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म.प्र. साहित्य अकादमी प्रादेशिक दुष्यंत कुमार पुरस्कार से डॉ. महेश परिमल विभूषित

 मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद द्वारा पत्रकार एवं साहित्यकार डॉ. महेश परमार परिमल को प्रादेशिक दुष्यंत कुमार पुरस्कार से नवाजा गया है। गत 25 अगस्त को आयोजित इस समारोह में मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा राज्य मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, प्रख्यात साहित्यकार नरेंद्र कोहली, साहित्य अकादमी के निदेशक त्रिभुवननाथ शुक्ल एवं संस्कृति परिषद के संयुक्त सचिव श्रीराम तिवारी उपस्थित थे। डॉ. परिमल को पुरस्कार स्वरूप 31 हजार रुपए का चैक भी दिया गया। यह पुरस्कार उन्हें उनके ललित निबंधों के संग्रह ‘‘लिखो पाती प्यार भरी’’ के लिए दिया गया।
उल्लेखनीय है कि डॉ. परिमल 30 वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। मूलत: छत्तीसगढ़ निवासी डॉ. परिमल ने भाषविज्ञान में पी-एच. डी की है। देशभर के प्रमुख समाचारपत्रों में उनके सम-सामयिक आलेखों का प्रकाशन होता रहता है। सम्प्रति वे भास्कर समूह से सम्बद्ध हैं। अपने ब्लॉग संवेदनाओं के पंख और आज का सच के माध्यम से वे अपने विचारों से अवगत कराते रहते हैं। डॉ. महेश परिमल जी का चलितवार्ता नंबर 
 09977276257 है।


नुक्‍कड़ समूह की शुभकामनाएं।
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एक पत्र अन्ना के नाम


प्यारे अन्ना हजारे जी

सादर अनशनस्ते

आपको हृदय से नमन करते हुए पत्र प्रारंभ करता हूँ. जब भारत देश घोटालों से त्रस्त हुआ, जब आम भारतीय मंहगाई से पस्त हुआ और जब भ्रष्टाचार की बांसुरी बजाकर शासन तंत्र मदमस्त हुआ तब आप संकटमोचक बनकर आये और बस गए हर भारतीय के दिल में. आपका भोला-भाला व्यक्तित्व भारतीय मानुष के मन में एक नई आशा जगाता है. हम भारतीय विश्व की नज़रों में तो सन 1947 में ही आज़ाद हो गए थे किन्तु अंग्रेज जाते-2 अपनी कार्बन कॉपियां अर्थात काले अंग्रेज यहीं छोड़ कर चले गए जो धूर्तता में अपनी ऑरिजिनल कापियों से भी एक कदम बढ़कर निकले. आगे पढ़ें...

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नेता बोले तो सब ठीक, जनता बोले तो कैरेक्‍टर ढीला है

वे परीक्षा पास करके संसद में दाखिल हों, इसमें बुरी बात क्‍या हैजो उन्‍हें इसमें भी अपना अपमान लगने लगा है। नहीं पूछेंगे, मुश्किल सवाल, एबीसीडी सुन लेंगे, दस तक गिनती लिखवा लेंगे, एकाध जानवरों के चित्र पहचनवा लेंगे। इम्‍तहान तो दें कि डर का भूत सिर पर सवार है, फेल न हो जाएं।  मतलब अपने सिर पर पड़ी तो भारी अपनी खाल कटे तो आरी, वैसे कहते हैं कि अवाम ही है माई बाप। जीत कर या हार कर अथवा वोटरों को मार कर यानी किसी भी तरह सत्‍ता हथियाने वालेसंसद में घुस जाने वालों को गंवार नहीं तो और क्‍या कहा ... यदि रोचक लग रहा हो तो यहां पर क्लिक करके पूरा पढ़ लीजिए और अपनी बेबाक प्रतिक्रिया भी दीजिएगा


आज नुक्‍कड़ के 500 फॉलोवर हो गए हैं, सभी को बधाई।
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अनशन का टूटना और भ्रष्‍टाचार का रूठना


कौन सा गेम खेला जाए, खैर … भ्रष्‍टाचार ने खूब गेम खेले थे, जी भर के प्रत्‍येक स्‍तर के दुर्जनों को खेले और खिलवाए थे, कितने ही तो उसके चेले तिहाड़ में उसका नाम रोशन कर रहे थे और वे अन्‍ना से उनके जबर्दस्‍ती जेल प्रवास के दौरान मिले भी थे, जो नहीं भी मिल पाए थे, उन्‍हें अन्‍ना के वहां पहुंचने और कब्‍जा करने तथा वापसी की पूरी रिपोर्ट अत्‍याधुनिक संचार माध्‍यमों के जरिए मिल गई थी।
तिहाड़ में ए. राजा, कनिमोझी इत्‍यादि खूंखार भ्रष्‍टाचार शिरोमणि मौजूद थे, जो किसी भी आरोप के जवाब में यही कहते थे कि यह करने के निर्देश तो हमें पीएम ने  ... यदि रोचक लग रही हो भ्रष्‍टाचार की आत्‍मस्‍वीकृति तो पूरी पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक कीजिएगा
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मैं भी अन्ना हूँ

आज (28.08.11) रात्रि सेवा के दौरान ही निश्चय किया कि आज मैं भी ड्यूटी समाप्त होने के उपरान्त रामलीला मैदान जाऊंगा और अन्ना जी को अनशन तोड़ते देखूँगा. अपने साथ चलने के लिए मैंने अन्ना भाई पद्म सिंह जी को आमंत्रित किया किन्तु अन्ना भाई अपनी तबियत आगे पढ़ें...
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आइये मिलिये गुडिया इंग्लिशतान से

आइये मिलिये ग़ुडिया इंग्लिशतान से

 जानना चाहते हैं कौन है ये ………मिलना चाहते हैं तो आइये इस लिंक पर्………

http://redrose-vandana.blogspot.com


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अन्‍नाभाई ने राखी से पंगा ले लिया, अब उनकी खैर नहीं .... सर्जना शर्मा

उधर राखी सावंत ने टीवी के अपने एक कार्यक्रम में अन्‍ना हजारे के समर्थन में उल्‍टे पांव दौड़ते हुए जाने की बात कहकर युवाओं में जोश भर दिया है। उल्‍टे पांव तो भूत और भूतनियों के होते हैं। आज जबकि लोगों में इतनी ताकत नहीं रही है कि कहीं सीधे पांव भी दौड़ लगाते हुए जा सकें, ऐसे में राखी ने उल्‍टे पांव दौड़ने की घोषणा करके गजब ढा दिया है। आज सब अपने अपने रुतबे के अनुसार वाहनों में दौड़ लगाते हैं। घर के द्वार से ही अपने वाहन में चढ़ जाते हैं। उससे पहले भी लिफ्ट में उतर कर आते हैं। उस पर राखी ने उल्‍टे पांव दौड़ने की बात कह कर अन्‍ना को अपना भाई स्‍वीकार कर लिया है।  ... पूरी जानकारी लेने के लिए क्लिक कीजिएगा
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सत्‍य तो सत्‍य ही रहेगा : जन लोकपाल बन कर रहेगा

इंदिरा गांधी के दो बेटे थे
एक को देश चलाने का शौक था
उसने प्‍लेन चलाया और उसे गिरा दिया

दूसरे को प्‍लेन चलाने का शौक था
उसने देश चलाया और उसे गिरा दिया

इसी तरह उनकी दो बहुएं थीं
एक को जानवर पालने का शौक था
पर वो मिनिस्‍टर बन गई

दूसरी को मिनिस्‍टर बनाने का शौक था
उसने सिब्‍बल, मनीष, दिग्‍िविजय वगैरह वगैरह पाल लिए ...

साभार : अन्‍ना हमारे फेसबुक समूह में अमित कुमार

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ये चुटकुला सुना !

संता - यार ये सरकार अण्णा हज़ारे के प्रस्ताव पर कानून क्यों नहीं बनाना चाह रही थी ?
बंता - अबे लोग तो सवाल पूछने के भी नोट लेते हैं, और ये अण्णा मुफ़्त में ही कानून बनवाने के जुगाड़ में था...

