Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

हिन्‍दू गर्ल्‍ज कॉलेज जगाधरी में यूथ फैस्‍ट, दूसरा दिन

-प्रतिभा को निखारने के लिए मंच जरुरी- शिव रमन गौड़-
-दूसरे दिन सिर चढक़र बोला वेस्टर्न आइट्मस का जादू-

जगाधरी। युवा महोत्सव एक ऐसा मंच है, जिसके जरिए प्रतिभावान विद्यार्थी स्वयं को बुलंदियों तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन इसके लिए समपर्ण की भावना का होना बेहद जरुरी है। उक्त शब्द मुख्यमंत्री हरियाणा के मुख्य सचिव एवं सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के महानिदेशक शिव रमन गौड़ ने हिंदू गल्र्स कालेज में चल रहे क्षेत्रीय युवा महोत्सव के दूसरे दिन बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करते हुए कहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कालेज प्रिंसिपल डा. उज्ज्वल शर्मा ने की। दूसरे दिन जहां वेस्टर्न आइट्मस की धूम रही, वहीं वन एक्ट प्ले, इंडियन ऑके्रस्ट्रा व फोक सांग के जरिए प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। गौड़ ने कहा कि युवा महोत्वस बहुत बड़ा मंच है, जो कि विद्यार्थियों की प्रतिभा को साल-दर-साल निखार रहा है। प्रदेश में ऐसे बहुत सारे कलाकार हैं, जिन्होंने इस मंच के जरिए देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी अगल पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि वर्ष भर के पाठ्यक्रम की थकान ऐसे स्वास्थ मनोरंजन के द्वारा ही दूर हो सकती है। युवा महोत्सव के द्वारा ही विद्यार्थी मेल मिलाप व अनुशासन को कायम रखते हुए प्रतिस्पर्धा के मैदान में उतरते हैं। जीवन में आगे बढऩे के लिए ऐसी भावना का होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि युवाओं की प्रतिभा को निखारने और उसे बुलंदियों तक पहुंचाने के लिए सरकार द्वारा विद्यार्थियों को हर संभव सहायता मुहैया करवाई जा रही है।
कालेज प्रिंसिपल डा. उज्ज्वल शर्मा ने कहा कि कालेज में छात्राओं को सभी प्रकार की सुविधाएं मुहैया करवाई जा रही है। यही वजह है कि आज कालेज की छात्राएं शिक्षा के अलावा खेलकूद, सांस्कृतिक क्षेत्र में भी अग्रणीय है। उन्होंने कहा कि युवा महोत्सव के जरिए कालेज को नई पहचान मिली है। जिस वजह से कालेज का नाम पूरे प्रदेश में रोशन हुआ है।

कार्यक्रम के दौरान विशिष्ठ अतिथि महेंद्र शर्मा ने कालेज की होनहार व जरुरतमंद छात्राओं को ३१ हजार रुपए की छात्रवृति प्रदान की। उन्होंने कहा कि आगे भी कालेज की होनहार छात्राओं को उनकी तरफ से इस प्रकार की सहायता मुहैया करवाई जाएगी।
कार्यक्रम के दूसरे दिन वन एक्ट प्ले के दौरान डीएवी गल्र्स कालेज की छात्राओं ने सूरज की अंतिम किरण से सूरज की पहली किरण तक पर अपनी प्रस्तुति दी। जिसकी सभी ने सराहना की। जीएनजी कालेज की छात्राओं ने अपनी प्रस्तुति के जरिए बताया कि स्त्री के मनोभावों को समझने की परख पुरुष में नहीं होती। जिस पर दर्शकों ने खूब तालियां बजाई। हिंदू गल्र्स कालेज की टीम नारी की प्रसव पीड़ा, पुरुष के समक्ष फीकी है, इसके जरिए सामाजिक संदेश दिया। लोकगायन के दौरान डीएवी गल्र्स कालेज की टीम ने उड़दा वे जावी कावा गीत प्रस्तुत कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। राजकीय महाविद्यालय छछरौली की टीम ने बूहे बारिया गीत प्रस्तुत कर सभी की आंखें नम कर दी। जिसकी सभी ने सराहना की। लाइट वोकल के दौरान हिंदू गल्र्स कालेज की टीम ने परदेसी-परदेसी दिल तोड़ गया की प्रस्तुति दी। जिस पर सभागार में बैठे दर्शक काफी देर तक तालियां बजाते रहे। वन एक्ट प्ले के दौरान हिंदू गल्र्स कालेज की कुमारी मेघा को बेस्ट एक्टर्स घोषित किया गया।
वेस्टर्न में सिर चढक़र बोला शकीरा का जादू- युवा महोत्सव के दूसरे दिन वेस्टर्न आइट्मस का जादू सिर चढ़ कर बोला। वेस्टर्न ग्रुप सांग की प्रस्तुति के लिए जब डीएवी गल्र्स कालेज की छात्राएं स्टेज पर पहुंची, तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। डीएवी की छात्रा सवि, मल्लिका, कृति, तरुण, दिशा व रिचा ने ऑब्जेक्शन शकीरा प्रस्तुत किया। इस दौरान उन्होंने हिट मी बेबी वन मोर टाइम, इफ यू हैड माई लव आई हैव गोट सिक्रेट प्रस्तुत कर खूब तालियां बटौरी। वहीं गुरु नानक खालासा कालेज की छात्राओं ने स्टोरी सैक्सी आईज़ की प्रस्तुति दी। वेस्टर्न सोलो के दौरान डीएवी गल्र्स कालेज की छात्रा सवि ने वेन अवर, वेयर अवर देयर ओवर हेयर अंडर गीत प्रस्तुत किया। जिसके उपरांत सभागार में काफी देर तक तालियों की गडग़ड़ाहट गुंजती रही। गुरु नानक खालसा कालेज की शिखा ने स्टोरी ऑफ माई लाइफ सर्चिंग फार द राइट की प्रस्तुति देकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। युवा महोत्सव के दूसरे दिन वेस्टर्न वोकल सोलो, वेस्टर्न इंस्ट्रूमेंटल सोलो, वेस्टर्न ग्रुप सांग की प्रस्तुतियां दी गई।
जींस पर कुर्ती ने जमाया रंग-
मैं छैल ग्लैया जांगी, बाजण दे मेरा नाडा, मैं छैल ग्लैया जांगी...हरियाणवी पॉप सांग के दौरान जब यह गीत इंद्रधनुष वैन्यु में बजा, तो पूरा हॉल तालियां से गुंज उठा। इस दौरान कोई सिटी बजाता नजर आया, तो किसी का चेहरा खुशी के मारे दमक गया। हरियाणवी पॉप के दौरान जींस पर कुर्ती का जादू दर्शकों के ही नहीं, अपितु निर्णायक मंडल सदस्यों के सिर पर भी चढक़र बोला। कलाकारों द्वारा दी गई प्रस्तुतियां देखकर हर कोई वंस मोर कह उठा। प्रतिभागियों का उत्साह वर्धन करने के लिए पूरा हाल तालियों से गुंजता रहा। वहीं स्टेज पर परफोरमेंस के लिए कलाकारों ने भी अपनी बेहतर प्रस्तुति देने का प्रयास किया। श्रोताओं का कहना है कि हरियाणवी पॉप के दौरान हरियाणवी धूनों को वेस्टर्न स्टाइल में प्रस्तुत करना तथा उस पर डांस करना गजब होता है। यहीं वजह है कि पिछले कुछ सालों के दौरान यह आइटम बहुत ज्यादा पापुलर हो गया है।
इस प्रकार रहा दूसरे दिन का परिणाम-
हरियाणवी डांस में डीएवी गल्र्स कालेज यमुनानगर की टीम रिकमेंडिड तथा गुरु नानक खालसा कालेज तथा जीएनजी कालेज की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। पुरुष वर्ग में एमएलएन कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा गुरु नानक खालसा कालेज तथा आईजीएन कालेज लाडवा की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। हरियाणवी पॉप सांग में डीएवी गल्र्स कालेज यमुनानगर की टीम रिकमेंडिड तथा एमएलएन कालेज यमुनानगर तथा डीएवी कालेज साढौरा की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। हरियाणवी स्किट में एमएलएन कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा डीएवी गल्र्स कालेज यमुनानगर तथा हिंदू गल्र्स कालेज जगाधरी की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। सांग में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड रही। हरियाणवी फोक सांग मे एमएलएन कालेज रिकमेंडिड तथा डीएवी कालेज साढौरा तथा गुरु नानक खालसा कालेज यमुनानगर की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। हरियाणवी फोक इंस्ट्रूमेंटल सोलो में राजकीय महाविद्यालय नारायणगढ़ की टीम रिकमेंडिड तथा डीएवी गल्र्स कालेज की टीम कमेंडिड रही। हरियाणवी गज़ल में एमएलएन कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा डीएवी गल्र्स कालेज व गुरु नानक खालसा कालेज की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। वन एक्ट प्ले में डीएवी गल्र्स कालेज यमुनानगर की टीम रिकमेंडिड तथा गुरु नानक खालसा कालेज यमुनानगर तथा हिंदू गल्र्स कालेज जगाधरी की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। मिमिक्री में गुरु नानक खालसा कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा एमएलएन कालेज की टीम कमेंडिड रही। इंडियन ऑके्रस्ट्रा में हिंदू गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा जीएनजी कालेज व डीएवी गल्र्स कालेज की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। हरियाणवी ऑक्रेस्ट्रा में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा गुरु नानक खालसा कालेज व राजकीय महाविद्यालय नारायणगढ़ की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। लाइट वोकल में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा एमएलएन कालेज व डीएवी कालेज साढौरा की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। फोक सांग जनरल में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा जीएनजी कालेज व राजकीय महाविद्यालय नारायणगढ़ की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही।




Read More...

