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फ़ज़ल इमाम मल्लिक को राजीव गांधी एक्सिलेंस अवार्ड


उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी समाचार पत्रिका ‘सीमापुरी टाइम्स’ ने युवा साहित्यकार, स्तंभकार और पत्रकार ़फ़ज़ल इमाम मल्लिक को साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में उलेखनीय योगदान के लिए ‘राजीव गांधी एक्सीलेंस अवार्ड-२०११’ से नवाजा। सम्मान दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित समारोह में केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने दिया। सम्मान के तौर पर उन्हें एक स्मृति चिन्ह और सनद दिया गया। इस मौके पर कांग्रेस सांसद अनु टंडन भी मौजूद थीं।
बिहार के शेख़पुरा जिले के चेवारा के निवासी ़फ़ज़ल इमाम मल्लिक दिली से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ से जुड़े हैं। उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘सनद’ और ‘ऋंखला’ का संपादन भी किया। इसके अलावा काव्य संग्रह ‘नवपलव’ और लघुकथा संग्रह ‘मुखौटों से परे’ का संपादन भी कर चुके हैं। दूरदर्शन के उर्दू चैनल से उन पर एक ख़ास कार्यक्रम ‘सिपाही सहाफत के’ प्रसारित भी हुआ है। इससे पहले पिछले हफ्ते उन्हें दिल्ली में ही आयोजित एक समारोह में रोशनी दर्शन पत्रिका ने दस साल पूरे करने के मौके पर उन्हें ‘चित्रगुप्त सम्मान’ से नवाज चुकी है।
बतौर खेल पत्रकार जनसत्ता से जुड़े फ़?ाल इमाम मल्लिक ने क्रिकेट और हाकी के ्िसव कप मैचों को तो कवर किया ह७ी दूसरे खेलों के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को भी कवर किया है। दूरदशर््न के राष्ट्रीय नेटवर्क के लिए फुटबाल, टेनिस, एथलेटि?स, बास्केटबाल और फुटबाल के मैचों में बतौर कमेंटेटर भी मैचों क८ा आंखो देखा हाल भी बयान किया है। राष्ट्रीय सहारा के उर्दू चैनल में बतौर खेल विशेषज्ञ भी जुड़े रहे हैं।
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नुक्‍कड़ के फेसबुक बटन को पसंद कीजिए

नुक्‍कड़ की अधिक पहुंच बढ़ाने के पावन उद्देश्‍य से नुक्‍कड़ का एक पेज फेसबुक पर बनाया गया है क्‍योंकि अभी इस संबंध में पूरी जानकारी मुझे नहीं है। इसलिए ऐसे साथियों की जरूरत है जो इस पेज का निर्माण भली भांति कर सकें जिससे इसका अधिकाधिक लाभ मिल सके और उपयोग हो सके।

तो पहले कदम के तौर पर आप पसंद कर लीजिए और दूसरे कदम के तौर पर जो तकनीकी तौर पर सक्षम हों, वे सूचित करें तो उन्‍हें फेसबुक के नुक्‍कड़ पेज के एडमिन अधिकार सौंप दिए जाएंगे।

जय फेसबुक
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देश भर के 13 स्कूली बच्चों को बाल भारती निबंध प्रतियोगिता पुरस्कार


देश भर के 13 स्कूली बच्चों को बाल भारती निबंध प्रतियोगिता-2010 के पुरस्कार दिए गए। प्रथम पुरस्कार के लिए दिल्ली के मोहम्मद साकिब खान, दूसरे पुरस्कार के लिए गुड़गांव की सविता और तीसरे पुरस्कार के लिए दिल्ली की ही गौरी श्रीवास्तव के निबंधों को चुना गया। अन्य 10 बच्चों को प्रोत्साहन पुरस्कार दिए गए। ये हैं- पूर्वा, प्रियम स्नेह, चारुता गुप्ता, ऋषभ गर्ग, सौहार्द डोभाल, राजा विक्रम, मो. अनस राजा, कु. उमा देवी, दुष्यंत कुमार फेकर और शुभम तिवारी।

