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अवाम




फ़ज़ल इमाम मल्लिक



सत्ता के शीर्ष पर जब वह पहुंचा तो हैरान रह गया...क़दम-क़दम पर बेईमानी...भ्रष्टाचार....।
आदर्श और मूल्य बस अब सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गए हैं...उसे पहले डर भी लगा। किस-किस के खिलाफ़ वह हल्ला बोले....ऊपर से नीचे तक सब एक ही रंग में रंगे थे....लेकिन फिर उसने हिम्मत जुटाई...धीरे-धीरे सत्ता पर पकड़ बनाई। लोगों की आंखों से आंसू पोंछने के लिए वह लगातार कोशिश करता रहा....भ्रष्ट और बेईमानों की परेशानी बढ़ी....सत्ता में उसके सहयोगी उसके ख़िलाफ़ होने लगे तो पार्टी में उसके कामकाज के तरीक़े को लेकर फुसपुसाहट शुरू हो गई। लेकिन इन सबसे बेपरवाह वह लोगों के पक्ष में खड़ा होना उसने नहीं छोड़ा।
धीरे-धीरे विरोध बढ़ता गया। पार्टी और उसके सहयोगी उसे सत्ता से बेदखल करने के लिए लामबंद हुए...और फिर सबने एक सुर में उसे हटाने की मांग करने लगे....।
सारे विरोध के बावजूद वह अब भी सत्ता के शिखर पर बैठा हुआ है.....अवाम उसके साथ हैं....।

चुनाव

सत्ता के लिए पार्टी चाहिए और पार्टी चलाने के लिए पैसा...।
उसने पहले पार्टी बनाई....फिर पैसा और उसके बाद सत्ता हासिल की.....।
सब कुछ ठीक चल रहा था....सत्ता उसके पास थी और पैसा उस पर बरस रहा था....पैसा अब उसकी मजबूरी नहीं कमज़ोरी बन गई थी.....इस कमज़ोरी की वजह से उसकी परेशानी बढ़ती गई....उसके अपने साथी-संगी उसका साथ छोड़ने लगे....और एक दिन ऐसा आया कि उसे पैसा और लोगों में से किसी एक को चुनना था.....
उसने पैसे को चुना....अगले दिन लोगों ने उसे सत्ता से बेदख़ल कर दिया....।
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दिवाली से पहले दिवाली का तोहफ़ा

अगर चाहिये दिवाली से पहले दिवाली का तोहफ़ा तो इस लिंक पर तशरीफ़ लाइये और अपना तोहफ़ा ले जाइये

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ब्लॉगिंग पर एक अच्छी किताब

ब्लाग पर लिखने-पढ़ने वालों की एक बड़ी जमाअत ने भाषा की जो नई इबारत गढ़ी उसमें और सब कुछ था सिवाय भाषा की तमीज़ के। गालीगलौज से होते हुए निजी खुन्नस तक का ज़रिया बन गया ब्लाग और एक तबक़ा ऐसा भी रहा जिसने इस पर रोक लगाने की बजाय इसकी हिमायत की और इस क़वायद में ख़ुद सामिल होकर इसके मज़े भी लेने लगा।

ब्लॉगिंग में इस तरह की बढ़ती प्रवृति ने इसे नुक़सान भी काफ़ी पहुंचाया और लोगों ने इसे गंभीरता से लेना बंद कर दिया। लेकिन इन सबके बावजूद ब्लॉगिंग आज अभिव्यक्ति का नए माध्यम के तौर पर स्थापित हुआ है तो इसकी वजह वे गंभीर ब्लागर हैं जो लगातार अपनी सक्रियता से संचार माध्यमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए हुए हैं और साहित्य के साथ-साथ दूसरे विषयों पर लगातार लिख-पढ़ रहे हैं। कौन है वो और किस किताब की बात कर रहे हैं सृजनगाथा में फ़ज़ल इमाम मल्लिक ?


सृजनगाथा पर आज एक और महत्वपूर्ण ब्लॉगर डा. जाकिर अली रजनीश ने की है एक अतिमहत्वपूर्ण 
पुस्तक की चर्चा, बिना किसी भूमिका के आइये चलते हैं सृजनगाथा की ओर-



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अन्‍ना हजारे ने बनाया ब्‍लॉग : अब जरूर भ्रष्‍टाचार जाएगा भाग

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4th Haryana International Film Festival from Sept. 30 to Oct. 7, 2011




यमुनानगर, २९ सितंबर (जनसत्ता) चतुर्थ हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह एवं फिल्म एप्रीशिएशन कोर्स ३० सितंबर से ७ अक्टूबर तक डीएवी गल्र्स कालेज यमुनानगर आयोजित किया जा रहा है। इसमें देश विदेश के सुप्रसिद्ध कलाकार, फिल्म निर्माता, निर्देशक, लेखक, समीक्षक एवं कलाकार भाग ले रहे हैं। हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के निदेशक अजित राय तथा डीएवी गल्र्स कालेज प्रिंसिपल सुषमा आर्य ने एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी दी।
विश्व की जानीमानी ब्रिटिश फिल्मकार लेसली उडविन शनिवार एक अक्टूबर की सुबह १० बजे फिल्म समारोह का उद्घाटन करेंगी। उनकी नई फिल्म वेस्ट इज वेस्ट से फिल्म समारोह का शुभारंभ होगा। इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले सुप्रसिद्ध अभिनेता ओमपुरी इस अवसर पर दर्शकों से संवाद करेंगे। कुंदन शाह, सतीश कौशिक, राजेंद्र गुप्ता, गौतम घोष और ऐंटरटेनमेंट सोसायटी ऑफ गोवा के सीईओ मनोज श्रीवास्तव समारोह में विशिष्ट अतिथि होंगे। कांगे्रस के महासचिव और राज्य सभा सांसद चौधरी बिरेंद्र सिंह इसी दिन शाम चार बजे ग्रांड हरियाणा प्रीमियर सेक्शन का शुभारंभ करेंगे। इसमें देश विदेश की १० ऐसी फिल्में दिखाई जा रही है, जो व्यावसायिक रूप से सिनेमा घरों में रिलीज नहीं हुई है। सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता कुंदन शाह की नई फिल्म थ्री सिस्टर्स से हरियाणा प्रीमियर सेक्शन का शुभारंभ होगा। फिल्मोत्वस में उनकी कालजेयी फिल्म जाने भी दो यारो का विशेष प्रदर्शन किया जाएगा। दो अक्टूबर को मौहल्ला लाइव एक विशेष प्रोग्राम पेश कर रहा है-मेकिंग ऑफ एन एक्टर, मनोज बाजपेयी। इसमें अभिनेता मनोज बाजपेयी से अविनाश और
दर्शकों का संवाद दो अक्टूबर को दिन में दो बजे से चार बजे के बीच आयोजित किया जा रहा है। इसी दिन शाम को हरियाणा से जुड़े सुप्रसिद्ध अभिनेता फिल्मकार सतीश कौशिक अपनी ब्रिटिश फिल्म ब्रिक लेन प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने बताया कि शुक्रवार ३० सितंबर की शाम पांच बजे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के प्रधान सचिव शिव रमन गौड चौथे फिल्म एप्रिशिएशन कोर्स का शुभारंभ करेंगे। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज, सुरेश शर्मा, विनोद भारद्वाज, अतुल तिवारी आदि विशिष्ट अतिथि होंगे। कोर्स के निदेशक सुप्रसिद्ध फिल्मकार संजय सहाय हैं।
हरियाणा फिल्म समारोह के निदेशक अजित राय ने बताया कि इस बार क्षेत्रीय सिनेमा खंड में भोजपुरी सिनेमा पर सात अक्टूबर को विशेष आयोजन किया जा रहा है। इसमें भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार मनोज तिवारी और फिल्म निर्माता काशाीनाथ मिश्रा शिरकत कर रहे हैं। समापन समारोह में सुप्रसिद्ध सीरियल चाणक्य एवं पिंजर फिल्म के निर्माता निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी मुख्य अतिथि होंगे।
उन्होंने बताया कि फिल्म समारोह में हाल ही में दिवंगत हुए विश्व प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल और सदबहार अभिनेता शम्मी कपूर को श्रद्धांजलि दी जा रही है। जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी मणि कौल की फिल्म नौकर की कमीज (५ अक्टूबर) प्रस्तुत करेंगे। इससे पहले एक अक्टूबर को सुरेश शर्मा की फिल्म शम्मी कपूर-द किंग ऑफ रोमांस दिखाई जाएगी। अजित राय ने बताया कि विश्व सिनेमा खंड में इस समय की पांच सर्वश्रेष्ठ चर्चित फिल्में दिखाई जाएगी। जिसमें रोमन पोलंसकी की द घोस्ट राइटर, अब्बास किरोसतामी की स्टीफाइड कॉपी, पीटर चांग की वॉर लॉट्स, समीरा मखमलबॉफ की ब्लैक बोर्ड, बिलेऑगस्ट की गुड बॉय बाफना, पेडरो अलमोडोर की वॉल्वर आदि प्रमुख है। ईरान का विद्रोही सिनेमा फेस्टीवल का मुख्य आकर्षण होगा।
उन्होंने बताया कि बाल फिल्मोत्सव का शुभारंभ नील माधव पांडा की बहुचर्चित फिल्म आई एम कलाम से होगा। डीएवी गल्र्स कालेज की प्र्रिंसिपल सुषमा आर्य ने बताया कि चौथे वर्ष में हरियाणा फिल्म समारोह सच्चे अर्थ में अंतर्राष्ट्रीय हो चुका है। इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा की नई छवि विकसित हुई है और डीएवी कालेज का नाम दुनियाभर में लोग जानने लगे हैं।
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आपको क्‍या पसंद है हिंदी ब्‍लॉगरों ?

