो सिंगिंग या डांसिंग रिएल्टी शो में जा नहीं सकता। ऐसे में सिर्फ गंदा हॉर्न बजाने भर से किसी को अटेंशन मिल रहा है, तो क्या प्रॉब्लम है। जिस दौर में लोग पब्लिसिटी के लिए अपनी शादी तक का तमाशा बना देते हैं, वहां हॉर्न बजाना कौनसा अपराध है!

मैंने कहा-ये तो बड़ी वजहें हो गईं... इसके अलावा...आहत लाल-इसके अलावा छोटे-मोटे तात्कालिक कारण तो हमेशा बने रहते हैं। घर में बीवी से झगड़ा हो गया तो हॉर्न को बीवी की गर्दन समझ ऑफिस तक दबाते जाइए, ऑफिस पहुंचते-पहुंचते सारा गुस्सा छू हो जाएगा। ये समझना होगा कि ज़िंदगी के जिस-जिस मोड़ पर आप मजबूर हैं, वहां-वहां हॉर्न आपके साथ है। ऑफिस में रुके इनक्रीमेंट से लेकर कई दिनों से घर में रुकी सास तक का गुस्सा हॉर्न के ज़रिए निकाल सकते हैं। ज़माने भर का दबाया आदमी भी, हॉर्न दबा अपनी भड़ास निकाल सकता है और ये चूं भी नहीं करता, बावजूद इसके कि ये हॉर्न है! कहने वाले कहते होंगे कि किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त हैं मगर इंसान तो यही कहता है...तू ही तो मेरा हॉर्न है!

(नवभारत टाइम्स 18 अक्टूबर, 2010)
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कंगारूओं से भले हैं बंदर - चैटिंग विद मंकी पार्ट टू

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व्यंग्य - बुराई का शतशिख रावण उर्फ 'शतानन'

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मन में बसी बुराईयों के रावण को जलायें

मन में बसी हैं बुराईयां
उन्‍हें वहीं छोड़ आयें
जब रावण जलाने जायें

दशहरे की दूं शुभकामना
मन में विजय की भावना
विजयादशमी मनायें

मन में बसी बुराईयों को
पटाखों की जगह जलायें
जब रावण जलाने जायें

पोस्‍ट चाहें कितनी लगायें
संदेश मोबाइल से भिजवायें
फोन पर बातें बनायें

जब तक मन नहीं करेंगे साफ
बुराईयों का नहीं घटेगा ग्राफ
पोस्‍ट चाहे न लगायें


बुराईयों के रावण को
सिर्फ एक टिप्‍पणी से
कैसे अं‍तिम जगह पहुंचायें
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वर्धा सेमिनार के चित्र, महात्‍मा गांधी जी पर मेरी पोस्‍टें और आपके विचार

राष्‍ट्रपिताजी महात्‍मा गांधी       मुझे क्लिक करके पढ़ना मत भूलिएगा

आनंद ही मजा है


गांधी जी साथ होते तो ...

 कवि, कविता और ब्‍लॉगर

सच्‍चा चित्र

मुझे मत पहचानें

नाम आप बतलायें

याद दिलाती यादें

नदी में ब्‍लॉगर


आश्रम पहचानें


धन्‍यवाद दे ही दूं


यदि जाना हो तो अवश्‍य तलाशें



आओ ब्‍लॉगिंग की चक्‍की चलायें


 गर महात्‍मा गांधी जी ने हिन्‍दी ब्‍लॉग बनाया होता ?

ऊपर और नीचे के लिंक पर क्लिक जरूर कीजिएगा
महात्‍मा गांधी जी ने पत्र लिखा है, आप भी पढि़ए

सारे चित्र कविता जी ने ...