सभी विजेता बच्चों को प्रमाण पत्रों के साथ पुरस्कार राशि भी दी गई। ये पुरस्कार, कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सलाम बालक ट्रस्ट की अध्यक्ष श्रीमती प्रवीण नायर ने दिए। तेरह विजेता बच्चों में सोनभद्र, लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश), सीवान (बिहार), दुर्ग (छत्तीसगढ़), उत्तरकाशी (उत्तराखंड), टोंक (राजस्थान), पटना (बिहार), भोपाल (मध्य प्रदेश), रांची (झारखंड) जैसे दूर शहरों के प्रतियोगी भी शामिल हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव (नीति एवं प्रशासन) श्री खुर्शीद अहमद गनई समारोह में विशेष अतिथि थे।

बाल दिवस के मौके पर राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता में इस बार विषय रखा गया था- 'बढ़ते लोग, घटता पानी'। देश भर के करीब एक हजार स्कूली बच्चों ने इसमें भाग लिया। निबंधों का मूल्यांकन भाषा, अभिव्यक्ति और प्रस्तुति के आधार पर किया गया।

मुख्य अतिथि श्रीमती प्रवीण नायर ने समाज के वंचित बच्चों के साथ अपने काम के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बच्चों को बधाई देते हुए आशा जताई कि वे पढ़-लिख कर जीवन में ऊंचा मुकाम हासिल करेंगे और समाज की बेहतरी के प्रयास करेंगे।

विशिष्ट अतिथि श्री गनई ने कहा कि तकनीकी विकास का पढ़ने की अभिरुचि पर बुरा असर नहीं पड़ने देना चाहिए, बल्कि तकनीक को इसे बढ़ावा देने का औजार ही बना लेना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि अब तकनीक से दूर रहने का कोई औचित्य नहीं है।

दूरदर्शन न्यूज के महानिदेशक समाचार, श्री एस एम खान भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत प्रकाशन विभाग की अपर महानिदेशक श्रीमती अरविंद मंजीत सिंह ने किया। उन्होंने बताया कि बालभारती की प्रसार संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा है। पिछले 63 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही बाल भारती मनोरंजक और ज्ञानवर्धक के साथ ही यह पत्रिका बच्चों और किशोरों की प्रतिभा के विकास के लिए रचनात्मक अभियान भी चलाती रहती है।। वार्षिक निबंध और नियमित चित्रकला प्रतियोगिताएं और दूसरी गतिविधियां इसी अभियान का हिस्सा हैं जो बच्चों को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी की प्रेरणा देती हैं। इसमें पाठकों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। बदलते समय के साथ पत्रिका का कलेवर, प्रस्तुतीकरण भी बदला है। फिर भी पत्रिका की कीमत सिर्फ आठ रुपए है।

 सूचना और प्रसारण मंत्रालय के गीत एवं नाटक प्रभाग ने इस अवसर पर बच्चों की रुचि के अनुरूप सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया।

बाल भारती पत्रिका के वरिष्ठ संपादक श्री वेदपाल ने कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन किया।

बालभारती के अलावा, हर वर्ग और और भाषा-भाषी के लिए किफायती दरों पर पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य के साथ प्रकाशन विभाग हर माह 13 भारतीय भाषाओं में कुल 18 पत्रिकाएं छापता है। राष्ट्रीय विकास को दर्शाती 'योजना' पत्रिका 13 भाषाओं में निकलती है। इसके अलावा विभाग हिंदी और अंग्रेजी में ग्रामीण विकास की पत्रिका 'कुरुक्षेत्र', तथा हिंदी, और उर्दू में साहित्यिक पत्रिका 'आजकल का प्रकाशन भी करता है। रोजगार समाचार (हिंदी और उर्दू) तथा एंप्लॉयमेंट न्यूज (अंग्रेजी) इसके विशिष्ट पाक्षिक हैं जो बेहतर रोजगार चुनने और पाने में युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं।

