नेट पर साहित्य - सुशील कुमार।

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  • Sushil Kumar
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  • नेट पर साहित्य को अभी मानक मिलने में काफ़ी समय लगने की संभावना है क्योंकि साहित्य के पुरोधाओं ने इसे अब तक द्वितीय पंक्ति की चीज मान रखा है और जरुरत के मुताबिक इसका इस्तेमाल किया गया है। यहां केवल वे लोग अक्सर देखे जाते हैं जिनको सरप्लस समय है। सरप्लस पूंजी का उपयोग कर वे संभ्रांत जन में अपना प्रभाव जमाने के लिये इसका उपयोग-उपभोग करते हैं। इसलिये जो नेट पर समर्पित होकर काम कर रहे हैं, उन्हें यहां  निराशा भी  हाथ लगती है। यहाँ चीजे first hand नहीं आतीं। पूर्णिमा वर्मन हो या सुमन कुमार घई जी  ,  इनको साहित्य की अद्यावधि गतिविधियों की जानकारियाँ नहीं रहती। इनकी दुनिया नेट पर संकुचित हो गयी है। हालाकि नेट पर इनके काम काफ़ी सराहनीय है पर यह इस जगह की ही विडम्बना है। अविनाश वाचस्पति जी को ही ले लीजिये, नेट पर समय देने को तैयार हैं अपनी स्वास्थ्य खराब करके भी , पर यह मुगालता पाल रखा है  सर जी ने कि हिन्दी पर बहुत अच्छा काम नेट में हो रहा है।जितने भी अप्रवासी वेबसाईट हैं सब मात्र हिन्दी के नाम पर अब तक प्रिंट में किये गये काम को ही ढोते  रहे हैं, वे स्वयं कोई नया और पहचान पैदा करने वाला काम नहीं कर  रहे , न  कर सकते क्योंकि वह उनके कूबत से बाहर है।

    31 टिप्‍पणियां:

    1. मगर अब साहित्यकारों को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा!
      क्योंकि ब्लॉगिंग अब बहुत लोकप्रिय होती जा रही है!

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    2. विचारणीय विषय. चर्चा और चिंतन की काफी गुंजाइश है. इस पर बातें आगे दूर तक जा सकती हैं . बहुत-बहुत आभार .

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    3. ।जितने भी अप्रवासी वेबसाईट हैं सब मात्र हिन्दी के नाम पर अब तक प्रिंट में किये गये काम को ही ढोते रहे हैं, वे स्वयं कोई नया और पहचान पैदा करने वाला काम नहीं कर रहे , न कर सकते क्योंकि वह उनके कूबत से बाहर है-

      यह चर्चा का विषय है, इससे पूर्णतः सहमत नहीं हुआ जा सकता.

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    4. पश्विम में आज,​ प्रिंट का स्थान बड़ी तेज़ी से e-books ले रही हैं. हमारे यहां भी सभी लेखक, अपने लेखन में कंप्यूटर का प्रयोग करते हैं. तो फिर वे ये उम्मीद कैसे पाले बैठे हैं कि वे लिखेंगे तो कंप्यूटर पर उनका लिखा लोग पढ़ेंगे केवल छपा हुआ. यह कबूतर का, बिल्ली आते देख आंखें मूंद लेने जैसा नहीं है

      आज जो पाठक छपी किताब ख़रीद कर पढ़ता है, उसकी जेब में मोबाइल भी होता है. लेकिन उसे अपने मोबाइल की संभावनाएं अभी पता नहीं हैं, बस. आज जो मोबाइल आ रहे हैं वे इंटरनेट व भारतीय-भाषा-सक्षम मोबाइल हैं. मोबाइल की ही क़ीमत में, किताबें पढ़ने के​ लिए टैबलेट आने लगी हैं जो किताब के साइज़ की ही हैं. बस चार दिन की बात है...जैसे आज हर कोई मोबाइल लिए घूमता है कल इसका प्रयोग पढ़ने के लिए भी करता भी मिलेगा. आने वाले इस कल की, एक बानगी तो आज हवाई यात्राओं में भी देखी जा सकती है.

      बेचारे तथाकथित किताबी लेखक माने बैठे हैं कि कंप्यूटर पर अच्छा माल नहीं डाला जाता और, ये भी कि इंटरनेट पर सब फ़्री ही होता है.

      शायद वे मानने को तैयार नहीं कि किताबों के नाम पर भी खूब कूड़ा छपता है दूसरे, अभी इन्हें पता नहीं कि इंटरनेट पर सबकुछ फ्री नहीं है. यहां भी, ढंग का माल डाउनलोड करने में माल ख़र्च होता है.

      इनकी छपी जयादातर किताबें आज भी लाइब्रेरियों में धकियायी जाती हैं. कल जब वह गली भी बहुत संकरी होने लगेगी तब ये संभ्रांतवाद की ग़तलफ़हमी में जीने वाली जनता सच में ही कंप्यूटर की ओर दौड़ी फिरेगी.

