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‘फिल्म सोशिएलिज्म ‘ - भविष्य के सिनेमा का ट्रेलर : गोवा से अजित राय



पणजी, गोवा, 30 नवम्‍बर
विश्‍व के सबसे महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकारों में से एक ज्‍यां लुक गोदार की नयी फिल्‍म ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ का प्रदर्शन के भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की एक ऐतिहासिक घटना है। पश्चिम के कई समीक्षक गोदार को द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद का सबसे प्रभावशाली फिल्‍मकार मानते हैं। इस 80 वर्षीय जीनियस फिल्‍मकार की पहली ही फिल्‍म ‘ब्रेथलैस’ (1959) ने दुनिया में सिनेमा की भाषा और शिल्‍प को बदल कर रख दिया था। ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ गोदार शैली की सिनेमाई भाषा का उत्‍कर्ष है। इसे इस वर्ष प्रतिष्ठित कॉन फिल्‍मोत्‍सव में 17 मई 2010 को पहली बार प्रदर्शित किया गया। गोदार ने अपनी इस फिल्‍म को ‘भाषा को अलविदा’ (फेयरवैल टू लैंग्‍वेज) कहा है। अब तक जो लोग यह मानते रहे हैं कि शब्‍दों के बिना सिनेमा नहीं हो सकता, उनके लिए यह फिल्‍म एक हृदय-विदारक घटना की तरह है। इस फिल्‍म को दुनिया भर में अनेक समीक्षक उनकी आखि‍री फिल्‍म भी बता रहे हैं।
यह अक्‍सर कहा जाता है कि सिनेमा की अपनी भाषा होती है और वह साहित्यिक आख्‍यानों को महज माध्‍यम के रूप में इस्‍तेमाल करता है। गोदार की यह फिल्‍म आने वाले समय में सिनेमा के भविष्‍य का एक ट्रेलर है, जहां सचमुच में दृश्‍य और दृश्‍यों का कोलॉज शब्‍दों और आवाजों से अलग अपनी खुद की भाषा में बदल जाते हैं। गोदार ने पहली बार इसे हाई डेफिनेशन (एच डी) वीडियो में शूट किया है। वे विश्‍व के पहले ऐसे बड़े फिल्‍मकार हैं, जो अपनी फिल्‍मों की शूटिंग और संपादन वीडियो फार्मेट में करते रहे हैं। यह उनकी पहली फिल्‍म है, जहां उन्‍होंने अपनी पुरानी तकनीक से मुक्ति लेकर पूरा का पूरा काम डिजीटल फार्मेट पर किया है। गोदार ने अपनी फिल्‍मों से आख्‍यान, निरंतरता, ध्‍वनि और छायांकन के नियमों को पहले ही बदल डाला था और हॉलीवुड सिनेमा के प्रतिरोध में दुनिया को एक नया मुहावरा प्रदान किया था। वे कई बार अमेरिकी एकेडेमी पुरस्‍कारों को लेने से मना कर चुके हैं। इस नयी फिल्‍म में उन्‍होंने शब्‍द, संवाद, पटकथा की भाषा आदि को पीछे छोड़ते हुए ‘विजुअल्‍स‘ की अपनी भाषाई शक्ति को प्रस्‍तुत किया है। इस प्रक्रिया में कई बार हम देखते हैं कि जो ध्‍वनियां हमें सुनाई देती हैं, दृश्‍य उससे बिल्‍कुल अलग किस्‍म के दिखाई देते हैं। इससे यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यह केवल गोदार का एक कलात्‍मक प्रायोगिक और तकनीकी आविष्‍कार है। इस फिल्‍म की संरचना में उनका अस्तित्‍ववाद और मार्क्‍सवाद का राजनैतिक दर्शन पूरी तरह से घुला-मिला है। उन्‍होंने कहा भी है कि ‘’मानवता के लिए भविष्‍य का दृष्टिकोण प्रस्‍तुत करने का काम केवल सिनेमा ही कर सकता है क्‍योंकि हमारे अधिकतर कला-माध्‍यम अतीत की जेल में कैद होकर रह गए हैं’’।
गोदार की नई कृति ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ दरअसल तीन तरह की मानवीय गतियों की सिम्‍फनी है। फिल्‍म के पहले भाग को नाम दिया गया है ‘कुछ चीजें’। इसमें हम भूमध्‍य सागर में एक विशाल और भव्‍य क्रूजशिप (पानी का जहाज) देखते हैं, जिस पर कई देशों के यात्री सवार हैं और अपनी-अपनी भाषाओं में एक दूसरे से बातचीत कर रहे हैं। इन यात्रियों में अपनी पोती के साथ एक बूढ़ा युद्ध अपराधी है, जो जर्मन, फ्रेंच, अमेरिकी कुछ भी हो सकता है, एक सुप्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक है, मास्‍को पुलिस के खुफिया विभाग का एक अधिकारी है, एक अमेरिकी गायक, एक बूढ़ा फ्रेंच सिपाही, एक फिलिस्‍तीनी राजदूत और एक संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ की पूर्व महिला अधिकारी भी शामिल है। गोदार ने समुद्र के जल की अनेक छवियां मौसम के बदलते मिजाज के साथ प्रस्‍तुत की हैं। जहाज पर चलने वाली मानवीय गतिविधियों का कोलॉज हमारे सामने एक नया समाजशास्‍त्र रचता हुआ दिखाया गया है। सिनेमॉटोग्राफी इतनी अद्भुत है कि रोशनी और छायाओं का खेल एक अलग सुंदरता में बदलता है।


फिल्‍म के दूसरे हिस्‍से का नाम ‘अवर ह्यूमैनिटीज’ है जिसमें मानव-सभ्‍यता के कम से कम 6 लीजैंड बन चुकी जगहों की यात्रा की गई है। ये हैं मिश्र, फिलिस्‍तीन, काला सागर तट पर यूक्रेन का शहर उडेसा, ग्रीक का हेलास, इटली का नेपल्‍स और स्‍पेन का बर्सिलोना।
तीसरे भाग को ‘हमारा यूरोप’ कहा गया है जिसमें एक लड़की अपने छोटे भाई के साथ अपने माता पिता को बचपन की अदालत में बुलाती है और स्‍वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्‍व के बारे में कई मुश्किल सवाल करती है।
गोवा फिल्‍मोत्‍सव में गोदार की ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ बिना अंग्रेजी उपशीर्षकों के दिखाई गई। गोदार कुछ दिन बाद 3 दिसम्‍बर 2010 को अपनी उम्र के 81वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उनकी कही गई एक बात, जिसका अक्‍सर उल्‍लेख किया जाता है, इस फिल्‍म को देखते हुए याद आती है। उन्‍होंने कभी कहा था कि ‘’सिनेमा न तो पूरी तरह कला है, न यथार्थ, यह कुछ-कुछ दोनों के बीच की चीज है।’’ इस फिल्‍म के कुछ दृश्‍य इतने सुंदर हैं कि उनके सामने विज्ञापन फिल्‍में भी शर्मा जाएं। संक्षेप में, हम इसे कला, इतिहास और संस्‍कृति का क्‍लाइडोस्‍कोपिक मोजे़क कह सकते हैं। 
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प्रख्‍यात हास्‍य-व्‍यंग्‍य कवि ओमप्रकाश आदित्‍य जी की धर्मपत्‍नी श्रीमती बृजलता नहीं रहीं

गमगीन
8 जून 2009 को प्रख्‍यात हास्‍य-व्‍यंग्‍य कवि ओमप्रकाश आदित्‍य जी अपने अन्‍य साथी कवियों के साथ मध्‍य प्रदेश में आयोजित एक सम्‍मेलन से कार द्वारा लौटते हुए दुर्घटनाग्रस्‍त हुए थे। अभी कुछ मिनट पहले ही श्री राजेश चेतन का एक मोबाइल संदेश मिला है जिसमें आदित्‍य जी की धर्मपत्‍नी श्रीमती बृजलता जी के निधन की सूचना है। उनका अंतिम संस्‍कार 30 नवम्‍बर 2010 को 12 बजे दोपहर मालवीय नगर शमशान घाट पर किया जायेगा। यह ए पी जे स्‍कूल के समीप है। 
नुक्‍कड़ परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि। 


विशेष : यदि कोई बंधु श्रीमती बृजलता जी का चित्र मेल tetaalaaa@gmail.com  कर सकें   तो आभारी रहूंगा। जिससे उनका चित्र इस पोस्‍ट में लगाया जा सके।
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विश्व सिनेमा में इतिहास से जुड़ी यादें - गोवा से अजित राय