नुक्‍कड़ समूह बाल भारती पत्रिका के इस सफल प्रयास की सराहना करता है और सब बच्‍चों को बधाई देता है कि वे अपनी रचनात्‍मक प्रतिभा के विकास में और भी बढ़ चढ़कर भाग लें। जो बच्‍चे हिन्‍दी ब्‍लॉग लेखन के संबंध में जानने के इच्‍छुक हों, वे भी nukkadh@gmail.com पर ई मेल संदेश भेजकर अपनी रुचि जाहिर कर सकते हैं।
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देखिये निकम्मी सरकार की बेरुखी

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अंडमान में ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी

लोकार्पण का चित्र
अंडमान में 'सरस्वती सुमन' के लघु कथा विशेषांक का विमोचन और ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चेतना’ के तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे.

कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के लघुकथा विशेषांक के विमोचन से हुआ. इस विशेषांक का अतिथि संपादन चर्चित साहित्यकार और द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया है. अपने संबोधन में मुख्य अतिथि एवं द्वीप समूह के प्रधान वन सचिव श्री एस.एस. चौधरी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट के कारण चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है । ऐसे में साहित्यकारों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण अभियान शुरू करना चाहिए । उन्होंने कहा कि आज के समय में लघु कथाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विधा में कम से कम शब्दों के माध्यम से एक बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं और 10 सारगर्भित आलेखों को समेटे सरस्वती सुमन के इस अंक का सुदूर अंडमान से संपादन आपने आप में एक गौरवमयी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.

युवा साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में लघुकथाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए एवं साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये। श्री यादव ने समाज के साथ-साथ साहित्य पर भी संकट की चर्चा की और कहा कि संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता की बजाय साहित्य जटिल उपमानों और रूपकों में उलझा जा रहा है, ऐसे में इस ओर सभी को विचार करने की जरुरत है.

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर ने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में समग्रता के स्थान पर सीमित सोच के कारण उन विषयों पर लेखन होने लगा है जिनका सामाजिक उत्थान और जन कल्याण से कोई सरोकार नहीं है । केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के निदेशक डा. आर. सी. श्रीवास्तव ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज बड़े पैमाने पर लेखन हो रहा है लेकिन रचनाकारों के सामने प्रकाशन और पुस्तकों के वितरण की समस्या आज भी मौजूद है । उन्होंने समाज में नैतिकता और मूल्यों के संर्वधन में साहित्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला । डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय ने अंडमान के सन्दर्भ में भाषाओँ और साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ हिंदी का एक दूसरा ही रूप उभर कर सामने आया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का एक विज्ञान है और यही उसे दृढ़ता भी देता है.

अंडमान से प्रकाशित एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'द्वीप लहरी' के संपादक डा. व्यास मणि त्रिपाठी ने ने साहित्य में उभरते दलित विमर्श, नारी विमर्श, विकलांग विमर्श को केन्द्रीय विमर्श से जोड़कर चर्चा की और बदलते दौर में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने साहित्य पर हावी होते बाजारवाद की भी चर्चा की और कहा कि कला व साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना होगा। पूर्व प्राचार्य डा. संत प्रसाद राय ने कहा कि कहा कि समाज और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से यदि किसी एक पर भी संकट आता है, तो दूसरा उससे अछूता नहीं रह सकता।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘‘सरस्वती सुमन’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक डाॅ0 आनंद सुमन सिंह ने पत्रिका के लघु कथा विशेषांक के सुन्दर संपादन के लिए श्री कृष्ण कुमार यादव को बधाई देते हुए कहा कि कभी 'काला-पानी' कहे जानी वाली यह धरती क्रन्तिकारी साहित्य को अपने में समेटे हुए है, ऐसे में 'सरस्वती सुमन' पत्रिका भविष्य में अंडमान-निकोबार पर एक विशेषांक केन्द्रित कर उसमें एक आहुति देने का प्रयास करेगी. उन्होंने कहा कि सुदूर विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएं घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोगों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अनुराग बढ़ रहा है, वह चिन्ताजनक है एवं इस स्तर पर साहित्य को प्रभावी भूमिका का निर्वहन करना होगा। उन्होंने रचनाकरों से अपील की कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य समाज के निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डा. सिंह ने द्वीप समूह में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए और स्व. सरस्वती सिंह की स्मृति में पुस्तकालय खोलने हेतु अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव दुर्ग विजय सिंह दीप ने अतिथियों और उपस्थिति का स्वागत करते हुए आज के दौर में हो रहे सामाजिक अवमूल्यन पर चिंता व्यक्त की । कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने किया और संस्था की निगरानी समिति के सदस्य आई.ए. खान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न द्वीपों से आये तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

