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बाल कृष्‍ण है, बाल कंस नहीं है बालकृष्‍ण


बाबा ने सरकार से पंगा लिया है तो सरकार उनसे जुड़े लोगों को बलात् नंगा करने पर लगी हुई है। सरकार की नीयत खराब हो चुकी है इसलिए उसकी नियति भी सुरक्षित नहीं रह सकती। अगर ऐसा नहीं है तो  आपको क्‍या लग रहा है कि बालकृष्‍ण, कृष्‍ण नहीं कंस है ? ... पूरा पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए क्लिक कीजिए।

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हंस के रजत जयंती कार्यक्रम में 'साहित्यिक पत्रकारिता और हंस' विषय पर डॉ. नामवर सिंह का वक्तव्य

हंस के पच्चीस साल

(अगस्त 1986 से जुलाई 2011)


राजेंद्र यादव के संपादन में जनचेतना की प्रगतिशील पत्रिका हंस प्रकाशन के पच्चीस वर्ष पूरे कर चुकी है। हिंदी समाज ही नहीं, पूरे देश और देश की तमाम भाषाओं के लिए यह एक गौरवपूर्ण घटना है। हंस का प्रकाशन सबसे पहले 1930 में मुंशी प्रेमचंद ने शुरू किया था। हंस के शैशव काल से ही प्रेमचंद के अलावा महात्मा गांधी, राजगोपालाचारी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, काका कालेलकर आदि विभूतियों के नाम उससे जुड़े रहे। बाद में श्रीपत राय और अमृत राय हंस के संपादक रहे। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता की विरल पड़ती धारा को अगस्त 1986 से राजेंद्र यादव के हंस ने लगातार प्रवहमान बनाए रखा। न सिर्फ कथा-साहित्य, बल्कि विभिन्न विधाओं के लिए इस पत्रिका ने मंच की भूमिका निभाई। अपने समय के अधिसंख्य रचनाकारों की पहली महत्त्वपूर्ण रचनाएं हंस में ही प्रकाशित हुईं। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, सांप्रदायिकता विरोध और सामाजिक नवजागरण जैसी देश-समाज की वृहत्तर बहसें हंस के पन्नों पर ही साकार हुईं। हंस का 25 साल का होना इन विमर्शों का भी युवा होना है।
हंस की रजत जयंती के अवसर पर 31 जुलाई को शाम पांच बजे ऐवाने गालिब सभागार में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। आयोजन में प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह 'साहित्यिक पत्रकारिता और हंस' विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। उनके वक्तव्य के बाद कार्यक्रम में उन सहयोगियों को सम्मानित किया जाएगा जिनके बगैर इतने वर्षों तक इस पत्रिका का अनवरत चलते रहना नामुमकिन था। कार्यक्रम में तीन पुस्तकों का लोकार्पण भी किया जाएगा। ये पुस्तकें पिछले पच्चीस सालों के दौरान हंस में प्रकाशित सामग्री से चयन करके तैयार की गई हैं। ये पुस्तकें हैं-

1- पच्चीस वर्ष पच्चीस कहानियां : श्रृंखला संपादक- राजेंद्र यादव; संकलन-संपादक- अर्चना वर्मा
2. हंस की लंबी कहानियां : श्रृंखला संपादक- राजेंद्र यादव; संकलन-संपादक- अर्चना वर्मा
3. मुबारक पहला कदम : (हंस में प्रकाशित कथाकार की पहली कहानी) श्रृंखला संपादक- राजेंद्र यादव; संकलन-संपादक- संजीव
 
विषय- हंस के रजत जयंती कार्यक्रम में 'साहित्यिक पत्रकारिता और हंस' विषय पर डॉ. नामवर सिंह का वक्तव्य

स्थान- ऐवाने गालिब, माता सुंदरी रोड (बाल भवन के पास), दिल्ली

समय- रविवार 31 जुलाई, शाम 5 बजे

धन्यवाद

--
प्रतिभा कुशवाहा 
हंस रजत जयंती समारोह समिति 
09891191549



आप आ रहे हैं
आ रहे हैं तो
शामिल भी होंगे
सुनेंगे अवश्‍य
मनन कीजिएगा

सुनना और मनन करना
विचारों का बनाता है झरना
जो बहे जाता है अविरल

इस कार्यक्रम का संचालन
कर रहे हैं अजय नावरिया
मुझे नहीं जानते आप
तो अजय को तो जानते हैं
मैं भी उन्‍हें जानता हूं
जानता भी हूं और
पहचानता भी हूं

आपस में बहुत सारे लोग
एक दूसरे को पहचानते हैं
पर विचार एक दूसरे के
नहीं जानते हैं
लगता है जानते हैं
पर कोशिश होती है

एक कोशिश यह भी है
इस कोशिश में कशिश भी है
जानने की
समझने की
इसे मिस मत कीजिएगा।

रविवार 31 जुलाई 2011 को
सांय 5 बजे से
माता सुंदरी कॉलेज के पास
ऐवाने गालिब, दिल्‍ली में
आकर अवश्‍य मिलिएगा ।
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राखी सावंत और बाबा रामदेव ने चढ़ाए सोने के रेट


विमर्श इस बात पर किया जा सकता है कि राहुल गांधी से शादी को तैयार राखी अब रामदेव के साथ सात फेरे लेने को तैयार क्‍यों हो गई हैं। जैसा कि स्‍पष्‍ट है कि यहां भी उनकी दाल डाउनलोड क्‍वालिटी की होने के कारण नहीं गलेगी। अगली बार कौन होगा राखी का अगला शिकार, .... रा अक्षर वाले रहें तैयार,  राखी कभी भी उनमें से किसी का नाम ले सकती है।

मुझे लग रहा है कि इस बार कॉमेडी किंग राजू श्रीवास्‍तव का नंबर  ... सच जानने के लिए क्लिक कीजिए और अपनी राय भी वहीं पर दीजिए
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ब्रिटेन में होते तो राजदीप सरदेसाई अबतक जेल में होते

ब्रिटेन में होते तो राजदीप सरदेसाई अबतक जेल में होते: "आईबीएन सेवन के सर्वेसर्वा राजदीप सरदेसाई अगर ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों में होते तो निश्चित मानिये कि उनकी जगह जेल होती और उनके न्यूज चैनल आईबीएन सेवन पर ताला जड़ गया होता। सामाजिक जलालत अलग से झेंलनी पड़ती। कानूनों की घेरेबंदी में इनकी ईमानदारी के पचखडे उड़ गये होते। इनकी पेज थ्री संस्कृति जमींदोज हो जाती। सड़कों पर चलने के दौरान इनके उपर अंडे-टमाटरों की बरसात होती। इनकी ज्ञात और अज्ञात संपति भी अपराध की श्रेणी में खड़ी होती। अनैतिक/पतनशील और भ्रष्ट सत्ता वाली व्यवस्था के अंतर्गत ही राजदीप सरदेसाई जैसी संस्कृति जन्म ले सकती है और फल-फूल सकती है। इतना ही नहीं बल्कि चोरी और सीना जोरी वाली कहावत को सच में बदल सकती है।

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हलचल होती रहनी चाहिये……टेस्ट बना रहता है

अगर जानना  है क्या हद हो गयी तो इस लिंक पर जाकर देखिये 

ये तो हद हो गयी………अब टी वी पर भी आ गये

 

http://vandana-zindagi.blogspot.com


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कसाब, खेल, याददाश्‍त, भारत रत्‍न और बहानेबाजी

कलमाड़ी स्‍मृतिदोष की चपेट में आ गए हैं, इसका यह मतलब मत लगाएं कि उन्‍हें किसी ने चपेट मारी होगी जिससे वे सब भूल गए होंगे। उनका भूलना उन्‍हें भोलू कहकर पुकारे जाने के लिए पर्याप्‍त है। कलमाड़ी की याददाश्‍त वापिस लाने के लिए जरूरत है डॉक्‍टरों, ओझाओं, तांत्रिकों, झोलाछाप डॉक्‍टरी ठगों और मुन्‍नाभाई स्‍टाइल के चिकित्‍सकों की क्‍योंकि एक ठग ही दूसरे ठग की यादों को सुरक्षित तौर पर लौटा कर वापिस ला सकता है। मुझे तो यह महसूस हो रहा है कि कलमाड़ी ने खुद ही छिपा दी होगी अपनी याददाश्‍त और शोर मचा दिया कि  ... पूरा पढ़ने, वोट देने अथवा प्रतिक्रिया दर्ज करने के लिए यही रास्‍ता है
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ब्लॉगोत्सव का इक्कीसवें दिन में प्रवेश, शुभकामनाएं अशेष !

आज सुबह -सुबह रवीन्द्र प्रभात जी से दूरभाष पर बात हुई 
परिकल्पना की नई परिकल्पना और उत्सव की प्रगति की जानकारी प्राप्त हुई 
उन्होंने कहा डेढ़ महीने बीत गए उत्सव होते हुए 
हर एक-दिन बाद दस-बारह पोस्ट प्रकाशित हुए 
कुल मिलाकर शामिल हो चुके हैं अबतक साढ़े तीन सौ रचनाकार 
इस बार उत्सव बढ़ रहा है एक नए कीर्तिमान की ओर लगातार 
उन्होंने एक राज की बात बतायी 
कि उन्हें भी मिल सकता है सम्मान जिन्हें पिछली बार मिला है भाई 
इसबार सम्मान की राशि भी बढ़ेगी और संख्या भी 
होगी एक पत्रिका में सारे पुरस्कृत रचनाओं की व्याख्या भी ......
और भी बाते हुई मजेदार 
लेकिन नहीं बताऊंगा इसबार 
राज को राज रहने दो 
ब्लॉगोत्सव रचनाकारों की परवाज़ रहने दो 
समय कम है, जो शामिल नहीं हुए हैं अपनी रचनाएँ भेज दें
साथ में फोटो और अपना विवरण सहेज दें 
इस ई मेल आई डी पर :


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शोध दिशा का अप्रैल-जून 2011 का स्‍वर्ण जयंती अंक बनाम हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग विशेषांक


shodh disha


जैसा कि आपको विदित है कि विगत ३० अप्रैल२०११ को हिंदी भवन दिल्ली में देश का प्रमुख प्रकाशन संस्थान हिंदी साहित्य निकेतन ने अपने स्वर्ण जयंती वर्ष को हिंदी ब्लॉगर्स के नाम करते हुए परिकल्पना और नुक्कड़ ब्लॉग के साथ एक वृहद् कार्यक्रम को मूर्तरूप दिया, जिसमें हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-२०१० से ५१ चिट्ठाकारों को तथा हिंदी ब्लॉग प्रतिभा सम्मान-२०११ से १३ हिंदी चिट्ठाकारों को सम्मानित किया गया . शोध दिशा का स्वर्ण जयंती अंक प्रकाशित हो गया है, पूरी पत्रिका बांचने के लिए यहाँ किलिक करें ......