फ्रीडा पिंटो
पणजी, गोवा, 29 नवम्‍बर
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में विश्‍वप्रसिद्ध फिल्‍मकार रोमन पोलांस्‍की की नयी फिल्‍म ‘द घोस्‍ट राइटर’ राजनैतिक कारणों से इन दिनों दुनिया भर में चर्चा में है। पोलांस्‍की ने इस फिल्‍म की पटकथा पिछले वर्ष तब पूरी की थी, जब स्विटजरलैंड  पुलिस ने अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के आग्रह पर उन्‍हें गिरफ्तार किया था। उन पर एक फिल्‍म की शूटिंग के दौरान एक कम उम्र की लड़की के साथ यौनाचार का आरोप लगाया गया था। पोलांस्‍की हमेशा अपने जीवन और फिल्‍मों के कारण विवाद में रहते हैं। इसके बावजूद इस फिल्‍मोत्‍सव में उनकी नयी फिल्‍म का प्रदर्शन एक बड़ी उपलब्धि है। इस फिल्‍म का प्रीमियर इसी वर्ष 12 फरवरी 2010 को 60वें बर्लिन अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में हुआ था, जहां उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का सिल्‍वर बीयर पुरस्‍कार मिला।
‘द घोस्‍ट राइटर’ ब्रिटेन के एक पूर्व प्रधानमंत्री की कहानी है जो रिटायर होने के बाद अपना शेष जीवन अमेरिका के किसी द्वीप में बिता रहा है। उस पर आरोप है कि उसने एक युद्ध में अमेरिका का हद से बाहर जाकर अंध-समर्थन किया था। फिल्‍म के प्रदर्शन के बाद बीबीसी ने दावा किया था कि फिल्‍म का मुख्‍य चरित्र एडम लंग हूबहू ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्‍लेयर से मिलता है और फिल्‍म जिस युद्ध की बात की गई है, वो दरअसल इराक युद्ध है। यह साफ है कि टोनी ब्‍लेयर ने इराक युद्ध में अमेरिका का अंध-समर्थन किया था और ब्रिटिश जनता से झूठ भी बोला था कि इराकी राष्‍ट्रपति सद्दाम हुसैन के महल में रासायनिक हथियार हैं। लंदन के एक चर्चित अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ ने यह भी खुलासा किया है कि इस फिल्‍म के लिए जर्मन सरकार से भारी आर्थिक मदद मिली है। यह भी कहा जाता है कि जिस फिल्‍म को बर्लिन फिल्‍मोत्‍सव में सिल्‍वर बीयर मिलता है, उसे जर्मन सरकार भारी आर्थिक अनुदान देती है।
Roman Polanski
रोमन पोलांस्‍की की यह फिल्‍म इस तरह के राजनीतिक विवादों से आगे एक बड़ी सिनेमाई पहल है, जिसमें एक दिलचस्‍प रहस्‍य कथा के माध्‍यम से दुनिया की सत्‍ता-राजनीति की परतें खोली गई हैं। पोलांस्‍की ने पटकथा पर काफी शोध किया है और इराक युद्ध के दौरान की मीडिया सामग्री का रचनात्‍मक इस्‍तेमाल भी। यह फिल्‍म भारत में जल्‍दी ही रिलीज होने वाली है।
पोलैंड के बहुचर्चित फिल्‍मकार जान जाकूब कोलस्‍की की 8 फिल्‍मों का प्रदर्शन गोवा फिल्‍मोत्‍सव की एक खोज ही कही जायेगी। इस फिल्‍मकार के बारे में भारत में बहुत कम लोग जानते हैं। यहां हम उनकी ताजा फिल्‍म ‘वेनिस’ (2010) की चर्चा कर रहे हैं। इसमें द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान पोलैंड की राजधानी वारसा में एक 11 वर्षीय बच्‍चे मारक के सपनों के माध्‍यम से एक नया जादुई संसार रचा गया है। वैसे भी कोलस्‍की अपनी फिल्‍मों में जादुई यथार्थवाद के लिए भी जाने जाते हैं। यह फिल्‍म लोकप्रिय पोलैंड लेखक वुडमिर्ज ओडोजेवस्‍की के एक चर्चित उपन्‍यास पर आधारित है। अपनी सिनेमाई भाषा, पटकथा, संवाद, छायांकन और मार्मिक अपील के कारण ‘वेनिस’ गोवा फिल्‍मोत्‍सव की सबसे अधिक चर्चि‍त फिल्‍मों में से एक है। लेखक का कहना है कि मैंने द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान पोलैंड के समय का सारांश बताने की कोशि‍श की है, जिसमें भावनाएं, यातना, प्रेम, भय और घृणा सब कुछ है।
‘वेनिस’ जाने की प्रबल इच्‍छा रखने वाला मारक युद्ध के दौरान अपनी डायरी लिखता है। एक दिन वह लिखता है कि ‘’क्‍या रूसियों की तरह जर्मन भी ईश्‍वर में विश्‍वास करते हैं ? यदि हां, तो वे इतने बुरे क्‍यों हैं। मैं अब यहां नहीं रहना चाहता।‘’ उसकी आंटी उसे खुश करने के लिए अपने घर के तलघर में वेनिस शहर का एक मॉडल बनाती है, जिसमें नाव पर बैठकर मारक सचमुच के वेनिस शहर की सैर करता है। मारक लिखता है कि ‘’दुनिया में सबसे महत्‍वपूर्ण चीज प्रेम है, मुझे अब प्रेम के बारे में सोचना चाहिए।’’ फिल्‍म में बहुत कम संवाद हैं। युद्ध के दृश्‍य तो बिल्‍कुल नहीं हैं। युद्ध में मरते, तबाह होते लोगों के परिवारों के दृश्‍य जरूर हैं। जो दुख और यातना की अंतहीन चादर लपेटे हुए अच्‍छे दिनों के आने का इंतजार कर रहे हैं। उनकी इस मुश्किल दुनिया में फिल्‍म उम्‍मीदों की रोशनी के रूप में बच्‍चों के सपनों को सामने ला खड़ा करती है।
ऑस्‍कर पुरस्‍कारों से सम्‍मानित फिल्‍म ‘स्‍लम डॉग मिलिनेयर’ की हीरोइन फ्रीडा पिंटो का यहां आना दर्शकों के लिए जबर्दस्‍त आकर्षण का विषय था। हालांकि अमेरिकी फिल्‍मकार वुडी एलेन की जिस नई फिल्‍म ‘यू विल मीट ए टॉल डार्क स्‍ट्रेंजर’ को दिखाया गया, उसमें फ्रीडा पिंटो का इस्‍तेमाल केवल शो पीस के तौर पर किया गया है। जैसे अनुपम खेर भी केवल 4 मिनट के लिए आते हैं। फिल्‍म की शुरूआत बड़े दार्शनिक अंदाज में होती है, जिसमें विलियम शेक्‍सपियर का एक प्रसिद्ध वाक्‍य हमें सुनाई देता है – ‘जीवन आवाजों और उन्‍मादों से भरा हुआ होता है लेकिन अंत में कुछ भी सार्थक नहीं बचता’। वुडी एलेन की यह फिल्‍म देखने के बाद सचमुच यह बात सार्थक हो जाती है क्‍योंकि हम एक दूसरे से यह पूछते हैं कि इस फिल्‍म का क्‍या मतलब है, यह सवाल और लाजमी है कि भारत के इस अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सव में किसको चाहिए फ्रीडा पिंटो। हालांकि उन्‍होंने यह जरूर कहा कि इस फिल्‍म से उन्‍हें यह सीख मिली ‘’ उस पार मेरे लिए खुशियां ही खुशियां हैं’’। फ्रीडा पिंटो को भले ही खुशियां मिली हों पर फिल्‍म को देखकर निकले दर्शकों को भारी निराशा ही हाथ लगी।
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यातना, संघर्ष और स्‍वप्‍न का नया सिनेमा : गोवा से अजित राय

Girish Kasarvalli

पणजी, गोवा, 28 नवम्‍बर
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के पैनोरमा खंड में दिखाई गई सुप्रसि‍द्ध फिल्‍मकार गिरीश कासरवल्‍ली की नई कन्‍नड़ फिल्‍म ‘मानासाम्‍बा कुदुरेयानेरी’ (राइजिंग ड्रीम्‍स) अपने विषय और बर्ताव के कारण हमारा ध्‍यान खींचती है। भूमंडलीकरण के बाद भारतीय समाज में उपभोक्‍तावाद की नकली चमक-दमक के पीछे लगभग 80 करोड़ लोगों के जीवन की यातना, संघर्ष और स्‍वप्‍न को यह फिल्‍म सामने लाती है।
अब तक 12 फिल्‍में बना चुके गिरीश कासरवल्‍ली को 4 बार सर्वश्रेष्‍ठ फीचर फिल्‍म एवं निर्देशन का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुका है। ‘घटश्राद्ध’ से दुनिया भर में चर्चित इस फिल्‍मकार की शैली अब तक नहीं बदली है, हालांकि उनकी हर फिल्‍म कहानी के स्‍तर पर एक नया प्रस्‍थान रचती है। पिछले वर्ष वैदेही कहानी पर बनी उनकी फिल्‍म गुलाबी टाकीज को भारी प्रशंसा और कई पुरस्‍कार मिले थे। इस बार भी केवल 38 दिन और 45 लाख रुपये के बजट में उन्‍होंने इस फिल्‍म को पूरा किया है, जो अमरेश नुआगादोनी की पुरस्‍कृत कहानी पर आधारित है। इसमें एक पिछड़े गांव में मृत्‍यु, गरीबी, रिश्‍तों और बाजार की रस्‍साकशी के माध्‍यम से भारतीय समाज पर भूमंडलीकरण के प्रभावों को बिल्‍कुल नये तरीके से दिखाया गया है। फिल्‍म का एक-एक दृश्‍य हमें बिल्‍कुल नये देशकाल में ले जाता है। ऐसा लगता है कि हर चरित्र अभिनय की बजाय अपना वास्‍तविक काम कर रहा है।
फिल्‍म की कहानी कर्नाटक के बीजापुर जिले के एक गांव में रहने वाले इरीया नामक मजदूर की है, जो कब्र खोदने का काम करता है। आश्‍चर्य है कि कर्नाटक के हिन्‍दुओं में मरने के बाद दफनाने की अनूठी परंपरा है। इरीया को अक्‍सर एक सपना आता है जिससे उसे पता चल जाता है कि गांव में दूसरे दिन कोई मरने वाला है और वह सुबह से ही कब्र खोदने में लग जाता है। एक रात उसके गुरू सिद्धा सपने में आते हैं और पता चलता है कि अगले दिन गांव का जमींदार मरने वाला है। दूसरी सुबह वह उनके लिए कब्र खोदने में लग जाता है। काम पूरा कर वह जमींदार के घर जाता है, जहां मैनेजर मातादैया उसे कुछ रूपये देकर डांटकर भगा देता है। इरीया सदमे में है कि उसका सपना झूठा कैसे हो गया। बाद में पता चलता है कि इरीया का सपना झूठा नहीं हुआ, उस दिन सचमुच जमींदार की मौत हो गई। दरअसल उसका बेटा शिवन्‍ना फैक्‍टरी बनाने के लिए अपनी जमीनें बेचना चाहता था, जिस दिन जमीनें बेची जानी थीं उसी दिन उसके पिता की मृत्‍यु हो गई। यदि यह खबर घर से बाहर निकलती तो जमीन की बिक्री को रोकना पड़ता। मैनेजर की सलाह पर शिवन्‍ना दो दिन बाद अपने पिता की मृत्‍यु की घोषणा करता है तब तक लाश की दुर्गन्‍ध से पूरी हवेली आक्रांत हो चुकी होती है। एक दृश्‍य में हम देखते हैं कि गाजे बाजे के साथ जमींदार की शवयात्रा निकली है और जैसे ही इरीया जुलूस में लोगों को यह बताने की कोशिश करता है कि जमींदार की मौत तो दो दिन पहले ही हो गई थी, उसे मार पीट कर भगा दिया जाता है। अंत में वह अपनी पत्‍नी रूद्री के साथ बंजर जमीन पर खेती करते दिखाया गया है। उसके सपने में फिर उसके गुरू आते हैं। वह कहता है कि अब वह कब्र खोदने का काम नहीं करेगा क्‍योंकि लोग इतने बदल गए हैं कि मृत्‍यु का भी कारोबार करने लगे हैं।
इस फिल्‍म को देखते हुए हमें प्रेमचन्‍द की कहानी कफन के घीसू और माधव की याद आती है। इरीया और रूद्री समाज के आखिरी पायदान पर जी रहे दो लोग हैं, जिनके लिए सपने देखना, उनके जिंदा रहने की शर्त है। कैमरा बार-बार एक बंजर लैंडस्‍केप में इन दो लोगों के फटेहाल जीवन में सपनों को उगते हुए दिखाता है। फिल्‍म में कोई खलनायक नहीं है। भूमंडलीकरण के बाद का समय खुद एक खलनायक की तरह समूचे जीवन पर हावी है। संवाद बहुत कम हैं लेकिन अंदर तक चोट करते हैं। विशाल हवेली में तार-‍तार होता सामंतवाद जाते-जाते भी नये व्‍यापार में रूपांतरित होता है। जहां रूपये का लालच रिश्‍तों की अनिवार्य मर्यादा पर भारी पड़ता है। यह कैसे संभव है कि शिवन्‍ना के लिए पिता के अंतिम संस्‍कार से ज्‍यादा जरूरी फैक्‍टरी के लिए जमीन की खरीद-बिक्री हो जाए। फिल्‍म में उसकी सुशिक्षित अभिजात्‍य पत्‍नी की घबराहट और बेचैनी एक दुविधा की तरह बनी रहती है। उसकी 8 साल की छोटी बच्‍ची और उसके निष्‍पाप से लगने वाले सवाल निर्देशक का एक प्रतिकात्‍मक हस्‍तक्षेप है।
kanasemba kudureyaneri
फिल्‍म का छायांकन हृदयस्‍पर्शी है। दिन भर कब्र खोदने के बाद जब थका-मांदा इरीया अपनी झोंपड़ी में लौटता है तो उसकी पत्‍नी रूद्री जिस तरह से सपनों का उत्‍सव मनाती है, वह गरीबी पर फिल्‍मकार की संवेदनशील टिप्‍पणी है। अंतिम दृश्‍य में जब रूद्री सपने में आए गुरू सिद्धा का तिरस्‍कार करती है, जिसके अंधविश्‍वास में फंसा इरिया सामान्‍य जीवन नहीं जी पाता और दोनों को खेती करते हुए देख गुरू पूछता है कि पौधों को कैसे सींचोगे, इरीया का जवाब सामान्‍य भारतीय आदमी की जिजीविषा और दृढ-निश्‍चय का घोषणा पत्र बन जाता है। वह कहता है कि एक-एक पौधे को बढ़ा करूंगा, भले ही उन्‍हें अपने पेशाब से ही क्‍यों सींचना पड़े। 
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छिपकलियां छिनाल नहीं होतीं, छिपती नहीं हैं, छिड़ती नहीं हैं छिपकलियां

