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साहित्यकार संसद के स्पीकर डॉ. हरीश अरोड़ा


प्रिय मित्रो 

          सादर ब्लॉगस्ते!

                    ये लो जी संसद का शीतकालीन सत्र भी समाप्त हो गया और बीमारी के कारण महात्मा अन्ना का अनशन भी ख़त्म हुआ. ठंडी फूफी अपने शीत अस्त्रों से उत्तर भारत, ख़ास तौर पर दिल्ली वासिओं का  हुलिया टाईट किये हुए हैं. इन सब घटनाओं से बिना व्यथित हुए  डॉ. हरीश अरोड़ा फेसबुक पर साहित्यकार संसद को चलाने में व्यस्त और मस्त हो रखे हैं. मित्रो आप भली-भाँति समझ गए होंगे कि आज मैं आप सभी का परिचय कराने जा रहा हूँ एक और ब्लॉगर डॉ. हरीश अरोड़ा से. 
उनके परिचय में क्या कहूँ... उनकी रचनाधर्मिता उनके जीवन को खुद बयां करती है..
मैं किसी के सांस की अंतिम घडी हूँ
मैं किसी के गीत की अंतिम कड़ी हूँ.
जिंदगी घबरा के बूढी हो गयी है,
मैं सहारे के लिए अंतिम छड़ी हूँ.
यह फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय के पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य) के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं. वर्ष १९८७ से साहित्य लेखन के क्षेत्र में आये. विद्यालयी शिक्षा के दौरान इनकी  रूचि साहित्य में नहीं थी. लेकिन 12 कक्षा के दौरान कविता लेखन में रूचि जागृत हुयी.  कॉलेज की शिक्षा के दौरान कुछ युवा रचनाकारों के साथ मिलकर वर्ष १९८८ में 'युवा साहित्य चेतना मंडल' संस्था का निर्माण किया.  यह संस्था आज साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिए योगदान देने के साथ साथ प्रकाश के क्षेत्र में भी आ चुकी है. आगे पढ़ें... 

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नितांत गोपनीय परंतु ओपनीय : चिट्ठाकार कहीं के मिल रहे हैं एक जनवरी बारह को - ग्‍यारह से बारह का चिट्ठाकारी सफर

खबर आ रही है
बहुत तेज चैनल है
अब न्‍यू मीडिया
मालूम ही नहीं चलता
खबर कहां से आ जाती है
खबर कहां चली जाती है

मच जाता है हल्‍ला
चाहे दिन हो
साल का पहल्‍ला
चिट्ठाकारी के लिए रुपहला
इसे कहा जाता है
नहले पर दहला

जबकि है इस बार
ग्‍यारह पर बारह
ग्‍यारह भारी रहा
या भारी रहेगा बारह

चाहूं तो खबर के बहाने
अभी सौंप सकता हूं
सबको शुभकामनाएं
उस बारह की
जिसके तिगुना होने पर
बनते हैं छत्‍तीस
और दांत खिलते हैं
हमारे हमेशा बत्‍तीस

पर इतनी बेकरारी नहीं है
एक तो आने दो
एक को आने दो
एक को छाने दो
जब छाएंगे सारे
बरसाएंगे कामनाएं
शुभ मन से सारे

इतवार तो है
पर शुभकामनाओं की
छुट्टी नहीं हुआ करती है
छुट्टी के दिन शुभकामनाएं
आसमान छूती हैं
उन्‍हें जमीन पर ले आओ

जमीन के साथ
सभी जमीन वाले जुड़ जाओ
चाहे इधर आओ
या उधर जाओ
पर आओ जाओ अवश्‍य
सक्रियता अपनी
अपने प्‍यारे चिट्ठों पर
अवश्‍य दिखलाओ।


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वसंत कुंज स्थित इंस्‍टीच्‍यूटऑफ लीवर एंड बायलरी साइंसेज में मुख्‍य द्वार पर क्रिसमस के अवसर पर बनाया गया मनभावन दृश्‍य

जी हां
दृश्‍य बहुत मेहनत से
किया गया है तैयार

चाहे देर से ही सही
पर दूर न रहे
आपकी नजरों के
पहुंचे पास
जिस तरह रहती है
सबको सांता क्‍लाज से
उपहार की आस

उपहार तो टिप्‍पणी भी है
कि आपको क्‍या क्‍या दे रहा है दिखाई
अपने सूक्ष्‍म आंखों यानी
मन के उजाले से देखें
देखें मत महसूस करें

और उस महसूसन को
बतलाएं यहां
तो मन में सुमन खिल जाएंगे
हर ओर
जहां तक बसा हुआ है
इस धरती पर प्रेम का जहां।


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प्रेम का भात पकाते रवीन्द्र प्रभात



प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

   पुराना साल रोते-हँसते, खोते-पाते बीतने वाला है और नया साल मुस्कुराते हुए आने वाला है। जहाँ पूरा जग नए साल के स्वागत में अपनी पलकें बिछा रहा है वहीं  रवीन्द्र  प्रभात जी हिंदी ब्लॉगरों को अगले साल होनेवाले ब्लोगोत्सव में खिलाने के लिए प्रेम का भात पका रहे हैं। भात पकाने के लिए चावल की बोरी अविनाश वाचस्पति जी ने नुक्कड़ नामक सुपर फास्ट ट्रेन से भेजी है। इस साल ५१ लोगों को भात खिलाया गया था अबकी बार देखते हैं कि कितने लोग इस प्रेम भात को खाने का सौभाग्य पाते हैं। हालांकि   रवीन्द्र प्रभात जी अभी हाल ही में थाईलैंड से थके-मांदे लौटे हैं और वहां चलते-फिरते उनकी थाई भी थक गयी हैं फिर भी उन्हें प्रेम भात पकाने का इतना चाव है कि आते ही लग गए अपने काम-काज में। तो मित्रो आप सब समझ ही गए होंगे कि आज मैं आपकी मुलाक़ात करवाने जा रहा हूँ परिकल्पना पर हम सबकी राष्ट्रभाषा हिंदी की प्रगति का कल्पना को साकार रूप देने में लगे हुए श्री   रवीन्द्र प्रभात जी से.  आगे पढ़ें...
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लूट तो सभी रहे हैं, कोई नहीं छोड़ रहा है लूटने का मौका : कोई देश लूट रहा है कोई देशवासियों को ???

साजिश पड़ोसी की नहीं
बिजली कंपनियों की है
सब एकजुट हो जाइए
मिलकर एक अभियान चलाइए

बनाना पड़े तो 
इसके निवारण के लिए
एक चिट्ठा बनाइये
फेसबुक पर बनाइये एक समूह
ट्विटर पर जगाइये 

कुछ भी करिए
खुद को लुटने से
जरूर बचाइए

मत िकहिएगा खबर न हुई।

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संत नगर में हुई चिट्ठाकारों की भीड़ : आज कलम घिस्‍सी का चिट्ठाजगत में पदार्पण हुआ है



संत नगर में भई रे, ब्लॉगरन की भीर (भीड़)
चले समोसे, ढोकला, मिल ना पाई खीर

बैठे-बैठे   देखिये, एक  अजब   ही  सीन
पद्म जी कोने में जा, लें शरबत, नमकीन


बात में सब उलझ गये, फिर भी हुई न देर
इंदु  पुरी  को  फोन  पर,  बेटी   मारे  टेर

पद्म सिंह के हाथ से, छूटा न था लैपटॉप
अन्ना  चाचू  फोन से, करन लगे जी टॉक 


संतोष जी और अपन, लगे पियन फिर चाय
सब बोले तब जोर से, एक मिलन हो जाय 

चर्चा फिर होने लगी, जोर लगा के खूब
जगी नई संभावना, उगी प्रेम की दूब


रिश्ता बना एक नया, अच्छा कितना नैट 
सबने यह वादा किया, रोज़ करेंगे चैट

फेसबुक  या  गूगल  पर,  होगी  सबसे बात
चलो  ख़तम होती यहीं, आज की मुलाक़ात...





प्यारे चिट्ठाकार साथियो अपन थोड़ी बहुत कविताबाजी भी  कर लेते हैं.
पढ़ना हो तो पधारें http://sumit-ke-tadke.blogspot.com/ पर...