हिन्‍दू गर्ल्‍ज कॉलेज जगाधरी में यूथ फैस्‍ट, पहला दिन

प्रतिभा निखारने के लिए युवा महोत्सव सबसे बढिय़ा मंच: मितेश
-युवा महोत्सव में पहले दिन छाई हरियाणवी संस्कृति-
-४० से ज्यादा कालेजिज के प्रतिभागी देगें अपनी प्रस्तुति-


जगाधरी। युवा शक्ति देश का भविष्य है और युवा महोत्सव ऐसा मंच है, जो उन्हें अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर प्रदान करता है। उक्त शब्द एसपी मितेश जैन ने हिंदू गल्र्स कालेज में रविवार से शुरू हुए ३४वें क्षेत्रीय युवा समारोह के दौरान उद्घाटन अवसर पर कहे। समारोह की अध्यक्षता कालेज प्रिंसिपल डा. उज्ज्वल शर्मा ने की। यह समारोह तीन दिनों तक आयोजित किया जाएगा। जिसमें ४० से ज्यादा कालेजिज के सैंकड़ोंं प्रतिभागी २८ से ज्यादा विद्याओं में अपनी प्रस्तुति देकर कला का प्रदर्शन करेंगे।
 
जैन ने कहा कि युवा महोत्सव ऐसा मंच है, जहां पर युवा अपनी प्रतिभा को बुलंदियों तक पहुंचा सकते हैं। कला व संस्कृति के बल पर हम देश में अपनी पहचान बना सकते हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने अंदर की शक्ति को पहचाने और उसका सही दिशा में इस्तेमाल करें। उन्होंने कहा कि देश का युवा ऊर्जा से भरपूर है। बस जरुरत है, तो उस ऊर्जा का सही इस्तेमाल करने की।
कालेज प्र्रिंसिपल डा. उज्ज्वला शर्मा ने कहा कि युवा महोत्सव को सफल बनाने के लिए कालेज  परिसर में तीन स्टेज बनाए गए हैं। जिसमें इंद्रधनुष, झंकार व सरगम शामिल है। उन्होंने बताया कि पहले दिन क्लासिकल डांस सोलो, ग्रुप डांस जनरल, ग्रुप सांग हरियाणवी, ग्रुप सांग जनरल, क्लासिकल वोकल सोलो, क्लासिकल इंस्ट्रूमेंट सोलो नान परकसन, क्लासिकल इंस्ट्रूमेंटल सोलो परकसन, हरियाणवी डांस, हरियाणवी पॉप सांग, हरियाणवी स्किट, सांग, हरियाणवी फोक सांग, हरियाणवी फोक सांग इंस्ट्रूमेंटल सोलो व हरियाणवी गजल की प्रस्तुति दी गई।
उन्होंने कहा कि कला और संस्कृति मानव ह्रदय को समृद्ध करते हैं। वर्तमान में युवाओं का संस्कृति से भटकाव विशेष रुप से चिंतनीय है, ऐसे में युवा महोत्सव नई पीढ़ी को कला संस्कृति से जोडक़र उन्हें नई दिशा प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि युवा महोत्सव में होने वाली नाट्य कलाएं युवाओं की विचार दृष्टि को सही दिशा देकर उनकी सोच को समाज सापेक्ष बनाती है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का युवा कल्याण एवं सांस्कृतिक विभाग पिछले कई दशकों से इस उद्देश्य के निर्वहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
युवा महोत्सव के पहले दिन हरियाणवी सांग में डीएवी गल्र्स कालेज की छात्राओं ने झुलण चाल्यो री सखी बागों में झूले पड़ गए गीत प्रस्तुत कर खुब तालियां बटौरी। ग्रुप सांग जनरल में डीएवी कालेज साढौरा की टीम ने ये कदम बढ़ाते रहे, तो जिंदगी है, गर रूक गए तो फिर यहां कुछ नहीं गीत प्रस्तुत सभी को मंत्र मुग्ध कर दिया। गुरु नानक खालसा कालेज की टीम ने वंदे मातरम, वंदे मातरम दिल है वतन हमारा, आवाज का सितारा गीत प्रस्तुत किया। जिसकी सभी ने सराहना की। डीएवी गल्र्स कालेज की टीम ने उज्ज्वल पावन देश हमारा गीत प्रस्तुत कर खूब तालियां बटौरी। शास्त्रीय गायन में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम ने विलंबित ख्याल, दरूत ख्याल तराना प्रस्तुत किया। जबकि जनरल डांस में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम ने राजस्थानी नृत्य प्रस्तुत कर समां बांध दिया।
हरियाणवी संस्कृति से रू-ब-रू हुए श्रोता-
यह हरियाणवी संस्कृति ही है, जो पूरे प्रदेश को एकसूत्र में बांधे हुए हैं। युवा महोत्सव के पहले दिन श्रोताओं को हरियाणवी संस्कृति से रू-ब -रू होने का अवसर मिला। कालेज परिसर मेें बनाए गए तीनों स्टेजों पर हरियाणवी विद्याएं छाई रही। विभिन्न कालेजिज के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रमों को देखकर हर किसी ने दांतों तले उंगलियां दबा ली। इंद्रधनुष वैन्यु तो श्रोताओं से इतना खचाखच भरा हुआ था कि वहां पर पांव रखने की भी जगह नहीं मिली। श्रोताओं ने दिल खोलकर कलाकारों का उत्साह वर्धन किया। घंटों तक इंद्रधनुष वैन्यू तालियों की गडग़ड़ाहट से गुंंजता रहा। पहले दिन जहां हरियाणवी डांस की धूम रही, वहीं कलाकारों ने ग्रुप सांग हरियाणवी के जरिए भी अपने जलवे बिखेरे। पहले दिन हरियाणवी डांस सोलो पुरुष व महिला, हरियाणवी पॉप सांग, हरियाणवी फोक सांग, हरियाणवी फोक इंस्ट्रूमेंट्रूमेंट सोलो, हरियाणवी गजल, हरियाणवी स्किट, ग्रुप सांग हरियाणवी की प्रस्तुति दी गई। श्रोता प्रमोद कुमार, सुमन, आर्यन, अभिनव व आकाश का कहना है कि युवा महोत्सव ऐसा मंच है, जहां पर उन्हें अपनी संस्कृति के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने का अवसर मिलता है। यहीं वजह है कि हर कोई इस समारोह की ओर खुद-ब-खुद खिंचा चला आता है। श्रोता विक्रम, अनुभूति व कार्तिक का कहना है कि हरियाणवी संस्कृति ने अपने दम पर दुनिया भर में अलग पहचान बनाई है। एक समय वह भी था, जब हरियाणा की संस्कृति लुप्त हो रही थी, लेकिन आज प्रदेश के कलाकारों की देश ही नहीं दुनिया में अगल पहचान है। उन्होंने कहा कि युवा महोत्सव के जरिए हम जहां अपनी संस्कृति से रू-ब-रू होते हैं, वहीं हम ऐसे कलाकारों के संपर्क में आते हैं, जो प्रदेश के लिए ही नहीं, अपितु देश के लिए काम कर रहे हैं।
इस प्रकार रहा परिणाम-
क्लासिकल डांस सोलो में डीएवी गल्र्स कालेज यमुनानगर की टीम रिकमेंडिड, ग्रुप डांस जनरल में एमएलएन कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा खालसा कालेज यमुनानगर व डीएवी गल्र्स कालेज की टीम सयुक्त रुप से कमेंडिड रही। ग्रुप सांग हरियाणवी में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा हिंदू गल्र्स कालेज जगाधरी तथा एमएलएन कालेज यमुनानगर की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। ग्रुप सांग जनरल में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा एमएलएन कालेज तथा डीएवी कालेज साढौरा की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। क्लासिकल वोकल सोलो में डीएवी गल्र्स कालेज की टीम रिकमेंडिड, जीएनजी कालेज तथा गुरु नानक खालसा कालेज की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। क्लासिकल इंस्ट्रूमेंटल सोलो नान परकसन में जीएनजी कालेज की टीम रिकमेंडिड तथा हिंदू गल्र्स कालेज जगाधरी तथा डीएवी गल्र्स कालेज यमुनानगर की टीम संयुक्त रुप से कमेंडिड रही। क्लासिकल इंस्ट्रूमेंटल सोलो परकसन में एमएलएन कालेज यमुनानगर की टीम रिकमेंडिड तथा गुरु नानक खालसा कालेज की टीम कमेंडिड रही।


Read More...

श्रीलाल शुक्‍ल जी को समर्पित दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स के 29 अक्‍टूबर 2011 के अंक में प्रकाशित प्रथम पेज समाचार और विशेष सामग्री


Read More...

