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जागरण जंक्‍शन ब्‍लॉग का हाल ऑफ फेम सम्‍मान

आदरणीय पाठकों,
जागरण जंक्शन मंच पर उत्कृष्ट लेख निरंतर प्रकाशित होते रहते हैं लेकिन कुछ आलेख ऐसे होते हैं जिनसे लाखों लोगों को प्रेरणा मिलती है.
यही कारण है कि मंच स्वयं पहल कर ऐसे चुनिंदा अनुकरणीय और व्यापक जनहित के ब्लॉगों को प्रमुखता प्रदान करते हुए उन्हें हॉल ऑफ फेम ब्लॉग के रूप में प्रतिष्ठित करता है. उल्लेखनीय है कि इस बार हॉल ऑफ फेम लेखों की चौथी कड़ी प्रकाशित की जा रही है.

नवीनतम चयनित जागरण जंक्शन हॉल ऑफ फेम ब्लॉग


बनारस भारत का अदभुत शोकेस है!

लेखक: अजय ब्रह्मात्मज








अश्लीलता का बाजार

लेखक: गजेंद्र प्रताप सिंह









जादू की छड़ी मिल गई सरकार को
लेखक: अविनाश वाचस्‍पति










बाप रे बाप …

लेखक: मधुरेश







नवउदारवादी साजिश और आक्रमण के घेरे में हिंदी

लेखक: अरुण कांत शुक्ल


जागरण जंक्शन परिवार की तरफ से सभी चयनित ब्लॉगरों को बहुत-बहुत बधाई.

धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार


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पानी से चलेंगे स्‍कूटर और कार : असली जाम के लिए अब हो जाइए तैयार

पेट्रोल को मारेंगे गोली
तो आग लग जाएगी
पहले भी लगती रही है

पानी में नहीं भी मारेंगे
तो चल जाएगी
कार ही क्‍यों
खुश हो जाएंगे स्‍कूटर सवार

पानी की असली कीमत
अब वसूली जाएगी
सरकार पानी पर
1000 प्रतिशत टैक्‍स 
जरूर लगाएगी

पानी ही होगा जिम्‍मेदार
सड़कों पर जाम के लिए
होगा परेशान जल्‍दी
आदमी जाम से

पानी से ही जलाएगा दिए
दीवाली पर
पानी से ही भिगोएगा
होली पर

पेटेंट हो चुका है
आपको क्‍या अभी भी मामला
खटाई में दिखेला है

बिल्‍कुल खटाई नहीं है
बात यह सच्‍ची है
सबके लिए अच्‍छी है

पर सरकार अब करेगी कमाई
खूब पानी बेचेगी भाई
पहले ही दिल्‍ली सरकार
पानी को निजी हाथों में
सौंप रही है
थमा रही है
उनके हाथों में मलाई

मलाई वे अब पानी से उतारेंगे
सड़कों पर जाम की फसल
कैसे लहलहाती है
अब सब देखेंगे।

पर यह जानने मानने के लिए
पहले इमेज पर क्लिक करके
पूरी खबर अवश्‍य पढ़ लीजिएगा

और हां पानी से चलायेंगे कार
स्‍कूटर
फिर टिप्‍पणी देने में भी
कैसी कंजूसी
कर दो कर दो
उ ला ला ऊह लाला
चाहे टिप्‍पणी जरा सी

सन्‍नी लियोन को बनायेंगे
इस पानी का ब्रांड एम्‍बेसडर
अब तो नहीं है आपको
पानी के बिकने का भी डर
हो जाओ निडर।
जन जन को दे रहा है यह संदेश, लखनऊ से प्रकाशित होने वाला जनसंदेश टाइम्‍स
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बड़ें फैसलें लेने में जल्दबाजी ठीक नहीं


राजीव गुप्ता लेखक 

यूपीए - 2  इस समय अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है !  सरकार जल्दबाजी और अपने गलत फैसलों के कारण संसद में रोज नए - नए मुद्दे लाकर समूचे विपक्ष समेत अपने सहयोगियों को भी अचंभित कर उन्हें विरोध करने के लिए मजबूर कर रही है ! इस बार के शीतकालीन संसदीय सत्र  में महंगाई और तेलंगाना के मसले में अभी हंगामा थमा भी नहीं था कि 24 नवम्बर 2011 को खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के सबंध में सरकार ने फैसला लेकर अपनी मुसीबत और बढ़ा ली जिसके चलते सोमवार को भी एक बार फिर से दोनों सदन दिन भर के लिए स्थगित हो गए ! गौरतलब है कि है कि मल्टी ब्रांड में सरकार ने 51  प्रतिशत और सिंगल ब्रांड में सरकार ने 100 प्रतिशत का विदेशी पूंजी निवेश स्वीकार कर लिया है जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना तय है !  महंगाई भ्रष्टाचार , और कालेधन पर चौतरफा घिरी सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने एवं अपनी इमेज सुधारने के लिए जो तुरुप का एक्का चला वही उसके गले की फांस बन गया ! 