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नवभारत टाइम्स ब्लॉग


इस पोस्ट के शुरू में हीं, पहले तो मैं ये विनम्र निवेदन कर लूं कि मैं 'नवभारत टाइम्स ब्लॉग' के विरूद्ध् नहीं हूं  और न ही मेरी कोई इच्छा है कि इसका भी हाल ब्लागवाणी जैसा हो. बल्कि सिमटते हिन्दी प्रिंट मीडिया के समय में नवभारत टाइम्स जैसे अख़बारों का अभी भी छपते रहना मेरे लिए निश्चय ही सुखदायी बात है. लेकिन मैंने पाया कि 'नवभारत टाइम्स ब्लॉग' पर बड़े ग़ज़ब का वर्णाश्रम सिस्टम है, इसके बारे में मुझे तो पहले पता ही नहीं था. इसकी जानकारी मुझे तब हुई जब मैंने भी इसपर अपना ब्लॉग बनाया.

मैंने पाया कि यहां पहली श्रेणी में ‘Celebrity Blogs’ आते हैं, जो मैंने तो बस अंग्रेज़ी में ही देखे …हो सकता है कि हिन्दी में सेलेब्रिटी-लोग होते ही न हों, या हिन्दी लिखने वाले सेलिब्रिटी न माने जा सकते हों, या हिन्दी में लिखने से सेलेब्रिटी स्टेटस छिन जाने का रिवाज़ हो, या फिर शायद सेलेब्रिटी-लोगों को हिन्दी ही न आती हो… बहरहाल इसी उहापोह के चलते मैं ठीक से कुछ भी तय नहीं कर पा रहा हूं. सलवार-कमीज़ पहनने वाली महिलाओं को बहिन-जी टाइप डिक्लेयर कर देने जैसी मानसिकता, हो सकता है, हिन्दी को लेकर भी हो… मुझे ठीक से नहीं पता.

उसके बाद, 'सारे ब्लॉग' के शुरू में तथाकथित बड़े लोग आते हैं. इस फ़ेहरिस्त में शायद वे लोग रखे गए हैं जो आए दिन मीडिया में, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या अप्रिंट मीडिया, यूं दिखाई-सुनाई देते हैं मानो विज्ञापकों ने इन लोगों को विज्ञापनों के बदले स्पांसर कर रखा हो, कि ये यहां-वहां दिखाई-सुनाई देने बंद हुए कि समझो नोटों की स्पलाई रूकने से मीडिया हाउस ही टें बोल जाएगा, मुन्ने.

सबसे पहले ‘सारे ब्लॉग' शीर्षक दिखाई देता है. इसमें दो हिस्से हैं… पहले हिस्से में बड़े लोगों के ब्लॉग सजाए जाते हैं और ये यहां तब तक दिखाई देते हैं जब तक कि लोग उन पर ढेर सारी टिप्पणियां न कर दें भले ही इसमें कितने ही दिन क्यों न ख़र्च हो जाएं.

और अंत में, जनता- ब्लॉग की तर्ज़ पर 'अपना ब्लॉग' के अंतर्गत बाक़ी की ब्लॉगर जनता आती है. अगर आप 'नवभारत टाइम्स ब्लॉग' बैनर भी देखें तो ही आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि 'अपना ब्लॉग' बहुत सारे दूसरे विषयों की सूचि में सबसे अंत में दिखाई देता है और ये भी कि इसे दबाने पर एक अलग इंडेक्स पेज आता है. ख़ैर जी, सर्वर है उनका सो मर्ज़ी भी है उनकी.

00000
-काजल कुमार

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साख ही नहीं रही तो अखबार निकालकर क्या करेंगे?

साख ही नहीं रही तो अखबार निकालकर क्या करेंगे?: "10 जुलाई को पिछले 168 साल से रुपर्ट मार्डोक के न्यूज कार्पोरेशन से छपनेवाले ब्रिटिश अखबार न्यूज ऑफ दि वर्ल्ड ने बिना किसी विज्ञापन के 38 पन्ने का संस्करण निकाला और पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा- थैंक यू एंड गुड बाय। यह अखबार का आखिरी संस्करण था और यह बताने के लिए कि अब ये क्यों नहीं छपेगा, पूरे एक पन्ने के संपादकीय में अखबार ने अपने गौरवशाली इतिहास की चर्चा करते हुए लिखा कि जब इसकी साख ही नहीं रही तो प्रकाशित करके क्या करेंगे? अखबार के संपादक कॉलिन मेयर ने इसे साढ़े सत्तर लाख पाठकों की श्रद्धांजलि करार दिया। अखबार बंद करने के फैसले के वक्त मीडिया मुगल और न्यूज ऑफ दि वर्ल्ड के मालिक रुपर्ट मार्डोक ने भी ठीक इसी तरह की बात की थी और तब अपने यहां भी मार्डोक के इस बयान को पेशे और पत्रकारिता की ईमानदारी के तौर पर देखा गया। आगे चलकर जैसे-जैसे इस खबर की पेंच खुलती गयी, मार्डोक ने पहले से कहीं ज्यादा अपनी उदार छवि दुनिया के सामने पेश करने की कोशिश की। 16 जुलाई को ब्रिटेन के तमाम अखबारों में वी ऑर सॉरी शीर्षक से पूरे पन्ने का विज्ञापन छापा गया जिसमें कि नीचे मार्डोक के हस्ताक्षर थे। मार्डोक के ही एक दूसरे अखबार सैटरडे ने इसे प्रायश्चित का दिन बताया। अखबार बंद होने से लेकर अब तक मार्डोक और उनके बेटे जेम्स मार्डोक ने ब्रिटिश संसद के अलावे सार्वजनिक रुप से बार-बार दोहराया कि जो कुछ भी हुआ,उसकी भरपाई सिर्फ सॉरी कह देने से नहीं हो जाती और यह दुर्भाग्यपूर्ण है। हमें अभी भी लगता है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया, समाज के लिए एक सकारात्मक शक्ति के तौर पर काम करता है और हम यह विश्वास हासिल करने के लिए आगे भी काम करते रहेंगे,हम लोगों के बीच ये भरोसा फिर से कायम कर सकेंगे।

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नवभारत टाइम्‍स ई पेपर के चिट्ठों की चर्चा अगले सोमवार के लिए मुल्‍तवी कर दी गई है

यह मर्जी मेरी नहीं
उन सबकी है
जिन्‍होंने नहीं बनाए
हैं अपने ब्‍लॉग
नवभारत टाइम्‍स ब्‍लॉग
ई पेपर की वेबसाइट पर।

वेबसाइट पर क्लिक करें
और बना लें
अपने अपने ब्‍लॉग
फिर देखेंगे वे जो सपना
वो सच होगा।

उनके ब्‍लॉग की होगी चर्चा
उनके विचारों का भी बनेगा पर्चा
उस पर्चे को भी सभी पढ़ेंगे
मोड़कर उसे जेब में
नहीं रख सकेंगे

कितना अच्‍छा लगेगा
अब तक पढ़ते रहे हैं आप
और अब लिखने लगेंगे।

आप ब्‍लॉग बनाएं
और उसकी सूचना
nukkadh@gmail.com पर
तुरंत भिजवाएं।

सबसे पहले मिलेगी बधाई
फिर हम ही खिलाएंगे मिठाई।
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बाजार में औरत और औरत का बाजार

बाजार में औरत और औरत का बाजार: "हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। औरत की देह इस समय मीडिया के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा से चला आ रहा देह बाजार भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है। देह की बाधाएं हटा रहा है, गोपन को ओपन कर रहा है।

बहस हुई तेजः

समय-समय पर देहव्यापार को कानूनी अधिकार देने की बातें इस देश में भी उठती रहती हैं। हर मामले में दुनिया की नकल करने पर आमादा हमारे लोग वैसे ही बनने पर उतारू हैं। जाहिर तौर पर यह संकट बहुत बड़ा है। ऐसा अधिकार देकर हम देह के बाजार को न सिर्फ कानूनी बना रहे होंगें वरन मानवता के विरूद्ध एक अपराध भी कर रहे होगें। हम देखें तो सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद एक बार फिर वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की बातचीत तेज हो गयी है। यह बहस हाल में ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में वकीलों के पैनल व विशेषज्ञों से राय उस राय के मांगने के बाद छिड़ी है जिसमें कोर्ट ने पूछा है कि क्या ऐसे लोगों को सम्मान से अपना पेशा चलाने का अधिकार दिया जा सकता है? उनके संरक्षण के लिए क्या शर्तें होनी चाहिए ?

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जिन हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं, वे जुगाड़ भिड़ाएं

कहां भिड़ाना है जुगाड़
नभाटा की इमेज पर
करके क्लिक पढ़ लें
और
करें तद्नुसार कार्रवाई।

सजग रहना जरूरी है
तभी पुस्‍तकें बिकेंगी
सुन रहे हो
मोहल्‍लालाइव
पुस्‍तकें सिर्फ दुकानों
पर ही नहीं बिकती हैं

यहां पर भी भिड़ानी पड़ती है जुगाड़
नहीं तो इकट्ठा होता है खूब कबाड़
प्रकाशित पुस्‍तकों का।

चाहते तो बचे रहना
तो कार्रवाई जरूर करना।

आप क्‍यों हंस रहे हैं
आपकी भी तो पुस्‍तक हुई है प्रकाशित
उसको भी सबमिट करना
मेरी तरफ मत देखिए
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति
2011 में हुई है प्रकाशित
और राजभाषा विभाग ने मांगी हैं
2010 में छपित।

पढ़ रहे हो पंकज सुबीर
पढ़ रहे हो समीर भाई
याद दिला रहा हूं
अयन प्रकाशन को
और शैलेश भारतवासी को भी।

फिर मत कहिएगा
कि बतलाया नहीं
चेताया नहीं
सो रहे थे हम
जगाया नहीं।
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नवभारत टाइम्‍स ई पेपर की वेबसाइट पर बनाए गए हिन्‍दी ब्‍लॉगों और ब्‍लॉगरों से मिल लीजिए

आपका नाम न हो तो निराश मत होइयेगा। अगली बार आपका ही नंबर होगा। नंबर मतलब आपकी या आपके ब्‍लॉग की भी चर्चा होगी। अगर आपने अभी तक अपना ब्‍लॉग नवभारत टाइम्‍स ई पेपर की वेबसाइट पर न बनाया हो तो देरी मत कीजिए।