एक नया हिंदी चिट्ठा : पधारिए इस पर भी साथियो
तुम्‍हारे हवाले चिट्ठावतन बिना वेतन के ही  साथियो
नमस्‍ते मैं हूं कलम घिस्‍सी, चाहे मैंने पैंसिल घिस दी है... 
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सांपला चिट्ठाकार संगोष्‍ठी के बाद अमर उजाला में 26 दिसम्‍बर 2011 को प्रकाशित एक बहुत बड़ी खबर - हिमानी दीवान की कलम से

सोच रहे होंगे आप
कैसे मालूम हुआ इनको
आखिर अखबार वाले हैं
उजाले को अमर करते हैं

ब्‍लॉगवाणी की चर्चा
सांपला में हुई
सांप लाने से अधिक

चिट्ठे भी बनाए गए
चिट्ठियां पाने से ज्‍यादा
मालूम चला आपको
ब्‍लॉगिंग का फायदा

नहीं मालूम हुआ है अभी
फिर पढ़ लीजिए
ऊपर दी गई इमेज पर
करके क्लिक
हिमानी दीवान ने
जो दिया है सच लिख

इंतजार सबको है
हिन्‍दी चिट्ठाकारों का ।

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कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन और कुनकुनी धुप में ब्लागर मीत............ ब्लॉग 4 वार्ता ........... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार,  काफ़ी ठंड के बावजूद सांपला में ब्लॉगर नेह मिलन हुआ। राज भाटिया जी की उपस्थिति में ब्लॉगोत्सव में मित्रों  का मिलन अच्छा लगा। रात अन्ना भाई की रिपोर्ट आ गयी थी और सुबह खुशदीप भाई ने पोस्ट लगाई। राजीव तनेजा जी ने फ़ेसबुक पर पिलर नम्बर 420 से कुछ फ़ोटो टांग दी थी। जिससे जानकारी  मिल गयी कि सांपला की यात्रा चालु आहे। फ़ोन लगाने पर महफ़ूज मियां और भाटिया जी से बात हुई। कहने का मतलब यह है कि सांपला से लाईव अपडेट मिलता रहा।  डॉ मीनाक्षी स्वामी के बहुचर्चित उपन्यास भूभल को अखिल भारतीय विद्वत परिषद वाराणासी द्वारा कादम्बरी सम्मान दिए जाने का समाचार मिला। आगे पढ़ें ............ 

 
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वंदना गुप्ता का खामोश सफ़र



प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते

इये मित्रो आज क्रिसमस के शुभ अवसर पर काजू और किशमिश खाते हुए मिलते हैं ब्लॉग जगत के एक सक्रियसदस्य सेजी हाँ मैं बात कर रहा हूँ वंदना गुप्ता जी कीदिल्ली के आदर्श नगर में रहते हुए अपने माता-पिता केआदर्शों को मन में संजोये हुए ये लगी हुईं हैं ब्लॉग लेखन द्वारा हिंदी माँ की सेवा मेंइनके पिता तो चाहते थे  किउनकी बेटी आई..एसअधिकारी बने लेकिन बन गयीं ये लेखक और ब्लॉगरअब होनी को जो मंज़ूर होता है वो हीहोता हैअब सोचिये यदि ये आई..एसअधिकारी  बन जाती तो ब्लॉग जगत की रौनक का क्या होताअथवा ब्लॉगर सम्मेलन उबाऊ  हो जातेतो आइये धन्यवाद दें उस दुनिया बनाने वाले को जिन्होंने इस दुनिया कोऔर वंदना गुप्ता जी को बनाया और इन्हें आई..एसअधिकारी नहीं बनायावंदना गुप्ता जी लेखन की विविधविधाओं में लिखती हैं और बाकी बचा-खुचा चलिए इन्हीं से पूछ लेते हैं
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ये नही देखा तो कुछ नही देखा…………


अनोखी यात्रा ………अनोखे पल

वन्दना at ज़ख्म…जो फूलों ने दिये - 21 seconds ago
चलिए मेरे साथ एक सफ़र पर अरे ये क्या ये पिलर ४२० बीच में कहाँ से आ गया कसम से टू मच हो गया ये तो उफ़ ...........ब्लोगर मिलन के मारे बेचारे पिलर ४२० पर ही अटक गए आधी ब्लोगर मीट तो नांगलोई में सिमट गयी ब्लोगर्स की मस्ती तो यहीं शुरू हो गयी चाय काफी की चुस्की साथ में मौसम सुहाना ये सफ़र तो रहा बड़ा मस्ताना ये सांपला में कौन पधारे देखें सारे सांपला वाले कोई इच्छाधारी तो नहीं आया हाँ हाँ ..........आया न सारे ही तो इच्छाधारी थे .........हा हा हा हमने दी नहीं कोई झूठी खबर देख लो अंतर्राष्ट्रीय मिलन ही था बोर्ड लगवा दिया गया स्वागत समारोह में ब्लोगर्स ने धमाल किया अब जाट देवता सं... more »
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सांपला अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी चिट्ठाकार संगोष्‍ठी की पहली रिपोर्ट : जिसने इतिहास रच दिया है

इस चित्र में जो नहीं हैं, वे सचमुच में मौजूद नहीं हैं
इस समय कवि सम्‍मेलन में कवि कविता पाठ कर रहे हैं।

सांपला की ओर जाने वाली सभी हवाई उड़ानें कवि सम्‍मेलन के कारण रद्द कर दी गई हैं जबकि कारण कोहरे को बतलाया जा रहा है और कोहरा कह रहा है कि मुझे तो वहां किसी ने बुलाया ही नहीं है।

हिन्‍दी चिट्ठाकारों ने निर्णय लिया है कि वे जल्‍दी ही एक चिट्ठाकार जांच आयोग का गठन कर इस मामले की पूरी जांच करवाएंगे।

आसमान से होकर गुजरने वाले सभी हवाई जहाज और हेलीकोप्‍टर कवि सम्‍मेलन स्‍थल के ऊपर ही या तो रूक गए हैं अथवा मंडरा रहे हैं।

चिट्ठाकार अपने साथ लाए हुए साफे, मफलर व दस्‍ताने धारण किए हुए हैं। ध्‍यान दें - दस्‍तानों के कारण ही वे अभी तक एक भी पोस्‍ट नहीं लगा पाए हैं। वैसे इंटरनेट का धीमे चलना भी इसका एक कारण है।

किसी चिट्ठाकार ने ताज नहीं पहन रखा जिससे सभी स्‍वयं को बेताज बादशाह समझ कर गौरवान्वित हैं।

चर्चा तो बहुत सारी हुई हैं लेकिन अगर आप उन्‍हें ही पढ़ने में लग गए और हमने आपको सब कुछ यहीं बतला दिया तो बाकी सभी चिट्ठों की टीआरपी गिर जाएगी, इसलिए चर्चा के संबंध में हम कुछ भी नहीं बतलाने के लिए विवश हूं, विवश बोलें तो मजबूर।

किसी भी चिट्ठाकार ने एक भी सांप के दर्शन नहीं किए हैं जबकि सभी चाह रहे हैं कि एक सांप तो कोई न कोई चिट्ठाकार पकड़ कर ले ही आए, पर सांप चौकस हैं। लगता है यह राज उन्‍होंने 'मुझे शिकायत है' चिट्ठे पर पहले ही पढ़ लिया है।

महिलाओं को भरपूर प्रतिनिधित्‍व दिया गया है। यह उनकी मौजूदगी से साबित हो रहा है। इससे स्‍त्री संबंधी शोर मचाने वाले चिट्ठों और चिट्ठाकारों को मायूसी मिली है कि वह स्त्रियों को चर्चा में विशेष स्‍थान नहीं देने के मसले पर शोर मचा पाएं।

जो चिट्ठाकार नहीं शामिल हुए हैं, उनके बहाने भी पर्याप्‍त पुख्‍ता हैं। यह उनके चिट्ठों पर जाकर आप देख सकते हैं। जैसे ललित शर्मा, अविनाश वाचस्‍पति के चिट्ठों पर। इसके अतिरिक्‍त भी चिट्ठों और चिट्ठाकारों की अनुपस्थिति की सूची और बहानों की फेहरिश्‍त तैयार की जा रही है। आप भी टिप्‍पणी में उनकी जानकारी और लिंक देने के लिए स्‍वतंत्र हैं।

ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत के सक्रिय होने के संबंध में गोपनीय जानकारी शीघ्र ही अलबेला खत्री जी के चिट्ठे पर खतरा टल जाने के बाद पेश की जाएगी।

वह चिट्ठाकार जो  कवि सम्‍मेलन से पर्याप्‍त दूरी बनाए हुए हैं। रजाईयों और गद्दों पर पसरे हुए चिट्ठों से खूब कमाई कैसे की जाए, संबंधी चर्चा में मशगूल हैं।

इस अवसर के सैकड़ों चित्र मोबाइलों, कैमरों और वीडियो में संजोए गए हैं, जिन्‍हें आप समय समय पर यू ट्यूब वगैरह पर पानी की तरह बहता हुआ महसूस कर पाएंगे।

दिल्‍ली में धूम मचा रहा कोहरा भी सांपों के भय के चलते इस अंतरराष्‍ट्रीय चिट्ठाकार संगोष्‍ठी में शामिल नहीं हुआ है। जबकि उसका वहां पर पढ़ी जा रही कविताओं को सुनने का बहुत मन था। एक पाठक का नुकसान सांपों के कारण हुआ है।