दौड़ या होड़

जरूरत है परिचय की

मन में इच्‍छा है, सच्‍चाई जानें और नेक बन जायें तो अनेक लिंक दे रहा हूं, इन्‍हें पढ़ें और अपनी राय बतलायें। प्रस्‍तुत‍ चित्र महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में आयोजित सेमिनार और इतर सेमिनारी चित्र हैं, जिनमें नर और नारी, गांधी जी की स्‍मृतियां और आचार्य बिनोवा भावे के पवनार आश्रम और वहां पर कल कल करके कल की याद कराती पवित्र पावनी नदी है।
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डॉ. सुभाष राय जी महाव्‍यस्‍त हैं, इसलिए साखी ब्‍लॉग पर अवकाश है

आप जानते ही होंगे
डीएलए को
बात बेबात को
साखी को
जानते हैं आप
डॉ. सुभाष राय जी को
वे आगरा छोड़ गए हैं
लखनऊ पहुंच गए हैं
जनसंदेश टाइम्‍स
में संभाला है संपादक का कार्यभार
भार अभी ज्‍यादा है
कम ज्‍यादा नहीं
ज्‍यादा वाला ज्‍यादा है।

संपादक से अधिक की
जिम्‍मेदारी वाला है
इसलिए उनके ब्‍लॉगों पर
चल रहा अवकाश है
जल्‍दी ही वे लौटेंगे
पुन: होंगे दोगुने-चौगुने
जोश से सक्रिय
पर अभी महाव्‍यस्‍त हैं
जनसंदेश में।
अभी तक सोच रहे हैं

काबलियत की पुकार

इंटरनेट पर भी
नहीं पहुंच पा रहे हैं
आप समझ रहे होंगे
उनके ई मेल में
अनपढ़ी-अनखुली मेलों के
अंबार लगते जा रहे हैं।

हिन्‍दी ब्‍लॉगर इसे अन्‍यथा न लें।
मैं उन्‍हें जनसंदेश से जुड़ने की हार्दिक शुभकामनायें दे रहा हूं।
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महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा से लौटकर .... हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक महारैली का आयोजन देश की राजधानी दिल्‍ली के इंडिया गेट पर करें

एक लिंक भी क्लिक कर के पढ़ने से छोड़ दिया तो समझिए इंडिया गेट की हिन्‍दी ब्‍लॉगर महारैली का भविष्‍य ...
इससे भी दुष्‍कर है हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग क्‍या ?
 इसमें उन सभी बातों और चित्रों से बचा गया है जिनका जिक्र अन्‍य पोस्‍टों में किया गया है। अगर आपने भी इस संबंध में कोई पोस्‍ट लिखी हो तो उसका लिंक अवश्‍य भेजें, उसे इसमें शामिल कर हमें प्रसन्‍नता का अनुभव होगा।
ब्‍लॉग मीडिया के दिन तब तक ही स्‍वर्णिम हैं, जब तक सरकारी तंत्र इस पर अपना कड़ा अंकुश नहीं कसता है। इसके आरंभ से ही इसको नियंत्रण में रहने की कवायदें तेज हुई हैं, यह प्रयास इसलिए भी किए जा रहे हैं क्‍योंकि सभी लिखने की आजादी की उपयोगिता को बखूबी जानते-मानते हैं। जिस दिन इस नए माध्‍यम पर लगाम कसनी शुरू हो जाएगी, उस दिन यह भी अन्‍य माध्‍यमों रेडियो, टी वी, अखबार इत्‍यादि की तरह ही हो जाएगा। फिर उनमें और इनमें कोई अंतर नहीं महसूस होगा। उन्‍हीं संभावनाओं से बचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की मन से सराहना होनी चाहिए।

इस सदी के सबसे ताकतवर ब्‍लॉग मीडिया के हिन्‍दी ब्‍लॉगों से जुड़े स्‍वामी/संचालकों यानी हिन्‍दी ब्‍लॉगरों का एक महत्‍वपूर्ण सेमिनार बीते शनिवार-रविवार 9 व 10 अक्‍टूबर 2010 को महाराष्‍ट्र में वर्धा स्थित महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में आपसी सौहार्दपूर्ण माहौल में रचा गया। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में आचार संहिता को लेकर आयोजित यह अब तक का उपयोगी आयोजन रहा है, इसे कहने में मुझे तनिक संकोच नहीं है। इसका श्रेय विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय आंतरिक सम्‍परीक्षा अधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी को जाता है, यह सच है।