चश्‍मा
या
कलम

शपथ
या
कसम

कुरर्ता
या
मूंछें

कान
या
बाल

गाल
या
विचार

नाक
या
नाम

बतलायें
खुलेआम ?


कैरिकेचर सौजन्‍य सागर
चश्‍मा सौजन्‍य ललित शर्मा

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दूसरों से अलग दिव्या दत्ता



फ़ज़ल इमाम मल्लिक

ईद की छुट्टियों के बाद लौटा ही था कि सुकृति कालरा का मेल मिला। सुकृति ने मेल के जÞिरए मुझे जानकारी दी थी कि दिव्या दत्ता दिल्ली आने वाली हैं और वे कुछ लोगों से मिलना चाहती हैं। फिर सुकृति से फ़ोन पर बात हुई तो उन्होंने बताया कि दिव्य दत्ता मनोरंजन चैनल मैक्स के लिए एक टीवी कार्यक्रम की मेजबानी करने जा रही हैं। फ़िल्मों को आधार बना कर पेश किए जाने वाले कार्यक्रम ‘एक्स्ट्रा शॉट्स चैलेंज’ की होस्ट दिव्या होंगी। यक़ीनन इस जानकारी ने उत्सुकता बढ़ाई थी। दिव्या को छोटे परदे पर इस तरह के कार्यक्रम की मेज़बानी करते देखना एक अलग तरह का अनुभव होगा, इसलिए नहीं कि वे फ़िल्मों से जुड़ी हैं बल्कि इसलिए कि वे एक बेहतरीन अदाकारा हैं और अपने अभिनय से लोगों को उन्होंने क़याल भी बनाया है। भले ही वे सहायक किरदारों में नज़र आती रहीं हों लेकिन अपने हर किरदार को बेहतरीन ढंग से उन्होंने जिया है और अपने अभिनय से फ़िल्म को वुसअत भी दी। वे ख़ूबूसरत तो हैं ही उतनी ही अच्छी उनकी आवाज़ है जो उनके अभिनय को लोगों तक बेहतरीन ढंग से संपे्रषित करती है।
दिव्या दत्ता का नाम सामने आते ही उनके कई चेहरे ज़ेहन में कौंधने लगते हैं। कई फ़िल्में फ्लैशबैक में नज़रों के सामने से गुज़र जाती हैं। एक के बाद दूसरा चरित्र लेकिन इन चरित्रों के बावजूद सामने सिफर्Þ एक नाम रह जाता है एक चुलबुली और खिलंडरी सी अदाकारा दिव्या दत्ता का। परदे पर उन्हें देखना बराबर ही सुखद रहा क्योंकि उनके अभिनय में एक अलग तरह की ताज़गी हमेशा ही दिखाई देती है। इसलिए इस न्योते पर मैंने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा डाली। पत्रकारिता के लंबे करिअर में फिल्म, खेल, मनोरंजन, कला, साहित्य से जुड़ी हस्तियों से मिलने का मौक़ा अक्सर ही मिलता रहता है। यह बात अलग है कि फ़िल्म से जुड़ी शख़्सियतों ने मुझे उतना प्रभावित कभी नहीं किया जितना कला, खेल या साहित्य से जुड़े लोगों ने किया। इसके बावजूद दिलीप कुमार, अमरीश पुरी, ए.के. हंगल, शबाना आज़मी, मिथुन चक्रवर्ती, सुशांत सिंह से मिलना और उनसे बातचीत करना एक नए अनुभव से गुज़रने जैसा था। दिव्या दत्ता को लेकर भी मेरे अंदर जो तस्वीर उभर रही थी वह कुछ-कुछ इसी तरह की थी। इसलिए दिव्या दत्ता से मुलाक़ात को लेकर एक उत्सुकता थी। सुकृति ने तय समय पर गाड़ी भी भिजवा दी थी लेकिन रास्ते में भीड़भाड़ काफ़ी थी, इसलिए तय समय से क़रीब पंद्रह-बीस मिनट देर से होटल पहुंचा। वहां कार्यक्रम को लेकर किसी तरह की गहमागहमी नहीं थी जो अमूमन फ़िल्मवालों को लेकर रहती है। मुझे कुछ अजीब लगा। रिस्पेशन पर पूछताछ की तो पता चला कि यहां कोई कार्यक्रम नहीं है। होटल के बैंक्वेट हाल में काम चल रहा था। एक पल को सोचा कहीं मैं ग़लत जगह तो नहीं आ गया लेकिन सुकृति ने जो मेल किया था उसमें तो यहां का ज़िक्र ही था। इसलिए बिना देर किए सुकृति को फ़ोन लगाया। तभी वे लॉबी में ही दिख गर्इं। तब तक उनकी नज़र भी मुझ पर पड़ चुकी थी। वे अपनी दो और सहयोगियों के साथ वहां मौजूद थीं। उन्होंने पहले मेरी मुलाक़ात उनसे कराई और फिर बताया कि कार्यक्रम में थोड़ा विलंब है। यों भी फिÞल्मवालों के कार्यक्रम देर से ही शुरू होते हैं इसलिए मैं आशवस्त था कि मुझे देर नहीं हुई है और सुकृति ने मेरी बात की तसदीक़ भी कर दी। उन्होंने बताया कि दिव्या थोड़ी देर से पहुंची हैं। वे कार्यक्रम के सिलसिले में अपने गृह राज्य पंजाब में थीं। उन्हें दूसरे दिन सुबह की फ्Þलाइट से लखनऊ जाना है इसलिए एअरपोर्ट के पास के होटल में उनसे मिलने का कार्यक्रम रखा गया। लेकिन हैरत इस बात को लेकर हुई कि उनसे मिलने वालों में कुल जमा चार लोग ही थे। फ़िल्मों पर कभी-कभार लिखने की वजह से उनमें से एक-दो लोगों से मेरी मुलाक़ात थी। लेकिन हैरत इस बत पर मुझे थी कि अमूमन फिÞल्मवाले अपनी छवि को लेकर बेतरह संवेदनशील होते हैं और उनके इर्दगिर्द फ़ोटोग्राफ़रों की एक बड़ी भीड़ होती है। कैमरों के फ्Þलशलाइटों की चमक की उन्हें आदत होती है लेकिन यहां तो कहीं कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। थोड़ी देर बाद ही मैक्स चैनल की भारती काबरे आर्इं और उन्होंने दुआ-सलाम के बाद बताया कि पांच-दस मिनट के बाद दिव्या हमारे साथ होंगीं। भारती अख़बारों से जुड़ी बातों की जानकारी लेती रहीं। उनसे बातचीत हो रही थी कि अचानक दिव्या आ खड़ी हुईं। बिना किसी तामझाम के। न बाउंसर, न बाडीगार्ड न कैमरों की चमक और न ही भीड़ से उन्हें दूर रखने की कोशिश करते लोग। अपने पास अचानक उन्हें देख कर लगा कि अपने घर की कोई लड़की है। उन्हें देखने के बाद लगा ही नहीं कि उनका ताल्लुक़ फ़िल्मों से भी हो सकता है। पूरी आस्तीन की छींटेदार क़मीज़ और जिंस की पैंट। क़मीज़ का रंग भी सोबर, हल्के फ़िरोज़ी रंग पर उजले-उजले छोटे फूल। उन्हें इस तरह अपने पास खड़ा देख कर मैं कह बैठा- ‘आप तो बहुत अपनी-अपनी लगती है, जैसे अपने घर की कोई लड़की’। वे हौले से हंसीं और कहा- ‘हां, मैं तो हूं ही आपके घर की।’
और इस एक जुमले ने ही दिव्या की पूरी शख़्सियत को हमारे सामने रख दिया था। दिव्या फिÞ ल्मों में काम करते हुए भी दूसरों से अलग थीं। ठीक है कि वे फ़िल्मों में मुख्य किरदार नहीं निभाती थीं लेकिन अपने किरदारों के साथ वे जीतीं थीं इसलिए उन्होंने जितनी भी फिÞल्में कीं, उनमें अलग-अलग किरदारों में नज़र आर्इं। ‘वीरज़ारा’ ‘वेलकम टू सजन्नपुर’ ‘दिल्ली-6’ ‘सिलसिले’ ‘बाग़बां’ ‘अग्निपंख’ ‘आजा नच ले’ ‘उमराव जान’ ‘यू मी और हम’ सहित दर्जनों फ़िल्म में काम करने वाली दिव्या को ‘वीरज़ारा’ की शन्नो ने पहचान दिलाई तो ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ की विंध्या ने उसे विस्तार दिया और ‘दिल्ली-6’ की जलेबी ने उनके अभिनय को नई ऊंचाई पर ला खड़ा किया। ज़ाहिर है कि हर फ़िल्म में अलग-अलग किरदारों में दिखाई देने वाली दिव्या अपने किरदारों को पूरी तरह जीने की कोशिश करती हैं। ‘चेहरे’ और ‘ज़िला ग़ाज़ियाबाद’ इस विस्तार को आगे ले जाता है। ‘दिल्ली-6’ और ‘वीरज़ारा’ के लिए तो उन्हें सहायक भूमिका के लिए पुरस्कार भी मिला है लेकिन देश में पुरस्कारों की जो राजनीति और गणित है दिव्या के अभिनय को उस पैमाने से नहीं देखा जा सकता क्योंकि दिव्या ने अपने किरदारों को जो ऊंचाई दी है वह इन पुरस्कारों से कहीं आगे की चीज़ है। इसलिए उस शाम उन्हें अपने बीच इस तरह पाना एक हैरत से भर गया।
वहीं खड़े-खड़े औपचारिक बातचीत होती है। फिर उन्हें बताता हूं कि आपसे मुलाक़ात के लिए आ रहा था तो बेटी का फ़ोन आया था। उसे जब बताया कि आपसे मिलने आ रहा हूं तो उसने छुटते ही कहा था ‘आप वीरज़ारा की शन्नो से मिलने जा रहे हैं’। दिव्या यह सुन कर हंसीं और कहा-मुझे शन्नो के तौर पर ही ज्Þयादर लोग जानते हैं। आगे की बात होती इससे पहले ही मैक्स के कार्यकारी उपाध्यक्ष नीरज व्यास ने कहा कि क्यों नहीं हमलोग खाने की मेज़ पर ही बातचीत करें। हम सभी रेस्तरां की तरफ बढ़ गए। वहां टेबल पहले से ही रिजर्व था। हम कुल जमा सात लोग थे। गोलाकार टेबल पर हम बैठे ही थे कि मैक्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष गौरव सेठ भी आ गए। खाने वैगरह के बारे में भारती ने हम लोगों से पूछा तो मैंने उन्हें अपनी पसंद से चीजें मंगवाने की छूट दे दी। भारती ने इतना ज़रूर पूछा कि हम वेजेटेरियन खाना पसंद करेंगे या नानवेजेटेरियन। भारती को हमने बताया कि नानवेजेटेरियन खाना ही पसंद करेंगे। भारती ने यही सवाल दिव्या से भी किया और किसी बच्चे की तरह उन्होंने कहा कि आज तो वे भी नानवेज ही खाएंगी।
आर्डर वग़ैरह देने की ज़िम्मेदारी भारती निभा रहीं थीं। इसलिए हम दिव्या के साथ बातचीत में मशग़ूल हो गए। बातचीत के केंद्र में दिव्या और फ़िल्में ही थीं। दिव्या को फ़िल्मों में अदाकारी करते हुए लंबा अरसा बीत गया है। कई यादगार फ़िल्में उन्होंने की। फ़िल्मों में काम करते हुए कई खट्टे-मीठे अनुभव उन्हें हुए। अपने किरदारों को उन्होंने बेहतरीन ढंग से जीने की कोशिश की। वे बेलौस ढंग से बात करती हैं। बिना किसी पसोपेश के कहती हैं, मेरी वजह से फिल्में हिट नहीं होतीं। फ़िल्में कामयाब होती हैं तो बस उसका श्रेय चार-पांच अदाकारों को ही जाता है। सच कहूं तो नायिकाओं की वजह से भी फ़िल्में हिट नहीं होतीं। कामयाबी की गारंटी हीरो ही होता है। एक कामयाब हीरो के साथ किसी भी नई लड़की को लेकर फिÞल्म बना लें, वह कामयाब हो सकती है लेकिन नायिकाओं के साथ ऐसी बात नहीं है। जब नायिकाएं कामयाबी की गारंटी नहीं होतीं तो फिर हम किसी फ़िल्म को कामयाब तो कर ही नहीं सकते। तसल्ली इस बात की होती है कि हमें जो काम करने को मिला उसे बेहतर ढंग से निभा दिया। छोटे परदे पर अपने नए कार्यक्रम ‘एक्स्ट्रा शाट्स चैलेंज’ को लेकर उत्साहित दिखीं दिव्या। इस कार्यक्रम में फ़िल्मों से जुड़े सवालों का जवाब प्रतियोगियों को देना होता है। वे बताती हैं- यक़ीन करें ढेरों ऐसी बातें इस दौरान मुझे पता चलीं जिसकी जानकारी मुझे नहीं थी, जबकि मेरा ताल्लुकÞ फ़िल्मों से रहा है। मुझे बहुत कुछ सीखने का मौक़ा मिला है इस दौरान। दरअसल यह सीखना ही जीवन में लगा रहता है।