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    5. अच्छा साहित्य सिर्फ किताबो में अब दूर की बात है, नेट पर वो सब मिल रहा है जो ढूढने पर भी किताबो में नहीं मिलता होता होगा जब उपलब्ध ही नहीं तो किस काम का. हमें याद है किताबे छपने के लिए कैसे कैसे मिलाव जुड़ाव झेलना पड़ता था. किसी विषय पर मांग रखो नेट देगा. हा महानुभावों नेट पर भी अच्छा लिखो, तभी अच्छा मिलेगा ना. नेट दोयम नहीं प्रथम हो रहा है इस में दो राय नहीं

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    6. पहली पंक्ति साफ जाहिर कर रही है कि नेट पर साहित्‍य को मानक मिलेगा। फिर मात्र सात दस वर्ष के शिशु से आप यह अपेक्षा क्‍यों कर रहे हैं कि वो सिर्फ इतनी अल्‍पावधि में शिखर पर सवार हो जाए।
      जिन्‍हें आप साहित्‍य का पुरोधा कह रहे हैं वे असलियत में पुरोधा तो हैं ही नहीं, पुरोधा तो कई सौ वर्ष पहले बीत गए हैं। अब जो हैं, वे सिर्फ क्रोधा हैं, मन में झांक लेंगे, तो सही आंक लेंगे।
      इसे द्वितीय पंक्ति की चीज मानना, दूसरे नंबर पर स्‍वीकार करना है। मतलब जरा सी चूक से वे अपनी पहली पंक्ति गंवा बैठेंगे। यही भय काफी है, पहली पंक्ति वालों के लिए और वो भी दूसरी पंक्ति वालों से, क्‍योंकि पहली पंक्ति वाले सिर्फ इस्‍तेमाल करना जानते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। सरप्‍लस समय वाले नहीं, धुन के धनी मौजूद हैं यहां पर, धन के धनी क्‍या गुल खिला रहे हैं, यह प्रिय भाई सुशील भली भांति जानते हैं।
      संभ्रांत जन पर प्रभाव जमाने वाली बात सिरे से ही भ्रांति से लबालब है क्‍योंकि ऐसा नहीं हो रहा है कि लोग हजारों लाखों करोड़ों व्‍यय करके, महंगे आलीशान सभागारों में मंत्रियों, साहित्‍य के पुरोधाओं को बुलाकर उनकी चापलूसी करने में निमग्‍न हैं और न ही स्‍वयं के खर्च से पुस्‍तकों, संग्रहों का प्रकाशन करके, उनकी समीक्षाएं लिखवाकर, लोकार्पण करवाकर, आत्‍म मुग्‍धता में रमे हुए हैं।
      नेट पर समर्पित कोई भी निराश नहीं है। निराश व्‍यक्ति एक दो चार दिन तो समर्पित भाव से कार्य करता रहता है परंतु फिर बाद में निराश होकर, नेट से व्‍यस्‍तता का आडंबर रच कर दूर हो जाता है, और फिर एकाएक अपनी ओर ध्‍यान आकर्षित करने के ध्‍येय से, ध्‍येय जो पावन नहीं है, नामवर सिंह, आलोक कुमार, राजेन्‍द्र यादव सरीखा ब्‍यान जारी करने के लिए, उन्‍हीं के मंच को इस्‍तेमाल करने से भी नहीं चूकता है।
      यहां चीजें जितनी First Hand में आती हैं, उतनी किसी और विधा या माध्‍यम के जरिए संभव नहीं हैं। पुस्‍तकों इत्‍यादि में संग्रहित रचनाएं भी पहले पत्रिकाओं में प्रकाशित करा ली जाती हैं, फिर उन्‍हें पुस्‍तकों में ठूंस ठांस कर रख दिया जाता है।
      नेट के लोग जितना सभी साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी रखते हैं, उतना रखने में भला और कौन संभव है ?
      नेट की दुनिया संकुचित नहीं, अपितु सारी दुनिया को विस्‍तार दे रही है। आपकी इस टिप्‍पणी नेट के अतिरिक्‍त अन्‍य किसी जगह कोई प्रकाशित ही नहीं करता, भाव बेभाव की सोचना तो दूर की कौड़ी है।
      किसी काम को सराहनीय बतलाना और फिर विडंबना करार देना - ये तो घनघोर विडंबना है।
      नेट पर किए जा रहे कार्य को मैं आज भी डंके की चोट पर अच्‍छा ही नहीं, सर्वोत्‍तम कार्य मानता हूं और मानता रहूंगा, और यह अगले दस सालों में सिद्ध हो जाएगा। दस साल कोई बहुत बड़ी अवधि नहीं है, आप भी इसे मानने को विवश होंगे।
      जहां तक मेरे स्‍वास्‍थ्‍य के खराब होने का मसला है, उसका इससे बिल्‍कुल भी संबंध नहीं है, मेरा स्‍वास्‍थ्‍य वर्ष 2005 में हैपिटाइटिस वायरस ग्रस्‍त रक्‍त चढ़ाने के कारण कुछ ठीक नहीं रहता परंतु उतना खराब भी नहीं है, जितना सुशील कुमार जी बिना डॉक्‍टर हुए बतला रहे हैं। इनमें और झोलाछाप डॉक्‍टरों में मुझे कोई अंतर नहीं लग रहा है।