शहनाई के शहनशाह और बनरास


फ़ज़ल इमाम मल्लिक

प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां की ज़िन्दगी हिंदुस्तानी संस्कृति की इबादत की तरह रही है। बिस्मिल्ला ख़ां बनारस के थे और बनारस बिस्मिल्ला ख़ां का। बनारस की गलियों, घाटों, चौक-चौराहों से शहनाई के इस उस्ताद का जुड़ाव तो रहा ही, बिस्मिल्ला ख़ां ने बनारस के घाटों, मंदिरों और महफ़िलों में अपनी शहनाई वादन से लोगों को क़ायल किया। शहनाई के इस सम्राट पर जूही सिन्हा की लिखी किताब ‘बिस्मिल्ला ख़ां द मेस्ट्रो फ्राम बनारस’ से इस शहर और यहां से जुड़ी सभ्यता, संस्कृति और संगीत की विस्तृत जानकारी मिलती है। लेखन के साथ-साथ फ़िल्मों के निर्माण से जुड़ी इस लेखिका ने बनारस की गलियों को भी हमारे सामने रखा है, घाटों से टकराते गंगा के पानी की लयकारी भी किताब में है, जीवन के रंग और उमंग भी हैं, मिठाइयों का ज़िक्र भी है और संगीत की उन महफ़िलों की चर्चा भी है जो बनारस की तहज़ीब से कहीं गहरे जुड़ी रही हैं। जूही सिन्हा ने बच्चों के लिए भी लिखा और बड़ों के लिए भी लेकिन संस्कृति उनका ख़ास विषय रहा है। चार साल पहले राजस्थान पर आई उनकी किताब भी ख़ासी चर्चित रही थी।
अपनी इस किताब ‘बिस्मिल्ला ख़ां द मेस्ट्रो फ्राम बनारस’ में जूही सिन्हा ने बीसवीं सदी के बनारस का ज़िक्र बेहतर ढंग से किया है। यहां की संस्कृति की चित्रमय प्रस्तुति के ज़रिए उन्होंने जीवन से जुड़े ठेठ बनारसी ठाठ को पाठकों के सामने परोसा है। शुरुआती अध्याय में जूही सिन्हा बनारस के गली-मोहल्लों, घाटों-नावों, मंदिरों-महफ़िलों, दुकानों-मिठाइयों के ज़ायकÞों से जोड़ती हैं और फिर धीरे-धीरे वे हमें बनारस की संगीत की दुनिया में ले जाती हैं। संगीत की उस दुनिया से वे हमें जोड़ती हैं, जिस दुनिया में उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां पले-बढ़े, सीखा-सिखाया और शहनाई को बुलंदियों पर ले गए। बिस्मिल्ला ख़ां के जीवन के क्रमवार विकास को उन्होंने सामने रखा है। डुमरांव जैसे छोटी-सी जगह से निकले उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां ने बनारस जैसे शहर में अपने को ढाला और फिर शहनाई को बुलंदियों पर पहुंचाया। शागिर्द से उस्ताद बनने तक के सफ़र में उन्होंने कई पड़ाव तय किए। एक अदना से कलाकार से उस्ताद बनने के दौरान उन्होंने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे। शुरुआती दौर में बिस्मिल्ला ख़ां किसी कार्यक्रम के लिए पांच रुपए लेते थे। लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने सुरों को साधा और शहनाई वादन में महारत हासिल कर शोहरत की बुलंदियों को छुआ तो एक कार्यक्रम के लिए पांच से दस लाख रुपए तक उन्हें मिले। इस सफ़र के दौरान उस्ताद को क्या कुछ झेलना और सहना पड़ा है, जूही सिन्हा सलीक़े से इनका उल्लेख करती हैं।
लेकिन किताब में सिर्फÞ बिस्मिल्ला ख़ां ही नहीं है। पुस्तक के ‘द म्युजिकल लेगैसी’ खंड में बनारस की संगीत परंपरा का विस्तार से ज़िक्र किया गया है। बनारस की दाल मंडी की गायिकाओं में से गौहर जान का उल्लेख उन्होंने ख़ासतौर से किया है। गौहर जान के जीवन से जुड़ी यादों को उन्होंने साझा करते हुए लिखा है कि बिस्मिल्ला ख़ां बनारस की ठुमरी गायिकाओं से प्रभावित तो थे ही, गुरु-शिष्य परंपरा को लेकर भी उनके मन में बेतरह सम्मान था और इसका निर्वाह वे हमेशा करते रहे।
जूही सिन्हा सुबह-ए-बनारस का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि ख़ां साहब कहा करते थे कि दो-तीन बजे भोर में ही शहर जाग जाया करता था और हम सब भोर में मिठाई की दुकान पर जाकर बालूशाही और गुलाब जामुन के साथ ही हलवा भी खाया करते थे। इस किताब में पंडित किशन महाराज, पंडित जगदीप और मौजुद्दीन ख़ान भी जगह-जगह अपनी पूरी सांगीतिक परंपरा के साथ मौजूद हैं। बनारस की सांगीतिक परंपरा में यों भी एक ही मज़हब को लोग मानते हैं, चाहे वह औरत हो या मर्द वह सिफर्Þ संगीत और कला को ही अपना मज़हब मानते हैं। उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां भी ऐसे ही संगीतकार ते जिन्होंने हमेशा संगीत को ही अपना मज़हब माना। बिस्मिल्ला ख़ां उन कलाकारों में शामिल है, जिन्होंने संगीत की इबादत की और संगीत के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह था कि जब उनका मन नहीं होता था उस दिन वह कह देते थे, ‘आज शहनाई बजाने का मन नहीं कर रहा है।’ यह किताब खÞां साहब की जिÞंदगी, बनारस शहर और उस शहर की संस्कृति को बेहतर ढंग से हमारे सामने रखता है। किताब की सबसे बड़ी ख़ूबी इसकी भाषा है। जूही सिन्हा ने सरल और सहज भाषा में पुस्तक लिखी है जो अंग्रेजÞी के कम जानकारों की समझ में भी आसानी से आ सकती है। पुस्तक में बनारस और बिस्मिल्ला ख़ां के अलावा दूसरे कलाकारों के कुछ दुर्लभ चित्र भी हैं जो किताब के महत्त्व को और भी बढ़ाते हैं।

बिस्मिल्ला खां द मेस्ट्रो फ्राम बनारस (जीवन वृतांत), लेखक: जूही सिन्हा, प्रकाशक: नियोगी बुक्स, डी-78, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-1, नई दिल्ली-110020, मूल्य: 795





Read More...

राग दरबारी ने श्रीलाल शुक्‍ल को अमर कर दिया है : कहीं नहीं गए वे यहीं हैं

अंक की समीक्षा
ज्ञानपीठ पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित तथा 'राग दरबारी' जैसा कालजयी व्यंग्य उपन्यास लिखने वाले मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल का शुक्रवार यहां सहारा अस्पताल में निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे।
 
पारिवारिक सूत्नों के अनुसार 31 दिसंबर 1925 में लखनऊ जनपद के अतरौली गांव में जन्मे शुक्ल सांस लेने में तकलीफ के बाद 16 अक्टूबर को गोमती नगर स्थित सहारा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तब से वह अस्पताल की गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में भर्ती थे।  हिंदी साहित्य जगत की इस जानी-मानी विभूति ने  शुक्रवार सुबह 11.30 बजे दम तोड़ दिया। श्री शुक्‍ल लम्बे समय से बीमार थे।

शुक्ल की खराब तबीयत के मद्देनजर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल. जोशी ने 18 अक्टूबर को अस्पताल की आईसीयू में ही उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया था।


नुक्‍कड़ परिवार श्रीलाल शुक्‍ल जी को विनम्र श्रद्धासुमन अर्पित करता है।


विस्‍तृत समाचार के लिए यहां और यहां क्लिक करें। 
Read More...

भावभीनी श्रधांजलि ...........

भावभीनी श्रधांजलि ...........
.ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल का आज लखनऊ स्थित सहारा अस्पताल में निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।....श्री लाल शुक्ल राग दरबारी के लेखक थे .... श्री लाल शुल्क ने हिंदी को एक गति प्रदान किया ...उनके मौत पर सुधीश पचौरी ने इसे हिंदी जगत का बहुत बड़ा धक्का बताया ...हलांकि पचौरी को यकीन था की शुक्ल जल्द ही ठीक हो कर वापस आ जायेंगे ...
बाईट - सुधीश पचौरी

शुक्ल के निधन पर हिन्दी साहित्य में शोक की लहर दौड़ गई है। भारतीय ज्ञानपीठ,जनवादी लेखक संघ प्रगतिशील लेखक संघ समेत कई साहित्यिक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उनकी रचना राग दरबारी एक अमर कृति है जो आज पहले से भी ज़्यादा प्रासंगिक है। उनके जाने से हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है।’


Anil Attri Delhi...........................

--

अभी जम्मू में हूँ 10 Nov के बाद दिल्ली आ पायेगें .......


Read More...

शनिवार 29 अक्‍टूबर 2011 को प्रख्‍यात कवियों से मिलने और उन्‍हें सुनने का डायमंड अवसर : आप आ रहे हैं

मैं आ रहा हूं
आप भी आइए
मिलेंगे
सुनेंगे
कहने वाले कहेंगे

हम तो विचारों में
खूब बहेंगे
मुलाकात आपकी
करवायेंगे

जो मेरे बुलाने पर
आयेंगे
डबल एम से
अब यह मत पूछिएगा
कि डबल एम कौन हैं
हम तो अभी मौन हैं

कल मुखर होंगे
कलम मुखर होगी
जब आप सम्‍मुख होंगे
और
होंगे बहुत सारे

सारे जहां से अच्‍छा
हिन्‍दीस्‍तां हमारा ।
Read More...

ये क्या हो रहा है


वीरू भाई का ब्लाग है 'राम राम भाई'. इस ब्लाग का पता है http://veerubhai1947.blogspot.com/ लेकिन आज 27.10.2011 को शाम 5 बजे के आस-पास इस पर एक पोस्ट उन्होंने प्रकाशित की 'कोंग्रेस का भाग्य दिग्विजय सिंह की जेब में है .दुर्भाग्य यह है दिग्विजय सिंह की जेब फटी हुई है .उन्हें बोलने का अतिसार है .'

इसके बाद से यह ब्लाग इंटरनेट से नदारद है. इसकी जगह संदेश आ रहा है

Blog has been removed

Sorry, the blog at veerubhai1947.blogspot.com has been removed. This address is not available for new blogs.
Did you expect to see your blog here? See: 'I can't find my blog on the web, where is it?'

पता नहीं क्यों. 
cache से प्राप्त ब्लाग का चित्र ऊपर है. क्या यह ब्लाग भी blogger.com की मनमर्ज़ी का शिकार है ?

0000000000000000
Read More...

प्रेम जनमेजय बनाम व्‍यंग्‍य यात्रा : हिन्‍दी चेतना पत्रिका के प्रेम जनमेजय विशेषांक का एक पन्‍ना



ऐसे बहुत सारे खूबसूरत और उपयोगी पन्‍नों से लबालब है हिन्‍दी चेतना का अंक। इसे पढ़ना चाहें तो अपना ई मेल पता nukkadh@gmail.com पर भिजवाएं और अपनी राय hindicehetna@yahoo.ca पर भेजें।


Read More...

काका हाथरसी और मैं : शोध दिशा पत्रिका का एक पन्‍ना

शोध दिशा के आजीवन सदस्‍य बनें और हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन के समस्‍त प्रकाशन आधे मूल्‍य पर प्राप्‍त करें। शोध दिशा पत्रिका नया अंक काका हाथरसी पर केन्द्रित विशेषांक है। 
Read More...

राह कौन सी जाऊं मैं, फेसबुक पर लगाऊं दुकान ....

राह कौन सी जाऊं मैं
दीपावली मनाऊं या
फेसबुक पर बस जाऊं मैं
यहीं पर खोल लूं दुकान
विचारों के बनाकर पकवान
सबको खूब खिलाऊं मैं
राह कौन सी जाऊं मैं
सुशील जोशी जी को बुलाऊं मैं

उनसे पटाखे चलवाऊं मैं
अमित त्‍यागी जी से कटवाऊं चालान
बम फटने पर उछल जाऊं मैं
राह कौन सी जाऊं मैं
फेसबुक पर बस जाऊं मैं

कहो तो सो जाऊं यहीं
या सोने के लिए
बिस्‍तर अलग लगाऊं मैं
आप कहें तो बिस्‍तर
यहीं पर बिछाऊं मैं
राह कौन सी जाऊं मैं

नगर कवियों का यहीं पर
सुनहरा भाव नगर बसाऊं मैं
राह कौन सी जाऊं मैं

दीपावली की दूं शुभकामनाएं
दीपावली पर लूं शुभकामनाएं
शुभकामनाओं का अंबार लगाऊं मैं
राह कौन सी सजाऊं मैं
Read More...