संता - फिर ये सरकार अब मान कैसे गई?
बंता - दूसरों ने समझाया कि हर काम के लिए ही पैसे की उम्मीद नहीं करनी चाहिये, कभी-कभी फ़र्ज़ भी निभा देना चाहिये.
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पीएम ने कहा और अन्‍ना ने अनशन तोड़ दिया (व्‍यंग्‍य कविता)

पी एम भी हैं प्रसन्‍न

अन्‍ना भी हैं खुश
तोड़ने वाले हैं अनशन

पी एम ने बतलाया है
अभी अभी उनका संदेश
मेरे मोबाइल पर आया है

संदेश में लिखा है
कंप्‍यूटर प्रत्‍येक मर्ज की दवा है

टाइप करो CORRUPTION
कर्सर को वहीं मटकने दो
कंट्रोल प्‍लस ए दबाओ
फिर तुरंत डी दबाओ
कंट्रोल पर से 
न ऊंगली हटाओ 
देखना हुआ न चमत्‍कार
डिलीट हो गया 
सारा भ्रष्‍टाचार

लेकिन इतनी जल्‍दी
मत खुश हो अन्‍ना
अभी रिसाइकिल में
जाकर बीन बजानी है
वहां से एम्‍पटी जगह 
तुरंत खाली करानी है

उसके बाद न रहेगा भ्रष्‍टाचार
न मिलेगा  करप्‍शन
चाहे करना सर्च
चाहे करना फाइंड
कितना ही लगाना माइंड

देखा मिट गया करप्‍शन
तोड़ दो अन्‍ना अपना अनशन

खाओ भरपेट राशन
अब मैं झाडूंगा भाषण
अगर नहीं आता कंप्‍यूटर चलाना
तो सीखकर आओ अन्‍ना, क्‍यों
इकट्ठा कर लिया है जमाना

जाओ अन्‍ना कंप्‍यूटर सीख कर आओ
यूं ही मत विश्‍वभर में कोहराम मचाओ
जाओ अन्‍ना कंप्‍यूटर सीख कर आओ

सारे विश्‍व का भ्रष्‍टाचार खुद अकेले मिटाओ
और सच कह रहा हं कि खूब ख्‍याति पाओ।
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अन्ना से जीत नहीं सकते इसलिए थकाना चाहते हैं

अन्ना से जीत नहीं सकते इसलिए थकाना चाहते हैं: अन्ना की परवाह होती तो सरकार अब तक फैसला ले चुकी होती

देश के लिए 74 साल का एक बुजुर्ग दिल्ली में भूखा बैठा है और सरकारें इफ्तार पार्टियां उड़ा रही हैं। वे अन्ना हजारे से जीत नहीं सकतीं, इसलिए उन्हें थकाने में लगी हैं। सरकार की संवेदनहीनता इस बात से पता चलती है कि उसने कहा कि “अनशन अन्ना की समस्या है, हमारी नहीं।” इतनी क्रूर और संवेदनहीन सरकार को क्या जनता माफ कर पाएगी ? इसके साथ ही मुख्य विपक्षी दल की नीयत और दिशाहीनता पर सवाल अब उनके सांसद ही सवाल उठाने लगे हैं। भाजपा के सांसद यशवंत सिन्हा, शत्रुध्न सिन्हा, उदय सिंह औ

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हिंदी ब्‍लॉगिंग की टूटती कमर : डॉ. अमर कुमार का जाना


नुक्‍कड़ समूह की विनम्र आदरांजलि
अभी थोड़ी देर पहले भाई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने फोन करके इस दुखद घटना की जानकारी दी .मैं बिलकुल सन्न और हतप्रभ रह गया.अभी पिछली बारह अगस्त को पहली बार उनसे भेंट हुई थी.उनसे मिलने के बाद हमने उनसे यह कहा था कि मैं उन पर एक पोस्ट लिखूँगा,वापस आने के बाद कुछ लिखा भी पर न जाने कैसे-कैसे व्यवधान आते गए और आज देखो उस कहानी का उपसंहार लिख रहा हूँ जिसकी प्रस्तावना, कथानक कुछ भी न लिख पाया था!

बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए,जबसे मैं डॉ. साहब से परिचित हुआ ! कोई छः महीने हुए होंगे जब वो अचानक मेरे ब्लॉग पर आये और उनकी टीप पढकर मैं उनके ब्लॉग पर पहुँचा ! उनका लेखन तो अच्छा लगा ही ,रायबरेली के हैं  ... पूरा पढ़ने और अपनी बात कहने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए
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फर्जी राशन कार्ड , फर्जी जाति प्रमाण पत्र , फर्जी डीग्री और भी बाकी फर्जी काम जल्दी निपटा लो अब कभी भी जनलोकपाल आ सकता है फिर नही ऐसा होगा ...........

फर्जी राशन कार्ड , फर्जी जाति प्रमाण पत्र , फर्जी डीग्री और भी बाकी फर्जी काम जल्दी निपटा लो अब कभी भी जनलोकपाल आ सकता है फिर नही ऐसा होगा ................अनिल अत्री दिल्ली ..........................
फर्जी राशन कार्ड , फर्जी जाति प्रमाण पत्र , फर्जी डीग्री और भी बाकी फर्जी काम जल्दी निपटा लो अब कभी भी जनलोकपाल आ सकता है फिर नही ऐसा होगा ................अनिल अत्री दिल्ली ..........................
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अरे कोई मुझे भी तो पकड़ो…


लाल बत्ती लगी सरकारी गाड़ियों में बच्चों को स्कूल आते-जाते या मेमसाहबों को बाज़ारबाज़ी करते तो सबने देखा होगा पर बहुत कम लोगों ने ये देखा होगा कि सड़कों पर जो लम्बी-लम्बी कारें चौबीसों घंटे यहां-वहां डोलती फिरती हैं उनमें से लगभग सभी किसी न किसी काम-धंधे के नाम पर ख़रीदी गई होती हैं और उनके ड्राइवर, हवा-पानी, तेल-डीज़ल, धुलाई-सफाई  और यहां तक कि उनके पार्किंग व पंक्चर तक का ख़र्चा भी उसी काम-धंधे के ख़र्चे में दिखाया जाता है. फिर भले ही वह कार किसी भी काम के लिए कहीं भी क्यों ना चलाई जाती हो.

बिजली चोरी करके काम-धंधे चलाना कोई नई बात नहीं है, कुठ ठाड़े लोग तो घर का ए.सी. तक बिजली का मीटर धीमे कर या बंद कर चला लेते हैं. ज़मीन जायदाद की ख़रीद फ़रोख़्त तो होती ही दो हिस्सों में है, एक नंबर के काग़ज बनते हैं, दो नंबर का काम मुस्कुराने से चल जाता है. बिल लेने की सलाह दुकानदार भी तभी देता है जब उसे लगता है कि –‘कल को माल ख़राब निकलने पर बोहनी के टैम ये कहीं माथा-पच्ची करने न आ धमके’. हमारा क्या है, हमें तो बिल लेकर कोई मत्थे मारना है क्या कि नाहक सेल्स-टैक्स (और आजकल वैट) भरते फिरें, फिर इस बात की ही क्या गारंटी है कि दुकानदार ही हमें वही पर्चा देगा जिसका टैक्स भी सरकार को जमा करवा ही देगा वो. वह मुआ भी तो दो नंबर के बिल बनाकर थमा देता है.

जब सरकार तन्ख़्वाह देने से पहले ही मेरी तन्ख़्वाह में से हर महीने टैक्स काट लेती है तो मैं कभी यह कहना नहीं भूलता कि –“जितना मेरा टैक्स कटता इतना तो काम-धंधे वाले सालाना कमाई भी नहीं दिखाते.” हे सरकार मैंने ही तेरा क्या बिगाड़ा है. यह बात अलग है कि सरकारी बाबू तो इस टैक्स कटाई में कुछ नहीं कर सकता पर हां, निजि क्षेत्र में चलने वाले कामकाजी अपने-अपने कर्मचारियों-अधिकारियों को दुनिया भर के वे सभी हथकंडे अपना कर पगार देते हैं कि अपने काम धंधे का तो ख़र्चा बढ़ ही जाए, मातहतों को भी टैक्स-मैनेजमेंट का फ़ायदा हो जाए.

कितना अच्छा लगता है कामचोरी करना, जब कोई देख न रहा हो. लेकिन अब वो दिन भी कहां रहे, जिसे देखो वहीं चोर-उचक्कों के नाम पर क्लोज़ सर्केट टी.वी. लगा कर अपने-अपने बंदों पर नज़र रखने की फ़िराक़ में रहता है. पर पब्लिक डीलिंग बाबू की कुर्सी लंबे-लंबे समय तक खाली दिखना कोई नई बात नहीं है. काउंटर के दूसरी तरफ वाला गंदा सा बाबू पैसा भी नहीं मांगता, काम भी नहीं करता, काम होने भी नहीं देता और बात-बात पर काटने को दौड़ता है, सो अलग. बाबू को इसी हड़काई में ही परमानंद आ जाता है.

एक गार्मेंट एक्सपोर्टर को मैंने बड़ी संजीदगी से कहते सुना कि वो कैसे कपड़े को खींच-खींच कर ही बढ़ा देता है. मैंने पूछा –‘तुम्हें बाज़ार में चीन से डर नहीं लगता ?’ उसने फिर खीस निपोर दी –“हें हें हें अरे हम तो चीन से फिर भी चार हाथ आगे हैं, हम पायजामा भेजते हैं तो वह हाफ़ पेंट तो निकलता है, चीन से पायजामा मंगाने वाले को तो कच्छा ही हाथ लगता है.”