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    7. पहली टिप्‍पणी पूरी स्‍वीकार न किए जाने के कारण शेष अंश यहां प्रस्‍तुत है :-

      आप्रवासी वेबसाइटों पर प्रकाशित साहित्‍य भी प्रिंट में आ रहा है, ऐसा बिल्‍कुल नहीं है कि सिर्फ पुस्‍तकों/पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्‍य ही वेबसाइट पर आ रहा है।
      फिर एक तरफ तो आप इसे समय और स्‍वास्‍थ्‍य खराब करने वाला कार्य मान रहे हैं, दूसरी ओर आप इन अप्रवासी वेबसाइटों को चुपचाप खंगाले भी डाल रहे हैं, अगर ऐसा नहीं करते होते तो आप इतने अधिकारपूर्वक इस तरह का ब्‍यान देने की जल्‍दबाजी नहीं करते। कुछ पढ़ते, फिर कहते और पढ़ लेते तो फिर कहते ही नहीं, क्‍योंकि तब सच्‍चाई से वाकिफ हो जाते।
      जहां तक कूबत की बात है, भाई सुशील कुमार को जान समझ लेना चाहिए कि जो कार्य एक चींटी के बस का है, वो हाथी नहीं कर सकता है। वे हम नेटप्रेमियों को चींटी ही रहने दें, इससे अधिक होने की हमें चाह भी नहीं है और न ही हमें यह मुगालता है कि हम कोई बहुत बड़ा तीर चला रहे हैं। हम तो सिर्फ आपस में सीख ही रहे हैं, जैसा कि वे हमसे और हम उनसे भी अनेक नेक अवसरों पर सीखते ही रहे हैं।
      वे कभी अन्‍य सामान्‍य ब्‍लॉगरों को मिलने वाली खूब सारी टिप्‍पणियों से विचलित भी हो जाते हैं और पोस्‍टें लिखकर तूफान खड़ा कर देते हैं। उन्‍हें यह भी सालता रहा है कि उनकी पोस्‍टों पर कम टिप्‍पणियां आती हैं और वे इसीलिए ब्‍लॉगिंग से किनारा कर बैठे हैं जबकि ब्‍लॉग से वेबसाइट तक का सफर जितनी तेजी से उन्‍होंने तय किया, उतनी तेजी के अन्‍य प्रमाण अभी तक नहीं मिलते हैं।
      मैं उनकी इस पोस्‍ट को अन्‍यथा नहीं ले रहा हूं और विश्‍वास है कि वे भी इस प्रतिक्रिया को सामान्‍य तौर पर ही लेंगे। परंतु जब उन्‍होंने विमर्श के लिए एक विषय दे ही दिया है तो इस पर विमर्श अवश्‍य होना चाहिए। जिसके अच्‍छे परिणाम ही निकलेंगे।
      मैं उनका नाम कदापि टिप्‍पणी में नहीं लेता यदि उन्‍होंने ब्‍लॉगिंग विधा का दीवाना घोषित न कर दिया होता। उनकी टिप्‍पणी का यही आशय मेरी समझ में आया है।

      और यह तय है कि उनकी साढ़े सात पंक्तियों का वक्‍तव्‍य निश्चित ही साढ़े सात हजार पंक्तियों की सार्थक टिप्‍पणियां प्राप्‍त कर लेगा। क्‍योंकि यह नेटप्रेमियों के हिन्‍दी कार्य को झुठलाना और और हिन्‍दी साहित्‍य के प्रति व्‍यामोह को दर्शाता है।

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    8. आप्रवासी वेबसाइटों पर प्रकाशित साहित्‍य भी प्रिंट में आ रहा है, ऐसा बिल्‍कुल नहीं है कि सिर्फ पुस्‍तकों/पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्‍य ही वेबसाइट पर आ रहा है।....
      .....हाँ मैं भी एक अप्रवासी प्रत्रिका 'गर्भनाल' पढ़ती हूँ बहुत ही उम्दा लगी...
      सार्थक प्रस्तुति के लिए आभार

