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राजीव रंजन प्रसाद के उपन्यास "आमचो बस्तर" की विवेचना – डॉ.वेद व्यथित

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  • राजीव रंजन प्रसाद
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  • लेखक – राजीव रंजन प्रसाद 
    प्रकाशक - यश प्रकाशन, नवीन शहादरा, नई दिल्ली 

     आमचो बस्तर लोक जीवन के विविध भावों, नेह, छोह, प्यार मनुहा और विशेष तौर से अपने भोले जीवन के प्रति रूप अत्याचारों को सहता और सुलगता एक सशक्त उपन्यास तो है ही साथ ही साथ पाषाण युग से आरंभ हो कर आज के पाषाण-हृदय इन्सानों तक पहुँचते हुए समय की बहुत लम्बी सड़क नापता है। उपन्यास के शिल्प पर बात करनी हो तो किसी स्थापित पैमाने का प्रयोग मुमकिन नहीं है। बहुत सारी कहानियाँ हैं, बहुत सी लघुकथायें हैं, भाषा कभी कविता की तरह कोमल हो जाती है तो कभी निबन्ध की तरह रुखड़ी। लेखक नें मिथकीय इतिहास को भी अपने कथाक्रम में स्थान दे कर एक क्षेत्र-विशेष की सभी तरह की जानकारियों को समेटा है। राजा दण्ड के व्यवहार से जहाँ आज की राजनीति को निशाना बनाया गया है वही रामायण काल के दण्ड़क क्षेत्र से जुडे प्रसंगों को विचारधारा के संघर्ष के साथ प्रस्तुत कर इशारों इशारों में माओवादी विभीषिका को उजागर किया गया है। नल-नाग-वाकाटक आदि राजवंशो का उल्लेख करते हुए लेखन नें उस युग की वे कहानियाँ चुनी हैं जो जन-संघर्ष के आसपास हैं। आततायी राजा मधुरांतक का प्रसंग आज भी प्रासंगिक है। लेखक की दृष्टि आतीत के आदिवासी संघर्षों पर विशेष तौर पर गयी है। उपन्यास की कथा वस्तु एकाधिक नायकों के इर्द गिर्द घूमती है यानि यह उपन्यास बहु नायकत्व लिए हुए है जो इस की विशेषता है । इस उपन्यास नें कई नायक दिये हैं। ये वे नायक हैं जिनपर राष्ट्रीय परिदृश्य में कभी भी चर्चा नहीं की गयी। इन नायकों के कार्यों और बलिदान की कहानियाँ जिस भाषाशैली में प्रस्तुत हुई हैं वे रोंगटे खडे कर देती हैं। लेखक को इस बात के लिये बधाई देनी ही होगी की अतीत के गर्भ में बिलकुल खो चुके आदिवासी नायकों को उपन्यास पुनर्जीवित करता है। हलबा विद्रोह (1774-1779), भोपालपट्टनम संघर्ष (1795), परलकोट विद्रोह (1825), तारापुर विद्रोह (1842-1854), मेरिया विद्रोह (1842-1863), महान मुक्ति संग्राम (1856-57), कोई विद्रोह (1859), मुरिया विद्रोह (1876), रानी-चो-रिस (1878-1882), महान भूमकाल (1910), महाराजा प्रबीर चंद्र का विद्रोह (1964-66)। इस सभी क्रांतियों के सूत्रधार उपन्यास आमचो बस्तर के पात्र हैं। गेन्द सिंह, यादवराव, व्यंकुटराव, जुग्गाराजू, जुम्माराजू, बापीराजू, नागुलदौरा, कुन्यादौरा, पामभोई, रामसायबहादुर, आयतु माहरा, डेबरीधुर और गुण्डाधुर जैसे अनेकों पात्रों के माध्यम से मिट्टी का इतिहास लिखा गया है। लेखक नें आदिवासी समाज की समस्याओं और सभी सशस्त्र विद्रोहों के कारणों की पडताल की है। 1910 का भूमकाल तथा 1966 में प्रवीरचन्द्र भंजदेव के आन्दोलन को उपन्यास में विस्तार से जगह दी गयी है। मुझे ‘कोई विद्रोह’ ने इस लिये प्रभावित किया क्योंकि कोई विद्रोह चिपको आन्दोलन से किसी भी प्रकार कमतर नही है अपितु उत्तम तदरूप है।