प्रस्‍तुति : दुर्ग विजय सिंह दीप
संयोजक- 'चेतना' (सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था)
उपनिदेशक- आकाशवाणी (समाचार अनुभाग)
पोर्टब्लेयर -744102 


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सुरेन्द्र प्रताप सिंह स्मृति समारोह आज, आइये एस.पी को याद करें

आधुनिक भारतीय पत्रकारिता के महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. की 14वीं बरसी पर उन्हें याद करते हुए दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस दौरान कॉरपोरेट मीडिया से बाहर, मास मीडिया के जो महत्वपूर्ण प्रयोग हो रहे हैं, उस बारे में बात की जाएगी। आप जरूर आएं।

वक्ता:

अचला शर्मा- बीबीसी से पुराना रिश्ता रहा

आनंद स्वरूप वर्मा- फिल्मकार और संपादक, ‘समकालीन तीसरी दुनिया’

जगदीश यादव- फोटो संपादक, इन दिनों वाल-न्यूजपेपर के कुछ अनूठे प्रयोग कर रहे हैं

आशीष भारद्वाज- न्यू मीडिया की संभावनाओं को लेकर सशंकित हैं

संचालन और बीज वक्तव्य : डॉ. आनंद प्रधान- मीडिया विश्लेषक


तारीख- 27 जून, 2011, समय- शाम 6.30 बजे

स्थान – अमलतास हॉल, इंडिया हैबिटेट सेंटर, लोधी रोड, नई दिल्ली (नजदीकी मेट्रो स्टेशन - जोर बाग़)

आयोजक - मीडियाखबर डॉट कॉम

संपर्क- pushkar19@gmail.com , 9999177575
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कुकुरमुत्ते की तरह फैलते मीडिया संस्थान

कुकुरमुत्ते की तरह फैलते मीडिया संस्थान: "सच है कि शुरूआती दौर में संचार को अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने वालों के पास कोई माध्यम, मीडिया को लेकर शैक्षिक व तकनीकी योग्यता नहीं रहा था। फिर भी शुरूआती दौर में जो काम हुआ एक मकसद के साथ। जन संचार के माध्यम मीडिया को जन हथियार बनाया गया और इसके माध्यम से जनता को शिक्षित करने, खबर, सूचना पहुचाने के साथ-साथ मनोरंजन करने का काम किया। इसने अपने को इतना मजबूत बना लिया और इसे लोकतंत्र का चैथा खंभा कहा जाने लगा। संचार का माध्यम यानी मीडिया। आमतौर पर पे्रस और पत्रकारिता को आज के आधुनिक स्वरूप में समग्र रूप से मीडिया के नाम से ही जाना जाता है। प्रेस यानी मीडिया, पत्रकारिता यानी मीडिया। यह पत्रकारिता के लिए सबसे प्रचलित नाम है। जो जन संचार से संबंध रखता है।