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कहानी से बाहर निकलती पटकथाएं : गोवा से


Director Fatih Akin

पणजी, गोवा, 27 नवम्‍बर
इस समय दुनिया भर में नयी पीढ़ी के जिन फिल्‍मकारों का जादू चल रहा है, उनमें तुर्की मूल के जर्मन फिल्‍मकार फतिह अकीन का नाम प्रमुख है। अपनी फिल्‍म ‘हैड-ऑन’ (2004) के लिए बर्लिन फिल्‍मोत्‍सव में गोल्‍डन बीयर तथा यूरोपियन बेस्‍ट फिल्‍म का यूरोपियन फिल्‍म अवार्ड पाने वाले इस फिल्‍मकार को ठीक तीन साल बाद ‘द एज ऑफ हैवन’ (2007) के लिए कॉन फिल्‍मोत्‍सव में सर्वश्रेष्‍ठ पटकथा का पुरस्‍कार मिल गया। गोवा फिल्‍मोत्‍सव में विशेष रूप से दिखाई गई उनकी नयी फिल्‍म ‘सोल किचन’ (2009) को भी बर्लिन फिल्‍मोत्‍सव में स्‍पेशल ज्यूरी अवार्ड मिल चुका है। यह फिल्‍म अपनी नयी सिनेमाई भाषा, उत्‍कृष्‍ट पटकथा, श्रेष्‍ठ संपादन और एक साथ कई जिंदगियों को देखने की चुटीली दृष्टि के कारण महत्‍वपूर्ण है। पारंपरिक कथा संरचना से बाहर निकलकर यह फिल्‍म आधुनिक यूरोप में नयी पीढ़ी की जिंदगी की नयी पटकथाएं प्रस्‍तुत करती है।
जर्मनी के हैम्‍बर्ग शहर के कम भीड़-भाड़ वाले इलाके में कम आय वर्ग के लोगों के लिए एक रेस्‍त्रां है सोल किचन। इसका मालिक जिनोस ग्रीक मूल का जर्मन है तथा वह नेदीन से प्रेम करता है, जो एक पत्रकार है और उसे चीन के शंघाई शहर में स्‍थानांतरित किया जा रहा है। जिनोस का भाई इलियास एक गुमराह युवक है जिसे पैरोल पर जेल से छोड़ा गया है। एक पारिवारिक भोज के दौरान दूसरे रेस्‍त्रां में जिनोस श्‍यान से मिलता है, जिसे उसे मालिक ने शेफ की नौकरी से निकाल दिया है। जिनोस अपनी प्रेमिका नेदीन से स्‍काईप पर वीडियो चैटिंग से जुड़ा रहता है। रात के अकेलेपन में अपने लैपटाप पर अपनी प्रेमिका को विविध मुद्राओं में निर्वस्‍त्र देखते हुए वह अक्‍सर सपनों की दुनिया में खो जाता है। याद कीजिए कि अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म ‘देव डी’ में माही गिल पंजाब से अपना निर्वस्‍त्र एमएमएस देव को लंदन भेजती है। यह संयोग नहीं है कि अनुराग कश्‍यप फतेह अकीन के जबर्दस्‍त प्रशंसक हैं। गोवा के एनएफडीसी फिल्‍म बाजार में उन्‍होंने फतिह अकीन के साथ एक विशेष सत्र का संचालन भी किया। बहरहाल जिनोस अंतत: फैसला करता है कि वह अपना रेस्‍त्रां बेच कर शंघाई चला जाएगा। नये शेफ श्‍यान के आने के बाद रेस्‍त्रां का भाग्‍य खुल जाता है। इस हालत में वह इलियास को मैनेजर बनाकर शंघाई का टिकट खरीदता है। हवाई अड्डे पर अचानक उसे नेदीन मिलती है, जो अपनी दादी की मृत्‍यु के बाद अपने चीनी ब्‍आय फ्रेंड के साथ लौटी है। उधर इलियास अपने अपराधी दोस्‍तों के साथ जुए में रेस्‍त्रां को हार जाता है। जिनोस भयानक कमरदर्द से पीडि़त है और उसकी मुलाकात एक सुंदर फिजियोथेरेपिस्‍ट अन्‍ना से होती है। उसका रेस्‍त्रां नीलाम हो रहा है, उसे बचाने के लिए जिनोस अपनी पूर्व प्रेमिका नेदीन से बड़ा कर्ज लेता है जो अब अमीर हो चुकी है। अंत में, हम देखते हैं कि सोल किचन के बंद दरवाजे पर ‘प्राइवेट पार्टी’ का बोर्ड टंगा है और भीतर केवल दो लोग हैं – जिनोस और उसकी नई सहयात्री अन्‍ना ।
‘सोल किचन’ में हमारा सामना तरह-तरह के चरित्रों से होता है जिनमें से अधिकतर जर्मनी में काम करने वाले विभिन्‍न देशों से आए मजदूर हैं। कई बार  कोई एक कहानी चल रही होती है, तभी दूसरी तीसरी चौथी शुरू हो जाती है। फिर पहली वापिस लौटती है तो पांचवीं शुरू हो जाती है। इस तकनीक का सबसे अच्‍छा इस्‍तेमाल मैक्सिको के फिल्‍मकार इना ऋतु अपनी फिल्‍मों ‘बावेल’ और ‘ट्वेंटी वन ग्राम’ में किया था। ‘सोल किचन’ का टोन, मूड और ट्रीटमेंट कॉमेडी का है। जो एक क्षण के लिए भी दर्शक को अपने जादुई प्रभाव से अलग नहीं होने देती। प्रेम और सैक्‍स के दृश्‍यों को बड़ी सुंदरता के साथ फिल्‍माया गया है। फिल्‍म का संपादन कमाल का है और अलग-अलग स्‍वभाव की छवियां अपने आप एक तार से जुड़कर पटकथा रचती हैं।
फिल्‍म के विशेष प्रदर्शन के दौरान फतिह अकीन ने कहा कि ‘सोल किचन’ उसके और उसके मित्र के एक साझे रेस्‍त्रां के सच्‍चे अनुभवों पर आधारित है। इसका केन्‍द्रीय विषय है – ‘करें या न करें’। हमेशा यह दुविधा बनी रहती है। चाहे वह बिजनेस हो, प्रेम हो या सैक्‍स। फिल्‍म के अधिकतर चरित्र इस दुविधा से घिरे दिखाई देते हैं। गोवा फिल्‍मोत्‍सव में इस फिल्‍म को जबर्दस्‍त सफलता मिली है। हालांकि कुछ वर्ष पहले दिल्‍ली के ओसियान फिल्‍मोतसव में इसी फिल्‍मकार की ‘हैड-ऑन’ को भी काफी पसंद किया गया था। इन दोनों फिल्‍मों में आधुनिक यूरोप के राष्‍ट्रवाद के भीतर की उपराष्‍ट्रीयताओं की अस्मिता का संघर्ष भी दिखाया गया है। कोई भव्‍य और महंगी दृश्‍य-श्रंखलाएं नहीं हैं। समाज के तलछंट में जी रहे लोगों के जीवन के दुख, संघर्ष और खुशियों को कॉमेडी के मूड में दिखाया गया है। कई बड़े फिल्‍मकारों की तरह फतिह अकीन मानते हैं कि अभिनय तो फुटपाथ पर बिखरा पड़ा है, एक फिल्‍मकार को चाहिए कि वो अपने हिसाब से उसे चुनकर एक तस्‍वीर में बदल दे। फिल्‍म की शैली को देखकर नई पीढ़ी के पसंदीदा वरिष्‍ठ फिल्‍मकार वांग कार वाई (हांगकांग) की याद आती है, खासतौर पर उनकी चर्चित फिल्‍म ‘शूंग किन एक्‍सप्रेस’ की। 
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हिन्‍दी ब्‍लॉगरों अमेरिका चलते हैं

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आखिर हम गाली क्यों देते हैं?

है न विचित्र किन्तु सत्य कि हम सब जानते हैंकि गाली देना बुरीबात है लेकिन गाली है कि मुँह से निकल ही जाती है |हमारा अपनी जुबान पर नियंत्रण ही नहीं रहता |पहले भी ब्याह-बारातों में ज्योनार के समय गाली गई जाती थी पर वह अधिकतर दूल्हे की माँ बहिनो कों बरात में नचाने का उपालंभ ही हुआ करता था|हम जब किसी कों अपमानित करना चाहते हैंतो हमारा सबसे बड़ा हथियार गाली ही हुआ करता है | बचपन में हम भी कुत्ता ,बेबकूफ ,उल्लू ,बदतमीज जैसी गाली दिया करते थे| और जब बहुत गुस्सा आता था तो कडी खाई धुआ करी मर जाएजैसी अनिष्टसूचक अथवा कोसने नुमा गाली मर जा ,कट जा और तेरे हाथ पैर टूट जाए जैसी गालिया प्रयोग की जाने लगी|
कुछ और समझदार हुए और बाहरी परिवेश से परिचय हुआ तो माँ बहिनकी गाली कानो में सुनाई पडी | तब तक इन गालियों के गूढार्थ पता नहीं हुआ करते थे अत: बचपने में एक बार इस गाली का प्रयोग किया और माँ से खूब पिटाई भी खाई | सख्त हिदायत दीगई कि अब कभी ऐसे शब्द जुबान पर भी आये तो जुबान खीच ली जायेगी| बस इस प्रकरण का यहीं पटाक्षेप हो गया|
जैसे-जैसे बड़े होते गए और समाज का हिस्सा बनते गए, देखा कि पुरुषों की भाषा में गालिया ऐसे सम्मिलित होने लगी जैसे दाल में तडका|अनसुनी करते करते भी पाया कि कई सज्जनो की बाते तो इन आलंकारिक शब्दों के बिना पूरी नहीं होती| तब बहुत कोफ़्त होती थी पर हम कर क्या सकते थे| बहुत हुआ तो ऐसे लोगो के आगे नहीं पडते थे| समझदारी आई तब जाना इन गालियों के मूल में स्त्री जाति और उसके पक्षधरों कों अपमानित करने की मूल मंशा ही थी| साला और साली कितने मधुर रिश्ते होते हैं पर ये भी गाली के पर्याय होते चले गए और अब साला तो इतना फैशन में आगया कि उसे गाली नहीं वरन बातचीत का जरूरी हिस्सा माना जाने लगा |पर इसी रिश्ते का एक पहलू और था पति के भाई और बहिन यानी देवर और ननद | ये रिश्ते सदैव पूजनीय रहे कभी गाली की कोटि में नहीं गिने गए|आखिर क्यो क्योंकी ये पति परमेश्वर के हिस्से जो थे और सालासाली उस बदनसीब के भाईबहिन | धीरे-धीरे इस साजिश ने एक और रूप अख्तियार कर लिया |हमारी पूरी की पूरी शक्ति औरतो के खिलाफ प्रयोग होने लगी |उनकी इज्जत के इतने चीथड़े बिखेरने केलिए एक गाली पर्याप्त होती और वह शर्म से मुह छिपा बैठी| समय बदला और बराबरी की धुन में औरतों ने भी इसी हथियार का प्रयोग करना शुरू कर दिया पर वह यह भूल बैठी कि ये तो पुरुषों के द्वारा दी जाने वाली गालिया है हम अपनी गालियोंका शास्त्र अलग बनाए |कौन मेहनत करता सो उसी कोष से गालिया चुन ली गई और उनका धडल्ले से प्रयोग किया जाने लगा |बिना सोचे समझे कि इन सब गालियों से तो हमी अपमानित हो रहे है| मेरा बहुत मन हुआ कि पूछू अरे ये कैसा अनर्थ कर रही हो| भला अपने कों भी कभी गाली दी जाती है पर बराबरी की होड़ में किसे ये सब फालतू बकबास सुनने की पडी थी|पुलिस का महकमा तो गालियों के बिना अधूरा ही है| और अब तो स्थिति यह है कि वे बच्चे जो इन गालियों की एबीसीडी भी नहीं जानते वे भी इन गालियों का धडल्ले सेप्रयोग करते है| ऐसे कुछ बच्चों कों मैंने जब कुछ समझाने की कोशिश की तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जबाव दिया कि ये खराब बात होती तो सब लोग क्यों देते | दुकान पर चौराहे पर और घर पर ये गालिया तो उसके कानो में रोज ही पडती है | आखिर किस-किस से बचायेंगे आप | और बस हमने मान लिया है कि किसी कों डराने धमकाने के लिए दोचार भद्दी गालियों का प्रयोग कर दो |सज्जन तो ऐसा भाग खडा होगा जैसे गधे के सर से सींग और भले घर की लडकिया तो उस माहौल से बचना ही सुरक्षित मानेगी |और कहा जाएगा क्या मेडम ये भी कोई लिखने का विषय है ,ये तो सब चलता रहता है|
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आखिर हम गाली क्यों देते हैं?