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    9. ब्लोगिंग की दुनिया पूरी तरह स्वतंत्र,आत्म निर्भर और मनमौजी किस्म की है ! यहाँ आप स्वयं लेखक, प्रकाशक और संपादक की भूमिका में होते हैं! ब्लॉग की दुनिया समय और दूरी के सामान अत्यंत विस्तृत और व्यापक है! यहाँ केवल राजनीतिक टिप्पणियाँ और साहित्यिक रचनाएँ ही नहीं प्रस्तुत की जाती वल्कि महत्वपूर्ण किताबों का इ प्रकाशन तथा अन्य सामग्रियां भी प्रकाशित की जाती है . आज हिंदी में भी फोटो ब्लॉग, म्यूजिक ब्लॉग, पोडकास्ट, विडिओ ब्लॉग, सामूहिक ब्लॉग, प्रोजेक्ट ब्लॉग, कारपोरेट ब्लॉग आदि का प्रचलन तेजी से बढ़ा है ! यानी हिंदी ब्लोगिंग आज संवेदनात्मक दौर में है ,जिस प्रकार हिंदी ब्लॉगर साधन और सूचना की न्यूनता के बावजूद समाज और देश के हित में एक व्यापक जन चेतना को विकसित करने में सफल हो रहे हैं वह कम संतोष की बात नहीं है ।आप्रवासी वेबसाइटों पर प्रकाशित साहित्‍य भी प्रिंट में आ रहा है, ऐसा बिल्‍कुल नहीं है कि सिर्फ पुस्‍तकों/पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्‍य ही वेबसाइट पर आ रहा है।

      सुशील जी, आपकी बातों से मैं इत्तेफाक नहीं रखता , अविनाश जी का कहना विल्कुल उचित है कि पहली पंक्ति साफ जाहिर कर रही है कि नेट पर साहित्‍य को मानक मिलेगा। फिर मात्र सात वर्ष के शिशु से आप यह अपेक्षा क्‍यों कर रहे हैं कि वो सिर्फ इतनी अल्‍पावधि में शिखर पर सवार हो जाए।

      हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हर उस ब्लॉगर की महत्वपूर्ण भूमिका है जो बेहतर प्रस्तुतिकरण, गंभीर चिंतन, समसामयिक विषयों पर सूक्ष्मदृष्ट, सृजनात्मकता, समाज की कुसंगतियों पर प्रहार और साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी बात रखने में सफल हो रहे हैं। ब्लॉग लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर ब्लॉग लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हिंदी समाज के लिए शुभ संकेत का द्योतक है।

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    10. अविनाश जी की बात से सहम्त हूँ। धन्यवाद।

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    11. हर समाज की अपनी भाषा और संस्कृति होती है और हर भाषा का अपना साहित्य होता है। हिन्दी भाषा का भी अपना साहित्य और समाज है। कहना न होगा यह समाज और इसका साहित्य अत्यंत समृद्ध रहा है। आधुनिक समय में मीडिया, विज्ञापन, पत्रकारिता और सिनेमा ने हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति की भूमि को उर्वर बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। ब्लाग या चिट्ठा इसी विकास की दुनिया का नवीनतम माध्यम है और ब्लागिंग या चिट्ठाकारिता लेखन या मीडिया की नई विधा।

      अंतरजाल की गहराईयों में गहरे उतरकर तो देखिये, अनगिनत साहित्य रुपी मोती आपको प्राप्त हो जायेंगे,किताब या पत्रिका की तुलना में इसकी पहुँच अधिक और तेज होने के कारण यह कई मामलों में पुराने मीडिया माध्यमों से बेहतर है।

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    12. bouth he aaha post hai aapkaa.... aache jankari hai is post mein thx...

      Everyday Visit Plz...... Thanx
      Lyrics Mantra
      Music Bol

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    13. नेट पर साहित्य ..ओह विषय ही भयंकर है ...क्योंकि साहित्य कहता है कि नेट कुछ नहीं और नेट जो कहता है वो नेट पर ही कहता है ...और कमाल की बात देखिए कि जो साहित्य अपने वजूद के आगे नेट का वजूदहीन या गैर मौलिक मानता साबित करता है वही हर बार खुद ये अतिक्रमण करके ..नेट पर ये बात कहने आ जाता है । हालांकि कुछ बेहद संपादक प्रकाशक अपनी भडास को अपने समाचार पत्रों में छाप चुके हैं मगर वही प्रबुद्ध लोग जवाब में लिखी गई पोस्ट को पढने का ताव भी न ला सके ।

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    14. अब अगली बात - भाई अविनाश वाचस्पति जी ने मुगालता पाल रखा है ............अब ये तो पाठक खुद तय कर लें कि मुगालता किसने पाल रखा है ..तो उन्हें ही करने भी देना चाहिए ..वे कर भी लेंगे बखूबी ....उन्हें कौन सा यहां साहित्यकार , ज्ञानी पुरूष ,या एलीट क्लास का तमगा मिलने वाला है । अभी सरकार ने कोई पुरूस्कार भी शुरू नहीं किया कि अगला ..जो ब्लॉगर ही कहलाएगा ..ब्लॉग शिरोमणि या फ़िर ब्लॉग केसरी की उपाधि लिए हुए ...सर की उपाधि सा फ़ील करे ..तो हर बार फ़िर ये जहमत साहित्य के जिम्मे ही क्यों आ जाता है कि वो तय करने लगता है कि साहित्य कौन है कहां है और किनके दम पे है

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    15. वैसे भी ये तय करने का हक साहित्यकारों ने ही suo motto अपने पास रख लिया है कि ...हम लिखें तो कालजयी और दूसरा तो मस्तराम ही होगा ...यकीन जानिए उन मस्तरामों की नज़र में ..हमारा सभ्य साहित्य भी उतना ही कचरा है जितना कि हमारी नज़र में वे ..मगर उसका प्रसार और आकार ..इतना दैत्याकार है कि ....जाने क्या क्या लीले बैठा है .....