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गंगा गंगा गंगा गंगा गंगा

शरीर शांति के लिए देहपाठ किया जाता है। देहपाठ को कुकर्म या पापकर्म मान लिया जाता है जबकि इसमें पाप जैसा कुछ भी नहीं है। वैसे क्‍या है पाप और क्‍या है पुण्‍य, अभी तो इसी का डिसीजन फाइनल नहीं है। किसी का पाप किसी के लिए पुण्‍य और किसी का पाप किसी का भी पुण्‍य बनने की क्षमता से युक्‍त होता है। देहपाठ को चारित्रिक पतन माना जाता है। यह दैहिक प्रकार की चरित्र संस्‍कृति है जिसका निर्माण और विकास मानव ने ही किया है। इसमें भी चरित्र की गिरावट तो दोनों की माना जाता है। पर इज्‍जत नारी की तार-तार होती है। नर के तार नहीं जुड़े होते... पूरा पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए और टिप्‍पणी भी वहीं कीजिएगा
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नौटंकी का दुर्भाग्य या सरकार की उदासीनता

ब्लॉगोत्सव (द्वितीय) में आज का कार्यक्रम :

http://www.parikalpnaa.com/2011/06/blog-post_3000.html

http://www.parikalpnaa.com/2011/06/blog-post_25.html

  • नौटंकी का दुर्भाग्य या सरकार की उदासीनता

 http://www.parikalpna.com/?p=4478




http://www.parikalpna.com/?p=4454

http://www.parikalpna.com/?p=4443

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फ़ज़ल इमाम मल्लिक को ‘चित्रगुप्त सम्मान’




साहित्यकार, स्तंभकार और पत्रकार फ़ज़ल इमाम मल्लिक को रोशनी दर्शन मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए चित्रगुप्त सम्मान से सम्मानित किया। यह सम्मान रोशनी दर्शन मासिक पत्रिका के स्वर्णिम दस साल पूरे होने के उपलक्ष में दिया गया। ़फ़ज़ल इमाम मल्लिक हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ से जुड़े हैं। उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘सनद’ और ‘ऋंखला’ का संपादन भी किया। इसके अलावा काव्य संग्रह ‘नवपल्लव’ और लघुकथा संग्रह ‘मुखौटों से परे’ का संपादन भी कर चुके हैं। दूरदर्शन के उर्दू चैनल से उन पर एक ख़ास कार्यक्रम ै‘सिपाही सहाफत के’ प्रसारित हुआ है। सम्मान उन्हें दिल्ली के राजेंद्र भवन में आयोजित एक समारोह में दिया गया। फ़ज़ल इमाम मल्लिक के अलावा अवार्ड ग्रहण करने वाले प्रमुख लोगों में ‘न्यूज 24’ के सीनियर प्रोड्यूसर अशोक कौशिक, ‘न्यूज 24’ की कैमरा पर्सन रेणु शर्मा, ‘आज तक’ के प्रोड्यूसर सुशील शर्मा और ‘हिंदुस्तान’ से सीनियर कॉपी एडिटर शरद पांडे।
इस मौके पर रोशनी दर्शन पत्रिका के संपादक सुशील श्रीवास्तव ने अतिथियों का स्वागत किया और पत्रिका के दस वर्ष पूरे होने पर पाठकों व साथियों का शुक्रिया अदा किया। इस कार्यक्रम में एसआईएस के प्रबंध निदेशक आर.के.सिन्हा, कपाली बाबा, इंस्टीट्यूट आॅफ पोलिटकल लीडरशिप के डायरेक्टर शहनवाज चौधरी व कई मशहूर हस्तियां उपस्थित थी।
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खबरों में बने रहने की इच्‍छा एक वासना है : सुरेंद्र प्रताप सिंह


खबरों में बने रहने की इच्छा वैसी ही वासना है, जैसा कि राजनेता पाले रखते हैं।

सुरेंद्र प्रताप सिंह से अजित राय की बातचीत

ये एसपी सिंह का आखिरी इंटरव्‍यू है। जो 15 जून 1997 को जनसत्ता में छपा था। ठीक दस दिनों बाद उनका निधन हो गया था। इस बातचीत में उन्‍होंने कहा है कि खबरों में बने रहने की इच्‍छा वैसी ही वासना है, जैसा कि राजनेता पाले रखते हैं।

आप प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्राँनिक मीडिया में आ गये हैं। अपनी उपस्थिति में कैसा अंतर पाते हैं?