पता नहीं कितने लोग हैं जो फ़ाइव-स्टारों के रेस्टोरेंटों या दारूखानों का भुगतान अपनी टैक्स चुकाई गई कमाई से करते हैं, या फिर दोपहर में विदेशी परफ़्यूम लगी सौ-सौ किलो की महिलाएं जिन बुटीकों में हज़ारों के कपड़े-लत्ते यूं ही ख़रीद मारती हैं, उनमें से कितनी ख़रीदारी का भुगतान टैक्स चुकाई गई कमाई से होता है…

सुना है दूसरों के लिए तो लोकपाल बिल आ रहा है, है कोई माई का लाल जो मेरा भी कुछ बिगाड़ ले. मेरा कुछ नी हो सक्ता.
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जनलोकपाल बनाम भ्रष्टाचार

जनलोकपाल बनाम भ्रष्टाचार: आमतौर पर सरकारी विभागों में महज घूसखोरी को भ्रष्टाचार माना जाता है। जबकि भ्रष्टाचार का दायरा काफी व्यापक है। रिश्वतखोरी के अलावा यदि हम अपना काम समय से या ईमानदारी पूर्वक नहीं करते हैं तो वह भी भ्रष्टाचार है। आज भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और हम सभी किसी न किसी स्तर पर इसमें भागीदार हैं।


भ्रष्टाचार की व्यापकताः

पुरी दुनिया में भ्रष्टाचार का बोलबाला अनादिकाल से रहा है। हमारा देश भी इसका अपवाद नहीं है। पर हाल के सालों में भ्रष्टाचार की व्यापकता में अकूत इजाफा हुआ है। इतने घोटाले हो चुके हैं कि अब नये घोटाले के खुलासे पर किसी की पेशानी पर शिकन तक नहीं आता है।

राष्ट्रमंडल खेल में हुए घोटाले की परत अभी भी खुल रही है। वोट के बदले नोट कांड का मामला फिर से खुल गया है। ज्ञातव्य है कि सरकार को बचाने के लिए झामुओं के सासंदों ने रिश्वत लिया था। इस मामले में नोट मुहैया करवाने का जिम्मा तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री श्री सतीश शर्मा ने लिया था। श्री शर्मा ने इसके लिए दरियादिली के साथ एस्सार और रिलायंस को तेल के कुएँ बांटे थे। स्पेक्ट्रम घोटाले के पहले दूरसंचार के क्षेत्र में बड़ा घोटाला करने का श्रेय पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुखराम को जाता है। उनके घर से बोरों में रखे तकरीबन साढ़े तीन करोड़ रुपये जब्त किए गए थे।

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इस लिंक देखिये इसमें आप भी है ...............................

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अन्‍ना हमारे हम अन्‍ना के : भ्रष्‍टाचार अन्‍न खा गया रे (कविता)


इतना भी अहिंसक नहीं है
यह आंदोलन
जितना हम आप और वे
समझ रहे हैं
इसमें भ्रष्‍टाचार का मारा जाना
पक्‍का तय है
वे कह रहे हैं
फिर कैसे और क्‍यों
और कौन
इसे अहिंसक मान ले  ?  पसंद आई हों आपको चंद पंक्तियां तो यहां पर क्लिक कीजिए। वोट दीजिए और टिप्‍पणी देने में संकोच मत कीजिए।
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दिल्ली में रहकर यहाँ नही गये तो ऐसी क्रान्ति में भाग न ले पाने का पछतावा पूरी उम्र रहेगा ..........................अनिल अत्री ........................

दिल्ली में रहकर यहाँ नही गये तो ऐसी क्रान्ति में भाग न ले पाने का पछतावा पूरी उम्र रहेगा ..........................अनिल अत्री ................................


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कुमार विश्वास कविता अन्ना हजारे रामलीला ग्राउंड दिल्ली ...अनिल अत्री दिल्ली ........


अनिल अत्री दिल्ली ........

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कुमार विश्वास कविता अन्ना हजारे रामलीला ग्राउंड दिल्ली ...अनिल अत्री दिल्ली ........
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तो क्या अब इंसान बनाएगा ‘रेडीमेड’ और ‘डिजाइनर’ बच्चे...!

भविष्य में इंसान यदि अपने आपको भगवान घोषित कर दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि उसने अपनी नई और अनूठी खोजों से भगवान की सत्ता को ही सीधी चुनौती दे दी है.किराए की कोख और परखनली शिशु(टेस्ट ट्यूब बेबी) के बाद अब तो वैज्ञानिकों ने बच्चे के आकार-प्रकार में भी परिवर्तन करना शुरू कर दिया है.इसका मतलब है कि अब हर बैठे डिजाइनर और रेडीमेड बच्चे पैदा किया सकेंगे.इसीतरह अपने परिवार के किसी खास सदस्य को भी फिर से बच्चे के रूप में पैदा किया जा सकेगा.यही नहीं इस दौरान उस व्यक्ति की कमियों को दूर कर उसे पहले से बेहतर बनाकर जन्म दिया जा सकेगा.यदि इसमें कापीराइट या पेटेन्ट जैसी कोई बाधा नहीं आई तो घर-घर में आइंस्टीन,महात्मा गाँधी,हिटलर,विवेकानंद,नेलशन मंडेला,अमिताभ बच्चन,मर्लिन मुनरो,दाउद इब्राहिम या इसीतरह के अन्य नामी-बदनाम व्यक्तियों को

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अनिल अत्री कवरेज से ............अन्ना की आंधी ....विडियो देखें ..............

videoअनिल अत्री कवरेज से ............अन्ना की आंधी ....विडियो देखें ..............
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यमुनानगर : अन्‍ना की आंधी

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और नाम के पीछे इन किन्नरों ने लगा लिया हजारे






और नाम के पीछे इन किन्नरों ने लगा लिया हजारे...................


पूरा देश अन्ना के समर्थन में उमड़ पडा है ..भ्रष्टाचार के शीकार करोड़ों लोग एक हो गये और हिल गई सरकार ...वो भी गांधीवादी तरीके से ..इस आन्दोलन में क्या बुड्डे , क्या बड़े , क्या बच्चे , क्या नौजवान , महिलाये यहाँ तक दूध मुहें बच्चे भी अन्ना अन्ना कर रहे है ..इसी बीच हर तबका आन्दोलन से जुड़ रहा है ...सरकारी कर्मचारी हो या प्राइवेट सभी सडकों पर अना के समर्थन में आकर जनलोकपाल बिल कि मांग कर रहे है ...ऐसे में देश के किन्नर लोग भी खुलकर अन्ना के समर्थन में आये और घोषणा कर दी कि सारे देश से किन्नर भी शुक्रवार से दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में पहुंचेगें और सरकार का विरोध करेगें ... वीरवार शाम दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम पर किन्नर लोग भी विरोध जताने पहुंचे ..हाथों में तख्ती जुबान पर लोकपाल के लिए नारे ...और नाम के पीछे इन किन्नरों ने लगा लिया हजारे ..देखिये अपनी बाईट में मनीषा अपना नाम मनीषा न बताकर मनीषा हजारे बता रही है ..
किन्नरों के नाच गाने में आज छत्रसाल स्टेडियम में वन्दे मातरम के व अन्ना हजारे के नारे गूंजे ...अन्ना पर लगाये गये शुरुवाती झूठे आरोपों से भी किन्नर तबका काफी नाराज है ..हम किन्नर तिहाड़ भी जायेगें ...इन्होने स्टेडियम के नारे लगाते हुए चक्कर भी लगाये ..वहां मौजूद लोगों में भी उत्साह बढ़ा और शाम के वक्त पूरा मोडल टाउन एक बार फिर वन्दे मातरम , अन्ना हजारे के नारों से गूंज उठा ,,
बाईट - मनीषा हजारे (All India Kinner एसोशियेशन मेम्बर ) टेक्स्ट - हम मरते दम तक लड़ेगें ..हम सब अन्ना के साथ है ..हम कल रामलीला ग्राउंड पहुंचेगें ..
शान्ति ( आंदोलनकारी किन्नर ) मरते दम तक हम साथ है ..
वी ओ फाइनल - अब तो सरकार को चेतना ही होगा ..हर तबका अब अन्ना अन्ना पुकार रहा है ..वीरवार को ये दिल्ली से किन्नर लोग आये है और शुक्रवार से पूरे भारत से किन्नर दिल्ली पहुंच रहे है .....और अपने गीतों में ये अन्ना अन्ना गा रहे है अब ये दुसरे गीतों कि बजाय अन्ना के गीत व वन्दे मातरम , इन्कलाब जिंदाबाद गा रहे है ...
अनिल अत्री दिल्ली ...............


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मीडिया धंधा है या चौथा खंभा?

मीडिया धंधा है या चौथा खंभा?: मीडिया धंधा है या चौथा खंभा? जस्टिस मजीठिया की अध्यक्षता में बने समाचार पत्र कर्मचारियों के वेतन बोर्ड की रिपोर्ट को लेकर यह विवाद एक बार फिर छिड़ गया है. समाचार पत्रों के मालिक कह रहे हैं कि समाचार पत्र धंधा है और जब सरकार किसी और धंधे में कर्मचारियों का वेतन तय नहीं करती तो समाचार पत्र के कर्मचारियों का वेतन सरकार क्यों तय कर रही है. यह विवाद एकतरफा है. इसलिए कि यह विवाद समाचार पत्र के पन्नों पर चलाया जा रहा है और वहाँ वही छप रहा है जो समाचार पत्रों के मालिक तय कर रहे हैं. इस विवाद में कर्मचारियों का पक्ष शायद ही कहीं आ रहा है. मीडिया कम-से-कम इस विवाद में निष्पक्ष होने का जोखिम नहीं उठा सकता क्योंकि यह समाचार पत्रों के मालिकों के लिए धंधे का मामला है और यहाँ उनके तटस्थ होने का सवाल ही नहीं उठता.

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भारत को मोमबत्तियों का आयात करना ही होगा.