एक पत्र पटाखों के नाम

प्यारे पटाखों
सादर फटस्ते!
आजकल तुम सब बहुत खुश होगे कि दीवाली को कुछ ही दिन शेष बचे हैं। तुम्हारा मन दीवाली के दिन मिल-जुल कर फट-फूट कर धमाका करने को बेताब हो रहा होगा। हालांकि अभी कुछ ही दिन बीते हैं रावण और उसके पारिवारिक बंधुओं के अंजर-पंजर को पटाखों द्वारा फटे हुए किन्तु तुम्हारे भीतर की फटकर धमाका करने के इच्छा अपनी प्रवृत्ति अनुसार दिनों-दिन बलवती होती जा रही है।जब तुम सब धमाका कर फूटोगे-फटोगे, जलोगे-मरोगे तो फैलाओगे ध्वनि प्रदूषण जो सुनने की शक्ति क्षमता से होगा कई गुना अधिक। जिस प्रकार ढोल को हद से अधिक पीटने से वह फट जाता है उसी प्रकार कईयों के कान के परदे भी तुम्हारे धमाकों की तेज ध्वनि को सुनकर तार-तार हो जायेंगे। आगे पढ़ें...
Read More...

तानाशाह की विदाई हुई संपन्‍न

गद्दाफी को एक  गद्दा तक न नसीब हुआ, यूं ही मारा गया। खुद तो डूबा, जान के लिए गिड़गिड़ा कर तानाशाही का नाम भी डुबो गया। तानाशाह पर व्‍यंग्‍य लिखने का ठेका नहीं मिला है, हौसला बुलंद इसलिए हो गया है क्‍योंकि तानाशाह की विदाई संपन्‍न हो गई है। जिसका न जीवन व्‍यंग्‍य था और न उसका जाना व्‍यंग्‍य है। आना तो सबका एक सा रोना रहता है। रोने का रंग सबके संग आता है। इसमें तानाशाही व्‍यंग्‍यकार की नहीं, एक तानाशाह की ही चलती है। तानाशाह शब्‍द का आरंभ व्‍यंग्‍य के एक प्राणतत्‍व ताना से ही शुरू हुआ है। लेकिन यह ताना है, बाना नहीं है, इसे आप भी जानते हैं। व्‍यंग्‍य लेखन में हिटलरी चलती है, या यूं कहूं कि व्‍यंग्‍यकारों की कलम मचलती है, उछलती है, कूदती है  कहीं कहीं पर बिसूरती भी है। आपने उसके बिसूरने को बिसरा दिया होगा, यह मुझे पक्‍का मालूम है।
वह अनेक रंग बिखेरती है। अब जो तानाशाह गोली खाकर मर गया, उस पर क्‍या तो व्‍यंग्‍य लिखें और क्‍या ताना मारें। उसके जीते जी उसे व्‍यंग्‍य विषय बनाने और उस पर लिखने की कूबत किसी व्‍यंग्‍यकार की नहीं हुई थी और अब हालत यह है कि सभी उसको कलम से कोंचने में जुट गए हैं। कुछ सीधे कीबोर्ड से ही खटराग की रागनी गा रहे हैं। मैं भी उनमें से एक हूं। तानाशाह पर व्‍यंग्‍य लिखा तो खुदा भी व्‍यंग्‍यकार की मदद नहीं कर सकता, सब जानते हैं। सत्‍ता का यह शाही अंदाज सबको लुभाता है, पर सबका बस नहीं चल पाता है। आप इसमें लिंगदोष मत ढूंढने बैठ जाइये। मान लिया कि बस स्‍त्रीलिंग है पर व्‍यंग्‍य तो स्‍त्रीलिंग है। जी हां, तानाशाह के गांव में आकर सभी पुल्लिंग स्‍त्रीलिंग हो जाते हैं, यह तानाशाही का अनूठा अंदाज है।
लोकसत्‍ता में हर दूसरे दिन कुर्सी पर खतरा मंडराता रहता है क्‍योंकि नेता बन जाते हैं खूब सारे, खुद ही अपने लिए लगाते हैं नारे, अपनी ही मूर्तियां बनवाते हैं, खुद ही उन पर फूल चढ़ाते हैं। इसलिए 5 बरस कुर्सी पर ठहर जाएं तो इतरा जाते हैं। उनका इतराना जायज है। इसी तराने पर मोहित होकर प्रजा कई पांच साला पैकेज गिफ्ट कर देती है।  इसके उलट तानाशाही में सब हथियाया जाता है। तानाशाह विरला ही हो पाता है। तानाशाह के रंग तो कई बरस लगातार बरसात की तरह बरसते रहते हैं। पिछले सप्‍ताह जिसे विदा किया, उसके यहां 42 बरस से लगातार धुंआधार बरसात हो रही थी। तानों की असली बरसात व्‍यंग्‍य में होती है। व्‍यंग्‍य में ही तानों की खेती होती है। यह ऐसी खेती है जो बिना बीजों के की जाती है और खूब फसल देती है, बरसात में भी नहीं डूबती। खेती करना भी प्रत्‍येक के बस का नहीं है। प्रत्‍येक व्‍यंग्‍यकार किसान नहीं हो सकता और न ही प्रत्‍येक व्‍यंग्‍यकार कार चलाने में निपुण होता है। किसान इसलिए कार नहीं चलाता क्‍योंकि फिर वो हल चलाते समय भी गियर तलाशेगा।
व्‍यंग्‍य में जब तक पुलिंग नहीं होगी, तब तक तीखा रंग नहीं निखरेगा। वैसे कुछ ही व्‍यंग्‍य या व्‍यंग्‍य उपन्‍यास होते हैं, जिनका राज बरसों से निरंतर चल रहा है। मानस में महामारी की तरह मचल रहा है। वरना तो अखबारी व्‍यंग्‍य की उम्र तो उसी दिन पूरी हो जाती है वह तो व्‍यंग्‍यकार ही उसे अपने साथ घसीटता रहता है। घिसटना व्‍यंग्‍य को पड़ता है रोजाना। तानाशाह कभी-कभार ही घिसटता है। वह विषय से लिपट उसमें रच बस जाता है लेकिन उसकी हुकूमत कायम नहीं रह पाती, जो तानाशाही में निखरकर दिव्‍य स्‍वरूप पाती है।
तानाशाह न गोली खाता है, न गाली खाता है। इन दोनों मामलों में ही उसका बहुत मुश्किल से खुलता खाता है। गोली सरेआम और गाली, वे ही खिला पाते हैं जो छिप कर देते हैं। सामने आकर गाली खिलाने का किसी में दम नहीं होता। कभी किसी तानाशाह को जूता मारा गया हो, इसकी भी मिसाल नहीं है, वह सीधा गोली खाता है। तानाशाह ताना नहीं मारता, जान लेता है, जान देता है यानी नाता ही तोड़ देता है। न जान रहेगी, न व्‍यंग्‍यकार तनतनाएगा।
माना कि व्‍यंग्‍य लेखन के भी उसूल होते हैं। पर जिंदा तानाशाह पर व्‍यंग्‍य लेखन से जिंदगी भी सलामत रहेगी, इसका भरोसा नहीं किया जा सकता। अब व्‍यंग्‍यकार का जो चालान होना हो, हो जाए। जान रहेगी तो भुगत कर दुख सुख का परिचय प्राप्‍त कर पाएगा। जानेगा कि दुख कैसे फनफनाते हैं। मुझे गोली न मारें, गाली चाहें कितनी दे दें अब यह छूट भी मिली, समझ लीजै।

Read More...

ठेका(लघु कथा)

अजमेर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ थी कि वहाँ की कोई बैंच खाली नहीं थी। एक बैंच पर एक परिवार, जो पहनावे से हिन्दू लग रहा था, के साथ बुर्के में एक अधेड़ सुसभ्य महिला बैठी थी। उसने सभ्यता से पान की पीक थूक-2 कर प्लेटफार्म पर अपने आस-पास कई चित्र बना दिये थे। बहुत देर चुपचाप बैठने के बाद जब उससे चुप्पी बर्दाश्त न हुई तो उसने बगल में बैठे युवक से पूछा, "अजमेर के रहनेवाले हैँ या फिर यहाँ घूमने आये हैं?" युवक ने बताया, "जी अपने माता पिता के साथ पुष्कर में ब्रह्मा जी के मंदिर के दर्शन करने आया था।" महिला ने बुरा मुँह बनाते हुए... आगे पढ़ें...
Read More...