जहां महंगाई की मार से आम जनता त्राहि - त्राहि कर रही हैऐसे में महंगाई से निपटने के लिए सरकार सिर्फ जनता को आश्वासन देती है परन्तु आम आदमी जो छोटे - मोटे व्यापार से अभी टक अपना परिवार पाल रहा था उसको बेरोजगार करने का सरकार ने अपने इस कृत्य से पुख्ता इंतजाम कर लिया है ! संसदीय समिति की सिफारिशों को दरकिनार करते हुए सरकार द्वारा विदेशी कंपनियों को खुदरा क्षेत्र में अनुमति देने का निर्णय " कैबिनेट"  में क्यों लिया गया जबकि  शीतकालीन सत्र अभी चल रहा है ! ज्ञातव्य है कि जुलाई 2010 को भारत सरकार ने एक चर्चा पत्र जारी कर अपनी मंशा जाहिर की थी जिसमे सरकार  ने संसदीय समिति के विरोध को भी स्वीकार किया था ! मामला अब संसद से सड़क तक जा पंहुचा हैं जो कि होना लाजिमी भी था क्योंकि खुदरे व्यापार से सीधे आम जनता का सरोकार  है ! सरकार का तर्क है कि उसके इस कदम से करोडो लोगों को रोजगार मिलेगा जो कि सिर्फ बरगलाने वाला तर्क - मात्र  से ज्यादा कुछ  नहीं है क्योंकि उसके इस कदम से जितने लोगो को रोजगार मिलेगा उससे कई गुना ज्यादा लोगो की जैसे रेहडी-पटरी लगाने वाले,  फ़ल-सब्जी बेचने वालेछोटे दुकानदारइत्यादि प्रकार के मध्यम और छोटे व्यापारियों की रोजी-रोटी कृपया पूरा पढने के लिए क्लिक करें 
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जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है