कहा गया है कि शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए। सबसे पहले तो हम हिन्‍दी प्रेमी और नुक्‍कडडॉटकॉम नवभारत टाइम्‍स समूह का आभारी है कि उन्‍होंने हिन्‍दी ब्‍लॉगहित में अपनी साईट पर पाठकों को अपने ब्‍लॉग बनाने का अवसर देकर एक उल्‍लेखनीय कार्य किया है। इस कार्य के लिए नवभारत टाइम्‍स की जितनी सराहन (यहां क्लिक करके आप अपना ब्‍लॉग बना सकते हैं ) की जाए, कम है।


 चंद दिनों में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के अग्रणी हस्‍ताक्षरों ने अपने ब्‍लॉग बनाकर यह साबित कर दिया है कि उन्‍हें नभाटा का यह कदम कितना मन भाया है। इन दिनों वैसे भी हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत एग्रीगेटरों की समस्‍या से जूझ रहा था जबकि ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत जैसे शीर्ष एग्रीगेटरों ने अपने कार्य पर विराम लगा दिया था।

मेरा सदा से यही मानना रहा है कि इस जहां में जो भी होता है, सदैव अच्‍छे के लिए होता है। इसी का प्रतिफल है कि नवभारत टाइम्‍स समूह ने हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की इस परेशानी को दूर करने के लिए तुरंत कार्य किया, नतीजा आपके सामने है।


नवभारत टाइम्‍स के संपादकों और स्‍तंभकारों के ब्‍लॉग की सुविधा तो साइट पर काफी समय से रही है परंतु पाठकों के लिए यह सुविधा देकर नभाटा समूह ने हिन्‍दी ब्‍लॉगरों का दिल जीत लिया है। जिन पाठकों/लेखकों ने  अभी तक अपने ब्‍लॉग नभाटा पर न बनाए हों वे अपने पुराने ब्‍लॉग तो इनके एग्रीगेटर से जोड़ें ही, अपना एक स्‍वतंत्र ब्‍लॉग भी अवश्‍य बना लें।

आने वाले सोमवार को नुक्‍कड़ पर जो चर्चा की जाएगी वो विशेष तौर पर नवभारत टाइम्‍स ई पेपर और इसकी साईट पर बनाए गए ब्‍लॉगों पर केन्द्रित रहेगी। इसलिए आप अपना ब्‍लॉग बना लें, हो सकता है सोमवार को होने वाली चर्चा में आपके ब्‍लॉग की भी चर्चा हो।


हिन्‍दी ब्‍लॉगहित में प्रकाशित एवं प्रसारित।


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ये हैं गोविंद तिवारी फ्रॉम इलाहाबाद

आप गोविंद तिवारी को तलाश रहे हैं
हम उन्‍हें नुक्‍कड़ तक ले आए हैं
अब आप मिल लें उनसे और
मिल लें उनके ब्‍लॉग से
जिसके बारे में खूब छपा है
आज नवभारत टाइम्‍स में।

उन्‍होंने किया ही सब ऐसा है
सबको उनकी तलाश है
दोस्‍ती करने की आस है
आस बने विश्‍वास जी।


सफल हो प्रयास जी।





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हिन्‍दी ब्‍लॉगर टोपी की नई कहानी सुनेंगे


आईना हूं

एक तरफ बाबा और एक तरफ टोपी वाला … दोनों तरफ से बंदरों पर दबाव बढ़ने लगा… यहाँ तक कि उन्हें मनुष्यों के वेश में रहना मुश्किल हो गया… और खीज में एक दिन बंदरों की मूल प्रवृत्ति उजागर हो ही गयी और खिसियाये हुए बंदर एक साथ इनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए भगवाधारी बाबा पर खौंखिया कर दौड़ पड़े… … बाबा इस अप्रत्याशित हमले से जैसे तैसे जान बचा कर निकले … उधर टोपी वालों ने अलग नाक में दम कर रखा था… रोज़ धरने की धमकी… अनशन की चेतावनी… बंदरों ने अपने कुछ चालाक और कुटिल प्रतिनिधियों को छाँट कर टोपी वालों से निपटने के लिए एक गोल बनाई और जैसे कभी इंसान ने बंदरों को लालच दिया था… आज बंदरों ने टोपीवालों को लालच दी… और टोपी वाले उनकी चाल में फंस गए… पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी करने के लिए क्लिक कीजिएगा

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पीएम जी यह गलती नहीं, गलता है

पीएम की नीयत पर संदेह तो नहीं होता है क्‍योंकि वे नहीं चाहते हैं कि इन्‍हें छोड़कर अगली वारदात का जोखिम लिया जाए। पर मेरा पागल मन पूछ रहा है कि यह पकड़ना कैसा है कि पकड़े जाने पर भी वे छुट्टे घूम रहे हैं और बम फोड़ रहे हैं, मतलब उनके दम ने अपनी घुटन को घुटने नहीं टेकने दिए हैं।

पीएम इस खुशफहमी में देश को खुश रखना चाहते हैं और खुद भी खुशी के खुदा बने हुए हैं कि सरकार ने तो साजिशकर्ताओं को पकड़ रखा है। अब पीएम ने न जाने किन किनको पकड़ रखा है, उन्‍हें यह भी याद नहीं होगा और वे प्रत्‍येक मौके पर आदतन कह देते हैं कि छोड़ेंगे नहीं ... पूरा पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिएगा  कमेंट देना भूल जाएं तो वोट देने में न शर्माएं। वोट देने के लिए पेज तारे भी एनबीटी पर ही मिलेंगे, बस क्लिक ही करना है।
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साहित्‍य अकादमी बुला रही है : ब्‍लॉगरों क्‍या आप मिल रहे हैं

भारतीय भाषाओं का भविष्‍य
बहुत ज्‍वलंत विषय है आज
कंप्‍यूटर पर भी सज रहा है।

बुधवार 20 जुलाई 2011 को
आमंत्रित हैं आप
इस पर मंत्र फूंकेंगे
राहुल देव जी लाजवाब।

फिर कल मिलते हैं
साहित्‍य मंच पर
मंत्रों के फूल खिलते हैं ।
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हिन्‍दी ब्‍लॉगरों को नहीं : ओखला मंडी में मिले जहरीले आम

उन्‍हें जिन्‍होंने खरीदे
पर बरतें सावधानियां
खाने से पहले
जहरीले आम भी खा सकते हैं
क्‍योंकि खरीदे हैं
इसलिए आप फेकेंगे नहीं

उसका उपाय भी इमेज पर
क्लिक करके जान सकते हैं
और जान सकते हैं
कहां से खरीद कर खाएं आम
जो जहरीले न हों
सच्‍चे आम हों

कच्‍चे आमों को भी
पका सकते हैं आप
तरीके उपर इमेज
में ही बतलाए हैं
आसान हैं तरीके
खा सकते हैं खरीद के

आम का मौसम
न खाएं आम
वो विशेष होते हैं
डायबिटीज के
मुरीद होते हैं।

दैनिक हिन्‍दुस्‍तान से ब्‍लॉगजनहित में साभार
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हिन्‍दी ब्‍लॉगर भी ध्‍यान दें : सबके लिए उपयोगी है, पांच लाख तक रिटर्न न दाखिल करने के पेंच


नियम बनते हैं यम
यदि ठीक से न समझे जाएं
और काबू में आते हैं हम
चाहे कितने ही होशियार कहलाएं

इस लेख को इमेज पर
करके क्लिक अवश्‍य पढ़ लें
और उपाय सिद्ध करें
शुभ लाभ के।

सबको बतलाएं
इस लिंक को
उन तक भी पहुंचाएं
जिनका आप चाहते हैं भला
वे भारत में हैं
तो सबका होना चाहिए
भारत भला।

जी हां , रविवार 17 जुलाई 2011 को दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के बचत पन्‍ने पर प्रकाशित श्री विनय कुमार मिश्र के लेख पांच लाख तक रिटर्न न दाखिल करने के पेंच खोले गए हैं। आप भी देखिए कितने पेंच हैं और अपनी रिटर्न अवश्‍य भरिएगा।  नहीं तो नुकसान की जगह होगा फायदा। अर्र ......... र्र .......... र्र ................. फायदे की जगह नुकसान। पहचान लीजिए जो बतला रहे हैं विनय कुमार जी।

जन जन  और ब्‍लॉगहित में दैनिक हिन्‍दुस्‍तान से साभार।
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परिकल्पना ब्लागोत्सव 2011 में मेरे व्यंग्य....

परिकल्पना ब्लागोत्सव 2011 में मेरे व्यंग्य....
आने वाला समय कुत्तों का है........
एक अलमारी सौ चिंतन..........
इस माह के और व्यंग्य हैं:—
महँगाई से निबटने के सौ तरीके

महँगाई के गूमड़

काला धन, सफेद धन, निर्धन  
आपकी प्रतिक्रिया आलोचना/समालोचना का इंतज़ार रहेगा।

प्रमोद ताम्बट

भोपाल
http://vyangya.blog.co.in/
http://www.vyangyalok.blogspot.com/
http://www.facebook.com/profile.php?id=1102162444
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कर देता हूं सारे ब्‍लॉग डिलीट और आजाद हो जाऊं 15 अगस्‍त को

सोच रहा हूं 
छोड़ दूं 
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग 
एक झटके से 
और 
कर दूं ब्‍लॉग सारे डिलीट।


लिखूं सीधे व्‍यंग्‍य अखबारों के लिए, 
छपे वहीं और वहीं पर ही पढ़े जाएं। 


फिर अधिक लिख पाऊंगा और
 भगवान से चाहा 
तो अधिक पारि‍श्रमिक पाऊंगा 
पर इतना तो तय है कि 
भगवान पद्मनाभ के 
खजाने के पासंग 
पहुंचने की 
सोच भी नहीं पाऊंगा। 


वैसे भी ब्‍लॉग पर यातायात नहीं है, 
सारा चेहरे की किताब पर चल रहा है। 


एक अगस्‍त को डिलीट करूं सारे ब्‍लॉग 
या दे दूं आजादी 15 अगस्‍त यानी स्‍वतंत्रता दिवस पर।
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जानिये सच्चाई कुछ सफ़ेदपोशों की…………