इस बीच वेटर पहले कोल्ड ड्रिंक्स और जूस रख गए थे। थोड़ी देर बाद ही कई तरह के कबाब हमारे सामने थे। शामी कबाब, टंगरी कबाब, चिकन टिक्का, मटन सीख़ कबाब और झींगा का कबाब वेटर हमारे प्लेट में एक-एक कर डाल गए। दिव्या के साथ बातें भी जारी थीं और कबाबों का मज़ा भी हम ले रहे थे। कबाब जितने लज़ीज़ थे दिव्या की बातें उतनी ही दिलचस्प। दिव्या फ़िल्मों में निभाए अपने किरदारों से बेतरह संतुष्ट दिखीं। एक कलाकार के तौर पर उन्होंने अच्छे किरदारों में बेहतरीन अभिनय किया और उनके चेहरे पर संतोष की इबारत साफ़ पढ़ी जा सकती थी। अच्छी बात यह है कि उन्होंने एक जैसे किरदार दूसरी फ़िल्मों में नहीं निभाए। वे बताती हैं मुझे आॅफ़र तो मिले लेकिन मैंने मना कर दिया। ‘वीरज़ारा’ और ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ के किरदारों को वे बेहतरीन मानती हैं। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर बनाई गई फ़िल्म ‘वीरज़ारा’ में शन्नो को किरदार को वे अपने दिल के बहुत पास मानती हैं। दिव्या कहती हैं इसकी एक वजह तो यह भी हो सकती है कि हम जिस इलाक़े से आते हैं वहां लोगों ने बंटवारे का दर्द देखा है। छुटपन से ही बंटवारे की कहानी सुनती रहती थी इसलिए यह किरदार मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा-सा बन गया। स्कूल और कॉलेज के दिनों में दिव्या ने नाटकों में भी काम किया। वे साफ़ कहती हैं लोग यह समझते हैं कि मैंने एनएसडी से अभिनय की तालीम हासिल की है लेकिन ऐसा नहीं है। स्टेज से मेरा रिश्ता कॉलेज औक स्कूल के दिनों में रहा है और शुरुआती दौर में मैंने जो अभिनय किया वह फ़िल्मों में काम आया। दिव्या साफ़गोई से अपनी बातें बता रहीं थीं और कबाब का लुत्फ़ भी ले रहीं थीं। कबाबों के बीच ही दिव्या ने कहा कि फिल्मों में वे इसलिए नहीं आर्इं हैं कि एक तरह के किरदार निभाती रहीं बल्कि वे इसलिए आर्इं हैं कि हर बार कुछ नया और अलग करें। वे कहती हैं ‘ फ़िल्मों में मैं आई ही इसलिए हूं कि आफबीट फ़िल्मों में काम करूं और इस मामले में थोड़ी ख़ुशक़िस्मत भी रहीं हूं कि मुझे इस तरह की भूमिका मिली’। दिव्या की फ़िल्में इस बात की तसदीक़ भी करती हैं। हर फ़िल्में में अलग किरदार और हर किरदार में ख़ुद को ढाल लेना दिव्या के अभिनय की ख़ूबी कही जाएगी। इस बीच सिनेमा से जुड़ी दूसरी बातें होती रहीं। फ़िल्मों के वर्तमान ट्रेंड से लेकर कॉमेडी के नाम पर अशलीलता परोसे जाने पर चर्चा हुई। अच्छी और ख़राब फ़िल्मों का ज़िक्र भी हुआ। हम बिना किसी ख़लल के आराम से बातें कर रहे थे। दिव्या को बतौर अभिनेत्री उस रेस्तरां में किसी ने नहीं पहचाना था इसलिए न तो आॅटोग्रॉफ लेने वालों की भीड़ लगी और न ही उनके साथ फोटो खिंचवाने की चाहत रखने वाले उनके पास आए। एक आम सी दिखने वाली लड़की ही लोगों ने समझा होगा उन्हें और यह हमारे लिए भी तसल्ली भरी बात रही। हम आराम से खाते भी रहे और बातें भी करते रहे।
कबाबों का दौर ख़त्म हो चुका था। वेटरों ने खाना परोसना शुरू किया। कुछ दाल, कुछ सब्ज़ी और रोटी। कबाबों का ज़ायक़ा अब भी बना हुआ था। दाल, रोटी और सब्ज़ी के अलावा मटन का बना हुआ कोई व्यंजन बैरे ने परोसा। इस बीच मैंने दिव्या से पूछा था कि आपको किस तरह की फ़िल्में पसंद हैं तो दिव्या का जवाब था-मुझे बसु चटर्जी की फ़िल्में बहुत पंसद आती हैं और आज भी उन्हें देखती हूं। बसु चटर्जी की फ़िल्मों का जवाब नहीं, हल्की-फुलकी लेकिन जीवन से जुड़ी हुई। फिर गुलज़ार साहब की फिÞल्में हैं। ‘मौसम’ मेरी पसंदीदा फिÞल्मों में से है। वे ख़ामोश होती ही हैं कि मैं अगला सवाल करता हूं- और किन अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने आपको प्रभावित किया। दिव्या मुस्कुराती हैं फिर जवाब देती हैं- ‘अभिनेत्रियों में मधुबाला मुझे बेहद पसंद हैं। इसलिए नहीं कि वे ख़ूबसूरत थीं। ख़ूबसूरत तो थी हीं वे लेकिन मुझे उनका अभिनय काफ़ी पसंद था। उनका चुलबुलापन, उनकी अदाएं मुझे बेतरह पसंद हैं। अभिनेताओं में दिलीप कुमार और बाद की पीढ़ी में ऋषि कपूर’। फ़िल्मों के निर्देशन का विचार कभी आया, ‘नहीं अभी मैं सारा ध्यान अभिनय पर ही दे रही हूं। निर्देशन का अभी तक सोचा नहीं है’। लेकिन अगर कभी फ़िल्म निर्देशन का ख़याल आया तो किस तरह की फ़िल्में बनानी पसंद करेंगे। दिव्या हौले से मुस्कुरार्इं और कहा- बसु दा जैसी फ़िल्में बनाते थे।
खाना खाते हुए देश-दुनिया की बातें भी होती रहीं। धारावाहिकों से लेकर अण्णा हज़ारे बाचतीच के केंद्र में रहे। इस दौरान दिव्या ने मुझसे पूछा कि आप कहां के रहने वाले हो, मैं उन्हें बताता हूं कि मेरा ताल्लुक़ बिहार से है, घर देहरादून में बनाया है और ग़मे-रोज़गार की वजह से दश्त की सैयाही ख़ूब की है। गुवाहाटी, कोलकाता, से होते हुए दिल्ली में डेरा जमा रखा है, अब आप तय करें कि मैं कहां का रहने वाला हूं, अपने लिए तो बस इतना ही कह सकता हूं कि रहने को घर नहीं हैं, सारा जहां हमारा।
खाना ख़त्म हो चुका था। इस बीच बेटी का फ़ोन आता है। उसे पूछा था दिव्या दत्ता से मुलाक़ात हो गई। मैंने उसे जवाब में कहा कि उनके साथ ही खाना खा रहा हूं तो उसे भी थोड़ी हैरत हुई। मैंने पूछा कि बात करोगी तो वह तैयार हो गई। दिव्या की तरफ़ फ़ोन बढ़ाते हुए मैंने कहा कि मेरी बेटी है आपसे बात करना चाहती है। दिव्या ने बेटी का नाम पूछा, ‘राष्ट्रीय सुंबुल’ मैंने बताया। दिव्या थोड़ी-सी चौंकीं, कहा- बहुत यूनिक नेम है, अपने आप में अलग। मैंने हामी भरी, हां कुछ तो अलग है। तब तक वे फ़ोने ले चुकी थीं। उन्होंने बेटी से भी यह बात दोहराई और कहा- तुम्हारा नाम बहुत ख़ूबसूरत है। थोड़ी देर तक दोनों बात करती रहीं। बातचीत ख़त्म हुई तो फ़ोन उन्होंने मेरी तरफ़ बढ़ाया। बेटी को संतोष हुआ। उसने कहा कि मुझे तो यक़ीन ही नहीं आ रहा है कि मैंने दिव्या दत्ता से बात की है। फ़ोन रख कर दिव्या से कहता हूं कि बेटी के लिए एक आॅटोग्रॉफ़ तो दे दें। वे आॅटोग्रॉफÞ देती हैं। मैं उनसे मेल आईडी और नंबर का आग्रह करता हूं। उसी काग़ज़ पर वे नंबर और अईडी लिख देती हैं। खाना हो चुका था। उन्हें भिंसारे लखनऊ के लिए विमान पकड़नी थी। वे विदा लेती हैं लेकिन तभी उनसे पूछता हूं कि और किन चीज़ों में उनकी रुचि है। वे जवाब देती हैं लेखन में, मैं कई जगह कॉलम लिखती हूं। उनका यह जवाब चौंकाता है। मन में जिज्ञासा होती है और उसे उनके सामने रखता हूं, किस तरह का लेखन। सोचा तो यह था कि वे जवबा देंगी फ़िल्मों से जुड़े अनुभवों पर लिखती हूं। लेकिन उनका जवाब होता है जो मुझे अंदर तक झकझोरता है वह चाहे अण्णा हज़ारे का आंदोलन हो या फिर आम आदमी की पीड़ा। मुझे जो चीज़ अंदर कहीं छूती है उसे मैं अपने लेखन का विषय बनाती हूं। वह चलने को तैयार थीं, कहती हैं सुबह सवेरे उठना है, आज्ञा दें। उनके चलने से पहले मैं यह ज़रूर जोड़ता हूं आपकी कुछ चीज़ें पढ़ना चाहूंगा संभव हो तो मेल से अपना कुछ लिखा भेजें। वे हामी भरती हैं और फिर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ जाती हैं।
उनके जाने के बाद हम लोगों के अलावा मैक्स के अधिकारी भारती, नीरज और गौरव सेठ बैठ कर गपें मारते हैं। तब तक बैरे ने मेरी पसंदीदा चीज़ क़ुलफ़ी मेरे प्लेट में ला रखी। मैंने बैरे से कहा कि एक और डाल दें। फिर एक रस्सगुल्ला मैंने लिया। मीठा खाने के बाद बैरा पान रख गया। काफ़ी अरसे बाद पान खाने की ख़्वाहिश हुई। एक पान का बीड़ा उठा कर मुंह में डाला और अपने मेज़बानों का शुक्रिया अदा कर कहा कि अब हमें भी चलना चाहिए।
रात थोड़ी और गहरा गई थी। हवाई अड्डा नज़दीक होने की वजह से विमानों का उतरना और उड़ान भरना जारी था। ड्राइवर इसी बीच गाड़ी लेकर आगया था। मैं घर लौट रहा था। लौटते वक्Þत भी दिव्या की बातें याद आरही थीं। उनकी सादगी, उनका बेलौस लहजा और उनकी साफ़गोई अच्छी लगी थी। दिव्या को अपनी सीमाओं का पता है और उनसे बेहतर इसे कोई और समझ भी नहीं सकता लेकिन फिर भी किसी तरह का बड़बोलापन नहीं। वे कहने से ज्Þयादा करने पर यक़ीन रखती हैं। दिव्या दत्ता से मिल कर, उनसे बातें कर लगा कि उनके अंदर कहीं एक बेहतर इंसान बैठा है जो उन्हें अच्छा करने के लिए प्रेरित करता रहता है। वह जो बेहतर इंसान है, उन्हें राह भी दिखाता है और अच्छे व बुरे का सलीक़ा भी सिखाता है। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि दिव्या का रिश्ता सिर्फÞ फ़िल्मों से नहीं है, उनका रिश्ता शब्दों के साथ भी है। शब्द आदमी को आदमी होने की तमीज़ भी सिखाता है और रोटी खाने का सलीक़ा भी। शब्द आदमी को आदमी बनने की तमीज़ सिखाते हैं। दिव्या दत्ता शब्दों को साधती हैं इसलिए वे दूसरे फ़िल्मवालों से अलग हैं, जुदा हैं।