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    16. दुनिया नेट पर संकुचित हो गयी है.................

      ऐसा निष्कर्ष आपने निकाला हो सकता है हमें तो लगता है कि नेट से दुनिया का विस्तार हुआ है ...बेशक भौतिक दुनिया का न सही आभासी का ही सही .....कादम्बिनी , हंस सरीखी साहित्यिक पत्रिकाएं आप उतनी सहजता से और उतना ही शीघ और संप्रेष्य बना कर ..पेश करने कोई बेहतर जुगत हो तो बताएं । वैसे भी हिंदी ब्लॉगिंग के सिर्फ़ पांच साल के अल्प इतिहास में आप लोग ..उसे पिछले सौ साल के हो चुके साहित्य से जबरन ही मुर्गा लडान कराने पर क्यों तुले हैं ये फ़िलहाल समझ से परे है ..या शायद इसलिए कि कम से कम अंतर्जाल पर भी कुछ लोगों को याद तो रहे कि ..इसके परे भी कोई साहित्य है .....

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    17. अजय भाई, .
      आपने तो इस पोस्ट के विरुद्ध पूरी भड़ास निकाल ली , कुछ छोड़ा ही नहीं किसी और के लिए , वैसे आप से पूरी तरह सहमत हूँ और अविनाश जी से भी !

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    18. एक कहावत है कि अगर पत्थर फेंके जाने लगें तो समझो पेड़ में फल आने लगे हैं, लगता है वेब पर हिंदी साहित्य का काम करनेवालों की मेहनत में फल आ गए हैं। बात तो ठीक है... भारतीय लेखकों को वेब की अद्यतन जानकारी नहीं होती और हमें भारतीय लेखन की। यह स्वाभाविक है, इसमें आलोचना की कोई बात नहीं है। एक दूसरे के साथ सहयोग कर के ही हम हिंदी का विकास कर सकते हैं पत्थर फेंक कर नहीं। वैसे सुशीलकुमार जी हैं कौन? कृपया वेब पर यह जानकारी अद्यतन करें। जो आप्रवासी को अप्रवासी लिखते हैं, जिनको सही हिंदी तक लिखना नहीं आता वे साहित्य की बात करते हैं, पहले भाषा तो सीखें....

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    19. नेट पर साहित्य एक ऐसा विषय है जिस पर अभी काफी विमर्श करना शेष है| ये एक दिन में दिया जाने वाला फैसला नहीं है| यह साहित्य अभी अपना आकार ले रहा है इसलिए जल्दबाजी में इसे सिरे से खारिज कर देना अपनी अल्पज्ञता का ही सूचक है | कम्प्यूटर तो एक यन्त्र मात्र है जिसका प्रयोग उपयोग कर्ता के हाथो सुरक्षित है| हम इस मुगालते में क्यों जी रहे हैं कि नेट का साहित्य साहित्य नहीं | लेखकों ने केवल अपने उपादान ही बदले है अपने सरोकार नहीं| मुद्दे तो वही उठाये जारहे है जो बेहद बाजिब है और सार्थक |अब इससे क्या फर्क पढ़ता है कि हम नेट पर लिखे या प्रिन्टमीडिया में \ हाँ अभी बचपन और प्रोढ की तुलना नहीं की जानी चाहिए | शिशु को उसके शैशव में ही मूल्यांकित किया जाना चाहिए|