हम बतलाना तो और भी बहुत कुछ चाह रहे थे परंतु राज जी के नाम के अनुरूप इसे राज ही रहने दिया जा रहा है।

इस अवसर पर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर प्रकाशित पुस्‍तकों के संबंध में भी चर्चा हुई है परंतु प्रकाशक हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन, बिजनौर की ओर से किसी के उपस्थित न होने के कारण बिक्री न हो सकी। इससे पुस्‍तकें बहुत नाराज हैं।

यह पहली रिपोर्ट आपकी उत्‍सुकता के शमन के लिए डाली जा रही है परंतु हम जानते हैं कि इससे आपके मन में विचारों की भीषण ज्‍वाला प्रज्‍वलित हो गई होगी।

भोजन, चायपान, जलपान, सिर्फ पान, सिर्फ पानी, सिर्फ पीना इत्‍यादि की खबरें भी अभी गोपनीय ही हैं। अवश्‍य ही वे भी चित्रों में अगले दो एक दिन में दिखलाई दे जाएंगी।

अभिव्‍यक्ति का यह नया दौर है बड़ा ही मजेदार
यहां सब सबको सुमिरन करते रहते हैं
संगीता पुरी जी ने फोन पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। इसके अतिरिक्‍त भी जिन्‍होंने उपस्थित फोन पर दर्ज कराई है, उनका जिक्र भी आप अवश्‍य ही चिट्ठों पर जारी पोस्‍टों में कर पाएंगे।

आपको यह प्रस्‍तुति कैसी लगी, जानने की उत्‍सुकता रहेगी क्‍योंकि इससे ही रक्‍त में प्‍लेटलेट्स यानी लाल रक्‍तकणों की संख्‍या में तेजी से बढ़ोतरी होती है। आप सब इसके मुक्‍तभोगी हैं।

और हां, सबसे जरूरी और पहली बात, जिन चिट्ठाकारों को मुंबई चिट्ठाकार संगोष्‍ठी में प्रकाशित पुस्‍तक की पीडीएफ फाईल न मिली हो, वे नि:संकोच तुरंत अपना ई मेल पता nukkadh@gmail.com पर भेज सकते हैं।

तब तक मैं कवि सम्‍मेलन का आनंद लेता हूं जो रात के दो बजे तक जारी रहेगा।

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पुण्य प्रसून बाजपेयी: कैसे बिछी लोकपाल पर मठ्ठा डालने की सियासी बिसात

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चौखट पर खड़े पवन चन्दन




प्यारे दोस्तो 
सादर ब्लॉगस्ते!
चलिए आज मेरे यानि कि आपके दोस्त सुमित प्रताप सिंह के साथ मिलते हैं एक और ब्लॉगर बन्धु श्री पवन चन्दन से  इन्होंने 17 दिसंबर 1953 को तत्‍कालीन जिला मेरठ अब बागपत के गांव मीतली में जन्‍म लेकर तथा स्‍नातक तक की शिक्षा लेकर नौकरी की  तलाश में राजधानी में पदार्पण किया। ये इस समय भारतीय रेल में इंजीनियर के पद पर हजरत निजामुददीन में कार्यरत हैं। बड़ा ही विरोधाभासी वातावरण रहता है । आफिस में सर्किट और घर में आकर शब्‍दों की उलट-पलट करना। फिर भी ऐसे या वैसे, कैसे न कैसे अपने लेखन धर्म का पालन कर्मठता से करते रहते हैं 

सुमित प्रताप सिंह- पवन चन्दन जी नमस्ते! कुछ प्रश्नों को मन में संजोये आपकी चौखट तक आया हूँ 

पवन चन्दन- नमस्ते सुमित प्रताप सिंह जी! आपके मन में जो भी प्रश्न हैं उन्हें बेखटक पूछ डालिए क्योंकि इस चौखट से कोई निराश होकर नहीं लौटता आगे पढ़ें...
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क्‍या ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत को सक्रिय करने की कोशिशें शुरू की जानी चाहिएं ???

यदि आप इस प्रश्‍न का उत्‍तर 'हां' में देना चाहते हैं तो सबसे पहले इन दोनों एग्रीगेटरों में से एक पर अपनी पूरी सहमति दीजिए और आप शनिवार 24 दिसम्‍बर 2011 को अंतरराष्‍ट्रीय सांपला चिट्ठा संगोष्‍ठी में शिरकत कर रहे हैं तो इस मुद्दे पर पूरी गंभीरता से विचार विमर्श कीजिए और एक नेक राह निकालिये। 

आप परिचित ही हैं कि इस चिट्ठा संगोष्‍ठी में चिट्ठा जगत के बेताज बादशाह शामिल हो रहे हैं। जिनमें अलबेला खत्री, राज भाटिया, ललित शर्मा, संगीता पुरी, अन्‍तर सोहिल, राजीव तनेजा, रूपचंद शास्‍त्री, दिनेश राय द्विवेदी,   योगेन्‍द्र मौद्गिल, वीरु भाई, शाहनवाज, खुशदीप सहगल और सतीश सक्‍सेना जी इत्‍यादि प्रमुख हैं। इसलिए कोई वजह नहीं बनती कि संगोष्‍ठी में चिट्ठा जगत के उन्‍वान के लिए फैसला लिया जाए और उस पर अमल करने में कोई कठिनाई हो। 

और कोई निर्णय हो, न हो, कोई बात हो, न हो लेकिन इस संबंध में लिए गए फैसले के बहुत ही दूरगामी परिणाम सामने आयेंगे। इसलिए संगोष्‍ठी में भाग लेने वाले चिट्ठाकार इस अवसर को मत गंवाइयेगा क्‍योंकि इस तरह सबके मिल बैठने और फैसले लेने के मौके बहुत कम ही आते हैं। मेरी इस संबंध में लिए गए सभी प्रकार के निर्णय में सहमति समझी जाए। 

एक बहुत ही अच्‍छी खबर का हिन्‍दी चिट्ठाजगत इंतजार कर रहा है। उसे निराश मत कीजिएगा अलबेला खत्री और टीम जी।
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क्‍या फेसबुक और अविनाश वाचस्‍पति की बीमारी चिट्ठाकारी के लिए संकट का वायस है ???

 मेरी राय तो यही है कि जितना नुकसान फेसबुक ने हिन्‍दी चिट्ठाकारी (ब्‍लॉगिंग) को पहुंचाया है, उतना तो नहीं परंतु कुछ नुकसान तो अविनाश वाचस्‍पति जी की बीमारी से हिन्‍दी चिट्ठाजगत को पहुंच रहा है। फेसबुक से विवेकी चिट्ठाकारों को नुकसान कम ही हुआ है क्‍योंकि उन्‍होंने फेसबुक की नेटवर्किंग के माध्‍यम से फेसबुक को चिट्ठाकारी के फायदों की ओर मोड़ दिया है। आज जबकि चिट्ठाजगत और ब्‍लॉगवाणी ए्ग्रीगेटरों के चिट्ठाकारी के मैदान को छोड़ देने के कारण काफी हानि हुई है। इस माध्‍यम की व्‍यापकता में कमी आई है। जितने पाठक इन ए्ग्रीगेटरों के जरिए हिन्‍दी चिट्ठों तक पहुंचते थे, उतने अब नहीं पहुंच रहे हैं। बल्कि यह कहना समीचीन होगा कि आधे भी नहीं पहुंच रहे हैं जिसके कारण नए नए हिन्‍दी चिट्ठों के बनने में कमी आई है। इस दिशा में अनेक प्रयास किए गए हैं। इनमें रवीन्‍द्र प्रभात जी के परिकल्‍पना समूह के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती है। 

चिट्ठाजगत के दो दिग्‍गज रवीन्‍द्र प्रभात और अविनाश वाचस्‍पति जी के द्वारा चिट्ठों के माध्‍यम से हिन्‍दी के प्रचार प्रसार के लिए किए गए कार्य अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। उनके सम्मिलित प्रयास के फलस्‍वरूप चिट्ठाकारी पर हिन्‍दी में पहली प्रामाणिक पुस्‍तक के संपादन और प्रकाशन का श्रेय भी उन्‍हें ही जाता है। भला 'हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति' पहली पुस्‍तक और 'हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का इतिहास' दूसरी पुस्‍तक ने बेहतर मिसाल कायम की है। कम साथी ही परिचित हैं कि मुंबई ने हाल ही में प्रकाशित हिन्‍दी ब्‍लॉंगिग की तीसरी पुस्‍तक भी इन्‍हीं की प्रेरणा का सुफल है। पुस्‍तक का नाम 'हिन्‍दी ब्‍लॉंगिंग : स्‍वरुप, व्‍याप्ति एवं संभावनाएं' है जो कि पीडीएफ फार्म में उपलब्‍ध है और जल्‍द ही प्रकाशित होकर भी मिल जाएगी। 