फ़ज़ल इमाम मल्लिक

बस एक दिन पहले कलानाथ मिश्र से मुलक़ात हुई थी। क़रीब दो-तीन घंटे उनके साथ रहा था। कवि-मित्र शिवनारायण ने उनसे मुलाक़ात करवाई थी। पटना पहुंचा तो फ़ोन पर शिवनारायण से बात हुई। उन्होंने किसी गोष्ठी की जानकारी दे कर आने का न्योता दिया था। लेकिन घर से निकलते-निकलते देर हे गई। वहां पहुंचा तो गोष्ठी ख़त्म हो चुकी थी और लगभग सारे लोग जा चुके थे। शिवनारायण को वहां अपने पहुंचने की इत्तला फÞोन पर दे चुका था इसलिए वे मेरा इंतज़ार कर रहे थे। शिवनारायण ने ही कलानाथ मिश्र से मुलाक़ात करवाई और फिर मुझे बताया था कि कल इनके पहले कथा संग्रह ‘दो कमरे का मन’ का लोकार्पण अनुग्रह नारायण कालेज सभागार में है। उन्होंने मुझे न्योता भी दिया कि लोकार्पण समारोह में ज़रूर शिरकत करूं। लोकार्पण समारोह में शिरकत के लिए शिवनारायण ने औपचारिकता निभाते हुए आमंत्रण पत्र भी थमा दिया। इतना कहने-सुनने के बाद उन्होंने कहा कि हम लोग पुस्तक मेला जा रहे हैं, आप भी चलें।
एक दिन पहले ही पुस्तक मेला श्ुरू हुआ था। मुझे थोड़ी देर बाद शंकर आज़ाद से मिलना था। लेकिन उन्हें आने में थोड़ी देर थी और मेरे लिए इतना समय काफ़ी था। फिर यह ख़याल भी आया कि पुस्तक मेले में कुछ लोगों से इसी बहाने मुलक़ात भी हो जाएगी। वहां से हम अलग-अलग गाड़ियों में गांधी मैदान पहुंचे। उस शाम वहां पत्रकारिता पर सेमिनार हो रहा था। उसी कार्यक्रम में अनिल विभाकर से मुलाकाÞत हुई। लंबे समय बाद उनसे मिल कर अच्छा लगा। समारोह ख़त्म होने पर अनिल विभाकर के साथ बातचीत कर ही रहा था कि पत्रकारिता के कुछ छात्रों ने हमें अपने-अपने सवालों के साथ घेर लिया। वक्ताओं की बजाय उनका हमसे सवाल-जवाब करना कुछ अटपटा ज़रूर लगा लेकिन उनके सवालों को हमने गंभीरता से लिया। पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता वाजिब लगी। हम दोनों ने उनके सवालों का जवाब दिया। अपने सवालों का जवाब पाकर उन्हें तसल्ली भी हुई। वे अख़बारों में लिखना चाहते थे। उन्हें बताया कि आप लोग फ़िलहाल अख़बारों में फ़ीचर लिखें। हमने भी इसी तरह से अख़बारी सफ़र शुरू किया था। दस-पंद्रह लड़कों का यह समूह पत्रकारिता में आई गिरावट को लेकर तो चिंता जता ही रहा था, बिहार में पत्रकारिता के स्तर पर भी सवाल खड़े कर रहा था। उनका कहना था कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में पत्रकारिता ख़त्म हो गई है और अख़बारों में ‘नीतीश चालीसा’ ही अब ज्Þयादा होने लगी है। भविष्य के उन युवा पत्रकारों की चिंता सचमुच डराने वाली थी। क्योंकि बीते पांच-सात साल से बिहार में पत्रकारिता की नई पाठशाला खोल रखी है नीतीश कुमार ने और इस पाठशाला से दीक्षित पत्रकार वही लिखता है जो नीतीश चाहते हैं। अख़बारों के ज़रिए बिहार में सुशासन की एक चमकीली दुनिया बाहर-भीतर दोनों तरफ़ से ही लोगों को आकर्षित करती है। विपक्ष और सरकार विरोधी ख़बरों को अख़बारों में जगह नहीं के बराबर ही मिल पाती हैं। पत्रकारिता के उन छात्रों की चिंता इसी बात को लेकर ही थी। उनके सवालों का जवाब देने के बाद मैं शिवनारायण और कलानाथ मिश्र को खोजने लगा।
कलानाथ मिश्र तो सामने ही दिख गए लेकिन शिवनारायण इस बीच कहीं निकल गए थे। कलानाथ मिश्र को बेली रोड होते हुए कहीं जाना था। मुझे भी शंकर आजाद से मिलने बेली रोड ही जाना था इसलिए मैंने उनसे साथ ले चलने को कहा तो वे राज़ी हो गए। लेकिन जाने से पहले शिवनारायण से मिलना ज्Þारूरी था, इसलिए उनका इंतज़ार हम करते रहे। वहीं सम्मेलन स्थल के बाहर अगले दिन होने वाले कार्यक्रमों का ब्योरा था। दूसरे दिन सम्मेलन में मेरे कई मित्र हिस्सा लेने वाले थे। रायपुर से गिरीश पंकज, महेंद्र ठाकुर, ग़ाज़ियाबाद से सुभाषचंदर और जयपुर से फ़ारूक आफ़रिदी के अलावा हरीश