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पानी के बुलबुले (लघु कथा)

साधु महाराज रिमझिम बारिश में धरती से निकल रहे पानी के बुलबुलों को देखकर काफी देर से मुस्करा रहे थे. उनके इस प्रकार के आचरण को देखकर उनके पैर दबा रहे शिष्य ने उनसे पूछा, "महाराज क्या बात है? आज आप इतना क्यों मुस्करा रहे हैं? अरे ऐसी कोई बात नहीं है शिष्य। बस ऐसे ही कुछ पुरानी बातें याद आ गईं." आगे पढ़ें
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नि:संदेह देह देह ही है देह भी नहीं नि:संदेह (कविता)


देह खिलाती है गुल
बत्‍ती करती है गुल
विवेक की
मन की
जला देती है
बत्‍ती तन की।
देह सिर्फ देह ही होती है
होती भी है देह
और नहीं भी होती है देह।
देह धरती है दिमाग भी
देह में बसती है आग भी
देह कालियानाग भी
देह एक फुंकार भी
देह है फुफकार भी।
देह दावानल है
देह दांव है
देह छांव है
देह ठांव है
देह गांव है।

देह का दहकना
दहलाता है
देह का बहकना
बहलाता नहीं
बिखेरता है
जो सिमट पाता नहीं।
देह दरकती भी है
देह कसकती भी है
देह रपटती भी है
देह सरकती भी है
फिसलती भी है देह।
देह दया भी है
देह डाह भी है
देह राह भी है
और करती है राहें बंद
गति भी करती मंद।

टहलती देह है
टहलाती भी देह
दमकती है देह
दमकाती भी देह
सहती है देह
सहलाती भी देह।


मुस्‍काती है
बरसाती है मेह
वो भी है देह
लुट लुट जाती है
लूट ली जाती है
देह ही कहलाती है।
देह दंश भी है
देह अंश भी है
देह कंस भी है
देह वंश भी है
देह सब है
देह कुछ भी नहीं।
देह के द्वार
करते हैं वार
उतारती खुमार
चढ़ाती बुखार
देह से पार
देह भी नहीं
देह कुछ नहीं
नि:संदेह।

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पटौदी चले गए

नुक्‍कड़ का नमन
मौन श्रद्धांजलि।

कार्यों का बखान
सब कर रहे हैं
हम उन्‍हें पढ़
मान रहे हैं।
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क्या आप फ़ेसबुक व ट्विट्टर पर हैं ?