किसी माध्यम या संस्थान में निजी उपस्थिति का कायल मैं कभी नहीं रहा। मैंने जहां भी काम किया, टीम वर्क की तरह काम किया। अखबार में भी जब मैं था, तो पहले पन्ने पर दस्तखत करके कुछ भी लिखकर छपने की वासना मुझमें नहीं रही। हिंदी में तो इसकी परंपरा ही रही है। मैं भी चाहता तो ऐसा अक्सर कर सकता था। अब टेलीविजन के लिए काम करना मुझे रास आ रहा है। बतौर प्रोफेशन मैं यहां पहले से ज्यादा संतुष्ट हूं। क्योंकि यहां लफ्फाजी और छल की गुंजाइश नहीं है। आलस्य और मिथ्या पत्रकारिता यहां नहीं चल सकती। जैसा कि कुछ लोग अनजान सूत्रों के हवाले से कुछ भी लिखते रहते हैं। यहां तो आप जो कुछ भी टिप्पणी करते हैं, उसे दिखाना पड़ता है। ये बात अलग है कि यहां ग्लैमर ज्यादा है।

आजकल हिंदी अखबारों पर संकट की हर जगह चर्चा हो रही है। आपको क्या लगता है?

ये.उनके घोर अज्ञान की अभिव्यक्ति है। हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग चल रहा है। हिंदी और भाषाई अखबारों की पाठक संख्या, पूंजी, विज्ञापन और मुनाफा लगातार बढ़ रहा है। हां, इस वृद्धि के बरक्‍स उनके समाचार-विचार के स्तर को लेकर आप चिंतित हो सकते हैं। पर ये सब समय के साथ ठीक हो जाएगा। दूसरी ओर आज, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर सहित अनेक क्षेत्रीय अखबार अपना विकास कर रहे हैं। जयपुर में भास्कर और पत्रिका की प्रतियोगिता से कीमतें नियंत्रित हुई हैं। गुणवत्ता भी सुधर जाएगी। सच तो ये है कि हिंदी पत्रकारिता अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। हालांकि पेशे के रूप में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण हिंदी पत्रकारिता में बड़ी मात्रा में खर-पतवार आ रहे हैं। लेकिन ये स्थिति स्‍थायी नहीं होगी।

इसी संदर्भ में कहा जा रहा है कि हिंदी अखबारों की विश्वसनीयता घट रही है।

भारतीय समाज में तुलसीदास के समय से ही त्राहि-त्राहि का भाव व्याप्त रहा है। पिछले 150 सालों से तो ये रोना और तेज हुआ है। हर आदमी बताता फिर रहा है कि संकट काल है। कम से कम मैं इस सामूहिक विलाप में शामिल नहीं हूं। भारतीय संस्कृति मूलत: विलाप की संस्कृति रही है। नरेंद्र मोहन अखबार की बदौलत राज्यसभा पहुंच गये तो बड़ा शोर हो रहा है। 1952 से ही ये सब हो रहा है।

पत्रकारिता के मिशन बनाम प्रोफेशन होने पर भी बहस हो रही है। आप क्या सोचते हैं?