दीपावली पर उपहार लेने देने में हार की दुर्गंध

दीवाली के नाम पर दिवाला दिलवालों का निकलता है। सेल के नाम पर बचा खुचा सब माल गोदामों से निकल जाता है। सब छूट से खिंचे चले आते हैं और सेल में सारा माल ऐसे निपट जाता है, मानो फ्री में बंट रहा हो। यह तो नेताओं का असर है कि देकर छूट लेते हैं लूट।
दीपावली एक ऐसा त्‍योहार कि इधर गुजरा, उधर अगली का इंतजार शुरू गया।  इसमें कसूर आपका नहीं है, इसमें है ही ऐसा आकर्षण। सब लौट लौट कर दीपावली मनाना चाहते हैं। आखिर यह त्‍योहार है ही खूब नोट बरसाने वाला। जिनके खर्च होते हैं, उनके पास भी कई गुने होकर बरसते हैं।
अब मैं आपको एक ऐसा रहस्‍य बतला रहा हूं कि क्‍यों एक दीवाली जाते ही अगली दीवाली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। राम नाम जपना और बचा खुचा माल खपना। छूट और त्‍योहार के नाम पर सब बिक जाता है। गिफ्ट आइटम टूटे फूटे भी धकेल दिए जाते हैं। इन दिनों थोक में भरपूर ऑर्डर आते हैं और धंधा चोखा चमकता है। गिफ्ट एक जगह से चलकर कहां रुकेगायह न गिफ्ट देने वाला जानता है और न लेने वाला ही। गिफ्ट को गिफ्ट कर शिफ्ट कर दिया जाता है। वैसे भी बम फटने की घटनाओं के कारण जब तक जरूरी न हो और पक्‍का विश्‍वास न होकोई भी गिफ्ट को अनपैक करने के नुकसानदायक खेल में नहीं उलझता है। बम निकला और फट गया तो नुकसान और दोबारा से पैक करना पड़ा तो श्रीमान परेशान और पैक करने की फिजूलखर्ची साथ में तंग करती है।
दीपावली का लुत्‍फ लेते हुए हलवाई तो बची खुची बासी मिठाई थोक ऑर्डर के डिब्‍बों में ही घुसा देते हैं। गिफ्ट लेने वाले भी उसे आगे सरका देते हैं। आफिसों के लिए थोक में खरीद करने वाले दुकानदार से सैटिंग करके किलो के डिब्‍बे में दो चार बासी मिठाई के खपाने की जो छूट देते हैं, उसका लाभ भी दीवाली पर ही मिलता है और गत्‍ते का डिब्‍बा तो इन सौदों में मिठाई के रेट से ही तुलता है। अच्‍छी मिठाई मिलावटी ही होगीइसकी भी गारंटी बनी रहती है। इसके बदले खरीदार की सेवा पानी हलवाई कर ही देते हैं, जिसके बारे में खुलासा करना जरूरी नहीं है।
अन्‍ना हजारे के अनशन तक में इस संबंध में किसी ने भी जानबूझकर इस तरह के भ्रष्‍टाचार के निदान के बारे में नहीं सोचा। दिवाली के डिब्‍बे दिवाली के कई दिन पहले से बंटने शुरू हो जाते हैं और कई दिन बाद तक बंटते रहते हैं। कौन डिब्‍बा कहां से चलाकिधर से होता हुआ किधर पहुंचाकोई नहीं जानता, वे कब खुलते हैं लेकिन यह तय है कि उनकी अंतिम परिणति घरों में जाकर नौकरों और काम करने वालों तक पहुंचने में ही होती है और वे भी उसे खाते नहीं हैं, सीधे कूड़ा घरों में पहुंचा देते हैं।
ड्राई फ्रूट्स में तो बिल्‍कुल भी रिस्‍क नहीं होता है, वे पहले से ही इतने सूखे होते हैं कि उन्‍हें कितना ही सुखा लो, उनका रूप और दमक कर सामने आता है, मानो उन्‍हें फेशियल करके निखारा गया हो। मेवों का तेल पानी भला किसने जांचा है। वे कितने ही पुराने और खराब हो चुके हों परंतु बहुत आराम से गिफ्ट के तौर पर बांट दिए जाते हैं। मिलावट करने वाले भी इन दिनों खूब बिजी रहते हैं। इतनी मिलावट करते हैं कि कई बार किसी आइटम में बूरे की जगह आटा या नमक डाल देने तक की दुर्घटनाएं घट जाती हैं।
पुलिस वालों और ट्रेफिक वालोंएमसीडीइंकम टैक्‍स,सेल्‍स टैक्‍सखाद्य सामग्री जांच विभाग मतलब जितने लोगों पर कानून के पालन करवाने का जिम्‍मा होता है, वे पूरी जिम्‍मेदारी और ईमानदारी से उसे कारनामा बनाने में जुटे रहते हैं। इन दिनों जिनको उपहार ढोने और बाद में बेचने का मौका नहीं मिला तो उसकी दीपावली तो व्‍यर्थ गई, समझ लीजिए। अनेक अधिकारी तो दीवाली पर मिलने वाले गिफ्टमिठाईयों की रीसेल के लिए दुकानदारों से डील कर लेते हैं और ढेर के ढेर डिब्‍बे दोबारा बिक जाते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि कोई डेढ़ बजे जिस डिब्‍बे को खरीदकर ले गयाउसने दो बजे गिफ्ट किया और तीन बजे वापिस वही डिब्‍बा दुकानदार के पास दोबारा बिकने के लिए लौट आया।
जब मंदिरों में भगवान की और शमशान में शवों की मौजूदगी में ऐसे ही कार्य किए जाते हैं तो आफिसों और घरों में किसे दिक्‍कत होगी। वहां पर सब अपने अपने मालिक खुद होते हैं। भगवान के यहां चढ़ाए जाने वाले नारियलफूल मालाएं और पूजा सामग्री वगैरह से धन कमाने की ऐसी सैटिंग होती है कि इधर चढ़ावा चढ़ता है और उधर पिछले दरवाजे पर तैनात भगवान के नितांत निजी भक्‍त अति गोपनीय तरीके से उसे वापिस दुकानों में फिर से बिकने के लिए भिजवा देते हैं। फिर यह मंदिरों के लिए भी अच्‍छा है क्‍योंकि बेहिसाब पूजा सामग्री,फूलफल इत्‍यादि आएं और वे भगवान के चरणों में पड़े सड़ते रहें, भगवान भी इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे। सारी सामग्री भगवान खा लेंगे तो निश्चित ही उनका पेट खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। अगर उस सामग्री को वहां से न ले जाया जाए तो भगवान उसी में खो जायेंगे और भक्‍तों को कैसे नजर आयेंगे।   
अन्‍ना हजारे को सलाह एक नेक सलाह है कि वे एक अनशन दीपावली जैसे त्‍योहारों पर भी किया करें। ऐसा न हो कि इस सलाह की भनक किसी को लग जाए और वे अमल करके लाभ उठा लें जिसमें इस गिफ्ट रूपी भ्रष्‍टाचार की समाप्ति का आग्रह किया गया हो। जिस तरह दीपावली लोकप्रिय है उसी तरह अन्‍ना और भी अधिक लोकप्रिय हो जायेंगे। दीपावली वैसे तो प्रेम का त्‍योहार हैविजय का त्‍योहार है। असली प्रेम उपहारों से किया जाता है और विजयी वही होता है जो सबसे अधिक गिफ्ट हथियाता है।
गिफ्ट पाना या हथियाना भी एक कला से कम नहीं है। इस अवसर पर जूते कपड़ों की इतनी सेल लगती हैं और सभी सपरिवार उन्‍हें खरीदने में इस कदर जुटे रहते हैं कि लगता है कि जूते, कपड़े फ्री में बंट रहे हैं। पहले नए कपड़ों के खरीदने से दीवाली होती थी और अब नए गैजेट्स खरीदने से दीवाली की खुशियां मिलती हैं। बम पटाखे के रूप में नोटों का दहन नहीं किया तो कैसी दीवाली और वरिष्‍ठ रचनाकारों की सब पुरानी रचनाएं इस अवसर पर नहीं छपीं तो फिर काहे की दीवाली। रही बची कसर इस अवसर पर जुआ खेलकरलाटरी के टिकट खरीद कर भाग्‍य आजमाने में निकाल ली जाती है। जुआ खेलनाशराब पीना जैसी कलाएं दीपावली के उत्‍साह में खूब बढ़ोतरी करती हैं। आयाम तो इतने हैं कि इस पर एक पूरी पुस्‍तक लिखकर दीपावली के दिन लोकार्पित की जा सकती हैआपकी क्‍या राय हैक्‍या ऐसा कर लिया जाए ?
Read More...

कैंपस के फिल्‍मोत्‍सवों में अंतर्राष्‍ट्रीय शब्‍द न जोड़ें तो बेहतर ! अजय ब्रह्मात्‍मज

(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)