हिन्‍दी चिट्ठाकारी पर संदर्भ और शोध के लिए विभिन्‍न पुस्‍तकों की महत्‍ता को पहचानते हुए अविनाश वाचस्‍पति और डॉ. हरीश अरोड़ा जी के संपादन में एक और पुस्‍तक का कार्य चल रहा है। इस संबंध में हिन्‍दी चिट्ठों और फेसबुक पर विभिन्‍न समूहों में लेख आमंत्रित किए गए हैं। इससे जाहिर होता है कि अविनाश वाचस्‍पति जी सदैव सभी को साथ लेकर चलने का जज्‍बा रखते हैं। उनके लिए कोई भी पराया नहीं है। देश-विदेश के हिन्‍दी चिट्ठाकारों को सम्‍मेलनों, संगोष्ठियों, मिलन समारोहों के जरिए जोड़ने के उनके कार्य का तो कोई मुकाबला ही नहीं है। उनके एक आवाह्न पर चिट्ठाकार इकट्ठे होकर विचार विमर्श के लिए सदा तैयार मिलते हैं।

आज यह सब लिखने की जरूरत इसलिए महसूस हुई है क्‍योंकि अविनाश जी पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से हैपिटाइटिस सी बीमारी से पीडि़त हैं परंतु उन्‍होंने अपनी सक्रियता में कभी कमी नहीं आने दी है लेकिन पिछले  सप्‍ताह भर से ऐसा अहसास हो रहा है कि अब बीमारी उन पर हावी होने लगी है। उनसे मिलने पर मैंने जाना है कि चिकित्‍सा शुरू होने पर लगाए जाने वाले पहले इंजेक्‍शन से ही उन पर शारीरिक अक्षमता दिखने लगी है। वह अब पहले की तरह जाग कर लंबे समय तक कार्य नहीं कर पा रहे हैं। इसी इंजेक्‍शन के कारण उनकी आंखों में दर्द, धुंधलापन, ज्‍वर, थकान, अधिक नींद अपना असर दिखलाने लगी है। फिर भी आशा है कि चिकित्‍सा की यह ऐलोपैथी पद्धति उनके शरीर से हैपिटाइटिस सी रूपी बीमारी को निकाल कर बाहर करेगी और उन्‍हें फिर से चुस्‍त-दरुस्‍त और सक्रिय कर देगी। 

इन्‍हीं शुभ कामनाओं और विश्‍वास के साथ हम सब मिलकर उनकी शीघ्र पूरे निरोग होने की कामना करते हैं। मैं यह भी चाहूंगा कि उनके द्वारा संचालित नुक्‍कड़ सहित जिन चिट्ठों पर भी हम साथी उनसे जुड़े हुए हैं, उसमें  पोस्‍टें लगाएं जिससे उनके द्वारा संचालित और शुरू किए गए चिट्ठों पर उदासीनता का वातावरण न बने। ऐसा करना मुझे तो आज समय की सबसे बड़ी जरूरत महसूस हो रहा है। 

उनकी हालिया पोस्‍ट में उनका दर्द बहुत ही सहजता से मुखर हुआ है :-

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सिल्क जो डर्टी नहीं है !

वास्तव में फिल्म में लगातार मर्दवादी और भूखे चेहरों पर 'सिल्क' दनादन तमाचे जड़ रही थी और उसका कृत्य कहीं से भी मुँह-छिपाऊ नहीं लगा.हम पुरुषों की मानसिकता और सोच अपने तईं और स्त्री के तईं बिलकुल अलग होती है.हम अपने व्यक्तिगत जीवन में उसे बतौर आदर्श कल्पित करते हैं और मौज,मज़े के लिए दूसरे हैं न.क्या मनोरंजन करने वाले ऐसे लोग दूसरी दुनिया से आयेंगे ? हमने उसके तमाचे को कई बार महसूस किया और फिल्म के अंत में वह सारा जोश,कुत्सित भावना हवा हो चुकी थी,हम जी भरकर रो भी नहीं  पा  रहे थे क्योंकि 'सिल्क' जैसी स्त्रियों के लिए झूठी,दोहरी मर्दवादी सोच ज़िम्मेदार जो है. हमें अपने से ही 'घिन' सी आने लगी.क्या ऐसा ही हमारा मर्द-समाज है जो सोचता कुछ है,लिखता कुछ है,दीखता कुछ है,करता कुछ है ?

मेरे लिए 'डर्टी पिक्चर' गन्दी और मनोरंजक नहीं रही,इस फिल्म ने हमारा,आपका बहुत कुछ उघाड़ दिया है !



पूरा पढ़ने के लिए यहाँ देखें और बताएँ !
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अब कम ही सक्रिय रहूंगा मैं इंटरनेट पर : अविनाश वाचस्‍पति

शनिवार को तो बिल्‍कुल नहीं
आगामी 6 महीने तक
पिछले शनिवार से
लगने शुरू हुए हैं इंजेक्‍शन
जो दूर करेंगे व्‍याधि
जिसे कहते हैं
हैपिटाइटिस सी।

लिखना पढ़ना तो होगा कम
आना जाना भी सीमित ही रहेगा
अब मन लगता नहीं है

फेसबुक पर कभी कभी
चेहरा लेकर हाजिर
हो जाया करूंगा

वैसे तो कभी आऊंगा
चिटठों पर भी
की बोर्ड का खटरागी हूं न
बाज कैसे आऊंगा

बाज न आऊं
पर बाजा अब कम ही बजाऊंगा
क्‍या करूं मजबूरी है

शनिवार को जो लगा है
इंजेक्‍शन पहली बार
अगली बार और
उससे अगली बार भी
लगा करेगा शनिवार को ही ।

क्‍या करूं
क्‍या न करूं
हाल बतलाऊं
या न बतलाऊं
इसलिए एक साथ
बतला रहा हूं।

कुछ बकाया काम
जो अधर में हैं
उन्‍हें जरूर धरा पर लाना है
मतलब पूरा करना है।

इसके अतिरिक्‍त तो सिर्फ
और सिर्फ
व्‍याधि से ही लड़ना है।

हंसता रहा हूं
हरदम हंसता ही रहूंगा।
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राज भाटिया जी भारत में : हिन्‍दी चिट्ठाकारी में उफान 24 दिसम्‍बर 2011 शनिवार को आएगा, आप पहुंच रहे हैं


श्री राज भाटिया जी आजकल दिल्ली में हैं और आप उनसे 09999611802  बात कर सकते हैं। 
शनिवार 24 दिसम्बर 2011 को सांपला में ब्लॉगर मिलन के लिये आने वाले मित्रों की लिस्ट में ये नाम भी जुड गये हैं।
सुश्री इन्दुपुरी जी
श्री पद्मसिंह जी
श्री ललित शर्मा जी

सभी आने वालों का स्वागत है और शुभकामनायें देने वालों का हार्दिक धन्यवाद। कवि सम्मेलन में पोस्टर पर लिखे प्रोफेशन कवियों के अलावा डॉO टी एस दराल जी  और अन्य 1-2 ब्लॉगर कवि भी प्रस्तुति दे रहे हैं। सामर्थ्यानुसार सभी तैयारियां जोर-शोर से की जा रही हैं। बहुत उत्साहित और अहोभाव महसूस कर रहा हूँ। आप सबसे मिलने का समय नजदीक आता जा रहा है।
समय की कमी और कार्य की अधिकता के कारण नेट पर ज्यादा समय नहीं दे पा रहा हूँ, कृप्या माफ कर दें। 
बाकि जानकारियों के लिये कृप्या पुरानी पोस्ट्स देखें। 

अन्तर सोहिल का प्रणाम स्वीकार करें। 

फिर मत कहिएगा कि खबर नहीं हुई।
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घर (लघु कथा)


पढ़ते-२ गौरव अचानक ही दीप्ति से बोला, "दीदी आपका घर कितना बड़ा और सुन्दर है. हमारी झुग्गी तो बहुत छोटी है और वो तो इतनी सुन्दर भी नहीं है." दीप्ति ने गौरव को समझाते हुए कहा, "गौरव एक दिन तुम्हारा घर भी ऐसा ही होगा." आगे पढ़ें...
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शिखा जी की "स्मृतियों में रूस"

किसी भी इंसान के लिए सब से कीमती चीज़ क्या होती है ... ???

 अब यह सवाल ऐसा है जिस के कि बहुत से अलग अलग जवाब हो सकते है क्यों कि हर बन्दे के हिसाब से ही उसकी सब से कीमती चीज़ तै की जा सकती है ... पर फिर भी एक जवाब ऐसा है जिस पर लगभग सारे ही लोग सहमत होंगे ... और वह है ... इंसान की सब की कीमती चीज़ उसकी यादें होती है !!