देश और विदेश में किसी भी सरकारी विश्‍वविद्यालय द्वारा किया जाने वाला यह आयोजन नि:संदेह मील का पत्‍थर है। इसमें देश और विदेश के विभिन्‍न हिस्‍सों से बुलाये गये 30 से अधिक हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की उपस्थिति ने इसे सार्थक बनाया। इस संबंध में आज तक लगभग सभी शामिल हुए (और जो शामिल नहीं रहे) हिन्‍दी ब्‍लॉगरों ने खूब पोस्‍टें लिखीं, अपनी राय जाहिर की, अपनी भागीदारी के अनुभव और चित्र साझा किए। इस संबंध में अब तक प्रकाशित सभी पोस्‍टों में जो जानकारी पेश की गई है, वो उल्‍लेखनीय है और उस सबका सक्रिय हिन्‍दी ब्‍लॉगरों और हिन्‍दी संसार ने नोटिस लिया है, यह सुखद है। मैं उसका दोहराव नहीं करना चाहूंगा और उन सबकी उपयोगिता को उनकी समग्रता में स्‍वीकार करता हूं।

जिस प्रकार कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के आयोजन से कुछ महीने पहले ही गेम्‍स और इससे जुड़ी खबरें खूब सुर्खियों में छाई रहीं। आयोजन के बाद गेम्‍स अपने बेहतर स्‍वरूप में सामने आये और देश की छवि निखरी, बावजूद इसके कि इससे घोटाले और अनियमितताएं जुड़ी रहीं। घर में भी जब कोई छोटा अथवा बड़ा आयोजन किया जाता है, उसमें भी यही सब होता है, ऐसे आयोजनों में खामियां रहना स्‍वाभाविक है। आज गेम्‍स की क्‍लोजिंग है और इस क्‍लोजिंग के साथ ही धीरे-धीरे और सप्‍ताह भर में गेम्‍स संबंधी सभी सुर्खियां नदारद हो जायेंगी क्‍योंकि हम सब जल्‍दी भूलते हैं और यह भूलना सदा सकारात्‍मकता की ओर ही ले जाता है।

इसी प्रकार की आपत्तियां, आरोप-प्रत्‍यारोप आदि इस हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सेमिनार के संबंध में भी ब्‍लॉग पोस्‍टों में नजर आए, जिनसे इस सेमिनार की सार्थकता स्‍वयं सिद्ध हुई है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को इससे बल प्राप्‍त हुआ है। इस दौरान पोस्‍टों में, जो सवाल सबसे अधिक चर्चा में आए, वे ये हैं कि, किन ब्‍लॉगरों को बुलाया गया है, क्‍यों बुलाया गया है, उनका चयन किस आधार पर किया गया है और आचार संहिता की जरूरत ही क्‍या है आदि। इसी संदर्भ में पूर्व में आयोजित इलाहाबाद वाले ब्‍लॉगर सम्‍मेलन की अव्‍यवस्‍थाओं और अनियमितताओं का भी जिक्र किया गया।

मेरा यह मानना है कि किसी भी आयोजन में यह तो संभव ही नहीं है कि देश और विदेश के सभी हिन्‍दी ब्‍लॉगरों को आमंत्रित किया जा सके और वे सभी शामिल हो जायें। वे शामिल हों तो आयोजन किया जाये और वे शामिल न हों तो आयोजन न किया जाये। जो ब्‍लॉगर बंधु ऐसा सोच रहे हैं, उनसे मेरा विनम्र आग्रह है कि वे इस दिशा में प्रयत्‍न करें और
हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक महारैली का आयोजन देश की राजधानी दिल्‍ली के इंडिया गेट पर करें। इसमें शामिल होने का खुला आमंत्रण दिया जाए और रहने, ठहरने, आने, जाने, खाने इत्‍यादि की व्‍यवस्‍था शामिल होने वालों की जिम्‍मेदारी पर ही छोड़ दी जाए, जैसा राजनैतिक दलों के ऐसे आयोजनों में किया जाता है जबकि वहां पर परोक्ष तौर पर राजनीतिक संगठनों द्वारा येन-केन-प्रकारेण सभी व्‍यवस्‍थाएं की जाती हैं। इंडिया गेट का किराया भरना नहीं है, हां, कुछ सरकारी औपचारिकताएं, अनापत्ति प्रमाण पत्र लेने, कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति के लिए संबंधित विभागों को सूचित किया जाना, जरूर करना होगा। हालांकि ऐसा हिन्‍दी ब्‍लॉगरी में होना अभी संभव नहीं लग रहा है, शायद कभी होगा भी नहीं और मेरी माने तो होना भी नहीं चाहिए, नहीं तो राजनीति और ब्‍लॉगिंग में अंतर ही क्‍या रह जायेगा। देखें कौन आगे आता है ऐसा आयोजन करने के लिए या सिर्फ सवाल उठाने के शहंशाह हैं हम सब।