रकारी सुविधाएं और पैसे लेकर निकलनेवाले अखबारों की सामाजिक प्रतिबद्धता क्या है? ये एक फरेब है, जो हिंदी में ज्यादा चल रहा है। पत्रकारिता कस्बे से लेकर राजधानी तक दलाली और ठेकेदारी का लाइसेंस देती है। मैंने किसी मिशन के तहत पत्रकारिता नहीं की। मेरी प्रतिबद्धिता अपने पेशे यानी पत्रकारिता के प्रति है। आजादी की लड़ाई के दौरान पत्रकारिता मिशन थी। इसलिए वस्तुपरक भी नहीं थी। मिशन की पत्रकारिता हमेशा सब्जेक्टिव होती है। यदि कोई पार्टी, संस्थान, आंदोलन मिशन की पत्रकारिता करे तो समझ में आती है। लेकिन नवभारत टाइम्स, जनसत्ता या हिंदुस्तान क्यों मिशन की पत्रकारिता करे?

मीडिया में वर्चस्व की संस्कृति को लेकर कुछ राजनेताओं ने अच्छा-खासा विवाद खड़ा कर दिया है। कांशीराम द्वारा पत्रकारों की पिटाई का मामला ताजा उदाहरण है। आपने इससे अपने आपको अलग क्यों कर लिया?

समें जातिवादी ओवरटोन ज्यादा था, इसलिए मैं अलग हो गया। यदि आप इस पेशे में आये हैं, तो इसकी पेशागत परेशानियों का सामना करें। वरना कोई अतिसुरक्षित पेशा चुन लें। कल्पना कीजिए यही काम किसी सवर्ण ने किया होता, तो क्या ऐसा ही विरोध होता? सवर्ण पत्रकारों ने इस घटना को दलित नेता को जलील करने के एक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया में प्रच्छन्न सवर्ण जातिवादी वर्चस्व है। उत्तर भारत में तो अधिकतर अखबारों में सांप्रदायिक शक्तियां ही हावी हैं। पिछड़ों को सबक सिखाने का भाव आज भी ज्यादातर महान किस्म के पत्रकारों की प्रेरणा बना हुआ है। ये वर्चस्व चूंकि समस्त भारतीय समाज में है, इसलिए मीडिया में भी है।

साहित्य और पत्रकारिता के रिश्तों पर आपकी टिप्पणियां खासा विवाद पैदा करती रही हैं। क्या आप अब भी ऐसा मानते हैं कि साहित्यकारों ने पत्रकारिता में घालमेल कर रखा है?

भाषा की बात छोड़ दें तो विषयवस्तु या विचार के स्तर पर किसी भी साहित्यकार संपादक ने हिंदी पत्रकारिता को कोई ज्यादा मजबूत किया, ऐसा मैं नहीं मानता। लेकिन ये भी सच है कि आज हिंदी पत्रकारिता की अपनी भाषा बन रही है। सारी दुनिया में पत्रकारिता की भाषा को साहित्य ने अपनाया है। हमारे यहां उलटी गंगा बहाने की कोशिश होती रही। इसे दुराग्रह नहीं तो क्या कहेंगे कि पत्रकारिता की भाषा को साहित्यिक बना दिया जाए। आप बेशक जैसी मर्जी वैसी साहित्यिक पत्रकारिता करें। लेकिन बजट और विदेश नीति पर पत्रकारीय लेखन में आपकी दखलअंदाजी क्यों? प्रिंट मीडिया के लिए भाषा और शैली की जरूरत है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि किसी बड़े विद्वान पंडित या साहित्यकार को संपादक बना दें। हिंदी में अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि पत्रकारिता में साहित्य को तरजीह नहीं दी जाती। आप बताइए कि संसार की किस भाषा की पत्रकारिता में साहित्यिक खबरें प्रमुख रहती हैं। खबरों में बने रहने की इच्छा वैसी ही वासना है, जैसा कि राजनेता पाले रखते हैं।

ऐसा कह कर आप पत्रकारिता के लिए साहित्य के महत्व को रद्द तो नहीं कर रहे हैं? क्या आप रघुवीर सहाय, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा और अन्य अनेक साहित्यकारों के पत्रकारीय योगदानों को स्वीकार नहीं करते?