मुनानगर में डीएवी ग‌र्ल्स कॉलेज है। इस कॉलेज में यमुनानगर के अलावा आसपास के शहरों और दूर-दराज के प्रांतों से लड़कियां पढ़ने आती हैं। करीब चार हजार से अधिक छात्राओं का यह कॉलेज पढ़ाई-लिखाई की आधुनिक सुविधाओं से युक्त है। इस ग‌र्ल्स कॉलेज की एक और विशेषता है। यहां पिछले चार सालों से इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हो रहा है। कॉलेज की प्रिंसिपल सुषमा आर्या ने छात्र-छात्राओं में सिने संस्कार डालने का सुंदर प्रयास किया है। उनकी इस महत्वाकांक्षी योजना में अजीत राय का सहयोग हासिल है।
सीमित संसाधनों और संपर्को से अजीत राय अपने प्रिय मित्रों और चंद फिल्मकारों की मदद से इसे इंटरनेशनल रंग देने की कोशिश में लगे हैं। डीवीडी के माध्यम से देश-विदेश की फिल्में दिखायी जाती हैं। संबंधित फिल्मकारों से सवाल-जवाब किये जाते हैं। फिल्मों के प्रदर्शन के साथ ही फिल्म एप्रीसिएशन का भी एक कोर्स होता है। निश्चित ही इन सभी गतिविधियों से फेस्टिवल और फिल्म एप्रीसिएशन कोर्स में शामिल छात्र-छात्राओं को फायदा होता है। उन्हें बेहतरीन फिल्में देखने को मौका मिलता है। साथ ही उत्कृष्ट सिनेमा की उनकी समझ बढ़ती है।
पिछले हफ्ते मैं यमुनानगर में था। पांच सौ छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए मैं उनकी आंखों और चेहरों की चमक देख रहा था। अपने संबोधन के बाद मैंने उनसे पूछा कि क्या उनमें से कोई फिल्मकार भी बनना चाहता है? तकरीबन 25-30 छात्रों ने हाथ उठाया। औपचारिक संबोधन के बाद करीब दर्जन भर छात्रों ने मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलने की संभावनाओं के बारे में जिज्ञासा प्रकट की। देश के हर कोने से उभर रहे युवा फिल्मकारों के मन में मुंबई आने और यहां नाम कमाने की आकांक्षा है। मैं इस आकांक्षा के पक्ष में नहीं हूं। मुझे लगता है कि अपने इलाके में रहते हुए भी सीमित संसाधनों के साथ फिल्में बनायी जा सकती हैं। हमें वितरण की नयी प्रणाली विकसित करनी होगी। नये वितरक तैयार करने होंगे और अपने-अपने इलाकों के प्रदर्शकों को तैयार करना होगा। स्थानीय टैलेंट का स्थानीय उपयोग हो।
बहरहाल, यमुनानगर जैसे शहरों में आयोजित फिल्म फेस्टिवल अपने उद्देश्य और ध्येय में स्पष्ट नहीं हैं। फेस्टिवल के आयोजकों को अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी। अगर नेटवर्क तैयार करना और निजी लाभ के लिए फेस्टिवल का इस्तेमाल करना है, तो सारा प्रयास निरर्थक साबित होगा। फेस्टिवल का उद्देश्य और ध्येय तय होगा तो यह संपर्को और मित्रों की चौहद्दी में निकलेगा। इसमें अन्य फिल्मकारों और सिनेप्रेमियों का जुड़ाव होगा। यह अभियान आंदोलन बनेगा और धीरे-धीरे उस बंजर जमीन से नये फिल्मकार आते दिखाई पड़ेंगे। किसी भी फेस्टिवल के लिए चार साल के आयोजन कम नहीं होते। इस बार मोहल्ला लाइव के सहयोग से मनोज बाजपेयी के साथ की गयी लंबी बातचीत प्रेरक और अनुकरणीय रही। मोहल्ला लाइव के सहयोग से ऐसे और भी आयोजन हों।
देश के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और अन्य संस्थाओं के सहयोग से छोटे-छोटे फेस्टिवल आयोजित होने चाहिए। उन्हें सरकारी समर्थन न मिले, तो भी स्थानीय सहयोग से इसे संभव किया जा सकता है। शैक्षणिक उद्देश्य से आयोजित ऐसे फेस्टिवल में फिल्मों के डीवीडी प्रदर्शन में कानूनी अड़चनें भी नहीं आतीं। बेहतर होगा कि ऐसे फिल्म फेस्टिवल के नाम से इंटरनेशनल शब्द हटा दिये जाएं। सिर्फ विदेशी फिल्में दिखाने या एक-दो फिल्मकारों को बुलाने से कोई फेस्टिवल इंटरनेशनल नहीं हो जाता। इसे हरियाणा फिल्म फेस्टिवल भी कहें तो उद्देश्य और प्रभाव कम नहीं होगा। सबसे जरूरी यह समझना है कि फेस्टिवल क्या हासिल करना चाहता है और क्या वह इसके काबिल है?
मोहल्‍लालाइव का आभार आओ बहस करते हैं
ई मेल पर मिली एक टिप्‍पणी : संगम पांडेय 
दैनिक जागरण जैसे अखबारों में खबर और पत्रकारिता के नाम पर पीआरगिरी और व्यक्तिगत राग – द्वेष कैसे निकाली जाती है,उसे समझने के लिए ये एक अनिवार्य लेख है। अविनाशजी को इस सच को हमलोगों के सामने लाने के लिए कोटि-कोटि नमन। वे कई बार दूसरों के पंख काटने के लिए भी जनहित में कार्य कर जाते हैं। इस लेख के आने से भी यही बात हुई। इस लेख के माध्यम से अजय ब्रह्मात्मज जैसे सिनेमा के पीआर और एजेंट के साथ-साथ मोहल्लालाइव की प्रतिष्ठा भी पाठकों के बीच धूल-धूसरित हुई है। बात अजय ब्रह्मात्मज को लेकर की जाए,इससे पहले मोहल्लालाइव के मॉडरेटर अविनाश से यह प्रश्न पूछा जाना जरुरी है कि क्या इस लेख के पहले उन्होंने यमुनानगर फिल्म फेस्टीबल से संबंधित कोई रिपोर्ट या लेख पहले प्रकाशित की थी? अगर की थी तो उनसे विनम्र अनुरोध है कि उसकी लिंक एक बार फिर से हमलोगों के बीच लाएं जिससे कि बाकी के पाठकों जो इस पूरे संदर्भ को नहीं समझ पा रहे हैं,वे समझ सकें कि आखिर पूरा मामला क्या है? उनके लिए यह लेख फॉलोअप के रुप में काम आएगी। अगर नहीं की थी तो फिल्मोत्सव के 15 दिनों बाद ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित करना,अपने आप में संदेह पैदा करता है और ऐसा लगता है कि इस बीच अविनाश और अजय ब्रह्मात्मज की दाल अजीत राय के साथ ठीक से गली नहीं और गली तो उसमें दोनों का असली चेहरा खुलकर सामने आ गया,जिसका कि अब बदला लेने की भावना से यह सबकुछ लिखा गया। अविनाशजी,आपके पास एक मंच है जिसे कि बहुत सारे लोग पढ़ते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है आप इसका प्रयोग अपने निजी स्वार्थ और दूसरों की टोपी उछालने के लिए करें और वह भी अपनी दाल न गलने की स्थिति में न कि कोई पत्रकारीय चरित्रों का पालन करने की नीयत से। अब आइए,पूरे मामले पर बात करें जिससे यह स्पष्ट हो सके कि अजय ब्रह्मात्मज ने पूरे 15 दिन बाद अन्तर्रा्ष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का मतलब समझाने की तकलीफ क्यों उठायी? वैसे पहले यह स्पष्ट कर दें कि अजय ब्रह्मात्मज और अविनाश की अगर चले तो अन्तर्राष्ठ्रीय क्या,यमुनानगर फिल्म फेस्टीबल को क्षेत्रीय स्तर तक की भी होने लायक न छोड़ें। आखिर जब यही दोनों महानुभाव अपने को बिना कुछ करने पर ही सिलेब्रेटी समझते हैं और उसी के हिसाब से पैसे की आयोजकों से मांग करते हैं तो फिर बाकी के लोगों की क्या मांग होगी,यह कल्पना से बाहर की चीज है।
अजय ब्रह्मात्मज मुंबई से दिल्ली जागरण फिल्म फेस्टीबल में शामिल होने के लिए आए और उन्होंने सारी सुविधा और किराया-भाड़ा जागरण से लिया। इस बीच अजीत राय ने उन्हें यमुनानगर के लिए आमंत्रित करते रहे और अजयजी देखते हैं-आते हैं,करते रहे जैसा कि कोई बड़ा आदमी करता है। अजयजी फिर यमुनानगर गए और सिर्फ अपनी उपस्थिति के कारण मुंबई से आने-जाने के किराये की मांग कर दी जो कि कुल अठारह हजार रुपये थे। वैसे मुंबई से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई का का किसी भी फ्लाईट में इतना किराया नहीं होता है। अजयजी जिस डीएवी गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल के काम की सराहना कर रहे हैं और दूसरी तरफ अजीत राय की कोशिशों को आपसी फायदे और जान-पहचान का हिस्सा बता रहे हैं,उनसे लोगों को पूछना चाहिए कि आपने एक ही जगह आने-जाने के लिए जागरण और यमुनानगर फिल्मोत्सव से पैसे कैसे ले लिए? क्या ऐसा करना आपके लिए नैतिक रुप से सही था? इस फिल्मोत्सव में आपसे भी बहुत बड़े-बड़े नाम आते हैं लेकिन वे फिल्मोत्सव और कॉलेज की क्षमता के अनुसार पैसे की मांग और सुविधाएं लेते हैं लेकिन आपने तो इतना अधिक लिया -जिसके लायक आप हैं भी नहीं। क्या आप जैसे लोगों की इस घिनौनी कुचेष्टा के बाद भी यह फिल्मोत्सव अन्तर्राश्ट्रीय बन पाएगा,जिसके लिए अजीत राय सहित कॉलेज के लोग प्रयासरत हैं? यमुनानगर में इतनी बड़ी रकम एक आदमी के लिए दिए जाने से दिक्कतें हुई और अजयजी को कॉलेज की इज्जत और अठारह हजार के बीच चुनना था और उन्होंने अठारह हजार चुना। इधर
फिल्मोत्सव के प्रबंधन ने अविनाशजी से कहा कि उन्हें मनोज वाजपेयी की कोई दरकार नहीं है। लेकिन अविनाशजी को अपना अस्तित्व खतरे में नजर आया और बार-बार अजीत राय पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि ऐसा न करें,वाजपेयी का कार्यक्रम हर-हाल में होना चाहिए। अविनाशज0ी और अजयजी से पूछा जाना चाहिए कि क्या इस तरह जबरदस्ती मनोज वापजपेयी को घुसाकर भी फिल्मोत्सव को अन्तर्राष्ट्रीय होने में मदद मिली? मनोज वाजपेयी को वैसे भी दिल्ली अपने पारिवारिक काम से आना था और रुकना था। अविनाशजी ने मनोज वाजपेयी का खर्चा बचाने और अपनी पीआर मजबूत करने के लिए इस फेस्टीबल में फिट कर दिया। जो मनोज वाजपेयी अदाकारी के आधार पर ही हम सबका हीरो है,इस पूरे मामले में इतना घटिया निकला कि उसने अपनी और अपनी पत्नी की बिजनेस क्लास की टिकट ली और करीब 80 हजार रुपये अविनाशजी के साथ मनोज वाजपेयी के इस पूरे कार्यक्रम में फूंक गए। यमुनानगर फिल्मोत्सव आपसे सहयोग और मदद से चलनेवाला कार्यक्रम है। मजबूरी में आयोजकों को वहां के एक सह्दय से मदद लेनी पड़ गयी। सवाल है कि इस काम के लिए मजबूर किसने किया? वही अविनाशजी और हमारे मनोज वाजपेयी हीरो ही न जो कि भ्रष्टाचार मुक्त0 सुंदर समाज बनाने का ढोंग करते रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में आखिर फिल्मोत्सव और डीएवी कॉलेज,यमुनानगर का क्या फायदा हुआ? उनकी तो एक रिपोर्ट तक मोहल्लालाइव ने प्रकाशित नहीं की और आज अजयजी ने लिखा भी तो पूरी अपनी खुंदक निकाल दी। क्या उनमें इस बात का साहस है कि वे लोगों के सामने स्वीकार करें कि एक ही जगह से आने-जाने के लिए उन्होंने दो अलग-अलग आयोजकों से पैसे लिए? अगर ऐसा वे स्वीकार लेते हैं या फिर उनकी पोस्ट लगाते वक्त अविनाशजी लिख देते कि यह अजयजी के निजी विचार हैं,तब भी शायद कुछ ईमानदारी बची रह जाती। वैसे भी 15 दिन बाद की इस पोस्ट में शक की सुइयां अपने आप ही उठती रहती है। दैनिक जागरण के नाम पर अजयजी ने जो निजी लाभ लेने की कोशिश की है,वह कितनी ओछी घटना है,इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है।
हम पाठकों से बात इतनी ही विनती करेंगे कि आप मोहल्ला की किसी भी रिपोर्ट और पोस्ट को पूरी तरह आंख खोलकर पढ़े क्योंकि अब यहां पीआर की प्रकाष्ठा शुरु हो गई है। यह साइट कई सामग्री को छापने और नहीं छापने के लिए धन की उगाही करता है,उसे वह खुद तो उजागर नहीं करेगा लेकिन उसके लिए अब मोहल्लालाइव के बदले किसी शहरलाइव वेबसाइट की जरुरत है। हम अंत में यह जरुर कहेंगे कि अजीत राय दूध का धुला नहीं है लेकिन उस पर लिखने का नैतिक आधार न तो अजय ब्रह्मात्मजी और अविनाशजी के पास नहीं है क्योंकि ये दोनों भी समान रुप से और कहीं अधिक घिनौनी करतूतों में शामिल हैं।

Read More...

नुक्‍कड़डॉटकॉम नाम से प्रकाशन शुरू किया जाए ?