नवल और प्रेम जनमेजय भी आने वाले थे। दिल्ली में इन लोगों से कम ही मुलक़ात होती है, अपने शहर में अपने मित्रों के आने की सूचना से मुझे सकून तो हुआ ही, मेरे भीतर एक सुख भी पसर गया। इनमें से कइयों से सालों बाद मुलाक़ात होगी। दिल्ली में रहते हुए भी कहां किसी से ढंग से मिलना-जुलना हो पाता है। हर कोई अपने-अपने ग़मे-रोज़गार में मुब्तला। न हम ख़ाली न वे ख़ाली। कथाकार बलराम अग्रवाल की बात याद आ गई। हाल ही में उनका फ़ोन आया था। बक़रीद पर बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि अभी-अभी सुभाष नीरव से पंजाब के एक कार्यक्रम में मुलाक़ात हुई। लगता है कि हम दोनों भी अब रायपुर में ही फिर मिलेंगे। दिल्ली में रहते हुए अरसा बीत गया है लेकिन सुभाष नीरव ही क्या बलराम अग्रवाल से भी मुलाक़ात हुए अरसा बीत गया है। वह तो भला हो फ़ोन का जिसकी वजह से हम बीच-बीच में बतियाते रहते हैं। तीन साल पहले बलराम अग्रवाल से रायपुर में हुई मिलना हुआ था। ‘सृजनगाथा’ के लघुकथा सम्मेलन में। उस दिन उसी बात का ज़िक्र बलराम कर रहे थे। पटना में दिल्ली और दूसरी जगहों से आरहे लेखकों की सूची में कई परिचितों का नाम देख कर बलराम मुझे याद आए।
शिवनारायण अब तक नहीं आए थे। हमें देर हो रही थी। तब कलानाथ भाई ने शिवनारायण को फ़ोन किया तो पता चला कि वे एक स्टाल पर जमे हैं। हम स्टाल की तलाश में घूमने लगे। चलते हुए ही मैंने कलानाथ मिश्र से मज़ाक़ में कहा- ‘प्रोफेसरों के साथ यही दिक्ÞकÞत है। उन्हें याद ही नहीं रहता कि दूसरे लोग भी उनके साथ हैं।’ कहने को तो मैं कह गया लेकिन बाद में कलनाथ भाई का ख़याल आया। उनसे पूछा आप कहां कार्यरत हैं तो उन्होंने बताया कि मैं भी इत्तफ़ाक़ से प्रोफ़ेसर ही हूं। मैं थोड़ा असहज ज़रूर हुआ, लेकिन शिवनारायण से लंबे समय से जुड़ाव था इसलिए सहज होने में देर नहीं लगी। उन्हों खोजते हुए हम लोग स्टाल पर पहुंचे तो वहां चाय का दौर चल रहा था। मैंने छूटते ही फिर ‘प्रोफ़ेसर वाली’ अपनी बात दोहराई। शिवनारायण हंसने लगे और हम चाय पी कर वहां से निकल गए। रास्ते में कलानाथ मिश्र से ढेरों बातें हुईं। साहित्य से लेकर पत्रकारिता पर उनसे बात होती रही। तब मुझे पता चला था कि प्रोफ़ेसरी से पहले कलानाथ मिश्र पत्रकारिता के दश्त में भी ख़ूब सैयाही कर चुके हैं। थोड़ी देर बाद ही मेरी मंज़िल आ गई तो मैंने उनसे विदा ली। उन्होंने चलते-चलते याद दिलाया- कल आप कार्यक्रम में ज़रूर आएं। मैंने उनसे वादा किया। यों भी दूसरे दिन पटना में मुझे दो लोगों से मिलना ही था। इन दो में पहला नाम वरिष्ठ साहित्यकार कुमार विमल का था। क़रीब सात-आठ महीने से वे लगातार संपर्क में थे और जिस स्नेह से वे बतियाते थे, उसने मुझे उनका क़याल बना लिया था। ईद में घर गया था तभी उनसे मिलने का कार्यक्रम था। लेकिन तब बहुत जल्दी में दिल्ली लौटना हुआ और मैं उनसे मिल नहीं पाया था। इसका मलाल काफी सालता रहा था। इसलिए इसबार तय कर आया था कि उनसे ज़रूर मुलाक़ात करूंगा। गांव से फ़ोन पर उनसे बात भी हो चुकी थी और वे बेतरह ख़ुश हुए थे यह जान कर कि मैं बिहार आया हुआ हूं और उनसे मुलाक़ात के लिए उनके घर आऊंगा। दूसरे शख़्स थे, कवि-गीतकार सत्यनारायण। उनसे मिले भी काफ़ी अरसा हो गया था। बीच में वे बीमार भी रहे थे और दिल का आपरेशन करवा कर लौटे थे। इसलिए मिलना ज़रूरी था।
दूसरे दिन विमोचन के कार्यक्रम में देर से पहुंचा। समारोह की अध्यक्षता बिहार के पुर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र कर रहे थे। गिरीश पंकज, सुभाषचंदर, महेंद्र ठाुकर, हरीश नवल, प्रेम जनमेजय को देख कर अच्छा लगा। पुराने मित्र-पत्रकार ध्रुव कुमार सामने थे। ध्रुव ने मेरे लिए जगह ख़ाली की। देख कर अच्छा लगा कि सभागार भरा हुआ था। सामने ही कवियत्री डाक्टर कुमारी मनीषा भी थीं। उनसे दो साल पहले खगड़िया के समारोह में मिलना हुआ था। वे अच्छी कविताएं लिखती हैं। उन्होंने खगड़िया में अपनी कविताओं का पाठ भी किया था। हम दोनों ने बिना बोले एक-दूसरे का अभिवादन किया। उनके अलावा कई और मित्रों को देख कर अच्छा लगा। संचालन शिवनारयण कर रहे थे। मैं पहुंचा तो पुस्तक पर कवि-मित्र निविड़ शिवपुत्र बोल रहे थे। निविड़ को सुनना अच्छा लगा। उसने पुस्तक पर बहुत अच्छी और सधी प्रतिक्रिया दी। प्रेम जनमेजय की वक्तव्य के दौरान ही शिवनारायण की नज़र मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे इशारे से बताया कि मुझे भी बोलना है। पहले तो मैं झिझका। किताब मैंने पढ़ी नहीं थी। इसलिए उस पर क्या कुछ बोलूंगा। इसलिए पहले मैंने मना किया। लेकिन शिवनारायण ने जब दोबारा कहा तो मैं राज़ी हो गया। मुझे क्या कुछ बोलना है यह मैंने तय कर लिया था। कल रात से ही पुस्तक को लेकर जो बात मुझे बेतरह हॉण्ट कर रही थी, उसे लोगों के सामने रखने का ख़याल अचानक मुझे आया ता। कलानाथ मिश्र ने पुस्तक का नाम ‘दो कमरे का मन’ रखा है और इस नाम से मुझे एक अलग तरह का लगाव हो गया था। इसलिए शिवनारायण ने जब मुझे बुलाया तो मैंने इसी को केंद्र में रख कर अपनी बात कही। मैंने कहा कि दिल्ली में पिछले सात-आठ साल से रहना हो रहा है। वहां रहते हुए इस बात का शिद्दत से अहसास हुआ कि साहित्य और दुनियादारी दोनों ही जगह दिल्ली वालों ने अब अपने मन में एक भी कमरा नहीं रख छोड़ा है। मुझे ख़ुशी इस बात की है कि मेरे शहर और मेरे प्रदेश के कथाकार ने आज भी मन में कम से कम दो कमरे छोड़ रखे हैं। और सच तो यह भी है कि वह बिहार ही है जो देश को दुनियादारी भी सिखाती है और साहित्य में मन में कमरे बनाने की सीख भी देता है। मेरी यह बात वहां मौजूद श्रोताओं को पसंद तो आईं लेकिन दिल्ली वालों को शायद मेरी यह साफ़गोई अच्छी नहीं लगी। मेरे बाद बोलने आए हरीश नवल ने इसका इज़हार भी किया लेकिन अपने संबोधन में जब उन्होंने महानगर की त्रासदी का ज़िक्र भी किया तो मेरी बात की तसदीक़ भी एक तरह से उन्होंने कर दी। हालांकि उन्होंने अपने संबोधन में ‘मुख़ालफ़त’ के लिए जब ‘ख़िलाफ़त’ का इस्तेमाल किया तो मुझे बेतरह अटपटा लगा। पत्रकारिता की चलताऊ बातचीत में ‘ख़िलाफ़त’ का इस्तेमाल ‘विरोध’ के लिए ख़ूब किया जा रहा है लेकिन हिंदी का कोई विद्वान और प्रोफ़ेसर अगर विरोध के लिए खिलाफ़त का इस्तेमाल करे तो यह शर्मनाक है। कम से कम उन जैसे लोगों को तो ‘ख़िलाफ़त’ और ‘मुख़ालफ़त’ का मतलब भी आना चाहिए और फ़र्क़ भी। फिर अगर हिंदी में मुख़ालफ़त के लिए विरोध शब्द है तो क्या ज़रूरत है उर्दू की टांग तोड़ने की। लेकिन हिंदी में ऐसा हो रहा है और हरीश नवल सरीखे लेखक भी उसका इस्तेमाल बिना मतलब जाने-समझे कर रहे हैं। यह बात मेरे जैसे कम समझ वाले के लिए चिंता की बात है।
बहरहाल कार्यक्रम ख़त्म हुआ। जगन्नाथ मिश्र से लंबे समय बाद मिलना हुआ था। वह तपाक से मिले और कहा कि तुम्हें पहचान लिया है। पटना आते हो ते मिलते क्यों नहीं हो। सुभाष, गिरीश पंकज और महेंद्र ठाकुर लहक कर मिले। लेकिन मेरी संक्षिप्त टिप्पणी पर दिल्ली वाले इस बुरी तरह आहत थे कि उन्होंने ढंग से बातचीत तक नहीं की। यानी सचमुच दिल्ली के साहित्य-समाज अपने मन के कमरे को बंद कर रखा था। जहां अब न तो कोई ताज़ी हवा आती है और न ही जिसे अपनी आलोचना सुनने की ताब। कलानथ मिश्र की किताब उनके मन में कोई कमरा बना पाए, ऐसा लगता तो नहीं लेकिन उम्मीद तो की ही जा सकती है। वैसे इस मौक़े पर मुझे मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद का एक शेर याद आ रहा है-
चेहरे पर सारे शह्र का गर्दो-मलाल है
जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है।