हमारे एक बड़े हैं, कुछ नकचढ़े हैं, पुराने में पूरा भरोसा रखे हुए हैं कि ओल्ड इज़ गोल्ड, नए पर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं तो देखते ही बनता है. बच्चों के बर्थडे आए नहीं कि नसीहत चालू…’हमारा ज़माना था कि लोग मंदिर जाते थे. शांत मन  से प्रार्थना करते थे. भगवान के आगे दिया जला कर रखते थे, पर आज इन्हें देखो, मोमबत्तियां बुझाकर अंग्रेज़ी में हल्ला करते हैं...हैप्पी बर्थडे टू यू’.

जब से शहरों में लोगों ने मोमबत्ती-जुलूस निकालने शुरू किए हैं, इनका पारा नीचे आने से कुछ इस तरह इन्कार करता रहता है…’ये भी कोई बात हुई कि पश्चिम की देखा-देखी चालू हो लिए मोमबत्तियां लेकर. अरे भई हमारे यहां तो बस साल-चौमासे मज़ारों पर ही दिया-बत्ती करने की रवायत रही है. ये कौन सा नया मोमबत्ती-राग है कि जिसे देखो मुंह पे पाउडर-लाली पोत कर मोमबत्ती लिए चल देता है.’

‘मुझे तो पक्का लगता है कि इस सबके पीछे ज़रूर वो ही बुझी हुई फ़िल्म-अभिनेत्री रही होगी जो उम्र के चलते फ़िल्मों से फ़ारिग़ होकर एक अरसे से मोमबत्तियां बनाने में ताबड़-तोड़ जुटी हुई है…आखि़र फ़िल्मों वाले क्यों और कितनी मोमबत्तियां ख़रीदते रह सकते हैं. जैसे फ़िल्म बनाकर उसे भुनाने के लिए हर कोई नए-नए पैंतरे नापने लगता है ठीक वैसे ही, इस लुगाई ने जुलूसियों को शुरू-शुरू में कुछ मोमबत्तियां ज़रूर मुफ़्त में बांटी होंगी, फिर शाम के झुरमुटे में बिना फ़्लैश के जब टी.वी. कैमरों की फ़ुटेज बहुत अच्छी निकली तब तो जैसे लाटरी ही खुल गई… हर कोई जुलूसिया ख़ुद ही मोमबत्तियां जुटाने लगा.’

‘लेकिन मोमबत्ती लेके चलना कोई खाला जी का बाड़ा भी नहीं है. इसके भी अपने फ़ंडे हैं मियां. मोमबत्ती का गर्म मोम पिघल कर जब अंगूठे और अंगुलि पर टपकता है तो नारों के साथ-साथ उह-आह-ओह भी सुनाई देने लगती है. मोमबत्ती अपनी तरफ झुकाई जा नहीं सकती, आगे झुकाओ तो आसमान पर थूके समान वह मोम अपने ही पैरों पर गिरने लगता है… और आगे चलने वाला, नारों को धता बता कर कनखियों से घूरता है कि मोम कहीं मेरे कपड़ों पर न गिरा दीजो भइय्ये, सो अलग.’

कुल मिला कर लुब्वोलवाब ये है कि अब इनकी चिंता नोएडा के किसानों को लेकर है …. अगर किसानों ने अपनी ज़मीनें खाली कराने के झांसे से, ज़्यादा नोट ऐंठने वाले जुलूसों में अगर मोमबत्तियां भी बरतनी शुरू कर दीं तो देखा-देखी देश के सभी किसान पीछे हो लेंगे इस चाल में… भगवान न करें कहीं मोमबत्तियों का टोटा पड़ जाए और देश, सारे काम-धंधे छोड़ कर ‘पहले मोमबत्ती आयात करो’ के नारों से गूंजने लगे.
0000
-काजल कुमार

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अण्णा को नए सिरे से आत्ममंथन की ज़रूरत

अण्णा को नए सिरे से आत्ममंथन की ज़रूरत: "अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम में बीते हुए समय के दौरान दुनिया के कुछ खास मुल्कों में काफी उथल-पुथल रही. यह जानते हुए भी कि अमेरिका सख्त आर्थिक बोहरान से गुज़र रहा है और अभी उसे आगे भी गुज़रना होगा,, नाटो की सेना का कुछ मुल्कों में हस्तक्षेप अभी भी जारी है. भारत के अंदरूनी मामलों में अपने बयान का दखल देकर यह जता दिया है कि उसकी चौधराहट में फर्क नहीं आया है. इस बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि अण्णा हजारे का आन्दोलन भ्रष्टाचार-विरोध की बैसाखी पर विपक्ष की लंगड़ी राजनीति के शतरंज की एक ऐसी चाल है जो मंदिर-मस्जिद विवाद के बाद अब चली गयी है और प्रतिपक्ष को लगता है कि इस बार ताज-तख़्त दूर नहीं है. ऐसा हो भी सकता है. योग-गुरू स्वामी रामदेव के आन्दोलन के माध्यम से देश ने कुछ समय पहले देखा भी था. यदि समझदार लोगों ने स्थिति को काबू में न कर लिया होता तो परिणाम भयानक होते जिसकी कल्पना करना आसान नहीं है. एक बार फिर चुनौतियाँ सामने हैं.

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आलोक श्रीवास्तव को मिला अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान

आलोक श्रीवास्तव को मिला अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान: "मास्को. ''तुम्हारे पास आता हूं, तो सांसें भीग जाती हैं / मुहब्बत इतनी मिलती है, कि आंखें भीग जाती हैं.'' हिन्दी के जाने-माने कवि आलोक श्रीवास्तव ने अपनी यह पंक्तियां जब हिंदुस्तानियों की ओर से भारतीय साहित्य और संस्कृति के चहेते रूसियों को नज़्र कीं तो मॉस्को में आयोजित पूश्किन सम्मान समारोह में मौजूद लोगों की आंखें सचमुच भीग गईं. कार्यक्रम समाप्त हुआ तो इन पंक्तियों के साथ कई लोग देर तक भारत-रूस के पुराने-रिश्ते को याद करते रहे.

आलोक श्रीवास्तव यहां रूस का प्रतिष्ठित 'अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान' लेने आए हुए हैं.

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अन्‍ना हजारे, सबके प्‍यारे : कर लिया गिरफ्तार

अन्‍ना गिरफ्तार
इतनी तेज रफ्तार
बोला भ्रष्‍टाचार

करो विचार
मत करो विचार
अनशन अत्‍याचार

है सरकारी विचार
भ्रष्‍टाचार की महिमा
सदा रहेगी अपरंपार

पूरी कविता का आनंद लेने और वोट देने तथा राय जाहिर करने के लिए क्लिक कीजिए यहीं, अरे चल दिए और कहीं।
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अन्‍ना हजारे को राखी सावंत ने भारतवर्ष का असली मर्द माना


उल्‍टे पांव दौड़ लगाकर साबित करने की मंशा से सराबोर है। भ से भ्रष्‍टाचार के मुकाबले में भूतनी के उल्‍टे पांव देखकर ही अगर भ्रष्‍टाचार से छुटकारा मिल जाता है तो सौदा महंगा नहीं है। वैसे यह भी हो सकता है कि वे अन्‍ना की मर्दानगी को अब भी जांचना चाह रही हों कि कहीं वे भूत-भूतनियों से डरते तो नहीं हैं, तो उन्‍हें इतना जान लेना चाहिए कि जो भ्रष्‍टाचार की खिलाफत करने से नहीं डरा, वो भला इन नजर न आने वाले, ऊधमियों से क्‍या डरेगा। वे कितनी ही शैतानी ताकतें क्‍यों न हों, वे आजकल के भ्रष्‍टाचार विरोधी सत्‍तासीन नेताओं से तो उन्‍नीस ही बैठेंगी।
इससे राखी सावंत की उस दीवानगी का भी पता चलता है कि वे सदा सुर्खियों में बने रहने की चाहत से लवरेज रहती हैं और कोई मौका नहीं चूकती हैं।  ......... पूरा पढ़ने और राय जाहिर करने के लिए क्लिक कीजिए
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सुभाष रॉय, यशवंत सिंह, राकेश पांडेय, गंगेश गुंजन और 14 अन्‍य लोगों को 16 अगस्‍त को दिल्‍ली में सम्‍मानित किया जा रहा है

वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष रॉय, यशवंत सिंह एवं गंगेश गुंजन समेत अठारह लोगों को साहित्‍य शिरोमणि पं. दामोदर दास चतुर्वेदी स्‍मृति सम्‍मान 2011 से नवाजा जाएगा. अखिल भारतीय भाषा साहित्‍य सम्‍मेलन एवं भारतीय सांस्‍कृतिक संबंध परिषद के संयुक्‍त तत्‍वावधान में 16 अगस्‍त को आयोजित इस कार्यक्रम का उद्घाटन संसदीय राजभाषा समिति के उपाध्‍यक्ष एवं कांग्रेसी नेता सत्‍यव्रत चतुर्वेदी करेंगे.

कार्यक्रम का आयोजन आईटीओ स्थित आजाद भवन में सायं पांच बजे से होगा. मुख्‍य अतिथि हिंदुस्‍तान के प्रमुख संपादक शशि शेखर होंगे. विशिष्‍ट अतिथि के तौर पर पूर्व पत्रकार तथा दिल्‍ली के उद्योग मंत्री रमाकांत गोस्‍वामी उपस्थित रहेंगे. कार्यक्रम की अध्‍यक्षता भारतीय सांस्‍कृतिक संबंध परिषद के महानिदेशक सुरेश के गोयल करेंगे तथा बीज आलेख संडे इंडियन के प्रबंध संपादक ओंकारेश्‍वर पाण्‍डेय देंगे.

इस कार्यक्रम में हिंदी अकादमी दिल्‍ली के सचिव परिचयदास, दिल्‍ली सरकार के वरिष्‍ठ सूचना अधिकारी सतपाल, जनसंदेश टाइम्‍स लखनऊ के संपादक सुभाष रॉय, प्रवासी संसार के संपादक राकेश पांडेय, भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह, तृष्‍णगंधा पटना के संपादक देवकी नंदन शुक्‍ल, मुंबई के कवि राकेश टैगोर, वरि‍ष्‍ठ कार्यक्रम निदेशक अजय गुप्‍ता, शिक्षाविद एवं समाजसेवी गजे सिंह त्‍यागी, शिक्षाविद् रजनी सिंह, कवयित्री रया निर्दोषी, शिक्षाविद् एवं समाजसेवी जयवीर मलिक, बुंदेलखंड साहित्‍य परिषद के अध्‍यक्ष अशोक रिछारिया, समाधान के संपादक हीरालाल पाण्‍डेय, सोशल एक्टिविस्‍ट कंवलजीत सहरावत, प्रख्‍यात नृत्‍यांगना शिवानी कश्‍यप, उपशिक्षा निदेशक अनिता सेतिया एवं सुलभ इंटरनेशनल के गंगेश गुंजन को सम्‍मानित किया जाएगा.

अखिल भारतीय भाषा साहित्‍य सम्‍मेलन के अध्‍यक्ष सतीश चतुर्वेदी एवं सचिव पंडित सुरेश नीरव ने साहित्‍य में रुचि रखने वालों को 16 अगस्‍त को आजाद भवन में पहुंचने की अपील की है. कार्यक्रम के  संयोजक रजनीकांत राजू  हैं.

नुक्‍कड़ परिवार की सबको बधाई।
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लोकतंत्र को आलोक तंत्र बनाने की कवायद


लोकतंत्र को 
आलोक-तंत्र बनाने की कवायद करता.
भारत पैंसठ साल का  बुड्ढा..  हो गया..
अपनी पुरानी यादों में खो गया.......!!
दीवारों पर कांपते हाथों से लिख रहा था 
"आलोक-तंत्र"
लोग भी आये आगे 
बूढ़े का मज़ाक  उड़ा कर भागे..!!
कुछ खड़े रहे मूक दर्शक बन ..!
कुछ गा रहे थे बस हम ही हम..!! 

कोलाहल तेज़ हुआ फ़िर बेतहाशा 
हर ओर नज़र छाने लगी निराशा !
सबकी अलग थलग थी भाषा-
कांप रही थी बच्चों की जिग्यासा !!
कल क्या होगा.. सोच रहे थे बच्चे 
एक बूड़ा़ बोला :-"भागो किसी लंगड़े की पीठ पे लद के ही "
जान बचाओ.. छिप छिपाकर.. 
हमें नहीं चाहिये न्याय
क्या करेंगें स्विस का पैसा लेकर 
फ़हराने दो उनको तिरंगा ये
है उनका
संवैधानिक अधिकार...
रामदेव..अन्ना... सब कर रहे
शब्दों का व्यापार..
अरे छोड़ो न यार
फ़िज़ूल में मत करो वक्त बरबाद..
गूंगे फ़रियादीयो कैसे बोलोगे
बहरी व्यवस्था की भी तो कोई मज़बूरी है
वो कानों से देखेगी...!!
सदन में चीत्कारेंते हैं..
हमारे लिये हां..ये वही लोग हैं जो
सड़क पर दुत्कारतें हैं...
पूरे तो होने दो पांच साल
बदल देना
इस बरगद की छाल...
अभी चलो घर चलतें हैं..
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अभिव्यक्ति : सुरुचि की - भारतीय साहित्य, संस्कृति, कला और दर्शन पर आधारित।

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आप कुछ भी कहते रहें परंतु शम्‍मी कपूर नहीं रहे

आजादी से एक दिन पहले आजाद हो गए शम्‍मी कपूर। अब आप चाहे उन्‍हें कुछ भी कहते रहें। बरबस याद आ जाता है वो गीत। चाहे कोई मुझे जंगली कहे, कहता है तो कहता रहे। हम प्‍यार के ........  और वे चले गए। सब कुछ छोड़ कर चले गए, छोड़ गए खूब सारी सुनहरी, रूपहली यादें। विकीपीडिया पर उनके बारे में पूरी जानकारी के लिए क्लिक कीजिए। इस जानकारी को पूरी करना ही उनको सच्‍ची श्रद्धांजलि देना होगा। 29 अक्‍तूबर1931 को मुंबई में जन्‍मे शम्‍मी कपूर ने अपनी अंतिम सांस आज 14 अगस्‍त 2011 को मुंबई में ही ली। शम्‍मी कपूर  किडनी खराब होने के कारण अस्‍पताल में भर्ती थे।

शम्‍मी कपूर को नुक्‍कड़ परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि। अपने सभी हिंदी साथियों से यह अनुरोध है कि विकीपीडिया में उनके बारे में जानकारी को अवश्‍य ही अद्यतन करें।
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आज़ादी का जश्न या डरपोक-भयभीत लोगों का एक दिन....!


जगह-जगह ए के-४७ जैसी घातक बंदूकों के साथ रास्ता रोककर तलाशी लेते दिल्ली पुलिस के सिपाही, सड़कों पर दिन-रात गश्त लगाते कमांडो, रात भर कानफोडू आवाज़ के साथ सड़कों पर दौड़ती पुलिस की गाडियां, फौजी वर्दी में पहरा देते अर्ध-सैनिक बलों के पहरेदार, होटलों और गेस्ट-हाउसों में घुसकर चलता तलाशी अभियान और पखवाड़े भर पहले से अख़बारों-न्यूज़ चैनलों और दीवारों पर चिपके पोस्टरों के माध्यम से आतंकवादी हमले की चेतावनी देती सरकार.....ऐसा नहीं लग रहा जैसे देश पर किसी दुश्मन राष्ट्र की नापाक निगाहें पड गई हों लेकिन घबराइए मत क्योंकि न तो दुश्मन ने हमला किया है और न ही देश किसी 
मुसीबत में है बल्कि यह तो हमारे राष्ट्रीय पर्व स्वतन्त्रता दिवस पर
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अविनाश बन रहा कंकाल

नहीं पड़ रहा अकाल
फिर भी बन रहा कंकाल
देश नहीं मैं
हड्डियों पर चढ़ी खाल
खाल पर खड़े बाल
आपको क्‍यों भयभीत कर रहे हैं ?

वही हड्डी वही खाल
खाल के बीच का माल
माल मॉल नहीं मांस
घट रहा है

आयु 45 वजन 78
आयु 47 वजन 53
आयु 52 वजन 56
दोनों की संधि रेखा
आयु 53 वजन 53
तीन माह में
और 3 किलो
घट जाऊं मैं
जैसे घट रही है उमर
घट रही है मेरी कमर

53 की संधि रेखा
14 दिसम्‍बर को आ पहुंची है
आएगी तो तेरह को
पर कहलाएगी 14 को
क्‍यों ?
यह आप मेरे से बेहतर जानते हैं

बिना अकाल के
मैं कंकाल हुआ जाता हूं
खूब खाकर भी वजन घटाता हूं
उम्र घट रही है
वजन घट रहा है
और
घट रही हैं चाहतें

सब कुछ पहले जैसा
अब नहीं रहा है
लिखना पढ़ना खूब रहा है
पर अब सोता ज्‍यादा हूं

पहले तो मन ही नहीं चाहता
मन चाहता है तो
तन कर देता है बगावत
विरोध मेरा कर रहे हैं
या विचारों का मेरे

जानता हूं मैं
विचार बदलने से
मांस नहीं बढ़ा करता
खूब खाओ तब भी
मांस नहीं चढ़ा करता
तेजी से चढ़ो अगर
सांस सबकी चढ़ जाती है

मैं तेजी से सोच तो सकता हूं
नए नए विचार
चला सकता हूं तेजी से
मैं अपनी कार
पर अपने तन की सरकार को
कैसे ड्राइव करूं
इसको चलाने के लिए
फर्जी लाइसेंस भी नहीं मिला करता

फर्जी डॉक्‍टर मिल जाते हैं
(असली डॉक्‍टरों से क्षमा याचना सहित)
ठग वे धन जाते हैं
तन को भी दूषित कर जाते हैं

ले जाते हैं धन, ले जाएं
तन न दूषित कर पाएं
धन के जाने/लुटने से
कभी विचार नहीं मरा करता
धन के बदले मांस मिल जाता है
जानवर का ही सही
पर सांस नहीं मिलता करता

माने कोई, न माने
किसी के रोकने से
कभी जाने वाला
नहीं रुका करता

ऐसा अगर हो जाता
सफर यूं ही चलता रहता
जाने से किसी के सफर कोई
नहीं कभी कोई रुका करता