    निबंध जितनी विवेचना कर सकता है सामाजिक सरोकारों का उससे कहीं बेहतर चित्रण उपन्यास में हुआ है। उपन्यास अनेक सहायक कहानियों के द्वारा बुना गया है। हर सहायक कहानी या लघुकथा उस कालखण्ड की दिशा और दशा बताती है जिसमें कही गयी है। कई कहानियाँ मर्मस्पर्शी हैं और पाठक की आँख नम कर सकती हैं। इतिहास में जो कहानी चलायी गयी है वह कथावस्तु का सहायक भाग है। इतिहास को अपना तर्क सिद्ध करने के लिये प्रयोग किया गया है क्योंकि लेखक बस्तर अंचल के वर्तमान हालत का कारण अतीत से तलाशता है। उपन्यास की कहानी किसी थाने पर हुए माओवादी हमले से आरंभ होती है और फिर फ्लैशबैक में चली जाती है। जगदलपुर शहर के किसी छात्रावास पहुँच कर कहानी सूक्षमदर्शी वर्गीकरण प्रस्तुत करती है। आदिवासी अंचल और अध्ययन का सम्बन्ध, पढे लिखे आदिवासी युवक-युवतियों के स्वप्न तथा अपेक्षायें, उनके मार्ग की रुकावटे तथा अंतत: मिलने वाला अंधकार और पराजय उपन्यास बखूबी पाठकों को समझा पाता है। लेखक नें आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा के तरीकों को बदले जाने की आवश्यकता बतायी है वहीं विकास और पर्यावरण जैसे संवेदनशील विषय पर हिम्मत के साथ कलम चलाई है। जो बात सबसे प्रभावित करती है वह है विषय के दोनों पहलुओं पर पूरी निष्पक्षता से बात करना। यह उदाहरण देखिये कि “सोमारू ने अपने सामने ही भरे पूरे पहाड़ को जख्मी होते देखा, उसने अपनी नदियो और नालों के पानी को लाल होते देखा और अपने जंगलों को सिमटते भी पाया। सोमारू यह भी महसूस करता था कि उसके गाँव से तेंदुओं और भालुओं ने दूरी बना ली, चीते दिखना बंद हो गये और मैना लापता। सोमारू ने देखा है वह बदलाव कि कैसे सड़क जंगल के सीने से हो कर गुजरने लगी और नयी दुनियाँ ने आकार लिया। जैसे पेड़ की शखायें होती हैं वैसे ही सड़क से भी शाखायें निकलीं और एक उसके गाँव से हो कर भी गुजरी।“ यह उदाहरण विकास का एकपक्षीय समर्थन नहीं करता बल्कि पर्यावरण के प्रति लेखक की जिम्मेदारी का निर्वहन भी करता है। लेखक नें विषय उठाया है कि यदि हमें किसी बन क्षेत्र के संसाधनों का दोहन नहीं करना है तो उस क्षेत्र को अपने संसाधन बचाये रखने का मुआवजा मिलना चाहिये। 

    उपन्यास की बुनावट इस तरह से की गयी है कि पढने वाला बस्तर अंचल की जनजातियों, उनकी परम्परायें, धर्म, कला, सस्कृति से परिचित होता हुआ आगे बढे। स्थान स्थान पर स्थानीय कहावते, लोकोक्तियाँ तथा लोकगीतों के इस्तेमाल नें उपन्यास का प्रवाह बढाया है। उपन्यास में नंगे आदिवासी देखने वाले पर्यटन पर जबरदस्त प्रहार करते हुए लेखक नें पर्यटन पर बहुत सी जानकारियाँ रोचक तरीके से रखी हैं। लेखक नें पंड़ा बैजनाथ से ले कर ब्रम्हदेव शर्मा तक कई प्रशासक और अधिकारियों के निर्णयों और प्रभावों की विवेचना की है। बुद्धिजीविता और सामाजिक आन्दोलनों की विकास के संदर्भ में पड़ताल की गयी है। लेखक नें समकालीनता के नाम पर साहित्य में खेमेबाजी पर भी व्यंग्य किया है। आदिवासी और गैर आदिवासी सम्बन्धों और उनके बीच की दूरियों को समझने के लिये जहाँ शैलेष और सोमारू जैसे पात्र सामने रखे गये हैं वहीं बुदरू और आभा की एकतरफा प्रेमकहानी पाठक को सोचने पर बाध्य कर देती है। बस्तर से बाहर आने के बाद पात्र शैलेष बाहर की दुनिया और उनका बस्तर के प्रति नजरिया देखता है और हो रही राजनीतियों को समझता है। पात्र दीपक के माध्यम से पत्रकारिता और विचारधारा के द्वन्द्व और समाचारों की खेमेबाजी को उजागर किया गया है। 