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गश्त (लघु कथा)


एस.एच.ओ. (थानाध्यक्ष) रात के स्टाफ की ब्रीफिंग लेते हुए बोला, " तुम सब रात की गश्त ढंग से क्यों नहीं करते. आज डी.सी.पी. ने मुझे बुलाकर फिर से मेरी माँ-बहन एक कर डाली. अगर तुम्हें कामचोरी की गन्दी आदत पड़ ही गई है तो कम से कम पत्रकार अरोड़ा की गली में तो एक चक्कर लगा आया करो. साला हर दूसरे दिन अपने अखबार में खबर छाप देता है कि इलाके की पुलिस गश्त नहीं करती."

रात का स्टाफ एक सुर में बोला, "जनाब हम सब नियम से रात को थाने के इलाके के चप्पे-२ में गश्त करते हैं." एस.एच.ओ. ने उनसे खीज कर पूछा, "तो फिर अरोड़ा अपने अखबार में यह खबर क्यों छापता है कि तुम सब गश्त नहीं करते?" आगे पढ़ें...
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पिंजरे में पंछी किस्‍म किस्‍म के (कविता)


पिंजरे में सिर्फ
बुलबुलें ही कैद
नहीं की जातीं
तोते भी किए
जाते हैं बंद
तोते यूं तो
काटते नहीं है
बंद हों पिंजरे में
और दिखाओ ऊंगली
तो काट लेते हैं।

कबूतर पहले थे
संदेशवाहक देश से विदेश
विदेश से प्रदेश
अब आदमियों की
तस्‍करी के लिए
मुहावरों में आते हैं काम
कबूतरबाजी है जिसका नाम।

बाजी पर सिर्फ
नहीं है बाज का ही हक
कार्य का भी नाम है
कारनामा कहें जिसे
चाहे कहें करतूत
बने ना कोई बुत।

मैना रखने से नाम
नहीं बच पाती है
मै ना
कितना ही कहे
मारी जाती है
है ना।

सबसे पहले कैद
वही किया जाता है
जो कहता है
मैं पाक, मैं साफ
मैंने नहीं किया घोटाला
पर टाला भी तो नहीं
मौन रहने से
नहीं बचा जा सकता।

खतरे में
गौरेया है
सोन चिरैया है
सबसे अधिक
आजाद भी है
कैद में है
सिग्‍नल प्रदूषण के
बनी शिकार है
तकनीकी व्‍यभिचार है
इंसान लाचार है
वाई फाई बनाती है
हाई फाई
कैसे छोड़ दे
खेल यह तरंगों का है
रंगहीन है
रंगविहीन है
फिर भी संगीन है
इंसान ही गमगीन है।

वैचारिक दंगों का
अपाहिज अंगों का
अपाहिज कर रहा है
मन को
मानस को
नस नस को
सन्‍नाहट भी नहीं
होती है महसूस
आहट का नहीं
होता है अहसास
अजीब है रास
रस्‍साकसी गर्दन फंसी।

गधे तो खाते रहेंगे घास
बढ़ाते रहेंगे बुद्धि
कहलाते रहेंगे मूर्ख
साधते रहेंगे स्‍वयं को।

साधना साध धन घना है
धन को साधना
बांधना चाहते हैं
इसे साधने के लिए
क्‍या इंसान जन्‍मा है ?
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i चार व ग्यारह दिसंबर को अन्ना का साथ देकर सरकार को लोकपाल के लिए गंभीर करने में सहयोग दे ....हर रोज इस बारे कुछ शब्द बज / फेसबुक / ब्लॉग व ऑरकुट आदि पर जरूर डाले .........ये भी एक देशभक्ति होगी .....राजधानी में फूंक गया अनशन का बिगुल ....तिलक मार्ग थाना इलाके में अन्ना समर्थक और पुलिस आमने सामने हो गए ..जब शाम को अन्ना समर्थकों से प्रचार सामग्री जब्त करने को लेकर अन्ना समर्थक थाने के कैपस में धरने पर बैठ गए .....शाम के ठंढ भरे धुंधलके में राजधानी के तिलक मार्ग थाने में अन्नागिरी करते ये टीम अन्ना के ही लोग हैं.....ये लोग पुलिस के द्वारा अपनी प्रचार सामग्री छीने जाने का विरोध कर रहे हैं .....इनकी सुने तो ये जन लोकपाल पर लोगों को अवेयर करने के लिए इण्डिया गेट पर कुछ प्रचार सामग्री ले कर प्रचार कर रहे थे ...तभी पुलिस ने उनसे समय ख़त्म होने का बहाना कर उनकी प्रचार सामग्री को एक ट्रक में इकट्ठा करवाया और फिर ट्रक ले कर चलते बने .....जब अन्ना समर्थकों ने उनसे कारन पूछा तो थाने के SHO ने ऊपर के आदेश होने का बहाना बनाया .....बाईट नीरज सिंह ( को ऑर्डिनेटर इंडिया अगेंस्ट करप्शन )सारा सामान हमने अपनी गाडी में इक्कठा किया और पुलिस वाले इसे लेकर कहते बने और कहा उपर से आदेश है ...इस जबाब से नाराज अन्ना समर्थक थाने के कैम्पस में ही धरने पर बैठ कर भजन गाने लगे हैं ...क्योंकि ये पूरी तरीके से एक राजनितिक मसला है इसलिए अभी तक पुलिस कि तरफ से इस मामले पर कोई औपचारिक बयान नहीं आया है ....मगर आज दिन भर के घटनाक्रम पर नजर डालें तो तीन अन्ना कि आज दिन भर कि सुगबुगाहट कहीं ना कहीं अनशन का माहौल तैयार करने कि दिशा में उठाया गया कदम लगता है अनिल अत्री दिल्ली ...........
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Untitled

Debate
आंसुओं से कब भला धुलती तमा तकदीर की

शान्ति पलती है हमेशा साये मे शमशीर की

 

 

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क्‍या यही विकास है (कविता)


विकास जैसा मैंने समझा
विकास जैसा सबने चाहा
काश, सब वैसा मानें

अवैधता के वैधता की ओर
दौड़ते हुए धुंआधार कदम
धुंआ सार्वजनिक स्‍थलों पर
निकला है आपकी नाक-मुंह से
पानी की मोटरें
वैध हो गईं
देखते-देखते
पानी दे रही हैं
दे रही हैं जीवन
पानी की टंकियों को
वरना तो सब
उखाड़ ही फेंकते
खाली टंकियों को
चढ़ते देखा होगा आपने
टंकियों पर
नौटंकी करने के लिए
टंकी एक ही काफी होती है
बस्तियां, पगडंडियां
मकानों पर मंजिलें
मंजिलें सब जिलों में हैं
जिलों से सबके मन मिले हैं
मकानों में हैं दुकानें
दुकानों में रिहायश
न कभी वैध थी
न कभी वैध होगी
पर रहने वाले
वहीं सोयेंगे रात भर
पटरी पर दुकान होते हुए
सोना जायज नहीं है
किसी भी तरह से।
दुकानों का फुटपाथ पर होता विस्‍तार
अवैध होते हुए भी वैध है
अगर अवैधता न परिवर्तित हो
उसका स्‍वरूप न हो वैध
फिर विकास कैसे होगा
विकास के लिए वैधता का होना
निहायत जरूरी है।
जेब काटना
मोबाइल छीनना
एटीएम लूटना
चैन खींचना
सभी अवैध हैं
इसे अंजाम पर पहुंचाने वाला
पकड़ में आए
न पकड़ में आए
एफ आई आर नहीं होती है दर्ज
इसका दर्ज न होना
एक लाइलाज मर्ज है
इंसानियत पर कर्ज है
कर्ज ही रहेगा
चुकाए कौन
सब हैं मौन।
अवैध को वैध बनाने का खेल
खेल जो कॉमनवेल्‍थ नहीं है
इसमें भी घोटाले कॉमन हैं
नेताओं का इसी में लगता मन है
लूट की तो
लोकतंत्र में छूट है।
वाहन चलाते समय
मोबाइल पर बात करना
गैर कानूनी है
कानून तो सिर्फ
पैसों से खरीदा जाता है
बात करने वाले का सिर्फ
चालान ही किया जाता है
यह भी एक मर्ज है
विकास के नाम पर कर्ज है
सब जगह यह भी दर्ज है
मेरी तो इतनी सी अर्ज है।
यह ज्ञान की अज्ञान वाली पीठ है
देख लो आप कितनी घोर ढीठ है
विकास है या विकास के नाम पर
नैतिकता, संस्‍कृति, मूल्‍यों
का किया जा रहा है सत्‍यानाश
फिर भी कायम है हमारा विश्‍वास
यही सब विकास है
ऐसा सबका विश्‍वास है।
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नेता और जन आक्रोश




जब खाने-पीने की चीजों के दामों में आग लग जाय और रसोई के चूल्हे की आग गैस सिलेंडर महंगा होने से बुझ जाय , सरकार के मंत्री के घोटालो के चलते पूरी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हो , विदेशों में जामा काले धन को स्वदेश में लाने के लिए सरकार टालमटोल का रवैया अपनाये तो ऐसा में जनता में आक्रोश होना लाजमी है ! अगर सरकार अब भी न चेती तो कही हालात नियंत्रण से बाहर न हो जाय जिसका आगाज़ एक शख्स  ने वर्तमान कृषि मंत्री शरद पावर जी पर थप्पड़ मार कर अपने आक्रोश का इजहार तो कर दिया जो कि बहुत ही निंदनीय है परन्तु सरकार को अब जागना ही होगा अन्यथा कही ये हालात और भड़क कर बेकाबू न हो जाय !   