क्‍या नुक्‍कड़डॉटकॉम नाम से एक प्रकाशन शुरू किया जाए , यदि आप इसका उत्‍तर हां में देते हैं तो यह जानकारी भी चाहूंगा कि :-

इसके लिए औपचारिकताएं क्‍या रहेंगी
क्‍या इसका पंजीकरण करवाना आवश्‍यक है
आईएसबीएन नंबर प्राप्‍त करने के लिए क्‍या और कहां पर करना होता है
कम्‍पोजिंग, प्रूफ रीडिंग, प्रिंटिंग इत्‍यादि की क्‍या प्रक्रिया रहेगी और कहां पर कराई जाए
पुस्‍तकों की बिक्री व वितरण के लिए क्‍या नीति बनाई जाए

चाहता हूं कि पुस्‍तक की बिक्री लागत पर ही की जाए। प्रकाशन सामूहिक हो। नुक्‍कड़ से जुड़े साथियों के लिए प्रकाशित पुस्‍तकों को लेने की बाध्‍यता हो। उनकी पुस्‍तकों को प्रकाशन में वरीयता दी जाए। मतलब सभी कार्य सहयोगी आधार पर ही की जाएं। नाममात्र 10 से लेकर 25 रुपये तक की मासिक सदस्‍यता का प्रावधान किया जाए। वही सदस्‍यता संख्‍या और शुल्‍क नुक्‍कड़डॉटकॉम की मजबूती का आधार बने।

अगर आप इच्‍छुक हैं तो अपनी सहमति और अन्‍य जानकारी nukkadh@gmail.com पर भेजें। कई साथियों की सहमति इस संबंध में मिल चुकी है। वे हर तरह से तैयार हैं। परंतु कदम सभी सावधानी से उठाए जाने चाहिएं ताकि प्रकाशन का यह सफर दूर तक सफलतापूर्वक चल सके। पुस्‍तकें वास्‍तविक पाठकों तक पहुंच सकें। सभी की उच्‍चगुणवत्‍ता की पुस्‍तकों का प्रकाशन हो सके। पुस्‍तकों के चयन के लिए एक संपादक मंडल का गठन भी किया जाए।

और वे सभी बातें जो आपके मन में उठ रही हैं और मेरे मन में नहीं उठ पाई हैं। सभी की चर्चा जरूरी है। सब चर्चा और विमर्श खुलकर टिप्‍पणियों में हों तो बेहतर रहेगा। सभी इस संबंध में शिक्षित हों।



Read More...

दीपावली पर हिंदी ब्‍लॉगिंग की पुस्‍तकों से छूट वापिस लेने की संभावनाएं

पिछले दिनों हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर  जिन दो पुस्‍तकों का प्रकाशन हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन, बिजनौर ने किया है। इस दीपावली पर उन पुस्‍तकों के विक्रय पर एक सौ रुपये तक बढ़ाए जाने की संभावनाएं हैं क्‍योंकि  दोनों पुस्‍तकों की अब सीमित प्रतियां ही बची हैं। अर्थशास्‍त्र के मांग और पूर्ति के सिद्धांत को ध्‍यान में रखे जाने से इस दीपावली के बाद से पुस्‍तकें 450/- रुपये के स्‍थान पर 600/- रुपये जमा कराने पर मिलेंगी। वैसे तो सिर्फ एक सौ रुपये की आज के युग में कोई खास अहमियत तो नहीं है क्‍योंकि अगर आप कहीं पर आइसक्रीम खाने के लिए खड़े हो जाते हैं तो एक सौ रुपये तो यूं ही चले जाते हैं। अगर आप पेट्रोल पंप पर पेट्रोल, डीजल या गैस लेने के लिए लाईन में लगते हैं तो क्‍या आपको यह बतलाने की जरूरत है कि एक सौ रुपये में खरीदे गए ईंधन से कितने दिन वाहन चलाया जा सकता है। दूध लेने भी जायेंगे तो एक सौ रुपये में तीन किलो खरीद भी लाएं परंतु घी, मक्‍खन, पनीर तो एक किलो खरीदने के बारे में सोचिएगा भी मत। हां, अगर दीपावली पर किसी को देने के लिए यदि आप गिफ्ट की तलाश में हैं तो चाकलेट, बिस्‍कुट का डिब्‍बा अवश्‍य ही आपको एक सौ रुपये में मिल जाएगा। 
मेरी तो यह सलाह है कि आप इस दीपावली पर अपने मित्रों को दोनों पुस्तकें उपहार स्‍वरूप भिजवा ही दीजिए और एक सौ रुपये अवश्‍य बचा लीजिए। आखिर दीपावली पर की गई बचत से मन को खूब सुकून मिलता है।

प्रक्रिया वही है जो नीचे लिखी है :-

(१) पुस्तक का नाम : हिंदी ब्लॉगिंग : अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति
यह पुस्तक अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात के द्वारा संपादित है
 मूल्य : 495/- ( डाक खर्च अलग से )
प्रकाशक : हिंदी साहित्य निकेतन, 16, साहित्‍य विहार, बिजनौर (ऊ.प्र.) 246701


(२) पुस्तक का नाम : हिंदी ब्लॉगिंग का इतिहास
लेखक का नाम : रवीन्द्र प्रभात
मूल्य : 250 /-( डाक खर्च अलग से)
प्रकाशक : हिंदी साहित्य निकेतन, 16, साहित्‍य विहार, बिजनौर (ऊ.प्र.) 246701



रुपये 450/- केवल भेजने के लिए आप अपनी सुविधानुसार निम्‍नलिखित तीन विकल्‍पों में किसी एक का चयन कर सकते हैं
1. आप मनीआर्डर से सीधे हिंदी साहित्य निकेतन, 16, साहित्‍य विहार, बिजनौर (ऊ.प्र.) 246701 के पते पर राशि भेज सकते हैं परंतु मनीआर्डर के पीछे संदेश में अपना पूरा पता, फोन नंबर ई मेल आई डी के साथ अवश्‍य  लिखें।
2. तकनीक का लाभ उठाते हुए आप बैंक ऑफ बड़ौदा, बिजनौर के नाम हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन के खाता संख्‍या 27090100001455 में नकद जमा करवा सकते हैं। इस सुविधा का लाभ उठाने के बाद जमा पर्ची का स्‍कैन चित्र मेल पर अपनी पूरी जानकारी के साथ अवश्‍य भिजवायें।
3. आप यह राशि हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन के नाम ड्राफ्ट के द्वारा भी डाक अथवा कूरियर के जरिए भेज सकते हैं। चैक सिर्फ सी बी एस शाखाओं के ही स्‍वीकार्य होंगे।
आप जिस भी विकल्‍प का चयन करें, उसका उपयोग करने के बाद इन ई मेल पर सूचना भी अवश्‍य भेजने का कष्‍ट कीजिएगा
giriraj3100@gmail.com, ravindra.prabhat@gmail.com & nukkadh@gmail.com पर जरूर भेजिएगा।





वैसे जब हम आपको सच्‍चाई बतला रहे हैं तो आपको मालूम हो ही जाना चाहिए कि संपादकद्वय किसके साथ हैं। इसलिए मौका मत चूकिए, आलस छोड़ दीजिए और तुरंत जाकर पैसा (नहीं रुपया) जमा कर सूचना ई मेल से भेज दीजिए और किसी फीमेल के चक्‍कर में मत रहिए क्‍योंकि वे तो दीपावली पर आपसे हजारों खर्च कराकर भी संतुष्‍ट नहीं होंगी।
Read More...

बिहार में सूचना का अधिकार, बिना धार का हथियार.