किसी के मरने से
नहीं जाता कोई मर
यूं ही कोई फिर भी
बिला वजह डरा करता।

10 अगस्‍त 2011 को प्रात: 2.35 बजे लिखी गई कविता।
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दुष्यंत को मिला प्रथम कविता कोश सम्मान, प्रेमचंद गांधी बने कोश के संपादक

(प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह जयपुर में सफलतापूर्वक संपन्न)

जयपुर। अंतर्जाल की दुनिया में कविताओं और कवियों का सबसे बड़ा ठिकाना है कविता कोश। हाल में ही कोश के संचालन को पांच साल पूरे हुए। इस मौके पर प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह का आयोजन जयपुर में जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में किया गया। समारोह में घोषणा की गई कि कविता कोश के नए संपादक कवि प्रेमचन्द गांधी होंगे। भूतपूर्व सम्पादक अनिल जनविजय टीम के सक्रिय सदस्य के रूप में संपादकीय संयोजन का काम देखेंगे।

प्रेमचन्द गांधी ने उपस्थित कवियों, श्रोताओं और समारोह के सहभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह दिन हिंदी कविता के इतिहास की बड़ी परिघटना है। पहली बार कोश को इंटरनेट की दुनिया से निकालकर सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है और इस समारोह में उपस्थित दो-ढाई सौ लोगों में मात्र वे कवि उपस्थित नहीं हैं, जो कविता कोश में शामिल हैं, बल्कि बहुत-से पत्रकार, हिंदी प्रेमी, छात्र, साहित्यकार एवं जनता के अन्य वर्गों के लोग भी उपस्थित हैं।

कविता कोश के संस्थापक और प्रशासक ललित कुमार ने उपस्थित जन समुदाय को कविता कोश के इतिहास और कविता कोश वेबसाइट के उद्देश्यों से परिचित कराया। ललित ने कविता कोश के विकास में सामुदायिक भावना के महत्व पर बल दिया और बताया कि इस तरह की वेबसाइट का अस्तित्व सिर्फ सामुदायिक प्रयासों से ही संभव है। एक अकेला व्यक्ति इस तरह की वेबसाइट नहीं चला सकता,  इसीलिए शुरू में उन्होंने अकेले इस परियोजना को शुरू करने के बावजूद धीरे-धीरे अन्य लोगों को कविता कोश से जोड़ा और कविता कोश टीम की स्थापना की। अब यह टीम ही कविता कोश का संचालन करती है।

रचनाकारों का सम्मान

कविता कोश ने पंच वर्षीय जयंती के अवसर पर दो वरिष्ठ कवियों और पाँच एकदम नए युवा कवियों को सम्मानित करने का निर्णय लिया था। कविता कोश सम्मान 2011 के तहत  नरेश सक्सेना, लखनऊ (कवि), बल्ली सिंह चीमा, ऊधमसिंह नगर (कवि),  दुष्यन्त, राजस्थान (कवि), श्रद्धा जैन, सिंगापुर (शायर),  अवनीश सिंह चौहान, इटावा (नवगीतकार),  सिराज फ़ैसल  ख़ान, शाहजहांपुर (शायर) व  पूनम तुषामड़, नई दिल्ली (कवि) को सम्मानित किया गया।

सम्मान के अंतर्गत वरिष्ठ कवियों नरेश सक्सेना एवं बल्ली सिंह चीमा को 11000 रू. नकद, कविता कोश सम्मान पत्र और कविता कोश ट्रॉफ़ी प्रदान की गई। पाँचों युवा कवियों को पाँच हजार रु. नकद, सम्मान पत्र और कविता कोश ट्रॉफ़ी दी गई। शाल ओढ़ाकर इन कवियों का सम्मान करने के लिए मंच पर कवि विजेन्द्र, ऋतुराज, कवि नंद भारद्वाज, आलोचक मोहन श्रोत्रिय आदि उपस्थित थे।

सम्मान समारोह के बाद आयोजन विचार गोष्ठी में बदल गया था। कवियों ने चिंता व्यक्त की कि हिंदी भाषा और हिंदी कविता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो रहा है। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण और भारत के हिंदी भाषी क्षेत्र के निवासियों द्वारा हिंदी पर अंग्रेजी को प्रमुखता देने के कारण हिंदी संस्कृति और साहित्य का ह्रास हो रहा है। हिंदी को बाजार की भाषा बना दिया गया है लेकिन उसे ज्ञान और विज्ञान की भाषा के रूप में विकसित करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हिंदी कविता के नाम पर बेहूदा और मजाकिया कविताएँ लिखी, छपवाई और सुनाई जा रही हैं। हिंदी कविता के मंच पर तथाकथित हास्य कवियों का अधिकार हो गया है।

कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक की संपूर्ण शिक्षा का माध्यम हिंदी को बनाया जाना चाहिए और सभी तरह के विज्ञान और प्रौद्योगिकी को भी हिंदी में ही पढ़ाया जाना चाहिए अन्यथा आने वाले दस बीस सालों में हिंदी का अस्तित्व खत्म हो सकता है। नरेश सक्सेना के अनुसार आज हिंदी की हैसियत घट गई है इसको अब वापस पाना होगा। सिर्फ आग लिख देने से कागज जलते नहीं बल्कि उन्हें जलाना पड़ता है। उन्होंने अपनी कविताओं से भी माहौल को जीवंत बनाया। उन्होंने मुक्त छंद में अपनी कविता पढ़ी।

जिसके पास चली गई मेरी जमीन
उसके पास मेरी बारिश भी चली गई
(2)
शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है

कवि बल्ली सिंह चीमा ने अपने वक्तव्य में कविता कोश के प्रति आभार प्रकट किया कि उन्हें जयपुर आने और नए श्रोताओं से रूबरू होने का अवसर प्रदान किया गया है। यह सम्मान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सम्मान किसी सरकारी संस्था या किसी राजनीतिक संगठन द्वारा नहीं दिया जा रहा है बल्कि कविता के प्रेमियों द्वारा कवियों को सम्मानित किया जा रहा है और यह बड़ी बात है। उन्होंने कामना की कि कविता कोश वेबसाइट पर अधिक से अधिक कवियों की ज्यादा से ज्यादा कविताएँ जुड़ें और यह हिंदी की सबसे बड़ी वेबसाइट बन जाए। चीमा जी ने कविता सुनाई....
कुछ लोगों से आँख मिलाकर पछताती है नींद
खौफ़ज़दा सपनों से अक्सर डर जाती है नींद
हमने अच्छे कर्म किए थे शायद इसीलिए
बिन नींद की गोली खाए आ जाती है नींद
(2)
मैं किसान हूँ मेरा हाल क्या मैं तो आसमाँ की दया पे हूँ
कभी मौसमों ने हँसा दिया कभी मौसमों ने रुला दिया
(3)
वो ब्रश नहीं करते
मगर उनके दाँतो पर निर्दोषों का खून नहीं चमकता
वो नाखून नहीं काटते
लेकिन उनके नाखून नहीं नोचते दूसरों का माँस

कवि विजेन्द्र ने कहा कि कविताएँ दॄष्टिविहीन (visionless) नहीं होनी चाहिए| देश को सही विकल्प की और बढ़ाने वाली कविता ही सर्वश्रेष्ठ हो सकती है। कविता कोश इस दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहा है। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि ऋतुराज, नंद भारद्वाज और मोहन श्रोत्रिय ने भी अपने अपने विचार प्रस्तुत किए।
समारोह में कविता कोश की तरफ से कविता कोश की प्रशासक प्रतिष्ठा शर्मा, कोश की कार्यकारिणी के सदस्य धर्मेन्द्र कुमार सिंह, टीम के भूतपूर्व सदस्य कुमार मुकुल एवं आदिल रशीद, संकल्प शर्मा, रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', माया मृग, मीठेश निर्मोही, राघवेन्द्र, हरिराम मीणा, बनज कुमार ‘बनज’ आदि उपस्थित थे।.
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दर्द तो यहां रहता है

दर्द फोड़े में न रहे
बाहर बहे
तो अच्‍छा
न करे दिल का रुख
सबसे अच्‍छा
दिल का दर्द
दिल में दर्द
नहीं जानते हैं सिर्फ
दिल्‍ली में रहने वाले।

दिल का दर्द
उस प्रत्‍येक को होता है
जो रखता है अपने पास
एक अदद नेक दिल
पर जरूरी नहीं
प्रत्‍येक दिलधारक को
दिल के दौरे पड़ें ही।

हां, उसका दिल
बेदर्दी से बांटता रहा हो
दर्द-ए-दिल
बहुत मशरूफियत से सबको
विनम्र उदारतापूर्वक
और दिल वाले
स्‍वीकारते रहते हों उसे
दर्द का निवास
होता तो सब जगह है
पर चीत्‍कार कुछ जगह
का ही करता है
सह जाते हैं
दर्द-ए-दिल भी
अंदर से पीडि़त होते हैं
पर बाहर से सहज
नजर आते हैं

तब ऐसा महसूस होता है कई बार
कि इस दिल में
दरियादिली से
मदिरा का दरिया बसता होगा
मदिरा में डूबे दिल में
दर्द का असर
भला कैसे होगा ?
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'फेसबुक' की 'तीसरी दुनिया'