खैर ... विश्‍वविद्यालय द्वारा इससे पहले के आयोजनों में भी सबको नहीं बुलाया गया था और न ही इस आयोजन में सबको बुलाया जाना संभव था और न ही भविष्‍य में आयोजित किए जाने वाले आयोजनों में सबके बुलाने–शामिल होने की गारंटी ली/दी जा सकती है। सबको बुलाने और भीड़ इकट्ठी करने की उपयोगिता भी नहीं है। सभी को अपना महत्‍वपूर्ण लगना एक मानवीय कमजोरी है और इसका कोई हल भी नहीं है। बस, हमें आत्‍म-मुग्‍धता से बाहर निकल कर आना होगा और हिन्‍दी ब्‍लॉग समाज हित के लिए सक्रिय रहना होगा।

विचार तो यह होना चाहिए कि एक सुखद शुरूआत हुई है, मुझे नहीं बुलाया गया तो कोई बात नहीं, जिसको बुलाया गया, हैं तो वे भी हिन्‍दी ब्‍लॉगर ही। हम सबमें से ही एक हैं। एक हैं तो नेक भी होंगे, पर हम खुद कितने नेक हैं, यह सोचने की जहमत हम नहीं उठाते हैं। इसकी जगह होता यह है कि मैं तो सबसे धुरंधर ब्‍लॉगर हूं, मेरे बिना ऐसे आयोजन की कोई सार्थकता ही नहीं है, उपयोगिता नहीं है, कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, इससे बचना होगा और सब्र करना होगा।

अब यहां अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के नए माध्‍यम से जुड़े हैं तो और कुछ न करें पर रायता तो न फैलायें, कि न तो खुद पियें, और न दूसरों को ही पीने दें। दूसरे के दुख में अपने सुख को तलाशने में जुटे रहें। हम खुद ही हिन्‍दी ब्‍लॉग मीडिया को पांचवां खंबा और न जाने क्‍या-क्‍या स्‍वीकारते हैं तथा इसी के विध्‍वंस पर उतारू हैं।

इन सभी पर हम सबको खुले मन से विचार करना होगा। आरोप लगाना, शोर मचाना, संवाद की जगह विवाद करना, मन पर मैल की सख्‍त परत चढ़ाना – जिससे लोकप्रिय होने का जुगाड़ बन सके, यह सब लोकप्रियता पाने के, सुर्खियों में आने के सस्‍ते यानी बेहद हल्‍के तरीके हैं। अपने सुकार्यों में गति लायें, प्रगति की ओर बढ़ें-चढ़ें। उचित यही होगा कि मन में विवेक जागृत हो और इस सबसे ऊपर उठकर सकारात्‍मक दृष्टिकोण से कार्यों की सराहना करें तथा विकास में सहभागी बनें। क्षुद्र स्‍वार्थों से परहेज रखें।

उन सबका प्रतिकार होना चाहिए जो इस नए मीडिया को अपनी विश्‍व पहचान बनाने के लिए कुत्सित प्रयासों में संलग्‍न हैं और इसका जरिया चाहे-अनचाहे हमें ही बना रहे हैं। हम सबको सचेत होकर शुभ कार्यों में जुटे रहना है। बिल्‍कुल उसी तरह, जिस तरह जब हम यात्रा पर निकलते हैं और रेल के सफर के दौरान सतर्क रहते हैं। कुछ से घुल-मिल भी जाते हैं। इसका ताजा अनुभव भड़ास फेम यशवंत सिंह हैं, जिनके संबंध में न जाने क्‍या-क्‍या पढ़ने को मिलता रहा है जबकि वे एक खुले दिल के स्‍वामी हैं और सबकी मदद को सदैव तैयार रहते हैं। नकारात्‍मकता से उनका दूर-दूर तक का संबंध नहीं है – ऐसा मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