     नक्सलवाद/माओवाद पर लेखक नें अपनी साफ राय रखी है। लेखक नें आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल, ओडिशा, झारखंड और बिहार से अंतर साफ करते हुए बस्तर अंचल की समस्याओं को सामने रखा है। लेखक की राय है कि चाहे देश के किसी भी हिस्से में माओवाद क्रांति कहा जाये या आन्दोलन वह इस बहस में नहीं है बस्तर अंचल में माओवाद को वह आन्दोलन या क्रांति निरूपित नहीं करता। उपन्यास में बस्तर क्षेत्र में माओवाद से जुडी अबतक की सभी घटनाओं को सामने रखा गया है। बस्तर के अबूझमाड क्षेत्र को माओवाद की आश्रयस्थली मानते हुए अपने यकीन के सभी तथ्य उपन्यास में सामने रखे गये हैं। आम आदिवासी तथा गैर आदिवासियों के माओवाद की त्रासदी को भुगतने की सम्पूर्ण व्यथाकथा है। उपन्यास माओवाद के कारण क्षेत्र में भाषा, संस्कृति, मान्यताओं, गीत-संगीत, रहनसहन आदि पर पडे प्रभावों पर विशेष रूप से बात करता है। लेखक नें जनताना सरकार और वर्तमान व्यवस्था दोनों के सामने सवाल खडे किये हैं। दोनो ओर की बंदूको के बीच पिसते आदिवासी उपन्यास के केन्द्र में हैं। मेरी रुचि यह जानने में थी कि सलवाजुडुम को ले कर लेखक अपने उपन्यास में कौन सी लकीर पकडते हैं। यह उद्धरण महत्व का है - “तो क्या आप सलवा जुडुम के समर्थक हैं?” निधि नें चुभने वाला सवाल किया। “निधि यह एक खेमा पकडने वाली बात है जो सही नहीं है। ऐसा ही सवाल है जैसे कि अरे आप वामपंथी नहीं हैं तो निश्चित ही दक्षिणपंथी हैं? अगर मुझे इन दोनों साँचों में ढलने से इनकार हो तो?” इतना ही नहीं निर्पेक्ष रह कर लेखक नें कहा है कि “अब आप या तो सलवा जुडूम में थे या आप माओवादियों के साथ। लडाई दोनों ही पक्षों के लिये आर पार की थी। यह उनके अस्तित्व का संघर्ष था। इतनी कडुवाहट जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे की रोटी-बेटी का भी सम्मान नहीं करते। नृशंस हत्या और बलात्कार दोनों ही पक्षों की सत्यता थी।“ इसमें संदेह नहीं कि बस्तर में जारी माओवादी हिंसा की लेखक नें भर्तसना की है। आलोचना करने के साथ साथ समाधान पर भी चर्चा हुई है यह बात उपन्यास का महत्व बढा देती है। उपन्यास एक आशावादी अंत देता है जहाँ एक पात्र बुदरू अपने उस सिपाही-सहपाठी दोस्त की विधवा को चूडी पहनाता है जो माओवादी हमले में शहीद हो गया था। 

     यह एक साहसिक उपन्यास है। जिन्होंने अपने आसपास विचारधारा के मकडजाल बुने हुए हैं उनके द्वारा इस किताब के खारिज किये जाने की सौफीसदी संभावना है। यह उपन्यास झकझोरता है, परेशान करता है और सोचने पर मजबूर करता है। यह उपन्यास एक इमानदार कोशिश है। उपन्यास की शैली नयी है तथा कथा की बुनावट असामान्य है। लेखक की भाषा सधी हुई है तथा प्रस्तुतिकरण रोचक है। दो अलग अलग कहानियाँ एक के बाद एक पाठक के सामने आती हैं लेकिन जब वे जुडती हैं तो एक बहुत बडे भूभाग को अतीत से वर्तमान तक सजीव कर देती हैं। यह उपन्यास किसी विचारधारा के साथ नहीं आम आदिवासी के पक्ष में खडा होता है।

    -डॉ. वेद व्यथित

    2 comments:

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