अजब दुनिया है यह फ़ेसबुक और ट्विट्टर भी. लगता है जैसे खाली बैठे सिर खुजाने वालों के मोहल्ले में आ गए हों.

इस तरह के प्रोग्राम लिखने वालों को इनकी प्रेरणा ज़रूर आदिमानवों द्वारा बनाए गए भित्ति चित्रों से मिली होगी. उन लोगों ने गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए और कुछ-कुछ लिख कर चलते बने, पर अक़्लमंद लोग हैं कि उनके लिखे में आज भी मतलब ढूँढ़ रहे हैं. अरे भई छोड़ो न, ये उनके समय के फ़ेसबुक और ट्विट्टर थे. आज हज़ारों साल बाद भी यह परंपरा ज़िंदा है, यक़ीन नहीं तो बाहर कहीं भी किसी भी दीवार पर नज़र घुमाइए, शर्तिया कुछ न कुछ लिखा ज़रूर मिलेगा.

फ़ेसबुक व ट्विट्टर भी, दीवारों पर यूँ ही कुछ-कुछ लिख कर चलते बने लोगों की ही दुनिया है. यहाँ कुछ लोग हैं कि कुछ कवितामय छोड़ देते हैं तो कुछ जीवन-दर्शन सरीखा कुछ, कई तो चुटकुले लिख जाते हैं. पता ही नहीं चलता कि कौन किसके लिए क्या लिख रहा है. कुछ तरह-तरह की फ़ोटो टाँग जाते हैं.

सुंदर सी महिलाओं की फ़ोटो वाली लाइनों के नीचे पसंद करने वालों और प्रतिक्रिया देने वालों का तो ताँता ही लगा मिलता है, ज़ाहिर है इन लाइन लगाए लोगों में पुरुष ही ज़्यादा होते हैं.

ये प्रोग्राम भी जातिवादी परंपरा का पालन करते हैं. यहाँ बड़े लोगों के फ़ैन बनने के न्योते आते हैं तो आम जनता को मित्र बनाने के सूचनाएँ चस्पा की जाती हैं. अब श्रृद्धा आपकी है कि आप क्या करना चाहते हैं.

कुछ झंडाबरदार लोग भी यहाँ आते हैं, उन्हें इतने से ही सुख नहीं मिलता कि कुछ लिख कर चलते बनें. वे ग्रुप कहे जाने वाले अपने गुट बनाकर यहाँ-वहाँ लोगों को उनमें शामिल करने के संदेश तो दाग़ते ही रहते हैं, जहाँ मौक़ा मिला वहाँ लोगों को, उन्हें बिना बताए ही, इनमें चुपचाप शामिल भी कर लेते हैं. इनका गुज़ारा इतने से ही नहीं होता, इसके बाद आपको ढेरों इमेल भी ठेले जाते हैं कि फ़लाने ने ढिमाके के यहाँ क्या तीर मारा.

ट्विट्टर तो गूंगों की दुनिया लगती है. कोई आया और कुछ-कुछ लिख कर चलता बना, अगर आपके पास समय है तो पढ़ लो. बहुत हुआ तो आप भी कुछ लिख आओ. ट्विट्टर पढ़ कर ऐसे लगता है कि किसी ने शायद जम्हाई लेते हुए कुछ अनर्गल/ निरापद कह दिया हो. हां, यह बात दीगर है कि कुछ बड़े लोग जो कुछ कभी-कभार यहां लिखते हैं उसका ढिंढोरा मीडिया के दूसरे लोग जम कर पीट मारते हैं.

पहले-पहल कंप्यूटर में विंडो के साथ सॉलिटायर गेम का उद्देश्य यह बताया गया था कि यह काम करते-करते बोर होने पर मन बहलाने भर के लिए है. आज यही काम फ़ेसबुक और ट्विट्टर कर रहे हैं. ज्यों जेम्स बाँड की फ़िल्म में कोई सामाजिक संदेश नहीं ढूँढ़ा जाता ठीक वैसे ही फ़ेसबुक और ट्विट्टर पर भी कोई अर्थ नहीं ढूँढ़ा जाना चाहिए.

बहुत से लोगों को, एक समय के बाद यहां ऊब होने लगती है पर कई ठाड़े हैं कि जो आज भी यहां डटे हुए हैं.

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- काजल कुमार
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एक पत्र शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के नाम


प्यारे शहीद मोहन चंद शर्मा
सादर कुर्बानस्ते !
सर्वप्रथम आपकी देश के प्रति असीम त्याग जी भावना को नमन करता हूँ जिसको धारण कर आपने आतंकियों से लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. देश भक्तों के लिए परसों आपकी शहादत का दिन था और देशद्रोहियों के लिए बटला हाउस एनकाउन्टर की बरसी. बटला हाउस क्षेत्र में देशद्रोही कई दिनों से बटला हाउस एनकाउन्टर के विरोध में रैलियां निकाल रहे थे और आतंकियों की जन्मभूमि आजमगढ़ व उसके आस-पास के क्षेत्र से मार्च करके जंतर-मंतर पर इकट्ठे हो रहे थे. वहीं कुछ देशप्रेमी जुलैना चौक पर... आगे पढ़ें...
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दिलीप मंडल की नयी किताब, कॉरपोरेट मीडिया-दलाल स्ट्रीट

दिलीप मंडल की नयी किताब, कॉरपोरेट मीडिया-दलाल स्ट्रीट: दिलीप मंडल की नयी किताब, कॉरपोरेट मीडिया-दलाल स्ट्रीट
पेड न्यूज़ पर 'मीडिया का अंडरवर्ल्ड' किताब के बाद स्वतंत्र पत्रकार और दलित चिंतक दिलीप मंडल की नयी किताब आ गयी है. इस बार निशाना कॉपोरेट मीडिया में होने वाले घपलेबाजी पर है. किताब का नाम 'कॉरपोरेट मीडिया-दलाल स्ट्रीट' है. राडिया कांड के संदर्भ में इसमें पब्लिक रिलेशन, कॉरपोरेट कम्युनिकेशन और लॉबिंग के भारतीय मॉडल को समझने की कोशिश की गई है.

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ब्‍लॉग वार नहीं, ब्‍लॉग पीस कहिए एनबीटी नजरिया जी

मेरा मानना है कि ब्‍लॉग वार नहीं, ब्‍लॉग पीस क‍हना चाहिए। हम आरंभ से ही वार नाम देकर आखिर क्‍या साबित करना चाह रहे हैं क्‍योंकि नहीं इसे ब्‍लॉग पीस (शांति) के नाम से संबोधित करते हम। जितने वार, प्रहार इत्‍यादि नकारात्‍मक नजरिया है हमारा, इसे बदलकर हमें ब्‍लॉग पर शांति प्रदान करने का नजरिया विकसित करना चाहिए।
मेरा नजरिया तो यही है, आपका क्‍या है, यहां भी लिख सकते हैं और सीधे www.khulamanch.nbt.in पर लॉगिन करके भी अपनी बात लिख सकते हैं। दोनों ही जगह पर लिखेंगे तो और अच्‍छा रहेगा।
आज दिनांक 21 सितम्‍बर 2011 के नवभारत टाइम्‍स के संपादकीय पेज पर प्रस्‍तुत एनबीटी नजरिया और यशवंत सिंह के विचार पढ़कर आप भी अपनी बात बिल्‍कुल साफ शब्‍दों में कहिए, अच्‍छा लगेगा।
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हाकी की तल्खियां बन गई हैं सुर्खियां


तुलना करने चले हैं क्रिकेट से। जिसमें बाल फेंकने के लिए भी अलग से माहिर खिलाड़ी होते हैं जिन्‍हें बालर कहा जाता है। हाकी में तो यूं ही बाल को लुढ़का भर दिया जाता है, उसके बाद बाल के पीछे अपनी अपनी हाकी लेकर लुढ़कते फिरो सब और सिर फुटव्‍वल करते रहो। आपस में भी उलझ-उलझा कर गिरो। मतलब हंसी का भरपूर मसाला, कम हो जाए तो हार जाओ, हार कर भी दुनिया को खूब हंसाओ। उसी ठहाके लगाती दुनिया के बाशिंदों ने खुशी से पच्‍चीस हजार देने चाहे तो तुम्‍हें न भाए, कैसे हो गए हाकी वाले इतने खाए अघाए। क्रिकेट में तो बाल पकड़ने के लिए हाथों का उपयोग होता है, हाकी खेलते समय बाल में हाथ लगाओगे तो हार जाओगे, जब यह जानते हो, फिर क्‍यों खुद को क्रिकेट के बराबर चिरकुट मानते हो। वहां एक बाल के पीछे सब बैट लेकर तो नहीं भागते हैं तुम्‍हारी तरह, बेशर्मों के माफिक, सब एक बाल के पीछे अपनी अपनी हाकियां लेकर दौड़ पड़ते हो, फिर कहते हो हमें भी क्रिकेट के बराबर नोट मिलने चाहिएं। नोट कर लो, ऐसा कभी नहीं होगा। जितना मिल गया, उतने में सब्र कर लो, संतोष धन का कोई मुकाबला नहीं है। एक बार पाकिस्‍तान को क्‍या हरा दिया, खुद को फन्‍ने खां समझ बैठे। इस बार तो तुम्‍हारी जिद को आसमान दे दिया है, अगली बार जमीन भी नहीं मिलेगी।