देखिए, एक बात साफ कर दूं कि मैं इन लोगों के प्रति बहुत श्रद्धा रखता हूं। साहित्य पढ़ना मेरी आदत है। जो लोग कविता लिखते हैं, वो बहुत कठिन और बड़ा काम करते हैं। मुझे खुद इस बात का अफसोस रहता है कि मैं कविताएं नहीं लिख पाता। ये मेरी असमर्थता है। लेकिन ये लोग सिर्फ अच्छे साहित्यकार होने की वजह से संपादक नहीं बने। ये लोग अपने समय के श्रेष्ठ पत्रकार थे। ये उस दौर में सामने आये, जब हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे के पत्रकारों के हाथों में था। इन लोगों ने इसे नया चमकदार चेहरा दिया। साहित्य सृजन की एक श्रेष्ठ विद्या है। जैसे चित्रकला, अभिनय, गायन, नृत्य आदि। फिर आप बहुत बड़े डॉक्टर, इंजीनियर, नेता, वकील या कुछ भी हों पर इसका मतलब ये नहीं कि आपको संपादक बना दिया जाए। महज इसलिए कि आप उस भाषा में लिखते हैं, जिसमें अखबार निकलता है।

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आईपी यूनिवर्सिटी में मीडिया टीचर के नाम पर धंधेबाजों की नियुक्ति

आईपी यूनिवर्सिटी में मीडिया टीचर के नाम पर धंधेबाजों की नियुक्ति: "पत्रकारिता और जनसंचार की पढ़ाई के लिए लगातार खुल रहे विभागों में कैसी पढ़ाई हो रही है और वहां कैसे-कैसे लोग भरे जा रहे हैं, इसका अंदाजा इन विश्वविद्यालयों के कथित पत्रकारिता विभागों की जांच करने के बाद सामने आ सकता है।

ताजा मामला दिल्ली सरकार के गुरू गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ मीडिया स्टडीज में एक प्रोफेसर की तैनाती का है।

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ब्‍लॉगर हों या नॉन ब्‍लॉगर सबके लिए उपयोगी जानकारी है यह : फोन पर मेवा

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जी हां, एक ऐसी जानकारी
जिसके बारे में
मैंने भी नहीं सोचा था
आपने भी नहीं सोचा होगा
पर क्‍या दुनिया इतनी छोटी है
कि सिर्फ हम ही सोचें
जिन्‍हें हम समझते हैं दूसरा
पर वे अपने होते हैं
जनहित ख्‍यालों में बुने होते हैं

इनमें से एक हैं
एन रघुरमन
जिन्‍हें आप भास्‍कर के
एक नियमित स्‍तंभ लेखक
के तौर पर जानते हैं
उनकी दी गई जानकारी
से उठाइये लाभ
जानकारी है लाजवाब

लगा लीजिए सारे हिसाब
सबसे उपयोगी पाएंगे
पर पहले इमेज पर
लगाइये चटका

और इसे पढ़ लीजिए।
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न्‍यू मीडिया कंपोजिट मीडिया है : देवेन्‍द्र कुमार देवेश

न्‍यू मीडिया कंपोजिट मीडिया है
देवेन्‍द्र कुमार देवेश लिखित इस आलेख को 30 अप्रैल 2011 को आयोजित हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन द्वारा हिन्‍दी भवन में आयोजित द्वितीय सत्र के संदर्भ में पढि़ए और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराइयेगा।
सादर
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समय बिताने के लिये चिट्ठा न लिखें,कुछ सार्थक लिखें

ब्लॉगोत्सव में --

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आज के कार्यक्रम का आकर्षण :
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अपनी बात में आज : 

चाँद के पार में आज:  
विशेष :
सीधी बात में आज गिरीश बिल्लोरे के संग शिखा वार्ष्णेय सीधी बात :01 “प्रवासी चिट्ठाकार एवम साहित्यकार “

कामायनी के ७५ वर्ष :

काव्य सृजन में आज  :

और शाम-ए-अवध में सुनें आज डा. सुप्रिया जोशी की आवाज़ में : रोशनी बनकर जियो 


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