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    20. मैंने साहित्य पर कोइ शोध तो नहीं किया है पर एक पाठक के रूप में अपनी बात कहूँ तो आपसे पूर्ण असहमति है.. अब अपने आपको ज्ञानी साबित करने के लिए हमारा "डा. नामव...गेन्द्र ठाकुर" इत्यादि पर लिखना जरूरी है... जो उनपे नहीं लिख रहा वो ज्ञानी नहीं है?
      नेट को 'सभ्रांत' बताना तो कूपमंडूकता ही होगी.. आज गली का दसवीं का लौंडा जिसने 'कादम्बिनी/हंस या ऊपर वाले गणमान्यों का नाम भी न सुना होगा और न सुनने में जिसकी रुचि है, वो भी इंटरनेट इस्तेमाल कर रहा है.. जाल है यह.. आज न कल वह हिन्दी की दुनिया मन भी घुसेगा ही.... और फिर साहित्यिक पत्रिकाओं की ही पहुँच कितने 'आम' पाठक तक है गाँव-देहात के लोगों अथवा कम पढ़े लोगों को तो छोड़ ही दीजिए विश्विद्यालयों के कितने छात्र साहित्यिक किताबें खरीद के पढते हैं? आज जिस गाँव से १०-२० किमी दूर तक एक किताब की दूकान नहीं है वहाँ मोबाइल ज़रूर है.. इसलिए जनाब 'सभ्रांत' तो मै 'पुस्तकीय साहित्य' को मानता हूँ.
      दूसरी बात भाषा और साहित्य कभी भी स्थिर नहीं रहे हैं... हो सकता है कि जो हल्का-फुल्का साहित्य आज नेट पर लिखा जा रहा है वही कल का साहित्य हो... 'प्रगतिशील साहित्य' भी जब शुरू हुआ था तो लोग ऐसे ही भौंह चढाते थे इसपर...
      और अभी समय कितना हुआ है? बच्चे को जरा खाने-पीने, मुटाने दीजिए... फिर कुश्ती करवाइयेगा कौन बरियार है :)

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    21. "जो नेट पर समर्पित होकर काम कर रहे हैं, उन्हें यहां अक्सर निराशा भी हाथ लगती है" आप की इस बात से सहमत हूँ लेकिन जितने भी अप्रवासी वेबसाईट हैं सब मात्र हिन्दी के नाम पर अब तक प्रिंट में किये गये काम को ही ढोते रहे हैं वाली बात मुकम्मल तौर पे सही नहीं लगती.
      .
      कुछ इधर की कुछ उधर की
      शारीरिक संबंधों को सहमती देनी
      जौनपुर शिराज़ ए हिंद भाग १

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    22. मैं देख रहा हूं कि कई मैग्जिन वालों की दुकाने ब्लॉग जगत से ही चल रही हैं।

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    23. सुशील कुमार जी ने जो अपनी राय व्यक्त की उस पर एक स्वस्थ बहस होनी चाहिए ना कि व्यक्तिगत टीका टिप्पणी । और सुशील जी को भी किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप से बचना चाहिए । ब्लॉगिंग फालतू समय वालों के लिए बल्कि उनके लिए है जो शौक रखते हैं ।ब्लॉगिंग दिल से होती है टाईम पास के लिए नहीं । इस पर स्वस्थ बहस करके सुशील जी को जबाव दिया जाना चाहिए ।

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    24. इस लेख में अपने आपको साहित्यकार समझने वालों की झुंझलाहट साफ़ झलक रही है ,इनकी इस झुंझलाहट से ही ब्लोगिंग की ताकत को समझा जा सकता है

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    25. आदरणीय गुरुजनों और मित्रो ,
      मैं तो इतना जानता हूँ की , आज जितनी हिंदी नेट पर पढ़ी जाती है , उतनी कही भी किसी भी किताब या magazine में नहीं पढ़ी जाती [ मैं ट्रेन में पढने वालो की बात नहीं कर रहा हूँ , मैं गंभीर रूप से पढने वालो की बात कर रहा हूँ ] ..जिसे भी थोडा भी हिंदी साहित्य में रूचि है आज वो नेट पर है ...और नेट से ज्यादा अच्छे और स्वतंत्र और स्वस्थ अभिव्यक्ति कहीं नहीं है , और देखा जाए तो पिछले ५ वर्षो में जितने अच्छे लेखक और कवी हिंदी साहित्य को , नेट के कारण मिले है वो पिछले २५ सालो में magazines को नहीं मिल पाए है और ये संभव हुआ है सिर्फ नेट पर हिंदी साहित्य की असीमित संभावनाओ के कारण. मुझे अपना ही उदहारण याद आ रहा है की , पहले मेरी कविताये नेट पर /ब्लॉग पर छपी और पढ़ी गयी , और फिर हंस और दूसरी सारी पत्रिकाओ में छपी . आज के हिंदी लेखक या कवी को इससे पहले ये ख़ुशी कभी हासिल नहीं हुई , क्योंकि पहले तथाकथित हिंदी साहित्य के ठेकेदारों ने अपना दबदबा बन रखा था साहित्य जगत पर. .. और सुशील जी आप inferiority complex के शिकार है , पहले बहुत से नवजात कवी और लेखको पर अपना निशाना साधा [ जैसे की मैं .. याद है आपको , मैं आज तक नहीं भूला हूँ. वो तो धन्यवाद समीर जी की की उन्होंने एक अपने एक लेख में मेरे बारे में लिखकर मुझे फिर से लिखने की प्रेरणा दी, वो तो धन्यवाद प्राण शर्मा जी का और दुसरे सारे साहित्यकारों का जिन्होंने मुझे हमेशा पसंद किया और मुझे प्रेरित किया ] , लेकिन आज तो आप बहुत आगे निकल गए , आदरणीय पूर्णिमा जी के बारे में कह डाला , गुरु जी अविनाश जी के बारे में कह डाला [ वो जरुर कहते होंगे ... you too brutaas ] ...... आप अपने हिंदी साहित्य से जुड़े रहिये , किसी के बारे में मत कहिये ... हिंदी साहित्य को जहाँ जाना है , वहां वो जा रहा है और अगर आप आनेवाले १० साल जीवित रहे तो देखियेंगा की प्रिंट के अलावा नेट पर भी हिंदी साहित्य को बोलबाला होंगा . और मैं तो यही कहूँगा की हिंदी साहित्य अब सिर्फ नेट पर ही ज्यादा उपलब्ध होंगा . आज ब्लॉग्गिंग बहुत ही सशक्त माध्यम है और भारत को हिंदी ब्लोग्गेर्स की बहुत जरुरत है .. आप अपनी सुधि देखिये , बाकी , हम तो भारत के हिंदी ब्लोग्गेर्स है , हिंदी साहित्य को जहाँ ले जाना है , वहां तो ले ही जायेंगे .. मुझे तो शक होता है की आप सही में हिंदी को प्रेम करते है , क्योंकि अगर ऐसा होता तो आप अविनाश जी को कभी कुछ नहीं कहते .. आज हिंदी ब्लॉग्गिंग में और हिंदी साहित्य में उनका योगदान , बहुत ही ज्यादा है ...बाकी तो मुझे कुछ नहीं कहना है क्योंकि , हिंदी ब्लॉग्गिंग करना है हिंदी साहित्य को आगे ले जाना है .. प्राणाम !!!