जानिये सच्चाई कुछ सफ़ेदपोशों की…………


बेशक पोस्ट ज्यादा बडी है दोनो ही मगर इन्हे पढें जरूर क्योंकि इनका वास्ता हमारे ब्लोगजगत से है और उसके बारे मे जानना हम सबके लिये बहुत जरूरी है ।
खासकर महिला ब्लोगर के लिये ये जानना बहुत जरूरी है कि कुछ लोगो की मीठी बातो के जाल मे ना फ़ंसें और अपना चैन ना गवायें………यहां भी छद्मवेश मे रावण मिल जायेंगे …………इसलिये किसी से भी दोस्ती रखें तो सिर्फ़ यहीं तक ही रखें उसे इतना आगे ना बढायें कि कभी लेने के देने पड जायें………अब हमे नही पता कि उन महिला ब्लोगर के साथ क्या हुआ और किसने क्या किया मगर हम सब इतने भी अन्जान नही कि ये समझ ना सकें या अन्दाज़ा ना लगा सकें कि क्या हुआ होगा और वो कितनी परेशान हुई होगी तभी उसने ये बात बताई ब्लोगजगत मे जिन्हे
अपना शुभचिन्तक समझा उन्हें………तो आज से हम सब का फ़र्ज़ बनता है कि अपने सभी दोस्तो को सावधान कर दें ताकि कोई बडी क्षति ना हो।




इन्तिहा हो गयी...हर बात की(1)- राजीव तनेजा

http://www.hansteraho.com/2011/07/1_10.html

इन्तिहा हो गई…हर बात की(अंतिम भाग) राजीव तनेजा

http://www.hansteraho.com/2011/07/blog-post_11.html

 धन्यवाद

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जो नुक्‍कड़ समूह से लेखन की सदस्‍यता छोड़ना चाहते हैं, स्‍वयं बतला दें

क्‍या मालूम किसकी मर्जी कितनी है
कौन चाहता है जुड़े रहना और लिखना
कोई चाहता है जमे रहें बिना लिखें
सूरतें दोनों ही अच्‍छी हैं

पर न चाहते हैं लिखना
न चाहते हैं बने रहना
वे बेबाकी से कह जाएं
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नैतिक मूल्यों का ध्यान रखे ब्लॉगर :अरुणेन्द्र

नैतिक मूल्यों का ध्यान रखे ब्लॉगर :अरुणेन्द्र: "जौनपुर. वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग द्वारा संकाय भवन में शुक्रवार को सामजिक सरोकार एवं ब्लोगिंग विषयक गोष्ठी का आयोजन किया गया.इसमें बतौर मुख्य वक्ता उत्तर प्रदेश विधानसभा के संपादक अरुणेन्द्र चन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि आज ब्लोगिंग पत्रकारिता का लघु रूप लेता जा रहा हैं. ऐसे में ब्लॉग लेखन से जुड़े लोगों की और भी जिम्मेदारी बढ़ जाती हैं. आज ब्लोगरों को नैतिक मूल्यों को प्ररित करने वाले विषयों पर लेखन करना चाहिएँ. भारत एक विशाल देश हैं जिसमें सामाजिक मान्यताएं अपना एक अलग स्थान रखती हैं.त्वरित पत्रकारिता के समय में इन भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिएँ.

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आम औरत की छवि बिगाड़ते टीवी धारावाहिक ...!

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले अधिकतर धारावाहिकों में मुख्य किरदार महिलाओं के ही होते हैं।  छोटे पर्दे दिखाये जाने वाले ज्यादातर धारावाहिकों में महिलाएं नई-नई कूटनीतिक चालें चलकर बड़े-बड़े घरानों को बर्बाद या आबाद कर सकती हैं। पूरी पोस्ट यहाँ पढ़ें...!
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अब यहाँ भी आ गये हैं
http://readerblogs.navbharatti​mes.indiatimes.com/zindagiekkh​amoshsafar/entry/%E0%A4%AC-%E0​%A4%A8-%E0%A4%AE-%E0%A4%A6%E0%​A4%B9%E0%A4%B2-%E0%A4%9C-%E0%A​4%95-%E0%A4%95%E0%A4%AC-%E0%A4​%A8-%E0%A4%AE-%E0%A4%AE-%E0%A4​%B2-%E0%A4%B9
readerblogs.navbharattimes.ind​iatimes.com
चलो अच्छा हुआ अब दहलीज को लांघकर निकल जाते हैं लोग वरना आस के पंख कब तक इंतजार की धडकनें गिनते यूँ भी अब कहाँ लोग बनाते हैं दहलीज घरों में ये तो कुछ वक्त के निशाँ हैं जिन्हें दहलीजें समेटे बैठी हैं वरना दहलीजें तो अब सिर्फ उम्र की हुआ करती हैं रिश्तों की नहीं ........... शायद तभी रिश्तों की द
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विश्‍व जनसंख्‍या दिवस पर विशेष : जनगणना कराना सरकार का धर्म है


जनगणना कराती है सरकार, फिर बताती है कि हम एक दो एक करोड़ हो गए। पहले एक करोड़, फिर दो करोड़ और वापिस एक करोड़, जबकि ऐसा संभव नहीं है। सरकार ने एक सौ इक्‍कीस करोड़ बतलाया है। होना तो यह चाहिए कि सिर्फ जनों को गिना जाए और जनानियों को छोड़ दिया जाए, पर सरकार यह नहीं करती, वो सभी को जन ही मानती है, चाहे कोई भी हों, इस गिनती से हिजड़े तथा समलैंगिक भी नहीं बच पाते हैं, सरकार उन्‍हें भी गिनवा लेती है।  सज्‍जन और दुर्जन भी जन माने जाते हैं। अब आप सरकार पर आरोप नहीं लगा सकते कि वो भेद-भाव करती है।
सरकार का मानना है कि जन वही, जिसमें जान हो और सबसे अधिक जान जानवरों में होती है, जानवर सबसे जानदार शब्‍द है। उनकी जान के आगे इंसान की भला क्‍या बिसात ?  मिसाल के तौर पर जान लीजिए कि घोड़े की शक्ति को पैमाना माना गया है। वो तो इंसान को अपने हाथों पर पूरा भरोसा नहीं है, दिमाग पर है, इसलिए उसने हथियार बना लिए, वरना समूची धरा पर शक्तिशाली जानवरों ने इंसानों को धराशायी कर दिया होता। इंसान लुका-छिपा गुफाओं में, नदी-नालों में रहने को विवश होता। यह विचार आते ही उन सबको भय की अनुभूति होने लगी होगी, जो डरते हैं, दूसरों की जान से उन्‍हें सिर्फ इतना सरोकार होता है कि उनके न होने से किसी काम में बाधा आ जाएगी। इसलिए धन सर्वोपरि, रिश्‍ते-नाते-अपनापे उसके बाद।
सरकार चाहे भी कि किसी को जनगणना में शुमार न करा जाए तो, जिनको नहीं गिनना चाहती है, वे दांत किटकिटाने लगते हैं। मानो निरीह सरकार को अपने दांतों के बीच में कुचल डालेंगे जबकि वे अपने ही ओंठ  निज दांतों से काट हंसी उड़वाते हैं। गणना उनकी होती हैं जिनमें जन जुड़ा हो, चाहे उपसर्ग या अंतसर्ग अथवा बतौर प्रत्‍यय।
सरकार चाहे तो कह सकती है कि इंडिया गेट पर जनगणना के लिए परेड कराई जाएगी, आओ और खड़े हो जाओ। अपना-अपना नंबर बोलते जाओ और आखिरी जन की संख्‍या विश्‍वस्‍त आंकड़ा होगा।  जनगणना धर्म निभाने का सीधा सरल तरीका। इस तरीके से सारा दारोमदार अंतिम जन पर है, उसने गलत संख्‍या बोल दी तो सरकार की फजीहत हो जाएगी। नतीजा, सरकारी योजनाओं की वाट लग जाएगी, बजट सारे दोबारा बनाने होंगे, संख्‍या के हिसाब से करेंसी नोटों को अधिक छापना होगा, नहीं तो नकली करेंसी अधिक मात्रा में छपने का बुरा परिणाम होगा और यह सरकार नहीं चाहती है। सरकारी चाहना अधिक प्रभावी नहीं होती है, जिसका नतीजा फेक करेंसी वाले, बाजार में, बैंकों में, एटीएम में येन-केन-प्रकारेण फेक करेंसी फेंक ही देते हैं।
जनगणना में जिंदा जन गिने जाते हैं, जिसका बुरा पक्ष यह है कि अध्‍यापकों को इस काम में लगाया जाता है और वे सदा से यही कहते पाए गए हैं कि जनगणना का काम करने से तो मरना अच्‍छा ?  जब वे अपने को जिंदा मानने में शक करते हैं तो जनता खुद को जिंदा कैसे मान ले, वैसे आम जनता जिंदा होती नहीं है। कईयों की तो आंखों में ही शर्म नहीं बची होती है कि उन्‍हें जिंदा माना जाए पर, डॉक्‍टर उन्‍हें मरा घोषित नहीं करते। जनसंख्‍या के पेच मास्‍टरों के लिए बहुत दुखदायी होते हैं। जिन्‍हें गिनने जाते हैं, वे कई बार बिना गिने खूब डांट पिलाते हैं कि मानो डांट नहीं खाई तो पगार नहीं मिलेगी।
मास्‍टर तबीयत खराब होने पर पढ़ाएं नहीं तो, दोषी और सरकार जनगणना कार्य सौंप दे और वे न करें तो भी सदोष। जन की गणना करना वास्‍तव में क���िन कार्य है, इसलिए इनके हिस्‍से आया है। मास्‍टर अपने छात्रों से गिनवा नहीं सकते हैं। बच्‍चा गिनती करते समय अपनी शंकाओं के निवारण के लिए वापिस घर लौट गया तो .....।
टीचरों को टार्चर पब्लिकली अधिकतर घरों में किया जाता है। इस सबकी एक फिल्‍म बनाई जाए तो वो अवश्‍य ही फीचर फिल्‍म से भी लंबी बनेगी और श्‍याम बेनेगल की ‘भारत एक खोज’ की तर्ज पर उसका नाम ‘मास्‍टर अब सोच’ रखा जा सकता है। फिल्‍म को देखकर चाहे पूरे जहां के मास्‍टर रोएं, परंतु फिल्‍म-दर्शक जरूर हंसेंगे और अपने दांत फाड़ ही देंगे। वैसे वे दांत नहीं फाड़ेंगे, मुंह खोलेंगे परंतु मास्‍टर ही ऐसे मुहावरे सिखाते हैं और अब ये उन पर ही फिट बैठ कर हिट हो रहे हैं। निश्‍चय ही मास्‍टरी पेशे वाले परिवार और उनके जन दुखी होंगे।
फिर भी मास्‍टर शुक्र मनाते हैं कि प्रत्‍येक वर्ष गणना नहीं करनी होती। अगर प्रत्‍येक वर्ष करनी होती तो तब भी वे यह कार्य करते क्‍योंकि अगर मास्‍टर खुद ही कहना मानना नहीं सीखेंगे, तो आप ही सोचिए कि उनके विद्यार्थियों पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा।
सोपानस्‍टेप मासिक पत्रिका में पूर्व प्रकाशित रचना का पुनर्प्रस्‍तुतिकरण
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जरा बताएँगे,सीएनईबी जैसे चैनलों में हो रहे भ्रष्टाचार की जांच कौन करेगा?

जरा बताएँगे,सीएनईबी जैसे चैनलों में हो रहे भ्रष्टाचार की जांच कौन करेगा?: "देश की जनता ने 15वीं लोकसभा का चुनाव परिणाम देखा, और देख रहा है मनमोहन सरकार की दूसरी पारी भी। साढ़े 18 प्रतिशत मंहगाई वाले देश के लोग 61वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। आज़ादी के इन 63 वर्षों में जितना घोटाला मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुआ, इससे पहले कभी नहीं। शासक के हाथ में जब दूबारा सत्ता आती है तब वह और भी निरंकूश और बेफिक्र हो जाता है। चाहे 20 साल तक बिहार की गद्दी पर राज करने का सपना देखने वाला लालू प्रसाद यादव हो या पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की सरकार हो या फिर मिश्र के इजिप्ट में गद्दाफी की सरकार हो।

लेकिन, कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने दूसरी पारी में ही भ्रष्टाचार की सभी सीमा को लांघने को आतुर दिख रहे हैं। निरंकुशता का इससे बड़ा उदाहरण और कोई नहीं दिया जा सकता। जब प्रधानमंत्री 2जी घोटाले पर भरी संसद में साफ कह देते है, इस संबंध में मुझे नहीं मालूम? प्यादा से लेकर सिपाही तक और मंत्री से लेकर राजा सबके सब भ्रष्ट । वर्ष 2010 में हजारों टन गेंहूं केवल सही ढंग से रख - रखाव नहीं रहने की वजह से सड़ गये और सरकार मुंह ताकती रह गई? शरद पवार को चेहरे से लेकर पैर के नाखून तक में फिर लकवा मार दिया और निढाल पड़े रहे?

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आइए,मीडिया नकाबपोशों के आगे आज सवाल बनकर खड़े हों

आइए,मीडिया नकाबपोशों के आगे आज सवाल बनकर खड़े हों: "आज शाम तीन बजे 'भ्रष्टाचार का मुद्दा और मीडिया की भूमिका' पर बात करने के लिए मीडिया इन्डस्ट्री के जीलेट-पॉमोलिव से सजे-संवरे चेहरे कॉन्सटीच्यूशन क्लब,नई दिल्ली में जुटनेवाले हैं। पुरुष वर्चस्व का नमूना पेश करने के लिहाज से इस परिचर्चा में एक भी महिला पत्रकार वक्ता के तौर पर नहीं होगी और न ही कोई दलित पत्रकार अपनी बात रखेंगे। ठाकुर-ब्राह्मण पत्रकारों की जमात मीडिया और भ्रष्टाचार के मसले पर अपनी बात रखेंगे। ये एक तरह से अच्छा ही है कि बरखा दत्त जैसी एक-दो महिला पत्रकारों को छोड़ दें तो जब महिला पत्रकारों ने मीडिया को भ्रष्ट किया ही नहीं है तो उसे दूर करने के लिए सिर क्यों खपाए और एक भी दलित पत्रकार ने इसके दामन को दागदार नहीं किया है तो फिर इस पर पंचायती करने के लिए क्यों बुलाया जाए? इस मीडिया को अगर ब्राह्मण-ठाकुरों ने भ्रष्ट और दलाली के अड्डे के तौर पर तब्दील कर दिया है तो बेहतर है कि फिलहाल वही इसकी संड़ाध को खत्म करने के तरीके के बारे में बात करे।

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पद्मनाभ मंदिर में मिले धन का असली वारिस हूं मैं

मैं यहां भी कमल मंदिर, कालका मंदिर, शिव मंदिर और इस्‍कान मंदिर से घिरी हुई बस्‍ती में रह रहा हूं। पर मन मेरा ठंडा बस्‍ता है, जो अभी तक नहीं भरा था। पर अब जब मालूम चला है तो वो भरने को बेताब है। पद्मनाभ मंदिर का धन भी गिलगिला रहा होगा, उसे जरूर गिला रहा होगा कि चार मंदिरों से घिरे वासी के पास जाने में ही भलाई है और संत के लिए मलाई है। जी हां, जो संत नगर में रहे वो संत, जो धन का दावा करे वो सच्‍चा संत। तो संत नगर के निवासियों में से सिर्फ एक अकेला मैं ही अपना दावा कर रहा हूं और उस धन का मन भी मुझसे मिलमिलाने का कर रहा है।  पर मिलने तो दे कोई, सुरक्षा के नाम पर कमांडो तैनात कर दिए हैं। पर देख लेना जल्‍दी ही एक दिन वो धन जरूर मेरे पास चला आएगा और खूब खिलखिलाएगा। जिससे आपकी बत्‍तीसी भी बंद हो जाएगी। उस धन ने तो बाहर आना ही था, जो अंधेरे में मुंह छिपाते हैं, वे जरूर ही भीतर ही भीतर ... पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी देने के लिए क्लिक कीजिए। टिप्‍पणीदाता को भी धन में साझीदार बनाने की योजना है
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टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग - समीक्षा

टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग - समीक्षा: "नब्बे के दशक में मीडिया का स्वरूप बहुत तेजी से बदला. यह वह दौर था जब भारतीय दर्शक दूरदर्शन के फ्रेम से बाहर आकर सैटेलाइट चैनलों की चमक में खोने लगा था. यहीं से बाजार उसे देखने लगा. समाचार की भाषा, मानक, स्वरूप, सरोकार और उसका चयन सब कुछ बदलने लगे. साल 2000 आते-आते अखबार के सेंट्रल डेस्क से लेकर टीवी न्यूजरूम तक सब बाजार की भाषा बोलने लगे. फरमान जारी होने लगे कि 'अगर कुछ बिकता है तो वह है सिनेमा, क्रिकेट और क्राइम. इसी पर फोकस करो.'

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नवभारत टाइम्‍स की साइट पर हिन्‍दी ब्‍लॉग अग्रीगेटर से अपना ब्‍लॉग जोड़ें और एक नया ब्‍लॉग भी बनाएं

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खेल नवभारत टाइम्‍स पर
खेलने में जरूर आनंद आएगा
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कमज़ोर ‘पेट’ वाले इसे जरुर पढ़ लें...वरना पछताएंगे

मामू आमिर खान और भांजे इमरान खान द्वारा रचा डेली वेली नामक तमाशा देखा.यह गालियों,फूहड़ता,अश्लीलता और छिछोरेपन के मिश्रण से रची एक चुस्त, तेज-तर्रार और सटीक रूप से सम्पादित रियल लाइफ से जुडी कामेडी फिल्म है. जिन लोगों ने छोटे परदे पर फूहडता के प्रतीक एम टीवी पर शुरूआती दौर में साइरस भरुचा द्वारा बनाये गए विज्ञापन और कार्यक्रम देखे हैं तो उन्हें यह फिल्म उसी का विस्तार लगेगी और शुचितावादियों को हमारी संस्कृति के मुंह पर करारा तमाचा. यदि उदाहरण के ज़रिये बात की जाए तो हाजमा दुरुस्त रखने के लिए हाजमोला की एक-दो गोली खाना तो ठीक है लेकिन यदि पूरा डिब्बा ही दिन भर में उड़ा दिया जाए तो फिर हाजमे और पेट का भगवान ही मालिक है.मामा-भांजे की जोड़ी ने इस फिल्म के जरिये
आगे पढ़े :www.jugali.blogspot.com 
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सीधी बात वन्दना गुप्ता से


सीधी बात वन्दना गुप्ता से

ज़ख्म फूलों ने दिए ..!!जिंदगी एक खामोश सफ़र, एवं एक प्रयास  ब्लॉग की स्वामिनी गृहणी श्रीमती वंदना गुप्ता से विगत  रविवार 03.07.2011 को ब्लागोत्सव के लिए  विशेष भेंट श्रोताओं से साझा कर रहा हूँ 

गिरीश बिल्लोरे मुकुल 

http://www.parikalpna.com/?p=4959#comment-786


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सवालों में उलझा बचपन .....!


इसे मासूम  मन में उपजी जिज्ञासा कहें या सब कुछ जान लेने की जल्दबाजी , बच्चों के  क्या ,क्यों और कैसे का सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होता । कई बार तो प्रश्र ही ऐसे होते है कि अभिभावक उलझ कर रह जाते हैं। उनके प्रश्नों को टाल जाना ही बड़ों को बचने का एकमात्र मार्ग नज़र आता है | पर क्या यह सही है ? Yah Post Yahan padhen...!
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मणि कौल का जाना : जो दिख रहा है उससे अलग हटकर देखें

 उसकी रोटी, आषाढ का एक दिन एवं सतह से उठता आदमी...जैसी यथार्थ की पृष्ठभूमि से जुडी़ लीक से हटकर फिल्मों के सृजनहार  प्रख्यात फिल्म निर्देशक मणि कौल का कल रात लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 66 वर्ष के थे। सूत्रों ने बताया कि कौल का निधन कल रात एक बजे गुडगांव स्थित उनके निवास पर हुआ। उन्हें कल रात ही अस्पताल से छुट्टी दी गई थी। कौल के परिवार में दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं। कौल का अंतिम संस्कार इस समय (दिनांक 6 जुलाई 2011 समय सायं 4 बजे) लोधी रोड शमशान घाट पर हो रहा है।

उल्लेखनीय है कि 25 दिसंबर 1944 को राजस्थान के जोधपुर में जन्मे कौल ने भारतीय फिल्म एवं टेलीवि‍जन संस्थान एफटीआईआई में बंगाली नवयर्थाथवादी सिनेमा के पुरोद्धा रितिक घटक के मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त की थी। रितिक के सरोकारों का युवा कौल के मन पर बडा गहरा प्रभाव पडा। कौल को उन भारतीय सिने निर्देशकों की श्रेणी में गिना जाता था जिन्होंने लीक से हटकर फिल्में बनाई और नए भारतीय सिनेमा को आकार देने में एक अहम भूमिका अदा की।



मणि कौल का मानना था कि पुराने सिनेमा में जो बातें प्रतीक के रुप में कहीं गयी वे चीजें नए फिल्मकार सीधी सीधी बात में कहते हैं। कैमरे के कोण, लोकेशन या ध्वनि अथवा संवादों की भाषा में जो नयापन है उसे सिनेमा का नया आंदोलन कहा जा सकता है। मसलन विशाल भारद्वाज ने ओंकारा में जिस भाषा का प्रयोग किया है वह पिछले सारे अनुभवों से भिन्न है।

मणि कौल नयी कहानी आन्दोलन के महत्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश की एक कहानी पर आधारित 'उसकी रोटी' उन्हीं के नाटक 'आषाढ का एक दिन' 'मुक्तिबोध' की कहानी पर सतह से उठता आदमी. विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास 'नौकर की कमीज' और 'विजय दान' देथा की कहानी 'दुविधा' पर इसी नाम से फ्ल्मि बना कर अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्‍त की थी।
एक बार एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंने कहा था कि सिनेमा को देखने का तरीका यह है कि जो दिख रहा है उससे परे हट कर देखा जाए। जो दिखता है वह उपभोक्तावाद है। कार सुंदर है या कोई चीज सुंदर है उससे परे हट कर देखना चाहिए। जो नहीं दिख रहा उस पर दृष्टि डालने की कोशिश करनी चाहिए। कथा से भिन्न जो अकथ है जिसे महसूस किया जा सके। वह ध्वनि जो सुनाई न दे उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. सिनेमा का आनंद इसी कोशिश में है।  


नुक्‍कड़ समूह परिवार मणि कौल के निधन पर विनम्र श्रद्धां‍जलि अर्पित करता है। 
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प्रसून जोशी और जावेद अख्तर को 'वातायन' अवार्ड

प्रसून जोशी और जावेद अख्तर को 'वातायन' अवार्ड: "नेहरु सेंटर और यू के हिंदी समिति के तत्वाधान एवं बैरोनैस फ्लैदर के संरक्षण में ३० जून के दिन लन्दन के हाउस ऑफ़ लोर्डस के एक एतिहासिक कमरे में वातायन : पोएट्री ऑन साउथ बैंक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. समारोह में प्रसिद्ध कवि और लेखक श्री प्रसून जोशी एवं श्री जावेद अख्तर को वातायन अवार्ड से सम्मानित किया गया. मुख्य अथिति के रूप में प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आज़मी, लोर्ड देसी एवं डा मधुप मोहता ने इस समारोह की शोभा बढाई.

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इस हॉस्पिटल को बनवाने में जय प्रकाश अग्रवाल का उतना ही हाथ है जितना श्यामू की कुतिया के बच्चे देने में

..शिलान्यासों की राजनीती के शिकार बुराड़ी में फिर हुआ एक शिलान्यास ....इस बार शिलान्यास हुआ है मिन्नी हॉस्पिटल के निर्माण को लेकर .....चूँकि ये काम MCD फंड से होना है इसलिए शिलान्यास भी बीजेपी की तरफ से किया गया है ....मगर इलाके में ऐसे पोस्टरों की भी कमी नहीं है जिसमे इस हॉस्पिटल का श्रेय सांसद JP अग्रवाल को दिया जा रहा है ....कोंग्रेस के इस पोस्टर पर बीजेपी के पार्षद ने क्या कहा आइये पहले डालते हैं उस पर एक नजर ....
( एम्बियेंस )( इस हॉस्पिटल को बनवाने में जय प्रकाश अग्रवाल का उतना ही हाथ है जितना श्यामू की कुतिया के बच्चे देने में )
पूरी स्क्रिप्ट विडियो के साथ इस लिंक में देखें ...................
Link:
http://anilattrihindidelhi.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

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इस हॉस्पिटल को बनवाने में जय प्रकाश अग्रवाल का उतना ही हाथ है जितना श्यामू की कुतिया के बच्चे देने में

..शिलान्यासों की राजनीती के शिकार बुराड़ी में फिर हुआ एक शिलान्यास ....इस बार शिलान्यास हुआ है मिन्नी हॉस्पिटल के निर्माण को लेकर .....चूँकि ये काम MCD फंड से होना है इसलिए शिलान्यास भी बीजेपी की तरफ से किया गया है ....मगर इलाके में ऐसे पोस्टरों की भी कमी नहीं है जिसमे इस हॉस्पिटल का श्रेय सांसद JP अग्रवाल को दिया जा रहा है ....कोंग्रेस के इस पोस्टर पर बीजेपी के पार्षद ने क्या कहा आइये पहले डालते हैं उस पर एक नजर ....
( एम्बियेंस )( इस हॉस्पिटल को बनवाने में जय प्रकाश अग्रवाल का उतना ही हाथ है जितना श्यामू की कुतिया के बच्चे देने में )
पूरी स्क्रिप्ट विडियो के साथ इस लिंक में देखें ...................
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अब तो एक नया कानून बनना चाहिये…………आखिर देश के भविष्य के लिए

देश के पदनाभास्वामी मन्दिर से निकला 90 हजार करोड का खज़ाना …………एक प्रश्नचिन्ह बन रहा है सब ये सोचने मे लगे है कि आखिर ये खज़ाना , ये संपत्ति किस राजा के काल का है और उसके वंशज कौन है? आखिर क्या जरूरत है मंदिर की संपत्ति है या तो मंदिर के काम आये या फिर जनता के और मन्दिर के भी कितने काम आ सकती है एक दायरे मे ही ना तो उसके बाद उस पैसे का सदुपयोग देश और समाज के कल्याण के लिये होना चाहिये ना……आखिर देश की संपत्ति है ……बेशक जनता ने दी है तो जनता के ही काम आयेगी ना……वैसे भी हमारे देश से राजा महाराजाओ की परम्परा खत्म हो चुकी है ऐसे मे उनके वंशज से पूछना ना पूछना कोई मायने नही रखता……तो हम ये क्यो नही सोचते कि इस धन का सदुपयोग इस तरह क्या किया जाये कि जन कल्याण हो और देश का विकास भी……सोचने वाली बात ये है कि हर मन्दिर या मठ मे इतना पैसा बरस रहा है तो क्यो ना एक ऐसा कानून बनाया जाये जिसके तहत एक सीमा तक ही मन्दिरो या मठों मे पैसा रखा जाये और उसके बाद का सारा पैसा जन कल्याण के कार्यक्रमो मे उपयोग किया जाये………इससे एक नयी विचारधारा का जन्म होगा ……बेरोजगारो को काम मिलेगा और देश मे अपराध , बेईमानी , भ्रष्टाचार का बोलबाला कम होगा और अपनी जरूरतो के लिये किसी की तरफ़ हाथ फ़ैलाने की जरूरत नही रहेगी………आज एक ऐसे कानून की जरूरत है जिसका सख्ती से पालन किया जा सके .............वैसे भी हमारी जनता धर्मभीरु ज्यादा है और डर के मारे वहाँ तो पैसा चढ़ा देगी मगर कोई जरूरतमंद माँग ले उसे नहीं देगी ...........या किसी के काम आ जाये वो नहीं करेगी तो चाहे जिस कारण से पैसा आ रहा हो तो उसका सदुपयोग करने के लिए क्यों ना ऐसा कानून बने जिससे जान जान का कल्याण हो और देश और समाज में स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो .
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अन्ना हजारे और हमारे चरित्र का दोगलापन!

शुरुआत एक किस्से से-एक सेठ प्रतिदिन दुकान बंदकर एक संत के प्रवचन सुनने जाते थे और सभी के सामने उस संत का गुणगान कुछ इसतरह करते थे कि मानो उनके समान कोई और संत है ही नहीं और सेठ जी के समान संत का कोई अनुयायी. सेठ जी प्रवचन स्थल पर संत की हर बात का आँख मूंदकर पालन करते थे. संत अपने प्रवचनों में आमतौर पर प्रत्येक जीव से प्रेम करने की बात कहते और मूक जीव-जंतुओं के साथ मारपीट नहीं करने की सीख देते थे. एक दिन सेठ जी प्रवचन में अपने बेटे को भी लेकर गये.बेटे ने श्रद्धापूर्वक संत की बातें सुनी और उन पर अमल की बात मन में गाँठ बाँध ली. कुछ दिन बाद सेठ जी दुकान बेटे के भरोसे छोड खुद प्रवचन सुनने जाने लगे. एक दिन दुकान में एक गाय घुस गयी और दुकान में रखा सामान खाने लगी। यह देखकर सेठ जी का बेटा गाय के पास बैठ गया और उसे सहलाने लगा। थोडी देर बाद जब सेठजी दुकान पहुंचे तो यह दृश्य देखकर आग बबूला हो गए और बेटे को भला-बुरा कहने लगे. इस पर बेटे ने संत के प्रवचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि गाय को कैसे हटाता, वह तो अपना पेट भर रही थी और उसे मारने पर जीवों पर हिंसा होती. इस पर सेठ ने कहा ‘बेटा प्रवचन सिर्फ वहीँ सुनने के लिए होते हैं बाहर आकर जीवन में अपनाने के लिए नहीं.’ कुछ यही स्थिति हमारे समाज की है.इसका नवीनतम उदाहरण अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उमडा जनसमूह और उसकी कथनी और करनी में अन्तर है. अन्ना हजारे सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए ‘लोकपाल’ के गठन के लिए संघर्ष कर रहे हैं और आश्चर्य की बात यह है कि अपने कार्य व्यवहार में भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुका मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग
 आगे पढ़ें:   http://www.jugaali.blogspot.com/