'फेसबुक' की 'तीसरी दुनिया': "एक नई दुनिया बन कर तैयार हो रही है। यह दुनिया एक दूसरे से मिले बिना एक दूसरे से जुड़ी रहती है। एक दूसरे के सपने, गुस्से और दुख को बांटती है और पल भर में एक दूसरे के साथ जुड़ भी जाती है। यह बात अलग है कि जितनी तेजी से जुड़ती है, उतनी ही तेजी से उन संबंधों को किसी डस्टबिन में फेंक आगे निकल भी जाती है।

नए आकंड़े बड़ी मजेदार बातें बताते हैं। अगर दुनिया भर के फेसबुक यूजर्स की संख्या को आपस में जोड़ लिया जाए तो दुनिया की तीसरी सबसे अधिक आबादी वाला देश हमारे सामने खड़ा होगा।

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यहाँ पुरुष ,महिला है और बूढ़ा, सजीला जवान

इंटरनेट के आभाषी(वर्चुअल) गुण के कारण तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट हमें एक आभाषी दुनिया का हिस्सा तो बना रही है परन्तु वास्तविक दुनिया से दूर भी कर रही हैं. यहाँ सब-कुछ नकली है,लोगों के नाम,उम्र,पता,फोटो और खासतौर पर लिंग सब झूठे होते हैं.यहाँ पुरुष सामान्तया महिला बनकर और महिलाएं पुरुष बनकर मिलती हैं.पचास साल का व्यक्ति या तो स्वयं को नौजवान दिखायेगा या फिर आयु छिपाने के लिए अपने जन्म का साल ही नहीं लिखेगा.इस सबसे बढ़कर बात यह है कि यहाँ मौजूद लोग अपनी जवानी के दिनों की फोटो लगाए नज़र आते हैं और यदि बदकिस्मती से जवानी में भी खुदा ने नूर नहीं बख्शा था तो फिर किसी फिल्मी सितारे का मुखौटा लगाना तो सबसे आसान है.यदि आपके पास एक अदद सुन्दर-जवान चेहरा और महिला का अच्छा सा नाम है तो फिर आपके पास सोशल नेटवर्किंग साइट पर दोस्तों की लाइन लग जायेगी.महिला द्वारा लिखे गए उफ़ आज सोमवार हैजैसे फालतू

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US की हालत पतली होने का मतलब

आपको बिना आंकड़ों में उलझाए बात करने का प्रयास करूंगा इस लेख में.

हुआ क्या है-  अमरीका का हाल ”आमदनी अठन्नी ख़र्चा” रूपया जैसा है. यह हालत पहले भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी पर अब पहले से भी और पतली हो गई है. इसलिए अमरीकी संसद से और अधिक ऋण लेने की आज्ञा मांगी थी इसके राष्ट्रपति ने, जिस पर पहले तो संसद अड़ गई थी पर अंतत: इसे मानना ही था क्योंकि इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं था किसी के पास. इस समय, अमरीका के कुल वार्षिक उत्पाद का 95% के बराबर ऋण है आज इसकी सरकार पर. इस नए ऋण के दो मतलब हैं,   आगे पढ़िए
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चैनलों का चरित्र



फ़ज़ल इमाम मल्लिक

समाचार चैनलों का चरित्र लगातार बदल रहा है और समाचारों का भी। चैनलों को देख कर तो कभी-कभी यह भी लगता है कि उनका कोई चरित्र है भी या नहीं। दरअसल अब ख़बरें बनती नहीं हैं, बनाई जाती हैं और चैनल अपने-अपने चरित्र के हिसाब से ख़बरें गढ़ते हैं और फिर ख़बरें तेज़-तेज़ चैनलों पर भागती हैं। न तो इनकी कोई तसदीक़ की जाती है और न ही दर्शकों के मिज़ाज को समझने-परखने की कोशिश की जाती है। दर्शकों की परेशानी तब और बढ़ती है जब हर चैनल एक ही ख़बर को अपने-अपने तरीक़े से चलाता (कृप्या इसे दिखाता पढ़ें) है। मनोरंजन और हास्य की ख़बरों के नाम पर जिस तरह की सामग्री परोसी जाती है उसे देख कर तो और भी रोना आता है। न ढंग की प्रस्तुति और न ही बेहतर स्क्रिप्ट। भाषा को लेकर तो सतर्कता बरतने की न तो चैनल में बैठे मठाधीशों को फुर्सत है और न ही इस पर ध्यान देने की ज़रूरत महसूस की जाती है। लेकिन एक बात का ध्यान ज़रूर रखा जाता है, ख़बरों को परोसने में कौन चैनल कितना और कहां तक अतिनाटकीयता कर सकता है, इसे लेकर चैनलों में होड़ लगी रहती है। पत्रकारों पर हमले हों, कैटरीना कैफ़ का जन्मदिन हो, सुबोधकांत सहाय फैशन समारोह में हिस्सा ले रहे हों, शाहरुख ख़Þान मन्नत में जश्न मना रहे हों, चैनलों को ख़बर बनाने का मौक़ा मिल जाता है। लेकिन ख़बरें, ख़बरों की तरह नहीं दिखाई जाती हैं। चैनल फ़ौरन अदालत लगा बैठते हैं, नैतिकता, आदर्श, मूल्य और न जाने कितने भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल कर हर उस आदमी को कठघरे में खड़ा कर डालते हैं जो उनके हिसाब से ग़लत है। कई चैनल तो इससे भी आगे बढ़ जाते हैं और फैसला भी सुना डालते हैं। चलो हो गई छुट्टी। यानी चैनल ही सिपाही, जज और वकील सब कुछ हैं। शीशों की अदालतों में पत्थरों से गवाही ली जाती है और फैसला सुनाने में देरी भी नहीं की जाती। लेकिन इस अदालत में ख़ुद को खड़ा करने की न तो कभी कोशिश करते हैं और न ही इसकी ज़रूरत महसूस करते हैं। सारी नैतिकता, सारे आदर्श और सारे मूल्य दूसरों के लिए होते हैं, ख़ुद के लिए नहीं। चैनलों पर यह बात बिल्कुल फिट बैठती है। प्रिंट मीडिया से जुड़े होने की वजह से यह सब कुछ लिख रहां हूं ऐसी बात नहीं है। चैनलों का पल-पल बदलता चरित्र जब दिखाई देता है तो मीडिया से जुड़े होने की वजह से शर्मिंदगी होती है, थोड़ी बहुत खीझ भी और फिर चैनलों की जहालत पर ग़ुस्सा भी आता है। भाषा का संस्कार चैनलों ने जिस तरह बदला है उसे देख कर अपनी हिंदी ही समझ में नहीं आती है। और भी कई बातें हैं जो चैनलों के जगमगाते अंधेरे को देख कर अंदर तक कचोटती है।
हाल के दिनों में ख़बरों और चैनलों के चरित्र के विरोधाभास ने मुझ जैसे नासमझ और कमअक्Þल क़लमघसीट को भी अचंभित कर डाला। ख़बरों से ज्यÞादा ख़बरों को बनाने की जो एक दीवानगी रोज़ ब रोज़ बढ़ती जा रही है वह चिंता में डालने वाली है। फिर विज्ञापनों का खेल अलग ही होता है। बाज़ार का बाहरी और भीतरी दबाव ख़बरों को ही नहीं चैनलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है। ऐसे में परेशानी तो उस बेचारे दर्शक को उठानी पड़ती है जो सच जानने और समझने के लिए ख़बरें देखता है लेकिन ख़बरें जब कुछ और कहती हैं और विज्ञापन कुछ और कहानी बयान करती हो तो फिर दर्शक के लिए यह तमीज़ करना तो मुश्किल ही हो जाता है कि सच ख़बरों में है या फिर ख़बरों के पीछे। अभी कहां कितने दिन हुए, राष्ट्रीय स्तर के चैनल आईबीएन सेवन के दो पत्रकारों को लखनऊ में पुलिस वालों ने पीटा और उनमें से एक पर फ़जर्Þी मुक़दमा लादने तक की धमकी दी थी। चैनल ने इस ख़बर को दो-तीन दिन प्रमुखता से चलाया। चैनल के प्रमुख राजदीप सरदेसाई से लेकर चैनल के दूसरे प्रमुख पत्रकारों ने इस पर तीखी टिप्पणी की। अपने को महारथी मानने वाले चैनल से जुड़े पत्रकारों ने मायावती सरकार की ख़बर लेने में किसी तरह की कोताही नहीं की। आईबीएन सेवन के साथ-साथ कई चैनलों में उत्तरप्रदेश में अपराध के बढ़ते ग्राफ़ पर लगातार ख़बरें आ रही थीं। चैनल मुख्यमंत्री मायावती के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन को भी कठघरे में खड़ा करने के लिए हर तरह के संज्ञा-विशेषण लगा रहे थे। आईबीएन सेवन के पत्रकारों के साथ यह घटना घटी थी इसलिए उसने इस ख़बर को प्रमुखता से प्रसारित किया और प्रसारण के दौरान मायावती और उनकी सरकार को जितना कोस सकते थे कोसा। लेकिन हैरत और शर्मिंदगी तब हुई जब इस ख़बर के तुरंत बाद मायावती का गुणगाण करता विज्ञापन आईबीएन सेवन पर चलने लगा। वह भी कई मिनट का विज्ञापन। विज्ञापन में मायावती और उनकी सरकार के क़सीदे पढ़े गए थे और वही चैनल उसे दिखा रहा था जो ठीक पहले मायावती की सरकार को पानी पी-पी कर कोस रहा था। लेकिन आईबीएन सेवन ही क्यों हर वह चैनल जो मायवाती के जंगल राज का जिक्र करने में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में जुटा था, मायावती के गुणगान वाले इस विज्ञापन को उतनी ही प्रमुखता से दिखा रहा था। यानी एक तरफ़ जंगल राज की ख़बरें और दूसरी तरफ़ विकास की राह पर उत्तर प्रदेश को ले जातीं मायावती की तस्वीरें। अब ख़बरों और विज्ञापनों के इस घालमेल पर कौन ऐताबर करे और किस पर करे। ख़बरों में मायावती और उनका कुशासन दिख रहा है लेकिन इन ख़बरों के ठीक बाद वही मायावती उत्तरप्रदेश की मसीहा के तौर पर उन चैनलों पर ही महिमामंडित की जाती हैं। ख़बरों और विज्ञापनों के इस खेल को देख कर तो यही लगता है कि चैनल विधवा-विलाप ही करने में ज्यÞादा दिलचस्पी रखते हैं। याद करें कुछ चैनलों पर पीएसीएल नाम की एक कंपनी को लेकर भी ख़ूब खबरें चलीं लेकिन फिर चैनलों पर कंपनी के विज्ञापन भी ख़ूब चले। बेचारा दर्शक समझ नहीं पाता है कि सही क्या है ख़बर या विज्ञापन। निजी हितों के लिए भी मीडिया अपना इस्तेमाल किस तरह करता है इसे भी चैनलों से सीखा जा सकता है। मोहब्बत और जंग ही नहीं अब तो धंधे में भी सब जायज़ लगता है।
ख़बरों को दिखाने के लिए ख़बरें बनाने का खेल चल रहा है। नैतिकता, आदर्श और मूल्यों की दुहाई दी जाती है लेकिन अपना चेहरा आईना में देखने की ज़हमत कोई चैनल नहीं उठाता। मुंबई धमाकों के बीच थोड़े अंतराल के बाद दो ख़बरें दिखाई गईं। पहले केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के फैशन समारोह में हिस्सा लेने की और फिर शाहरुख़ ख़ान के घर पर कटरीना कैफ़ के जन्मदिन समारोह की। इन ख़बरों को चैनलों ने ऐसे-ऐसे ‘व्यंजनों’ के साथ परोसा कि मुझ जैसा आदमी तो परेशान हो उठा। ‘मंत्री मस्त’ या ‘शर्म नहीं आती’ जैसे विशेषणों के साथ ख़बरें चलाईं गईं और सुबोधकांत विलेने की तरह लोगों के सामने पेश किए गए। मुंबई धमाकों में जो शहीद हुए थे या जो ज़ख़्मी होकर अस्पतालों में थे, उसकी पीड़ा सुबोधकांत सहाय को नहीं हुई होगी, ऐसा सोचना भी बेवक़ूफ़ी ही होगी। लेकिन फैशन समारोह में मौजूद चैनलों के रिपोर्टरों और कैमरावालों को धमाकों के बीच यह बड़ा मसाला दिखा और फिर शुरू हो गई चैनलों पर ‘फ़ैशन परेड’। सियासतदानों की संवेदनहीनता के बहाने चैनलों ने इस फ़ैशन समारोह को इतनी बार दिखाया कि इनके बीच मुंबई धमाकों की गूंज गुम हो गई। सियासतदानों को नसीहत देते वक्Þत चैनल भूल गए कि उनकी भी कुछ मर्यादा होती है। उनके लिए भी नैतिकता, आदर्श और मूल्य उतने ही ज़रूरी हैं जितना किसी भी सियासतदां के लिए। सुबोधकांत सहाय के साथ उस फ़ैशन समारोह में कितने चैनलों और मीडिया के ख़बरनवीस मौजूद थे, किसी चैनल वाले ने यह नहीं बताया और उन्हें कठघरे में खड़ा नहीं किया। दहशत्गर्द हमलों के दौरान किसी सियासतदां का फैÞशन समारोह में हिस्सा लेना सही नहीं है तो उसी तरह तमाम मीडिया वालों सहित उन तमाम लोगों का भी उसमें शिरकत करना ग़लत है। वे भी उतने ही संवेदनहीन और ग़ैरज़िम्मेदार हैं जितने सुबोधकांत सहाय। चैनलों या कहें मीडिया को यह छूट तो नहीं दी जा सकती कि वे धमाकों के बीच फ़ैशन समारोह में हिस्सा लें, अपने चैनल पर हंसी के कार्यक्रम दिखाएं, सीरियलों में क्या कुछ हो रहा है उसे बताएं और किस हीरो का किस हीरोइन के साथ चक्कर है दिखाते रहें, अपने स्टूडियो में फ़िल्म वालों को बुला कर उनकी आने वाली फ़िल्मों पर बतियाते रहें, सालों पहले किसी चैनल पर हुए हास्य कार्यक्रमों की भौंडी नक्Þल पेश करते रहें और फिर किसी भी मंत्री या नेताओं को कठघरे में खड़ा कर उन पर लानत भेजते रहें। उन पर लातन भेजने से पहले चैनलों को ख़ुद पर लानत भेजना चाहिए था क्योंकि इन धमाकों के बाद भी बाज़ार चैनलों को चलाता रहा। कंडोम के विज्ञापन भी दिखाए गए और परफ्यूम के नाम पर ‘औरतों का जिस्म’ भी दिखाया गया। तेल भी बेचे गए और खेल भी होते रहे। जितने चैनल उतने खेल। चैनलों को तब नैतिकता याद नहीं आई और न ही ‘सुबोधकांत सहाय’ की तरह शर्म। नैतिकता के दो अलग-अलग पैमाने तो नहीं हो सकते, चैनलों के लिए अलग और मंत्रियों या सियासतदानों के लिए अलग। चैनलों के रिपोर्टरों और एंकरों को बोलते देख कर तो कभी ऐसा नहीं लगा कि मुंबई धमाकों की वजह से उन्हें कोई पीड़ा हुई है। उनकी आवाज़ में किसी तरह का ग़म या दुख का एक नन्नहा कÞतरा भी नहीं दिखाई दिया। बल्कि ख़बरों को परोसते हुए जिस उत्साह के साथ वे बोल रहे थे, उससे तो ऐसा नहीं लग रहा था कि मुंबई धमाका कोई बड़ा हादसा नहीं था जिसमें कइयों की जानें चली गर्इं बल्कि ऐसा लग रहा था मानो भारत ने क्रिकेट विश्व कप जीत लिया है। उत्साह से भरे ऐंकरों और रिपोर्टरों पर मुंबई धमाके का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था और वे अपने-अपने तरीक़े से ख़बरों को परोस रहे थे बिना किसी संवेदना के। क्योंकि मुंबई धमाका उनकी दुकानदारी चलाने का एक बेहतर ज़रिया बन कर सामने आया था और हर चैनल ‘धमाकों के इस खेल’ में शामिल हो कर अपनी दुकान चमकाने में जुट गया था। कई चैनलों ने धमाकों के बाद दाऊद इब्राहीम को लेकर कई ख़बरें इस तरह चलार्इं मानो दाउद इब्राहीम ने सारी योजना उनके रिर्पोटर-कैमरामैनों के सामने ही बनाए थे। ख़बर को विश्वसनीय बनाने के लिए जितना नाटक कर सकते थे चैनल करते रहे। पुरानी क्लिपिंग्स के साथ ख़बरों को अपने-अपने तरीक़े से परिभाषित करने का खेल भी इन दिनों ख़ूब चल रहा है चैनलों में। ऐसा करते हुए चैनल अक्सर अपनी सीमा लांघ जाते हैं। उन्हें क्या और कितना दिखाना या बताना है वे यह भूल जाते हैं और नतीजा यह होता है ख़बरें कहीं पीछे छूट जाती हैं और दूसरी चीजें आगे निकल जाती हैं।
चैनलों का यह दूसरा चेहरा है जो किसी भी दूसरे व्यक्ति के सामने आईना रख कर कहता है, इसमें अपना चेहरा देखो लेकिन वह उस आईने को अपने सामने रखने से परहेज़ करता है। ठीक उसी तरह जिस तरह शाहरुख ख़ान के घर पर कैटरीना कैफ़ की जन्मदिन की पार्टी को चैनलों ने ‘बालीवुड के बेशर्म’ के नाम से ख़ूब चलाया। यह बात दीगर है कि ख़ुद समाचार चैनलों ने भी ‘कैटरीना का जन्मदिन’ मनाने में किसी तरह की कंजूसी नहीं दिखाई। गांव-गिराम के मुहावरे में बात करूं तो ‘तुम करो तो रासलील, मैं करूं तो कैरेक्टर ढीला’ (अब यह मुहावरा एक फ़िल्म में गीत के तौर पर इस्तेमाल हुआ है)। आदर्श, नैतिकता और मूल्यों के पैमाने अलग-अलग नहीं हो सकते, चैनलों को इसका ध्यान रखना होगा। वैसे भी नीरा राडिया ने हमारे मीडिया के सामने एक आईना तो रख ही दिया है, किसी को कठघरे में खड़ा करने से पहले उस आईने में अपने आपको निहारना ज़रूरी हो गया है। क्या हम ऐसा करेंगे, बड़ा सवाल यह है।
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