यादें या स्मृतियाँ जो चाहे कह लीजिये ... हमेशा ही आपको एक अलग ही दुनियां की सैर करवाती हैं ... 

अब एक ऐसी ही सैर का निमंत्रण दे रही हैं शिखा जी आप सब को ... अपनी नयी पुस्तक ... "स्मृतियों में रूस" के माध्यम से ...

 
Diamond Publication द्वारा छापी गयी इस पुस्तक का मूल्य है मात्र ३०० रुपये ... आप इस पुस्तक को घर बैठे बैठे ही मंगवा सकते है ऑनलाइन अपना आर्डर दे कर ...

तो फिर इंतज़ार किस बात का ... इस ठंडी ठंडी ठण्ड में गरमा गरम चाय के साथ चले इस सैर को ...
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मेरी नज़र से भी देखिये ……" टूटते सितारों की उड़ान " एक दृष्टिकोण


मेरी नज़र से चलिये इस सफ़र पर ……

वन्दना at ज़ख्म…जो फूलों ने दिये - 6 hours ago
दोस्तों अभी अभी हमारे ब्लोगर मित्र सत्यम शिवम् ने अपना पहला काव्य संग्रह "साहित्य प्रेमी संघ " के तत्वाधान में " टूटते सितारों की उड़ान " निकाला है जिसमे उन्होंने २० कवियों की कविताओं को शामिल किया है . पेशे से इंजिनियर सत्यम ने इस पुस्तक का संपादन स्वयं किया है और उम्र में तो अभी हमारे बेटे जैसा है मगर फिर भी इतनी लगन और निष्ठा से कार्य को अंजाम दिया है कि लगता ही नहीं ये कार्य किसी नवागंतुक ने किया है . शायद तभी कहते हैं प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती. इस काव्य संग्रह में बीस कवियों की रचनाएँ हैं जिनमें पांच कविताएँ मेरे द्वारा रचित हैं जिन्हें ससम्मान स्थान प्रदान किया ह... more 
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हँसते-हँसाते राजीव तनेजा



प्यारे मित्रो

 सादर ब्लॉगस्ते!

 आज मैं बोले तो आपका मित्र सुमित प्रताप सिंह आप सबसे मिलवाने लाया हूँ  हँसने और हँसाने में यकीन रखने वाले ब्लॉगर बन्धु राजीव तनेजा से| राजीव तनेजा जी दिल्ली में पैदा हुए...यहीं पले-बढे...इस नाते शुद्ध और खालिस रूप से दिल्ली के ही बाशिंदे हैं...इनकी हास्य-व्यंग्य लिखने तथा पढ़ने में रूचि है...कुछ रचनाएँ ऑनलाइन अखबारों तथा पत्रिकाओं एवं प्रिंट मीडिया में छप चुकी है| अंतर्जाल पर ज्यादा सक्रिय हैं और 'हँसते रहो' के नाम से इनका एक लोकप्रिय ब्लॉग है| रोजी-रोटी का जुगाड़ करने के लिए दिल्ली में ही ये रेडीमेड दरवाजों का एक छोटा सा बिजनैस चलाते हैं|

 सुमित प्रताप सिंह- राजीव तनेजा जी नमस्ते! कैसे हैं आप?

 राजीव तनेजा- जी सुमित जी नमस्ते! अपनी जिंदगी कट रही है हँसते-हँसाते | आप अपनी कहें|

 सुमित प्रताप सिंह- जी मैं भी बिलकुल खैरियत से हूँ| कुछ प्रश्न मन में खलबली मचाये हुए हैं|

 राजीव तनेजा- उन प्रश्नों को अब खलबली मचाने की इजाजत दिए बगैर पूछ ही डालिए|

 सुमित प्रताप सिंह- आपको ये हँसने और हँसाने का शौक कैसे पढ़ा? कभी रोने और रुलाने का मन नहीं करता? आगे पढ़ें
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यह प्रामाणिक है परंतु प्रत्‍येक को अलग अलग बतलाऊं पासीबल नहीं है

Inj. Pegasys 135mg दिनांक 17 दिसम्‍बर 2011 को दोपहर दो बजकर बीस मिनिट पर इंस्‍टीच्‍यूट लीवर एंड बायलरी साईसेंज, वसंत कुंज में लगाया गया है। इससे पहले 13 दिसम्‍बर से दो दो कैप्‍सूल Ribavirin and 1 capsule Festovit के दिन में दो दो बार ले रहा हूं। यह हैपिटाइटिस सी की चिकित्‍सा है। छह महीने लगातार चलेगी। प्रत्‍येक सप्‍ताह एक इंजेक्‍शन लगाया जाएगा, उससे पहले रक्‍त जांच करवाई जाएगी। स्‍वस्‍थता की ओर मेरे शरीर की दौड़ जबकि नुकसान सिर्फ लीवर को हुआ है। अभी कुछ बुखारीय महसूस कर रहा हूं और सिर में हल्‍का सा दर्द।
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संस्मरण - 'ज्ञान की तरह...- मनोहर बिल्लौरे



               बात उन दिनों की है जब ज्ञान जी नव-भास्कर का संपादकीय पेज देखने जाते थे। सन याद नहीं। तब वे अग्रवाल कालोनी (गढ़ा) में रहा करते थे. सभी मित्र और चाहने वाले अक्सर शाम के समय, जब उन के निकलने का समय होता, पहुँच जाते. चंद्रकांत जी दानी जी मलय जी, सबसे वहाँ मुलाकात हो जाती। आज इंद्रमणि जी याद आ रहे हैं। वे भी अपनी आवारा जिन्दगी में ज्ञान जी के और हमारे निकट रहे और अपनी आत्मीय उपसिथति से सराबोर किया।
उस समय जब ज्ञान जी ने अग्रवाल कालोनी वाला घर बदला और रामनगर वाले निजी नये घर में आये तब काकू (सुरेन्द्र राजन) ने ज्ञान जी का घर व्यवसिथत किया था. जिस यायावर का खुद अपना घर व्यवसिथत नहीं वह किसी मित्र के घर को कितनी अच्छी तरह सजा सकता है, यह तब हम ने जाना, समझा। ज्ञानरंजन की बदौलत हमें काकू (सुरेन्द्र राजन) मिले. मुन्ना भाई एक और दो में उनका छोटा सा रोल है। बंदिनी सीरियल में वे नाना बने हैं। उन्हें तीन कलाओं में अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड मिले है। वे कहते हैं कि फिल्म में काम हम इसलिये करते हैं ताकि महानगर में रोटी, कपड़ा और मकान मिलता रहे।
आगे पढ़ने क्लिक कीजिये "भारत-ब्रिगेड"
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स्नेह पुरी की इंदु पुरी

प्यारे मित्रो सादर ब्लॉगस्ते! लो जी फिर से हाजिर है आपका मित्र सुमित प्रताप सिंह ब्लॉग संसार के एक और व्यक्तित्व से आपकी भेंट करवाने. जी हाँ इनका नाम है इंदु पुरी. इंदु पुरी जी बहुत स्वाभिमानी नारी हैं और जरा सा कोई बदतमीजी से बात कर ले या तू कह दे उसे ब्लाक कर देती हैं हमेशा के लिए.व्यक्तिगत जीवन मे ऐसी नही हैं.बहुत भावुक, रिश्तों को जीने वाली,प्यार देने और लेने वाली औरत हैं ये. हाँ दोस्तों का सर्कल बहुत छोटा है.पर....खूब ठोक पीट बजाकर देखने के बाद जिन्हें इन्होने अपने जीवन मे आने दिया वो इनके यह संसार छोड़ने के बाद ही इनसे अलग होंगे.क्या कहें ऐसिच हैं ये.इनका जन्म इलाहाबाद मे हुआ था.इनके पिता एयर फ़ोर्स ऑफिसर थे वहाँ.चार भाइयों के बाद गंगा मैया की मनौती रखने के बाद इनके पापा-मम्मी को यह 'सैम्पल' प्राप्त हुआ था. इसलिए परिवार मे सबसे छोटी और एक मात्र लड़की थी.उपर लिखे 'गुणों' का विकास भी शायद इसी कारण हुआ होगा.पढ़ने मे शुरू से बहुत अच्छी थीं. स्कूल मे (कक्षा मे नही)पहला या दूसरा स्थान हमेशा आता था. स्कूल मे बैस्ट स्टूडेंट, बैस्ट सिंगर, बैस्ट ओरेटर, बैस्ट डिबेटर के खूब इनाम पाए.गोल्डन पीरियड जिया इन्होने अपने स्कूल कॉलेज लाइफ का. सबकी लाडली रही.पढ़ने का बहुत शौक था.स्कूल लाइब्रेरी मे कई नई किताबों के पृष्ठ भी इन्होने अलग किये.वहीँ हिंदी,अंग्रेजी,उर्दू,संस्कृत, रुसी और विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कई किताबे पढ़ी.इनकी पहली सहेली फर्स्ट इयर मे बनी.यूँ सबसे दोस्ती थी और ..किसी से भी दोस्ती नही थी.आगे पढ़ें ...
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प्रधानमंत्री ने ओमप्रकाश को पुरस्कृत किया




पॉवर फिनांस कारपोरेश में कार्यरत ओमप्रकाश को एक समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने श्रेष्ठ नोडल अधिकारी का पुरस्कार दिया। यह तीसरा मौका है जब उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री के अलावा ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंडे और ऊर्जा राज्य मंत्री केसी वेणुगोपाल भी मौजूद थे। ऊर्जा संरक्षण पर आयोजित चित्रकारी प्रतियोगिता के मौके पर समारोह का आयोजन ऊर्जा मंत्रालय ने किया था। ओमप्रकाश पावर फिनांस कारपोरेश में उप महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। साहित्यिक सरोकारों के लिए जाने जाने वाले ओमप्रकाश ने समय-समय पर अंग्रेजी और हिंदी में यात्रा संस्मरण भी लिखे हैं।
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कार्टून बनाने का मौका : व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल : अविनाश वाचस्‍पति

मेरे व्‍यंग्‍यों की एक पुस्‍तक जनवरी 12 के प्रथम सप्‍ताह में प्रकाशित होकर आ रही है। नाम व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल और प्रकाशक  ज्‍योतिपर्व प्रकाशन । इच्‍छा है कि व्‍यंग्‍य से संबंधित कार्टून व्‍यंग्‍य के साथ प्रकाशित किए जाएं। समय कम है फिर भी एक प्रयोग करना चाहता हूं कि सभी कार्टूनकार मित्र दो दो पांच पांच व्‍यंग्‍यों पर कार्टून बनाकर सहयोग करें जिन्‍हें व्‍यंग्‍य के साथ प्रकाशित किया ...जाएगा। इच्‍छुक कार्टूनकार मित्र सूचित करें तो उन्‍हें व्‍यंग्‍य की फाईल भिजवा दूं। मेरे पसंदीदा कार्टूनकारों में इरफान, कीर्तीश, काजल कुमार, सागर, सुरेश शर्मा, अभिषेक कुमार, चन्‍द्रशेखर हाडा, देवेन्‍द्र ओझा इत्‍यादि इत्‍यादि हैं। नए कार्टूनकारों को भी अवसर देना चाहता हूं। प्रतीक्षा कर रहा हूं मैं अपनी ई मेल nukkadh@gmail.com पर अथवा संदेश के डिब्‍बे में।

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रंग-रंग जीवन



फ़ज़ल इमाम मल्लिक

आज़ादी से पहले भारत के नक्Þशे पर कई राजा-महाराजाओं और नवाबों की रियासतें दिखाई पड़ती थीं। इन रियासतों की अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता और अपनी परंपरा थी। ज़ाहिर है कि इन रजवाड़ों और रियासतों की एक अलग दुनिया थी, जिनमें जिंदगी अलग-अलग रंग में दिखाई देती थीं। मशहूर लेखक लुइस रॉसेट की पुस्तक ‘इंडिया एंड इट्स नेटिव प्रिंसेस’ में इन रजवाड़ों और रियासतों को देखने-समझने में मदद मिलती है। उन्नीसवीं सदी के आखिर में लिखी गई इस पुस्तक में मध्य भारत के साथ-साथ बंगाल और बंबई के इलाकों और वहां से जुड़ी संस्कृति से हम रूबरू होते हैं। लुइस रॉसेट ने 1882 में इस पुस्तक की रचना की थी और क़रीब छह साल तक भारत की रियासतों और वहां के जीवन पर गहन शोध के बाद यह पुस्तक लिखी थी। तब इस पुस्तक का प्रकाशन बिकर्स एंड संस ने किया था। बाद में इस पुस्तक का संपादन लिफ्टेनेंट कर्नल बकल ने किया और नियोगी बुक्स ने इसका पुनर्प्रकाशन कर हमारे सामने उन्नीसवीं सदी के इतिाहस, सभ्यता और संस्कृति को सामने रखने की कोशिश की है।
यह कोशिश इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि पुस्तक में कई अनकही कहानियों के साथ-साथ उन्नीसवीं सदी के राजा-महाराजाओं और उनकी रियासतों से जुड़े कई ऐसे अनछुए पहलू हमारे सामने आते हैं जिनसे हम जैसे लोग अनजान ही थे। छह साल तक भारत के इन हिस्सों में घुमक्कड़ी कर इस फ्रांसीसी लेखक ने पाठकों के सामने एक नई और अनोखी दुनिया को सामने रखा है। इस दुनिया में इतिाहस भी है, धर्म-संस्कृित भी है, आस्था, धार्मिक विश्वास के साथ-साथ जीवन से जुड़ा हर वह रंग है जो उन्नीसवां सदी में उन रियासतों में पसरे हुए थे। भाषा की सहजता और रवानी इन रंगों को और चोखा करती है। रॉसेट हमें भीलों की दुनिया में ले जाते हैं तो कोणकन से लेकर अंबरनाथ के मंदिरों की हमें सैर कराते हैं। डाकबंगलों की कहानियां भी वे बताते हैं और चीतल-हिरणों की रफ्तार के साथ पाठकों को वे खेत-खलिहानों, जंगलों और पहाड़ों पर ले जाते हैं।
बड़ौदा, पुष्कर, अजमेर, अलवर, आगरा, जयपुर, धौलपुर, ग्वालियर, भरतपुर सहित सांची, पन्ना, ओरछा, झांसी, गोविंदगढ़, मालवा, भोपाल, बनारस, गया होते हुए मुर्शिदाबाद के रास्ते वे बंगाल ले जाते हैं। सफ़र में सांभर झील भी मिलती है और मंदार की पहाड़ियां भी। भीलों की दुनिया से भी वे रूबरा कराते हैं और संथालों के जीवन से भी वे हमें जोड़ते हैं। इस यात्रा के दौरान भारत कई-कई रूपों में हमारे सामने आता है। बेहतरीन रेखाचित्रों के ज़रिए अपनी सभ्यता और संस्कृति को पहचानने-समझने में हमें मदद लिमती है। इन स्केचों ने पुस्तक का महत्त्व और भी बढ़ा दिया है। नियोगी बुक्स ने इस पुस्तक को प्रकाशित कर एक बड़ा काम किया है। सरल और सहज भाषा इस पुस्तक की बड़ी ख़ूबी है यह ख़ूबी पुस्तक को पठनीय बनाती है।
इंडिया एंड इट्स नेटिव प्रिंसेस (यात्रा वृतांत), लेखक: लुइस रॉसेट, प्रकाशक: नियोगी बुक्स, डी-78, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेस-1, नई दिल्ली-110020, मूल्य: 795 रुपए।
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फ्री में मुंबई घूमना चाहते हैं तो फेसबुक से जुड़ जाएं

जी हां
इधर भी 
इधर भी
न जाने किधर जी
उधर जी
हर इधर उधर और इधर को
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हर ओर लग गया है
आंखों में जिगर जी
आंखों से देखें
शब्‍दों में बुनें
फोटो में अपनी
भावनाओं को चुनें

मुंबई घूमना चाहें
नहीं चाहें खर्चा करना
रिजर्वेशन का झंझट है
हवाई जहाजों की आहट है
पैसे से खूब चाहत है
इसे बचाते बचाते
मुंबई घूमना चाहें
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फेसबुक का नहीं
कर रहा हूं विज्ञापन
यह तो है मेरा अपनापन
दिखला रहा हूं
यात्रा में जो जो याद रहा है
मेरे आई फोन को
आप भी देख लें
कमेंट में कविता बुनें
अपनी भावनाओं को बांटे

दुख और अवसाद को
मारें जोरदार चांटे
चिट्ठाकारों से मिलें
मिलें डॉक्‍टर और प्रोफेसरों से
उनके विचारों को जानें
हिंदी का कर रहे हैं वे विकास
उसे मन से पहचानें
अपना भी एक चिट्ठा बना लें

अपनी भी धाक जमा लें
जिससे धड़कने लगें
अंग्रेजी वालों के दिल
वे भी आएं और हिंदी को
अपने गले से लगाएं
सबमें हिंदी और चिट्ठा
का प्रेम भाव जगाएं।

जो हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर
तीसरी पुस्‍तक अपनी ई मेल पर
जेपीजी फार्मेट में पाना
और पढ़ना चाहें
वे nukkadh@gmail.com पर
तुरंत संदेश भिजवाएं। 
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धन-बल को मिलने वाला मान है भ्रष्टाचार की जड़ ....!