वर्धा से दिल्‍ली वापसी में जी टी एक्‍सप्रेस में वे मेरी यात्रा के सहभागी रहे और भोपाल में दस मिनट के रेल के स्‍टेशन पर विराम के दौरान मिले भाई प्रमोद ताम्‍बट के आदर और स्‍नेह ने मुझे कहीं भीतर तक अभिभूत कर दिया। इससे मुझे यह अहसास हुआ है कि जब हम आपस में मिलते हैं तो आचार-संहिता और नैतिकता खुद ही हम सबके बीच उतर आती है। अतएव, ब्‍लॉगर मिलन जैसे आयोजनों को जारी रखना चाहिए, इनमें तेजी जानी चाहिए। इसी मिलने-मिलाने से एक जिम्‍मेदारी का भाव विकसित हो रहा है, एक-दूसरे को जानने-समझने-पहचानने का अवसर मिल रहा है, इसे व्‍यर्थ न जाने दें और इस ओर अपने प्रयत्‍न जारी रखें। रेल के अबाध सफर की तरह ... आमीन। 

साला न कहें, भाई साहब कहें
ब्लागिंग सबसे कम पाखंड वाली विधा है
ब्लागिंग की आचार संहिता की बात खामख्याली है
वर्धा में भाषण जारी
वर्धा में ब्लागर सम्मेलन
ब्लाग वर्कशाप की अन्य तस्वीरें
वर्धा सम्‍मेलन की तीन अविस्‍मरणीय बातें
वर्धा ब्लोगर संगोष्ठी के पर्दे के पीछे के असल हीरो ...
ब्लोगिंग का उपयोग सामाजिक सरोकार तथा मानवीय मूल्यों को सार्थकता क़ी ओर ले जाने केलिए किये जाने क़ी संभावनाएं बढ़ गयी है ........
वी एन राय, ब्‍लॉगिंग और मेरी वर्धा यात्रा






वर्धा ब्‍लॉगर सम्‍मेलन : कुछ खट्टा कुछ मीठा
नीचे दिए गए लिंक्‍स को कापी करके एड्रेस बार में पेस्‍ट करें और एंटर दबाएं पोस्‍ट खुल जाएगी
http://sanjeettripathi.blogspot.com/2010/10/blog-post.html
http://indian-sanskriti.blogspot.com/2010/10/blog-post_12.html
http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2010/10/blog-post.html
http://charchamanch.blogspot.com मुझे 15 अक्‍टूबर 2010 को खोलिएगा
http://hindibharat.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html
वर्धा में नदी उदास नहीं थी





हिन्‍दी ब्‍लॉगर को हिन्‍दी कवि का आशीर्वाद


ब्‍लॉग : आइये आचार संहिता को मारें गोली
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पत्‍थर मारो, पैसा पाओ यारो

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क्या इसी मनरेगा पर इतरा रही है सरकार

(सुनील)

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना नाम से ही भव्यता झलकती है और इसी नाम पर सरकार अपनी पीठ भी थपथपाती रहती है लेकिन गांव-गांव और शहर-शहर तक इस योजना को पहुंचाने का दंभ भरने वाली सरकार की मनरेगा की सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। कल सोनी चैनल पर शुरू हुए द ग्रेट अमिताभ बच्चन का शो 'कौन बनेगा करोडपति' ने इस योजना की असलियत को सामने ला दिया। अमिताभ बच्चन द्वारा पूछे गए एक सवाल 'नरेगा' योजना किस महान नेता के नाम से जुडा हुआ है। इस प्रश्न के चार ऑप्शन महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी थे। प्रतियोगी को इस प्रश्न का उत्तर नहीं पता था। यहां तक तो ठीक था। उसने लाइफ लाइन का इस्तेमाल किया और एक्सपर्ट की राय ली। एक्सपर्ट ने भी संकोचपूर्वक जवाब दिया। हालांकि उनका जवाब सही था लेकिन हद तो तब हो गई जब केबीसी में बैठे अधिकांश दर्शकगणों में से महात्मा गांधी को केवल 9 फीसदी वोट मिला जबकि अधिकांश दर्शक जवाहर लाल नेहरू या फिर राजीव गांधी के पक्ष में थे। तो आप सोच सकते हैं कि सरकार की यह योजना कितनी घर-घर तक पहुंची हुई है और कितने लोग इस योजना से वाकिफ हैं। आप आप इस योजना की राज्यवार सफलता के बारे में आसानी से सोच सकते हैं।