है न विचित्र किन्तु सत्य कि हम सब जानते हैंकि गाली देना बुरीबात है लेकिन गाली है कि मुँह से निकल ही जाती है |हमारा अपनी जुबान पर नियंत्रण ही नहीं रहता |पहले भी ब्याह-बारातों में ज्योनार के समय गाली गई जाती थी पर वह अधिकतर दूल्हे की माँ बहिनो कों बरात में नचाने का उपालंभ ही हुआ करता था|हम जब किसी कों अपमानित करना चाहते हैंतो हमारा सबसे बड़ा हथियार गाली ही हुआ करता है | बचपन में हम भी कुत्ता ,बेबकूफ ,उल्लू ,बदतमीज जैसी गाली दिया करते थे| और जब बहुत गुस्सा आता था तो कडी खाई धुआ करी मर जाएजैसी अनिष्टसूचक अथवा कोसने नुमा गाली मर जा ,कट जा और तेरे हाथ पैर टूट जाए जैसी गालिया प्रयोग की जाने लगी|
कुछ और समझदार हुए और बाहरी परिवेश से परिचय हुआ तो माँ बहिनकी गाली कानो में सुनाई पडी | तब तक इन गालियों के गूढार्थ पता नहीं हुआ करते थे अत: बचपने में एक बार इस गाली का प्रयोग किया और माँ से खूब पिटाई भी खाई | सख्त हिदायत दीगई कि अब कभी ऐसे शब्द जुबान पर भी आये तो जुबान खीच ली जायेगी| बस इस प्रकरण का यहीं पटाक्षेप हो गया|
जैसे-जैसे बड़े होते गए और समाज का हिस्सा बनते गए, देखा कि पुरुषों की भाषा में गालिया ऐसे सम्मिलित होने लगी जैसे दाल में तडका|अनसुनी करते करते भी पाया कि कई सज्जनो की बाते तो इन आलंकारिक शब्दों के बिना पूरी नहीं होती| तब बहुत कोफ़्त होती थी पर हम कर क्या सकते थे| बहुत हुआ तो ऐसे लोगो के आगे नहीं पडते थे| समझदारी आई तब जाना इन गालियों के मूल में स्त्री जाति और उसके पक्षधरों कों अपमानित करने की मूल मंशा ही थी| साला और साली कितने मधुर रिश्ते होते हैं पर ये भी गाली के पर्याय होते चले गए और अब साला तो इतना फैशन में आगया कि उसे गाली नहीं वरन बातचीत का जरूरी हिस्सा माना जाने लगा |पर इसी रिश्ते का एक पहलू और था पति के भाई और बहिन यानी देवर और ननद | ये रिश्ते सदैव पूजनीय रहे कभी गाली की कोटि में नहीं गिने गए|आखिर क्यो क्योंकी ये पति परमेश्वर के हिस्से जो थे और सालासाली उस बदनसीब के भाईबहिन | धीरे-धीरे इस साजिश ने एक और रूप अख्तियार कर लिया |हमारी पूरी की पूरी शक्ति औरतो के खिलाफ प्रयोग होने लगी |उनकी इज्जत के इतने चीथड़े बिखेरने केलिए एक गाली पर्याप्त होती और वह शर्म से मुह छिपा बैठी| समय बदला और बराबरी की धुन में औरतों ने भी इसी हथियार का प्रयोग करना शुरू कर दिया पर वह यह भूल बैठी कि ये तो पुरुषों के द्वारा दी जाने वाली गालिया है हम अपनी गालियोंका शास्त्र अलग बनाए |कौन मेहनत करता सो उसी कोष से गालिया चुन ली गई और उनका धडल्ले से प्रयोग किया जाने लगा |बिना सोचे समझे कि इन सब गालियों से तो हमी अपमानित हो रहे है| मेरा बहुत मन हुआ कि पूछू अरे ये कैसा अनर्थ कर रही हो| भला अपने कों भी कभी गाली दी जाती है पर बराबरी की होड़ में किसे ये सब फालतू बकबास सुनने की पडी थी|पुलिस का महकमा तो गालियों के बिना अधूरा ही है| और अब तो स्थिति यह है कि वे बच्चे जो इन गालियों की एबीसीडी भी नहीं जानते वे भी इन गालियों का धडल्ले सेप्रयोग करते है| ऐसे कुछ बच्चों कों मैंने जब कुछ समझाने की कोशिश की तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जबाव दिया कि ये खराब बात होती तो सब लोग क्यों देते | दुकान पर चौराहे पर और घर पर ये गालिया तो उसके कानो में रोज ही पडती है | आखिर किस-किस से बचायेंगे आप | और बस हमने मान लिया है कि किसी कों डराने धमकाने के लिए दोचार भद्दी गालियों का प्रयोग कर दो |सज्जन तो ऐसा भाग खडा होगा जैसे गधे के सर से सींग और भले घर की लडकिया तो उस माहौल से बचना ही सुरक्षित मानेगी |और कहा जाएगा क्या मेडम ये भी कोई लिखने का विषय है ,ये तो सब चलता रहता है|
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हम अपने अपने टापू में कैद क्यों है ?

हम सभी सामाजिक प्राणी है और हमें समाज के सहयोग की आवश्यकता हर पल पडती है |हमारा सबसे पहला साबका अपने पडौसी से ही पडता है|हमारे सुख-दुःख का सबसे पहला गवाह पडौसी ही हुआ करता है | हमने तो यह भी देखा है पडौसी हमारी रोजमर्रा की समस्याओं में सह भागी होता है पर अब शायद ऐसे पडौसी नहीं हुआ करते |हम वह् होते हैजैसा हमारा अडोस-पडौस,आमने -सामने होता है |शादीब्याह के सन्दर्भ में तो आपके -पडौसी ही आपसे संबंधी सूचनाओं के आधार हुआ करते है| कल हमारे पडौस में अम्माजी की मृत्यु हो गई |वह लंबे समय से बीमार थी | शाम ६ बजे उनकी मृत्यु हुई और लगभग ५० मिनिट बाद उस सूचना की सबसे पहली हकदार मैं ही बनी ,वह भी किसी तीसरे माध्यम से | खैर मैंने अपनी कालौनी के अन्य लोगों कों सूचित किया |
मैं समझ नहीं पा रही आखिर हम इतने औपचारिक कब से हो गए कि मृत्यु जैसे दुखद अवसर पर भी हम यह प्रतीक्षा करने लगें कि जब शव यात्रा निकलेगी तब हम भी उस भीड़ का हिस्सा बन जायेंगे| कहाँ बची है हमारी संवेदना ,क्या अब इन बड़ी कोठियों के लोगो के बीच मोहल्ले जैसा भाईचारा जैसा कुछ नहीं होता | कहा वह समय था ,जब किसी के घर ऐसे अवसरों पर सब कुछ पडौसी ही संभाल लेते थे| जब तक रिश्तेदार आते ,तब तक तो सब हाथोहाथ ले लिया जाता| और अब एक समय ऐसा आगया जब सब कुछ ऑफिस नुमा हो गया | जहां रोने केस्वर सुनाई देने चाहिए थे वहाँ यह देखा जाने लगा कि हम अपने घर कों पहले व्यवस्थित कर लें |मुझे लगने लगा कि अब हम पदौसियोंके मध्य नहीं रहते बल्कि मशी नुमा जीवो के मध्य रहते हैं| हमारे अपने इगो इतने बढ़ गए कि हम स्वयं कों अपने में पूर्ण मानने लगे | हमें किसी से कोई लेना-देना नहीं |हमारे पास इतना पैसा जो आगया है कि अब सब कुछ उससे खरीदा सकता है | जी हाँ रिश्ते भी | और क्या आपने देखा नहीं शादी-विवाहों में गीत गाने के लिए मंडली बुलाई जाने लगी है सब कुछ पेशे जैसा हो गया |लोग आते है आपको खाना परसते है, खईदी हुई मुस्कान से आपका स्वागत करते है |
और जो मेजबान है वह हाथ जोड़े दरवाजे पर केवल आपको अटेंड करते है| सब तो इतनी तेजी से बदल रहा है| शायद मेरे मन के किसी कोने में अब भी वह गंवईपन बाकी रह गया है जो जब चाहे अपना सर उठा लेता है और मुझे सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम आखिर अपने -अपने टापुओ की हद कों तोड़ क्यों नहीं देते |हम अपनी संवेदनाओं का विस्तार क्यों नहीं कर लेते | और कम से कम दुःख के अवसरों पर तो आपसी वैमनस्य कों भुला क्यों नहीं देते ?हम पहले जैसे पडौसी क्यों नहीं बन जाते जब किसी के घर आहात भी होती तो पूरा मोहल्ला एक हो जाता | तब मोहल्ले की बहन बेटी सबकी बहन बेटी होती थी| एक कादुख सबका दुःख होता था |सब के सुख -दुःख में सब शरीक होते |पर शायद अब हमने अपने घर तो बड़ा बना लिया है पर दिल संकुचित हो गए है|
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ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग बहुत जरूरी है

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मनुष्य का पूरा जीवन सीखने और सिखाने के अनुभवों से भरा हुआ है | जन्म से लेकर मृत्यु तक हम सीखते और सिखाते रहते है| कभी-कभी हम सीखते हुए भी सिखा रहे होते है इस द्रष्टि से प्रत्येक व्यक्ति अध्यापक है और अपने जीवन काल मेंकभी ना कभी शिक्षकके संपर्क में अवश्य आया होता है| याद कीजिए आपकी स्मृति में किस अध्यापक की यादे आज भी ताजा हैं | हो सकता है वक्त की धूल ने सब कुछ धुंधला कर दिया हो पर जैसे ही वह धूल हटती है अथवा आपके द्वारा हटाई जाती है सब कुछ कितना साफ़ दिखाई देने लगता है मानो कल की ही बात हो | हाथ में डंडी लेकर पढाने वाले मास्साब ,गुस्से में त्योरिया चढाते और बात- बात में गरियाते सर , कुछ भी पूछने पर मार का डर,लेकिन कभी-कभी इतने अच्छे अध्यापक जिनके कारण ही हम स्कूल जाने कों उत्साहित हो जाते ,इतनी अच्छी अध्यापिका कि माँ और दीदी से भी ज्यादा प्यारी लगती ,| आखिर क्या था उन अध्यापकों में कि आज भी उनका नाम हमारी जुबान पर चढा रहता है |
भले ही वे प्रशिक्षित न रहे हो पर उनके जीवन के अनुभव ने उन्हें हमारे समीप ला दिया था |क्या ज्ञान केवल पुस्तकों से ही प्राप्त किया जा सकता है ,काश ऐसा होता तो हम सभी आज बड़ी -बड़ी उपाधियों के साथ पंडित और विद्वान बन चुके होते | आज हमारे पास मोटी-मोटी किताबें तो है पर उनका ज्ञान हम पचा नहीं पाए है | हमने जो भी कभी पढ़ा होगा ,वह केवल परीक्षा के लिए और जैसे ही हमने परीक्षा पास की सबकुछ विस्मृत हो गया |क्योंकि हमने तो जो पढ़ा था और जिसके लिए पढ़ा था वह लक्ष्य तो मिल ही गया फिर उसे याद करने की क्या आवश्यकता रह गई ?यही हम मात खा जाते हैं |
जब हम दूसरों कों सिखाना प्रारम्भ करते हैं तब सबसे पहले हमारा व्यक्तित्व परिलक्षित होता है | हम कैसे है ,जीवन में किन चीजों कों हम प्राथमिकता देते है ,हम अपने छात्रों के विषय में क्या सोचते हैं ,हमारा शिक्षण के प्रति कैसा नजरिया है | हम छात्रोंके दिमाग में सूचनाए भर रहे होते हैं या उनके मस्तिषक कों सक्रीय करना चाहते हैं| किसी भी ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग कक्षा में छात्रों कोसजग रखता है |यदि हम किसी भी विषय कों पढाने से पूर्व उस विषय की जीवन में उपयोगिता बता दें तो उस विषय के प्रति रूचि बढ़ जाती है और हम उस विषय कों सहज रूप में सीख लेते है क्योंकि उसके साथ हमारा लक्ष्य और मन दोनों जुड जाते है|पहले हम तो अपने ज्ञान भण्डार की छटनी कर ले कि क्या बताना जरूरी है और क्या छोड़ा जा सकता है | विषय का मंथन तो कर ले , उसकी गरिष्ठता कों सुपाच्य तो बना ले पर हमें इतना सब्र कहाँ है हमें तो बस पढ़ी गई सूचनाओं कों ज्योंका त्यों उसके दिमागमें फीड कर देना है और उसे परीक्षा पास करने लायक बना देना है यही हमारा शिक्षण है और इसी काम का हमें वेतन मिलता है |लेकिन यह क्रम आखिर कब तक चलता रहेगा ?
सीखा इसलिए जाता है कि जिससे जीवन में कभी समस्या आये तो हम उसके समाधान ढूढ़ सके | मुझे पिताजी की एक बात आज भीयाद है | एक बार किसी घरेलू समस्या के कारण हम सभी परेशान थे | पिताजी कुछ तय नहीं कर पा रहे थे | तब उन्होंने हम भाई-बहिनों से कहा अरे जहा चार-पांच पीएच.डी बैठे हो वहा भी समस्या के समाधान नहीं निकला करते | हम सभी अवाक रह गए और सोचने लगे कि रिसर्च में तो यह्कभी सिखाया नहीं गया| पर आज जरूर समझ आ गया है कि यदि एक बार आपमे विश्लेषण की क्षमता विकसित हो जाए तब आप अधिकतर परेशानियो के हल ढूढने में समर्थ हो ही जाते है और नहीं तो कम से कम उसे अपने ऊपर हाबी तो नहीं होने देते |इसलिय हमेशा याद रखना चाहिए कि जब तक हम सीखे गए ज्ञान का उपयोग नहीं कर लेते तब तक वह ज्ञान हमारे अनुभव का विषय नहीं बनाता और जो हमारे अनुभव का विषय नहीं हो सकता वह पुस्तकों में तो शोभा पा सकता हैपर हमारे जीवन जीने का आधार नहीं हो सकता |
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धर्मांधता के खिलाफ सिनेमाई हस्तक्षेप : गोवा से अजित राय

फिल्‍म का दृश्‍य 

सुप्रसिद्ध भारतीय फिल्‍मकार गौतम घोष की नई फिल्‍म मोनेर मानुष (द क्‍वेस्‍ट) धर्मांधता के खिलाफ एक सशक्‍त सिनेमाई हस्‍तक्षेप है। भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के प्रतियोगिता खंड में इसे प्रदर्शित किया गया है। यह फिल्‍म भारतीय पैनोरमा खंड की भी एक विशिष्‍ट कृति है। भारत और बांगलादेश में एक साथ 3 दिसम्‍बर 2010 को रिलीज किया जा रहा है। इसमें दोनों देशों के कलाकारों ने काम किया है। 1952 के बाद पहली बार ऐसा होने जा रहा है।
ज्ञानपीठ पुरस्‍कार विजेता बांगला लेखक और साहित्‍य अकादमी के अध्‍यक्ष सुनील गंगोपाध्‍याय की कहानी पर आधारित यह फिल्‍म उस सूफी संत लालन फकीर के बारे में है, जिन्‍होंने हिन्‍दुओं और मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता का जवाब प्रेम और करूणा की एक नयी मानवीय परंपरा को बनाकर दिया। फिल्‍म में पहले से बनी बनायी कोई कहानी नहीं है। 19वीं सदी में घटित बंगाल के नव जागरण की पृष्‍ठभूमि में फिल्‍म शहरी बौद्धिकता और देशज ज्ञान की बहस का सिनेमाई आख्‍यान रचती है। गुरूदेव रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई और अपने जमाने के चर्चित चित्रकार ज्‍योतिन्‍द्र नाथ ठाकुर लालन फकीर को अपने घर आमंत्रित करते हैं, यह 1889 का अविभाजित बंगाल है और जीवन एवं जगत के बारे में कई सवालों पर बातचीत करते हैं। लालन फकीर के जीवन को फ्लैश बैक में देखते हुये हम एक विस्‍मयकारी देशकाल की यात्रा करते हैं। जीवन के अधिकतर जटिल सवालों के जवाब फिल्‍म में विलक्षण संगीत के माध्‍यम से दिए गए हैं। इस प्रकार फिल्‍म का गीत संगीत, फिल्‍म की पटकथा और संवादों के अंग हैं। यह फिल्‍म जीवन और समय के बारे में एक अद्भुत संगीतमय आख्‍यान है। खास बात यह है कि 19वीं सदी के अंतिम दिनों के बंगाल का देशकाल जिस जीवंतता के साथ प्रस्‍तुत होता है, उसे देखना एक दुर्लभ अनुभव है।
बंगाल के एक निर्धन हिन्‍दू परिवार में जन्‍मे लालन फकीर को दूसरा जीवन मु‍स्लिम परिवार में मिलता है। बाउल संगीत की परंपरा उन्‍हें सूफी दर्शन से जोड़ती है। उन्‍होंने तब के अविभाजित बंगाल में हिन्‍दू और मुस्लिम धर्मांधता के खिलाफ शांति, करूणा एवं सह-अस्तित्‍व की नई परंपरा शुरू की। जिसकी जरूरत आज पहले से कहीं अधिक है। नदी, जंगल, खेत, आसमान, हवा, आग, पानी यानी प्रकृति मनुष्‍य के इतने करीब सिनेमा में बहुत कम देखी गई है। गौतम घोष का कैमरा एक तिनके से लेकर पानी की बूंद और हवा की सरसराहट को भी बड़े सलीके से दृश्‍यों में बदलता है। उन्‍होंने लगभग लुप्‍त हो चुके लालन फकीर के गीतों और धुनों को पहली बार इतनी मेहनत से पुनर्जीवित किया है। बांगला देश के सूफी गायक फरीदा परवीन और लतीफ शाह ने अपनी गैर-व्‍यावसायिक आवाजों से वास्‍तविक प्रभाव पैदा किया है। गौतम घोष को बांगलादेश के कुश्तिया में 85 वर्षीय फकीर अब्‍दुल करीम खान ने लालन के संगीत के खजाने के बारे बताया था।
फिल्‍म का दृश्‍य
फिल्‍म में हम साधारण लोगों की करिश्‍माई छवियां देखते हैं। जहां जीवन अपनी सहजता में अद्भुत कलात्‍मक और दार्शनिक ऊंचाई पर पहुंचता है। एक स्‍त्री जिसका प्रेमी नपुंसक हो चुका है, अपनी शारीरिक कामना के आवेग में लालन फकीर के पास जाती है और निराश होकर लौट जाती है। आश्‍चर्य है कि अपने एक सहयोगी की उत्‍कट देहाकांक्षा को पूरा करने के लिए लालन उसी स्‍त्री से अनुरोध करते हैं। फिल्‍म स्‍त्री पुरूष संबंधों में प्रेम, सेक्‍स, समर्पण और शरीर से जुड़े जटिल सवालों का आसान जवाब गानों के रूप में सामने रखती है। धर्म, समाज, परिवार और रिश्‍तों की दुनिया में लालन फकीर का संगीत किसी आध्‍यात्मिक ऊंचाई के बदले दिल की धड़कन की तरह मौजूद है। गौतम घोष की करिश्‍माई सिनेमाटोग्राफी प्रकृति और मनुष्‍य के रिश्‍तों को दिन रात के बदलते काल चक्र के पर्दे पर खूबसूरती से उकेरती है। लालन फकीर की भूमिका में बांगला फिल्‍मों के सुपर स्‍टार प्रसेनजीत चटर्जी का अभिनय जादुई असर पैदा करता है। उनकी आंखें और उनका चेहरा बिना संवाद के दृश्‍यों में बहुत कुछ कहता रहता है। 

गौतम घोष
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ट्विटर पर टैक्‍ट्रर और अमिताभ बच्‍चन

हट जा भाई आगे सै
वे खेत करते हैं समतल 
तो भर जाता है 
चैनलों और अखबारों का धरातल 
हमारे कार्य डूब जाते हैं 
चले जाते हैं रसातल 

उनकी ही चर्चा होती है 
जो चर्चा में होते हैं 
हम चर्चा में नहीं हैं 
इसलिए हमारी चर्चा कौन करे


पूरा पढ़ने के लिए यहां माउस का टैक्‍ट्रर चलाएं
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विश्‍व सिनेमा में स्त्रियों का नया अवतार : गोवा से अजित राय




पणजी, गोवा, 25 नवम्‍बर

भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में विश्‍व सिनेमा खंड में दिखाई जा रही अधिकतर फिल्‍मों में स्त्रियों का नया अवतार चकित कर देने वाला है। यह संयोग नहीं है कि ईरान, जापान और चीन से लेकर स्‍वीडन, पौलेंड, फ्रांस और जर्मनी तक की फिल्‍मों में हमें जो स्त्रियां दिखाई दे रही हैं, उनके सामने निजी सुखों से अधिक सामाजिक अस्मिता की चुनौती ज्‍यादा है। इन फिल्‍मों में इस सामाजिकता को नये ढंग से अंतरंग मानवीय रिश्‍तों के ताने-बाने से बुना गया है। मिसाल के तौर पर हम यहां दो फिल्‍मों की चर्चा करना चाहेंगे। स्‍वीडन की युवा फिल्‍मकार लिज़ा लैंजसेत की फिल्‍म प्‍योर (शुद्ध) की 18 वर्षीय कैटरीना एक अस्‍त-व्‍यस्‍त जिंदगी जीते हुए मोज़ार्ट संगीत के सहारे अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर ईरानी फिल्‍म इराक, इवनिंग ऑफ द टेंथ डे (निर्देशक – मोज़तबा राइ) की डॉक्‍टर मरियम सिराजी बचपन में अपनी बिछ़ड़ी बहन की खोज करते हुए युद्धग्रस्‍त इराक में एक विस्‍मयकारी अनुभव का सामना करती है।

कैटरीना के जीवन में अपार दुख हैं। एक दिन शहर के भव्‍य संगीत सभागार में मोजार्ट कन्‍सर्ट सुनते हुए उसे लगता है कि यह संगीत ही एक दिन उसकी मुक्ति का माध्‍यम बनेगा। उसे किसी तरह वहां रिसेप्‍शनिस्‍ट की नौकरी मिल जाती है। प्रेम और स्‍पर्श की चाहत उसे मोजार्ट संगीत के एक सुपर स्‍टार एडम के करीब लाती है। वह उसे अपना फ्रेंड फिलास्‍फर और गाइड समझने लगती है लेकिन एडम की नजर उसकी आकर्षक देह पर है। उन्‍माद उतरने के बाद वह उसे दूर फेंक देता है। पहले से ही अपने ब्‍आय फ्रेंड को छोड़ चुकी कैटरीना रेलवे प्‍लेटफार्म, सार्वजनिक पार्क और बस अड्डों पर रातें बिताते हुए फिर से अपने जीवन का ताना-बाना बुनती है। वह महसूस करती है कि जो यातना उसने झेली वह उसका अतीत था। अब वह पहले की तरह निष्‍पाप और कुंवारी महसूस करती है। फिल्‍म के आखिरी फ्रेम में पूरे पर्दे पर उसके चेहरे के बदलते भावों का अंत एक रहस्‍यमयी मुस्‍कान में होता है। जो बिना कहे बहुत कुछ कह जाता है।



पिछले कुछ वर्षों से ईरानी फिल्‍मों में दुनिया भर के दर्शकों का ध्‍यान खींचा है। गोवा फिल्‍मोत्सव में ईरान की 10 फिल्‍मों का एक विशेष पैकेज प्रदर्शित किया जा रहा है। ‘इराक – इवनिंग ऑफ द टेंथ डे’ की नायिका मरियम सिराजी एक डॉक्‍टर है और रेडक्रास की ओर से युद्धग्रस्‍त इराक में घायल लोगों का उपचार करने एक मिशन पर जाती है। 20 साल पहले बमबारी में उसकी छोटी बहन एक सैनिक के हाथ लग गई थी जिससे मिलने के लिए उसकी मां तड़प रही है। एक लंबी और दिलचस्‍प यात्रा के बाद वह अपनी बहन को खोज निकालती है जिसे उस सैनिक ने अपने बेटी की तरह पाला है। दोनों बहनों के मिलन का एक विलक्षण दृश्‍य है जिसमें दोनों एक दूसरे की भाषा नहीं जानतीं। सिराज फारसी बोलती है और अरबी नहीं जानती जबकि उसकी बहन रहमान अरबी जानती है और फारसी का एक शब्‍द भी उसे नहीं मालूम। इराक और ईरान के बीच अमेरिका सेना के कब्‍जे वाले नो मैन्‍स लैंड के पास एक पारंपरिक शहर में डॉक्‍टर सिराज तरह-तरह के लोगों से मिलती हुई अपनी बहन तक पहुंची है। उसका प्रेमी डॉक्‍टर, उसकी मां को तेहरान से यहां लाने में सफल होता है। सद्दाम के पतन के बाद अमेरिकी सेना के कब्‍जे में हम जिस इराक को देखते हैं, वह कई तरह के संकटों से जूझ रहा है। कैमरा शहर की तंग गलियों, व्‍यस्‍त बाजारों, विशाल कब्रिस्‍तानों, धूल से भरी सड़कों से होता हुआ इराकी लोगों के दैनिक जीवन को जिस जीवंतता के साथ हमें दिखाता है, वह एक नया सौंदर्य-शास्‍त्र रचना हुआ लगता है। क्‍या हम इसे विध्‍वंस का सौंदर्य-शास्‍त्र कहेंगे, जिसमें हर दृश्‍य को एक स्टिल फोटोग्राफ के रूप में देख सकते हैं। ईरान की सिराज और स्‍वीडन की कैटरीना जिस धैर्य, साहस और उत्‍साह का परिचय देती हैं, वह सिनेमा में स्‍त्री की बदलती छवियों का प्रतीक है।



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पढ़िये नवदुनिया में प्रकाशित मेरा व्यंग्य हाई स्कूल का छात्र।
हाई स्कूल का छात्र
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कैमरा कमरा और कमर

कमर कमरिया
कैमरा कमरिया रहा है
आपका कमर का किस्‍सा
देखने पधारे हैं
कैमरा बतलाइये
कौन सा बढि़या है
बेहतरीन है
ताजातरीन है
इंतजार है
विशेषज्ञों की सलाह का
सलाह वो जो आदेश भी हो।
सलाह या आदेश यहां दीजिएगा
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ओबामा से मिल लिए, अब इनसे मिल लीजिए

एलोवेरा सा करता है असर 
व्यंग्य नहीं छोड़ता कसर 

व्‍यंग्‍य ऐलोवेरा है
मानसिक ताजगी के लिए।
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सिनेमा का बाजार और बाजार में सिनेमा : गोवा से अजित राय

नुक्‍कड़ की सभी सामग्री संदर्भ देकर कहीं भी प्रकाशित की जा सकती है बल्कि प्रकाशित कर आप भागीदार बनिये।

Film Socialism
 पणजी, गोवा, 24 नवम्‍बर
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में राष्‍ट्रीय फिल्‍म विकास निगम ने भारतीय फिल्‍मों का दुनिया भर में बाजार विकसित करने के लिए गोवा के मेरियट रिजार्ट में चार दिवसीय फिल्‍म बाजार इंडिया, 2010 का आयोजन किया है। इसमें पहली बार अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सव में भारतीय फिल्‍मकारों की भागीदारी बढ़ाने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में आज लोकार्नो अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सव के निदेशक ओलिवर पेरे ने घोषणा की कि अगले वर्ष गोवा में होने वाले भारत के 42वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह से लोकार्नो फिल्‍म समारोह का एक विशेष पैकेज प्रदर्शित किया जाएगा। उन्‍होंने दुनिया भर के फिल्‍मोत्‍सवों में भारतीय फिल्‍मों की कम होती भागीदारी पर चिंता व्‍यक्‍त की।
Director Godard
फिल्‍म बाजार में पहली बार अफ‍गानिस्‍तान, भूटान, बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान, श्रीलंका, नेपाल से आमंत्रित प्रोजेक्‍ट शामिल किए गए हैं। इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड से फिल्‍मों के कई जाने-माने खरीददार और एजेंट शामिल हो रहे हैं। एन एफ डी सी की प्रबंध निदेशक नीना लाठ गुप्‍ता का कहना है कि ‘हमारी मुख्‍य चिंता इस बात की है कि अधिक से अधिक भारतीय फिल्‍में विश्‍व के अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सवों में शामिल हो सकें तथा दूसरे देशों के साथ फिल्‍म निर्माण के साझा प्रोजेक्‍ट शुरू किए जाएं। ‘
गोवा फिल्‍मोसव की सबसे खास बात यह है कि जिन फिल्‍म प्रेमियों को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्‍म समारोह – कान फिल्‍मोत्‍सव (फ्रांस) – में जाने का अवसर नहीं मिला, उनके लिए वहां से चुनी हुई दस फिल्‍मों का एक विशेष खंड प्रदर्शित किया जा रहा है। इसमें फ्रेंच न्‍यू वेब के प्रमुख फिल्‍मकार ज्‍यां लुक गोदार की नई फिल्‍म ‘फिल्‍म सोशियलिज्‍म’ और मशहूर ईरानी फिल्‍मकार अब्‍बास किरस्‍तामी की पुरस्‍कृत फिल्‍म ‘सर्टीफाइड कॉपी’ शामिल हैं। अन्‍य फिल्‍मों में ‘आउटरेज’ (ताकेशी किटानो), वी आर व्‍हाट वी आर (सबना गज्‍जंती), यंग गर्ल्‍स इन ब्‍लैक (जीन पाल सिवेयरेक), रूट आइरिश (केन लोच), ए स्‍क्रीमिंग मैन (महामत सलेह हारून), द ट्री (जूली बर्तुसेली), द सिटी (क्रिस्‍टोफ होचस्‍टर) आदि।
भारत सरकार की सिनेमा से जुड़ी सभी संस्‍थाओं-एजेंसियों को अब लगने लगा है कि बाजार ही उनका अस्तित्‍व बचाए रख सकता है। फिल्‍म प्रभाग पिछले 60 वर्षों में बनी फिल्‍मों का वेबकास्‍ट जारी करने वाला है। प्रभाग द्वारा बनाई गई फिल्‍मों की मार्केटिंग के लिए एन एफ डी सी के साथ समझौता किया गया है। करीब 110 करोड़ की लागत से बनने वाले देश के अनूठे सिनेमा संग्रहालय बनाने का जिम्‍मा भी सरकार ने फिल्‍म प्रभाग को सौंपा है। फिल्‍म प्रभाग आज से शास्‍त्रीय नृत्‍य एवं नृत्‍य गुरुओं पर बनी फिल्‍मों का उत्‍सव शुरू कर रहा है। प्रभाग के महानिदेशक कुलदीप सिन्‍हा ने उम्‍मीद जताई है कि भारतीय सिनेमा के शताब्‍दी वर्ष 2013 में सिनेमा संग्रहालय फिल्‍म प्रेमियों के लिए उपलब्‍ध हो जाएगा। यह संग्रहालय मुंबई में बनाया जा रहा है।
भारत के अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सवों में राष्‍ट्रीय फिल्‍म संग्रहालय (NFAI, Pune) पुणे की बड़ी भागीदारी होती है। इस बार कई फिल्‍मों को फिर से संरक्षित किया गया है। ऐसी 5 फिल्‍में गोवा में प्रदर्शित की जा रही हैं, जिनमें 1931 में बनी पी वी राव की मूक फिल्‍म ‘मार्तण्‍ड वर्मा’ और मृणाल सेन की ‘बाईशे श्रावण’ प्रमुख हैं। एन एफ ए आई ने पणजी की कला अकादमी में दादा साहेब फाल्‍के पुरस्‍कार से सम्‍मानित फिल्‍मी हस्तियों पर एक महत्‍वपूर्ण पोस्‍टर प्रदर्शनी भी लगार्इ है। इसमें पहली बार पुरस्‍कृत देविका रानी (1969) से लेकर इस बार पुरस्‍कृत डी रामानायडू (2009) तक की यात्रा को प्रदर्शित किया गया है। इन फिल्‍मी हस्तियों से जुड़ी फिल्‍मों के दुर्लभ पोस्‍टरों को देखना एक अलग तरह का अनुभव है। बाजार में इन पोस्‍टरों की कीमत अब काफी बढ़ गई है। इस प्रदर्शनी से पता चलता है कि सुप्रसिद्ध अभिनेता पृथ्‍वीराज कपूर को 1971 में दादा साहेब फाल्‍के अवार्ड दिया गया था। इसके अगले ही साल (1972) उनका निधन हो गया। यही घटना उनके बड़े बेटे राज कपूर के साथ घटी। जिन्‍हें 1987 में यह सम्‍मान मिला और अगले ही साल (1988) उनका निधन हो गया। इस प्रदर्शनी में सत्‍यजीत राय, अडूर गोपालकृष्‍णन, श्‍याम बेनेगल, अशोक कुमार, लता मंगेशकर आदि की फिल्‍मों के दुर्लभ पोस्‍टर लगाए गए हैं।
कन्‍फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्‍ट्रीज द्वारा आयोजित ‘द बिग पिक्‍चर वर्कशाप’ में इस बात पर काफी चर्चा हुई कि यूरोप अमेरिका की बजाय एशिया-अफ्रीका में भारतीय फिल्‍मों के बाजार की अधिक गुंजायश है। फिल्‍म निर्माण और वितरण से जुड़े अधिकतर लोगों का कहना है कि गोवा में इन देशों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाना चाहिए।
गोवा में कुछ अविस्‍मरणीय कालजयी फिल्‍मों को बड़े परदे पर दोबारा देखने का आनंद भी अलग तरह का है। मशहूर अभिनेता अशोक कुमार की याद में बिमल राय की फिल्‍म ‘बंदिनी’ का विशेष प्रदर्शन किया गया। यह फिल्‍म सचिन देव बर्मन के विलक्षण संगीत के कारण भी याद की जाती है। इस अवसर पर अशोक कुमार की पोती अनुराधा पटेल और उनके भाई सुप्रसिद्ध गायक के बेटे किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार ने ठीक ही कहा कि ‘दादामुनि भारत के पहले रैपस्‍टार थे। बीना राय की स्‍मृति में ‘अनारकली’ को देखना एक अलग अनुभव है।
गोवा फिल्‍मोत्‍सव में एक तरफ जहां यूरोप की आधुनिक फिल्‍में हैं तो वहीं दूसरी तरफ भारत की क्‍लासिक फिल्‍में भी हैं। आधुनिकता और परम्‍परा के बीच सिनेमा पर कई बहसें भी चल रही हैं। लाख टके का सवाल यह भी है कि इतने सारे भगीरथ प्रयासों के बावजूद हिन्‍दी सिनेमा की कोई विशेष पहचान विश्‍व–स्‍तर पर क्‍यों नहीं बन पा रही है। यहां दुनिया भर से आए फिल्‍मकारों से बात कीजिए, वे सत्‍यजीत राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन से लेकर गौतम घोष तक की बातें तो करेंगे लेकिन हिन्‍दी फिल्‍मकारों के बारे में वे कुछ नहीं जानते।
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हरे प्रकाश उपाध्‍याय : जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में फीचर संपादक बने