ऐसे देश में भ्रष्टाचार कैसे खत्म हो सकता है ,  जहाँ किसी व्यक्ति का मान उसकी बेटी की शादी में खर्च किये गए धन से निर्धारित होता है |  जहाँ  समाज की नज़र में किसी एक मनुष्य की मनुष्यता बौनी हो जाती है दूसरे के आलीशान मकान के आगे | किसी घर के आगे खड़ी महँगी गाड़िया तय करती हैं कि उसे कितना सम्मान मिलेगा ? किसी परिवार की महिलाओं के  झाले-झुमकों का वज़न तय करता है कि उन्हें मिलने वाले मान-सम्मान का माप-तौल क्या होगा ? पूरी पोस्ट यहाँ पढ़ें...... 
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शहंशाहे ब्‍लॉग का जन्‍मदिन है आज


क्लिक करो और जादू देखो
क्लिक करते ही बनेगी कविता

हैप्‍पी बर्थडे अविनाश जी
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अन्‍नाभाई के जन्‍मदिन पर पढि़ए हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की जनसंदेश टाइम्‍स दैनिक में प्रकाशित एक बहुत बड़ी खबर

पढ़ने के लिए खबर क्लिक कीजिए खबर पर अथवा आइये जनसंदेश टाइम्‍स के इस लिंक पर। 
सबके प्‍यारे अन्‍ना 
क्‍यों  मैंने सच कहा है न ?
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अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई के जन्‍मदिन पर हम आपको केक नहीं, कुछ और दिखला रहे हैं

http://indianbookcover.blogspot.com/2011/12/vyangya-ka-sunyakal-by-avinash.html
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हार कर जीतना


फ़ज़ल इमाम मल्लिक

अकेला मैं ही नहीं, किसी को भी यक़ीन नहीं था अफ़ग़ानी फ़ुबाल टीम का प्रदर्शन इतना शनादार रहेगा। बरसों से अफ़गानिस्तान युद्ध और आतंकवाद झेल रहा है। पहले रूस और अब अमेरिकी सेना की मौजूदगी ने यक़ीनन इस देश के युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव ही छोड़ा होगा। गोलियों की तड़तड़हाटें और बमों के धमाकों के बीच एक पूरी पीढ़ी वहां जवान हुई होगी तो एक पीढ़ी ने बुढ़ापे में क़दम रखा होगा। दूसरे देश की सेनाओं ने कइयों के सपनों को उनकी आंखों से छीन ले गई होगी तो कइयों के सपने आंखों में पलने से पहले ही टूट गए होंगे। दूसरे देश की सेनाओं ने एक पूरी पीढ़ी को अपाहिज बना डाला तो तालिबानों की वजह से भी इस ख़ूबसूरत देश में लोगों को क्या कुछ झेलना पड़ रहा है, पूरी दुनिया इससे वाक़िफ़ है। क़बीलाई इलाकÞों के आसमान में अमेरिकी सैनिकों के उड़ते विमान और ड्रोन कहीं भी और कभी भी मौत बरसाती हैं और आसमान में पर खोले तैरती मौतें रोज़ ही नजाने अनगिनत लोगों को अपना शिकार बना डालती है। एक अनदेखा डर बाहर भी है और भीतर भी और इस डर के साथ जीने के लिए अफ़ग़ानी अभिशप्त हो गए हैं। इसलिए सैफÞ फुटबाल चैंपियनशिप में अफ़ग़ानी फ़ुटबाल टीम से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद मुझे और मेरे साथी खेल पत्रकारों को नहीं थी। इसलिए फ़ाइनल के दिन मैच के दौरान अमित ने छूठते ही कहा था- ‘फ़ज़ल भाई! किस ने सोचा था कि यह टीम सैफ़ फुटबाल का फ़ाइनल खेलेगी’। अमित मेरे सहकर्मी रह चुके हैं। वे मेरे साथ ‘जनसत्ता’ में थे। फिर ख़ूब से ख़ूबतर की तलाश में वे एक दूसरे दैनिक में इन दिनों रन कूट रहे हैं और मौक़ा मिलने पर गोल भी ठोंक देते हैं। मैंने अमित की बात की तसदीक़ की और कहा- ‘ठीक कहा, हमने सोचा भी नहीं था कि अफ़गानिस्तान का प्रदर्शन इस टूर्नामेंट में इतना अच्छा रहेगा’।
लेकिन अफ़ग़ानी टीम ने अपने कला-कौशल और तकनीक से हमें अपना क़याल बनाया था। जंग से बदहाल उस देश के खिलाड़ियों ने जिस तरह का प्रदर्शन इस टूर्नामेंट में किया उससे उनके जीवट का पता तो चलता ही है, खेलों को लेकर उनके जुनून को भी समझा जा सकता है। लंबे-तगड़े और ख़ूबसूरत अफ़गÞानियों को मैदान पर भारत के ख़िलाफ़ खेलते देखना अच्छा लगा था। लीग मुक़ाबले में इस टीम ने भारत को एक-एक की बराबरी से रोक कर अपने इरादे भी ज़ाहिर कर दिए थे। क्योंकि फीफा रैंकिंग में अफ़गÞानिस्तान भारत से काफ़ी नीचे है इसलिए उसने जब घरेलू मैदान पर भारत को बराबरी की टक्कर दी तो लगा कि उसने तो मैदान मार लिया है। जीत-हार भले गोलों से तय होता है लेकिन कभी-कभी मैदान पर अद्मय साहस, संघर्ष की क्षमता और मज़बूत इरादे व इच्छा शक्ति भी किसी टीम को विजेता की तरह मैदान से बाहर लाता है, भले वह टीम हार गई हो या मुक़ाबला बराबरी पर छूटा हो। इसलिए फ़ाइनल के दिन जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में मेडल लेने के बाद अफ़ग़ानी फ़ुटबाल टीम हमारे सामने से गुज़री तो उनके लिए तालियां बजाने से ख़ुद को नहीं रोक पाया। मेरे साथ ही बैठे सुरेश कौशिक और राजेश राय ने भी उनका अभिनंदन किया। अपने देश के ख़िलाफ़ किसी दूसरी टीम के लिए इस तरह तालियां कभी मैंने बजाई हों, मुझे याद नहीं पड़ता। जबकि भारत की जीत पर या उसके बेहतरीन प्रदर्शन पर ख़ूब तालियां भी बजाईं हैं, तिरंगे को मैदान पर लहराते देख कर भावुक भी हुआ हूं और भारत के हारने पर मलाल और अफ़सुरदा भी हुआ हूं। भारत की हार पर तो आंसू नहीं निकले हैं लेकिन कई मौक़े ऐसे आए जब आंखों नम हो उठी थीं। ये मौक़े तब आए जब भारत ने मैदान पर चमकदार प्रदर्शन किया और मुक़ाबले जीते थे। यानी हार पर नहीं भारत के जीतने पर मैंने आंसू बहाए थे। लेकिन उस दिन अफ़ग़ानी टीम के लिए मेरे अंदर बैठा आदमी बार-बार उसकी शान में क़सीदे पढ़ रहा था। इसलिए भी कि एक लुटे-पिटे देश में खिलाड़ी किस तरह तैयार किए जाते हैं, कम से कम उससे हमें सीखना चाहिए। खेलों को लेकर हमारे यहां जिस तरह का माहौल है और खेल संघों पर क़ब्ज़ा जमाए अधिकारी, जिनमें ज़्याजातर नौकरशाह और सियासतदां हैं, खेलों की बजाय अपनी दुकान चमकाने में जुटे रहते हों, वहां एक छोटा सा देश सारी मुश्किलों से उबर कर एक ऐसी टीम बनाता है जो मैदान पर हमारी आंखों में आंखें डाल कर बराबरी की टक्कर देता है। इसलिए उस शाम नेहरू स्टेडियम की दूधिया रोशनी में उन खिलाड़ियों को सलाम करने को जी चाहा था। कुछ महीने इसी दिल्ली में अफ़गानिस्तान से आई महिला फुटबाल खिलाड़ियों ने भी दिल जीता था। और चीन में हुए एशियाई खेलों की क्रिकेट में पाकिस्तान को हरा कर फ़ाइनल में पहुंचने वाली अफ़गानिस्तान टीम ने भी अपने जीवट का प्रदर्शन किया था। दरअसल कुछ कर गुजरने की ललक ही किसी टीम को बेहतर टीम बनाती है जो मैदान पर मज़बूत से मज़बूत प्रतिद्वंद्धि के सामने डट कर खड़ी हो जाती है। गले में मेडल पहने हमारे सामने से गुज़रते अफ़ग़ानी खिलाड़ियों में से कइयों की आंखों में आंसू थे। अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद टीम एक बार पिछड़ी तो फिर उबर नहीं पाई।
पहले हाफ़ में अफ़ग़ानी टीम ने बेहतर खेला था और अगर भारतीय गोलची ने चौकसी नहीं दिखाई होती तो यक़ीनन भारत दो गोलों से पिछड़ रहा होता। लेकिन करणजीत सिंह ने बेहतरीन पूर्वानुमान के साथ ग़ोता लगाते हुए अफ़गानिस्तान के हमले को टाला। अफ़गानिस्तानके बलाल और संजार अहमदी ने भारतीय डिफेंडरों को कई बार परेशानी में डाला था। उन्होंने डिफेंस को छितराया भी लेकिन भारतीय रक्षा पंक्ति के अंतिम किले पर मुस्तैदी से जमे करणजीत ने दो बेहतरीन बचाव किए। दोनों ही बचाव शानदार और दर्शनीय थे। करणजीत ने सही समय पर चौकसी नहीं दिखाई होती तो सैफÞ फुटबाल चैंपियनशिप का पहला फ़ाइनल खेल रही अफ़ग़ानी टीम को फिर रोकना भारत के लिए मुश्किल होता। हालांकि मैदान उसका अपना था और दर्शकों का साथ भी था लेकिन पहले हाफÞ में भारतीय आक्रमण में वह धार नहीं दिखी जो होनी चाहिए थी। छुटपुट हमले ज़रूर भारत ने बनाए लेकिन वे हमले ऐसे नहीं थे जिन पर गोल बन सकता था। खिलाड़ियों से ज्Þयादा शायद दर्शकों में उत्साह था इसलिए भारतीय टीम के पास जब भी गेंद आती तो नेहरू स्टेडियम में मौजूद दर्शक उत्साह में भर कर शोर मचा कर तिरंगे लहराने लगते। ऐसा बरसों बाद देखने को मिला था। क्रिकेट की दीवनगी में फ़ुटबाल और दूसरे खेल कहीं खो से गए हैं, लेकिन इस साल पहले एएफसी कप में संयुक्त अरब अमीरात के ख़िलाफÞ और अब सैफ खेलों में दर्शकों का उत्साह देख कर अच्छा लगा था। दर्शकों से स्टेडियम भरा तो नहीं था लेकिन नेहरू स्टेडियम पर क़रीब बीस हज़ार लोगों की मौजूदगी देख कर अच्छा लगा था। कोलकाता में ज़रूर फ़ुटबाल मैचों में भी स्टेडियम में लोगों का हजूम उमड़ता था। लेकिन हाल के दिनों में क्रिकेट ने सभी खेलों से दर्शकों को लगभग दूर कर डाला था। इसलिए फ़ुटबाल को लेकर दर्शकों की बढ़ती दीवानगी एक सुख से भर दे रही थी।
अपने घर में, अपने दर्शकों के बीच भारत को यह फ़ाइनल जीतना ज़रूरी था। हालांकि फ़ाइनल तक के सफ़र में भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा था। शुरुआती मुक़ाबले में अफ़ग़ानिस्तान ने उसे बराबरी पर रोक लिया था इससे उनका मनोबल बढ़ा हुआ था। दूसरे हाफ़ में भी अफ़ग़ानिस्तानी टीम ने बराबरी की टक्कर दी। लेकिन एक ग़लती ने खेल की पूरी तस्वीर ही बदल डाली। दूसरे हाफ़ में छब्बीस मिनट का खेल बीत चुका था और भारत, अफ़ग़ानिस्तान के गोल को भेद नहीं पाया था। लेकिन इसके बाद ही अफ़गÞानिस्तान ने एक ग़लती की और भारत को मैच पर पकड़ बनाने का मौक़ा मिल गया। मध्य मैदान पर गेंद सैयद रहीम नबी ने संभाली। एक डिफेंडर को उन्होंने ख़ूबसूरती से छकाया और फिर लंबा लाब अपने साथी खिलाड़ी जेजे लालपेखलुआ के लिए फेंका। डिफेंडर फ़ैज़ल सफ़ा जेजे के साथ थे। बाक्स के ठीक ऊपर मिली गेंद को लेकर जेजे निकले ही थे कि फ़ैज़ल ने उन्हें टंगड़ी मार दी। वे बाक्स के अंदर दाख़िल हो चुके थे इसलिए रेफ़री ने पेनल्टी देने में देर नहीं लगाई। फैÞज़ल की यह ग़लती टीम के लिए भारी पड़ी। जेजे निकले ज़रूर थे लेकिन वे गोल भेद ही देते ऐसा लग तो नहीं रहा था। फैÞज़ल ने उन्हें गिरा कर तो ग़लती की ही, रही-सही कसर गोलची हमीदुल्लाह यूसुफजारी ने पूरी कर दी। पहले उन्होंने रेफरी को पश्तो में कुछ बुरा-भला दी। यह बात उन्हें नहीं पता थी कि सिंगापुर के रेफरी को पश्तो समझ में आती है। लेकिन हमीदुल्लाह यूसुफजारी इतने पर ही नहीं रुके और उन्होंने रेफरी को धक्का देने की कोशिश की। यह ग़लती उन्हें भारी पड़ी और रेफ़री ने उन्हें लाल कार्ड दिखा कर मैदान से बाहर भेज दिया। हमीदुल्लाह यूसुफजारी इस फ़ैसले पर जितना लाल-पीले हो सकते थे, हुए, लेकिन मैदान पर उन्होंने जो किया उसका ख़मियाज़ा उनके साथ-साथ टीम को भी भुगतना पड़ा। बाक़ी समय उसे दस खिलाड़ियों से खेलना पड़ा। पेनल्टी पर सुनील छेत्री ने गोल बनाने में कोई ग़लती नहीं की। यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है कि छेत्री ने जिस वक्Þत गोल दाग़ा स्टेडयिम की दूधिया रोशने के बीच ही चांद ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। स्टेडियम के पूर्वी सिरे से चांद धीरे-धीरे ऊपर आता गया और उसके साथ ही भारतीय टीम का प्रदर्शन भी निखरता गया।
लहराते तिरंगों के बीच ही भारत ने अगले सात मिनट में दो गोल फटाफट दागÞ कर अपनी जीत पुख़्ता कर ली। दोनों गोल के सूत्रधार छेत्री ही रहे। पहले मध्य मैदान से बढ़ाव बना कर उन्होंने दाएं छोर पर साथ चल रहे क्लाईफोर्ड मिरांडा को बेहतरीन ढंग से गेंद बढ़ाई। मिरांडा गेंद के साथ बाक्स में दाख़िल हुए। एक डिफÞेंडर को छकाया और फिर आगे बढ़ आए गोलची के बाएं से ज़मीनी शार्ट लगा कर गेंद को जाल के बाएं कोने में अटका दी। इस दूसरे गोल ने अफ़गÞानी टीम के हौसलों को एक तरह से पस्त कर दिया। तीन मिनट बाद छेत्री ने फिर पांवों की कलाकारी दिखाई। इस बार गेंद जेजे के लिए बढ़ाई और जेजे ने दाएं पांव से बेहतरीन वाली लगाई। गोलची कुछ समझ पाता इससे पहले ही गेंद जाल में तैर रही थी। तीन गोलों की बढ़त के बाद भारत की जीत तय हो चुकी थी। लेकिन खेल ख़त्म होने से ठीक पहले सुशील कुमार ने बाक्स के ठीक ऊपर से दनदनाता शार्ट लगाया और गेंद जाल में उलझ कर नाचने लगी। स्टेडियम तिरंगों से लहराने लगा था। दर्शकों का उत्साह देखने लायक़ था।
रेफरी की लंबी सिटी बजते ही भारतीय खिलाड़ी तिरंगे के साथ मैदान की परिक्रमा करने लगे। जीत की इबारत उनके चेहरों पर साफ़ पढ़ी जा सकती थी। दर्शकों में भी एक सुख पसरा था। नब्बे मिनट तक जूझने के बाद अफ़गÞानिस्तान टीम हार कर बाहर आ रही थी। कइयों की पलकों पर आंसू आकर ठहर गए थे तो कइयों के आंसुओं ने आंखों का तटबंध तोड़ डाला था। वे हार गए थे, लेकिन योद्धा थे। इसलिए उन्हें हार कर मैदान से बाहर आते देख कर भी अच्छा लग रहा था। एक सुख मेरे भीतर भी पसरा था। भारत ने एक बड़ा ख़िताब जीता था और यह बात सुख देने वाली थी। भारतीय टीम मेडल लेकर सैफ़ ट्राफी के साथ तस्वीरें खिंचवाने में जुटी थी। आसमान पर चांद अब पूरी ऊर्जा के साथ मुस्करा रहा था। स्टेडियम की दूधिया रोशनी में भी चांद की रोशनी भारतीय फ़ुटबाल टीम को सलाम कर रही थी- जीत का उजाला चांदे के चहरे पर भी फैला था और इस उजाले में भारतीय टीम को देखना अच्छा लग रहा था।
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