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सालगिरह पर संदेश


फ़ज़ल इमाम मल्लिक

मुझे नहीं याद पड़ता है कि कभी अपनी सालगिरह मनाने के लिए किसी तरह का आयोजन किया हो। उम्र का एक हिस्सा गांव में गुज़रा। वहां ईद-बक़रीद जैसे उत्सवों के अलावा दूसरे पर्व-त्योहार ही मनाए जाते थे। शादी-ब्याह या कभी-कभार अक़ीक़ा जैसे आयोजन भी होते रहते थे लेकिन सालगिरह मनाने की कोई रस्म गांव में नहीं थी। आयोजन की बात तो जाने दें, जन्मदिन की औपचारिक बधाई देने की रस्म भी नहीं थी। जन्मदिन आता और बिना किसी शोर-शराबे और बधाई-वधाई के चुपचाप चला जाता। न तो उसे कुछ पता चलता जिसका जन्मदिन होता और न ही दूसरे लोगों को इस बात का पता रहता। जन्मदिन आता और बहुत ख़ामोशी से साल में गिरह लगा कर अगले साल फिर से आने के लिए चला जाता। दरअसल हमलोग उस दौर में पैदा हुए, पले-बढ़े जहां सालगिरह जैसी रस्मों की समाज में कोई जगह ही नहीं थी। कभी-कभार सिनेमा में ज़रूर इस तरह की रस्मअदायगी को देखते और ‘तुम जियो हज़ारों साल’ या फिर ‘बार-बार दिन ये आए, बार-बार दिल ये गाए’ जैसे गीत सुन कर ही झूम लेते थे और ‘बर्थडे’ की कल्पना कर लेते थे कि यह भी शहर के लोगों का कोई चोंचला होगा। लेकिन मैट्रिक के बाद आगे की पढ़ाई के लिए संझले चाचा के पास रांची गया तो वहां भी इस तरह की कोई संस्कृति नहीं थी, जहां बर्थडे या सालगिरह मनाया जाता। वे रांची में एचईसी में काम करते थे। उनके दोस्तों की बड़ी तादाद थी फिर भी किसी के घर में इस तरह का कोई आयोजन नहीं होता था। तब न टीवी था और न इंटरनेट या मोबाइल। ले-दे कर रेडियो-ट्रांजिस्टर था जिससे गाहे-बगाहे गाना सुनते थे। सिनेमा ज़रूर था लेकिन उसे देखने पर भी बंदिश थी। दरअसल फ़्लिमों को लेकर आम धारणा यह थी कि इससे ज़ेहनो-दिल पर बुरा असर पड़ता है और इससे कई बुराइयां पैदा होती हैं। मुंगेर में गर्मियों की छुट्टी के दौरान चचा (इज़हारुल हक़) के यहां जाना होता तो वहां ज़रूर फ़िल्म देखने की इजाज़त थी। चचा वकील थे इसलिए उनके जानने वालों में सिनेमा हाल के मालिकान भी थे। चचा का एक पुजर्Þा ही काफ़ी होता था। पटना में रिश्ते के एक फूफा भी थे इज़ाहरुल हक़। वे वित्त विभाग में थे और सिनेमा हाल के टैक्स जैसे मसले उनके पास आते रहते थे। इसलिए उनसे कह कर भी मुफ्Þत में ख़ूब फ़िल्में देखी थीं। लेकिन रांची में तो कालेज से भाग कर ़ही फ़िल्में देखीं। नया-नया शहर का चस्का लगा इसलिए छुप कर ही फ़िल्में देखीं और ख़ूब देखीं। इसके लिए कई बार पिटाई भी हुई लेकिन चोरी-छुपे फ़िल्म देखना नहीं छूटा।
संझले चाचा के साथ वहां सिर्फÞ दो फिल्में देखीं। एक तो थी ‘भाई हो तो ऐसा’ और दूसरी ‘पाकीज़ा’। पाकीज़ा को लेकर एक दूसरे तरह का क्रेज़ था लोगों में। घर वालों की राय में यह एक साफ़-सुथरी फ़िल्म थी। गांव से घर के दूसरे लोग भी आए थे इसलिए सब लोगों ने साथ मिल कर देखी थी यह फ़िल्म। मुझे जहां तक याद है अब्बू ने पहली बार शायद पटना में मैट्रिक के बाद कोई फ़िल्म देखने की इजाज़त दी थी और पैसे भी। हां, शेख़पूरा में छुटपन में एक फ़िल्म लगी थी ‘ख़ाना-ए-ख़ुदा’। वह फ़िल्म देश भर में ख़ूब चली थी। घर से बाहर पांव नहीं धरने वाली मुसलिम महिलाओं ने भी वह फिÞल्म देखी और उन लोगों ने भी जो सिनेमा को हराम बताने में आगे रहते थे। फिÞल्म हज को केंद्र में रख कर बनाई गई थी, इसलिए मुसलमानों में इसे लेकर एक अजब तरह का उत्साह था। इस उस्ताह को देख कर तब यों लगता था कि लोग फिÞल्म देखने नहीं हज पर ही जा रहे हों। गांवों से टमटम, मोटरों, टैक्सियों और दूसरी सवारियों पर भर-भर कर लोग फिÞल्म देखने के लिए शेखपुरा गए थे। बुर्क़ानशीं औरतों, बच्चों, बूढ़ों, जवान मर्द-औरत सबों में फ़िल्म देखने को लेकर इस तरह होड़ थी मानो ज़मीन पर ही जन्नत मिल जाएगी या फिर अगर फ़िल्म नहीं देखा तो एक सवाब से महरूम हो जाएंगे। मेरे घरवाले भी इसमें शामिल थे और उन घरवालों में मैं भी शामिल था। घर वालों की इजाज़त से हम सब घरवाले फिल्म देखने गए थे। दादा अब्बा के अलावा और कौन-कौन लोग फ़िल्म देखने नहीं गए थे, अब यह याद नहीं। ज़माना बीत गया, लेकिन फ़िल्म के नाम पर इस तरह के उत्सव का यह पहला मौक़ा था। सच तो यह है कि तब हम इसी तरह के मौक़े उत्सव-समारोहों के लिए ढूंढते थे। सालों बाद इसी तरह का जनून ‘जय संतोषी मां’ को लेकर दिखाई दिया था। तब पात्र बदल गए थे और चेहरे भी।
तब हमारे जीवन में छोटी-छोटी ख़ुशियां इतनी बिखरी पड़ीं थी कि सालगिरह जैसे मौक़े पर जमा होकर केक काटने या फिर मोमबत्तियां बुझा कर ‘हप्पी बर्थडे’ का गीत गाने की ज़रूरत भी कभी महसूस नहीं हुई। उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि तब हर दिन ईद हुआ करती थी और हर शब, शबे-बारात। खुÞशियां ज्Þयादा थीं, एक-दूसरे के दुख-सुख में शामिल होने के मौक़े इतने थे कि इस तरह के बनावटी आयोजनों के लिए जीवन में न तो जगह थी और न ही ज़रूरत। धीरे-धीरे जीवन से ख़ुशियां निकलती गईं और हम ‘डेज़’ के बहाने ख़ुशियां बांटने के मौक़े तलाशते लगे। धीरे-धीरे ये ‘डे’ हमारी संस्कृति में इस तरह घुलते-मिलते गए कि हम इनमें ही ख़ुशियों के पल तलाशने लगे। बाज़ार ने इनमें सेंध लगा कर इसे घर-घर तक पहुंचाया और हम अब बर्थडे ही नहीं मडर्स डे, फ़ादर्स डे, वैलेंटाइन डे और इसी तरह के अल्लम-ग़ल्लम डे मनाने को अभिशप्त हो गए हैं। तकनीक ने इसे और विस्तार दिया। बाज़ार की पैठ दिन ब दिन इतने गहरी होती गई कि तरह-तरह की दुनिया हमारी दुनिया से जुड़ती गई। सालगिरह हर घर का हिस्सा बन गया। गिफ्Þट वसूले जाने लगे और फिर बाज़ार ने अपना खेल खेला और रिटर्न गिफ्Þट का सिलसिला चल निकला। इसी तरह की और दूसरी चीज़ें भी धीरे-धीरे ‘बर्थडे’ के नाम पर होने लगीं। अपना जन्मदिन तो कभी मनाया नहीं लेकिन बेटी का जन्मदिन मनाना सामाजिक तौर पर भी ज़रूरी हो गया। बेटी के साथ पढ़ने वाले जन्मदिन मनाते थे तो उसे भी मनाना ही था। उसके जन्मदिन से पहले कई तरह की माथापच्ची करनी पड़ती थी। उसके जन्मदिन के पांच दिन बाद मेरा जन्मदिन है लेकिन अपने लिए कभी नहीं सोचा। पत्नी का एक महीने पहले है, वह भी कभी परेशान नहीं हुई। लेकिन बेटी ही हम दोनों के जन्मदिन को लेकर भी परेशान रहती। अपनी उम्र के हिसाब से हम दोनों के लिए कुछ करने की कोशिश करती। यह उस नई पीढ़ी की सोच है, जिसके लिए बर्थडे उनकी संस्कृति का हिस्सा बन गया है। हमारे लिए तो आज भी यह कोई उत्सव नहीं है। इसलिए इस बार भी अपने जन्मदिन पर न तो किसी तरह के आयोजन की योजना थी और न ही ढोल-नगाड़े बजाने थे।
वैसे इस बार बेटी के जन्मदिन पर भी किसी तरह के आयोजन को हमने टालने का फैसला कर लिया था। बेटी ने यह ज़रूर कहा था कि उसे कुछ कपड़े ख़रीदने हैं, तो मैंने हामी भर ली थी। जन्मदिन से ठीक पहले उसकी परीक्षा थी, यह भी एक वजह थी कि इसबार उसके जन्मदिन को सादगी से मनाने का फैसला किया। मेरा भी देहरादून जाना नहीं हो पाया उस दिन तो फ़ोन पर ही बिटिया से बात की। उसे दुआएं दीं। लेकिन उसकी उदासी छुप नहीं सकी। तब मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा कि बेटा मैं आरहा हूं, अपना और तुम्हारे जन्मदिन का केक एकसाथ काटेंगे। पता नहीं बिटिया ख़ुश हुई या नहीं लेकिन अपना देहरादून जाने का कार्यक्रम तय हो गया था।
जन्मदिन से एक दिन पहले रात की ट्रेन से देहरादून के लिए रवाना हुआ। जन्मदिन पर पहला संदेश मोबाइल पर मनु का आया और इसके ठीक बाद सुंबुल ने फ़ोन किया। बेटी को मैंने बताया कि मैं ट्रेन में हूं और सुबह-सुबह देहरादून पहुंच जाऊंगा। उसे यह भी बताया कि उसके लिए मैं एक अच्छा सा तोहफ़ा लेकर आरहा हूं। वह ख़ुश हो गई। फ़ोन रखा ही था कि सौम्या का फ़ोन आ गया। सौम्या फ़ेसबुक पर बनी मेरी नई-नई दोस्त हैं। उन्होंने भी जन्मदिन की बधाई दी। कुछ दूसरी बातें भी उनके साथ हुईं।
नींद आरही थी इसलिए फिर मैंने फ़ोन को वाइब्रेशन पर डाल दिया। नींद खुली तो पता चला कि गाड़ी बस देहरादून पहुंचने ही वाली है। मुंह-हाथ धो कर फ़ोन देखा तो किसी की काल आई पड़ी थी। तब तक गाड़ी स्टेशन पर लग चुकी थी। ट्रेन से उतर कर मैंने उस नंबर पर फ़ोन किया। दूसरी तरफ़ शिरीन हया थीं। लखीमपुरी खीरी में वे कहीं रहती हैं। उन्होंने सालगिरह पर बधाई दी, आपना नाम बताया और कहा कि फ़ेसबुक पर वे मेरी दोस्त हैं। दुआ-सलाम के बाद फिर फ़ोन की बात कही और उनसे विदा ली। सुबह की शुरुआत इस तरह सालगिरह की बधाई से हुई थी। मोबाइळ पर ही कई एसएमएस भी इस बीच बधाई के आ चुके थे। तकनीक के इस युग में सामाजिक साइट फ़ेसबुक से जुड़े होने की वजह से पहली बार कुछ अनजान मित्रों के बधाई संदेश मिले तो अच्छा भी लगा।
घर पहुंच कर सफ़र की थकान मिटाने के बाद लैपटाप खोला तो अपने मेल बाक्स में फेसबुक के ज़रिए आए बधाई संदेशों को देख कर मैं अचंभे में पड़ गया। बड़ी तादाद में जाने-अनजाने मित्रों ने फ़ेसबुक पर जन्मदिन की बधाई दी थी। बधाई संदेश देखने के लिए मैं फ़ेसबुक खोला तो चैटिंग के ज़रिए कई लोगों ने बधाई देनी शुरू कर दी। इन बधाई संदेशों का जवाब देना मैंने ज़रूरी समझा और एक-एक कर सभों का शुक्रिया अदा किया। इस बीच नोएडा की एक मित्र ने मुझे बताया कि आपके फ़ेसबुक के वाल की सेटिंग्स में कुछ समस्या है इसे ठीक कर लें। अभी इस समस्या से जूझ ही रहा था कि दिल्ली से एक ज्योतिष पंडित सतवंत का फ़ोन आया। वही बधाई और बताया कि आपके वाल की सेटिंग्स ठीक नहीं होने की वजह से फ़ोन किया है। मुझे हैरत भी हुई और ख़ुशी भी। थोड़ी देर के बाद नेट से उठा तो बिटिया के साथ बाज़ार गया। हम दोनों ने तय किया कि एक छोटा सा केक लाया जाए और घर में ही हम उत्सव मनाएं। केक लेने के बाद कुछ मिठाइयां लीं, कुछ नमकीन लिए। बेटी ने कहा कि रात में अगर मुर्ग ज़ाफ़रानी बनाया जाए तो कैसा रहे। तब हमने बाज़ार से मुर्ग ख़रीदा और घर लौटे। यानी एक छोटे-मोटे उत्सव की तैयारी, जिसमें मैं, मनु और बेटी के अलावा सरूर शामिल हुए।
रात में फिर नेट पर बैठा तो जन्मदिन की बधाई देने वालों की भीड़ थी। उस पूरे दिन फ़ेसबुक पर क़रीब सात-आठ सौ मित्रों ने मुझे शुभकामनाएं दीं, अच्छा और बेहतर करने के लिए प्रेरित किया। जन्मदिन का यह मेरा पहला उत्सव रहा। इस उत्सव में मेरे सात-आठ सौ मित्रों ने शिरकत की। कुछ चीन्हे, कुछ अनचीन्हे। लेकिन सबने दिल खोल कर ख़ुशयिां लुटार्इं। मुझे अपने प्यार से सराबोर किया। जन्मदिन का यह पहला उत्सव इतना भव्य रहेगा, मैंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। उन तमाम मित्रों का आभार जिन्होंने मेरे जन्मदिन को यादगार बनाया और तकनीक की दुनिया का भी शुक्रिया, जिसकी वजह से देश के अलावा विदेशों से भी लोगों ने मेरे जन्मदिन पर शिरकत की। फेÞसबुक के मेरे मित्रों ने जो मोहब्बत मुझ पर लुटाया है, ज़िंदगी की अंधेरी, पुरख़तर और सुनसान राहों पर उससे मुझे रोशनी भी मिलेगी और कुछ बेहतर करने के लिए प्रेरणा भी। मोहब्बतों के इन संदेशों ने मेरी आंखें बी नम कीं और अंदर यह यकÞीन भी पुख़्ता हुआ कि इंसानी रिश्तों में जो पाकीज़गी और मिठास है, वह तब तक क़ायम रहेगी, जब तक दुनिया रहेगी। क्या मैं ग़लत कह रहा हूं।
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मुझे तो मंदिर बहुत प्‍यारा है इसमें मिला माल ढेर सारा है पर यहां पर चर्चा कुछ और है

हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की पसंद क्‍या है
इसके बारे में बतला रहे हैं
हर दिल अजीज
प्रिय भाई मासूम

मंदिर प्‍यारा है
मंदिर में क्‍योंकि धन हमारा है
कैसे
इसे जानेंगे
बाद में आप
जब बतलाएंगे हम आपको जनाब
जो भटक जाएं
वे संबंधित पोस्‍ट पर ही टिप्‍पणी कर आएं
पर यहां पर पहले से कर जाएं
टिप्‍पणी के महात्‍मय पर शीघ्र एक
पोस्‍ट आप सबके समक्ष आ रही है।

अपनी राय यहां पर ही दीजिएगा
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आखिर कब तक ऐसा होगा?

अभी एक पोस्ट पढ़ी रूबी सिन्हा की........तो ये ख्याल आया

आखिर कब तक ऐसा होगा? 


आज जहाँ देखो वहाँ जिस मंदिर में देखो वहीँ हर जगह सिर्फ यही सुनने को मिलता है कि अमुक मंदिर में  इतने किलो का मुकुट या इतने किलो की चेन चढ़ाई गयी .......


अगर जानना है क्या तो यहाँ देखिये-------http://ekprayas-vandana.blogspot.com
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साहित्‍य जन से दूर क्‍यों, पढ़ सकते हैं इस शीर्षक को ऐसे भी, हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में रमता है मन क्‍यों


आज दिनांक 3 जुलाई 2011 के दैनिक जनसत्‍ता में मनोज सिंह के विचार एक सच्‍चाई को ब्‍यां कर रहे हैं। मैं तो इनसे पूरी तरह सहमत हूं। आपको इसमें कोई विसंगति नजर आती है, तो बतलाएं। अथवा आप भी सहमति जतलाएं। जो जन साहित्‍य से दूर हो रहे हैं, वे हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के पास आ रहे हैं। मेरा ऐसा मानना है, इस प्रक्रिया में तेजी दिखलाई दे रही है, जो एक अच्‍छी बात है। वैसे इससे अच्‍छी बात तो यह होती, अगर साहित्‍यकार जनता की भाषा में रचना करने को अच्‍छा समझते। पर वे अपने ज्ञान को प्रदर्शित करने का जरिया अगर साहित्‍य को मानते हैं और पाठकों तक उनकी बात नहीं पहुंच रही है और वे किंचित मात्र भी चिंतित नहीं हैं तो यह नि:संदेह साहित्‍य का दुर्भाग्‍य है। अब हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के साहित्‍य के दिन शीर्ष पर हैं, कल वे इससे भी ऊंचे शिखर पर होंगे। फिर साहित्‍यकार खरखराहट करते मिलेंगे, अगर वे सच्‍चाई की आहट पर ध्‍यान न धरेंगे या अपने लेखन में माकूल बदलाव नहीं लाएंगे। 
मैं चाहता हूं कि मैं अपनी सारी बात न कहूं, पहले आप इस पर अपने अपने विचार प्रस्‍तुत करें। चाहे आप साहितयकार हैं अथवा हिन्‍दी ब्‍लॉगर। आपने हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग अभी शुरू ही क्‍यों न की हो, आपके विचारों का भी संपूर्ण विनम्रता के साथ नुक्‍कड़ पर स्‍वागत है। 

उपर दी गई इमेज पर एक या दो बार क्लिक करने पर रचना को आप सरलता से पढ़ सकते हैं। यह लेख आज के जनसत्‍ता से साभार लेकर अविकल रूप में आपके विचारों के लिए प्रस्‍तुत किया जा रहा है। 

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मनमोहन सिंह का शिखंडी मीडिया मैनजमेंट

मनमोहन सिंह का शिखंडी मीडिया मैनजमेंट: "मीडिया मैनेजमेंट से भी मनमोहन सिंह की हुई जनविरोधी छवि साफसुथरी होगी नहीं। क्योंकि मनमोहन सिंह की छवि पर भ्रष्टचार की कालिख पुत गची है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे मनमोहन सिंह संविधान-लोकतंत्र के रखवाले नहीं बल्कि धृतराष्ट हैं/ मनमोहन सिंह शिखंडी हैं/ भ्रष्टाचार-कालेधन के संरक्षक है/ औद्योगिक घरानों-वैश्विक लूटेरों के सबसे पसंददीदा प्रधानमंत्री हैं?राजसिंहासन पर बैठे धृतराष्ट ने जिस दिन द्रौपदी का चिरहरण पर मौन साधा था उसी दिन महाभारत की नींव पड़ी थी और कौरववंश के नाश का समय निर्धारित हो गया था।

मनमोहन सिंह ने धृतराष्ट की तरह सुरेश कलमाडी /ए राजा/ कारपोरेटेड घरानों को देश का धन लूटते हुए चुपचाप देखा। सिर्फ चुपचाप ही नहीं देखा बल्कि भ्रष्ट राजनेताओं और औद्योगिक घरानों के संरक्षण देने के लिए खड़े भी हुए। भ्र

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गजोधर भैया हिन्‍दी ब्‍लॉगरों और ब्‍लॉगिंग से खफा नहीं हैं, तो फिर .... बतला रहे हैं राजू श्रीवास्‍तव

दैनिक लोकसत्‍य में प्रकाशित खबर खफा हैं गजोधर भैया

गजोधर भैया
क्‍यों सबको खुश रखते हैं
क्‍योंकि दुखी होने के रास्‍ते
उस खुशी से ही 
निकलते हैं

उन्‍होंने बहुत बरस पहले
किया था खुश
खुश होकर लोग हंसे
आज भी हंस रहे हैं
वे चाहे दुखी हो रहे हो
वे हंसते ही रहेंगे 

हंसाने वाले की 
यही तो नियति है
हंसने में इसी से
आती प्रगति है

गुंडों का सत्‍संग कराया
गजोधर भैया ने
गुंडों ने तो नहीं
बेगुंडों ने उन्‍हें
दुख से भूनकर
खफा कर दिया
उनका जिक्र भी नहीं किया
और 
दफा कर दिया  

अब धारा नई बनानी होगी
144 की तरह 
फिल्‍म वालों पर लगानी होगी

गजोधर भैया की
यही तो नई कहानी होगी
सब हंसेंगे
हंस रहे होंगे
हंसते रहेंगे
गजोधर भैया
खुशी के फूल
सदा महकते रहेंगे। 

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