माननीय मुख्यमंत्री महोदय ने चुनाव पूर्व बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को अपना प्रमुख मुद्दा बताया था| उन्होंने वादा किया था कि हम जनता की आँखों से देखेंगे और उन्हीं के कानों से सुनेंगे भी| जनता की आँखें तो तथ्यात्मक सूचनाओं के बिना मोतियाबिंद के मरीज की आँखें बन जाती हैं और कान तो सुनेंगे वही जो उन्हें सुनाया जाएगा| पारदर्शिता के क्षेत्र में काम करने के लिए अखबारों में बिहार सरकार की काफी तारीफ़ हो रही है और व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए नित नई-नई व्यवस्थाएं की जा रही है| सूचना का अधिकार क़ानून स्वतन्त्र भारत में एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में देखा गया था| लोकहित में इसका काफी प्रयोग किया जाने लगा, जिससे सरकारी तंत्र और भ्रष्ट अधिकारियों में खौफ पैदा हुआ| बिहार सरकार ने प्रशासनिक पारदर्शिता के क्षेत्र में विशिष्ट पहल करते हुए जानकारी सुविधा केन्द्र की स्थापना की, जिसमें कॉल सेंटर तथा इंटरनेट के माध्यम से सूचना हेतु आवेदन देने की व्यवस्था की गयी| देश में पहली बार जब बिहार सरकार ने आईसीटी (ICT-Information and Communications Technology) का प्रयोग करते हुए सूचना अधिकार अधिनियम को व्यापक स्तर पर प्रसारित करने एवं आम लोगों की पहुँच तक लाने का काम किया तो बिहार सरकार की इस पहल को भारत सरकार द्वारा ई-गवर्नेंस का उत्कृष्ट उदाहरण मानते हुए पुरस्कृत किया गया था| समय बीतने के साथ भ्रष्ट गठजोड़ ने इसका तोड़ खोजना शुरू किया और आज इस क़ानून को ठेंगा दिखाया जाने लगा| आज बिहार सरकार के सारे दफ्तरों में सूचना देने के बजाए सूचना छुपाने हेतु भरपूर जोर-आजमाईश हो रही है|
जानकारी सुविधा केन्द्र के बारे में तो बस यही कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था संभवतः बिहार सरकार ने केवल पुरस्कार पाने के लिए ही बनाई थी| ऑनलाइन दर्ज आवेदनों के बारे में मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह कहता है कि उनका कोई रेस्पोंस नहीं लिया जाता| अगर व्यवस्था गूंगी-बहरी हो तो क़ानून में दर्ज प्रथम अपील, द्वितीय अपील बस कागज़ पर लिखे क़ानून ही रह जाते हैं, वे जमीन पर पाँव ही नहीं रखते| इतनी शानदार व्यवस्था का व्यवस्थापकों ने भ्रूण-ह्त्या कर रखी है|
सूचना आयोग की लापरवाही का आलम यह है वाद संख्या ४६९६३/१०-११ के लोक सूचना अधिकारी प्रखंड विकास पदाधिकारी, दाउदनगर है| पर, सूचना आयोग से नोटिस प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, दाउदनगर को प्रेषित की जाती है| हद तो तब, जब प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी एवं आवेदक दोनों द्वारा बार-बार यह बताया जाता है कि इसमें लोक सूचना अधिकारी प्रखंड विकास पदाधिकारी, दाउदनगर हैं तब भी आयोग के वेबसाईट पर इसे सुधारा नहीं जाता है| इस लेख के लिखे जाने तक आयोग के आधिकारिक वेबसाईट पर इसमें सुधार नहीं किया गया है और पूरा विश्वास है कि इस लेख के छपने के बाद भी आप इसे यथावत देख सकते है|
सूचना के अधिकार पर काम कर रहे बिहार के चर्चित कार्यकर्ता एवं नागरिक अधिकार मंच के अध्यक्ष श्री शिवप्रकाश राय ने जब सूचना आयोग से यह जाननी चाही कि अब तक आयोग ने सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा २०(१) और २०(२) अंतर्गत कितने लोक सूचना पदाधिकारियों पर अर्थ दंड लगाए, कितने पर विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा की, कितनों से अर्थदंड की वसूली हुई और कितनों पर विभागीय कार्रवाई की गयी| तो सूचना आयोग के लोक सूचना पदाधिकारी ने इन सूचनाओं के उपलब्ध नहीं रहने की सूचना दी| क्या सूचना आयोग के पास भी अपने कार्यों के बारे में ही सूचना नहीं है ?
असली बात यह है कि सूचना आयोग में द्वितीय अपील की सुनवाई के दौरान दिखावे को तो लोक सूचना पदाधिकारियों पर अधिनियम के विरुद्ध आचरण करने हेतु जुर्माना लगाया जाता है, जो समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनती हैं| पर, या तो उन पर लगाए जुर्माने को वसूलने हेतु कोई कार्रवाई नहीं होती अथवा अवैधानिक तरीके से उनका जुर्माना ही माफ कर दिया जाता है| सूचना के अधिकार अधिनियम में कहीं भी लोक सूचना अधिकारी पर लगे अर्थदंड को माफ करने का प्रावधान नहीं है| उदाहरण के तौर पर वाद संख्या ३२२८६/०९-१० का उल्लेख करना मुनासिब होगा| दिनांक ०५|०४|२०११ को इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सूचना आयुक्त श्री पी० एन० नारायणन ने लोक सूचना अधिकारी सह पंचायत सचिव तथा पंचायत रोजगार सेवक, ग्राम पंचायत- राजपुर (बक्सर) पर २५००० रूपए का अर्थदंड लगाया तथा दिनांक ३०|०६|२०११ तक आवेदक को सूचना दी जाने, दंड राशि जमा किए जाने तथा धारा २०(२) अंतर्गत आयोग में स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया| लेकिन अगली तिथि दिनांक ०२|०९|२०११ को मुख्य सूचना आयुक्त श्री अशोक कुमार चौधरी ने जुर्माने एवं स्पष्टीकरण की बात तो छोड़ ही दें, लोक सूचना अधिकारी को सूचना आयोग में उपस्थिति से भी छूट दे दी| ऐसे फैसले दाल में कुछ काला होने का भान कराते हैं, नागरिक अधिकार मंच के अध्यक्ष श्री शिव प्रकाश राय तो कहते हैं कि पूरी दाल ही काली है|
ऐसे भी मामले हैं जिनमें सूचना आयोग ने लोक सूचना पदाधिकारी को सूचना देने का आदेश दिया, तो वे सूचना आयोग के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय चले गए| श्री शिव प्रकाश राय द्वारा प्राप्त की गयी सूचना के अनुसार वर्ष २००८ से ०५|०८|२०११ तक ऐसे कुल १०० मामले हैं| इन मामलों में सूचना आयोग को अब तक दस लाख रूपए से अधिक की राशि वकीलों को कानूनी सलाह लेने के बदले में देना पड़ा है, लोक सूचना पदाधिकारियों द्वारा व्यय की गयी राशि का विवरण उपलब्ध नहीं है| पर यह निश्चित रूप से राज्य सूचना आयोग द्वारा व्यय की गयी राशि से कई गुनी अधिक होगी| दोनों पक्षों द्वारा व्यय की गयी राशि बिहार सरकार के राजकोष से खर्च हो रहे हैं| कितनी अजीब बात है कि बिहार सरकार के राजकोष की राशि का अपव्यय सरकार के संस्थाओं द्वारा ही परस्पर विरोध में किया जा रहा है- एक सूचना दिलाने के नाम पर दूसरा सूचना छुपाने के लिए| क्या यह प्रदेश की निरीह जनता के साथ भद्दा मजाक नहीं है
Read More...

रावण के पुतले की ख्‍वाहिश

सरकार को एक ई मेल मिलती है और कईयों की नींद उड़ जाती है जबकि उनमें से बहुतेरे ऐसे होते हैं जिन्‍हें नींद आती नहीं है पर वे भी यही अहसास कराते पाए जाते हैं कि उनकी नींद उड़ गई है। अब उड़कर कहां गई है, यह तो कोई नहीं जानता परंतु वे उस नींद को इस हालिया मिली ई मेल में तलाशने में लग गए हैं। ई मेल में खबर यह है कि इस बार पुतलों ने विद्रोह कर दिया है। जबकि इसमें विशेष यह है कि रावण के पुतलों ने नेताओं के मुखौटे पहनने से साफ मना कर दिया है। दशहरा ... पूरा पढ़ने और अपनी ख्‍वाहिश जाहिर करने के लिए यहां क्लिक कीजिएगा
Read More...

गधा कौन (लघु कथा)

भूरा जैसे ही जज के सामने पहुंचा, फफककर रोने लगा। जज ने उससे पूछा "क्या बात हुई ?क्यों रो रहे हो ?"भूरा बोला,"माई बाप .हमने चोरी नही की है.इन पुलिस वालों ने हमें झूठा इल्जाम लगाकर फंसा दिया है .जज बोला ,"अच्छा यदि तुमने चोरी नही की तो उस स्थान पर इतनी रात में क्या कर रहे थे ."भूरा ने सुबकते कहा,"जज साहब हम दिल्ली में नये -२ आये हैं .रात को रास्ता भटक गये थे.रास्ते इन पुलिस वालों ने पकड़ कर चोरी के इल्जाम में बंद कर दिया." जज ने कुछ सोच विचार के बाद भूरा से कहा,"बेटा चिंता मत करो में तुम्हारे साथ न्याय करूँगा." आगे पढ़ें...
Read More...

एक लघुकथा

विदेशी - "जब हमारे यहां ये पाया जाता है कि किसी जगह अक्सर सिगरेट के टुकड़े मिल रहे हैं तो ये समझा जाता है कि वहां एशट्रे की आवश्यकता है, सरकार वहां एक एशट्रे रखवा देती है."
भारतीय - 'हमारे यहां जब लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर मूत्र-विसर्जन करते पाया जाता है तो सरकार उस दीवार पर लिख देती है -"देखो गधा पेशाब कर रहा है."
00000000
Read More...

नोबल पुरस्‍कार चाहिए तो चले आइए

नेता देश से खेलते समय, कब कुर्सी से खेल जाते हैं, भनक भी नहीं लगती कि वे करेंसी नोटों से भी खेल रहे होते हैं, और उनके रंग को काले से गोरा बनाने के खेल में जुगाड़ाधीन रहते हैं। वोटर और जनता की भावनाओं से खेलना तो उनकी परमानेंट खेल मोड में फीड रहता है। किसी को अहसास भी नहीं होता और वे खूब तेजी से खेलकर अपनी विशिष्‍टता से सबको सम्‍मोहित कर लेते हैं। खेलने वाले जो मिलावट का खेल खेलते हैं, भला आप उन्‍हें खिलाड़ी कैसे नहीं मानेंगे, फिर नकली करेंसी का प्रकाशन, उनका प्रसारण, बाद में सूचना का मिलना – यह सब ऐसा ही है जैसे सूचना और प्रसारण का मंत्र जपा जा रहा हो। मिलावटन का खेल खेलने वाले सभी आयामों को ध्‍यान में रखकर उसमें रत रहते हैं। ... पूरा पढ़ने के लिए मुझे क्लिक कीजिए। 
Read More...

सूचनार्थ

दोस्तों

यदि आपमें से कोई भी प्रवासी भारतियों की मैगज़ीन में विज्ञापन देना चाहता हो तो गर्भनाल पत्रिका के संपादक श्री आत्माराम शर्मा जी से संपर्क कर सकता है उनका मेल मैं साथ में दे रही हूँ.

Read More...

'जग जीत' ने वाली आवाज़

'जग जीत' ने वाली आवाज़: बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है। ठीक वैसे जैसे जगजीत सिंह की यादें कभी धुंधली नहीं होने वालीं। ठीक वैसे ही जैसे एक मखमली आवाज़ शून्य में खोकर भी हमेशा आसपास ही कहीं सुनाई देती रहेगी।

जगजीत भाई यूएस में थे, वहीं से फ़ोन किया - 'आलोक, कश्मीर पर नज़्म लिखो। एक हफ़्ते बाद वहां शो है, गानी है।' मैंने कहा - 'मगर में तो कभी कश्मीर गया नहीं। हां, वहां के हालाते-हाज़िर ज़रूर ज़हन में हैं, उन पर कुछ लिखूं.?' 'नहीं कश्मीर की ख़ूबसूरती और वहां की ख़ुसूसियात पर लिखो, जिनकी वजह से कश्मीर धरती की जन्नत कहा जाता है। दो रोज़ बाद दिसंबर को इंडिया आ रहा हूं तब तक लिख कर रखना। सुनूंगा।'

- Sent using Google Toolbar
Read More...

ये आप सबकी जीत है


http://www.catchmypost.com/index.php/hindi-corner/sandesh/729-2011-10-08-01-36-56
सभी दोस्तों की हार्दिक शुक्रगुजार हूँ जिन्होने प्रतियोगिता मे मेरी कविता को पसन्द किया और मुझे दूसरा स्थान दिलाया…………ये मेरी नही मेरे सभी दोस्तों की जीत है उनकी पसन्द की जीत है।
www.catchmypost.com
Catch My Post , poem competition October 2011 results.




यहाँ भी देख लीजियेगा 

http://www.catchmypost.com/index.php/hindi-corner/sandesh/744-2011-10-09-10-30-55
Read More...

हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास और प्रवृत्तियों पर लोगों की पैनी नजर है..

आवश्यकता, उपयोगिता, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दुनिया से सैकण्डों में अपनी बात के जरिए जुड़ने वालों की बढ़ती संख्या को देखते हुये आज ब्लॉगिंग जैसे द्रतगामी संचार माध्यम को  पॉचवा स्तम्भ माना जाने लगा है। कोई इसे  वैकल्पिक मीडिया तो कोई न्यू मीडिया की संज्ञा से नवाजने लगा है । हलांकि  हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास महज ८ वर्ष का ही है मगर इसकी पैठ और प्रवृत्तियों पर लोगों की पैनी नजर है...

हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास और प्रवृतियों पर डा. अरविन्द मिश्र की वेबाक राय आज सृजनगाथा पर प्रकाशित हुई है ....पढ़ने के लिए यहाँ किलिक करें



Read More...
 
Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz