फिल्म के दूसरे हिस्से का नाम ‘अवर ह्यूमैनिटीज’ है जिसमें मानव-सभ्यता के कम से कम 6 लीजैंड बन चुकी जगहों की यात्रा की गई है। ये हैं मिश्र, फिलिस्तीन, काला सागर तट पर यूक्रेन का शहर उडेसा, ग्रीक का हेलास, इटली का नेपल्स और स्पेन का बर्सिलोना।
‘फिल्म सोशिएलिज्म ‘ - भविष्य के सिनेमा का ट्रेलर : गोवा से अजित राय
फिल्म के दूसरे हिस्से का नाम ‘अवर ह्यूमैनिटीज’ है जिसमें मानव-सभ्यता के कम से कम 6 लीजैंड बन चुकी जगहों की यात्रा की गई है। ये हैं मिश्र, फिलिस्तीन, काला सागर तट पर यूक्रेन का शहर उडेसा, ग्रीक का हेलास, इटली का नेपल्स और स्पेन का बर्सिलोना।
प्रख्यात हास्य-व्यंग्य कवि ओमप्रकाश आदित्य जी की धर्मपत्नी श्रीमती बृजलता नहीं रहीं
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| गमगीन |
नुक्कड़ परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि।
विशेष : यदि कोई बंधु श्रीमती बृजलता जी का चित्र मेल tetaalaaa@gmail.com कर सकें तो आभारी रहूंगा। जिससे उनका चित्र इस पोस्ट में लगाया जा सके।
विश्व सिनेमा में इतिहास से जुड़ी यादें - गोवा से अजित राय
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| Roman Polanski |
यातना, संघर्ष और स्वप्न का नया सिनेमा : गोवा से अजित राय
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| Girish Kasarvalli |
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| kanasemba kudureyaneri |
कहानी से बाहर निकलती पटकथाएं : गोवा से
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| Director Fatih Akin |
आखिर हम गाली क्यों देते हैं?
कुछ और समझदार हुए और बाहरी परिवेश से परिचय हुआ तो माँ बहिनकी गाली कानो में सुनाई पडी | तब तक इन गालियों के गूढार्थ पता नहीं हुआ करते थे अत: बचपने में एक बार इस गाली का प्रयोग किया और माँ से खूब पिटाई भी खाई | सख्त हिदायत दीगई कि अब कभी ऐसे शब्द जुबान पर भी आये तो जुबान खीच ली जायेगी| बस इस प्रकरण का यहीं पटाक्षेप हो गया|
जैसे-जैसे बड़े होते गए और समाज का हिस्सा बनते गए, देखा कि पुरुषों की भाषा में गालिया ऐसे सम्मिलित होने लगी जैसे दाल में तडका|अनसुनी करते करते भी पाया कि कई सज्जनो की बाते तो इन आलंकारिक शब्दों के बिना पूरी नहीं होती| तब बहुत कोफ़्त होती थी पर हम कर क्या सकते थे| बहुत हुआ तो ऐसे लोगो के आगे नहीं पडते थे| समझदारी आई तब जाना इन गालियों के मूल में स्त्री जाति और उसके पक्षधरों कों अपमानित करने की मूल मंशा ही थी| साला और साली कितने मधुर रिश्ते होते हैं पर ये भी गाली के पर्याय होते चले गए और अब साला तो इतना फैशन में आगया कि उसे गाली नहीं वरन बातचीत का जरूरी हिस्सा माना जाने लगा |पर इसी रिश्ते का एक पहलू और था पति के भाई और बहिन यानी देवर और ननद | ये रिश्ते सदैव पूजनीय रहे कभी गाली की कोटि में नहीं गिने गए|आखिर क्यो क्योंकी ये पति परमेश्वर के हिस्से जो थे और सालासाली उस बदनसीब के भाईबहिन | धीरे-धीरे इस साजिश ने एक और रूप अख्तियार कर लिया |हमारी पूरी की पूरी शक्ति औरतो के खिलाफ प्रयोग होने लगी |उनकी इज्जत के इतने चीथड़े बिखेरने केलिए एक गाली पर्याप्त होती और वह शर्म से मुह छिपा बैठी| समय बदला और बराबरी की धुन में औरतों ने भी इसी हथियार का प्रयोग करना शुरू कर दिया पर वह यह भूल बैठी कि ये तो पुरुषों के द्वारा दी जाने वाली गालिया है हम अपनी गालियोंका शास्त्र अलग बनाए |कौन मेहनत करता सो उसी कोष से गालिया चुन ली गई और उनका धडल्ले से प्रयोग किया जाने लगा |बिना सोचे समझे कि इन सब गालियों से तो हमी अपमानित हो रहे है| मेरा बहुत मन हुआ कि पूछू अरे ये कैसा अनर्थ कर रही हो| भला अपने कों भी कभी गाली दी जाती है पर बराबरी की होड़ में किसे ये सब फालतू बकबास सुनने की पडी थी|पुलिस का महकमा तो गालियों के बिना अधूरा ही है| और अब तो स्थिति यह है कि वे बच्चे जो इन गालियों की एबीसीडी भी नहीं जानते वे भी इन गालियों का धडल्ले सेप्रयोग करते है| ऐसे कुछ बच्चों कों मैंने जब कुछ समझाने की कोशिश की तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जबाव दिया कि ये खराब बात होती तो सब लोग क्यों देते | दुकान पर चौराहे पर और घर पर ये गालिया तो उसके कानो में रोज ही पडती है | आखिर किस-किस से बचायेंगे आप | और बस हमने मान लिया है कि किसी कों डराने धमकाने के लिए दोचार भद्दी गालियों का प्रयोग कर दो |सज्जन तो ऐसा भाग खडा होगा जैसे गधे के सर से सींग और भले घर की लडकिया तो उस माहौल से बचना ही सुरक्षित मानेगी |और कहा जाएगा क्या मेडम ये भी कोई लिखने का विषय है ,ये तो सब चलता रहता है|
आखिर हम गाली क्यों देते हैं?
कुछ और समझदार हुए और बाहरी परिवेश से परिचय हुआ तो माँ बहिनकी गाली कानो में सुनाई पडी | तब तक इन गालियों के गूढार्थ पता नहीं हुआ करते थे अत: बचपने में एक बार इस गाली का प्रयोग किया और माँ से खूब पिटाई भी खाई | सख्त हिदायत दीगई कि अब कभी ऐसे शब्द जुबान पर भी आये तो जुबान खीच ली जायेगी| बस इस प्रकरण का यहीं पटाक्षेप हो गया|
जैसे-जैसे बड़े होते गए और समाज का हिस्सा बनते गए, देखा कि पुरुषों की भाषा में गालिया ऐसे सम्मिलित होने लगी जैसे दाल में तडका|अनसुनी करते करते भी पाया कि कई सज्जनो की बाते तो इन आलंकारिक शब्दों के बिना पूरी नहीं होती| तब बहुत कोफ़्त होती थी पर हम कर क्या सकते थे| बहुत हुआ तो ऐसे लोगो के आगे नहीं पडते थे| समझदारी आई तब जाना इन गालियों के मूल में स्त्री जाति और उसके पक्षधरों कों अपमानित करने की मूल मंशा ही थी| साला और साली कितने मधुर रिश्ते होते हैं पर ये भी गाली के पर्याय होते चले गए और अब साला तो इतना फैशन में आगया कि उसे गाली नहीं वरन बातचीत का जरूरी हिस्सा माना जाने लगा |पर इसी रिश्ते का एक पहलू और था पति के भाई और बहिन यानी देवर और ननद | ये रिश्ते सदैव पूजनीय रहे कभी गाली की कोटि में नहीं गिने गए|आखिर क्यो क्योंकी ये पति परमेश्वर के हिस्से जो थे और सालासाली उस बदनसीब के भाईबहिन | धीरे-धीरे इस साजिश ने एक और रूप अख्तियार कर लिया |हमारी पूरी की पूरी शक्ति औरतो के खिलाफ प्रयोग होने लगी |उनकी इज्जत के इतने चीथड़े बिखेरने केलिए एक गाली पर्याप्त होती और वह शर्म से मुह छिपा बैठी| समय बदला और बराबरी की धुन में औरतों ने भी इसी हथियार का प्रयोग करना शुरू कर दिया पर वह यह भूल बैठी कि ये तो पुरुषों के द्वारा दी जाने वाली गालिया है हम अपनी गालियोंका शास्त्र अलग बनाए |कौन मेहनत करता सो उसी कोष से गालिया चुन ली गई और उनका धडल्ले से प्रयोग किया जाने लगा |बिना सोचे समझे कि इन सब गालियों से तो हमी अपमानित हो रहे है| मेरा बहुत मन हुआ कि पूछू अरे ये कैसा अनर्थ कर रही हो| भला अपने कों भी कभी गाली दी जाती है पर बराबरी की होड़ में किसे ये सब फालतू बकबास सुनने की पडी थी|पुलिस का महकमा तो गालियों के बिना अधूरा ही है| और अब तो स्थिति यह है कि वे बच्चे जो इन गालियों की एबीसीडी भी नहीं जानते वे भी इन गालियों का धडल्ले सेप्रयोग करते है| ऐसे कुछ बच्चों कों मैंने जब कुछ समझाने की कोशिश की तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जबाव दिया कि ये खराब बात होती तो सब लोग क्यों देते | दुकान पर चौराहे पर और घर पर ये गालिया तो उसके कानो में रोज ही पडती है | आखिर किस-किस से बचायेंगे आप | और बस हमने मान लिया है कि किसी कों डराने धमकाने के लिए दोचार भद्दी गालियों का प्रयोग कर दो |सज्जन तो ऐसा भाग खडा होगा जैसे गधे के सर से सींग और भले घर की लडकिया तो उस माहौल से बचना ही सुरक्षित मानेगी |और कहा जाएगा क्या मेडम ये भी कोई लिखने का विषय है ,ये तो सब चलता रहता है|
हम अपने अपने टापू में कैद क्यों है ?
मैं समझ नहीं पा रही आखिर हम इतने औपचारिक कब से हो गए कि मृत्यु जैसे दुखद अवसर पर भी हम यह प्रतीक्षा करने लगें कि जब शव यात्रा निकलेगी तब हम भी उस भीड़ का हिस्सा बन जायेंगे| कहाँ बची है हमारी संवेदना ,क्या अब इन बड़ी कोठियों के लोगो के बीच मोहल्ले जैसा भाईचारा जैसा कुछ नहीं होता | कहा वह समय था ,जब किसी के घर ऐसे अवसरों पर सब कुछ पडौसी ही संभाल लेते थे| जब तक रिश्तेदार आते ,तब तक तो सब हाथोहाथ ले लिया जाता| और अब एक समय ऐसा आगया जब सब कुछ ऑफिस नुमा हो गया | जहां रोने केस्वर सुनाई देने चाहिए थे वहाँ यह देखा जाने लगा कि हम अपने घर कों पहले व्यवस्थित कर लें |मुझे लगने लगा कि अब हम पदौसियोंके मध्य नहीं रहते बल्कि मशी नुमा जीवो के मध्य रहते हैं| हमारे अपने इगो इतने बढ़ गए कि हम स्वयं कों अपने में पूर्ण मानने लगे | हमें किसी से कोई लेना-देना नहीं |हमारे पास इतना पैसा जो आगया है कि अब सब कुछ उससे खरीदा सकता है | जी हाँ रिश्ते भी | और क्या आपने देखा नहीं शादी-विवाहों में गीत गाने के लिए मंडली बुलाई जाने लगी है सब कुछ पेशे जैसा हो गया |लोग आते है आपको खाना परसते है, खईदी हुई मुस्कान से आपका स्वागत करते है |
और जो मेजबान है वह हाथ जोड़े दरवाजे पर केवल आपको अटेंड करते है| सब तो इतनी तेजी से बदल रहा है| शायद मेरे मन के किसी कोने में अब भी वह गंवईपन बाकी रह गया है जो जब चाहे अपना सर उठा लेता है और मुझे सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम आखिर अपने -अपने टापुओ की हद कों तोड़ क्यों नहीं देते |हम अपनी संवेदनाओं का विस्तार क्यों नहीं कर लेते | और कम से कम दुःख के अवसरों पर तो आपसी वैमनस्य कों भुला क्यों नहीं देते ?हम पहले जैसे पडौसी क्यों नहीं बन जाते जब किसी के घर आहात भी होती तो पूरा मोहल्ला एक हो जाता | तब मोहल्ले की बहन बेटी सबकी बहन बेटी होती थी| एक कादुख सबका दुःख होता था |सब के सुख -दुःख में सब शरीक होते |पर शायद अब हमने अपने घर तो बड़ा बना लिया है पर दिल संकुचित हो गए है|
ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग बहुत जरूरी है
मनुष्य का पूरा जीवन सीखने और सिखाने के अनुभवों से भरा हुआ है | जन्म से लेकर मृत्यु तक हम सीखते और सिखाते रहते है| कभी-कभी हम सीखते हुए भी सिखा रहे होते है इस द्रष्टि से प्रत्येक व्यक्ति अध्यापक है और अपने जीवन काल मेंकभी ना कभी शिक्षकके संपर्क में अवश्य आया होता है| याद कीजिए आपकी स्मृति में किस अध्यापक की यादे आज भी ताजा हैं | हो सकता है वक्त की धूल ने सब कुछ धुंधला कर दिया हो पर जैसे ही वह धूल हटती है अथवा आपके द्वारा हटाई जाती है सब कुछ कितना साफ़ दिखाई देने लगता है मानो कल की ही बात हो | हाथ में डंडी लेकर पढाने वाले मास्साब ,गुस्से में त्योरिया चढाते और बात- बात में गरियाते सर , कुछ भी पूछने पर मार का डर,लेकिन कभी-कभी इतने अच्छे अध्यापक जिनके कारण ही हम स्कूल जाने कों उत्साहित हो जाते ,इतनी अच्छी अध्यापिका कि माँ और दीदी से भी ज्यादा प्यारी लगती ,| आखिर क्या था उन अध्यापकों में कि आज भी उनका नाम हमारी जुबान पर चढा रहता है |
भले ही वे प्रशिक्षित न रहे हो पर उनके जीवन के अनुभव ने उन्हें हमारे समीप ला दिया था |क्या ज्ञान केवल पुस्तकों से ही प्राप्त किया जा सकता है ,काश ऐसा होता तो हम सभी आज बड़ी -बड़ी उपाधियों के साथ पंडित और विद्वान बन चुके होते | आज हमारे पास मोटी-मोटी किताबें तो है पर उनका ज्ञान हम पचा नहीं पाए है | हमने जो भी कभी पढ़ा होगा ,वह केवल परीक्षा के लिए और जैसे ही हमने परीक्षा पास की सबकुछ विस्मृत हो गया |क्योंकि हमने तो जो पढ़ा था और जिसके लिए पढ़ा था वह लक्ष्य तो मिल ही गया फिर उसे याद करने की क्या आवश्यकता रह गई ?यही हम मात खा जाते हैं |
जब हम दूसरों कों सिखाना प्रारम्भ करते हैं तब सबसे पहले हमारा व्यक्तित्व परिलक्षित होता है | हम कैसे है ,जीवन में किन चीजों कों हम प्राथमिकता देते है ,हम अपने छात्रों के विषय में क्या सोचते हैं ,हमारा शिक्षण के प्रति कैसा नजरिया है | हम छात्रोंके दिमाग में सूचनाए भर रहे होते हैं या उनके मस्तिषक कों सक्रीय करना चाहते हैं| किसी भी ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग कक्षा में छात्रों कोसजग रखता है |यदि हम किसी भी विषय कों पढाने से पूर्व उस विषय की जीवन में उपयोगिता बता दें तो उस विषय के प्रति रूचि बढ़ जाती है और हम उस विषय कों सहज रूप में सीख लेते है क्योंकि उसके साथ हमारा लक्ष्य और मन दोनों जुड जाते है|पहले हम तो अपने ज्ञान भण्डार की छटनी कर ले कि क्या बताना जरूरी है और क्या छोड़ा जा सकता है | विषय का मंथन तो कर ले , उसकी गरिष्ठता कों सुपाच्य तो बना ले पर हमें इतना सब्र कहाँ है हमें तो बस पढ़ी गई सूचनाओं कों ज्योंका त्यों उसके दिमागमें फीड कर देना है और उसे परीक्षा पास करने लायक बना देना है यही हमारा शिक्षण है और इसी काम का हमें वेतन मिलता है |लेकिन यह क्रम आखिर कब तक चलता रहेगा ?
सीखा इसलिए जाता है कि जिससे जीवन में कभी समस्या आये तो हम उसके समाधान ढूढ़ सके | मुझे पिताजी की एक बात आज भीयाद है | एक बार किसी घरेलू समस्या के कारण हम सभी परेशान थे | पिताजी कुछ तय नहीं कर पा रहे थे | तब उन्होंने हम भाई-बहिनों से कहा अरे जहा चार-पांच पीएच.डी बैठे हो वहा भी समस्या के समाधान नहीं निकला करते | हम सभी अवाक रह गए और सोचने लगे कि रिसर्च में तो यह्कभी सिखाया नहीं गया| पर आज जरूर समझ आ गया है कि यदि एक बार आपमे विश्लेषण की क्षमता विकसित हो जाए तब आप अधिकतर परेशानियो के हल ढूढने में समर्थ हो ही जाते है और नहीं तो कम से कम उसे अपने ऊपर हाबी तो नहीं होने देते |इसलिय हमेशा याद रखना चाहिए कि जब तक हम सीखे गए ज्ञान का उपयोग नहीं कर लेते तब तक वह ज्ञान हमारे अनुभव का विषय नहीं बनाता और जो हमारे अनुभव का विषय नहीं हो सकता वह पुस्तकों में तो शोभा पा सकता हैपर हमारे जीवन जीने का आधार नहीं हो सकता |
धर्मांधता के खिलाफ सिनेमाई हस्तक्षेप : गोवा से अजित राय
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| फिल्म का दृश्य |
सुप्रसिद्ध भारतीय फिल्मकार गौतम घोष की नई फिल्म मोनेर मानुष (द क्वेस्ट) धर्मांधता के खिलाफ एक सशक्त सिनेमाई हस्तक्षेप है। भारत के 41वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के प्रतियोगिता खंड में इसे प्रदर्शित किया गया है। यह फिल्म भारतीय पैनोरमा खंड की भी एक विशिष्ट कृति है। भारत और बांगलादेश में एक साथ 3 दिसम्बर 2010 को रिलीज किया जा रहा है। इसमें दोनों देशों के कलाकारों ने काम किया है। 1952 के बाद पहली बार ऐसा होने जा रहा है।
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| फिल्म का दृश्य |
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| गौतम घोष |
ट्विटर पर टैक्ट्रर और अमिताभ बच्चन
| हट जा भाई आगे सै |
तो भर जाता है
चैनलों और अखबारों का धरातल
हमारे कार्य डूब जाते हैं
चले जाते हैं रसातल
उनकी ही चर्चा होती है
जो चर्चा में होते हैं
हम चर्चा में नहीं हैं
इसलिए हमारी चर्चा कौन करे
पूरा पढ़ने के लिए यहां माउस का टैक्ट्रर चलाएं
विश्व सिनेमा में स्त्रियों का नया अवतार : गोवा से अजित राय
पणजी, गोवा, 25 नवम्बर
भारत के 41वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में विश्व सिनेमा खंड में दिखाई जा रही अधिकतर फिल्मों में स्त्रियों का नया अवतार चकित कर देने वाला है। यह संयोग नहीं है कि ईरान, जापान और चीन से लेकर स्वीडन, पौलेंड, फ्रांस और जर्मनी तक की फिल्मों में हमें जो स्त्रियां दिखाई दे रही हैं, उनके सामने निजी सुखों से अधिक सामाजिक अस्मिता की चुनौती ज्यादा है। इन फिल्मों में इस सामाजिकता को नये ढंग से अंतरंग मानवीय रिश्तों के ताने-बाने से बुना गया है। मिसाल के तौर पर हम यहां दो फिल्मों की चर्चा करना