पूरा पढ़ने के‍ लिए और आप भी कुछ कहना चाहें तो यहां पर क्लिक कीजिएगा
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काला नहीं, चोखा है नाव का धंधा


दिल्‍ली में नावों का भविष्‍य सुनहरा हो गया, ऐसा लगता है। यह पिछले सप्‍ताह की मूसलाधार बारिश ने बेपूछे बतला दिया है। दिल्‍ली जुटी हुई थी काला धन वापिस लाने में और लौट आए हैं काले मेघा। सोच रहा हूं कि फाइनल ही कर लिया जाए कि नाव बनाने व किराए पर देने का धंधा शुरू कर लूं, कुछ काली कमाई के रास्‍ते भी ओपन होंगे। किसी को इसमें हैरानी भी नहीं होगी, इससे तो सैकड़ों की परेशानी दूर होगी। अगर दूर की न सोची जाए तो असफलताएं पप्‍पी ले लेती हैं और देर में सोची जाए तो चिडि़याएं सारे खेत की जफ्फी ले लेती हैं। वैसे आजकल चिडि़याओं का अस्तित्‍व ही मोबाइल संकेतों के कारण खतरे में है और इंसान पर्यावरण के नुकसान के इन संकेतों से अज्ञानी बनकर खूब खुश है। वे लुप्‍त होती जा रही हैंखेत फिर भी सुरक्षित नहीं हैं। वे चुग लिए जाते हैंमुझे अहसास हो रहा है कि जरूर नेता ही चुग लेते होंगेजिनके लिए बदनाम वे चिडि़याएं हो रही हैं। सड़कों पर भरा पानी चीख चिल्‍लाकर कह रहा है कि सूनामी आई हैसंदेशा लाई है कि नाव बना लोउसे किराए पर चला लो, पर पानी की यह चिल्‍लाहट नगर निगम न सुन लेवरना तो कर वसूलने के लिए कमर और कर दोनों कस लेगा।  कहीं देर न हो जाए ....। बहरहालखेत तो तैयार हैंबस नाव बनाने और किराए पर चलाने की देर है। पर इस देरी को चुपचाप सन्‍नाटे के साथ खत्‍म करना है। अगर किसी नेता को इस फार्मूले की भनक भी पड़ गई तो घोटाला-घपला होकर ही रहेगा क्‍योंकि जितने तिहाड़ में हैंउससे कई गुना तो बाहर संसद में हैं।
पानी जरूर गीला है पर जब सड़कों पर उतरता है जो जम जाता है और उसके जमने से जाम लग जाता है। फिर उस गीले बारिश के पानी में कारेंमोटरसाईकिलेंबस और आदमी सब जम जाते हैं। ऐसा लगता है कि वक्‍त भी जम गया है पर वो जमा हुआ वक्‍त बहुत तेजी से पिघलता जाता है और किसी के काबू में नहीं रह पाता। बारिशों का बेकाबू होना, बतला रहा है कि सिर्फ सरकारी बा‍बू ही काबू में नहीं आता है, यह सब मौके पर निर्भर करता है। कौन जाने, कब किसे मौका मिल जाए ?
इस बार जो भी हुआ है बहुत भयानक हुआ है क्‍योंकि बरसात के पानी ने राजधानी की सड़कों और जीवन को बंधक बना लिया। यह क्‍या किसी आतंकवादी गतिविधि से कम खतरनाक है। अस्‍पताल जाने वाले अस्‍पताल न जा सकेआफिस जाने वालेआफिस आफिस खेलने से महरूम रह गएदुकानदारों को अपना माल किसी भी रेट में बेचने का मौका न मिल सकामतलब सब कुछ खर्च हुआपेट्रोल भी जलासमय भी सुलगापर धन कमाने का मौका हाथ न लगा। जिनके हाथ न लगावे निराश हैं पर उन्‍हें नाव में अपना भविष्‍य देख कर तुरंत सक्रिय हो जाना चाहिए। 
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लो जी यहाँ भी देख ही लेना………शायद कुछ मिल जाये

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हंस में हँसे हम भी


हंस पत्रिका के इस माह (सितम्बर,२०११) के अंक में अपनी भी लघु कथा "लाल बत्ती का खेल" प्रकाशित हुई है. आप भी इसे पढ़ कर आनंद लें.

लाल बत्ती का खेल (लघु कथा)

लाल बत्ती पर तोमर जी ने गाडी रोकी ही थी कि एक लगभग 15 वर्षीय बच्चा आ धमका. उसके कपडे बहुत गंदे व जगह-२ से फटे हुए थे. उसकी सूरत को देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे कई दिनों से खाना नसीब न हुआ हो. तोमर जी को उस पर दया आ गयी व उन्होंने एक दस रुपये का नोट जेब से निकाला आगे पढ़ें

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हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति पुस्‍तक की समीक्षा पढि़ए

खरीदना चाहें तो nukkadh@gmail.com पर ई मेल कीजिए। मूल्‍य सिर्फ 450/- रुपये। इसके साथ आपको हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का इतिहास पुस्‍तक भी भेजी जाएगी। 
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सांस्‍कृतिक विरासत की परत दर परत पड़ताल

सांस्‍कृतिक विरासत की परत दर परत पड़ताल: साहित्यिक एवं सांस्‍कृतिक विरासत को नई पीढी में संचारित करने के उद्देश्‍य से महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद केंद्र द्वारा बीसवीं सदी का अर्थ : जन्‍मशती का संदर्भ श्रृंखला के अंतर्गत बीसवीं सदी के प्रथम एकांकीकार व नाटककार भुवनेश्‍वर की जन्‍मशती पर भुवनेश्‍वर एकाग्र विषय पर आयोजित दो दिवसीय (10-11 सितम्‍बर, 2011) समारोह का उद्घाटन साहित्‍य आलोचक व विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने किया। समारोह में समय और समाज की कसौटी पर परखते हुए भुवनेश्‍वर के जीवनसंघर्ष और उनकी रचनाओं की परत दर परत पड़ताल की गई।

व्‍यक्ति के रूप में भुवनेश्‍वर पर विमर्श करते हुए नामवर सिंह ने कहा कि भुवनेश्‍वर अपने दौर के अद्भुत रचनाकार थे। उनकी गद्य लिखने की शैली, फैंटेसी रचने की कला अनूठी थी। नाटकों में भी उन्‍होंने कई प्रयोग किए। ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों पर लिखे नाटकों में भुवनेश्‍वर की अद्भूत कल्‍पनाशीलता नज़र आती है। भूले-बिसरे नाटककार को याद करना देश के किसी भी विश्‍वविद्यालय का पहला आयोजन है। ऐसे वैचारिक विमर्श से हम भुवनेश्‍वर के कृतित्‍व से परिचित हो सकेंगे।

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साथी कोई मिल जाए प्यारा

अभी जीवन जो पड़ा है
अकेले में लफड़ा बड़ा है
कोई साथ हो जाए यारा
साथी कोई मिल जाए प्यारा...आगे पढ़ें
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घर घर की सुरक्षा के मंत्री हैं क्‍या होम मिनिस्‍टर हमारे

एक फीमेल तो ढंग से देखी नहीं जा रही है, उसी का ख्याल रख रखकर हलकान हुए पड़े हैं और आप हमें इतना मुश्किल काम करने के लिए कह रहे हैं। हमने वोटर से वोट हथिया लिए, यह क्या कम जाबांजी का काम है। इतना आसान होता तो देश के सारे वोटर ही मंत्री नहीं बन गए होते। जो विपक्ष में हैं, वो भी तो जीतकर ही आए हैं, फिर भी मंत्री नहीं बन पाए हैं। विपक्ष में बैठकर मुंह चलाना अलग बात है, सरकार में घुसकर मंत्री बनना दूसरी बात। इन दोनों की तुलना आप एक तरह से कैसे कर सकते हैं, अगर कर सकते हैं तो समझ लीजिए कि आपका दिमाग फिर गया है। वैसे भी अगर  ... पूरा पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए और हिन्‍दी को बढ़ावा देने के लिए आप अपनी राय तो हिंदी में व्‍यक्‍त करेंगे ही।
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हिन्‍दी दिवस पर हिन्‍दी में ही हंसना अच्‍छा लगता है