फ़्रांस की 1756 की क्रांति का इतिहास साक्षी है , जो कि कोई सुनियोजित न होकर जनता के आक्रोश का परिणाम थी !  जब जनता किंग लुईस के शासन में महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान होकर सडको पर उतरी और तो पूरे राजघराने को ही मौत के घाट उतारते हुए अपने साथियों को ब्रूस्सील ( Brusseel ) जेल को तोड़कर बाहर निकाल कर क्रांति  की शुरुआत की ! परिणामतः वहां  लोकतंत्र  के साथ - साथ  तीन नए शब्द  Liberty , Equality ,  Fraternity  अस्तित्व में आये ! वास्तव में उस समय राजघराने का जनता की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं था ! इसका अंदाजा हम उस समय की महारानी मेरिया एंटोनियो के उस वक्तव्य से लगा सकते है जिसमे उन्होंने भूखमरी और महंगाई से बेहाल जनता से कहा था कि " अगर ब्रेड नहीं मिल रही तो केक क्यों नहीं खाते ! "

ऐसी ही एक और क्रांति सोवियत संघ में भी हुई थी ! जिसका परिणाम वहां की जारशाही का अंत के रूप में हुआ था ! कारण लगभग वहां भी वही थे जो कि फ़्रांस में थे जैसे खाने-पीने की वस्तुओं का आकाल , भ्रष्टाचार में डूबी सत्ता और सत्ता के द्वारा जनता के अधिकारों का दमन ! सोवियत संघ में लोकतंत्र तो नहीं आया परन्तु वहां कम्युनिस्टों  की सरकार बनीं !

जब अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर हो , मंहगाई के साथ - साथ बेरोजगारी दिन - प्रतिदिन बढ़ रही  आगे पढने के लिए क्लिक करें 

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अब जानना हुआ आसान कि आप पूर्वजन्‍म में क्‍या थे ?


पिछले लगभग सात बरस से मैं जिस खोज में जुटा था अभी अभी वह जानकारी मुझे सिद्ध हो गई है। मुझे पुख्‍ता जानकारी मिली है कि इस जन्‍म से पहले किस नाम से मेरी पहचान थी। मैं क्‍या करता था। लेकिन उस जानकारी को आप सबके साथ साझा करने या बतलाने से पहले मैं अंतिम पुष्टि के तौर पर आपसे इस संबंध में कयास लगाने के लिए निवेदन कर रहा हूं। मेरे उन सभी मित्रो के लिए भी यह एक चुनौती है जो ज्‍योतिष विद्या में पारंगत हैंइस अध्‍ययन के लिए वे मेरी जन्‍मतिथि और वर्ष भी जानना चाहेंगे जो कि 14 दिसम्‍बर 1958 है और जन्‍म स्‍थान पश्चिमी दिल्‍ली स्थित उत्‍तम नगर है। यदि आप सब इसका सही आकलन कर पाते हैं और मेरी जानकारी से आपकी दी हुई जानकारी का मिलान हो जाता है। फिर वह जो जानना चाहेंगे कि वह पूर्वजन्‍म में क्‍या थेमेरे से जान सकते हैं।
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चित्रकला प्रतियोगिता



स्कूली बच्चों में ऊर्जा के महत्त्व और उसके संवर्धन की जानकारी देने के लिए दिल्ली के स्कूलों में चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस राज्य स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन पॉवर फीनांस कारपोरेशन (पीएफसी) ने शिक्षा मंत्रालय और बीईई के सहयोग से किया था। इस प्रतियोगिता में राजधानी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के चौथी से छठी क्लास के क़रीब पचास छात्रों ने हिस्सा लिया। पीएफसी के उप महाप्रबंधक (जनसंपर्क) ओमप्रकाश ने बताया कि इन बच्चों का चयन अगस्त से अक्तूबर तक चली स्कूली प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बाद किया गया था। तीन महीने तक चली प्रतियोगिता में क़रीब चार लाख बच्चों ने हिस्सा लिया था। दिल्ली के शिक्षा मंत्री हारून यूसुफ, पीएफसी के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक सतनाम सिंह और निदेशक एमके गोयल ने विजयी प्रतियोगियों को पुरस्कार बांटे।
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