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    26. हन्दी ब्लोगिंग जगत की एक छोटी से बूँद होने के नाते सर्वप्रथम तो समग्र अध्ययन के पश्चात् मैं निष्पक्ष रूप से श्री अविनाश जी और रवींद्र प्रभात जी की बातों से अक्षरशः सहमत हूँ. हिंदी साहित्य और ब्लोगिंग के समर्थन में कुछ कहने की मैं कोई जरूरत नहीं समझता क्योंकि ये विषय सर्वविदित है. हर प्रिंट पत्रिका, अखबार या किसी भी स्तर पर किसी ने भी इस नकारा नहीं है, बल्कि इससे हिंदी के प्रचार-प्रसार और संवर्धन हेतु सराहा ही है साथ ही इसे माध्यम बनाकर अपने स्वयं को भी सराहा है..चूँकि ये अभी में शिशुकाल है तो वाजिब है अविनाश जी के कहेनुसार कि कम से कम दस साल तो लगेंगे ही. १८ साल से पहले तो व्यक्ति भी वयस्क भी नहीं गिना जाता...फिर भी हिंदी ब्लोगिंग ने इस क्षेत्र में एक वयस्क के स्तर का काम किया है. शायद वो इसे देख नहीं पाए..! मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आने वाले साल स्वयं सुशील कुमार जी को उनके वक्तव्य का जवाब निश्चिन्त तौर पर दे ही देंगे.
      कहना चाहूँगा कि कोई भी प्रतिक्रिया दो तरह से दी जा सकती है.. एक- विशुद्ध और समग्र मंथन द्वारा किसी निष्कर्ष तक पहुँच कर और दूसरी- व्यक्तिगत कुंठाग्रस्त.
      अँधेरे में जितनी दूर टोर्च की रोशनी दृश्य दिखाती है, क्या आस-पास के अँधेरे में कुछ भी नहीं? है ! निश्चिन्त तौर पर है, जरूरत है वहाँ तक नज़र की पहुँच होने की. जो कि सच है.
      सम्मानीय सुशील कुमार जी ने भी अपनी तथाकथित वक्तव्य को कहने के लिए जिस माध्यम को चुना, शायद वो उसी की बात कर गए..! दृष्टिकोण क्या रहा होगा, शायद हिंदी ब्लॉग्गिंग से जुड़े छोटे-मोटे हम जैसे साहित्य से जुड़े लोग इतना तो समझते ही हैं. माना कि आपकी कुछ व्यक्तिगत कुंठाएं या जो भी अनुभूति हों, रही होगी.. फिर आपतो साहित्य के पुरोधा हैं, इस लिहाज़ से आप को तो लाज़मी है सब जानकारी रही ही होगी पहले से ही नेट जुड़े साहित्य और साहित्यकारों तथा समर्पित लोगों के शायद इस छिछोरे समर्पणयुक्त प्रयासों की. फिर सर्वप्रथम तो प्रश्न यही उठता है कि आपने हिंदी ब्लॉग्गिंग (जिसके सम्मान में आपने अपने की व्यथा लिखी है) में प्रवेश करने से पूर्व अपने इस प्रतिक्रिया से विपरीत सोचकर ही कदम रखा होगा ये तो मैं निश्चिन्त तौर पर कह सकता हूँ. खैर..!.. अब आपके सोच का टर्न U है या कुछ और..और क्यों है? आप जाने.. हम तो जान चुके हैं.
      अंत में सम्मानीय सुशील कुमार जी से इतना ही कहना चाहूँगा कि अविनाश जी, पूर्णिमा वर्मन जी, रति सक्सेना जी जैसे लोग जितना प्रिंट में काम करते हैं उतना ही नेट पर भी..और दोनों क्षेत्रों में अपनी कुशल क्षमताओं का परिचय दिया है. इससे उनकी क्षमताओं को पहचाना जा सकता है..आप शायद पहली जगह निराश रहे होगे तो दूसरा ऑप्सन चुना और जब दूसरे में भी निराश रहे तो.. पुनः लौट कर इस पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं. तो फिर आप कहाँ हैं? हम जानना चाहेंगे..!
      काश आप इस विषय पर अपना आंकलन निष्पक्ष और बिना किसी कुंठा के कर पाते तो इस क्षेत्र में और गहन अनुसन्धान आपका सम्मान बढ़ाता और आप इसी विषय की तारीफों के कशीदे गढ़ते.
      किसी भी बड़े काम में ऐसी परिस्थितियाँ और लोग सामने आते हैं. इससे यही तातीजा निकलता है कि हम सब नेट के जरिये हिंदी और साहित्य दोनों के लिए बेहतर काम कर रहे हैं..और करते रहेगे.
      और भी बहुत है जो लिखना चाहता हूँ.. पर समस्त गुनीजनो ने इतना तर्कयुक्त कहा है कि मैं जितना भी कहूँ कम ही होगा..!
      सम्मानीय सुशील कुमार जी, आशा है कि आप इन बातों को व्यक्तिगत नहीं लेंगे, विषयांतर नहीं होंगे..! व्यक्तिगत तौर पर आपका सम्मान है हम सभी के दिलों में.. पर किसी पर भी आप कृपया व्यक्तिगत प्रतिक्रिया न दें, जैसी कि आपने श्री अविनाश जी के स्वास्थ्य सम्बन्धी दी, तो आपका सम्मान और बढेगा..श्री अविनाश जी तो हम सबके लिए डॉ. कोटनीस की तरह है. बेहद मुश्किल है उन जैसा बनना !
      समस्त हिंदी ब्लोगर्स और उनके वन्दनीय कृत्यों को मेरा नमन !

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    27. मित्रों … नेट का महत्व आज साहित्य से जुड़े लगभग सभी लोग पहचानते हैं और मानते हैं। मेरा मानना है कि जैसे प्रिण्ट में अच्छा, बुरा और कूड़ा सब है वैसे ही नेट पर। एक सुधि पाठक को 'सार-सार को गहि रहै' वाली नीति अपनानी चाहिये।

      और सुशील जी…यह मैं इस हक़ से कह सकता हूं कि मैं दोनों माध्यमों में पर्याप्त सक्रिय हूं।

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    28. ब्लॉगिंग को एक मॅल्टीपरपॅज़ यूटिलिटी-टूल का रूप दिये बिना इसे आम पाठक तक ले जाने की कल्पना अभी तो सपना ही है, फिर यह पूर्वानुमानित अरण्य-रोदन क्यों ?
      नेट को मैं एक मॅल्टीपरपॅज़ यूटिलिटी-टूल के रूप में देखता हूँ, ब्लॉगिंग माध्यम को एक सार्थक उपयोगी टूल साबित किये बिना इसे आम पाठक तक ले जाने की कल्पना अभी तो सपना ही है, फिर साहित्य के मानकों पर खरे उतरने के लिये ऎसा पूर्वानुमानित अरण्य-रोदन क्यों ?
      अजय कुमार झा जी की दो टूक बातों में दम है, क्योंकि आम पाठक के नज़रिये से देखें तो.. .. जब तक हम उन्हें मनोरँजक सामग्री, अच्छा साहित्य, चुनींदा पुरालेख, बेहतरीन शायरी, प्रगतिशील कविताओं, महत्वपूर्ण ऎतिहासिक अभिलेखों, विविध विषयों का एक ठोस डाटाबेस तैयार कर के नहीं देते, तब तक वह आम पाठक या आम जनता ब्लॉगिंग को एक अनुपयोगी ( non-productive ) बुद्धिविलास से अधिक का महत्व नहीं देगी !

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    29. उपरोक्त टिप्पणी में दोहराव के लिये खेद है !
      ब्लॉगिंग को एक मॅल्टीपरपॅज़ यूटिलिटी-टूल का रूप दिये बिना इसे आम पाठक तक ले जाने की कल्पना अभी तो सपना ही है, फिर यह पूर्वानुमानित अरण्य-रोदन क्यों ?

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    30. ब्‍लॉगिंग और साहित्‍यकारी न छुड़वा दी सबकी तो कहना, बात करते हैं सुशील कुमार सर के बारे में।

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
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