हिन्‍दी की हंसी

हम हिंदी की ताकत कम होने और उसका असर कम होने का रोना साल भर रोते हैं तथा आजादी के बाद से लगातार रो रहे हैंवो मुझे तो बिल्‍कुल ठीक नहीं लगता है। आप सरकारी फाईलों, प्राइवेट पत्र-व्‍यवहार कार्यकलापोंदुकानोंदफ्तरों के साइन बोर्ड हिंदी में करके कौन सी मंजिल को पाना चाह रहे हैं। इतने सारे हिंदी अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। आखिर वो सब बाद में रद्दी बनकर कबाड़ में ही तो जाती हैं और सरकारी फाईलों और दस्‍तावेजों का निपटान एक पूरी रस्‍म अदायगी और औपचारिकताओं के बीच उन्‍हें फूंक कर किया जाता है।
अब आप चाह रहे हैं कि हिंदी में खूब काम होपुस्‍तकों का भी प्रकाशन हो और बाद में वे रद्दी के भाव बिकें या थोक खरीद के बाद लाईब्रेरियों में सड़ती रहें। तो इससे आप हिंदी समाज को क्‍या देना चाह रहे हैं और क्‍या दे पा रहे हैं। आप हिंदी में बोल रहे हैंबातचीत कर रहे हैं और आप यह जानते हैं कि हिंदी का सर्वाधिक प्रयोग बातचीत इत्‍यादि में खूब धड़ल्‍ले से किया जाता है और फिर उस बातचीत के कबाड़ में पहुंचने का खतरा भी नहीं रहता है। इस तरह से अनपढ़ और लिखना न जानने वाला भी हिंदी के समुचित विकास में सक्रिय सहयोग कर रहा है। आप उसके कार्यों और उसकी उपलब्धियों  और सक्रियता को किसी गिनती में नहीं गिन रहे हैं। आपको रेलोंहवाई जहाजोंसड़कदफ्तरों में सर्वाधिक प्रतिशत हिंदी में बात करने वालों का मिलता हैकभी कभार ही कुछ लोग अंग्रेजी में लड़ाई करते दिखलाई देते हैं लेकिन जब वे गाली गुच्‍चा करते हैं तो हिंदी का ही प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी में गाली देने में वो बात ही नहीं है जो हिंदी में सहज ही आती है। फिर भी आप हिदी के प्रचार प्रसार को लेकर न जाने क्‍यों चिंतित हैं।
आपने पुरस्‍कार बांटने हैं तो हिंदी में बातचीत करने वालों को एकदम मौके पर पकड़कर पुरस्‍कृत कर दीजिए। जैसे आप सिगरेट पीने अथवा ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों के चालान करते हैं,, फिर देखिए आपका हिंदी के उत्‍थान में लगा पैसा हिंदी के विकास में किस बेतरह बढ़ोतरी करता है। आपके इस क्रांतिकारी कदम से उन पब्लिक स्‍कूलों में भी जागृति आएगी जिन्‍होंने हिंदी में बात करने को दंडनीय अपराध बनाकर रखा हुआ है। पुरस्‍कार और नकद पुरस्‍कार का लालच इंसान से जो न करवाए थोड़ा है और यह कदम हिंदी की बढ़ोतरी में सहायक होगा। कई नए नए कीर्तिमान बनेंगे। इसे भ्रष्‍टाचार भी नहीं कहा जा सकता क्‍योंकि यह तो भाषाई विकास के महत्‍वपूर्ण प्रयासों में शामिल किया जाएगा।
इसी प्रकार कोई किसी से अंग्रेजी में बात करे और सामने वाला हिंदी में जवाब दे तो उसे विशेष तौर पर सम्‍मानित किया जाना चाहिए। जिससे अंग्रेजी बोलने वाले को अपनी मूर्खता का अहसास हो और अगली बार से वो भी हिंदी में बात करता मिले। इस बार हिंदी में बात करने की पहल भी उसी की ओर से की गई होगी। मैंने तो महसूस किया है कि इंसान अपनी बात सामने वाले तक पहुंचाने के लिए किसी भी भाषा में बात करे परंतु वे सदैव हंसते खिलखिलाते सदा हिंदी में ही नजर आते हैं। मुस्‍कराते भी सभी हिंदी में ही हैं और ऐसी मुस्‍कराहट बहुत भली लगती है। हंसना खिलखिलाना प्रफुल्‍लता इत्‍यादि हिंदी में ही होते हैं और अच्‍छे लगते हैं जबकि कोई उदास होरो रहा हो तो उसके चहरे से साफ झलक जाता है कि इसकी यह हरकत अंग्रेजी में हैउसके चेहरे से ऐसा ही बोध होता है।
तो फिर एक हिंदी आंदोलन चलाने के लिए इस हिंदी दिवस पर संकल्‍प लीजिए कि भ्रष्‍टाचार मिटाने की तर्ज पर हिंदी अपनाने के लिए उपर्युक्‍त और अन्‍य कारगर उपायों पर चिंतन और अमल आज से ही सरकारी और गैर सरकारी कार्यालय करना शुरू कर देंगे और हम सब अपने प्राणपण से इसमें भरपूर सहयोग देंगे।
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हिन्दी दिवसः हिन्दी के नाम का अब मकबरा बनाइए

हिन्दी दिवसः हिन्दी के नाम का अब मकबरा बनाइए: इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में,अलग-अलग जगहों पर हिन्दी को मरी हुई क्यों करार देते हैं? हिन्दी के विकास के नाम पर ऐश करने का काम जब सामूहिक तौर पर होता आया है तो उसके नाम की मर्सिया पढ़ने का काम क्यों न सामूहिक हो? इस प्रोजोक्ट में बेहतर हो कि एक नीयत जगह पर उसके नाम का मकबरा बनाया जाए जहां 14 सितंबर के नाम पर लोग आकर अपनी-अपनी पद्धति से मातम मनाने,कैंडिल जलाने का काम करें। कोशिश ये रहे कि इसे अयोध्या-बाबरी मस्जिद की तरह सांप्रदायिक मामला न बनाकर मातम मनाने की सामूहिक जगह के तौर पर पहचान दिलाने की कोशिश हो। वैसे भी पूजा या इबादत की जगह सांप्रदायिक करार दी जा सकती है, मातम मनाने के लिए इसे सांप्रदायिक रंग-रोगन देने की क्या जरुरत? बेहतर होगा कि इसे कबीर की तरह अपने-अपने हिस्से का पक्ष नोचकर मंदिर या मस्जिदों में घुसा लेने के बजाय खुला छोड़ दिया जाए। देश में कोई तो एक जगह हो जो कि शोक के लिए ही सही सेकुलर( प्रैक्टिस के स्तर पर ये भी अपने-आप में विवादास्पद अवधारणा है लेकिन संवैधानिक है इसलिए) करार दी जाए। बस मूल भावना ये रहे कि ये जगह उन तमाम लोगों के लिए उतनी ही निजी है जितनी कि किसी के सगे-संबंधी के गुजर जाने पर उसके कमरे की चौखट,तिपाई,चश्मा,घाघरा जिसे पकड़कर वो लगातार रोते हैं।

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अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी-भाषा-लेखक-संघ के गठन की घोषणा




                                अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी-भाषा-लेखक-संघ के गठन की घोषणा 
 - (डॉ.) कविता वाचक्नवी 



वर्ष 2002 में जब "विश्वम्भरा" की स्थापना की थी तब जो कारक मन में रहे थे, उनकी अपनी एक पृष्ठभूमि थी। 1995 में नॉर्वे में रहते हुए, बचपन से रक्त में हिन्दी साहित्य, भाषा और संस्कृति के प्रति जड़ों में पोसा हुआ संस्कार बेकल होकर अंधाधुंध किसी खोज में डूबा रहता, उसके परिणाम स्वरूप एक स्वप्न रूपाकार ले रहा था, जिसमें मूलतः संस्कार के उस ऋण से उऋण होने के लिए छटपटाहट भरती जा रही थी। उऋण तो यद्यपि कभी हुआ नहीं जा सकता किन्तु उऋण होने का यत्न करना तो अवश्य चाहिए था। जिन-जिन से कुछ भी सीखा-पाया है, उन-उन के दाय को अधिकाधिक लोगों व अधिकाधिक समय में (भविष्य) , अधिकाधिक माध्यमों से जितना संभव हो उतना प्रचारित प्रसारित कर देना उसकी एक प्रमाणित विधि हो सकती थी। 


उसी का परिणाम था " विश्वम्भरा : भारतीय जीवनमूल्यों के प्रसार की संकल्पना " का गठन । संस्था का उद्घाटन कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी ने किया। ज्ञानपीठ गृहीता डॉ. सी नारायण रेड्डी ने अपनी ओर से संस्था के मुख्य संरक्षक होना स्वीकार किया। संस्था ने मूलतः `फील्डवर्क' को प्रमुखता देते हुए बिना शोर शराबे के, बड़े कार्य किए ; यद्यपि अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी संस्था ने आयोजित किए जिनमें विष्णु प्रभाकर जी, प्रभाकर श्रोत्रिय जी प्रभृति अनेकानेक भाषा, साहित्य व संस्कृति के ख्यातनाम वरिष्ठ व्यक्तित्वों ने स्वयं उपस्थित होकर संस्था के विशद उद्देश्यों के प्रति अपना समर्थन व सहयोग दिया। उस पर फिर कभी विस्तार से लिखा जा सकेगा तो लिखूँगी।




                   उस समय उद्घाटन अवसर छापे गए आमंत्रण पत्र में संस्था के उद्देश्यों आदि की जानकारी देता कार्ड का एक पन्ना 




पश्चात जैसे जैसे संसाधनों की सार्वभौमिकता के माध्यम, ऊर्जा, श्रम व शक्ति, परिणाम, परिणामों की व्यापकता, दीर्घकालिकता और गति का गणित समझ आता चला गया तैसे तैसे "विश्वंभरा" का वह अभियान सर्च इंजिनों, आधुनिक समाज और संसाधनों के प्रयोक्ताओं की मानसिकता को समझ कर गत 5 वर्ष की नेट रँगाई के विविध पक्षों सहित 23 अक्तूबर 2007 को हिन्दी भारत + हिन्दी-भारत की काया में आ गया। 


इन सब बीती बातों को आज स्मरण करने का एक अन्य बड़ा कारण है। भारतीय भाषाओं के इतिहास में आज का दिन महत्वपूर्ण है। अतः गत कुछ समय से संकल्पित अनुष्ठान को आज उद्घाटित करने से अच्छा अवसर और क्या हो सकता है ?