कादंबिनी को गुडबॉय 

जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में फीचर संपादक बने : मशहूर युवा कवि और पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय ने कादंबिनी, दिल्ली से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने नई पारी की शुरुआत लखनऊ से शीघ्र प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के साथ की है. उन्हें फीचर एडिटर का पद दिया गया है. उनके जिम्मे संपादकीय पेज समेत सभी फीचर व विशेष पेज हैं. हरे प्रकाश दिल्ली को छोड़कर लखनऊ शहर पहुंच चुके हैं और कामकाज संभाल लिया है.

हरे प्रकाश नई पीढ़ी के जाने-माने कवि है. उनके पहले काव्य-संग्रह का नाम है 'खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं'. इसे भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया है. आजकल वे कहानियां - उपन्यास भी लिखने लगे हैं. उनका एक उपन्यास जल्द प्रकाशित होने वाला है. भोजपुर (बिहार) के रहने वाले हरे प्रकाश को 'अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार' से सम्मानित किया जा चुका है. हिन्दी की नयी पीढ़ी के संवेदनशील और सजग कवि हरे प्रकाश की दो कविताएं पेश हैं...

बुराई के पक्ष में

कृपया बुरा न मानें
इसे बुरे समय का प्रभाव तो क़तई नहीं
दरअसल यह शाश्वत हक़ीक़त है
कि काम नहीं आई
बुरे वक्त में अच्छाइयाँ
धरे रह गये नीति-वचन उपदेश
सारी अच्छी चीज़ें पड़ गयीं ओछी
ईमानदारी की बात यह कि बुरी चीज़ें
बुरे लोग, बुरी बातें और बुरे दोस्तों ने बचाईं जान अक़सर
उँगली थामकर उठाया साहस दिया
अच्छी चीज़ों और अच्छे लोगों और अच्छे रास्तों ने बुरे समय में
अक़सर साथ छोड़ दिया
बचपन से ही
काम आती रही बुराइयाँ
बुरी माँओं ने पिलाया हमें अपना दूध
थोड़ा-बहुत अपने बच्चों से चुराकर
बुरे मर्दों ने खरीदी हमारे लिए अच्छी कमीज़ें
मेले-हाटों के लिए दिया जेब-ख़र्च
गली के हरामज़ादे कहे गए वे छोकरे
जिन्होंने बात-बात पर गाली-गलौज़
और मारपीट से ही किया हमारा स्वागत
उन्होंने भगाया हमारे भीतर का लिज़लिज़ापन
और किया बाहर से दृढ़
हमें नपुंसक होने से बचाया
बददिमाग़ और बुरे माने गये साथियों ने
सिखाया लड़ना और अड़ना
बुरे लोगों ने पढ़ाया
ज़िन्दगी का व्यावहारिक पाठ
जो हर चक्रव्यूह में आया काम हमारे
हमारी परेशानियों ने
किया संगठित हमें
सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल
जब थक गए पाँव
झूठ बोलकर हमने माँगी मदद जो मिली
झूठे कहलाए बाद में
झूठ ने किया पहले काम आसान
आत्महत्या से बचाया हमें उन छोरियों के प्रेम ने
जो बुरी मानी गईं अक़सर
हमारे समाज ने बदचलन कहा जिन्हें
बुरी स्त्रियों और सबसे सतही मुंबईया फ़िल्मों ने
सिखाया करना प्रेम
बुरे गुरुओं ने सिखाया
लिखना सच्चे प्रेम-पत्र
दो कौड़ी के लेमनचूस के लालच में पड़ जाने वाले लौंडों ने
पहुँचाया उन प्रेम-पत्रों को
सही मुक़ाम तक
जब परेशानी, अभाव, भागमभाग
और बदबूदार पसीने ने घेरा हमें
छोड़ दिया गोरी चमड़ी वाली उन ख़ुशबूदार प्रेमिकाओं ने साथ
बुरी औरतों ने थामा ऐसे वक़्त में हाथ
हमें अराजक और कुंठित होने से बचाया
हमारी कामनाओं को किया तृप्त
बुरी शराब ने साथ दिया बुरे दिनों में
उबारा हमें घोर अवसाद से
स्वाभिमान और हिम्मत की शमा जलायी
हमारे भीतर के अँधेरों में
दो कौड़ी की बीड़ियों को फूँकते हुए
चढ़े हम पहाड़ जैसे जीवन की ऊँचाई
गंदे नालों और नदियों का पानी का आया वक़्त पर
बोतलों में बंद महँगे मिनरल वाटर नहीं
भूख से तड़पते लोगों के काम आए
बुरे भोजन
कूड़े पर सड़ते फल और सब्जियाँ
सबसे सस्ते गाजर और टमाटर
हमारे एकाकीपन को दूर किया
बैठे-ठाले लोगों ने
गपोड़ियों ने बचाया संवाद और हास्य
निरंतर आत्मकेंद्रित और नीरस होती दुनिया में
और जल्दी ही भुला देने के इस दौर में
मुझे मेरी बुराइयों को लेकर ही
शिद्दत से याद करते हैं उस क़स्बे के लोग
जहां से भागकर आया हूँ दिल्ली!

घड़ी

दुनिया की सभी घड़ियाँ
एक-सा समय नहीं देतीं
हमारे देश में अभी कुछ बजता है
तो इंग्लैंड में कुछ
फ्रांस में कुछ
अमेरिका में कुछ....
यहाँ तक कि
एक देश के भीतर भी सभी
घड़ियों में एक-सा समय नहीं बजता
समलन हुक्मरान की कलाई पर कुछ बजता है
मज़दूर की कलाई पर कुछ
अफ़सरान की कलाई पर कुछ
मन्दिर की घड़ी में जो बजता है
ठीक-ठीक वही चर्च की घड़ी में नहीं बजता है
मस्जिद की घड़ी को मौलवी
अपने हिसाब से चलाता है
और सबसे अलग समय देती है
संसद की घड़ी
कुछ लोग अपनी घड़ी
अपनी जेब में रखते हैं
और अपना समय
अपने हिसाब से देखते हैं
पूछने पर अपनी मर्ज़ी से
कभी ग़लत
कभी सही बताते हैं।
मोहनदास करमचन्द गाँधी
अपनी घड़ी अपनी कमर में कसकर
उनके लिए लड़ते थे
जिनके पास घड़ी नहीं थी
और जब मारे गये वे
उनकी घड़ी बिगाड़ दी
उनके चेलों-चपाटों ने
कहना कठिन है अब उनकी घड़ी कहाँ है
और कौन-कौन पुर्ज़े ठीक हैं उसके
हमारी घड़ी
अकसर बिगड़ी रहती है
हमारा समय गड़बड़ चलता है
हमारे धनवान पड़ोसी के घर में
जो घड़ी है
उसे हमारी-आपकी क्या पड़ी है!
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'ईस्‍ट इज ईस्‍ट' के बाद अब 'वेस्‍ट इज वेस्‍ट' : गोवा से अजित राय