सरकार की जय हो
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दैनिक नईदुनिया की रविवारीय मैगज़िन में मेरा - व्यंग्य नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे। आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।
प्रमोद ताम्बट
भोपाल

व्यंग्य और व्यंग्यलोक
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तीसरा हरियाणा अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह : जाते-जाते







































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फिल्म महोत्सव में आ·र मैं उन दिनों ·ी यादों में खो गया, जब मैं अपने सहपाठियों ·े साथ स्·ूल और ·ॉलेज ·ी ओर से आयोजित दस दिवसीय ·ैंप में रहते थे। वैसे ही इन ·ुछ ही दिनों में वैसा ही अनुभव हुआ और बहुत ·ुछ सीखने ·ो मिला।
महोत्सव में सबसे सुखद पहलु यह रहा ·ि ईश्वर ने मुझे श्री अविनाश वाचस्पति जी, जिन·ो लोग ब्लाग ·ा बाबा रामदेव भी ·हते हैं, से मिलवा दिया। मैंने ·ई बार ब्लॉग बनाने ·ी सोची, परंतु ·ुछ समझ नही आया, ·ि शुरूआत ·हां से और ·ैसे ·रूं । अविनाश जी ने मुझे न सिर्फ ब्लॉग बनाना सिखाया बल्·ि यूनी·ोड से भी परिचित ·रवाया। यद्यपि मैं हिंदी, अंग्रेजी एवं पंजाबी में टाईप ·रना जानता हूं। परंतु ऑनलाईन हिंदी में लिखने ·ा ज्ञान मुझे श्री वाचस्पति जी ने दिया। मैं उन·ा आभारी हूं।

- रविन्द्र पुंज,
ग्राफिक्स डिजाइनर, यमुनानगर (हरियाणा)
http://khusar-fusar.blogspot.com/
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हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग से चार दिन की छुट्टी की घोषणा 8 अक्‍टूबर से 11 अक्‍टूबर 2010 तक

छुट्टी के दिन
छु्ट्टी मनाऊंगा मैं
छुट्टी के दिन
सबसे मिलने का
लुत्‍फ उठाऊंगा मैं।

रवानगी 8 अक्‍टूबर ट्रेन संख्‍या 2626  /2A/28

क्‍योंकि
जा रहा हूं
ब्‍लॉगिंग सेमिनार में।

सेमिनार
व्‍यापार नहीं है
पुरस्‍कार नहीं है।

मिलेंगे
जिनसे मिलते हैं
उनसे मिलेंगे।

आपसे मिलते हैं
आप भी मिल सकते हैं
मैं तो मिलूंगा।

मिलने का सफर
छुट्टी के दिनों में
जारी जरूर रखूंगा।

सेमिनार
वर्धा में है
जा रहा हूं रेल से।

रेल से जा रहा हूं
मेल का विश्‍वास
पा रहा हूं।

आयोजक
आयोजन

वापसी 11 अक्‍टूबर ट्रेन संख्‍या 2615/ 2A/42
लौटते समय भोपाल में दिनांक 11 अक्‍टूबर 2010 को रेल में मेल होगा श्री प्रमोद ताम्‍बट जी से।
जिनसे मुलाकात होगी उनके लिए मैं कुछ ले जा रहा हूं। आप बतला सकते हैं क्‍या ?

देखते हैं कौन कौन मिलते हैं
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के पुष्‍प
किन किन रेलवे स्‍टेशनों पर
खिलते हैं और
ब्‍लॉगर खिलखिलाते हैं।
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तीसरा हरियाणा अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह सफलतापूर्वक संपन्‍न




शहर का नाम बतलायें
 
पहली पंक्ति में बैठे किसी एक को पहचानिए


खुश कौन कौन हैं


आनंद तालियों का

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तीसरे हरियाणा अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह का 7 अक्‍टूबर 2010 का दैनिक समारोह समाचार








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