विदेशों में बसे, जन्मे, या नागरिकता ले चुके भारतवंशियों के एक बृहत अंतरराष्ट्रीय सामूहिक मंच की योजना कई दिन से मन में थी। अभी तो यही स्वप्न है कि यह एक ऐसा साझा मंच बने, जो भारत से बाहर किसी भी देश में रहने वाले भारतवंशी लेखकों, भाषाचिंतकों, भाषा टेक्नोलॉजी से जुड़े मुद्दों पर काम करने वालों का अपना मंच हो। अब तक कहीं कोई ऐसा सामूहिक संयुक्त उपक्रम नहीं हुआ है, जिसमें एक स्थान पर सभी आप्रवासी भारतीय जो भाषा, लिपि, साहित्य इत्यादि विषयों माध्यमों से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं, उनको संयुक्त स्वर/रूप दे। भूमंडलीकरण से उपजे बाजार के खतरे में भारतीय भाषाओं और लिपियों पर मंडरा रहा खतरा वस्तुतः भारतीयता पर मंडरा रहा खतरा है। भाषा और साहित्य ही में वह शक्ति होती है कि संस्कृति को विरासत के रूप में सँजो कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कर पाए। आधुनिक संचार माध्यमों में भारतीय भाषाओं का सिमटता स्वरूप और शक्ति हमें इस बाज़ार के खतरों से परिचित करवाने के लिए पर्याप्त हैं। जिस भाषा का व्यवहार आधुनिक संचार माध्यम करते हैं, उसकी बड़ी स्वीकार्यता और प्रचलन भी एक अन्य संकेत देते हैं। ऐसे में अपनी भाषाओं, लिपियों को इन माध्यमों की शक्ति के प्रयोग से विश्वबाजार में स्थापित कर देने की चुनौती भी बड़ी है; क्योंकि आने वाली पीढ़ियों के भाषाकोशों में वही भाषा सुरक्षित रहेगी, जो भाषा उनके माध्यमों द्वारा उनके पास पहुँची होगी। ऐसे में भारतीयता किस रूप में व कितनी पहुँचेगी यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है। 


"विश्वम्भरा" के ऊपर उद्धृत उद्देश्योंकी भांति संस्था अधुनातन माध्यमों का प्रयोग अपने कार्य-विस्तार हेतु तो करेगी ही अपितु साथ ही इन माध्यमों में साहित्य व भाषा के विविध स्वरूपों की पड़ताल, प्रयोजनमूलक व समाज-भाषिक पक्षों, अनुवाद, समाजभाषिक संदर्भ में वैश्विक हिंदी/भारतीय भाषाओं की स्थिति का आकलन, विविध स्तरों व क्षेत्रों की भाषा के बदलते स्वरूप आदि को समझने - समझाने व उनके अध्ययन अध्यापन आदि से जुड़े सरोकारों पर भी बल देगी। ताकि भारतीय भाषाओं विशेषतः हिन्दी को उसके सभी स्तरों, सभी रूपों व सभी माध्यमों में उसकी यात्रा के सही व सार्थक परिप्रेक्ष्य में देखा समझा जा सके, उसके साहियिक व साहित्येतर पक्षों से संबन्धित व्यक्तियों, रचनाकारों को जोड़ा जा सके, उनके अवदान को एक स्थान पर एकत्रित कर उनके कार्यों में सहभागिता व मूल्यांकन में आवश्यक सहयोग हेतु वातावरण निर्मित किया जा सके। 

आज तो सूत्रपात मात्र है, धीरे धीरे विस्तार देते हुए आप्रवासी लेखकों के एक लेखक-कोश और डाटाबेस बनाने की भी योजना मन में है। इस कोश में प्रारम्भ में मुख्यतः हिन्दी में किसी भी विषय अथवा विधा में लेखन करने वालों को जोड़ा जाएगा। पश्चात विषयवार, विधावार, क्षेत्रवार, भाषावार अलग अलग और भी विस्तार जोड़े जाएँगे। संभव है, आगे चल कर अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों और भाषाकर्मियों को भी सम्मिलित करना हो; साथ ही भारतीय मूल के उन लेखकों, भाषाकर्मियों को भी जो किसी भी अन्यभाषा द्वारा भारतीयता को किसी भी रूप में आगे सिंचित कर रहे हैं। 


इसी प्रकार एक योजना आप्रवासियों द्वारा हिन्दी में प्रकाशित की जा रही पत्र-पत्रिकाओं के कोश निर्माण / डाटाबेस की भी है। वह भले ही नेट पत्रिका हो या प्रिंट की, मासिक हो अथवा छमाही, किसी भी संगठन, संस्था, व्यक्ति अथवा विषय से जुड़ी हो ; सबका स्वागत है। 


आज मुख्यतः इस संस्था / मंच ("विश्वम्भरा" : अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी-भाषा-लेखक-संघ ) के गठन व स्थापना की औपचारिक घोषणा करने के उद्देश्य से लिखना प्रारम्भ किया था। यह एक खुला मंच है, कोई भी आप्रवासी भारतीय, भले ही वे किसी भी देश में रहते हों, संस्था से जुड़ें और उसकी योजनाओं की सिद्धि में अपनी सहभागिता दें। जिन-जिन के पास उनके परिचय क्षेत्र के उपर्युक्त विषय से सम्बद्ध ऐसे व्यक्तियों के पते, परिचय, चित्र व संपर्क सूत्र आदि हों, वे उन सब को इस से जोड़ें। किसी पत्रिका के विषय में जानकारी है तो उसे जोड़ें। ध्यान रहे आपका जरा-सा भी सहयोग इतिहास- निर्माण की इस प्रक्रिया में बड़े काम का हो सकता है। जिन्हें अपने-अपने अथवा दूसरे किसी देश के ऐसे व्यक्तियों की कोई भी जानकारी हो, भले उनका काल कोई भी रहा हो, उसे भी बताएँ, जुड़वाएँ | संस्था गत 100 वर्ष या उस से भी अधिक के जितने भी ज्ञात- अज्ञात ऐसे व्यक्ति हैं, उन सब को उस कोश में जोड़ने का विचार रखती है । इसी प्रकार पुरानी से पुरानी पत्र- पत्रिकाओं और उनके इतिहास से संबन्धित हर वस्तु को भी। 


अलग अलग देशों में रहने वाले कुछ मित्रों- परिचितों को क्रमश: उस-उस देश के प्रतिनिधि के रूप में जोड़ा जाएगा। शुभचिंतकों व सलाहकारों के सहयोग की भी सदा आवश्यकता पड़ेगी, वे अपना सहयोग व आशीर्वाद सदा संस्था को देते रहें। प्रतिनिधियों व सलाहकारों के अतिरिक्त और भी सभी लोग जो भी इसे पढ़ें, जानें, वे सब खुले मन व भावना से इस के उद्देश्यों की पूर्ति में सहयोग करें। यह एक प्रयास है ताकि भाषा, लेखन व भाषा टेक्नालॉजी के किसी भी क्षेत्र से जुड़े आप्रवासी भारतवंशियों को समीप लाया जा सके। मैं केवल जोड़ने वाला सूत्र-भर हूँ। आगे किस रूप में क्या कार्य-योजनाएँ कैसे रूपाकार लेंगी, यह तो समय बताइएगा। 


हिन्दी ( भारतीय भाषाओं) और भारत से प्रेम करने वालों के मध्य परस्पर विचारों के आदान-प्रदान के निमित्त इसे गठित किया जा रहा है। भाषा, साहित्य, कला एवं ज्ञान-विज्ञान के विविध अधुनातन विषयों / क्षेत्रों ( उनकी समस्याओं, समाधान आदि से जुड़े पक्षों ) पर संवाद व पारस्परिकता का वातावरण बना कर उन्हें एक सामूहिक मंच प्रदान करना, सम्पूर्ण विश्व में उन्हें प्रचारित प्रसारित कर विकास का वातावरण और पृष्ठभूमि बनाने का यत्न करना, उन्हें भारतीयता की पहचान के रूप में स्थापित करना, भावी पीढ़ियों के लिए तथ्यों व सामग्री को समायोजित कर के सँजोने, शोधार्थियों के लिए भारत से बाहर हुए साहित्य व भाषा विषयक कार्यों की सामग्री व उसके मूल्यांकन में सहयोग देना जैसे अनेकानेक कार्य संस्था की परिधि में आते हैं। उन पर धीरे धीरे समयानुसार संसाधनों की उपलब्धता व सामाजिकों के सहयोगानुसार विचार किया जाएगा। 


आपके सुझाव भी आमंत्रित हैं। सहयोग भी अपेक्षित, वांछित है। विचार आपको करना है कि इस बड़े यज्ञ में आपकी आहुति कैसे व कब पहुँचेगी। 


"विश्वम्भरा" अर्थात् "यत्र विश्वम् भवत्येक नीडम्"


प्रतिक्रियाओं व सहयोग की प्रतीक्षा में ...... 


सादर 
क. वा.
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