चाहेंगे। स्वीडन की युवा फिल्मकार लिज़ा लैंजसेत की फिल्म प्योर (शुद्ध) की 18 वर्षीय कैटरीना एक अस्त-व्यस्त जिंदगी जीते हुए मोज़ार्ट संगीत के सहारे अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर ईरानी फिल्म इराक, इवनिंग ऑफ द टेंथ डे (निर्देशक – मोज़तबा राइ) की डॉक्टर मरियम सिराजी बचपन में अपनी बिछ़ड़ी बहन की खोज करते हुए युद्धग्रस्त इराक में एक विस्मयकारी अनुभव का सामना करती है।
कैटरीना के जीवन में अपार दुख हैं। एक दिन शहर के भव्य संगीत सभागार में मोजार्ट कन्सर्ट सुनते हुए उसे लगता है कि यह संगीत ही एक दिन उसकी मुक्ति का माध्यम बनेगा। उसे किसी तरह वहां रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल जाती है। प्रेम और स्पर्श की चाहत उसे मोजार्ट संगीत के एक सुपर स्टार एडम के करीब लाती है। वह उसे अपना फ्रेंड फिलास्फर और गाइड समझने लगती है लेकिन एडम की नजर उसकी आकर्षक देह पर है। उन्माद उतरने के बाद वह उसे दूर फेंक देता है। पहले से ही अपने ब्आय फ्रेंड को छोड़ चुकी कैटरीना रेलवे प्लेटफार्म, सार्वजनिक पार्क और बस अड्डों पर रातें बिताते हुए फिर से अपने जीवन का ताना-बाना बुनती है। वह महसूस करती है कि जो यातना उसने झेली वह उसका अतीत था। अब वह पहले की तरह निष्पाप और कुंवारी महसूस करती है। फिल्म के आखिरी फ्रेम में पूरे पर्दे पर उसके चेहरे के बदलते भावों का अंत एक रहस्यमयी मुस्कान में होता है। जो बिना कहे बहुत कुछ कह जाता है।
पिछले कुछ वर्षों से ईरानी फिल्मों में दुनिया भर के दर्शकों का ध्यान खींचा है। गोवा फिल्मोत्सव में ईरान की 10 फिल्मों का एक विशेष पैकेज प्रदर्शित किया जा रहा है। ‘इराक – इवनिंग ऑफ द टेंथ डे’ की नायिका मरियम सिराजी एक डॉक्टर है और रेडक्रास की ओर से युद्धग्रस्त इराक में घायल लोगों का उपचार करने एक मिशन पर जाती है। 20 साल पहले बमबारी में उसकी छोटी बहन एक सैनिक के हाथ लग गई थी जिससे मिलने के लिए उसकी मां तड़प रही है। एक लंबी और दिलचस्प यात्रा के बाद वह अपनी बहन को खोज निकालती है जिसे उस सैनिक ने अपने बेटी की तरह पाला है। दोनों बहनों के मिलन का एक विलक्षण दृश्य है जिसमें दोनों एक दूसरे की भाषा नहीं जानतीं। सिराज फारसी बोलती है और अरबी नहीं जानती जबकि उसकी बहन रहमान अरबी जानती है और फारसी का एक शब्द भी उसे नहीं मालूम। इराक और ईरान के बीच अमेरिका सेना के कब्जे वाले नो मैन्स लैंड के पास एक पारंपरिक शहर में डॉक्टर सिराज तरह-तरह के लोगों से मिलती हुई अपनी बहन तक पहुंची है। उसका प्रेमी डॉक्टर, उसकी मां को तेहरान से यहां लाने में सफल होता है। सद्दाम के पतन के बाद अमेरिकी सेना के कब्जे में हम जिस इराक को देखते हैं, वह कई तरह के संकटों से जूझ रहा है। कैमरा शहर की तंग गलियों, व्यस्त बाजारों, विशाल कब्रिस्तानों, धूल से भरी सड़कों से होता हुआ इराकी लोगों के दैनिक जीवन को जिस जीवंतता के साथ हमें दिखाता है, वह एक नया सौंदर्य-शास्त्र रचना हुआ लगता है। क्या हम इसे विध्वंस का सौंदर्य-शास्त्र कहेंगे, जिसमें हर दृश्य को एक स्टिल फोटोग्राफ के रूप में देख सकते हैं। ईरान की सिराज और स्वीडन की कैटरीना जिस धैर्य, साहस और उत्साह का परिचय देती हैं, वह सिनेमा में स्त्री की बदलती छवियों का प्रतीक है।
कैमरा कमरा और कमर
कैमरा कमरिया रहा है
आपका कमर का किस्सा
देखने पधारे हैं
कैमरा बतलाइये
कौन सा बढि़या है
बेहतरीन है
ताजातरीन है
इंतजार है
विशेषज्ञों की सलाह का
सलाह वो जो आदेश भी हो।
सलाह या आदेश यहां दीजिएगा
सिनेमा का बाजार और बाजार में सिनेमा : गोवा से अजित राय
नुक्कड़ की सभी सामग्री संदर्भ देकर कहीं भी प्रकाशित की जा सकती है बल्कि प्रकाशित कर आप भागीदार बनिये।
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| Film Socialism |
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| Director Godard |
हरे प्रकाश उपाध्याय : जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में फीचर संपादक बने
कादंबिनी को गुडबॉय
जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में फीचर संपादक बने : मशहूर युवा कवि और पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय ने कादंबिनी, दिल्ली से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने नई पारी की शुरुआत लखनऊ से शीघ्र प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के साथ की है. उन्हें फीचर एडिटर का पद दिया गया है. उनके जिम्मे संपादकीय पेज समेत सभी फीचर व विशेष पेज हैं. हरे प्रकाश दिल्ली को छोड़कर लखनऊ शहर पहुंच चुके हैं और कामकाज संभाल लिया है.
बुराई के पक्ष में
इसे बुरे समय का प्रभाव तो क़तई नहीं
दरअसल यह शाश्वत हक़ीक़त है
कि काम नहीं आई
बुरे वक्त में अच्छाइयाँ
धरे रह गये नीति-वचन उपदेश
सारी अच्छी चीज़ें पड़ गयीं ओछी
ईमानदारी की बात यह कि बुरी चीज़ें
बुरे लोग, बुरी बातें और बुरे दोस्तों ने बचाईं जान अक़सर
उँगली थामकर उठाया साहस दिया
अच्छी चीज़ों और अच्छे लोगों और अच्छे रास्तों ने बुरे समय में
अक़सर साथ छोड़ दिया
काम आती रही बुराइयाँ
बुरी माँओं ने पिलाया हमें अपना दूध
थोड़ा-बहुत अपने बच्चों से चुराकर
बुरे मर्दों ने खरीदी हमारे लिए अच्छी कमीज़ें
मेले-हाटों के लिए दिया जेब-ख़र्च
जिन्होंने बात-बात पर गाली-गलौज़
और मारपीट से ही किया हमारा स्वागत
उन्होंने भगाया हमारे भीतर का लिज़लिज़ापन
और किया बाहर से दृढ़
हमें नपुंसक होने से बचाया
बददिमाग़ और बुरे माने गये साथियों ने
सिखाया लड़ना और अड़ना
बुरे लोगों ने पढ़ाया
ज़िन्दगी का व्यावहारिक पाठ
जो हर चक्रव्यूह में आया काम हमारे
हमारी परेशानियों ने
किया संगठित हमें
जब थक गए पाँव
झूठ बोलकर हमने माँगी मदद जो मिली
झूठे कहलाए बाद में
झूठ ने किया पहले काम आसान
जो बुरी मानी गईं अक़सर
हमारे समाज ने बदचलन कहा जिन्हें
सिखाया करना प्रेम
बुरे गुरुओं ने सिखाया
लिखना सच्चे प्रेम-पत्र
दो कौड़ी के लेमनचूस के लालच में पड़ जाने वाले लौंडों ने
पहुँचाया उन प्रेम-पत्रों को
सही मुक़ाम तक
और बदबूदार पसीने ने घेरा हमें
छोड़ दिया गोरी चमड़ी वाली उन ख़ुशबूदार प्रेमिकाओं ने साथ
बुरी औरतों ने थामा ऐसे वक़्त में हाथ
हमें अराजक और कुंठित होने से बचाया
हमारी कामनाओं को किया तृप्त
बुरी शराब ने साथ दिया बुरे दिनों में
उबारा हमें घोर अवसाद से
स्वाभिमान और हिम्मत की शमा जलायी
हमारे भीतर के अँधेरों में
दो कौड़ी की बीड़ियों को फूँकते हुए
चढ़े हम पहाड़ जैसे जीवन की ऊँचाई
गंदे नालों और नदियों का पानी का आया वक़्त पर
बोतलों में बंद महँगे मिनरल वाटर नहीं
बुरे भोजन
कूड़े पर सड़ते फल और सब्जियाँ
सबसे सस्ते गाजर और टमाटर
बैठे-ठाले लोगों ने
गपोड़ियों ने बचाया संवाद और हास्य
निरंतर आत्मकेंद्रित और नीरस होती दुनिया में
मुझे मेरी बुराइयों को लेकर ही
शिद्दत से याद करते हैं उस क़स्बे के लोग
जहां से भागकर आया हूँ दिल्ली!
घड़ी
एक-सा समय नहीं देतीं
हमारे देश में अभी कुछ बजता है
तो इंग्लैंड में कुछ
फ्रांस में कुछ
अमेरिका में कुछ....
एक देश के भीतर भी सभी
घड़ियों में एक-सा समय नहीं बजता
समलन हुक्मरान की कलाई पर कुछ बजता है
मज़दूर की कलाई पर कुछ
अफ़सरान की कलाई पर कुछ
ठीक-ठीक वही चर्च की घड़ी में नहीं बजता है
मस्जिद की घड़ी को मौलवी
अपने हिसाब से चलाता है
और सबसे अलग समय देती है
संसद की घड़ी
अपनी जेब में रखते हैं
और अपना समय
अपने हिसाब से देखते हैं
पूछने पर अपनी मर्ज़ी से
कभी ग़लत
कभी सही बताते हैं।
अपनी घड़ी अपनी कमर में कसकर
उनके लिए लड़ते थे
जिनके पास घड़ी नहीं थी
और जब मारे गये वे
उनकी घड़ी बिगाड़ दी
उनके चेलों-चपाटों ने
कहना कठिन है अब उनकी घड़ी कहाँ है
और कौन-कौन पुर्ज़े ठीक हैं उसके
अकसर बिगड़ी रहती है
हमारा समय गड़बड़ चलता है
हमारे धनवान पड़ोसी के घर में
जो घड़ी है
उसे हमारी-आपकी क्या पड़ी है!
'ईस्ट इज ईस्ट' के बाद अब 'वेस्ट इज वेस्ट' : गोवा से अजित राय
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| अजित राय |
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| ओमपुरी वेस्ट इज वेस्ट के एक दृश्य में |
‘ग्रासरूट से ग्लैमर’ की यात्रा : ममता बैनर्जी ने किया 41वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का शुभारंभ : गोवा से अजित राय
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| The Union Minister for Railways, Kumari Mamata Banerjee lighting the lamp to inaugurate the 41st International Film Festival (IFFI-2010) at Kala Academy, in Panaji, Goa on November 22, 2010. |

