पणजी, गोवा, 23 नवम्‍बर
अजित राय
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की उद्घाटन फिल्‍म वेस्‍ट इज वेस्‍ट इस समारोह की सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍मों में से एक है। यह फिल्‍म करीब एक दशक पहले बनी ईस्‍ट इज ईस्‍ट का दूसरा भाग है, जिसने दुनिया भर में करीब 160 करोड़ रुपये का कारोबार किया था। यह फिल्‍म भारत के सु‍प्रसिद्ध अभिनेता ओमपुरी को विश्‍व के महान अभिनेताओं की पंक्ति में ला खड़ा करती है। ब्रिटिश फिल्‍म की निर्माता लैस्‍ली एडविन ने बताया कि लगभग 18 करोड़ रुपये की लागत वाली यह फिल्‍म ब्रिटेन और भारत में अगले वर्ष 25 फरवरी को एक साथ रिलीज की जाएगी। इसमें मुख्‍य भूमिकाएं ब्रिटिश कलाकारों के साथ ओमपुरी, इला अरुण, विजयराज, राज भंसाली आदि भारतीय कलाकारों ने निभाई है। उन्‍होंने कहा कि वे इस श्रंखला की तीसरी फिल्‍म ‘ईस्‍ट इज वेस्‍ट’ की पटकथा पर तेजी से काम कर रही हैं।
‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ ब्रिटेन के मैनचेस्‍टर शहर में साल्‍फोर्ड इलाके में बसे एक पाकिस्‍तानी जहांगीर खान की कहानी है जो 35 साल पहले 1940 में अपनी पहली बीवी बशीरा और अपनी बेटियों को छोड़कर आ गया था। मैनचेस्‍टर में उसने एक आयरिश महिला से प्रेम विवाह किया जिससे उसके कई बेटे हुए। ‘ईस्‍ट इज ईस्‍ट’ 1975 के ब्रिटेन में पाकिस्‍तानी समाज के जिस सांस्‍कृतिक संकट पर खत्‍म होती है, वहीं से ‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ शुरू होती है। ‘ईस्‍ट इज ईस्‍ट’ के अंतिम दृश्‍य में हमने देखा था कि जहांगीर खान अपनी पत्‍नी एली पर हाथ उठाता है, तभी उसका बड़ा बेटा उसका हाथ पकड़ लेता है। उसे अब लगता है कि पुराने सामंती मूल्‍यों के सहारे अब उसका परिवार नहीं चल सकता। ‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ की शुरूआत जहांगीर खान की पाकिस्‍तान यात्रा से होती है। जहां वह 35 साल पहले अपने परिवार को छोड़ गया था। वह अपने दो बेटों को साथ लाता है और चाहता है कि दोनों पाकिस्‍तानी की तरह प्रशिक्षित हों। उसे पता चलता है कि इन पैंतीस सालों में सब कुछ वैसा ही नहीं है, जैसा वह छोड़ कर गया था। उसे बहुत ग्‍लानि होती है कि उसने अपने पहले परिवार की घोर उपेक्षा की है। इसी पारिवारिक संघर्ष पूरब और पश्चिम की संस्‍कृतियों की टकराहट और नए पुराने मूल्‍यों की रस्‍साकसी के बीच फिल्‍म आगे बढ़ती है। इस फिल्‍म की शूटिंग भारत के पंजाब प्रांत में हुई थी क्‍योंकि पाकिस्‍तान सरकार ने निर्माताओं को इसकी अनुमति नहीं दी थी।
‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ में 1976 के एक पाकिस्‍तानी गांव के परिवेश की जीवंत तस्‍वीर पेश की गई है। माहौल को वास्‍तविक बनाने के लिए छोटी से छोटी बातों का ख्‍याल रखा गया है। यहां तक की जहांगीर खान का छोटा बेटा साजिद ‘पंजाब’ को ‘पुंजाब’ कहता है क्‍योंकि अंग्रेजी में उसने पीयूएनजेएबी पढ़ा है। फिल्‍म मानवीय रिश्‍तों की परतों के बीच सांस्‍कृतिक अस्मिता के संघर्ष को ताजगी के साथ प्रस्‍तुत करती है।  पूरी फिल्‍म में कहीं भी शोर, हिंसा, एक्‍शन और भड़काऊ चमक-दमक नहीं है। रोब लेन और शंकर अहसान लॉय का अद्भुत सूफी संगीत दर्शकों को एक रूहानी दुनिया में ले जाता है। एक-एक दृश्‍य खूबसूरत चित्र की तरह है। दृश्‍यों के रंग चरित्रों के आपसी संवाद और उनके मनोभावों को दिखाते हैं। फिल्‍म में एक ऐसी दुनिया रची गई है जहां हर पात्र अपनी-अपनी जगह सही होते हुए भी एक अनवरत यातना सह रहा है। अंत में हम देखते हैं कि जब जहांगीर खान की दूसरी पत्‍नी एली उसे ढूंढते हुए ब्रिटेन से पाकिस्‍तान पहुंचती है और काफी उहापोह के बाद जहांगीर खान अपने बच्‍चों के साथ वापस ब्रिटेन लौटने का फैसला करता है तो वह कहता अपनी पहली पत्‍नी से कहता है ‘’मैंने जो जीवन चुना था, वह यह नहीं है।‘’
ओमपुरी वेस्‍ट इज वेस्‍ट के एक दृश्‍य में
‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ में जहांगीर खान के केन्‍द्रीय चरित्र को ओमपुरी ने अपने अभिनय से अविस्‍मरणीय बना दिया है। लेस्‍ली एडविन ने फिल्‍म के प्रदर्शन के मौके पर ठीक ही कहा कि ‘’ओमपुरी विश्‍व के महान अभिनेताओं में से एक हैं। ‘’ उन्‍होंने एक पिता, दो पत्नियों के पति, पाकिस्‍तानी मुसलमान और ब्रिटिश नागरिक के रूपों को एक ही चरित्र में सुंदर तरीके से समायोजित किया है। उनके बचपन की जो दुनिया छूट गई है उसे वे अपने बच्‍चों के माध्‍यम से पाना चाहते हैं। लेकिन बच्‍चों के सामने आधुनिक ब्रिटेन और यूरोप है। फिल्‍म में संवादों से अधिक चरित्रों का मौन बोलता है। एक विलक्षण दृश्‍य में जहांगीर खान की पहली पत्‍नी बशीरा और दूसरी पत्‍नी एली का संवाद है। बशीरा अंग्रेजी नहीं जानती जबकि एली को पंजाबी नहीं आती। बशीरा पंजाबी बोलती है और एली अंग्रेजी में उसका जवाब देती है। यह दो स्त्रियों का अद्भुत संवाद है। जो दिल की धड़कनों की भाषा से एक दूसरे को समझने की कोशिश करती हैं। बीच-बीच में सूफी संत समय की व्‍याख्‍या करते रहते हैं। किशोर साजिद अपनी तरह से पाकिस्‍तानी गांव में एक नई और रोमांचक दुनिया से परिचित होता है।
फिल्‍म की निर्माता लेस्‍ली एडविन ने खचाखच भरे सभागार में हिंदी में दर्शकों से मुखातिब होकर सबको खुश कर दिया।  उन्‍होंने हिंदी में कहा कि इस फिल्‍म समारोह में ‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ के प्रदर्शन के मौके पर मैं इतनी खुश हूं कि मेरे पैर जमीन पर नहीं हैं।

विशेष * इसे आप भी अपने ब्‍लॉग पर प्रकाशित कर सकते हैं।
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‘ग्रासरूट से ग्‍लैमर’ की यात्रा : ममता बैनर्जी ने किया 41वें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह का शुभारंभ : गोवा से अजित राय

The Union Minister for Railways, Kumari Mamata Banerjee lighting the lamp to inaugurate the 41st International Film Festival (IFFI-2010) at Kala Academy, in Panaji, Goa on November 22, 2010.
पणजी, गोवा, 22 नवम्‍बर, केन्‍द्रीय रेल मंत्री ममता बैनर्जी ने यहां एक भव्‍य समारोह में भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह का शुभारंभ किया। उन्‍होंने कहा कि सिनेमा जमीनी स्‍तर की आवाजों को जगह देने का एक बड़ा माध्‍यम है। इसमें हम अपने देश, समाज और दुनिया भर की छवियां देखते हैं। आज पूरी दुनिया एक गांव में बदल गई है। यह बदलाव सबसे पहले सिनेमा के माध्‍यम से संभव हुआ है।
उन्‍होंने चुटकी लेते हुए कहा कि वे जमीनी कार्यकर्ता हैं और सिनेमा ग्‍लैमर की दुनिया। उनके लिए यहां आना ग्रासरूट से ग्‍लैमर की यात्रा है। उन्‍होंने कहा कि यह ठीक है कि उन्‍हें अच्‍छी अंग्रेजी नहीं बोलनी आती लेकिन वे दिल की भाषा बोलती हैं। उन्‍होंने कहा कि ग्‍लैमर की चमक के पीछे काम करने वाले तकनीशियनों, मजदूरों और छोटे मोटे कामगारों के योगदान को हमें नहीं भूलना चाहिए। यश चोपड़ा के अनुरोध पर उन्‍होंने इस वर्ग के लिए रेल यात्रा में कई रियायतें लागू की हैं। उन्‍होंने कहा कि एक दिन सच्‍चे अर्थों में भारतीय सिनेमा दुनिया भर में अपनी जगह बना लेगा।
सुप्रसिद्ध फिल्‍म निर्माता और दादा साहेब फाल्‍के अवार्ड से सम्‍मानित यश चोपड़ा ने कहा कि समय बदल रहा है, दुनिया जितना काम कर रही है, उतना हम क्‍यों नहीं कर पा रहे हैं। आज का फिल्‍म उद्योग कई संकटों से गुजर रहा है लेकिन सवाल यह है कि सरकार क्‍या कर रही है। सरकार भारतीय फिल्‍म उद्योग पर नए-नए टैक्‍स लगाने की तैयारी में है, यदि यह लागू हो गए तो भारत में फिल्‍म निर्माण बहुत मुश्किल हो जाएगा। उन्‍होंने रेल मंत्री ममता बैनर्जी से अनुरोध किया वे सरकार तक फिल्‍म वालों की बातें पहुंचायें। उन्‍होंने कहा कि फिल्‍म निर्माण से जुड़े कई महत्‍वपूर्ण और गंभीर मुद्दें हैं जिन पर सरकार को फैसले लेने होंगे।
गोवा के मुख्‍यमंत्री दिगम्‍बर कामत ने विश्‍वास दिलाया कि अगले वर्ष तक गोवा में कई बड़ी सुविधाओं का निर्माण हो जाएगा। उन्‍होंने कहा कि इस साल गोवा एंटरटेनमेंट सोसायटी ने प्रतिनिधियों के लिए ई टिकटिंग की व्‍यवस्‍था लागू की है जिससे उन्‍हें टिकट खिड़की पर लाईन लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, वे इंटरनेट के माध्‍यम से घर बैठे टिकट बुक कर सकेंगे। उन्‍होंने खुशी जाहिर की कि गोवा भारत में सबसे बड़े फिल्‍म केन्‍द्र के रूप में विकसित हो रहा है।
इस अवसर पर फिल्‍म समारोह की जानकारी देते हुए फिल्‍म समारोह‍ निदेशालय के महानिदेशक एस एम खान ने कहा कि इस बार 61 देशों की करीब 300 फिल्‍में दिखाई जा रही हैं। प्रतियोगिता खंड को सारी दुनिया के लिए खोला गया है और पुरस्‍कारों की  राशि बढ़ाकर 90 लाख रुपये कर दी गई है। सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता और सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री के दो नए पुरस्‍कार शुरू किए जा रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि पिछले वर्ष भारत में 1300 फिल्‍मों का निर्माण हुआ, उनमें से प्राप्‍त प्रविष्टियों में से भारतीय पैनोरमा का चुनाव किया गया है। इस बार उडि़या सिनेमा के 75 वर्ष पूरे होने पर एक विशेष आयोजन किया जा रहा है। साथ ही समारोह में अशोक कुमार, मोतीलाल, नाडिया तथा कई जानी-मानी फिल्‍मी हस्तियों को श्रद्धांजलि दी जा रही है।
इस अवसर पर सुप्रसिद्ध फिल्‍मकार सुभाष घई, मधुर भंडारकर, राजकुमार हिरानी, फिल्‍म अभिनेता अजय देवगन, मनोज वाजपेयी, गीतकार प्रसून जोशी सहित कई फिल्‍मी हस्तियां मौजूद थीं। समारोह का संचालन अभिनेता आफताब शिवदासानी और अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने किया। 
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